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एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी

डॉ. राकेश तिवारी जी हिंदी प्रेमी, बनारसवासी बहुत प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता ही नहीं वे रोमांचक  – यात्राओं के भी प्रेमी हैं। ‘उन यात्राओं का अलग ही शैली में वर्णन उनको वर्तमान में यात्रा वृत्तांत लेखकों की श्रेणी में अलग से रेखांकित करता है।  ' एक सफर डोंगी में डगमग’ उनकी बहुत लोकप्रिय कृति है। राकेश तिवारी आर्कियॉलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पूर्व डायरेक्टर जनरल रह चुके हैं। उनके अनूठे अनुभवों की बानगी पाठक स्वयं देखें। यहाँ प्रस्तुत है उनकी अफगानिस्तान डायरी।

तीसरा ख़त                                                      शिबरग़ान                                     12 अप्रैल 1977     

4.1: 'साझा तहज़ीब का हिस्सा'

प्रिय -----------

--------------------- 

आज का दिन भी सफ़र में नए-नए तजुर्बों से दो-चार होते कटा, अब जा कर ठिकाने पर पहुंचा हूँ, थक कर निढाल। सोचा आज का हाल, हाल के हाल, लिख लूँ नहीं तो कल के लिए ज़्यादा हो जाएगा।     

सुबह उठ कर अगले ठिकाने मज़ार-ए-शरीफ़ की ओर जाने की फ़िराक़ में जल्दी ही कुंदूज़ वाले अन्सारी होटलसे रुखसत पा ली। बाहर, जगह-जगह, दिन में पहली बार मिलते ही लोग तपाक से गले मिलते हुए, एक दूसरे के दाएं और बाएं दोनों गालों पर एक एक बोशा जड़ने के बाद, गर्मजोशी से दोनों हाथों में हाथ थाम कर, आगे-पीछे हिलते, एक सांस में घर-परिवार, बाल-बच्चों, रिश्तेदारों की ख़ैरियत पूछते दिखे। अभिवादन का यह तरीका - अपने प्रणाम, हाथ जोड़ कर नमस्कार, एक हाथ लखनऊवा अंदाज़ में उठाए और सिर झुका कर एक ख़ास अदा में सलाम और अंग्रेजी शेक हैंड - सबसे जुदा, निराला और मेरे लिए अब तक अनजाना।    

बस अड्डेपर जिस बस में सवार हुए वो अपने यहाँ की क़स्बाई बसों से भी ज़्यादा खचाड़ा निकली। डब्बेनुमा फ्रेम के अन्दर निखालिस लकड़ी की सीटें, ऊपर से कपड़ें की एक परत तक नहीं, जिनकी क़तारों के बीच पैर फैलाने भर का भी  फ़ासला नहीं, किसी तरह उसी में अड़स लिए। अगली दो क़तारें  जनानाबाक़ी  सब मर्दाना। ज़्यादा से ज़्यादा नफ़री बढ़ा कर ज़्यादा से ज़्यादा आमदनी के फेर में सवारियां न हुईं होल्डाल-अटैची जैसी जहाँ  जैसे मन आया  ठूंस दी गयीं। छोटी सी मोटर-बस  में, बहुत नहीं तो भी कुल मिला कर चालीस-पचास मर्द-औरत तो रहे ही होंगे। कोई सवारी किसी के भी असबाब पर पैर रख कर निकल जाती किसी को कोई  फरक नहीं पड़ता। ऊँची आवाज़ में इस कदर चाँय-चाँय करते मानो कबाड़ी बाज़ार में आ गए हों।  मज़ार के सफ़र पर निकलते हुए सभी ख़ुशी से लरज़ते नज़र आते।  

 

 काजल सजी आँखें, विभिन्न देश (फोटो: इंटरनेट से) 

बस का किराया अदा करना  ही काफ़ी है, टिकट नहीं मिलता। सवारियां भरते ही, कंडक्टर की 'बोरो बख़ैर' की पुकार के साथ 'मोतर' चल पड़ी। कुछ ही देर में मर्दों ने छोटी-छोटी डिबिया निकाल कर चुटकी भर हरी नसवार होठों के नीचे दबा ली, बिलकुल अपने यहाँ की खैनी (तम्बाकू) दबाने की तर्ज़ पर। और फिर, पूरी बस में नसवार की गंध भर गयी। इसके बाद डिबिया बंद करके वे उसके ढक्कन के ऊपर लगे आईने में आँखें फाड़-फाड़ कर अपने चेहरे का नूर निरखने लगे, चेहरे का ऐंगिल (कोंण) बदल-बदल कर, कुछ देर यूं ही चलता रहा। अगला दौर चला छोटी-छोटी कैंचियों से अपनी-अपनी छितरी दाढ़ी के बहकते काले और चुन-चुन कर सफ़ेदी वाले कोनों को छांटने-तराशने का।  

कल वाले रास्ते पर पीछे बढ़ते रहे। धीरे-धीरे पहचाने हुए पहाड़ करीब आने लगे। नसवार दबाए सवारियां खिड़की से मुंह निकाल कर जब-तब पिच्च-पिच्च थूकती रहीं। कुछ लोग इस वास्ते चौकियों के नीचे रखे डब्बेनुमा थूकदान  निकाल कर उनमें थूक कर फिर वहीँ सरका देते। कुछ लोग इतनी भी ज़हमत उठाने की ज़रूरत न समझ कर वहीं फर्श पर थूक मारते। अक्सर आगे की खिड़की से मारी गयी पीक पीछे वाली सवारियों के चेहरों पर थोप उठती लेकिन उन पर उसका कोई असर नहीं पड़ता, निर्विकार भाव से बस धीरे से पोंछ लेते। और कुछ लोग, बस की धूल और पीक भरी तली पर नज़रें गड़ाए अधसोए से रहते, और उनके मुंह की नसवार से भीनी राल मुंह के कोनों से रिसती हुई दाढ़ी में भर कर हरी-हरी लकीरें बनाती टपकती और दुबारा आइना देखने तक वैसी ही लपटी रहती। 

