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लन्दन डायरी के कुछ अंश


शिखा वार्ष्णेय

23 Jan 2014
शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन -

मैं काफी हद तक एशियाई के मुकाबले पश्चिमी देशों की शिक्षा व्यवस्था के पक्ष में रही हूँ। परन्तु कालांतर में एशियाई देशों से पश्चिमी देशों की तरफ बढ़ते प्रवास ने यहाँ की शिक्षा व्यवस्था पर भी कुछ असर तो डाला ही है। अपने स्वभाव से मजबूर हम भारतीय माता पिता अपने बच्चों पर पढ़ाई का अतिरिक्त दबाव डालने से नहीं चूकते और इसी का नतीजा होता है कि यहाँ के स्कूलों में बाकी बच्चों के मुकाबले एशियाई बच्चों के नंबर अधिक रहा करते हैं। और इसे देखते हुए यहाँ भी शिक्षा व्यवस्था में समय समय पर अनुकूल परिवर्तन किये जा रहे हैं।जिससे कि सभी स्कूल और समुदायों में शिक्षा के स्तर को बढ़ाया जा सके।
अपने यायावरी जीवन के चलते यह मेरा सौभाग्य रहा कि मैंने और मेरे बच्चों ने अपनी औपचारिक शिक्षा भारत में भी ग्रहण की और भारत के बाहर पश्चिमी देशों में भी। अत: सभी का तुलनात्मक अध्यन करने का मौक़ा मुझे सर्वदा मिलता गया है। जिसके तहत मैंने पाया कि जहां पश्चिमी देशों में सरकारी हो या फिर कोई निजी स्कूल सभी के लिए शिक्षा का स्तर और मौके बराबर होते हैं। यहाँ पढ़ाई किताबी नहीं बल्कि व्यावहारिक होती है। जब जिस उम्र में जिस विषय की जरुरत होती है वह पढाया ही नहीं जाता बल्कि सिखाया भी जाता है और इस तरह कि वह महज एक विषय नहीं बल्कि ज्ञान बने।
वहीँ हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा भी किताबी अधिक होती है। बचपन से ही जोड़ तोड़ करके हर बच्चे पर अधिकतम नंबर लाने का दबाब होता है। और येन केन प्रकारेण वे कोई तकनिकी डिग्री ले ही लेते हैं। हम ढूंढने निकलें तो शायद ऊंगलियों पर भी ऐसे लोग नहीं गिने जा सकेंगे जो यह कहें कि, शिक्षा ने मुझे वह दिया जो मैं पाना चाहता था। हमारे देश में एक व्यक्ति पढता कुछ और है, बनता कुछ और है, और बनना कुछ और ही चाहता है। फिर नतीजा होता है। वही असंतुष्टी अपने जीवन से, अपनी आत्मा से और समझौता अपने काम से और अपने फ़र्ज़ से।

