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अमिता शीरीं की जेल डायरी



13.12.19


11 दिसम्बर को हमें यहां रहते हुए पूरे 5 महीने बीत गए. पृथ्वी अपनी धुरी पर न जाने कितने चक्कर लगा चुकी और अपनी परिधि पर लगभग आधा सफ़र पूरा कर चुकी है. गर्मी बीत गई, बारिश बीत गई, और फिर हलकी ठण्ड और अब कड़ाके की ठण्ड पड़ने लगी है. इन 5 महीने में मन का मौसम भी न जाने कितनी करवटें लेता रहा. शुरूआती कुछ दिन तो जेल को समझने में और ख़ुद को यहां ढालने में लगा. अब वक्त बीता जा रहा है लेकिन ज़िन्दगी ठहर सी गई है. सबसे ज़्यादा खलता है कि यहां एक पल की निजता संभव नहीं. सुबह से देर रात तक तेज़ आवाज़ में चलती टीवी. सुबह से शाम तक लड़ाई-झगड़ा, गाली-गलौज. अगरबत्तियों का धुंआ. तरह-तरह के तेल की खुशबुएँ. सारा कुछ परत दर परत ज़हन में समाते जा रहे हैं. कहीं थोड़ा सा चैन नहीं, सुकून नहीं. खाना बस इसलिए खाना है कि मानस में कहीं ये बैठा है की जीने के लिए खाना ज़रूरी है. शाम होते-होते मन पर उदासी की गहरी परत जमती जाती है. इस बीच जेल में पलने वाली टुच्ची राजनीति का भी पता चला. पुराने क़ैदी नए आने वाले क़ैदियों के साथ संवेदना व्यक्त करने की बजाय बेहद बुरा सुलूक करते हैं. खासतौर पर वे पुराने क़ैदी जो दबंग हैं, या फिर उनके चमचे बंदी. ये सब मिल कर सबसे पहले किसी नए क़ैदी के आते ही काम पर लगाते हैं, बिना यह समझे की जो जेल में पहले दिन आया है उसकी मनोदशा क्या होगी. अगर किसी ने नानुकुर की या विरोध किया तो उस पर गालियों की बौछार शुरू हो जाती है. या फिर बात बढ़ जाने पर उस नए बंदी की पिटाई भी हो जाती है. अगर कोई बंदी काम नहीं करना चाहता तो उसे पैसे जमा करने पड़ते हैं. ये पैसे आने वाली बंदी की हैसियत पर निर्भर करता है. और जितने में सौदा पट जाये. ये पैसे डिप्टी जेलर से लेकर सिपाहियों, राईटर और हमेशा गेट पर बने रहने वाली प्रभावशाली बंदियों के बीच बंट जाता है.
कल यानी 12 दिसम्बर को एक ख़ास दिन था. कल जेल के भीतर की टेरर यानि पुरानी राइटर की रिहाई थी. वह पिछले साढ़े तीन साल से जेल में थी. उसने जेल में अपना दबदबा बना कर रखा था. अपने आस-पास कुछ लोगों का घेरा बना रखा था. इसमे उसका काम करने वालियां थीं. उसके लिए गाली देने वाली/ खाना पकाने वाली/ बर्तन मांजने वाली/ कपड़ा धोने वाली/ उसके सिर पैर पर तेल लगाने वाली, मालिश करने वाली सब थीं. वह बेहद आत्ममुग्ध औरत थी. हर समय आत्मप्रशंसा करना उसकी आदत में शुमार था. ऊपर से वह बेहद कड़क बनती लेकिन भीतर से गहरे अवसाद का शिकार. वह अपने वर्गीय लोगों से शराफ़त से पेश आने का नाटक करती लेकिन ग़रीब लोगों के सामने आते ही भृकुटियाँ टन जातीं. जेल के भीतर के करप्शन ने वह पूरी तरह से साझेदार थी. भंडारे के सामान की साझेदारी से लेकर पुरुष बैरक में चिठ्ठियाँ भेजने तक का इंतज़ाम करने हर चीज़ में साझीदार. कोई उसके मन का नहीं करता तो उसको हर तरह से अपमानित करती. अपनी कर्कश आवाज़ में आसमान सिर पर उठा लेती. खैर, कल वह चली गई, जेल का एक हिस्सा हल्का हो गया.
आज सुबह 4 बजे से 6 बजे तक खूब बारिश हुई. उसके बाद दिन भर धीमी-धीमी बारिश होती रही. शाम से (इस समय शाम के 6.30 बजे हैं) खूब ठंडी-ठंडी हवा चल रही है. ठण्ड खूब बढ़ गई है. सभी ने अपने-अपने अड़गड़े पर चादर या कम्बल कस दी है. फिर भी खुले अड़गड़े में कम्बलों को चीर कर हवा आर-पार हो रही है. न जाने जेल के इस तरह से बनाने की संकल्पना किसकी है. संभवतः इसके पीछे यह सोच होगी, की इससे हर समय बंदियों पर नज़र रखी जा सकेगी.
नोट: केन्द्रीय कारागार लखनऊ के मोहनलाल गंज के खेतों के बीच में स्थित है जिसके चारों तरफ़ नहरों का जाल है. ऐसे में शहर में तापमान जब 2 या 3 डिग्री होता तो जेल परिसर में लगभग 0 डिग्री तक हो जाता. ठण्ड में हड्डियाँ बजने लगतीं. जब ठण्ड बेकाबू हो गई तो बंदियों ने जेल प्रशासन से अड़गडों का कुछ इंतज़ाम करने की प्रार्थना की. जेल प्रशासन ने कहा कि इसकी व्यवस्था का कोई प्रावधान नहीं है. अगर इस पर पन्नी लगवाना है तो अपने खर्च पर लगवाना पड़ेगा. तमाम विरोध के बीच हरेक बैरक से प्रति बंदी 50/ लिए गए. और पारदर्शी प्लास्टिक खरीद कर आई. जिसे अड़गड़े पर लाया जाने लगा. नयी राईटर खड़े होकर पन्नी लगवाने लगी. जब पन्नी लगी तो सिर्फ आधे अड़गड़े को ही ढंका गया. इसको लेकर बंदियों में रोष व्याप गया. एक तो हमसे पैसा ले कर पन्नी लगा रहे है, दूसरे आधा अड़गडा ही ढँक रहे हैं. लेकिन उनके विरोध का कोई फर्क नहीं पड़ा. नयी राइटर ने बस इतना कहा कि हमें इतना ही कवर करने को कहा गया है. लगने वाली पन्नी की क्वालिटी भी बहुत ख़राब थी. इस काम में कितने पैसे इकठ्ठा हुए, कितने खर्च हुए, ये सब बातें पन्नी की तरह पारदर्शी नहीं थीं.....

