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एक फौजी की डायरी - गौतम राजऋषि

1.               इक रास्ता है ज़िन्दगी जो थम गए तो कुछ नहीं

 

र्द सीलन भरे पत्थरों से बने इस बंकर से दूर, इस बेजान एके-47 के कुंदे से परे, इस ऊँचे पहाड़ की भेदती हवाओं से कहीं हटकर...चाहता हूँ बँट जाना मैं भी बेतरतीब-सी कुछ पंक्तियों में छोटे-बड़े, ऊपर-नीचे लिखे हुये चंद जुमलों में, तमाम  बंदिशों से आजाद, उन्मुक्त, बदहवाश...कि समेट सकूँ खुद की कविता में पापा की बिगड़ती तबीयत, माँ की व्याकुल पेशानी वाली सिलवटें, बारुद की गंध, रेत भरी बोरियों से बने सरहद पर के ये सारे मोर्चे, दीपिका पादुकोण की मुस्कुराती आँखें, कुछ लड़कियों के भूले-बिसरे नाम, अपनी इकलौती छुटकी की खिलखिलाहट और ढ़ेर सारी...ढेर-ढेर सारी छुट्टियाँ...ये सब कुछ एक साथ |

कितना मुश्किल है सबको...किसी को भी समझा पाना कि ड्यूटी पर मुस्तैद खड़े सिपाही के लिए कई बार छुट्टी के बारे में सोचना तक गुनाह जैसा लगता है...

...कि मेरे विराम में भी चलना निहित था और तुम देखते रहे बस ठहराव मेरा।

...कि उन क्षणों का आर्तनाद जिन्हें तुम स्वप्न में भी नहीं चाहोगे सुनना और जिन्हें भोगना था मेरी नियति, भोगने की चीख़ नहीं सुनी तुमने...नियति की किलकारियाँ सुनी।

...कि प्रतिबद्धताओं की नई परिभाषायें लिखने में टूटी उँगलियों से लिखा नहीं जाता जवाब तुम्हारे सवालों में छुपे आरोपों का। ...कि सच तो ये है कोई मायने नहीं रखता ये देखना, ये सुनना, ये सवाल उठाना

...कि जब पिता की विलुप्त होती स्मृतियों में भी नहीं रहता शेष मेरा समर्पण या मेरा शौर्य, किंतु बचा रह जाता है मेरी वाजिब अनुपस्थितियों का ग़ैरवाजिब निकम्मापन !

और फिर यूँ ही ययाति का क़िस्सा याद आता है देर रात के इन फैले-फैले सरहद के आशंकित रतजगों में पापा के बारे सोच कर | अपने ही श्वसुर और दैत्यों के गुरू शुक्राचार्य के क्रोध से उपजे शाप से ग्रसित हो असामयिक बुढ़ापे को पाकर, ययाति ने जाने किस मानसिक विचलन में आकर अपने पाँच पुत्रों से उनके यौवन के हिस्से की उधार-याचना की थी कभी प्राचीन काल में । बचपन में पढी हुई कहानी में जितना याद आ रहा कि शायद पाँच पुत्रों में से सबसे छोटा वाला, पुरू, ही तैयार हुआ था पिता की इच्छा पूरी करने को । इसी कहानी से एक आवारा-सी सोच अपना सर उठाती है यूँ ही कि इस चकित करने वाले तकनीकी-युग में विज्ञान के पास भी ऐसा कोई जुगाड़ होता काश कि रक्त-दान, अंग-दान की तरह ही कोई पुत्र अपने पिता को खुद के यौवन का हिस्सा भी दान कर पाता...! आह ये सारे काश’ !!!

रतजगों की तासीर भी जाने कैसे-कैसे काशबुनती रहती है !

इधर पता चला कि कल रात देर तक...बहुत देर तक छींकता रहा था वो सलेटी-सा पसरा हुआ पत्थर | हाँ, वही पत्थर...वो बड़ा-सा, जो दूर से ही अपने आकार और अपने सलेटीपने की बदौलत एकदम अलग सा नजर आता है उतरती ढ़लान पर, जिसके ठीक बाद चीड़ और देवदारों की श्रृंखला शुरू हो जाती है और जिसके तनिक और आगे जाने के बाद आती है वो छद्म काल्पनिक समस्त विवादों की जड़, वो सरहद नाम वाली रेखा | हाँ, वही सलेटी-सा पसरा हुआ पत्थर, जिस पर हर बार या तो किसी थकी हुई दोपहरका या किसी पस्त-सी शामका बैठना होता है गश्त से लौटते हुये ढाई घंटे वाली खड़ी चढ़ाई से पहले सांस लेने के लिए और सुलगाने के लिए विल्स क्लासिक की चौरासी मीलीमीटर लम्बी नन्ही-सी दंडिका |

...कैसे तो कैसे हर बार कोई ना कोई घबड़ायी-सी पसीजी हुई आवाज आ ही जाती है गश्त खत्म होने के तुरत बाद पीछे आती गश्त की टोली से "वहाँ उतनी देर तक बैठना ठीक नहीं साब, दुश्मन स्नाइपर की रेंज में है वो पत्थर और फिर उन सरफ़िरों का क्या भरोसा" | हम्म... सच ही तो कहती हैं वो पसीजी-सी आवाजें | लेकिन जाने कैसा तो भरोसा उस पत्थर का है, उस पत्थर पर के सलेटी पड़ाव का है, उस चंद मिनटों वाली अलसायी बैठकी का है, उन चीड़ और देवदारों की देवताकार (दैत्याकार नहीं) ऊंचाईयों का है और उस धुआँ उगलती नन्ही-सी दंडिका का है | कौन समझाये लेकिन उन घबड़ायी-सी पसीजी हुई आवाजों को ! बस एक अरे-कुछ-नहीं-होता-वाली मुस्कान लिए हर बार वो थकी-सी दोपहरया वो पस्त-सी शामसोचने लगती है कि अगली बार शर्तिया उस पत्थर की पसरी हुई सलेटी-सलेटी छाती पर ग़ालिब का कोई शेर या गुलज़ार की कोई नज़्म लिख छोड़ आनी है | क्या पता उस पार से भी कोई सरफ़िरी दोपहर या शाम आये गश्त करते हुये, पढे और जवाब में कुछ लिख छोड जाये...!!!

