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हिंदी गद्य का विकास और डायरी

यह लेख डायरी विधा के उस्ताद डॉ सत्यनारायण का है जिसमें वे डायरी विधा के इतिहास को समूचा आपके सामने प्रस्तुत कर देते हैं। डॉ सत्यनारायण की डायरियां हम सब ‘कथादेश’ में बड़े चाव से पढ़ते आए हैं, इस अंक में उन डायरियों की कुछ बानगी भी पाठकों को मिलेगी।

 

किसी व्यक्ति का दैनिक जीवन कैसा है? उसका दिन किस तरह बीतता है। उस दिन क्या - क्या विशेष घटता है? वह क्या अनुभव करता है, किन लोगों से मिलता है,आदि का लेखा-जोखा जो वह करता है वही उसकी दैनंदिनी है। किसी भी व्यक्ति की दैनंदिनी उसकी निजी दिनचर्या के बारे में होती है इसलिए वह उसकी निजी संपत्ति होती है। आवश्यक नहीं है कि वह अपनी दैनिक घटनाओं, विचारों को दूसरों को भी सुनाए। वह उन्हें अपने तक ही गोपन रखना चाहता है लेकिन उसके साथ दिन में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं या वह कुछ उन विशिष्ट लोगों से मिलता है जिनके बारे में दूसरों को बताने की भी उसकी उत्सुकता रहती है या उसे सार्वजनिक करने में उसे कोई संकोच नहीं होता। इसलिए अधिकतर दैनंदिनियां संपादित होकर ही प्रकाशित होती हैं।

भारत में बही लिखने की परंपरा अति पुरातन रही है। व्यवसायी दैनंदिन  लेखा जोखा बहीखाते में ही करता आया है।ब्राह्मण वर्ग भी अपनी ज्योतिष कार्य की दृष्टि से बहीखाते का प्रयोग करता रहा है। यदि हम चाहे तो इस विधा का उद्गम खींचतान कर प्राचीन युग में ले जा सकते हैं। लेकिन वस्तुतः यह दैनंदिनी आधुनिक काल की ही देन है जो डायरी विधा से प्रचलन में आई और आज डायरी गद्य साहित्य की कथित विधाओं में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। हिंदी गद्य की नई विधाओं में डायरी का महत्वपूर्ण स्थान है। हालांकि डायरी अंग्रेजी शब्द है पर अब उसे हिंदी में पूरी तरह मान्यता मिल चुकी है। हिंदी में दैनंदिनी, वासुरी या वासुरिका शब्द का प्रयोग डायरी के अर्थ में होता है। यह विधा पश्चिम की देन है। हिंदी में गद्य के विकास के साथ-साथ डायरी विधा का विकास हुआ पत्र-पत्रिकाओं का इस विधा को आगे बढ़ाने में विशेष योगदान रहा है।

डायरी का प्रमुख उद्देश्य आत्म विश्लेषण एवं आत्मक विवेचन होता है। इसमें से किसी व्यक्ति विशेष जो स्वयं इसको लिखने वाला होता है का ही व्यक्तित्व प्रतिबिंबित होता है।

यह अलग बात है कि दिन भर में जो व्यक्ति उसके साथ होता है या जिसका उस पर प्रभाव पड़ता है या उसके संपर्क में आता है, के बारे में भी उल्लेख होता है पर मुख्य रूप से लिखने वाले का व्यक्तित्व ही प्रधान होता है। इसमें लेखक समय और स्थान के अनुसार घटनाओं का वर्णन करता है ,यह घटना है उसके व्यक्तित्व विश्लेषण में सहायक होते हैं। कई डायरी लेखक विस्तार से उसकी दैनिक चर्चा का वर्णन करते हैं, कुछ ऐसी भी बातें होती हैं जिनका कोई महत्व नहीं होता। लेखक घटनाओं का प्रभाव इस प्रकार वर्णन करता है कि पाठक सहज ही आकर्षित हो जाता है और उसे लगता है कि यह सब कुछ मेरे साथ ही घटित हुआ और वह उसके साथ अपने को आत्मसात कर लेता है।

डायरी प्रतिदिन लिखी जाती है। कुछ एकाध दिन छोड़कर भी लिखते हैं। कुछ तब जब उन्हें लगता है कि आज का दिन मेरे लिए महत्वपूर्ण या अविस्मरणीय है। लेखक दिन, तिथि, सन के आधार पर अपने जीवन का वर्णन करता है । डायरी में अपने समय, समाज और वातावरण का अधिक महत्व होता है।  इसी के बीच से लेखक का व्यक्तित्व उभर कर आता है।  उस पर पड़ने वाले प्रभावों के साथ उन परिस्थितियों का भी वर्णन होता है, जिनके बीच से वह निकल कर आता है। इस प्रकार डायरी लेखन में निसंकोच अभिव्यक्ति, घटनाओं का वर्णन, मानसिक घात - प्रतिघात तथा सच्चाई आवश्यक है । डायरी लेखन डायरी लेखक का प्रमाणिक विश्लेषण होता है । इसमें सभी विधाओं के समावेश के साथ सभी लेखन विधियों का संस्पर्श होता है। डायरी लेखक समय-समय पर अपने अतीत के अनुभवों की पुनर्समीक्षा करता हुआ अपने को परिभाषित करता हुआ आगे बढ़ता है ।