14.12.19


आज शनिवार यानि मनीष से मिलने का दिन. इस क्षण के लिए पूरे हफ़्ते इंतजार करती हूँ. मनीष से मिलना हमेशा ऊर्जा से भर देता है. लगभग हर शनिवार को मनीष अब्बू को याद करके रोता है. मेरा मन भी भर जाता है. पता नहीं क्यों आज मेरा मन कल से ही भरा-भरा सा था. आज ना जाने क्योँ मनीष को देखते ही रोना आने लगा. जाते ही हम लोगों ने हाथ मिलाया. हमारा हाथ मिलाना लोगों को अजीब लगता है. औरत होकर हाथ मिलाती है? वह भी पति से? ऐसे सवाल लोगों की निगाहों में रहते हैं. लेकिन वहां वक्त इतना कम होता है कि लोगों को एक दूसरे की और ध्यान देने का समय नहीं होता. हाथ मिलने के बाद हम अपनी जगह पर बैठ जाते. अक्सर मनीष पहले वहां पहुँच जाता. और अपनी जगह लेकर चादर या पेपर बिछा कर हमारा इंतज़ार करता. मुलाकात कक्ष एक बड़ा सा हॉल था. जिसमे बाद में पता नहीं किस कारण से फाइबर का पार्टीशन कर दिया था. तो कुल मिला कर एक कमरे भर की जगह बची थी. उसमे सभी मुलाकाती बैठते थे. लगभग 50-60 जोड़े यानि लगभग 100 लोग. बच्चे अलग से. उस कमरे में 100 लोगों की आवाज़े आपस में टकराती. मिलने को तो ज़्यादातर पति-पत्नी मिलते थे लेकिन सभी इतने पास-पास बैठते थे कि कोई निजी बात नहीं कर सकता था. शुरू में तो हम इतने परेशान हो जाते की पूरे समय दोनों लोग ख़ामोश बैठे रहते. लेकिन बाद में हमें आदत पड़ गई. और वह वक्त इतना कीमती होता की हम उसे हाथ से जाने नहीं दे सकते थे.
उस दिन भी हाथ मिलने के बाद हम अपनी जगह पर बैठ गये फिर हमने एक दुसरे का लिखा हुआ पढ़ा. आज मनीष का लिखा 'अब्बू की नज़र में जेल' भाग 7 पढ़ा. पढ़ते-पढ़ते हम दोनों ही रोने लगे. अब्बू की याद इतनी कसक के साथ आती है की समझ सकती हूँ कि मनीष पर क्या गुजरती होगी. वो दोनों तो दो जिस्म एक जान थे. आज मुलाक़ात बहुत कम देर हुई. बस हमने अब्बू सीरीज पढ़ी और कुछ बात की और वो लोग चिल्लाने लगे -'चलो उठो, टाइम हो गया.' पता नहीं क्योँ मेरा मन कर रहा था कि मनीष के गले लग कर खूब रो लूं.
यहां जेल में मूड स्विंग बहुत तेजी से होता है. जीवन की व्यर्थता यहां इतनी ज़्यादा सताती है. हालांकि, मैं यहां दिन भर समयबद्ध काम करती हूं. ऐसा कभी नहीं होता कि समय काटे नहीं कटता. पर बौद्धिक साथ की कमी बहुत खलती है.
आज मनीष ने भोपाल के अपने कमरे की याद दिला दी. जूली ने रजनीगंधा का पौधा दिया था. उसमे पहली बार फूल आये थे. मैंने गमला कमरे में रख लिया था. पूरे कमरे में रात की रानी की उजली खुशबू भरी थी. पता नहीं एटीएस वालों को वह दिखा की नहीं. चलते समय मैंने नज़र भर कर रजनीगंधा को देखा. आज भी वह खिला हुआ है मेरी नज़रों में. इसके अलावा ज़मीन में बिछे अपने बिस्तर के सिरहाने पर मैंने ग़ालिब-फ़ैज़-मीर, साबिर हक़ा और अपनी कविताओं के पोस्टर लगाये थे. अबीर ने वसीम फाज़ली का शेर रट लिया था.
ये रात, ये आवारगी, ये नींद का बोझ
हम अपने शहर में होते तो घर चले जाते.
वहां रहते हुए अपना शहर -अपना घर बहुत याद आता. पर 'घर' कहां था मेरा........यहां से निकल कर एक बार फिर अपना 'घर', 'अपना कमरा' मुझे बनाना है, सजाना है.....
आने से पहले एक्रिलिक कलर में एक पेंटिंग बनाई थी. प्रकृति थी तस्वीर में. एक पेड़ पर बहुत ऊपर एक पतंग फंसी लटक रही थी. उसकी लम्बी पूंछ रह रह कर मेरे दिल में हिलती रहती है. मेरा दिल लरजता है- अपनी बनाई तस्वीर में लटकी उस पतंग के लिए. उस पेंटिंग को मै बाबु-जूली-झिनुक को देने वाली थी जो इंडिया आने वाले थे.
रचनात्मकता की ये कमी बहुत खलती है मुझे यहां.


15.12.19


आज सुबह से दिन एक समान ही बीता. कुछ भी उल्लेखनीय नहीं घटा. रूटीन में ही दिन बीता. हां जेल में गीजर लग गया. दो दिनों से गर्म पानी से नहाना हो रहा है. दोपहर में सोने की कोशिश रोज़ की तरह नाकाम रही. टीवी समेत भांति-भांति की आवाजें. अभी नींद का सामंजस्य जेल के साथ नहीं हो पाया. हां, रात में जल्दी सो जाती हूं. सुबह जल्दी उठना भी जारी है. लेकिन आज कल सुबह पढना नहीं हो पाता. ठण्ड के कारण बिस्तर से निकलना ही नहीं हो पाता. देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय की 'लोकायत' पढ़ रही हूं. बैरक में औरतों ने रोज़ सुन्दरकाण्ड पढने का संकल्प लिया है. ओ रोज़ 'ढोल गंवार शूद्र पशु नारी......' सुनने को अभिशप्त हूं. कई बार बीच में ही सोने की कोशिश करती हूं. कई बार केन्द्रित करके 'लोकायत' पढने का प्रयास करती हूं. आध्यात्मिकता और भौतिकवाद का अनूठा मेल है यहां. लोकायत पढने में बहुत मज़ा आ रहा है. शाम को बैरक बंद होने से पहले अफसाना का जीवन संघर्ष दुखी कर गया. यहां हरेक औरत का जीवन संघर्ष का समुन्दर! लहरें उलीच-उलीच कर दहाड़ें मारता- रोता कलपता हर समय...