           पुल-ओ-खुमरी से कुंदूज़, अफ़ग़ानिस्तान (google map)

कुछ थिर हो कर बैठे तो ध्यान गया मासूम बच्चों, जवाँ-मर्दों, बुर्के के पीछे से कभी कभार चमकती कमसिन, कुछ बूढ़ी और कुछ अधेड़ पीली आँखों में गाढ़े सुरमे की डोर की ओर। यह भी एक मनभावन डोर है अपनी साझा तहज़ीब के एक आमफ़हम हिस्से की।  सुरमा लगाने की जो रवायत यहां चल रही है वैसी कम से कम मैंने तो, और कहीं नहीं देखी। पता नहीं फिल्म  'किस्मत' वाले गाने 'कजरा मुहब्बत वाला, अँखियन में ऐसा डाला, कजरे ने ले ली मेरी जान, -------------  दिल्ली शहर का सारा मीना बाज़ार ले के -------- कजरा मोहब्बत वाला' की तर्ज़ पर इनके यहाँ भी कंटीली पनीली आँखों में डाले सुरमे की डोर में मोहब्बत का तड़का लगा कर गुनगुनाने वाले दिलफेंक मिज़ाज होते हैं या नहीं, इस बारे में कुछ पूछताछ ज़रूर करता अगर उनकी जुबां पर दखल रहा होता। साथ ही ज़ेहन में उभरने लगे अपने यहां के आँख का काजल चुरा लेने वाले कहन, बरेली का सुरमा, माथे या गाल पर तनिक या काजल लगा कर नज़र बचाने के टोटके, शादी-ब्याह में बन्ना-बन्नो की आँखों में काजल की सलाई फेरने के रस्म-ओ-रिवाज।    

अपना काजल तैयार किया जाता है तेल के चिराग़ की लौ पर जलाए गए कपूर और बादाम वग़ैरह की कालिख या उसमें तेल की कुछ बूँदें डाल कर, जबकि सुरमा एक तरह का खनिज है। सुलेमान पहाड़पर मिलने वाली इसकी एक क़िस्म 'सुरमा-सुलेमानी' के नाम से मशहूर हुई । आँखो में डोरे डालने के लिए सुरमे की कलम या पेन्सिल भी बनती है। कहते हैं, सुरमा लगाने का चलन यही कोई पांच हज़ार बरस पहले मिस्र देश में चला और फिर दुनिया भर में टहल गया। करीब दो हज़ार बरस बीते, इसकी औषधीय ख़सूसियतों के बारे में रोमन आलिम प्लिनी और उसके बाद औरों ने बहुत कुछ लिखा। इन दावों और उनसे जुड़े सुबूतों की पड़ताल फिर कभी करेंगे, फिलहाल इतना ही समझ लेना काफी होगा कि अपनी तहज़ीब का जितना दायरा हम जानते देखते रहे हैं, उसका घेरा और रिश्ता उससे कहीं दूर तक जाता है।  

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(ख़त अभी जारी है।)

4.2: 'हमारे साथ चलो

सूरज चढ़ने के साथ गरमी बढ़ने लगी। बगल में बैठे बाबा को प्यास लग आयी, उन्होंने पड़ोस में बैठे बाचा से कुछ कहा, दोनों की सफ़ेद-काली दाढ़ियां हरकत में आ गईं। समझ में नहीं आया उन्होंने क्या कहा-सुना, मगर यह देखा कि  कोई बात पूरी लारी में इस सिरे से उस सिरे तक दौड़ गयी। खोज-खाज कर एक सवारी के पास टोंटीदार सुराही निकली। पहले बाबा ने उससे गटागट घूँट भरे, फिर उन्हें देख दूसरे ख़रबूज़े भी रंग बदलने लगे, और लोगों को भी प्यास लग आयी। सुराही एक के हाथ से दूसरों तक घूमने लगी और लोग टोंटी में मुंह लगा कर दो-चार घूँट भरते रहे। अपने यहां जूठन खाना-पीना कतई नहीं होता, मगर इस मुल्क में, बिना जूठे-मीठे का ख्याल किए, एक ही सुराही से इस तरह पीना और एक ही थाल में खाना शुमार होता है भाई-चारे और हरदिल अज़ीज़ी की निशानी के तौर पर ।  

कल वाला गाँव आ गया, लेकिन आज सड़क किनारे के कुंए से पानी निकालता मुसाफिर, शहतूत के पेड़ से बंधा घोड़ा नदारद, सूना-सूना सा माहौल, चमड़े का एक ओर लुढ़का हुआ रीता डोल और रस्सी एक किनारे पड़े दिखे। कुछ सवारियों की गुज़ारिश पर कंडक्टर ने गाडी रोकने लिए आवाज़ लगाई - तो - s - s - शे - s - s - म !!!! और बस के चक्के धीमे होते-होते थम गए।  

