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दिनकर की डायरी

हम सभी जानते हैं दिनकर जी की डायरी न केवल हिंदी साहित्य जगत की थाती है बल्कि यह समूचे भारतीय वांग्मय के लिए वैचारिकी का विपुल संसार है। यह न केवल घटनाओं, विचारों और भावनाओं का दस्तावेज है बल्कि राष्ट्रकवि के तौर पर उनके जीवन में घटी घट्नाओं और संस्मरणों की अनमोल संपदा है। इसका संकलन तैयार किया है उनके पौत्र अरविंद कुमार सिंह ने।

 

2 जनवरी, 1961 (दिल्ली)

कल रात उर्वशी काव्य पूरा हो गया। लगता है, माथे पर से एक बोझ उतर गया। पहले कवि चाहता है कि कविता मुझे पकड़ ले और जब कविता उसे पकड़ लेती हैतब कवि से न सोते बनता है, न जागते बनता है। अधूरी कविता क्षण-क्षण उसके दिमाग में सुई चुभोती रहती है और जब तक पूरी न हो जाए, कवि दिन -रात परेशानी में पड़ा रहता है। रचना का यह दर्द उर्वशी के प्रसंग में मैंने आठ वर्ष तक लगातार भोगा है।

सन् 1953 ई. में आकाशवाणी के पेक्स, श्री कर्तार सिंह दुग्गल  ने मुझसे कहा था कि रेडियो से प्रसारित करने के लिए आप हमें कोई पद्य-नाटक लिखकर दीजिए। उर्वशी का आरंभ दुग्गलजी के उसी अनुरोध से हुआ था और उसका प्रथम अंक रेडियो से प्रसारित भी हुआ था। किन्तु प्रथम अंक के प्रसारित हो जाने के बाद मैंने कहा, दुग्गलजी, अब इसका आगे का अंश  मैं रेडियो की दृष्टि से नहीं लिखूंगा। इस काव्य के भीतर मुझे बहुत बड़ी संभावना दिखाई देने लगी है। अब कविता उसी राह से चलेगी, जिस राह से वह चलना चाहेगी। अतएव रेडियो से प्रसारण की बात वहीं खत्म हो गई।

इस काव्य की रचना में मुझे जितनी कठिनाई हुई है, उतनी कठिनाई किसी अन्य काव्य की रचना में नहीं हुई थी । कविता जहाँ  आकर रुक गई, उसे वहाँ से आगे ले चलने का रास्ता दो-दो वर्ष  तक नहीं सूझा। इस काव्य की पांडुलिपि और अन्य सामग्री को लिए हुए मैं कहां-कहां नहीं घूमा हूँ ? यहाँ  दिल्ली में कभी जयदयाल जी के घर में जा छिपता था, कभी चरतराम जी के घर में। एक बार सारी सामग्री के साथ काश्मीर चला गया था, लेकिन कविता की एक पंक्ति भी नहीं बनी। एक बार राँची  के राय बहादुर हरखचन्द के बागीचे में डेरा डाल दिया था। वहाँ  कुछ थोड़ा काम हुआ। लेकिन ज्यादा काम सन् साठ में हुआ और वह काम आखिर को दिल्ली और पटना में ही हुआ।

सन् साठ में मैं बीमार हो गया था और लगता था कि संभव है, अब चल देना पड़े। मगर उर्वशी को पूरा किए बिना मैं मरना नहीं चाहता था। इसलिए कविता की रचना मैंने जबरदस्ती शुरू कर दी। फिर यही जबरदस्ती प्रेरणा में बदल गई और कविता ने मुझे जोर से पकड़ लिया। किन्तु, जभी मैं गम्भीर समाधि में जाता, मुझे मूर्च्छा  आ जाती। यह बात मैंने पटने के डॉक्टर  घोषाल साहब से कही। उन्होंने कहा, ‘‘ अभी आप काव्य-रचना छोड़ दीजिए।’’ फिर जब मैंने बहुत आग्रह किया कि, ‘अब तो प्राण  का मोह छोड़कर इसे पूरा करना है’, तब उन्होंने कहा कि, ‘मूर्च्छा आने पर थोड़ा-सा मधु चाट लिया करें।’’ इस प्रकार प्राणों का संकट झेलकर मैंने इस काव्य को पूर्ण कर दिया। आज मैं बहुत ही खुश  हूँ, बहुत ही हलका हो गया हूँ ।