16.12.19


सुबह ठण्ड काफ़ी थी. पौने सात बजे जब बैरक खुला तो बाहर निकली. बाहर निकलते ही नज़रें सबसे पहले महिला परिसर के दो हातों को अलग करने वाली ऊंची-मोटी-भद्दी दीवार पर पड़ती है. पीले रंग में पुती इस दीवार का रंग बिलकुल धूसर हो गया है, जगह-जगह से पलस्तर उखाड़ा हुआ. बाहर निकलते ही जैसे ही इस दीवार पर नज़र जाती है, मन कोफ़्त से भर उठता है. दीवार की मनहूसियत जेल का अहसास करा देती है. वहां से नज़र फिसल कर आसमान पर गई. आसमान आज साफ़ था. एक दो टुकड़े बादल के मंडरा रहे थे. दिन भर तेज़ धूप निकली रही लेकिन तेज़ हवा भी चलती रही. आज सारे कैदियों के कम्बल गिने गए. जिनके पास कम्बल से ज़्यादा पाए गए वह छीन लिए गए. (इन 5 कम्बलों में ओढ़ना - बिछाना दोनों शामिल है) पुरुष बैरक में तो 2 या 3 कम्बल ही दिए जाते हैं. जो असरदर लोग हैं उनके पास 20-20 कम्बल तक रहते हैं. वो उसका मोटा बिस्तर तैयार करके सोती हैं. ज़ाहिर है जो नयी और हैसियत विहीन बंदी होती हैं उन्हें सबसे चिथड़ा और हल्का और गन्दा कम्बल मिलता है. वैसे कम्बल की राशनिंग करना ठीक ही है. क्योंकि जो नए बंदी आते हैं वो पर्याप्त कम्बल ना होने की वजह से ठण्ड में ठिठुरते हैं. आज की पूरी शाम इसी उठापठक में बीत गयी. कुछ लड़ाई-झगड़े भी हुए. रोज़ की तरह लाइन में लग के चाय ली और पी. बस सारा दिन इधर-उधर में ही बीत गया.


17.12.19


आज सीमा ने आने को कहा था तो सुबह से ही उसका इंतज़ार और तैयारी शुरू हो गई थी. उसे क्या-क्या देना है, लिखा-पढ़ा सब एक जगह किया सामानों की लिस्ट तैयार की. उससे क्या-क्या बात करनी है, सब तैयारी तो मन ही मन बहुत दिनों पहले से ही शुरू हो जाती है. यहां 'मुलाकात' शब्द में ही जादू है. पूरे शरीर में ऊर्जा का संचार होने लगता है. दोपहर दो बजे कान में वह जादुई शब्द पड़े- 'तुम्हारी मुलाक़ात आई है.' अन्दर से निकलने की बाधाओं को पार करके मुलाकात कक्ष में पहुंचे. वहां सीमा के साथ हम लोगों का प्यारा दोस्त अवध आया था. देख कर मन खुश हो गया. उससे शानवी और आश्वी और इंद्रा का हाल चाल पूछा. थोड़ी और बातचीत के बाद वह मनीष की ओर बात करने चला गया. जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है कि यहां मुलाकात का सिस्टम बड़ा ही अजीब है. औरतों और पुरुषों के लिये अलग-अलग कमरे हैं जिसमें जलियां लगी हैं, उस ओर बड़ा सा हॉल है, उसमे मुलाकाती इकठ्ठा होते हैं फिर जाली के इस पार मौजूद अपने-अपने प्रियजनों को तलाशते हैं और फिर जल्दी जल्दी बातचीत करते हैं. वह जाली इतनी निर्मम है कि कोई अपनों को स्पर्श भी नहीं कर सकता.
दोस्त के मनीष की तरफ़ जाने के बाद सीमा इधर मेरी तरफ़ आ गई. उसने हाल-चाल बताना शुरू किया. बेल की स्थिति बताई. छुट्टियों के बाद काम शुरू होगा. तभी मुलाकात के लिए साथ आई सिपाही आकांक्षा ने चिल्लाना शुरू किया 'चलो-चलो', 'अरे अभी तो 10 मिनट भी तो नहीं हुए. अभी तो कुछ बात भी नहीं हुई.' मुश्किल से 3-4 मिनट और बात की और वह चिल्लाने लगी. मुलाकात का वह नायाब क्षण यूं ही बीत गया. बिना जी भर बतियाये. आँख में आंसू लिए मैं वापस लौट आई. शाम तक मन खिन्न रहा. वह तो जेल में कुछ ऐसे दोस्त बन गए हैं जिनके कारण जीने की मोहलत मिल जाती है. कल अदालत है.