डायरी साहित्य का विभाजन व्यक्तिगत डायरी और साहित्यिक डायरियों के रूप में किया जा सकता है।  व्यक्तिगत डायरी का संबंध व्यक्ति विशेष से होता है जिसमें लेखक अपने जीवन की घटनाओं, प्रसंगो, निजी अनुभूतियों, विचारों तथा तथ्यों को लिखता  रहता है। ये डायरियां उसका अपना गोपन होती हैं। ये लेखक की, उसकी परिस्थितियों का लेखा-जोखा होती हैं। साहित्यिक डायरियां वस्तुत: दैनंदिनी नहीं होतीं इनमें इसे शिल्प के रूप में अपनाया जाता है। साहित्यिक डायरी में कल्पना को अधिक स्थान दिया जाता है।  ऐसी डायरी में रचनात्मक साहित्य का सृजन होता है। उदाहरण के लिए डॉक्टर देवराज का उपन्यास ' अजय की डायरी ' और मुक्तिबोध की पुस्तक 'एक साहित्यिक की डायरी'.

हिंदी गद्य साहित्य का इतिहास जितना ही पुराना है डायरी का इतिहास भी। पत्र-पत्रिकाओं का इसके विकास में विशेष योगदान रहा। इनमें विभिन्न लेखकों की डायरियों के अंश प्रकाशित होते रहे हैं। राधाचरण गोस्वामी की दैनंदिनी 1885 में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई। इसमें अपने हाथ से लिखी दिनचर्या और कुछ प्रतिज्ञाएं मिलती हैं । इससे यह ज्ञात होता है कि हिंदी के गद्य के प्रारंभिक दौर में ही लेखकों की रूचि डायरी लेखन की ओर रही है। भारतेंदु के समकालीन बालमुकुंद गुप्त की डायरी के अंश जो उन्होंने 1892-1907 के बीच लिखे थे मिलते हैं। यह अंश श्री बनारसी दास गुप्त एवं पंडित झाबरमल शर्मा द्वारा संपादित 'बालकृष्ण स्मारक ग्रंथ' ( 1950 ) में प्रकाशित हुए हैं। इसमें बालमुकुंद गुप्त की दिनचर्या का लेखा-जोखा है, जो वे रोज रात सोने से पहले एकांत में लिखते थे। इसमें तत्कालीन परिवेश की दुर्लभ छवियां अंकित हैं 25 फरवरी 1892 को वे लिखते हैं ---

" आज पंडित प्रताप नारायण जी को काव्य विषयक चिट्ठी जानी चाहिए थी जो लिखी नहीं जा सकी। . । रहबर का मैटर पूरा करके रवाना किया।"  शुरुआती दौर में लिखी गई यह डायरी धरोहर है।

स्वामी सत्यदेव की 'मेरी डायरी (1909) 'अमेरिका दिग्दर्शन', 'अमेरिका पथ प्रदर्शक', और 'अमेरिका भ्रमण' के रूप में मिलती है। अमेरिका भ्रमण वाली डायरी में आठ महीनों का लेखा-जोखा है। इस डायरी से यह भी पता चलता है कभी-कभी कई दिनों का वर्णन एक साथ लिखा गया है। लेखक ने स्वयं पुस्तक परिचय में कहा यह मेरी अढाई महीने की दिनचर्या है, अभी छ: महीने की दिनचर्या बाकी है। यह एक उत्कृष्ट डायरी है।

प्रभुदयाल द्वारा प्रस्तुत डायरी जो 'सरस्वती' के 1921 के सितंबर अंक में प्रकाशित हुई, जिसका शीर्षक है 'एक डायरी के कुछ पृष्ठ', यह डायरी उन्हें किसी दुकान पर मिली थी। जो बांग्ला में थी, इन्होंने उसका अनुवाद किया।

नरेंद्र शास्त्री वेदतीर्थ की 'जेल डायरी' (1930) मालिक और कलात्मक डायरी मानी जाती है। इसमें सच्ची घटनाओं के वर्णन के साथ संवेदनात्मक गहराई है। 'हंस आत्मकथात्मक अंक' जनवरी 1932 में प्रकाशित हुआ। इसमें मुंशी अजमेरी के राय कृष्णदास को लिखे गए पत्र हैंजिनमें 11 से लेकर 19 सितंबर 1929 तक गांधी जी के साथ का दिनचर्या के रूप में वर्णन है।  हंस के इसी आत्मकथात्मक में ही डॉ. धीरेंद्र वर्मा की डायरी का मार्मिक अंश है। जिसमें वे लिखते हैं _

"कभी-कभी शहर की गलियों में जाते हुए चित्त बड़ा उदास हो जाता है। जब दृष्टि सैकड़ों दुखित स्त्री - पुरुषों पर पड़ती है, जो भूख लगाने के कारण घिसटते होते हैं। समझ में नहीं आता यह लोग किस प्रकार से अपना तथा संसार का भला कर रहे हैं।"

प्रोफेसर भगवत दयाल शर्मा द्वारा 1933 में लिखी 'सिंधिया व होल्कर की डायरी' मिलती है , जिसमें इन राजाओं की दिनचर्या का वर्णन है। शिवरानी देवी के द्वारा 25 जून 1936 को लिखी डायरी जो 'हंस' के प्रेमचंद अंक में छपी है बड़ी मार्मिक है -- अतिशय रुगणावस्था में जबकि खून की कै हो रही है और नींद भी नहीं आ रही है..... भयंकर बेचैनी है। ऐसी अवस्था में भी प्रेमचंद मंगलसूत्र लिखे जा रहे हैं।"