तुरत-फुरत उतर कर सवारियाँ इधर-उधर छटक कर इज़ारबंद खोलने लगीं। खाद-पानी की कमी वाली वहां की ज़मीन के मद्देनज़र उन्होंने वहां के किसानों की दोनों ज़रूरतें किसी हद तक एक साथ पूरी कर दीं। उसके बाद कुएं पर खासी चहल-पहल हो गयी। खचर-खचर खचखचाती लकड़ी की गरारी पर चढ़ा कर लोग चमड़े के डोल से पानी निकालने लगे। फिर हाथ-पैर, चेहरा और दाढ़ी के साथ सुराही भरते रहे। लारीवान इंजन की टंकी में पानी भरने लगा और कुछ लोग नान तोड़ने में लग गए। फिर, इत्मीनान से चलते ही सवारियों ने नसवार की डिबियाँ खोल लीं।


                सजी-धजी बस (फोटो: नूरखान, इंटरनेट से) 

पहाड़ आ गए, दरिया का मटमैला पानी उसी तरह बौखलाया हुआ किनारों पर सिर पटकता दिखा। किनारे पर बंधी कश्तियाँ आज भी पार उतरने वालों का इन्तिज़ार करती मिलीं। रंगीला पहाड़ अपनी जगह तो बदल नहीं सकता लेकिन आज उस पर चर रही भेड़ों के रेवड़ और चरवाहों और पहाड़ पर चढ़ते एक बन्दूकधारी ने नया नज़ारा पेश किया। पीछे से आ कर तेज़ी से आगे निकली एक बस की छत पर सवारियां लदी दिखीं। दरिया के उस पार कुछ हरे-भरे खेत और दो चार मिट्टी के मकान, सरपट भागते घोड़ों पर लम्बी दाढ़ी और दस्तार वाले सवार, सामने दूर हिन्दूकुश पर चमचमाती बरफ़।   

फिर आया  पुल-ओ-खुमरी, बाग़लान सूबे की राजधानी, आबादी तीस हज़ार के आस-पास। उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान की व्यापारिक धुरी। नहरी पुल पार करके रास्ता उत्तर-पश्चिम रुख मुड़ गया। एक बार फिर हिन्दूकुश पहाड़ हमारी पीठ की ओर हो गया। चेकोस्लोवाकिया की मदद से 1954 में बन कर तैयार हुआ अफ़ग़ानिस्तान का पहलौठा सीमेन्ट-कारख़ाना  दिखा। सड़क के दाएँ हाथ पर पहाड़ के नीचे गर्म-आब (गरम पानी) का सोता आया। सड़क दो हिस्सों में बंट गयी, एक कुंदूज़ की तरफ़ और 1971 में बनी दूसरी - शमनगान-मज़ार-ए-शरीफ-शिबरगान की ओर। पश्तून बाशिन्दों की बहुतायत वाले कुंदूज़ के उलट यहां ताज़िक ज़्यादा तादाद में दिखे, वैसे दोनों ही जगह इन दोनों के अलावा उज़्बेक, हज़ारा मूल के लोग भी रहते हैं।    

आगे आये ट्रकों-बसों के ठहरने के अड्डे पर हमारी सवारी भी रुक गयी। सवारियां हाथ-पाँव धो कर नमाज़ अदा करने लगीं। ढाबेनुमा होटल, चुंगी और पहले से आयी दो-तीन बसों की सवारियों के अलावा सब सन्नाटा। ढाबे के सामने एक ख़ाली टेबल पर मैं अकेला बैठ गया। नमाज़ के बाद सभी मुसाफ़िर अगल-बगल की खाली पड़ी मेजों के साथ लगी कुर्सियों पर आ बैठे और मन-मुताबिक़ नान, गोश्त, ब्रिन्ज़ (पुलाव), सुर्ख़ या स्याह चाय, कोकाकोला का आर्डर करने लगे। दस अफ़ग़ानी में मेवा, आधी नान और चाय मंगा कर इधर-उधर का मंज़र देखता चाय मैं की चुस्की लेने लगा।   

तभी, एक सजा-धजा ट्रक घों-घों करता आ कर रुका। उससे झूमता हुआ उतरा, पीली ढीली सलवार-कमीज़ में फब रहा जवान पश्तून ड्राइवर। कुछ देर इधर-उधर नज़र फेंकता होटल के हाते में आया और मेरे सामने की कुर्सी पर जम गया। उसे पहले से पहचानने वाले, होटल के कामदार लड़के दौड़ कर वहां आए, उसने अपने खाने का आर्डर दिया: - 'नान-गोश्त'। फिर, उसके जाने के बाद मेरी ओर मुख़ातिब हुआ -  

'पाकिस्तानी ??'   

मेरे इनकार करने पर पूछा - 'हिन्दुस्तानी ??'

'हाँ'। सुन कर, उसने अगला सवाल किया - 'पश्तो नहीं आता ?'

'नहीं, तुमको हिन्दी कैसे आता है ?'

'हिंदी नहीं, उर्दू बोलता।'

ये हिंदी-उर्दू में फ़रक नहीं करते। दोनों को उर्दू ही समझते हैं। 

आगे उसने बताया: - 'अफ़ग़ानिस्तान के जलालाबाद शहर के पास पाकिस्तान के एक पश्तूनी शहर में है अपनी रिहाइश। माल ले कर अक्सर जाता रहता पेशावर-लाहौर, इसी वजह से थोड़ा उर्दू बोलता।'

पूंछता रहा - मैं अफ़ग़ानिस्तान में कहाँ-कहाँ घूमा। कब आया, क्या-क्या देखा। खाना ख़त्म होने पर उसने चाय मंगाई। उसके सवाल पहले की तरह जारी रहे। तब तक हमारी बस का हॉर्न बजने लगा। हमारी हमसफ़र सवारियां उधर बढ़ने लगीं। मैं भी उठने लगा। लेकिन पठान ड्राइवर ने कहा: -

'बस छोड़ दो, ड्राइवर से बोल देता, हमारे साथ चलो, रास्ते में बातें करेगा। हिन्दी-पश्तून दूस्त बिशियार ख़ूब। हमारा मेहमान।

इस अनचीते न्यौते ने पशोपेश में डाल दिया - 'क़तई अनजान ट्रक ड्राइवर, अनजान जगह और मुल्क !!!! 