19.12.19


कल अदालत थी. यहीं बताती चलूं कि जेल की अपनी कुछ शब्दावलियाँ हैं जिसे वहां रहने वाले बच्चे भी अपना लेते हैं. न जाने क्योँ वह सारे शब्द उर्दू और अरबी-फ़ारसी के होते हैं, यह अध्ययन का विषय है. जैसे जेल में कोई नयी बंदी आती है तो उसे कहते हैं 'आमद' (चूंकि नए बंदियों से पैसे लेने का अवसर भी मिल जाता है इसलिये जेल में व्यंग्य से नयी आने वाली को 'आमदनी' भी कहते हैं). अगले दिन उसका 'मुलाहिजा' होता है. जेलर या अधिकारियों के सामने 'पेशी' होती है. 'मुलाक़ात' 'अदालत', 'जिरह', 'तन्हाई', जिसमें बंदी को अकेले क़ैद किया जाता है. फिर 'ज़मानत' और 'रिहाई'.
खैर, कल हमारी अदालत थी और बेहद सर्द एक दिन. ऐसे में अदालत जाना मैदाने जंग में जाने के समान होता है. वैसे लगातार चारदीवारी में रहने के बाद यहां की बंदियां अदालत की डेट का बेसब्री से इंतज़ार करतीं हैं. खूब सज संवर कर, सबसे अच्छा कपड़ा पहन कर और ढेर सारा मेकअप करके औरतें अदालत जाती हैं तो लगता है कि वे सजधज के मेले में जा रही हैं. मेरे लिए, अदालत जाना यहां की सज़ायाफ्ता ज़िन्दगी में सबसे बुरी सज़ा होती है.
लम्बे इंतज़ार, गिनती दर गिनती के बाद मुल्ज़िमो की जाली वाली गाड़ी में सवार होकर हम घंटे डेढ़ घंटे बाद लखनऊ अदालत पहुंचते हैं. अदालत पहुंचते ही सिपाहियों की गिद्ध दृष्टि मोटे आसामियों पर रहती है. ग़ैरकानूनी रूप से लॉकअप से बाहर बिठाने के लिए किस बंदी से कितना पैसा ऐंठा जा सकता है इसी कोशिश में उनका पूरा दिन बीत जाता है. जेल में अपने परिवार से अलग-थलग पड़े बंदियों के लिए अपने परिवार के साथ कुछ समय बिता लेने का अवसर उनकी मजबूरी बन जाती है. ग़रीब से ग़रीब बंदियों से चार-पांच सौ नोच-खसोंट लेने में उनका दिल बिलकुल नहीं पसीजता. उनका रेट तय है. एक घंटे बिठाने का वह 500/ रुपये मांगती हैं. बहुत मोलभाव करने पर कोई-कोई 400 में तैयार हो जाती हैं. और 4-5 घंटे बिठाने के लिए तो उनका रेट था 1000/ से लेकर 1500/ तक है. जिस दिन तीन चार अमीर बंदी उनके साथ चली गयीं तो सिपाहियों के चेहरे पर चमक आ जाती है. न जाने ये इस हराम के पैसों से वे अपने बच्चों को कैसे पालती हैं. इसके अलावा बंदियों से फ़ोन करवाने, सामान लाने/पास करवाने के पैसे अलग से. हर जगह पैसे का ये खेल देख कर मन खिन्न हो जाता है.