उर्वर्शी के कम्पोजीशन से मुझे बहुत ही सन्तोष है। यह काव्य जिस रूप में लिखा  गया है, उसे उससे अधिक सुन्दर रूप में लिखना मेरी शक्ति के बाहर की बात थी। मुझे लगता है, मैंने इसकी रचना नहीं की है, यह अदृश्य में कहीं लिखा-लिखाया पड़ा हुआ था। मैंने मात्र उसका अनुसंधान कर लिया है।

आज पन्त जी को उर्वर्शी के बारे में मैंने जो पत्र लिखा है, उस में अपना यह विश्वास भी लिख दिया है-

मैं घोर चिन्तना में धँसकर / पहुँचा  भाषा के उस तट पर
था जहाँ  काव्य यह धरा हुआ / सब लिखा-लिखया पड़ा हुआ
बस
, झेल गहन गोते का सुख / ले आया इसे जगत् सम्मुख

 21 जनवरी, 1961 (दिल्ली)
श्री मन्मथनाथ गुप्त ने तय किया है कि
उर्वशी मेँ जो चित्र दिए जाएंगे, उन चित्रों का स्केच ज्योति भट्टाचार्य तैयार करेंगे। आज मन्मथ बाबू ने मुझे ज्योति बाबू से मिला दिया।

 25 फरवरी, 1961 (दिल्ली)

श्री नरेन्द्र गोयल आए और कुछ रुपए ले गए। वे संस्कृति के चार अध्याय का अंग्रेजी अनुवाद तैयार कर रहे हैं।

शाम को दद्दा (मैथिलीशरण) का फोन आया कि नाटक चलना है। वे चिरंजीत के साथ आए और मुझे नाटक में ले गए। लेकिन उससे मुझे सन्तोष नहीं हुआ। रात में मैं क्वीन ऑफ  शेवानामक फिल्म देखने चला गया।

 2 मार्च, 1961 (दिल्ली)

फिल्मों पर राष्ट्रपति जो एवार्ड देते हैं, उसकी कमेटी की बैठक चल रही है। सुबह नाश्ता करके फिल्म देखना, दोपहर में फिल्म देखना, फिर रात में फिल्म देखना। यदि डाक्यूमेंटरी को भी गिनें, तो दिन-रात मिलाकर 25 फिल्में देखनी पड़ती हैं। फिल्म देखने की भूख ही मिटती जा रही है।

 7 मार्च, 1961 (दिल्ली)

आज भोर आठ बजकर पचीस मिनट पर पं. गोविन्दवल्लभ जी पन्त का देहान्त हो गया। मैथिलीशरण जी और रायकृष्ण दास जी मेरे घर पर आए। फिर हम तीनों पन्तजी के अंतिम दर्शन के लिए गए। पंडित जी आज देश से बाहर हैं, सो भीड़  को शान्त करने के लिए जो काम वे करते थे, वह काम आज श्री कृष्ण मेनोन ने किया।

खंडवा के श्री विष्णु खरे ने इलियट के वेस्ट लैंड का हिन्दी में मरु प्रदेशके नाम से अनुवाद किया है। इस अनुवाद के प्रकाशक हैं कटक के श्री प्रफुल्लचन्द दास। पिछली बार जब मैं कटक गया था, प्रफुल्ल बाबू मुझे अपने दफ्तर में ले गए थे । हिन्दी में श्रेष्ठ पुस्तकें निकालने का उत्साह उनमें बहुत दिखलाई पड़ा। उनका आग्रह था कि मरु प्रदेशकी भूमिका मैं ही लिखूँ । भूमिका मैंने पिछले साल सितम्बर के आरंभ में ही भेज दी थी। किताब छपकर आज आई है। छपाई स्वच्छ है तथा गेटअप भी मनोरम और गम्भीर है।

30 मार्च 1961 (दिल्ली)