1940 में घनश्याम दास बिरला की 'डायरी के कुछ पन्ने' प्रकाशित हुए, हालांकि इसमें मात्र घटनाओं का वर्णन है पर वे वर्णन इस प्रकार करते हैं उसका चित्र पाठक के सामने साकार हो उठता है। रामनरेश त्रिपाठी की भी डायरी '30 दिन मालवीय जी के साथ' (1942)  संस्मरणात्मक डायरी है।

1942 में ही रावी की डायरी प्रकाशित हुई जिसका शीर्षक है 'बुकसेलर की डायरी' इसमें रावी जी ने जीविकोपार्जन के लिए घूम- घूम कर पुस्तके बेचीं, जिसका मार्मिक वर्णन मिलता है। सुंदरलाल त्रिपाठी की 1939 की डायरी जो 1945 में प्रकाशित हुई, यह साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण डायरी है। वे लिखते हैं -- "वर्धा की 12 . 6 .1939 की मेरी डायरी अधूरी रह गई।  डायरी ही क्यों जीवन के ऐसे अनेक कार्य हैं जो अधूरे रह गए।"  इसमें महात्मा गांधी, शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के अतिरिक्त तत्कालीन हिंदी साहित्य साहित्यकारों के बारे में मार्मिक प्रसंग है।

1947 में भगवती चरण वर्मा और लक्ष्मीचंद वाजपेयी की 'डायरी का एक पृष्ठ' प्रकाशित हुई। भगवती चरण वर्मा की 6 जनवरी 1947 की डायरी है तो लक्ष्मीचंद बाजपेयी ने 28 अक्टूबर 1946 के दिन को अपनी डायरी में दर्ज किया है। भगवती चरण वर्मा ने देवी पूजन एवं परिजनों की कथा एवं अर्चना के बारे में लिखा है, वाजपेई ने अपने जन्मदिन व दीपावली के बहाने तत्कालीन स्थितियों पर टिप्पणी की है।

गांधीजी की 'दिल्ली डायरी' 1948 में प्रकाशित हुई। इसमें उनके प्रवचनों का संग्रह है। तिथि के अनुसार दिए गए प्रवचनों में कई विषय हैं जिन पर गांधी जी ने चर्चा की है। महादेव भाई देसाई गांधी जी के भक्त थे। वे सदा उनके सानिध्य में रहे, उन्हीं की गोद में उन्होंने अंतिम सांस ली। महादेव भाई ने गांधीजी को दृष्टि में रखकर वृहद डायरी लिखी जो पहले गुजराती में प्रकाशित हुई और बाद में हिंदी में।  हिंदी में इसका पहला भाग 10.3.1932 से 4.9.1932 तक  ' गांधी जी के साथ यरवदा जेल में दिसंबर 1948 में अहमदाबाद से प्रकाशित हुआ। इसमें दिनचर्या के वर्णन के साथ गांधी जी के भाषण, भेंट, पत्र - व्यवहार के साथ रोजमर्रा की घटनाएं और गांधी जी के विचारों का समावेश है। मनुबैन गांधी की गुजराती से हिंदी में अनूठेदित डायरी भी महत्वपूर्ण है। इसमें 1946 से 1948 तक के गांधी जी के जीवन से संबंधित जीवन - चर्या का वर्णन है। यह चार भागों में प्रकाशित है -  एकला चलो रे (19.12.1946 से 4.3.1947), कलकत्ते का चमत्कार ( 1.8.1947 से 7.8.1947) बिहार की कौमी आग में ( 5.3.1947 से 24.5.1947) तथा दिल्ली डायरी। (8.9.1947 से 30.1.1948) गांधी जी के साथ की ये डायरी भी एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

हिंदी डायरी में गांधी युग का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन एवं गांधी जी के साथ गांधीवादियों के बारे में भी पता चलता है। सुशीला नायर की 'बापू की कारावास कहानी' का अपना योगदान है। यह डायरी बापू ने स्वयं सुशीला नायर से लिखवाई थी, जब वह आगा खां कारावास में बापू के साथ थीं।  इस में वहां की घटनाओं के वर्णन के साथ कस्तूरबा के वहां निधन और बापू पर उसका क्या असर पड़ा की चर्चा हुई है। जमनालाल बजाज बापू के साथ रहे । इनकी डायरी में 1912 से 1915 तक के जीवन का वर्णन है। गांधी जी के संपर्क में आने के कारण उनके जीवन में आए परिवर्तनों के साथ, उस समय के भारत की स्थितियों को इसमें देखा जा सकता है। निर्मला देशपांडे और  दामोदरदास मूंदड़ा की

विनोबा भावे की पदयात्रा से संबंधित दो महत्वपूर्ण डायरियां हैं।

निर्मला देशपांडे की ' सर्वोदय पदयात्रा' और दामोदरदास मूंदड़ा की  'विनोबा के साथ' में विनोबा भावे की भूदान यात्रा के दौरान की गई यात्राओं से संबंधित घटनाओं का वर्णन है। इनका ऐतिहासिक महत्व है। इसी तरह 1957 में प्रकाशित श्रीमन्नारायण अग्रवाल की 'विनोबा जी के साथ सात दिन की डायरी' भी उल्लेखनीय है।

1947 में सुंदर लाल त्रिपाठी ने दैनंदिनी के माध्यम से उल्लेखनीय पहल की लेकिन अब यह विस्मृति के गर्त में समा गई।  प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार इलाचंद्र जोशी की 1952 में 'डायरी के नीरस पृष्ठ' प्रकाशित हुई । इस डायरी का साहित्यिक महत्व है।  इसका नाम नीरस डायरी है पर सच में यह एक सरस डायरी है। आचार्य विनय मोहन शर्मा की डायरी भी महत्वपूर्ण है जिसमें उन्होंने किशोरावस्था में अपनी बीमारी के दौरान लिखा था।