और वह, मुझे कुछ-कुछ लिखता देख, सवालिया नज़रों से देखता रहा। 

------------------

(ख़त अभी जारी है।)

4.3: 'नमाज़ नहीं पढ़ते'  

उस पश्तून ड्राइवर की निष्कपट आँखें मेरे चेहरे पर टिकी रहीं। और मेरे अंदर मची रही कशमकश - 'कैसे भरोसा करें इस अजनबी पर !! कुछ हो गया तो श्याम को ख़बर तक नहीं मिलेगी !!!!! --------- लेकिन यह ग़लत आदमी तो नहीं लगता !! फिर सुना है पठान मेहमान के साथ कभी भी दग़ाबाज़ी नहीं करते और अगर कभी मेहमान पर ख़तरा आ जाए तो पहले अपना सिर कटाने में गुरेज़ नहीं करते। इसकी आँखें भी बेईमान नहीं लगतीं। -------- इसके अलावा एक अनजान आदमी के साथ अनजाने इलाके में अकेले सफ़र का ऐसा बिरला और रोमांचक लुत्फ़ लेने का नसीब फिर न जाने कब बनेगा !! चलो चल कर देखते हैं, ऐसा भी क्या डरना' ------- इतनी ख़ामोश मगज़मारी के बाद बोल पड़ा - ठीक है। तुम्हारे साथ ट्रक से चलूँगा ----- मेरा सामान बस पर --------'

वह जैसे बोलने को तैयार बैठा हो। मेरी बात पूरी होने से पहले ही बोला - 'परवा (ह) नई।'

  

                         अयनाक, अफ़ग़ानिस्तान
      (
https://asiasociety.org/blog/asia/afghanistans-cultural-heritage-risk-again) 

    अयनाक बौद्ध विहार, अफ़ग़ानिस्तान (फोटो डिडलिएर ताइस (Didlier Tais)      Creative Commons Attribution-Share Alike 3.0 Unported Free to share)

उसकी आँखों में चमक आ गई। तना हुआ चेहरा खुशी की लकीरों से भर गया। उसके इशारे पर क्लीनर मेरा सामान बस से उतार लाया। अब वह मेरी ओर अचरज से देखने लगा। शायद उसे मेरे इस जवाब की उम्मीद नहीं थी, लेकिन इस बाबत खामोश रहते हुए चाय की चुस्की के साथ हमारी बातें चलती रहीं।

उसने पूछा :- 'कहाँ जाओगे ?'

'जहाँ तक ले जाओगे।'

वह बोला :- 'खाना नाश्ता मेरी तरफ से।'

मैंने कहा :- 'जैसी तुम्हारी मर्ज़ी।'

वो मेरी ओर देखता चाय ढालता रहा। क्लीनर ने ट्रक के इंजन की टंकी में पानी भरा। चाय के दाम लेने आये होटल वाले को देख कर मैं जेब टटोलने लगा। लेकिन उसने निकालते हुए कहा:- 'तुम हमारे मेहमान, पैसा हम देंगे।' होटल वाले ने भी उसी की बात मानी। पैसा ले कर चला गया, मेरी ओर देखा तक नहीं।

'बेडफोर्ड' के पुराने मॉडल की ट्रक, इंग्लैण्ड की बनी, झकाझक सजी। चलते-चलते उसने सड़क पर निगाहें जमाए हुए स्टेयरिंग घुमा कर जानना चाहा:- 'पाकिस्तानी गाना सुनोगे ?'

मैंने कहा:- 'नहीं। मुझे रास्ते के बारे में बताते चलो।'

'ठीक है। क्या करते हो ?'

'पढ़ता हूँ।'

'कहाँ पढ़ते हो ?'

'बनारस।'

कुछ देर की चुप्पी के बाद वह फिर बोलने लगा:- 'बस जल्दी पहुंचेगी। ट्रक पर माल लदा है, धीरे-धीरे चलेगा। -------- इधर का आदमी अछा नई। तुम हमारे साथ इस तरह चल दिया परवा (ह) नई। और किसी के साथ ऐसे नई चलना। तुम्हारा नुक्सान कर सकता। ---------'

पूछने पर पता चला उसका नाम:- 'अब्दुल मोहम्मद'

पहाड़ी ढलान पर घुड़सवार चरवाहे के साथ भेड़ें, मोड़ पर मोड़, अगली ढलान पर नरम नई उगी घास. घोड़ों के झुण्ड से बहकते घोड़ों को खदेड़ कर झुण्ड में लाता दूसरा घुड़सवार। अब्दुल ने घोड़े के लिए 'अस' लफ्ज़ का इस्तेमाल किया, यहां के लोग आम तौर पर घोड़े को 'अस' ही कहते हैं जो मुझे संस्कृत के 'अश्व' के नज़दीक लगा।