अब आज जब यूके की प्रारम्भिक शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन को लेकर ठोस कदम उठाये जा रहे हैं ऐसे ही समय में अमेरिका की "टाइगर मॉम" लेखिका एमी चुआ की पेरेंटिंग पर नई किताब "ट्रिपल पैकेज" को काफी तीखी प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ा है। इसने आधुनिक अमेरिका में सफलता के सिद्धांत पर बड़ा विवाद खड़ा कर दिआ है। इस पुस्तक में उन्होंने घोषणा की है कि अमेरिका में सिर्फ आठ सफल और बेहतर समूह हैं जिनमें चीन, भारत और यहूदी समुदाय शामिल हैं।
चुआ के अनुसार - श्रेष्ठता की भावना, असुरक्षा और आवेग पर नियंत्रण ये तीन ऐसे गुण हैं जो इन समुदायों के माता पिता अपने बच्चों को देते हैं और यही सफलता की गारंटी हैं।
हालाँकि यह सही है कि भारत या चीन से आये प्रवासी यहाँ आकर बहुत कम समय में अपनी क्लास के गोरे साथियों से आगे निकल जाते हैं। परन्तु चुआ के इन तीन गुणों को जीवन की सफलता की गारंटी मनना शायद ठीक नहीं हैं। बचपन में हो सकता है इन तत्वो के सहारे बच्चे सफल हो जाए परन्तु बड़े होने पर कार्यस्थल में यही गुण- अवगुण में तब्दील हो सकते हैं। जरा सोच कर देखिये असुरक्षा, और श्रेष्ठता की भावना (सुपिरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स) के साथ आप जीवन के किस कार्य में आगे जा सकते हैं? और यही कारण है कि भारत, चीन जैसे देशों के मेधावी छात्र मौका मिलते ही ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलया जैसे देशों में उच्च शिक्षा या कार्य करने के लिए आना चाहते हैं, जिससे वे न केवल अधिक खुले दृष्टिकोण से पढ़ना सीख सकें बल्कि एक टीम में काम करना और अपना ज्ञान दूसरों से साथ बांटना भी सीख सकें। जो उन्हें आगे जाकर किसी भी कार्यक्षेत्र में उन्नत्ति में सहायक होता है।
यह बात बिलकुल ठीक है कि सफलता के लिए मेहनत सबसे अहम् गुण है। परन्तु मेरे ख़याल से उन माता पिता को भी निराश होने की कतई जरुरत नहीं है जो चुआ के इस सफलता के दायरे में फिट नहीं बैठते। और बच्चों पर अतिरिक्त दबाब नहीं डालते।
शिक्षा का मूल मकसद एक भावी व्यक्तित्व का निर्माण करना, एक बच्चे को यह समझने में सहायता करना कि वह क्या करने में सक्षम है और क्या करना चाहता है।उसकी योग्यता को पहचान कर उसे आगे के जीवन में बढ़ने में मदद करना है। और यह कार्य यहाँ के स्कूल और माता पिता सही तरीके से कर रहे हैं।

6 Feb 2014

विकसित होती तकनीक और बदलता परिवेश-


मानव सभ्यता जैसे जैसे विकास की और बढ़ती गई वैसे वैसे उसकी इच्छाएं बढ़ती गईं और फिर उसी गति से इच्छाओं को पूरा करने के संसाधन भी। पुराने समय में खरीदारी आवश्यक वस्तुओं के आपस में बदलने का नाम हुआ करती थी। जैसे किसान ने अपने अनाज के बदले दरजी से कपड़े ले लिए, या दरजी ने कुछ कपड़ों के बदले कुम्हार से कुछ बर्तन। फिर हुआ सिक्कों का आविष्कार तो हाट, बाजार लगने लगे। औद्योगिक क्रांति से मानव के रहने का मिजाज़ बदला तो खरीदारी भी बदल गई, आवश्यकता ने विलास और शौक का रूप ले लिया और धीरे धीरे व्यस्त होते मनुष्य के साथ मशीनो ने अपना अधिपत्य हर क्षेत्र की तरह खरीदारी पर भी जमाना आरम्भ कर दिया।
हाट बाजारों की जगह मॉल, और सुपर स्टोर्स ने ले तो ली, परन्तु संसाधनो के बढ़ने से लोगों में कमाई की अधिक भूख और काम की व्यस्तताएं भी बढ़ने लगी और फिर आया फैशन होम डिलीवरी का, इंटरनेट शौपिंग का, कि आप जहाँ कहीं भी हों बस ऑनलाइन खरीदिये और सामान आपके घर पहुंचा दिया जायेगा।
परन्तु काम काजी व्यस्त लोगों के लिए एक समस्या इसमें भी थी - वह यह कि उनका ज्यादातर समय तो यात्रा करने में निकल जाता है, उनके पास इतना भी समय नहीं था कि घर में रह कर आने वाले सामान का इंतज़ार करके उसे ले सकें।
तो अब इस समस्या के समाधान के रूप में लंदन मेट्रो ने एस्डा के ट्यूब पर आधारित "क्लिक एंड कलेक्ट" नामक सफल योजना से प्रभावित होकर एक योजना बनाई है।
इसके अंतर्गत आप नेट पर ऑनलाइन खरीदारी करके, मेट्रो स्टेशन पर उपलब्ध लॉकर या वैन से अपना सामान प्राप्त कर सकते हैं। इससे आपका खरीदारी करने में लगने वाला समय भी बचेगा और पार्सल प्राप्त करने के लिए एक स्थान पर उस समयावधि में बने रहने की बाध्यता से भी छुटकारा मिल जाएगा।