आज राज्यसभा के सत्र का अंतिम दिन था। कैनिंग लेन से साउथ अवेन्यू तक पैदल गया। फिर टैक्सी लेकर अज्ञेयजी से मिलने चला गया। हिन्दी मेँ अज्ञेय ही हैं जो विश्वविद्यालय कि नई प्रवृत्ति के सम्पर्क में रहते हैं। बोलते बहुत काम हैं, शायद इसीलिए शीलवान दिखाई देते हैं। आज भी वे काम ही बोले, ज्यादा बातें मैं ही करता गया। 

1 अप्रैल, 1961 (दिल्ली)

कल से हिंद-पाक सम्मेलन का जलसा चल रहा है। आज विज्ञान भवन में उसका साहित्य-समारोह मेरे सभापतित्व में हुआ। मैं जब बोलने को खड़ा हुआ, पश्चिमी पाकि स्तान के कवि हफीज जलंधरी ने कहा, ‘दिनकर साहब, आप उर्दू में बोलें।यह सुनकर पूर्वी बंगाल के कवि  जसीमउद्दीन खड़े हो गए और बोल उठे, ‘नो, नो, दिनकर, यू मस्ट स्पीक इन बेंगालीहफीज और जसीम, दोनों मेरे मित्र हैं। मैं पसोपेश  में पड़ गया। निदान, मैंने कहा, अगर यह बात है, तब तो मुझे अंग्रेजी में बोलना पड़ेगा, और अपना भाषण मैंने अंग्रेजी में ही दिया।

शौकत थानवी ने अपने भाषण में कहा, ‘पाकिस्तान में हमें उर्दू को आसान बनाना चाहिए। हिन्दुस्तान में आप हिन्दी को आसान बनाने की कोशिश करें।

थानवी ने जब भाषण खत्म किया , मैंने उसके कान में कहा, ‘मानते हो न कि गांधी जी अभी भी पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के लिए रेलेवेंट हैं?’

हफीज के साथ उनकी बेटी भी आई हुई थी। जब हम लोग सभा से निकलने लगे, जसीम ने हफीज से कहा, ‘वाह यार, तुमने अपनी गर्लफ्रेंड से मेरा परिचय क्यों नहीं कराया?’

हफीज ने कहा, ‘ मैं उस तरह का आदमी नहीं हूँ । जिसे तुम मेरी गर्लफ्रेंड समझते हो, वह मेरी बेटी है।

जसीम शर्म के मारे गड़ गया।

27 अक्तूबर, 1962 (पटना)

चीनी आक्रमण, और मैं पटना में बीमार हूँ । लगभग रोज एक कविता लिखकर अपना भय निकालता हूँ। इसी को जनता का साहस बढ़ाना भी कहते हैं।

जब मैं चीन में घूम रहा था, मन में कभी भी यह बात नहीं आई थी कि इस देश से हमारी लड़ाई भी हो सकती है। मगर लड़ाई हो गई। इस संकट से जूझने का एक ही तरीका है कि देश में चीन-विरोधी वातावरण तैयार किया जाए। अभी उस दिन पटना के गाँधी  मैदान में सभा हुई। राजेन्द्र बाबू ने भाषण दिया कि तिब्बत को मुक्त करना होगा। जनता सभा में उमड़कर आई थी। मुझसे किसी लड़के ने कहा, गुरुजी, आज गरजिए। मैंने कहा, गरजकर जिनको बुलाना है, वे तो उमड़कर आप-से-आप आ गए हैं। देखना यह है कि जनता के इस उत्साह से ज्यादा भय चीन को होता है या भारत के नेताओं को।

भारत सरकार साम्यवाद का विरोध नहीं करना चाहती और जनता साम्यवाद के विरोध में गरज रही है। अन्ततोगत्वा जवाहरलालजी की कल्पना ही ठहरने वाली है। लेकिन अभी क्या किया जाए?