अजित कुमार के क्षेत्र में विशेष योगदान है।  उनकी 'अंकित होने दो' शीर्षक से प्रकाशित संवेदनात्मक डायरी है।

डॉक्टर धीरेंद्र वर्मा द्वारा लिखी एवं 1952 में प्रकाशित 'मेरी कॉलेज डायरी' उनके कॉलेज जीवन का वर्णन है। उन्हीं के शब्दों में -- "यह डायरी मेरे सामाजिक जीवन के लगभग सात मूल्यवान वर्षों का सच्चा आत्मचरित है , जो आज नहीं लिखा जा रहा, बल्कि उसी कच्चे-पक्के रूप में है जिसमें यह तभी लिखा गया था, जब मैं कॉलेज का एक साधारण विद्यार्थी था और यह नहीं जानता था कि जीवन की नदी के थपेड़े मुझे किधर ले जाएंगे। इसकी अपूर्णता और सच्चाई में ही इसका महत्व है। यदि शेष आत्मचरित किसी भी रूप में लिखा गया तो वह जीवन का सिंहावलोकन मात्र होगा। वह अधिक प्रौढ़, परिमार्जित और परिपक्व हो सकता है किंतु किंतु इसमें मन के कुछ कच्चेपन और गदराएपन का आनंद नहीं हो सकेगा जो इस डायरी में मिलेगा।"  यह डायरी  चार भागों में है _ संदेह, संसार, देशदशा और मायाजाल। कॉलेज जीवन के साथ-साथ अन्य कई विषयों पर लेखक की प्रतिक्रिया है। तमाम घटनाओं, विचारों पर लेखक की अपनी वैयक्तिक छाप के साथ स्पष्टवादिता  भी परिलक्षित होती है। इसमें एक श्रेष्ठ डायरी के लगभग सभी गुण विद्यमान हैं। युवावस्था कि उहापोह, मार्मिकता का बेबाक वर्णन इस डायरी में हुआ है।

1959 में उपेंद्रनाथ अश्क की पुस्तक 'ज्यादा अपनी कम पराई' प्रकाशित हुई । इसमें अश्क जी ने 'नई - पुरानी डायरी के पन्नों में जीवन के रहस्यों के बारे में लिखा है। उन्होंने हर घटना को एक शीर्षक के अंतर्गत अभिव्यक्त किया है। जिसमें काव्यात्मक भाषा के उपयोग के साथ तिथियों का विशेष रूप से ध्यान रखा है।

1960 में स्वामी सत्यभक्त द्वारा डायरी के पृष्ठों में 'भगवान महावीर का अंतस्थल में' महावीर के विचारों पर प्रकाश डाला गया है।  1960 में गुलाब राय की 'मेरी असफलताएं' पुस्तक प्रकाशित हुई।  इसमें ' मेरी दैनिकी का एक पृष्ठ' शीर्षक से सितंबर 1945 का रोचक वर्णन है।

'राज्यपाल की डायरी से' भी इसी वर्ष प्रकाशित हुई जिसमें उत्तर प्रदेश के तत्कालीन सूचना निदेशक भगवती शरण सिंह ने प्रस्तुत किया है। इसमें राज्यपाल के कर्तव्य निष्ठा के साथ उसके जीवन के अंतरंग पहलुओं का चित्रण किया गया है। बाल्मीकि चौधरी की 'राष्ट्रपति की डायरी' (1960) में राजेंद्र प्रसाद के जीवन पर प्रकाश डाला गया है । बाल्मीकी चौधरी के अनुसार -- "इस पुस्तक में राष्ट्रपति भवन में रोजमर्रा की घटनाओं तत्संबंधी क्रिया-कलापों, राजनीतिक चित्रपट बनने-बनाने में जो तरह-तरह के दृश्य सामने आए उन्हें गूंथने का प्रयास किया है।"

जगदीश माथुर की पुस्तक 'दस तस्वीरें ' में उनके पिता लक्ष्मी नारायण माथुर 'आदर्श हेड मास्टर और शिक्षक' लेख में 2 अक्टूबर 1918 की उनकी निजी डायरी का जिक्र है--" लोग कहते हैं कि स्कूल के घंटों के बाद भी मैं क्यों स्कूल में काम करता हूं? काश मैं उन्हें बता पाता कि अगर मेरे स्वास्थ्य और शक्ति ने साथ दिया होता तो इससे भी अधिक काम करने में मुझे खुशी होती। आखिर कर्तव्य पालन में ही तो जीवन है । मेरा जो व्यवसाय है अध्यापन उसे तो मैं पसंद ही नहीं करता।"  साप्ताहिक हिंदुस्तान में प्रकाशित पंडित किशोरी दास वाजपेयी की 'हमारे देश रत्न के अंतिम दिन दस दिन' में राजेंद्र प्रसाद जी के अंतिम 10 दिनों का मार्मिक विवरण है।

1961 में रघुवंश की डायरी ' हरि घाटी' ,  डॉ. रामकुमार वर्मा की 'वाराणसी की डायरी' और सीताराम सेक्सरिया द्वारा लिखित  'डायरी के पन्नों में बसंत पंचमी प्रकाशित हुई।