मिटटी के मकान, ऊँची-ऊँची दीवारें, धूप में चमकती कोई-कोई टीन से छाई छत। गर्मी से पसीना आने लगा। दूर पर एक मिटटी के मकान का मिटटी की ही दीवार वाला बड़ा सा हाता आया। अब्दुल वहीँ उतर कर किसी को आवाज़ लगाने लगा, मगर उसकी आवाज़ तेज़ हवा के झोंकों में डूब-डूब जाती। वह हेडफ़ोन की तरह मुंह के आगे हाथों का गोला लगा कर कोशिश करने लगा। कुछ देर की मशक्क्त के बाद उधर से भी जवाबी आवाज़ आयी। फिर, हवा में फड़फड़ाते सलवार कमीज़ पहने एक खासा ऊंचा जवान उस तरफ से हाथी की तरह डोलता हुआ आता दिखा। अब्दुल उधर बढ़ने लगा। कुछ क़दमों के बाद दोनों दौड़ते हुए नज़दीक पहुंचे और एक दूसरे के हाथ थाम कर बड़ी गर्मजोशी से एक-दूसरे के गाल पर बोसे जड़े और  ख़ैरियत पूछते हुए बाहों में समा गए। फिर, उसने अब्दुल को बाहों में बाँध कर सीने तक तान दिया, अब्दुल के पाँव हवा में छटपटाने लगे।

उस जवान का क़द अब्दुल से एक बालिश्त ऊँचा और छाती छह अँगुल ज़्यादा फैली। लम्बी नाक तोते की टोंट जैसी आगे से मुड़ी। लम्बी बाहें और हाथ लोहारों जैसे कड़े और खुरदुरे। लेकिन रंग, अब्दुल के गोरेपन का ठीक उल्टा सांवला। मेरी ओर देखते हुए मेरी बाबत पूछने लगा। अब्दुल के जवाब में से बस मेहमान शब्द ही पकड़ पाया। उसने आगे बढ़ कर दोनों हाथों में मेरा हाथ थाम लिया, बाज़ जैसी आँखों में नरमी और चेहरा दोस्ताना। मैंने भी भर ताकत अपना हाथ कड़ा किया लेकिन उन शिकंजों का क्या मुकाबला करता। उसने खैरियत पूछते हुए एक सांस में तमाम रस्मी ख़ैर मकदम की । बार-बार सुने को याद करते हुए मैंने जवाब देने की कोशिश की लेकिन लड़खड़ा गया। वह घर चलने की ज़िद करने लगा लेकिन अब्दुल नहीं माना, वहीँ कुछ देर बातें करके आगे चलते हुए दोनों ने 'ख़ुदा हाफ़िज़' कह कर विदा ली।

चढ़ाई पर बढते, हमने घूम कर देखा, अब्दुल का दोस्त वहीँ खड़ा दिखा, तेज़ हवा में फड़फड़ती उसकी सलवार-कमीज़। उसके पीछे सफ़ेद-ख़ाकी-भूरे सूखे पहाड़-पत्थर। कहीं-कहीं फूलते पिश्ते के झाड़। चढ़ते ट्रक से ऐसी आवाज़ निकलती मानो उसका दम निकल रहा हो। दूर हिन्दूकुश की ऊँचाइयों वाली बर्फ़ मुस्कुराती सी लगी। अब्दुल रुक-रुक कर बताता रहा: -

'ये रबातक की मशहूर चढ़ाई। ख़तरनाक। इसके आगे कोई चढ़ाई नहीं। ------------ यहाँ दाड़ा (गाड़ा) लगता। बदमाशों के हथियारबन्द गिरोह यहाँ छुपे रहते, मौक़ा पाते ही दांव लगा कर ट्रक-बस लूट लेते। रात को इधर से गुज़रना नई। पिस्तौल-बन्दूक रखते।' सड़क किनारे एक बोर्ड पर गाँव का नाम दिखा - 'सयाद'। उसने बताया - 'ये जो पहाड़ गिरे हुए, ज़मीन उलट-पलट, ज़लज़ले की करामात। बहुत नुक्सान हुआ। तमाम अफ़राद हलाक़ हो गए। तमाम गाँव तबाह। सामने दूर के पहाड़ों में हज़ार खोह’, कुछ सैलानी उधर देखने जाता। ---------------------------- यहाँ, लड़की वाला पैसा लेता। मुसीबत लड़के वालों का। औरतें नफरी में कमतर, दाम पचास हज़ार से एक लाख अफ़ग़ानी तक लगता। ------------------- नीचे वो जो पानी के पास ख़ैमे लगे, जरायम पेशा हैं वो। चोरी बदमाशी करते। ज़नाना, पेशा करते।'

रबातक का नाम सुनकर याद आया, इस नाम के बहुत समय से सुन रहे इसी नाम के दर्रे का। और, पहाड़ों में हज़ार खोहसुन कर सोचा कहीं अयबाक की बहुत पुरानी खोहें और हज़ार सोम वैलीकी बात तो नहीं कर रहा? फिर तो सुर्ख कोतालनाम की जगह भी यहीं कहीं होनी चाहिए, जहाँ से मिले, आज से दो हज़ार साल से कुछ आगे और पीछे से मध्य एशियासे हिन्दुस्तान तक हुकूमत कर रहे कुषाण हुक्मरानों के समय की विशाल इमारतों, स्तूपों, मूर्तियों और अभिलेख की चर्चा सुनते आए हैं।

आगे, एक ठिकाने पर ट्रक रोक कर हाथ-पैर धो कर नमाज़ पढ़ने की तैयारी करते अब्दुल ने, मुझे वहीँ टहलते देख कर, पूछा - 'तुम नमाज़ नहीं पढ़ते।' तब समझ में आया, इसे यह भी नहीं पता। वह एक ओर चटाई बिछा कर नमाज़ पढ़ने लगा। सड़क पर बसें और टैक्सियां धड़ाधड़ निकलती रहीं। पहाड़ का मटियाला मलबा सड़क पर लुढ़क आया।

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(ख़त अभी जारी है।) 

4.4: 'इतनी भी क्या पाबन्दी !!!'