साम्यवादियों ने अपनी इज्जत बचाने को यह नारा निकाला है कि दकियानूस लोग नेहरू पर आक्रमण कर रहे हैं, हम नेहरू को बचाएंगे। असल में इस नारे से रक्षा साम्यवादियों की ही हो रही है। पंडित जी से कौन नाराज है? सारी नाराजगी मेनोन के खिलाफ है, जो अब भी आक्रमण को आक्रमण कहने को तैयार नहीं हैं।

रूस भारत का साथ ही नहीं देगा और चीन का साथ देगा, तो फिर अमेरिका की ओर ढुलने के सिवा और चारा क्या है? चीन ने जो मुसीबत खड़ी कर दी है, उसके प्रभाव से देश की विचारधारा को बचाना चाहिए। सबसे बड़ा खतरा हमारी विचारधारा को ही है।

राजा जी ने बयान दिया है कि मेनोन को निकाल दो और किसी भूतपूर्व जेनरल को रक्षामन्त्री बनाओ। हैदराबाद के श्री ब्रहमैया आज मिलने आए थे। उन्होंने कहा, ट्रेन में पढ़े-लिखे लोग इस बयान का स्वागत कर रहे थे।

लगता है, भारत पर पाकिस्तान भी हमला जरूर करेगा। तो फिर हालत यह होगी कि भारत पर बाहर से दो प्रकार के शत्रु चढेंगे और भीतर भी दो प्रकार के पंचमांगी होंगे। यह आक्रमण एक रोग का लक्षण है, जिससे भारत पीड़ित है। यह रोग है अति आजादी का। मैंने अभी हाल ही में लिखा है, ‘देखिए जिसे ही, वही जोर से आजाद है।यह रोग है अति बकवास का, अति गैर-जिम्मेवारी का, अति हड़ताल का । जिस जाति में ये दुर्गुण हों, उसे आजादी नहीं मिलनी चाहिए।

चीनी आक्रमण घोर शाप है, लेकिन वह वरदान में बदला जा सकता है, अगर सरकार जनता के उत्साह को दिशा दे सके। लड़ाई देर तक चले और सभी इलाकों के लोग उससे थोड़ा जल सकें, तभी जनता यह समझेगी कि आजादी कितनी कीमती चीज है और उसकी रक्षा  कैसे की जानी चाहिए।

रक्त-स्नान से भारत शुद्ध हो सकता है। अग्नि-स्नान से देश की ताकत बढ़ सकती है। विपत्तियों के झकोर से वह स्वराज जिन्दा किया जा सकता है, जो पार्सल से आया था।

जब युद्ध होता है, प्रगतिशील शक्तियाँ  दबकर नीचे चली जाती हैं। भारत में भी खतरा यही  है कि युद्ध देर तक चला, तो प्रगतिशील प्रवृत्तियां लापता हो जाएंगी।

 3 नवम्बर, 1962 (पटना)

 कमिश्नर सोहनी साहब और ए0डी0एम0 भट्टाचार्जी कृपा कर मेरे घर पधारे। मैंने अपने दो स्वर्ण पदक राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में दे दिए। साथ में 251 रूपए को चेक भी दिया। जरनलिस्ट श्री जितेन्द प्रसाद सिंह भी उनके साथ आए थे।

 5 मार्च 1963 (दिल्ली)

बहुत-सी नारियां इस भ्रम में रहती हैं कि वे प्यार कर रही हैं। वास्तव मेँ  वे प्रेम किए जाने के कारण आनन्द से भरी होती हैं। चूंकि वे इनकार नहीं कर सकतीं, इसलिए यह समझ लेती हैं कि हम प्रेम कर रही हैं। असल में यह रिझाने का शौक है, हलका व्यभिचार है। प्रेम का पहला चमत्कार व्यभिचार को खत्म करने में है , पार्टनर  के भीतर सच्चा प्रेम जगाने में है। 

8 मार्च 1963 (दिल्ली)

ऐसी औरतें हैं जिन्होंने प्रेम किया ही नहीं है, लेकिन ऐसी औरतें कम हैं, जिन्होंने प्रेम  केवल एक ही बार किया हो।

जब  प्रेम मरता है, तब बची हुई चीज ग्लानि होती है, पश्चाताप होता है। प्रेम आग है, जलने के लिए उसे हवा चाहिए। आशा और भय के समाप्त होते ही प्रेम समाप्त हो जाता है।