मेरी पहली अदालत में, मुझसे बाहर बिठाने के 1200/ मांगे, जिसे देने से मैंने मना कर दिया. मैं अदालत के दिन लॉकअप में ही बैठती हूं. पेशी के समय ही सीमा/विश्व से चंद क्षणों की मुलाक़ात, चंद पंक्तियां और घर से लाया खाना. इतने में ही 'सुकून' करना पड़ता है. लॉकअप यानि एक छोटा सा कमरा जिसमे पंखा भी नहीं लगा है. बंदियों के प्रति व्यवस्था की इतनी असंवेदनशीलता मुझे कभी समझ नहीं आई. लखनऊ जैसे शहर में जहाँ बेतहाशा गर्मी पड़ती है, लॉकअप में कमरे में एक पंखा भी नहीं लगाना, यह कहाँ का (अ)न्याय है, वह भी न्यायलय परिसर में? लॉकअप के एक कोने में दीवार घेर कर एक शौचालय बना है जहां हर समय पानी भरा रहता है, शौच करने के लिए बना पॉट एकदम पीला-काला. कमरे में ही एक कोने में नल लगा है जिसकी टोंटी हर समय बहती रहती है. उसका पानी भी कमरे में बहता रहता है. अदालत आते समय हम अपने बैग में अखबार और पानी की बोतल लेकर आते हैं. वहां की गन्दी फर्श पर अखबार बिछा कर बैठ जाते हैं. बंदियां वहीँ खाना खा कर बचा हुआ खाना' फलों के छिलके और कागज़ आदि फेंक देती हैं. कई बार झाड़ू नहीं लगने के कारण वह सब भी लॉकअप में बिखरा रहता है. बगल में पुरुषों का लॉकअप है जिसकी दशा और भी ख़राब है. वहां से आते-जाते बहुत से पुरुष बंदी, महिला लॉकअप को अपनी लिजलिजी निगाह से देखते हुए आते-जाते रहते हैं. कई लोग आते-जाते हुए सलाखों से नल की तरफ गुटके की पीक थूकते हुए भी जाते हैं. वहां मौजूद पुलिस वाले भी अपनी पीक वहीँ थूकते हैं. इतनी गन्दगी में ही बन्दियां, घर से आया खाना खातीं हैं. जिन बंदियों के घर से कोई नहीं आता, तो हम अपना खाना मिलबांट के खा लेते हैं. वहां इतना अधिक शोर होता है कि सिर भन्नाने लगता है. बीच-बीच में पुलिस वाले लाठियां भांजते बंदियों को अन्दर ठूंसने के लिए गालियां देते हैं. मेरा ध्यान बार-बार मनीष की ओर चला जाता है.
मनीष के लिए अदालत और भी कष्टप्रद होती है. एक गाड़ी में जानवरों की तरह ठूंस-ठूंस 50-55 लोग लाये जाते हैं. गाड़ी में बनी सीट पर एक तरफ़ 10 लोग बैठ सकते हैं बस. सीट पर बैठने के लिए एक तरफ़ के 100/ पुलिस वाले को देने पड़ते हैं. पहली अदालत में मनीष का जो अनुभव हुआ, उससे उसका रुंवासा चेहरा मेरे कलेजे में धंस गया. भोपाल में जितने वक्त वह मेरे साथ रहता था- मैं उसकी मां की भूमिका में भी रहती थी. उसे इतना दुलार और प्यार देती थी की अम्मा की कमी कुछ हद तक कम कर सकूं. अपने उस दुलारे मनीष को उस हाल में देखना मेरे लिए त्रासदी से कम नहीं. कल हमारी चौथी अदालत थी. अब मनीष थोडा एडजस्ट हो गया है.
जज-वकील-अदालत और बाहर की दुनिया में किसी को इस बात का अंदाज़ा भी नहीं है की यहां कट रहा एक-एक पल सदियों के समान होते हैं...