कितने सफ़े

हुये होंगे दफ्न

पत्थर की चौड़ी छाती में

कोई नज़्म तलाशूँ

कोई गीत ढूँढ लूँ

कि

एक सफ़ा तो मेरा हो... 

...और कल की शामगश्त से लौटते समय बारिश में नहाई हुई थी | ढाई घंटे की चढ़ाई जाने कितनी बार फिसली थी शामके कदमों तले और हर फिसलन ने मिन्नतें की थीं शामसे कि ठहर जाओ रात भर के लिए यहीं इसी पत्थर के गिर्द ठहरना तो मुश्किल था शामके लिए...हाँ, वो चंद मिनटों वाला पड़ाव जरूर कुछ लंबा-सा हो गया था...कि बारिश की बूंदों से गीली हुई चौरासी मीलीमीटर वाली विल्स क्लासिक की उस पतली-दुबली नन्ही दंडिका ने बड़ा समय लिया सुलगने में और उस देरी से खीझ कर पानी भरे जूतों के अंदर गीले जुराबों ने तो ज़िद ही मचा दी थी | ज़िद...जूतों से बाहर निकल पसरे पत्थर पर थोड़ी देर लेट कर उसकी सलेटी गर्मी पाने की ज़िद | सुना है, देर तक चंद नज़्मों की लेन-देन भी हुई जुराबों और पत्थर के दरम्यान | जुराबें तो सूख गई थीं...वो लेटा सा सलेटी पत्थर गीला रह गया था |

...और देर तक छींकता रहा था वो पत्थर कल रात...पसरी-सी सलेटी-सलेटी छींकें !

दूर वाले मोर्चे से संतरी-ड्यूटी पर खड़े नायक महेश के गाने की आवाज़ आ रही है...

जाते हुए राही के साए में सिमटना क्या

इक पल के मुसाफ़िर के दामन से लिपटना क्या

आते हुए कदमों से, जाते हुए कदमों से

भरी रहेगी राहगुज़र जो हम गए तो कुछ नहीं

इक रास्ता है ज़िन्दगी जो थम गए तो कुछ नहीं  

2.                   करुणा में हमेशा एक निजी इतिहास होता है

रातों को जैसे खत्म ना होने की लत लग गयी है इन दिनों...बर्फ क्या पिघली, जाते-जाते कमबख़्त ने जैसे रातों को खींच कर तान दिया है | इतनी लम्बी रातें कि सुबह होने तक पूरी उम्र ही बीत जाये ! "रोमियो चार्ली फॉर टाइगर...ऑल ओके ! ओवर !" छोटे वायरलेस सेट पर की ये ऑल ओके की धुन इन लम्बी रातों में गुलज़ार की नज़्मों और ग़ालिब के शेरों से भी ज़्यादा सूदिंग लगती है | बंकर के कोने में उदास पड़े सफेद लम्बे भारी भरकम स्नो-बूट्स के तस्मों से अभी भी चिपके हुये दो-एक बुरादे बर्फ के, फुसफुसाते हुये किस्सागोई करते सुने जा सकते हैं...  उन सुकून भरी बर्फ़ीली रातों की किस्सागोई, जब जेहाद के आसेबों को भी सर्दी लगती थी |

...और इन लम्बी-लम्बी रातों में आकार बदलते चाँद से ही गुफ्तगू होती है अक्सर | मगर ये कमीना चाँद इतनी जल्दी-जल्दी क्यों अमावस की तरफ भागता है ? बर्फ़ पिघल जाने के बाद तो इस मुए चाँद की रौशनी की ही तो दरकार है सरहद पर चौकस निगह-बानी की ख़ातिर | इन लम्बी रातों वाले मौसम तलक भूल नहीं सकता है क्या ये बदमाश अपनी फेज-शिफ्टिंग के आसमानी हुक्म को ?

कल रात बड़ी देर तक ठिठका रहा था वो आधा से कुछ ज्यादा चाँद अपनी ठुड्ढी उठाए सरहद के उस पार पहाड़ी पर बने छोटे से बंकर की छत पर | अज़ब-गज़ब सी रात थी...सुबह से लेकर देर शाम तक लरज़ते बादलों की टोलियाँ अचानक से लापता हो गईं रात के जवान होते ही | उस आधे से कुछ ज्यादा वाले चाँद का ही तिलिस्म था ऐसा या फिर दिन भर लदे-फदे बादल थक गए थे आसमान की तानाशाही से...जो भी था, सब मिल-जुल कर एक विचित्र-सा प्रतिरोध पैदा कर रहे थे | ....प्रतिरोध ? हाँ, प्रतिरोध ही तो कि दिन के उजाले में उस पार पहाड़ी पर बना यही बंकर सख़्त नजरों से घूरता रहता है इस ज़ानिब राइफल की नली सामने किए हुये और रात के अंधेरे में अब उसी के छत से कमबख़्त चाँद घूर रहा था सोच रहा हूँ, अब के जो दिखा बदमाश यूँ ही घूरता हुआ...उठा लाऊँगा उस पार से और रख लूँगा तपते तलवों पर स्लीपिंग बैग के भीतर | यूँ उस चाँद को उठा कर ले आने की ख्वाहिश कुफ़्र में शामिल तो नहीं हो जायेगी कि जब जा बसा हो वो मुआ चाँद दुश्मनों के ख़ेमे में ?