सुखमय विवाहित जीवन सम्भव है। स्वादमय विवाहित जीवन सम्भव नहीं है।

प्रेम का नाम नहीं सुनते  तो बहत-से लोग हैं, जो प्रेम में नहीं पड़ते। कवियों और उपन्यास-लेखकों ने प्रेम का प्रचार किया है।

 7 मई, 1963 (दिल्ली)

जे पद हमें नहीं मिला है, अपने  को उसके योग्य सिद्ध करना आसान है, किंतु जिस पद पर हम हैं, उसकी योग्यता सिद्ध करना बड़ा कठिन काम है।

सज्जन तो गुणों  का आदर करते हैं, मगर जनता सौभाग्य का आदर करती है। छलपूर्ण प्रशंसा से उपयोगी आलोचना श्रेष्ठ है, मगर कम ही लेखक उसको पसन्द करते हैं।

महापुरूषों की कीर्ति उन साधनों से नापी जानी चाहिए, जिनका प्रयोग कीर्ति पाने के लिए किया गया है।

एकान्त में भी इस प्रकार  का आचरण, मानो सारा संसार हमें देख रहा हो, यह  पुण्य की पहचान है।

कुछ लोग लोकप्रिय गीत के सामान होते हैं। ऐसे गीत को कुछ दिन गाकर लोग फिर सदा के लिए भूल जाते हैं।

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, आदमी के ज्ञान के साथ उसकी मूर्खता में भी वृद्धि होती है। विरह छोटे प्रेम को संकीर्ण और बड़े प्रेम को विस्तृत बनाता है। तूफान दीये को बुझा देता है, किंतु होली की आग को खूब भड़कता है।

जिसे प्यार करना छोड़ दिया, उसे फिर से प्यार करना मुश्किल काम है।

जवानी बुद्धि के बुखार का नाम है।

जो प्रसिद्धि तुम्हें मिली है, वह इस बात की प्रतिज्ञा है कि तुम और भी प्रसिद्धि प्राप्त करोगे।

18 मई, 1963 (दिल्ली)

 क्लासिक कवि वह है, जो प्राचीन काल के प्रसिद्ध महाकवियों के साथ खड़ा होने की सामर्थ्य रखता है और जिसकी अपील केवल अपने ही काल तक सीमित नहीं रहकर दूरस्थ भविष्य के लिए भी है।

वॉलतेयर ने कहा था कि कोई भी कविता या कोई भी वाक्य, जिसे समझाने की जरूरत महसूस होती है ऐसी चीज  नहीं है, जिसे समझाने की जहमत उठाई जाए।

जो समाज अपनी औरतों को परदों में बंद रखता है और जो समाज उन्हें घूमने-फिरने की आजादी देता है, उन दोनों की कवितायें अलग-अलग ढंग की होंगी।

सुन्दरता के बारे में तर्क जितना ही अधिक किया जाएगा, उसकी अनुभूति उतनी ही कम होगी।

कवि होना उस शुद्ध, जीवन्त बर्बर के समान बनना है जो सोचता नहीं, केवल अनुभव करता है, फील करता है, जिसके भीतर विचार नहीं होते, केवल बिम्ब या चित्र होते हैं।

20 मई, 1963 (दिल्ली)     

आज मुखौटे पर रिल्के की मार्मिक उक्ति पढ़ी।

हर आदमी के कई चेहरे होते हैं। कुछ लोग सालों तक एक ही चेहरा पहने रहते हैं। इस चेहरे का घिस  जाना स्वाभाविक है। वह गन्दा हो  जाता है, मुड़ जाता है, फट जाता है।

मितव्ययी लोग चेहरे नहीं बदलते न उसे धोते, न साफ करते हैं। वे समझते हैं, चेहरा अच्छा है। मगर चेहरा बुरा हो गया है, यह बात उन्हें कौन समझाए?