आज शनिवार यानी मनीष से मिलने का दिन. मनीष से मुलाकात पूरी होने के साथ ही अगले शनिवार का इंतज़ार शुरू हो जाता है. आज मनीष पापा का दिया गर्म ट्रैक सूट पहन कर आया था. बहुत अच्छा लग रहा था. पर उसके चेहरे पर एक विकलता थी. मैंने पूछा कि कुछ हुआ है क्या. उसने कहा 'कुछ नहीं'. शायद वह भी उसी उबियाहट का शिकार हो गया है जिसकी मैं हो गयी हूं. यहां जीवन इतना उथला है की कई बार जीते-जीते ही जी उबिया जाता है. यहां का माहौल और परिवेश गहराई से उतरने का मौका ही नहीं देता है. पेपर और किताबें एक सहारा हैं जो मुझे बौद्धिक खुराक देते हैं. 'लोकायत' धीमी गति से आगे बढ़ रही है. बहुत रुचिकर है किताब. लेकिन अधिक नहीं पढ़ पाती.
हां, कल सीएए के खिलाफ़ आन्दोलन कर रही एक आन्दोलनकारी सदफ़ जाफर आई हैं. वह धरने पर बैठी थीं. पुलिस ने बहुत पीटा है. पूरे शरीर में नील पड़ गई है. पेट में भी लात मारी है. रात में थोड़ी बात करने की कोशिश की पर वह बहुत थकी थी, सो गई. तेज़ आवाज़ में टीवी चल रहा था. अचानक तेज़ चिल्लाने की आवाज़ से मेरी नींद खुली. पट्टेवाली चिल्ला रही थी. शायद उस आन्दोलनकारी ने टीवी धीमा करने को कह दिया था. पट्टेवाली प्रदर्शनकारियों से चिढ़ी हुई थीं. कहने लगीं- 'उहाँ तमाशा करत रहीं तब नाहीं मूड़ पिरान. अब मूड़ पिरा रहा है, ये धरना प्रदर्शनवालियों से हमें बहुत चिढ़ है.'
पट्टेवाली यानि आशा सिंह (नाम बदला हुआ) पूर्व प्रधान रह चुकी हैं. किसी मर्डर केस में जेल में हैं. उनके पास तकरीबन 100 एकड़ से ज़्यादा ज़मीन है. गांव में पूरा साम्राज्य है. नौकरों की फ़ौज है. उनके पूरे शरीर में स्पोंडीलाइटिस है. वो गले और कमर में हर समय पट्टा बांधे रहती हैं, इसलिए सभी उन्हें पट्टेवाली बुलाते हैं. वह पूरी तरह से भाजपा मानसिकता की हैं. पूरी तरह से मुसलमान, दलित और महिला विरोधी हैं. जेल में मौजूद अपरकास्ट लॉबी के साथ हैं. वह किसी भी प्रगतिशील विचार के सर्वथा विरोधी महिला हैं. एक दिन 'सती प्रथा' का समर्थन करने लगीं. उस दिन से मैंने उनसे बात करनी बंद कर दी.
समाज की तरह जेल में भी जो अपरक्लास,अपरकास्ट और मिडिल कास्ट लॉबी है, वह शुद्ध रूप से घोर साम्प्रदायिक है. आज सुबह ही एक अन्य दबंग और पुरानी पंडित बंदी से बहस हो गई जो कह रही थी कुलदीप सिंह सेंगर इतना पावरफुल है कि उसके लिए लड़कियों की क्या कमी है. वह नीची जाति की लड़की से रेप क्योँ करेगा. मुझे वह जज याद आया जिसने भंवरी बाई के मामले में फैसला देते हुए कहा था कि एक उच्च जाति का प्रधान नीच जाति की औरत से बलात्कार नहीं कर सकता. तब से कितना पानी नदियों में बह चुका है. सवर्ण मानसिकता अभी भी कितनी पिछड़ी और दलित, महिला विरोधी है. कभी-कभी मुझे लगता था कि 21 वीं सदी है अकड़ थोड़ी ढीली हुई होगी, पर यहां समाज के सबसे संघनित रूप में समय बिताते हुए यह अहसास हो रहा है कि यह मानसिकता अभी भी बहुत मजबूत है और यहां तो इसका प्रदर्शन बहुत ही भौंडे और विकृत रूप में होता है.