...और ये आँखें जाने क्यों नम हो आयी हैं

विगत हजार...दस हजार सालों से, जब से ये हरी वर्दी शरीर का हिस्सा बनी है, इन आँखों ने आँसु बहाने के कुछ अजब कायदे ढ़ूंढ़ निकाले हैं । किसी खूबसूरत कविता पे रो उठने वाली ये आँखें, कहानी-उपन्यासों में पलकें नम कर लेने वाली ये आँखें, किसी फिल्म के भावुक दृश्‍यों पे डबडबा जाने वाली ये आँखें, हर छुट्टी से वापस ड्‍यूटी पर आते समय माँ के आँसुओं का मुँह फेर कर साथ निभाने वाली ये आँखें...आश्‍चर्यजनक रूप से किसी मौत पर आँसु नहीं बहाती हैं । अभी हफ्ते भर पहले भी नहीं रोयीं, जब नीचे जंगल में वो नौजवान मेजर सीने में तेरह गोलियाँ समोये अपने से ज्यादा फ़िक्र अपने गिरे हुये जवान की जान बचाने के लिये करता हुआ शहीद हो गया । ट्रिगर दबने के बाद दो हजार तीन सौ पचास फिट प्रति सेकेंड की रफ़्तार से एके-47 के बैरल से निकली हुई गोली जब शरीर में पैबस्त करती है तो ठीक उस वक़्त शरीर को आभास तक नहीं होता और जब तक होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है | दरअसल शौर्य दुश्मन पर गोली चलाने या गोली खाने में नहीं है...शौर्य तो उस इरादे में है, जो ये जानते-बूझते भी कि वहाँ मौत छुपी है मगर फिर भी वो इरादे डिगते नहीं, जाते हैं उसी जानिब मौत से दो-दो हाथ करने |

शौर्य ने एक नया नाम लिया खुद के लिये...मेजर सतीश का नाम । उम्र के 27वें पायदान पर खड़ा पड़ोस के नुक्कड़ पर रहने वाला बिल्कुल एक आम नौजवान...फर्क बस इतना कि जहाँ उसके साथी आई.आई.टी., मेडिकल्स, कैट के लिये प्रयत्नशील थे, उसने अपने मुल्क के लिये हरी वर्दी पहनने की ठानी । ...और उसका ये मुल्क जब सात समन्दर पार खेल रही अपनी क्रिकेट-टीम की हार पर शोक मना रहा था, वो जाबांज बगैर किसी चियरिंग के एक अनाम-सी लड़ाई लड़ रहा था । आनेवाले स्वतंत्रता-दिवस पर यही उसका ये मुल्क उसको एक तमगा पकड़ा देगा । इस मुल्क की विडंबना ही है कि आप तब तक बहादुर नहीं हैं, जब तक आप शहीद नहीं हो जाते । कई दिनों से ये "शहीद" शब्द मुझे जाने क्यों मुँह चिढ़ाता-सा नजर आ रहा है...!!!

इस ऊँचे बर्फ़ीले पहाड़ों के नीचे, मध्य कश्मीर के राजवाड़ और हफ़रुदा के जंगलों में खड़े ख़ामोश चीड़-देवदार के दरख़्त जाने कितनी अनदेखी-अनसुनी शौर्य गाथाओं के साक्षी हैं...भारतीय सेना के अनगिनत मेजर सतीशों की शौर्य गाथायें ! बर्फ़ की बिछी हुई विस्तृत सफ़ेद चादर के मध्य सिर उठाये सिहरते ख़ामोश खड़े इन चीड़ और देवदार के गिरे हुए पत्ते और टूटी हुई टहनियों ने विगत तीन दशकों से ज़्यादा के समयांतराल में मेजर सतीश सरीखे कितने ही सैनिकों के लहूलुहान जिस्म को अपनी गोद में सम्हाला दिया है | चीड़-देवदार के ये ख़ामोश दरख़्त, जंगल से सटे गाँवों में जिहाद के नाम पर उस पार से आने वाले सरफिरों की ख़ातिरदारी में इन गाँव के बाशिंदों द्वारा अपनी बेज़ुबान रोटियों और बेटियों को परोसते भी देखते हैं...बेज़ुबान रोटियों के टूटते कौर को इनका ख़ुदा नहीं देखता और चुप सहमी बेटियों का ज़िक्र किसी फेमिनिस्ट की कविताओं या कहानियों में जगह नहीं बना पाता ! लेकिन ये मेजर सतीश सब देखते हैं ! ये सतीश जैसे युवा आराम से अपनी सैन्य-चौकी पर बैठे रह सकते हैं इन तमाम तमाशों को देखने के बावजूद कि इन सतीशों को फिर भी उनकी तनख्वाह तो मिलनी ही है...लेकिन इन सतीशों की वर्दी के कन्धों पर सितारे सजने से पहले ली गयी शपथ उन्हें बैठने नहीं देती अपने सैन्य-चौकियों की सकून भरी गर्माहट में और उठ कर चल पड़ते हैं ये बाँकुरे इन जंगलों में शौर्य की नयी परिभाषा रचने ! उधर रोटी के साथ अपनी बेटी परोसने वालों की जहालत यहीं ख़त्म नहीं होती...इनकी जहालत तो ज़ख़्मी सतीशों को अस्पताल ले जाने वाली एम्बुलेंस पर बरसती है पत्थरों की बारिश बन कर | उकता कर इन सतीशों की रूहें इनके जिस्म को छोड़ चली जाती हैं ऊपर कि उस चुप बैठे ख़ुदा से गुज़ारिश कर सके हफ़रुदा और राजवाड़ की बेज़ुबान रोटियों और बेटियों के वास्ते ! जाने ख़ुदा इन सतीशों की सुनता भी है कि नहीं ! चालीस साल तो होने जा रहे...गुजारिशों की सुनवाई की कुछ ख़बर नहीं फिलहाल ! 