जिनके पास चेहरे बहुत हैं उन्हें कठिनाई होती है। एक को तो पहन लिया बाकी का क्या करें। बाकी चेहरे बाल-बच्चे पहनेंगे या घर का कुत्ता भी एकाध को पहनकर निकल सकता है।

कुछ लोग फिजूलफखर्ची करते हैं। वे सोचते हैं, चेहरों से सारा गोदाम भरा हुआ है। जितने भी पहनो, वे घटेंगे नहीं। मगर पचास की उम्र होते- होते उन्हें भी लगता है, चेहरों का स्टॉक खत्म हो गया।

23 मई, 1963 (पटना)

मैं बहुत बेचैन हूँ । चाहता हूँ कि कोई आकर कान में कह दे, ‘तुम बेचैन क्यों हो?’ कुछ भी नहीं हुआ है।’ 

8 अप्रैल, 1969 (कलकत्ता)

बारहवीं सदी में फ्रांस में प्रेम आदर का विषय था और प्रेमी इज्जत से देखे जाते थे। इसी कारण साहित्य में एक परम्परा बन गई, जिसका वर्तमान रूप यह है कि नैतिकता की दृष्टि से वासना उत्तम वस्तु है। वासना के लिए यह तनिक भी आवश्यक नहीं है कि वह सामाजिक रस्म-रिवाज या आचरण का ध्यान रखे। जो भी व्यक्ति उद्दामता के साथ प्रेम करता है, वह औसत आदमियों के झुंड में से उठकर उन उन्नत लोगों के बीच पहुँच जाता है, जिनकी संख्या थोड़ी है और जो पाप और पुण्य के पचड़े से निकल गए हैं। यही परम्परा अब सिनेमा में घुसकर ध्वंस फैला रही है। वासना पुण्य और पाप से अलग स्वतंत्र अनुभूति का विषय बन गई है और सिनेमा से शिक्षा यह निकल रही है कि प्रेम आचाारों से मुक्त होता है। लेकिन यह मुक्ति नहीं है। आदमी मुक्त तभी होता है, जब इन्द्रियां उसके वश में आ जाती हैं।

सिनेमा और साहित्य का सस्ता सुयश यह बतलाता है कि मानवता प्रेम के मारे बीमार है।

9 अप्रैल, 1969 (कलकत्ता)

रोमांटिक मर्द किस नारी की ओर जाना चाहता है? उस नारी की ओर, जो सभी नारियों में छिपी विचित्रता का सार है, जो आकर भी नहीं आती है, जो आलिंगन में बँधने पर भी स्पर्श से दूर है, जो आकांक्षा जगाकर उसे तृप्त  करने से भागती है जो शैया में होकर भी पूर्ण रूप से वहाँ नहीं होती, जो बाँह में स्वप्न सदृश उड़ी-उड़ी आती है और लहर-सी लौट तिमिर मे डूब-डूब जाती है।

प्रियतम को रख सके निमज्जित जो अतृप्ति के रस में

पुरूष बड़े सुख से रहता है उस प्रमदा के बस में। (उर्वशी)

21 अप्रैल, 1969 (दिल्ली)

हमारी मान्यताएँ टूटे हुए प्रतीकों के ढेर हैं।

जो दरवाजा आज तक न खुला , वह आगे भी नहीं खुलेगा।

पराजय हमारी इसलिए नहीं है कि हम लड़ते जा रहे हैं।

जीवन की तुम व्याख्या करते हो? तुम जो कुछ कहते हो, वह अटकल और अनुमान है।

1904 ई. में चेस्टर्टन ने एलान किया था, भविष्य का साहित्य बेवकूफी का साहित्य हागा।

आज र. से मिला था। उन्हें किसी ज्योतिषी ने कहा है कि विक्टोरिया मेमोरियल के आसपास गधे चरा करेंगे।

22 अप्रैल, 1969 (दिल्ली)

लगता है, यवनिका गिर रही है, सब खत्म हो रहा है। तुमने फूल बरसाए, उपाधियां दीं, आदर-सम्मान, सब कुछ दिया। किन्तु जिसे ये चीजें मिली थीं, वह अभिनेता था। अब पोशाक नहीं , चेहरे पर रंग नहीं, मंच की भाषा नहीं। मैं नग्न् हूँ । क्या तब भी ये चीजें मेरे पास रहने दोगे?