आगे पहाड़ों के बीच से काट कर बनाया गया इतना संकरा रास्ता आया, जिसके ऊपर दोनों ओर के पहाड़ आपस में जुड़ से गए। जान पड़ता अब गिरे कि तब और हम सब उसके नीचे ज़िंदा दफ़न हुए। नीचे से गुज़रने से पहले अब्दुल ने एक बार फिर से खुदा को याद कर लिया।  ------ समनगान -------- चुंगी, ------- तश्कुरगान --------- चिनार, बादाम, ज़रदालू के दरख़्त। जगह जगह ज़लज़ले से धसकी मिटटी की चहारदीवारी वाली जेल ----- गुंबद वाले मकान। बंजर मैदान। सड़क के एक ओर पहाड़, दूसरी ओर मैदान के कोर पर चमचमाता पानी सा लगा लेकिन निकला मृगमरीचिका का मंज़र। जान पड़ता सामने नख़लिस्तान दिख रहा है लेकिन क़रीब आने पर वही बंजर उजाड़, ठिगने झाड़, मैदान। एक सड़क उत्तर दिशा में बंजर में धंस कर सीधे सोवियत सीमा की ओर धंस गयी। एक के बाद एक सब सरकते गए।  

पूरब में तारिम घाटीचीनी शिनजियांग से बैक्ट्रिया होते हुए तुर्किस्तान से आगे पश्चिम एशियाई मुल्कों के रास्ते पूर्वी यूरोप तक जाने वाले माल लदे ऊंटों और गधों वाले कारवां अभी एक शताब्दी पहले तक 'समनगान' में डेरा डालते रहे।  इस शहर के पुराने नाम 'हैबक', 'अयबक' या 'ऐबक' के उज़्बेकी ज़ुबान में मायने - गुफा में रहने वाले - सीधा इशारा करते हैं, आस-पास की गुफाओं से इनके सीधे रिश्ते की ओर। इसके पास ही दीखते खण्डहरों की पहचान बैक्ट्रिया के राजा यूक्रेटाईडेस प्रथम के बाइस सौ बरस पहले बसाए शहर से की जाती है। 

आज की तारीख़ में 'खोल्म' या 'खुल्म' नाम से जाने जा रहे 'तश्कुरगान' से मिलते-जुलते तश्करगान जैसे नाम के कई शहर हैं- शिनजिआंग (चीन), ताजिकिस्तान, किर्ग़िज़स्तान जैसे मध्य एशिया के मुल्कों में। तुर्की जुबान में इस लफ्ज़ के मायने होते हैं - पत्थर के बने किले, मीनार या बुर्ज, इसलिए इस इलाके में जहाँ-जहाँ ऐसी इमारतें बनीं वो जगहें तश्कऱगन नाम से जानी जाने लगीं।   
 

                  पुल-ए-खोमरी से शिबरग़ान (गूगल मैप)

          

     खोल्म, अफ़ग़ानिस्तान ( Kholm  - Copy Photo Mohammad Shafiq Faqeerzai)

  


 एक चायख़ाने में बैठे अफ़ग़ान
(
Men at a teahouse Photo credit Wendy Tanner at Flickr) 

बगल से गुज़रता लचकते कूबड़ की लय पर बढ़ता ऊंटों का कारवां दिखा। दो ऊँट अचानक एक ओर दौड़ पड़े, उनके पीछे-पीछे उनके दो बछेड़े भी। एक दढ़ियल उनके पीछे लपका। --------------- उसे पीछे आता देख ऊंटों ने अपने दौड़ने की दिशा बदल दी। भागते बछेड़े बहुत प्यारे लगते। उनके पीछे रेतीली धूल माटी का गुबार उठता रहा। --------- थोड़ी ही दूर जा कर बड़े ऊँट जाने क्यों रुक गए। साथ ही बछेड़े भी जहाँ के तहाँ थम गए। ----- दढ़ियल ने नज़दीक पहुँच कर इशारों-इशारों में काबू कर के उन्हें फिर से एक क़तार में ले आया। मानो कुछ हुआ ही ना हो। 

दूर, हरियाली नज़र आने लगी। ------------- सड़क के दोनों बगल फिर से दरख्तों की कतारें आ गयीं। ----------- चहल-पहल, --------- फिर एक चौराहा आया। सामने खूबसूरत मज़ार आयी, झुण्ड के झुण्ड कबूतर। मज़ार के अहाते में खासी भीड़। बाहर सामान बेचने वालों के खोमचे ------------------ हमारा ट्रक आगे निकल गया। अब्दुल बोला:- 'ये मज़ार-ए-शरीफ़।' ------------------------ सड़क की एक शाख फूट कर प्राचीन बैक्ट्रिया या वाह्लीक या बल्ख की इसी नाम की राजधानी ओर बढ़ गयी। कल यहाँ ज़रूर आना होगा।

अब तक बैठे-बैठे कमर अकड़ गयी, भूख भी लगने लगी। अब्दुल से रुकने के लिए कहा। उसने बताया - 'आगे होटल, रूकने का ठिकाना। वहाँ रुकेगा।' बगल से निकलते चले गए - एक पुराने शहर के खण्डहर में तब्दील हो चुके परकोटे के घेरे में माटी के मकान, टूटे-फूटे, ढहे हुए, ऐसे जैसे हवाई जहाज़ से दीखते बिना बर्फ़ वाले सूखे नंगे पहाड़। और कहीं-कहीं इक्का-दुक्का लोग।