इधर यूँ ही एक आवारा सा ख़याल अपना सर उठाता है कि...उस पार वाले बंकर के नुमाइंदों को किसी की याद आती होगी कि नहीं चाँद को अपने बंकर के ऊपर यूँ ठिठका देखकर दिलचस्प होगा ये जानना... ! गीत चतुर्वेदी की एक कविता की पंक्तियाँ याद आती है-  

भूख में होती है तपस्या

पानी में बहुत सारी अतृप्ति

उपकार में कई आरोप

व्याख्या में थोड़ी-सी बदनीयती

और

करुणा में हमेशा

एक निजी इतिहास होता है  

3.                                    बीस साल बाद

बीस सालबीस साल हो गए इस जुलाई में कारगिल युद्ध के और स्मृतियाँ हैं कि यूँ डसती रहती हैं जैसे बस कल की ही बात हो | स्मृतियों के ये दंश अक्सर यही तो बताते रहते हैं कि युद्ध कभी भी वांछित जैसी चीज नहीं हो सकती है...और ख़ास कर एक सैनिक के लिए तो बिलकुल ही नहीं | किसी भी युद्ध के दौरान एक सैनिक को मौत या दर्द या ज़ख्म़ से ज़्यादा डर उसको अपने वर्दी की और अपने रेजीमेंट की इज़्ज़त खोने का होता है और कोई भी युद्ध वो इन्हीं दो चीजों के लिए लड़ता है...बस ! अपनी हरी वर्दी के लिए और अपने रेजिमेंट के नाम-नमक-निशान के लिए !

बीस साल पहले, मई के मध्य से जुलाई के आख़िर तक लगभग ढाई महीने चले इस कारगिल युद्ध में भी यही तो हुआ...जब इस मुल्क के सैनिक अपनी वर्दी और अपनी रेजिमेंट के आत्म-सम्मान को बनाए रखने के लिये तयशुदा मृत्यु की तरफ़ क़दम बढ़ाने से ज़रा भी नहीं हिचकिचाए । वीरता और शौर्य की एक से एक अद्भुत दास्तान कि जिनको सुनाने बैठा जाए तो समय का अनंत विस्तार छोटा पड़ जाएकि जिनको लिखा जाए तो शब्दकोष में नयी शब्दावलियों के अनगिनत पन्ने जुड़ जाए | जॉर्ज बर्नाड शॉ के चर्चित नाटक आर्म्स एंड द मेन का मुख्य किरदार कैप्टेन ब्लंश्ली कहता है मैं एक पेशेवर सैनिक हूँ | मैं युद्ध करता हूँ अवश्य जब ज़रुरत पड़ती है, लेकिन बहुत खुश रहता हूँ जब युद्ध की ज़रुरत नहीं हो |” सारे सैनिकों का सच इस कथन में समाया हुआ है…‘से नो टू वार का हैशटैग बना कर सोशल मीडिया पर क्रान्ति मचाने वाले कीबोर्ड-वारियर्स के बुने गए सच से मीलो-मीलो दूर बैठा है ये सैनिक का सच सच बस इतना सा है कि एक सैनिक से ज़्यादा कोई नहीं चाहता कि युद्ध न हो, लेकिन जब परिस्थिति उत्पन्न हो जाएदेश की संप्रभूता और देश के सम्मान पर हमला बोला गया हो तो फिर कोइ सैनिक उस युद्ध को नहीं नहीं कहता है |

दोस्त, रिश्तेदार सब लोग अक्सर पूछते रहते हैं इस बीस साल पहले के कारगिल युद्ध की कहानियों के बारे मेंमैं उदासी में लिपटे कुछ नाम भर ले लेता हूँ बसमनोज, विक्रम, अनुज, हनीफुद्दीन, वांगचुक, सौरभ, अमित, विजयंत, विश्वनाथन | इन नामों के सिवा और क्याकि ये नाम भर नहीं हैं, एक पूरी की पूरी दास्तान हैं अपने-आप में | कैप्टैन विजयंत थापर का उन रक्तरंजित चोटियों पर से लिखा गया आख़िरी ख़त याद आता है बार-बार | अपने अंतिम मिशन पर जाने से पहले अपने परिवार को लिखा गया विजयंत का आख़िरी ख़त जैसे दर्द-पीड़ा की जाने कितनी ही अनछुई, अनदेखी परतों को उधेड़ कर रख देता है । ख़त का हिन्दी अनुवाद सुनाता हूँ तुमको डायरी डियर... 