3 अक्तूबर, 1971 (पटना)

तैयार नहीं हुआ था, तभी फणीश्वरनाथ रेणु आ गए। तैयार हुआ , तब राजेश्वर और नवल बाबू आए । बारह बजे उन लोगों से फुरसत हुई। नौकरी छूटने से कई आराम छूट गए। फिर भी चलता है। शायद टाल्स्टाय ने कहा था- भगवान को धन्यवाद है कि जिन चीजों की हमें जरूरत है, उनका पाना कठिन नहीं है और जिनका पाना कठिन है, वे जीवन के लिए अनिवार्य नहीं है।

रेणु शाम को काफी हाउस ले गए। वहाँ जितेन्द्र प्रसाद सिंह भी आए थे। एक कवि आलोकधन्वा हैं, उनसे भी भेंट हुई। इन उदीयमान कवि का विचार है कि बिहार में दिनकर-दग्ध लोग काफी हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो रेणु से दग्ध हैं।  रेणु ने बताया, पटना के एक कवि महाराज ने यह कहा कि दिनकर चाहते क्या हैंवे अपने को हारा हुआ क्यों मानते हैं? उन्हें तो सब कुछ मिला है।

काश! वे यह समझ पाते कि जो कुछ प्राप्त हुआ, वह तुच्छ था। जिसकी तलाश है, वह अमूल्य है।

6 अक्तूबर, 1971 (दिल्ली)

कल से विनोबा जी का आचार्यकुल पढ़ रहा हूँ, जिसकी मूल शिक्षा यह है कि शिक्षा-विभाग उसी तरह स्वतंत्र होना चाहिए, जैसे न्यायपालिका स्वतंत्र है। जज को यह स्वतंत्रता है  कि वह सरकार के खिलाफ निर्णय ले सके। विनोबा जी कहते हैं कि स्कूलों और कालेजों में भी इस बात की छूट हो कि शिक्षक राज्य की नीति की आलोचना सिखा सकें। जरूरत हो, तो बच्चें को राज्य के खिलाफ भी शिक्षा दे सकें। विनोबा जी के अनुसार पंतजलि का योगशास्त्र शिक्षाशास्त्र का भी ग्रंथ है।

आज आलोकधन्वा कवि रेणु के साथ आए। अपनी एक कविता उन्होंने सुनाई जनता की आदमीमैं कत्ल नहीं कर सकता तो कविता भी नहीं कर सकता। शब्दों से मैं मनुष्य की नई त्वचा गढ़ रहा हूँ । कविता प्रभावकारिणी  है, मैंने उसे प्रबल कहा। गद्य में उन्होंने जो कुछ कहा, उसका भी मुझ पर प्रभाव पड़ा। चेग्वेवारा जिस आन्दोलन के दार्शनिक थे, आलोकधन्वा उसके कवि हैं। उस दिन मैं कहा था, ‘यह नाम तो मेरी कविता का हैवे बोले थे, ‘नाम किसी मित्र ने रख दिया। आपकी कविता मैंने बाद को पढ़ी।नाम चाहे मित्र ने रखा हो, लेकिन मेरी कविता के पहले हिन्दी में यह नाम था नहीं।

17 अक्तूबर, 1971 (पटना)

विचार था कि आज लिखना जमकर होगा, मगर रेणु का फोन आया ग्यारह बजे होटल चलिए।सो बाल-बच्चों को लेकर होटल गया। वहाँ शान्ति नामक कवि से भेंट हुई। कलकत्ते की  भूखी पीढ़ी के दो कवियों से भेंट हुई। उनमें से एक ने कहा, ‘जिज्ञासा यह है कि मैं कौन हूं। उसी जिज्ञासा से मेरी कविता फूटती होगीमैंने कहा, ‘तब तो आप अध्यात्म की बात करते हैं। खुशी की बात है।

रात में साम्प्रदायिकता विरोधी कवि-सम्मेलन का सभापतित्व किया। केवल दो ही शायद उर्दू के आए थे और श्रोताओं में भी मुसलमान दो-चार ही थे, वे भी नेता लोगा। शायद मुसलमान समझ गए हैं कि आन्दोलन मुलम्माबाजी है। एकता का फैसला इस बात से होगा कि इन्दिरा-सरकार बंगलादेश का क्या करती है। खतरनाक बात। नई कांग्रेसवालों को चाहिए कि वे मुस्लिम-सम्पर्क का काम जोर से शुरू करें। केवल जनसंघ का हौवा खड़ा करना छोटी राजनीति है।