23.12.19 मुआयना


आज का दिन अफरातफरी का था. जेल में जिस दिन परेड लगती या मुआयना होता है तो पूरे जेल में आफ़त मच जाती है. जेल में हर महीने सीजीएम का दौरा लगता है, या अधीक्षक का निरीक्षण होता है तो उसे परेड लगाना बोलते हैं. परेड मतलब अधिकारियों के सामने बंदियों को अपना-अपना जेल कार्ड लेकर लाइन से खड़ा होना होता है. अधिकारियों के आने की सूचना पहले से होती है इसलिए आने से पहले ही सारी व्यवस्था चाकचौबंद कर ली जाती है. खूब सफाई की जाती है. चूना वगैरह पड़ जाता है. इस मुआयने में एक बात अच्छी होती है की टॉयलेट के सफ़ाई हो जाती है. लेकिन बंदियों की मुश्किलें भी बढ़ जाती हैं. सुबह से ही सारी रस्सियां खुलवा दी जाती हैं. अब गीले कपड़े कोई कहां रखे. बैरक के अन्दर भी कपड़ा फ़ैलाने की इजाज़त नहीं होती. वैसे तो सीजेएम समेत तमाम अधिकारी ये मुआयना करने आते होंगे कि जेल के भीतर सब ठीकठाक चल रहा है न. किसी को कोई तकलीफ़ तो नहीं. लेकिन आमतौर पर किसी भी तरह का कोई भी मुआयना हो जाये, बंदियों की कोई तकलीफ़ कम नहीं होती. अव्वल तो किसी भी बंदी की मुंह खोलने की हिम्मत ही नहीं होती. अगर कोई आला अफ़सर आता है तो उसके पीछे-पीछे जेल के अधिकारी, जेलर, डिप्टी जेलर और सिपाही वगैरह भी चलते हैं. उनके सामने कोई मुंह खोलने की हिम्मत ही नहीं करता. आख़िर रोज़-रोज़ का समय तो उनके साथ ही बिताना है. पानी में रह कर मगर से बैर? ये संभव ही नहीं था. अगर किसी ने हिम्मत कर के जुबान खोल भी दी तो बाद में उसका जो हश्र होता था, उसको देखने के बाद कोई भी बंदी जुबान नहीं खोलती है. इसके अलावा कोई कुछ परेशानी रख भी दे तो उसका निदान कभी नहीं होता. थोड़ा बहुत कुछ होता भी तो उसके होने में इतना समय लग जाता कि उस शिकायत का ही कोई अर्थ नहीं रह जाता है. कुल मिला कर ये प्रक्रिया बहुत ही अपमानजनक होती है. सुबह से ही चिल्लाहट मच जाती है कि 'रस्सी खोलो, रस्सी खोलो, मुआयना है'. फिर कार्ड लेकर खड़े रहो. कई बार घंटों खड़े रहने के बाद भी कोई आता ही नहीं. बस अपमान का घूंट पी कर रह जाते हैं सभी. गाली देने वाली खूब जी खोल कर गालियां देतीं हैं. उस समय उनकी गालियां अच्छी लगतीं.