डियरेस्ट पापा, मम्मा, बर्डी और दादी 

जब तक आपलोगों को ये ख़त मिलेगा, मैं अप्सराओं की ख़ातिरदारी का लुत्फ़ उठाता हुआ आप सब को ऊपर स्वर्ग से देख रहा होऊँगा । मुझे कोई पछतावा नहीं ! सच पूछिये तो फिर से मानव जन्म मिले तो मैं भारतीय सेना में शामिल होऊँगा और देश के लिये लड़ूँगा । अगर संभव हो तो आप सब यहाँ आकर देखियेगा इस जगह को जहाँ भारतीय सेना ने आपके सुरक्षित कल के लिये लड़ाई लड़ी ।

जहाँ तक रेजिमेंट की बात है, नये सैनिकों को इस कुर्बानी के बारे में पता चलना चाहिये और मुझे आशा है कि मेरी तस्वीर अल्फा कंपनी के मंदिर में देवी कर्नी माता के साथ लगेगी । जो भी इंतज़ाम करना पड़े, कर दीजियेगा । अनाथालय में कुछ पैसे देते रहियेगा और रुख़साना (कश्मीर की एक बच्ची जिसका विजयंत गॉड फादर था...वो कहानी फिर कभी) को हर महीने पचास रूपये देते रहियेगा और योगी बाबा से मिलते रहियेगा ।

बर्डी (विजयंत का छोटा भाई) को समस्त शुभकामनाएं...इन सैनिकों की कुर्बानियों को कभी मत भूलना । पापा आप को गर्व होना चाहिये । मम्मा आपको भी....मोना (परिवर्तित नाम) से मिल लेना...मैं उस से बहुत प्यार करता हूँ । मम्मा मुझे माफ़ कर देना मेरी सारी ग़लतियों के लिये ।

ठीक हैअब वक़्त हो चला है कि मैं अपने 'डर्टी डज़न' में शामिल हो जाऊँ । मेरे हमलावर-दस्ते में बारह सैनिक हैं । समस्त शुभकामनाएँ आप सबको । ज़िंदगी शान से जियो ।

आपका
-
विजयंत

कैसे लोग थे ये यार डायरी ? विजयंतनाम भर पुकारता हूँ तो लगता है कि सीने की तलहटियों में कोई ज्वालामुखी फूटने लगता है | क्या थी इस बीस साल पहले बीते युद्ध की क़ीमतबस पाँच सौ सत्ताइस सैनिकों की शहादत और एक हज़ार तीन सौ तिरसठ जवानों का घायल ही होना ? पीछे छूट गये पिताओं, बिलखती माँओं, कलपते भाई-बहनों, नवेली दुल्हनों का क्या ? उनकी आँखों में घर बना चुके स्थायी बरसात के मौसम के लिये बड़ी से बड़ी दौलत भी कोई छतरी नहीं ख़रीद सकती है । इन क़ुरबानियों को किन्हीं शब्दों से परिभाषित नहीं किया जा सकता ! बस जिस्म की सिहरन, रुह की चीख़ें और आँसुओं का सैलाब ही इन क़ुरबानियों को जानता है...समझता है । 

अभी हफ्ते भर पहले गया था कारगिल के युद्ध-स्मारक पर | लगा जैसे कि हवा एक लम्हे को ठहरती है यहाँ...सलाम करती है और फिर लहराते तिरंगे को दुलार करने लगती है । सूरज उगता है रोज़ और आकर बिछा रहता है यहाँ देर तक । पहाड़ों की दबी-दबी सी सिसकियाँ चुप अँधेरी रातों में शबनम बन कर इस ज़मीन को धोती हैं । इस ज़मीन के नीचे चंद अद्भुत योद्धा अपने मुल्क के नाम सर्वस्व निछावर कर अब सुख की नींद सोते हैं ।

बसंत त्रिपाठी की एक कविता युद्ध के बाद जीवन का अंश याद आ रहा है | सुनो डायरी मेरी… 

काल का घुमड़ता बादल

जब उन्मादी हवाओं के साथ बरस जाएगा

साफ़ और नीले आसमान के नीचे

मैं तुम्हारे लिये लाऊँगा कुछ धूल-धुसरित फूल 

टैंक और बमवर्षक विमान

जब ध्वस्त हो जायेंगे लड़ते-लड़ते

ठीक उसके बाद

मैं लिखूँगा तुम्हे एक पोस्ट-कार्ड

और उम्मीदों से भरी हवा की पत्र-पेटी में डाल आऊँगा 

हो सकता है मिलने के बाद हम एक दूसरे को

अजनबियों की तरह निहारें

अपनी झुर्रीदार बुझती हुई आँखों से 

लेकिन मेरी प्रिय

तुम मेरी नज़रों को

अपनी पलकों में छुपा लेना

और मेरी गूंगी ज़ुबान पर रख देना

दुनिया के तमाम गैर-दुनियावी शब्द 

मैं अंधड़ से भरे तुम्हारे दिल में

रख दूंगा दुनिया में अभी ही जन्मी एक हरी कोमल पत्ती  

युद्ध के बाद घायल पसलियों और टूटी हड्डियों

और अपराजेय सपनों से

ऐसे ही बाहर आता है जीवन” 
 

4.                     अगर फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं अस्त 