28 अक्तूबर, 1971 (पटना)

कल से यशपाल जी का सिंहावलोकनपढ़ रहा हूं- सिंहावलोकन यानी सहस्त्र क्रांति की कहानी। कितनी अच्छी पुस्तक है, मगर मैंने अब तक पढ़ी नहीं थी, गरचे किताब मैंने 1961 ई. में ही खरीद ली थी। इस पुस्तक से यशपाल जी का जो रूप प्रकट होता है, वह प्रशंसनीय है, श्रद्धेय है। एक बार यशपाल जी मन्मथ बाबू के घर गए थे। उस रोज मन्मथ बाबू ने मुझे यह कहकर बुलाया था कि आ जाइए। आज हिन्दी के सबसे बड़े लेखक और सबसे बड़े कवि एक साथ भोजन करेंगे।मैं विवशता के कारण उस दिन उनके घर नहीं जा सका। मगर बातें उनकी याद हैं। मैं हिन्दी का सबसे बड़ा कवि हूँ या नहीं, यह अलग बात है। लेकिन यशपाल शायद हिन्दी लेखकों में, एकाध दृष्टि से, सबसे बड़े आदमी हैं। उसके समान तपे-तपाये मनुष्य का जो आदर हिन्दी में होना चाहिए था, वह शायद नहीं हुआ है। आज मैं भी अपने को थोड़ा दोषी अनुभव कर रहा हूं।  

22 नवम्बर, 1971 (दिल्ली से पटना तूफान ट्रेन में)

पौने नौ बजे तैयार हो गया। डॉक्टर राज आई। डॉक्टर तनेजा सपत्नीक आए। वे ही स्टेशन पहुँचा गए। रास्ते भर विश्वनाथ जी का सहस्रफणउपन्यास पढ़ता आया। जितना पढ़ा, उसमें से कई मुहावरे नोट किए। वे हिन्दी के लिए नए मुहावरे होंगेः

1.    हींग बँधे  कपड़े की बास कहाँ जाएगी?

2.    शास्त्री जी के हाथ में हड्डी नहीं थी। उन्होंने कभी किसी को ना नहीं कहा था।

3.    भुखमरी में दावत के सपने देखना।

4.    दोनों के बीच हरी दूब भी रखी जाती, तो फौरन जल जाती। (क्रोध की व्यंजना)

5.    पशु और बहू के आगमन की बेला की बड़ी महिमा है।

6.    आँखों की भाषा व्याकरण-दोष नहीं जानती।

7.    गाना खत्म होने पर भी थोड़ी देर सुर चलता रहता है।

8.    खेल में लगी मार केले के बराबर होती है।

9.    तुलसी की बगिया में गांजे का पौधा उगेगा?

10.   कुत्ते को क्या मालूम कि नैवेद्य की वस्तु को छूना नहीं चाहिए।

11.   धूप को देखकर छाता पकड़ने की कला में वह निपुण था।

25 नवम्बर, 1971 (पटना)

बचपन में मुझे साँप  ने काटा था। जवानी में राँची  में मुझ पर बिजली गिरी थी। आज प्रातःकाल पक्षाघात का आक्रमण हुआ। मगर वह केवल छूकर चला गया। यह बाबा मुक्तानन्द, माँ , महर्षि रमण और श्री आनन्दमयी माँ का प्रताप माना जाएगा। मथुरा डॉक्टर ए.के.एन.सिन्हा को बुला लाया। वही दवा भी खरीद लाया। मैंने अपने रोग की सूचना बाबा मुक्तानन्द और श्री मां को पत्र से भेजी। केदार नहीं था, इससे मन घबराता रहा। उदयपुर से देवराज जी आए थे, उनसे मिला। बिन्दो बाबू, राजेश्वर, वचनदेव, सभी घेरे रहे। मृत्यु ने स्पर्श करके छोड़ दिया है।

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