जमुना लाल बजाज की डायरी  सात भागों में 1960 में प्रकाशित हुई। इस डायरी में उनके संघर्ष में जीवन के साथ साथ तत्कालीन समाज एवं राजनीति के बारे में भी पता चलता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध की 'एक साहित्यिक की डायरी' प्रसिद्ध डायरी है जो विचार की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसमें दैनंदिन जीवन की घटनाओं का वर्णन ना होकर विचारों की श्रृंखलाबद्ध कड़ियां हैं। यहां 1968 में प्रकाशित हुई। 1971 में हरिवंश राय बच्चन की 'प्रवास की डायरी' प्रकाशित हुई, जिसमें उन्होंने लंदन में अपनी पीएचडी के दौरान के अनुभवों को दर्ज किया है। 1973 में रामधारी सिंह दिनकर द्वारा लिखी 'दिनकर की डायरी' प्रकाशित हुई । 1976 में रघुवीर सहाय की 'दिल्ली मेरा परदेस' प्रकाशित हुई। 1977 में ही लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 'मेरी जेल डायरी' प्रकाशित हुई। इसी वर्ष चंद्रशेखर कि 'मेरी जेल डायरी' भी प्रकाश में आई। मेरी टायर की 'भारतीय जेलों में पांच वर्ष' 1977 में अंग्रेजी से अनूदित होकर हिंदी में प्रकाशित हुई जिसकी खूब चर्चा हुई । प्रशांत कुमार की डायरी 'आपातकाल के उन्नीस महीने' 1978 में छप कर आई। रामविलास शर्मा की ' पंचरत्न' (1980) रामेश्वर टांटिया द्वारा लिखित 'क्या खोया क्या पाया' 1981 में प्रकाशित हुई।

1982 में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की

' मेरी डायरी' छपी। मोहन राकेश की डायरी 1985 में आई तो विवेकी राय की लिखी 'मनबोध मास्टर की डायरी' 1986 में प्रकाशित हुई। लेखक के शब्दों में--

"डायरी लिखने बैठा हूं तो हरि कीर्तन कानों में गूंजने लगता है।" और अंत में वे लिखते हैं -- " अरे क्या यही 8 जुलाई है जिसके प्रति मेरा इतना खिंचाव था?" फणीश्वर नाथ रेणु की डायरी 'वन तुलसी की गंध' 1984 में आई तो, शमशेर की 'शमशेर' (सं. मलयज) एवं शमशेर की कुछ अन्य गद्य रचनाएं 1979 में प्रकाशित हुईं।

एन फ्रेंक की तरह सबसे कम आयु 1980 में लिखी गई डायरी 'आस्था नवल' की है उन्होंने बचपन में ही डायरी लिखना प्रारंभ कर दिया था और कॉलेज में आई तब तक उनकी डायरी प्रकाशित हो चुकी थी। कम उम्र की होने के बावजूद उनमें प्रकृति प्रेम व जगत को देख लेकर उत्सुकता बराबर है 'आस्था नवल की डायरी' के शीर्षक से यह 2001 में प्रकाशित हुई।

सन 2000 में नामवर सिंह के संपादन में मलयज की डायरी  तीन भागों में प्रकाशित हुई। जिसमें 1951 से लेकर 1982 तक की डायरिया हैं । इससे पहले मलयज की पुस्तक 'हंसते हुए मेरा अकेलापन' प्रकाशित हुई। जिसमें उनके अद्भुत डायरी अंश हैं, इस पुस्तक में वे लिखते हैं - " सुरक्षा डायरी में भी नहीं है, वहां सिर्फ पलायन है । सुरक्षा अगर कहीं हो सकती है तो बाहर सूरज की रोशनी में, अंधेरे में नहीं। अंधेरे में सिर्फ छुपा जा सकता है, एक पल -पल की धुकधुकी के साथ।  सुरक्षा चुनौती को झेलने में ही है। लड़ने में पिसने में और खटने में। बचाने में नहीं, अपने कोसने में नहीं।

और मलयज के अनुसार डायरी कैसी हो - " डायरी मेरे लिए एक दहकता हुआ जंगल हो, एक तटस्थ घोंसला नहीं कि जिसमें अपने पर घुसेड़े जब चाहूं पड़ा रहूं। डायरी मेरे

कर्म की साक्षी हो। मेरे संघर्ष की प्रवक्ता हो।  मेरी सुरक्षा डायरी के कोरे पृष्ठों पर अंकित शब्दों में नहीं उन पर जलती आग के बीच हो । " ये अंश जून 1978 की डायरी के हैं । यह पुस्तक 1982 में प्रकाशित हुई थी।  सन 2000 में प्रकाशित तीन भागों में मलयज की संपूर्ण डायरी है, जिसमें भाग एक में ( 1951 से 1960) भाग दो में (1961 से 1970) भाग तीन में ( 1971 से 1982) तक की डायरियां सम्मिलित हैं। नामवर सिंह के शब्दों में -- "डायरी मलयज के लिए जीने का कर्म का अभिन्न अंग थी । अंतरात्मा का आईना ही नहीं बल्कि एक और जिंदगी शब्दों में रची हुई भरी पूरी दुनिया। शायद इसीलिए मलयज ने डायरी को समग्र विधा के रूप में विकसित किया। जिसमें उनकी मनचाही सभी चीजों के लिए जगह निकल सकती। क्या नहीं है उसमें ? कविता भी, कहानी भी और यात्रा वृतांत भी। अविस्मरणीय व्यक्ति चरित्र पद्धति के दुर्लभ दृश्य चित्र। अपने समकालीन साहित्यकार मित्रों से संवादसाहित्यिक गोष्ठियों की चर्चा को आगे बढ़ाने की कोशिश, किसी चित्र प्रदर्शनी, नाटक की प्रस्तुति , फिल्म के प्रदर्शन पर अपनी आलोचनात्मक प्रतिक्रिया, किसी पढ़ी हुई अंग्रेजी पुस्तक की चर्चा अथवा सद्य: प्रकाशित हिंदी रचना पर तात्कालिक प्रतिक्रिया इत्यादि। इस तरह से देखें तो पचास के दशक के उत्तरार्द्ध से लेकर साठ-सत्तर के दशक तक हिंदी साहित्य के लगभग 25 वर्षों का अंतरंग और प्रामाणिक साक्षी यह डायरी है। मलयज ने अपने समय और समाज पर लिखा है। और अंत तक पहुंचते-पहुंचते जैसे जीवन का एक पैसेंजर सफर पूरा हुआ 19 फरवरी 1982 की डायरी में 'यात्रा' शीर्षक से जैसे यह स्वयं उनकी यात्रा की डायरी है।