उम्मीद के जाने कितने ही रंग सफ़ेद बर्फ़ के फ़ाहों, चिनार की हरी और भूरी पत्तियों और रसभरे सेबों की लालिमाओं से लिपट कर एक कोई और ही नया रंग ढूँढ निकालते हैं| सुहैल आया था मिलनेअपनी नयी महंगी बाइक को इस ऊँचे पहाड़ तक दौड़ाता हुआ मेरे अड्डे पर| जाने कितने अरसे बाद मिल रहे थे हम| तीन दिन डेरा जमा कर कूच किया, यह कह कर अगली बार जब आयेगा तो तीन सौ सत्तर का हटना कश्मीर के लिए पुरानी बात हो चुकी होगी और कश्मीर भूल चुका होगा कि इस नाम के किसी परिंदे का ये गोश्त भी खाया करता था| दोस्ती हमारी इस वादी में मेरे प्रथम आगमन से ही अपनी शिनाख्त का ऐलान करती हैयानी कि बीस साल तो हो ही गए| इसकी लड़के की कहानी भी ग़ज़ब की है| विरासत में ख़ूब सारी दौलत मिली है| वालिद के पास उनके वालिद का छोड़ा हुआ जाने कितने ही एकड़ों में पसरा हुआ सेब का बगान है और साथ ही डल झील की फैली हुई बाँहों में तैरते दसियों शिकारे और एक विशाल सीमेंट की फैक्ट्री| लेकिन सुहैल को गणित के फॉर्मुलों से कुछ इस क़दर इश्क़ हुआ कि उसने इंजीनियर बनने की ठानी और कूच कर गया रूस की ओर| परिवारवालों ने भी सहर्ष सहमती दे दी कि अच्छा ही है यहाँ वादी के बौराए युवाओं से दूर रहेगा| वहाँ रसियन इंजीनियरिन्ग कॉलेज में जनाब को मुहब्बत हो गयी वहीं की एक स्थानीय बाला से| यह ख़बर जेहादियों के अकस्मात जबरन आगमन की तरह ही डर और बेचैनी लिए टपकी सुहैल के घर में और आनन-फानन में सुहैल के चाचा को रूस भेजा गया और वापस लिवा लाया गया सुहैल को कश्मीर| अब तो खैर शादी भी हो गयी है कमबख्त़ की और दो बच्चे भी हैंहाँ, ये अलग बात है कि वह रसियन बाला साल में एक बार ज़रूर आती है दिल्ली और ये जाता है यहाँ श्रीनगर से दिल्ली किसी न किसी बहाने उससे मिलने|  

6 फीट की लम्बाई को बस चंद सेंटीमीटर से चूकता हुआ सुहैल अपनी हल्की भूरी आँखों और मुस्कुराते चेहरे के साथ ख़ूब फ़बता है| धारा तीन सौ सत्तर की हंगामाखेज विदाई के महीने भर पश्चात, जब माहौल थोड़ा व्यवस्थित हुआ तो श्रीमान कुछ दिन महीने पहले ही ख़रीदी हुई हार्ले डेविडसन को उठाये श्रीनगर से कुपवाड़ा और फिर कुपवाड़ा से यहाँ मेरे पास तक की चढ़ाई पर डुग-डुग करता आ गया| शुक्र है कि बर्फ़बारी शुरू नहीं हुई है इन ऊँचे पहाड़ों पर अभी और बॉर्डर रोड ओर्गेनाईजेशन की टीम ने हमारी इन पतली सर्पीली सड़कों को तनिक सम्मानजनक बना दिया हैजिसकी बदौलत सुहैल अहमद वानी इस बादलचुम्बी सैन्य-चौकी पर बाइक लेकर आने वाले पहले भारतीय होने का ख़िताबधारी बन गया है| उससे कहा मैंने कि तू इतिहास में दर्ज हो गया बे!” …तो ठहाके लगाकर कह रहा था हम कश्मीरी इतिहास बनाने के शौक़ीन होते हैं”| तीन दिन तक रहा मेरे पास वो और ख़ूब बातें हुईं उससे| तीन सौ सत्तर की अकाल-मृत्यु के बाद से सरहद पार से बढ़ी हुई अवांछित हरकतों का नज़ारा भी लिया उसने और जम कर गालियाँ निकाली उसनेशुद्ध कश्मीरी गालियाँसामने वाले दुश्मन पोस्ट पर चिल्ला-चिल्ला कर

इतिहास वाली बात यूँ तो मज़ाक में कही थी उससे, लेकिन ये सत्य है कि सुहैल जैसे चंद युवा वर्तमान परिदृश्य में कश्मीर का नया इतिहास रचने जा रहे हैं| गवर्नर का बुलावा आया था इसको और इसके ही जैसे ढेर सारे युवा बिजनेसकर्ताओं को| एक विस्तृत रोड-मैप पर विमर्श हुआ इनके साथ और जिसके तुरत बाद ही गवर्नर साब द्वारा वो पचास हज़ार युवाओं को रोजगार देने वाली घोषणा हुई थी| कमाल की बात ये है कि इसी मुल्क में एक गुट-विशेष के लोगों द्वारा जिस तरह से तीन सौ सत्तर के प्रस्थानादेश का विरोध किया जा रहा है, वह जितना हास्यास्पद हैउतना ही दयनीय भी| सुहैल के ही शब्दों को उधार लूँ अगर मैं डियर डायरी मेरी…”जिस धारा को विरोध करने वाले एक पुल, एक लिंक के रूप में बता रहे हैं जो कश्मीर को शेष मुल्क से जोड़ता है तो इससे बड़ी आयरनी कुछ और हो ही नहीं सकती| ये विशेष-दर्जा वाला विशेषण ही तो समस्या की जड़ है| यह बदबू मारता विशेषण हटा है और अब सुनाई देगी कश्मीर के चिनारों की किलक भरी नयी खिलखिलाहट”|  