एक चायख़ाना, बगल  में एक माटी की दीवार में घिरा हाता। वहीँ पर ट्रक रोक कर उतरते अब्दुल का चेहरा थका हुआ, उनींदा सा, नज़र आया। वो, चायख़ाने के आगे के बरामदे की फर्श पर बिछी चटाइयों में से एक पर, पसर गया।  मैंने भी वहीँ बैठ कर पैर फैला लिए। पास ही पड़े तख़्त पर कुछ लोग चाय पीते और हाते में कपास के मोटे-मोटे गठ्ठरों के ढेर में से एक-एक कर वहीं खड़े दूसरे ट्रक में लदते दिखे। हमारे ट्रक का बोनट खोल कर क्लीनर उसका मुआइना करने लगा। ----------- कुछ देर बाद अब्दुल ने अपने लिए नान-गोश्त और मेरे लिए ब्रिंज (चावल) मंगाया।

बिना किसी से बात किए चुपचाप खा-पी कर वहीँ लेट गए। चारों ओर सन्नाटा। टुकड़े-टुकड़े सोचने लगा - पुरानी आस कुछ-कुछ ही सही पूरी होने की शुरुआत तो हो गयी। ------------- आखिर इस धरती ने अपनी ओर खींच ही लिया। और कैसा इत्तिफ़ाक़ बना !!! चला मज़ार-ए-शरीफ़ के लिए !! सोचा भी नहीं था, रास्ते में अब्दुल मिलेगा। ---------- उसका रबातक वाला दोस्त। --------- मज़ार-ए-शरीफ से भी आगे और आगे निकलते जाएंगे। इस चायख़ाने में दम लूंगा और ब्रिंज खाऊंगा --------  वाक़ई लिखा है दाने-दाने पर खाने  वाले  का  नाम’ ---------- लेकिन अफसोस, आया भी तो निपट अकेला ------------ श्याम काबुल में जाने क्या करते होंगे। ----------- गरमी के इस महीने में वहां इंडिया में लोग घर के दरवाज़े-खिड़कियाँ बन्द करके कूलर वाले कमरे में पड़े होंगे। --------- कालेज के साथी कैफेटेरिया की ओर बढ़ रहे होंगे, ----------- गुरु जी!! प्रागैतिहासिक प्रस्तर-उपकरणों की ढेरियों में से छोटे-छोटे ट्राइएंगल-ट्रेपीज़-ल्यूनेट- बैक्ड ब्लडलेट की अलग-अलग ढेरियाँ लगाते कभी-कभी याद करते होंगे। उन्हें क्या मालूम, यहाँ एक नए दोस्त के साथ, नए और अनजाने मुल्क के चायख़ाने में चुपचाप लेटा उन्हें याद कर रहा होऊंगा। ------------ बल्ख़, बुख़ारा, समरकन्द का बहुत नाम सुनता रहा। बल्ख़ तो देख लूंगा लेकिन बुख़ारा और समरकन्द !!!! बहुत नज़दीक हैं यहाँ से। लेकिन रूस ज़मीनी रास्ते से उधर जाने की इजाज़त नहीं देता, ट्रक-ड्राइवरों की मानें तो, उस पार रूस के फौजी लश्कर जमे होने की वजह से। -------------इजाज़त होती तो ऐसे ही किसी ट्रक से किसी नए दोस्त के साथ वहां की सैर भी कर आता। इतने भर से किसी का क्या बिगड़ जाता लेकिन राजकाज वालों को कौन समझाए कि इतनी भी क्या पाबन्दी’ !!!

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(ख़त अभी जारी है।)

4.5: 'बिन बुलाई बला

आराम से लेटे-लेटे ख़यालों-ख़यालों में सो ही गए होते, अगर उसी समय चाय की दूकान के टेप-रेकार्डर पर बज रहे आवारा फिल्म के सुरीले गीत के हवा में लहराते बोलों ने चैतन्य न कर दिया होता -----

'घर आया मेरा परदेसी,

प्यास बुझी मेरी अँखियन की।

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अब दिल तोड़ के मत जाना,

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कसम तुझे मेरे अँसुअन की,

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तक़रीबन हर एक ट्रक में टेप रेकॉर्डरपर बजते हिन्दुस्तानी गाने यहाँ के आम लोगों में उनकी पसन्दगी की सनद देते हैं।

अब्दुल भी उठ कर बैठ गया और दो चनक चाय का आर्डर दे कर अंगड़ाई लेने लगा। फिर, कपास के गट्ठरों से लदे ट्रकों की ओर देखते हुए जाने-पहचाने अंदाज़ में हमसे सवाल किया - 'हिन्द में कपास होता है ?' हमारा जवाब सुन कर चुप लगा गया। अचानक तेज़ हवाओं के झोंके आने लगे। चाय पी कर, आगे के लिए सड़क पर निकले तो पूरी संजीदगी से अगला सवाल किया: – 'शिबरगान में कहाँ ठहरोगे ?'

मैंने पलट कर सवालिया जवाब दिया - 'तुम कहाँ ठहरोगे ?'