" कल जयंती जनता से चलकर बनारस में पैसेंजर पकड़कर आज अपरान्ह महू पश्चात कोया गंज । मेरे बगल में बैठा एक आदमी मैले कपड़ों का जोड़ा पहने, कंधे पर अंगोछा कुर्ता धोती, उसके बाल निहायत छोटे, इतने कि घुटे होने का आभास दें। और काले, पर चेहरा बूढ़ा, आंखें भीतर हिंदुस्तान की गरीबी में डूबी, एक फीकी आस के सहारे जीवन का पैसेंजर सफर पूरा हुआ।"

आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री की डायरी, मोहन राकेश की डायरी 1985 में प्रकाशित हुई। मोहन राकेश की डायरी सीधी सपाट है। निर्मल की पुस्तक 'धुंध से उठती धुन' में डायरी अंश हैं। इनकी डायरी जैसे स्वयं से संवाद हैं। 12 जनवरी 1982 की एक टीप है -- " जब मैं कोई पत्ता झरता हुआ देखता हूं तो कहीं भीतर एक हल्का -सा रोमांच उमगने लगता है। वह अपने झरने में कितना सुंदर दिखाई देता है। अपनी मृत्यु में कितना ग्रेसफुल। आदमी क्या ऐसे नहीं मर सकता या ऐसे क्यों नहीं जी सकता?" निर्मल वर्मा अनुभव खंडों को पकड़ते हैं, उन्हीं के शब्दों में -- "डायरी हमेशा जल्दी में लिखी जाती है उड़ते हुए अनुभवों को पूरी फड़फड़ाहट के साथ पकड़ने का प्रलोभन रहता है। अनेक वाक्य अधूरे रह जाते हैं।"

बिशन टंडन की आपातकाल की डायरी खंड 1 - 2002 खंड 2 -02005। इनमें आपातकाल के दिनों का सरकार का आंतरिक पक्ष उजागर होता है।

कृष्ण बलदेव की 'ख्वाब है दीवाने का 2008 में , 'डुबोया मुझको होने ने' 2008 में प्रकाशित पुस्तकें हैं। इसमें कृष्ण बलदेव वैद की मनोग्रंथियों का पता चलता है। 'डुबोया मुझको होने ने 'पुस्तक में वे लिखते हैं -- " "मैंने कहा कि फिल्म एक अशुद्ध कला विधा है। गांधीजी और चार्ली चैपलिन, रस्किन, शॉ, चर्चिल, श्री अरविंद.....।  अशोक कुछ बेचैन से नजर आए तो वह और मैं अमर डायनिंग हॉल में चले गए। वहां हमारी बात राजदान से होती हुई निर्मल में जा फंसी और बात के दौरान अशोक अचानक सीखपा से हो उठे।  क्योंकि मेरी बात में निर्मल की आलोचना थी। उसकी इमानदारी की आलोचना, मुझे सख्ती से कहना पड़ा कि आप खुद को निर्मल का कस्टोडियन क्यों बनाए हुए हैं? मेरी बात सुनने का सब्र आपने क्यों नहीं? तब वे कुछ शांत हुए । अपनी बात की वज़ाहत करते हुए मैंने कहा कि 'एक बड़े लेखक में भी एक खास दर्जे की बेईमानी का दोष हो सकता है और वह निर्मल में है।' अशोक ने आखिर मेरी बात सुनी और सहमत हुए।"  इस तरह की टिप्पणियां उनकी डायरियों में बहुत मिलती हैं । इसी वर्ष की डायरी में उनकी एक टीप है __ " यह कड़वी हकीकत है कि हम हिंदी के लेखक एक दूसरे को शोक,प्यार , उदारता से नहीं पढ़ते। अक्सर तो पढ़ते ही नहीं पढ़ भी ले तो बता कर ही नहीं देते कि पढ़ लिया है।"  कृष्ण बलदेव वैद की डायरी अपने ही कोने - अंतरों में चक्कर लगाती है । जब यह दूसरों के बारे में लिखते हैं तो भी बेबाक लिखते हैं।