आधुनिक ज़िन्दगी की समस्त सुविधाओं का लुत्फ़ लेते हुए महज विरोध के नाम पर विरोध की दुदुम्भी बजाने वाले की-बोर्ड रिवोल्यूशन के क्रांतिकारियों की टोलियाँ अपने ड्राइंग-रूम में बैठ कर जोमैटो और स्विगी जैसे मोबाइल एप्प के जरिये ऑनलाइन पिज्जा और बर्गर ऑर्डर कर ख़ुद तो उदरस्थ करना चाहती हैं, लेकिन इन्हीं लुभावने और सहजप्राप्य सुविधाओं से धरती के इस कथित जन्नत के बाशिंदों को वंचित रखना चाहती हैं| श्रीनगर में डल झील को आलिंगनबद्ध करते उस ख़ूबसूरत बुलेवर्ड-रोड पर अभी कुछ साल पहले ही खुले कैफ़े कॉफ़ी डे की रौनक और स्कूल-कॉलेज आवर के पश्चात उमड़ते लड़के-लड़कियों का ग्रुप इसी अशांत कश्मीर की कितनी दिलकश छवि प्रस्तुत करते हैं, यह तो इस दृश्य के प्रत्यक्षदर्शी ही बयान कर सकते हैं| सुहैल कह रहा था कि यार देख, हमलोग दिल्ली जाते हैंएप्प में मोबाइल स्क्रीन पर दौड़ते छोटे-छोटे ओला और उबेर की टैक्सियों को देखते हैं और उसी एप्प से उनको हुक्म देते हैं कि हम यहाँ खड़े हैं, आओ और हमें पिक करोवो टैक्सी मिनटों में आती है और हमें बिठा कर ले जाती हैं जहाँ भी जाना चाहते हैं हम| हम बाइक चला कर आ गए तेरे पास इतनी दूर कि शौक है हमकोलेकिन किसी रोज़ हम एकदम आराम से आना चाहते हैं इन्हीं पहाड़ों पर अपने मोबाइल एप्प से बुक की गयी टैक्सी में बैठ कर|”  

सुहैल की बातें सुनकर जाने कितने ही ख़्वाबों ने अपना सर उठा-उठा कर अपनी उपस्थिति का ऐलान करना शुरू कर दियाजिसमें एक सबसे मचलता हुआ ख्व़ाब ये है कि एक रोज़, किसी रोज़ तो ऐसा होगा कि इन ऊँचे पहाड़ों की इन सुदूर सैन्य-चौकियों पर लंगर के खाने से ऊबी और पस्त जिह्वा मचल कर हाथों को हुक्म देगीहाथ मोबाइल उठायेंगे और नीचे कुपवाड़ा में अवस्थित डोमिनोज़ या मैकडोनल्ड की होम-डिलीवरी से हॉट और स्पाइसी पिज्जा और बर्गर का यहाँ के समस्त बंकरों में बड़ाखाना आयोजित होगा| अहा…! अहा…!! 

वैसे डायरी डियर, मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि बादशाह जहाँगीर ने ऐसे ही किसी ख्व़ाब की ताबीर करते हुए कहा होगा कि… 

अगर फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं अस्त

हमीं अस्त ओ हमीं अस्त ओ हमीं अस्त”       

 

5.                  मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको 

शामें सर्द होने लगी हैं | जाने कब से अटका हुआ...जाने का नाम ही नहीं ले रहा था कमबख्त़ सितम्बर ये | यूँ लग रहा था कि मुई तेरह हज़ार फिट की अम्बर-चुम्बी ऊँचाई इस सितम्बर को इतना भाने लगी है कि अक्टूबर को आने का रास्ता ही नहीं देगी ये | मगर आ ही गया अक्टूबर आख़िरकार...दूर नीचे ढ़लान से हाँफता हुआ...सितम्बर को परे धकेलता | कभी-कभी लगता है जैसे कि जाने कब से यहीं हूँ...इसी पहाड़ पर मोर्चा जमाये | कहीं और भी था क्या मेरा वजूद इससे पहले ? या कि सृष्टि की शुरुआत से यहीं हूँ मैं ? किससे पूछूँ ? बारह सौ जवानों और पंद्रह-सोलह ऑफिसरों का ये भरा-पूरा कुनबा भी मानो इस विराट फैले एकांत के लिए कम पड़ता है कई बार | किसी कुनबे की सरदारी से विकट एकाकी काम और कोई नहीं होता होगा शायद ! बंकरों से आता हुआ हर टेलीफोन कॉल्स... रेडियोसेट पर का हर संदेशा शरुआत में सीने को खटका ही देता है, जब तक पहले ऑल ओके ना कह दिया जाए | किसी रोज़ कमबख्त़ ये ह्रदय एकदम अचानक रुक ही ना जाए अंदेशों के बोझ तले इस निपट एकांत में !  कितनी बेकार-सी मौत होगी ना वो ! सितम्बर के महीने में ये मृत्यु-गन्ध किस क़दर पूरे जिस्म पर पसीजी-सी चिपकी रहती है | विगत आठ सालों से कुछ ज़ियादा ही उदास करता आ रहा है ये महीना...इस एकांत को तनिक और-और विस्तृत करता हुआ साल-दर-साल |

उदासी एक लम्हे पर गिरी थी...सदी का बोझ है पसरा हुआ सा | देखते-देखते आठ साल हो गए सुरेश को विदा कहे | हाँ...आठ साल ही तो ! सुरेश...सुरेश सूरी...मेजर सुरेश सूरी...कि जिसका होना तो शौर्य को चलते-फिरते परिभाषित करना था... लेकिन जिसका ना होना नियति ने तय कर रखा था कहीं-ना-कहीं अपनी फ़ेहरिश्त में जैसे मेरे होने के लिए | कितना आसान हो जाता है ना सब कुछ, जब हम मान लेते हैं कि ऐसा होना तो लिखा ही हुआ था...डेस्टिनी ! फिर मृत्यु तो ख़ुद ही नियति ठहरी पूरी-की-पूरी अपने होने में ! अभी उस रोज़ जब कैप्टेन राकेश ने पूछा था सुरेश का ज़िक्र आने पर कि कैसा लगता है सर मौत के उन आख़िरी क्षणों में”...तो हँसी आ गयी थी मुझे | मौत का आख़िरी क्षण ? मौत का कोई भी क्षण आख़िरी कैसे हो सकता है ? जीवन...ज़िन्दगी का आख़िरी क्षण होता है | मौत का तो बस वो एक ही क्षण होता है ना...पहला क्या और आख़िरी क्या ?