'सराय में।' उसने खामोशी से बताया।

                    कारवाँ सराय, अफ़ग़ानिस्तान
(
Photo : maxresdefault Afghanistan, Oskar von Niedermayer Collection 1910 - Copy - Copy) 

सराय !!! सुन कर ----- अपना मन एक बार फिर से ख़यालों में उड़ कर उतर गया बचपन में चन्दा मामा में पढ़ी कहानियों में पढ़ी बग़दादी सराय में। 'नासिर या दुल्ला या अब्दुल्ला, ऐसे ही किसी नाम वाला मुसाफ़िर ------- शाम ढले किसी सराय में पहुँच गया ---------- सराय में बंधे घोड़ों के साथ अपना घोड़ा भी बाँध कर उस पर बंधी जीन  उतारी। -------------कुंए की गरारी पर रस्सी चढ़ा कर चमड़े के डोल से पानी खींचता, हाथ मुंह धोता, चटाई बिछा कर नमाज़ पढ़ता, थके-हारे राही आराम करते ----------------- उन्हीं में शामिल कुछ चोर-बटमार --------- अहाते में ही ठहरी, कहीं जा रही एक शहज़ादी, पूरे लाव-लश्कर के साथ, -------------------- दूर मुल्क से आया शहज़ादा अपने कारवां के साथ। लम्बे सफ़र में थका हुआ। उसका ऊंचा घोड़ा भी हांफता हुआ --------------- सराय में एक हसीन ठगिनी भी, एक अकेली बुढ़िया के साथ भी वहीँ एक कोठरी में ठहरी। बुर्के के पीछे से दमकते नूर पर आते-जाते मर्द दीवाने हुए जाते। --------- सुबह होने पर वह ठगिनी गायब मिली, उन सबके दिल ही नहीं, असबाब सहित। ----------- ऐसी ही होगी यह सराय भी, आज मिलेगा उसमें ठहरने का तजुर्बा भी।' और तब अब्दुल के सवाल का सोचा-विचारा जवाब दिया - 'तुम्हारे साथ ही रुकूंगा। ट्रक पर ही सो जाऊंगा।'

यह सुन कर उसकी पेशानी पर परेशानी उभरने लगी लेकिन खामोश रहा। सड़क खाली, संवलाया आसमान, पश्चिम में क्षितिज पर हलकी लाली, पेड़ों की कतारें और हरियाली। शिबरगान आते-आते सड़क दो शाख़ों में बँट गयी। खड़खड़ाते दौड़ते टाँगे, दूकानों पर कुछ गाहक, चायख़ाने के बाहर पड़े तख़्त पर बैठे लोग। दाएं खेल का बड़ा मैदान। दाएं बाजू चलती सवारियाँ (कीप राइट)। दाएं मुड़ कर बाएं चले। कोने पर कचहरी। खड़े हुए कई ट्रक। सब जगह आदमियों की आमदरफ़्त और तादाद बहुत कम। मोटे-मोटे अंदाज़े से लगा पूरे शहर की आबादी बीस हज़ार से कुछ ऊपर होगी।

मेरे ख़्यालों में बसी सराय जैसी ही निकली वह चौकोर सराय जहाँ जा कर हमारा ट्रक ठहरा। अब्दुल खामोशी से उतरा, हाथ-मुंह धोने के बाद, चटाई उठा कर नमाज़ पढ़ने चला गया। मैं वहीँ चुपचाप टहलते हुए सराय का जायज़ा लेने लगा। एक के ऊपर एक कायदे से धरे मिट्टी के बड़े-बड़े खण्डों से उठाई गयी दीवार के साथ लगे बड़े और ऊंचे दरवाज़े से दाख़िला। अन्दर भी वैसी ही नीची दीवारों से बंटे ख़ित्ते। किनारों पर मिटटी की छोटी कोठरियों की क़तार। उनके ऊपर अधबने गुम्बद या चंदोवे जैसी उठी छत की क़तार। झुटपुटी ख़ामोशी। माहौल पर पुर असर रहस्य की चादर। बीच में कुआं, उस पर वैसा ही चमड़े का डोल। दुल्ले नुमा कुल्ले वाले एक दो मुसाफ़िर। एक बुढ़िया भी, मगर ठगिनी जैसी कोई कमसिन कहीं नहीं नज़र आयी। शहज़ादी और उसके सिपाही, शहज़ादा और ऊंचा घोड़ा भी नहीं। फिर भी बाक़ी सब वैसा ही पा कर सुकून पाया। 

अब्दुल लौटा तो बिलकुल बदले मिज़ाज में। आहिस्ता-आहिस्ता क़दम रखता पास आ कर पूरी संजीदगी से बोला - 'तुम सरकारी होटल में ठहर जाओ। सराय अच्छी जगह नई। यहाँ तुम्हें कुछ हो गया तो तुम्हारे लोगों को पता भी नहीं चलेगा। हम भी मुसीबत में पड़ेगा।' उसकी आवाज़ घबराहट भरी लड़खड़ाती हुई। जाने क्यों डरा-डरा सा लगा। उसके मासूम चेहरे पर खिसियाहट, शर्म और मजबूरी के मिले-जुले भाव आते-जाते। वजह पूछना ठीक नहीं लगा। होटल के सुपुर्द करके विदाई लेते वक़्त नज़रें चुराते हुए अब्दुल ऐसे वापस चला गया जैसे कोई ख़ता हो गयी हो। शायद उसे लगा हो - पता नहीं कैसे आदमी से पाला पड़ गया, कौन है किस मक़सद से गैर मुल्क में भी इस तरह बेख़ौफ़। एक बार मोहब्बत से बुला क्या लिया, बिन बुलाई बला जैसा लग लिया, किसी तरह इससे पिण्ड छुड़ाना ही भला होगा। चाहे  जो कुछ भी रहा हो उसके मन में वही जाने मगर  ऐसे परदेशी दोस्त किस्मत वालों को ही मिलते हैं।

अब आज का हाल यहीं पर छोड़ कर चलता हूँ नींद के आगोश में। आगे का हाल कहीं और से।

तेरा -----

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-डॉ. राकेश तिवारी

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