रमेश चंद्र शाह और परमानंद श्रीवास्तव की डायरियां अकसर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। इन दोनों की डायरी में पाठक उन दिनों की हलचलों के अतिरिक्त विभिन्न पुस्तकों से भी इस बहाने परिचित होते रहते हैं । इनमें की गई टिप्पणियां पाठकों का ज्ञान वर्धन करती हैं। मधु कांकरिया के डायरी अंश भी उनके यायावर एवं घुमक्कड़ी के दौरान के अनुभवों की अभिव्यक्ति हैं , जो पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। रामदरश मिश्र की डायरियां भी प्रकाशित होती रहती हैं। लवलीन की डायरी के अंश ' हंसमें प्रकाशित हुए जिनमें उनकी मन:स्थिति का पता चलता है । रघुनंदन त्रिवेदी की डायरी के अंश 'कथादेश' में प्रकाशित हुए। हसन जमाल ने भी अपनी हज यात्रा को लेकर डायरी लिखी जो कोलकाता से प्रकाशित समकालीन सृजन में प्रकाशित हुई। मंगलेश डबराल की पुस्तक 'एक बार आयोवा' 1996 को प्रकाशित हुई।  अपने आयोवा प्रवास के अनुभवों को इस डायरी में अभिव्यक्ति दी है। गोपाल सहर की गुजरात के दंगों को लेकर पहल में छपी 'गुजरात डायरी' काफी चर्चित हुई। प्रसिद्ध कथाकार नाटक का स्वदेश दीपक की पुस्तक मैंने मांडू नहीं देखा 2003 में प्रकाशित हुई। इसे हालांकि  किसी विधा में नहीं बांधा जा सकता पर यह डायरी ही है जिसमें उन्होंने अपनी 7 साल लंबी बीमारी के दौरान हुए अनुभवों को अनूठे ढंग से अभिव्यक्त किया है।  ज़ाबिर हुसैन की 'डोला बीवी की मजार' 2003 की डायरी पुस्तक है। तेजिंदर की 'डायरी सागा सागा' 2004 उड़ीसा के अकाल को लेकर लिखी गई डायरी है। इसमें वे राजनारायण मिश्र के बहाने  लिखते हैं - "जब मैं उस गांव से बाहर आ रहा था तो मैंने देखा कि एक आदिवासी नंगे युवक ने जिस के पास एक तीर कमान था , उसने कमान साथ लगाकर तीर खींचा और आसमान में उड़ते हुए गिद्ध को मार गिराया। जब उड़ते हुए गिद्ध को मार सकते हैं तो समझ लो जिस दिन उन्हें पता चल जाएगा कि उनका दुश्मन कौन है तो क्या वह उसे छोड़ देंगे! उन्होंने हंसते हुए कहा था"

16 जनवरी 2001 की तेजिंद्र की डायरी-टीप दहलाने वाली है , यह ओडिशा के अकाल की भयावहता को दिखाती है। वे लिखते हैं __ " मैं चीखना चाहता था मगर चीख नहीं सका था। मैंने देखा था कि वह आदमी पत्थर की गिट्टी को मुंह में डालकर चबाने लगा था। मैंने ध्यान से देखा कि गिट्टी के ऊपर लाल चींटे चल रहे थे, साथ ही उनके छोटे-छोटे अंडे भी। उस आदमी ने मुंह से एक तरह की कट कट  की आवाज आ रही थी। उसके अंदर जैसे कुछ टूट रहा था, पत्थर की गिट्टी, उसके दांत या फिर लाल चींटों के छोटे-छोटे अंडे। पर उस आदमी के चेहरे पर किसी तरह के हावभाव नहीं थे, जैसे कहीं कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। ना वो लाल चींटों से डर रहा था, ना पत्थर की गिट्टी से, न ही अखबार की संगणना से। सामने रोता हुआ कुत्ता भी चुप हो गया था।  मैं बेतहाशा डर गया था।"

कवियत्री गगन गिल की पुस्तक 'दिल्ली में उनींदे' का एक खंड डायरी का है। गगन गिल की डायरी अपने आप से संवाद है।

'कोचीन- कन्याकुमारी- त्रिवेंद्रम 1994' की डायरी में वह लिखती हैं - "कार्यक्रम समाप्त होने से पहले एक शाम बालम हम सब से मिलने आता है । मैं उदयन, मल्लिका , सुबोध सब उसकी मायावी बातें सुन रहे हैं। वह मुंडेर से पेरियार देखता हुआ कहीं और ही चला गया मालूम होता है। उसकी बातों का कोई सिरा ही हम पकड़ पाते हैं वी आर द एशेज़ ऑफ स्टार्स (हम सब राख है सितारों की)....यह जिस नदी को तुम देख रहे हो इसी में मैंने अपने पिता की अस्थियां बहाई थीं। वह जाने कौन सी घटना बता रहा है, प्राइवेट अपमान, अधूरे प्रेम प्रसंग, अपने ही उत्कटता से कमजोर पड़ती चेतना की डोर.... यह कोई दूसरा ही बालम है। पजेज़्ड! किसी जादू में बोलता हुआ। सहसा वह मुड़ता है, हम चारों को देखता है। कमरे में जाते हुए दिन का मटमैला सा प्रकाश है। पता नहीं हम चारों के चेहरों पर क्या लिखा है कि एक - एक को ध्यान से पढ़ता है। अपने में ही जैसे बुदबुदाता है -- मेरे बाईस दोस्तों ने आत्महत्या की, पंद्रह विक्षिप्त हो गए।