उस दिन सारे के सारे ऑफिसर मुझसे उस आठ साल पहले वाले सितम्बर की कहानी सुनना चाहते थे | मैं फिर से टाल गया था और उसी टाले जाने के एवज में वो सवाल मिला था...कैसा लगता है मौत के आख़िरी क्षणों में | हँसी आयी थी, लेकिन पल भर में ख़ुद ही सहम कर गायब हो गयी थी वो कमबख्त़ हँसी...कि ज़िक्र सुरेश का हो रहा हो तो इस हँसी की हिमाक़त कि आए ! इन आठ सालों में लगभग हर रोज़ ही तो जी उठता है और फिर-फिर मृत्यु को वरण करता है वो स्मृतियों के क्रूर पटल पर | यूँ-होता-तो-यूँ-ना-होता या फिर ऐसे-ना-किया-होता-तो-वैसा-ना-होता वाले हज़ारों-लाखों विकल्पों को उधेड़ता-बुनता मन सुरेश को हर बार वापस ज़िंदा करता है और वापस मारता है | उसके लिए तो शायद कोई क्षण आया ही नहीं आख़िरी जैसा...ज़िन्दगी का या फिर मौत का ही | वो आख़िरी क्षण तो आख़िर में चिपका रह गया मेरे वजूद संग ही...मेरी नियति बन कर | राकेश के उस सवाल पर अब सोचता हूँ तो याद आता है कि ख़ून से तर-ब-तर जिस्म को उस रोज़ क्या-क्या ख़याल आ रहे थे | पहला तो यही था कि सुरेश ज़िंदा है...अभी सब ठीक हो जाएगा...कि ये एक दु:स्वप्न मात्र है जो नींद से जागते ही मिट जाएगा | दूसरा कि मेरे नहीं रहने के बाद छुटकी अपने पापा के बिना कैसे बड़ी होगी ! कुछ और भी उलटे-सीधे से ख़याल...एक पूरी तरह सुनियोजित ऑपरेशन का यूँ अप्रत्याशित रूप से इस तरह करवट लेने पर ग़ुस्सा...जिस्म से टपकती ख़ून की बूंदों पर ग़ुस्सा...ख़त्म होती रायफल की गोलियों पर ग़ुस्सा | उन आख़िरी क्षणों में शायद ग़ुस्सा ही सबसे चरम भाव था | एक फ्लैश-सा पूरी ज़िन्दगी का आँखों के सामने से गुज़रना जैसा कुछ...हा ! वो शायद फिल्मों में ही होता है |

ये कहना कि शरीर में चुभी हुईं गोलियाँ उतना दर्द नहीं देतीं जितना एनेस्थिशिया देने के बावजूद डॉक्टरों की कैंची से उसी शरीर से बाहर निकाली जा रही गोलियाँ देती हैं...ऐसा कुछ कहना पोएटिक होगा या रियलिस्टिक ? इस डायलॉग पर देर तक हँसे थे सारे ऑफिसर उस दिन और उनकी वो हँसी पहली बार सितम्बर के महीने में भी सकून दे रही थी | मे बी...जस्ट मे बी दैट द पेन इज फायनली एक्सेप्टिंग द माईट ऑव डेस्टिनी ! कई-कई बार मन करता है कि फोन करूँ सुरेश के घर...आन्टी से बात करूँ देर तक...उन्हें बताऊँ अपने मन में चलतीं इन तमाम पोएटिक या रियलिस्टिक सी उधेड़-बुनों को | एक शायद वहीं तो हैं इस पूरी पृथ्वी जो इन उधेड़-बुनों की तह तक पहुँच सकें | लेकिन फिर हिम्मत नहीं होती ! कुछ अजीब-सा धुक-धुक करने लगता है सीने की गहरी तलहट्टियों में कहीं...कुछ-कुछ वैसी ही धुक-धुकी जो उस रोज़ उठी थी सीने में, जब गोलियों की आवाज़ चारों ओर से उठने लगी थी अचानक ही |

अभी...अभी के अभी दूर किसी अन्तरिक्ष से आती हुई गोलियों की आवाज़ें मानो ड्रम-बीट का पार्श्वसंगीत प्रदान कर रही हों जिस पर क़दमताल करती फिर रही हैं ये स्मृतियाँ ! स्मृतियाँ...सुरेश...सितम्बर...सब के सब से ही क्यों शुरू होते हैं ? सितमगर सितम्बर...हा ! व्हाट अ क्लीशे’ !!

गुलज़ार की नज़्म याद आती है...

मौत तू एक कविता है

मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको

डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे

ज़र्द सा चेहरा लिये जब चाँद उफ़क़ तक पहुँचे

दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के क़रीब

ना अंधेरा ना उजाला हो, ना अभी रात ना दिन

जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब साँस आऐ

मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको

 - गौतम राजऋषि

सेना मैडल से विभूषित, लंबे समय कश्मीर में रह चुके न केवल एक जांबाज़ सैनिक हैं बल्कि कर्नल गौतम हरदिल अज़ीज़ शायर हैं, जो एकदम आधुनिक इमेजरी लेकर शायरी के पटल पर उभरे हैं। क्योंकि जांबाज़ी और रूमानियत तो सहेलियाँ हैं साथ खिलखिलाती हैं। गौतम के दो ग़ज़ल संग्रह और एक कहानी संग्रह आ चुके हैं। उनकी यह डायरी एक ज़रूरी हस्तक्षेप आज के समय में जब हम सैनिक को मानव न समझ उसके निज मानवाधिकारों को भूल जाते हैं।

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