आज सुबह से ही कोहरा था. बहुत ज़्यादा सर्दी थी. ऐसे में खुले अड़गड़े से हवाएं क्रॉस हो रही थीं. पैर बर्फ़ हो रहे थे. ऐसे ही मौसम में पूरा समय मुआयने की आपाधापी में बीता. मन इतना खीझ जाता है कि क्या कहूं. बाहर एक भी कपड़ा नहीं फैलाने देते. आख़िर इस बदली में कोई अपने कपड़े सुखाये भी तो कहां. बंदियों से बिलकुल empathy नहीं है जेल प्रशासन को. ठण्ड लग रही है. कोई गीले कपड़े तो पहनेगा नहीं. इस परेशानी से कोई परेशान नहीं. एक-दो घंटे कार्ड ले कर खड़े रहो, फिर कोई आता नहीं. जब आ भी जाते हैं तो परेशानी कोई नहीं बताता. बता भी देता है तो परेशानी बताने का कोई फायदा नहीं. कोई हल तो होता नहीं. सब चुपचाप खड़े रहते हैं. जो मुआयना करने आते हैं उनका लहज़ा भी बंदियों के प्रति ख़ासा उपेक्षापूर्ण रहता है. एक बार एक वरिष्ठ आईएएस का मुआयना था. वह बंदियों से इस स्तर पर सवाल कर रहा था- '....तो किसको मार कर आई हो? यार के साथ मिल कर पति को मार दिया? हनी ट्रैप बिछाया था ना? धंधा करती हो?.....
मैं ठहर कर सोचने लगी, क्या यही आईएएस, पीसीएस हैं, जो बनने के लिए आज की नौजवान पीढ़ी अपनी समूची जवानी खपा देती. जो बनना मध्यवर्गीय समाज का उच्चतम आदर्श होता है?????

5.12.19


सदफ़ की ज़मानत हो गई. उसे यहां रहते 15-16 दिन हो गए. उससे अच्छी दोस्ती हो गयी है. खूब बातें हुईं. इन दिनों मैं भी मसरूफ़ रही. बहुत दिनों बाद इतनी बातें हुईं. यहां तो मैं अपने खोल में ही सिमट गयी थी. सदफ़ के आने के बाद बहुत सारी राजनीतिक बातें हुई. ज़ाहिर है, उससे बहुत से राजनीतिक मतभेद भी हैं. पर सदफ़ बहुत ओपन है इसलिए बातचीत संभव हो पाती है.
सदफ़ अपने घर पर दो किशोर बच्चों को छोड़ कर आई है. एकल मां होने के कारण उसे ढेर सारी सामाजिक भृकुटियों को भी झेलना पड़ता है. लेकिन वह मजबूती से इन सबका सामना करते हुए अपनी ज़िन्दगी जी रही है. सदफ़ की ज़िन्दगी के हालात ने उसे ज़मीन पर पैर टिकाये रखने के लिए मजबूर किया है. अपनी ज़िन्दगी में वह घरेलू हिंसा का शिकार रही. यहां की तमाम औरतों की तरह ही उसकी ज़िन्दगी भी एक कहानी की तरह ही है. कल या परसों उसकी रिहाई हो जाएगी. उसने जेल के ढेर सारे रंग देख लिए इतने दिनों में. उम्मीद है यह दोस्ती बाहर भी बनी रहेगी. माशाअल्लाह!

अमिता शीरीं
 

अमिता शीरीं एक राजनीतिक कैदी के रूप में लखनऊ जेल में 8 महीने रह कर मार्च में बाहर आयी हैं। एक राजनैतिक कैदी के रूप में जेल के अंदर की भयावह व्यवस्था, कोर्ट में पेशी की मुसीबतें, महिलाओं के जेल में हाल, राजनैतिक बंदियों के साथ कटु व्यवहार को वे निरंतर लिखती आईं हैं। हिंदीनेस्ट पर उस डायरी के कुछ अंश ।

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