तद्भव 11 अगस्त 2004 के अंक में डॉ. रामविलास शर्मा की डायरी ' मैं ही एक अकेला नहीं' शीर्षक से प्रकाशित हुई है। 11 मई 1980 के दिन वे लिखते हैं -- " कल भाषा परिवार का तीसरा खंड समाप्त किया। अभी दोहराना, जोड़ना - घटाना बाकी है। दस साल का परिश्रम, शरीर आधा रह गयायही दस साल पत्नी की बीमारी के, बेहोशी, नर्सिंग होम, ग्लूकोस, अप्रैल अंत में बीपी फिर बढ़ता हुआ ( 190 /100)इस बीच एक की नाराज़गी, दूसरे का व्यवहार। पुस्तक समाप्ति के अंतिम समय में आने-जाने, टिकने वालों की भीड़! प्रकाशक के पास पहुंच गए गंगा नहाए।"

इसी अंक में राजेंद्र यादव की डायरी "इस तरह के जीवन की तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी' शीर्षक से प्रकाशित हुई 10 सितंबर 1981 कि उनकी टीप है --- "और यही मुद्रा दिल्ली की बौद्धिक, सांस्कृतिकसाहित्यिक जिंदगी का आधारभूत रोग है। कॉफी हाउस टी हाउस जैसी कोई भी केंद्रीय जगह नहीं रह गई है जहां बिना किसी एडजस्टमेंट और उद्देश्य के लोग मिले बैठें, ठट्ठा मारें, काम की बातें हो, बौद्धिक मंथन हो, जहां आप के अपने तर्क, बौद्धिक जागरूकता, समस्याओं और रचनात्मकता को एक दूसरे की टकराहट में आने दें। "

'तद्भव- 8 ' में नमिता सिंह की डायरी 'गुजरात यहां भी है वहां भी है' प्रकाशित हुई।  2 मार्च 2002 अलीगढ़ की डायरी में उनकी टीप है -- "लगता है गोधरा की प्रतिक्रिया का दौर यहां भी शुरू हो चुका है। गुजरात तो एक प्रयोगशाला बन चुका है। यहां उत्तर प्रदेश में कई मिनी प्रयोगशालाएं हैं। अलीगढ़ में तो यह प्रयोग हम पिछले 30- 32 सालों से देख रहे हैं।"

तद्भव -6 के अंक में  '7 अप्रैल 2002 'उलित्सा त्वेर्सकाया में गोर्की की मां से मुलाकात' में डॉ तुलसीराम द्वारा की गयी रूस की यात्रा की डायरी है। तद्भव में ही अनामिका, सुधा अरोड़ा की डायरियां भी प्रकाशित हुई है।

डायरी के विकास में पत्र-पत्रिकाओं का बहुत अधिक योगदान रहा है। अधिकांश डायरियां पहले - पहल पत्र-पत्रिकाओं में ही प्रकाशित हुईं। डायरी केंद्रित विशेषांक केवल एक पत्रिका 'लहर' ने 1965 में प्रकाशित किया। पर यह दो भागों में था जिसमें सुरेंद्र चौधरी, कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह, अमित कुमार, राजेंद्र किशोर, सुरेंद्र अरोड़ा, सुदर्शन चोपड़ा, रघुवंश, गोपीकृष्ण गोपेश, राजकमल चौधरी स्वदेश दीपक, मधुरेश आदि की डायरी के अंश प्रकाशित हुए थे। इन अंको को तीन खंडों 'आत्म निर्वासन और संघर्ष', ' यात्रा और उभरती आकृतियां ' तथा 'कथा के सूत्र टटोलती डायरी' में विभाजित करके प्रकाशित किया गया था । हिंदी डायरी लेखन में 'लहर' के इस विशेषांक का महत्वपूर्ण स्थान है।

इसके अतिरिक्त 'हंस' आत्मकथांक (  जनवरी 1932 ) प्रेमचंद अंक  'परिषद पत्रिका' ( जनवरी 1969) इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी (1993)समालोचक (मई एवं अगस्त 1958 ) नया ज्ञानोदय (जनवरी 1964 ) साप्ताहिक हिंदुस्तान , सारिका, दिनमान आदि पत्रिकाओं में विभिन्न व्यक्तियों के डायरी एंड प्रकाशित होते रहे हैं। श्रीधर पाठक ग्रंथावली (1984)  में 'रघुवीर सहाय रचनावली' में रघुवीर सहाय की डायरियों के अंश प्रकाशित हुए हैं श। निस्संदेह डायरी को एक विधा के रूप में पत्र-पत्रिकाओं की महत्वपूर्ण भूमि मिलती रही है। तद्भव के अतिरिक्त कथादेश, ज्ञानोदय, शेष, दोआबा, समकालीन सृजन , साक्षात्कार, पूर्वाग्रह आदि पत्र-पत्रिकाओं में लेखकों की डायरी के अंश प्रकाशित होते रहे हैं।

डायरी में लेखक अक्सर खुलकर अपनी बात कहता है । उनकी अपनी रचना प्रक्रिया, अपना जीवन , प्रेरणास्रोत, अपनी कामयाबी का रहस्योद्घाटन डायरी द्वारा ही होता है। डायरी लेखक की एक तरह से आत्मकथा भी होती है। किसी भी लेखक के समय, परिवेश और उसके व्यक्तित्व को जानने समझने के साथ डायरी उसके परिवर्तनों की साक्षी भी होती है। हिंदी में डायरियां इन दिनों खूब लिखी जा रही हैं, जो अक्सर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। पुस्तक के रूप में भी उनका प्रकाशन  निरंतर हो रहा है, जो इस विधा को समृद्ध कर रहा है

-डॉ सत्यनारायण

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