पिछले दिनों ट्यूब (मेट्रो) प्रमुखों ने भूमिगत पर एक खुदरा क्रांति शुरू करने के लिए हाई स्ट्रीट के सबसे बड़े नामों में से कुछ से हस्ताक्षर कराये हैं। और अगले महीने से, टेस्को और वेट्रॉस एक दर्जन दूरस्थ स्टेशनों पर "क्लिक एंड कलेक्ट" सेवा के जरिये, लॉकरों या वैन से किराने का सामान लेने के लिए यात्रियों के लिए उपलब्ध हो जायेंगे।
क्लिक एंड कलेक्ट" सेवा ट्यूब के 270 स्टेशनों पर रिटेल के आधुनिकीकरण में पहला बड़ा कदम है । इस चेन के अगले कदम के रूप में केंद्रीय स्टेशनों पर और अधिक सुविधा स्टोर के खुलने की उम्मीद है।
असल में लंदन परिवहन के अधिकारी अगले साल तक सभी टिकट कार्यालयों को बंद करके टिकट बिक्री के पूर्णत: स्वचालित करने की अपनी योजना पर यूनियनों से जूझ रहे हैं। उनके अनुसार इस तरह इन स्टोर्स के लिए मेट्रो स्टेशनो पर और जगह बनाई जा सकती है। उनका लक्ष्य इन व्यवसायिक योजनाओं से अगले दशक तक 3.5 विलियन पाउंड्स का इजाफा करना है।
आने वाले समय में मेट्रो स्टेशनो पर तापमान नियंत्रित लॉकर्स और इनके कार पार्क में फ्रिज सहित वैन स्थापित होंगी, जहाँ अपना व्यक्तिगत कोड टाइप करके या अपना स्मार्टफोन या क्रेडिट कार्ड स्कैन करके यात्री अपना आर्डर किया हुआ सामान निकाल सकेंगे।
वहीं टेस्को के ग्राहकों के पास अपने सामान का आर्डर करने के लिए आधी रात तक का समय होगा और वैन आदि से सामान प्राप्त करने के लिए सुबह, दोपहर और शाम के विभिन्न स्लॉट। यहाँ तक कि, कहीं यात्रा में फंस जाने पर या कार्यालय में देरी हो जाने पर वैन के ड्राइवर को तीन घंटे तक इंतज़ार करने के भी निर्देश होंगे।
फिलहाल इस योजना के अंतर्गत एस्डा की यह क्लिक और इकठ्ठा करने वाली वैन पूर्व फ़िंचली , हैरो और वेल्सडोंन , उच्च बार्नेट , हाईगेट , स्तनमूर और इप्पिंग स्टेशनो में सफलता पूर्वक काम कर रही है और टेस्को की यह सेवा, ऑस्टर्ली , न्यूबरी पार्क , रायनर्स लेन , फ़िंचली सेंट्रल , अर्नोस ग्रोव और कॉकफ़ोस्टर पर होगी ।
अभी तक कुछ मेट्रो स्टेशनो पर छोटे छोटे मिठाई, नाश्ते या अखबार के कियोस्क ही थे। अब जब हमारा रहन सहन बदला है, यात्रा करने के साधन और तरीके बदले हैं तो जाहिर है खरीदारी के भी बदलेंगे ही। सुविधाओं के रास्ते पर मशीनो पर निर्भर होते जा रहे मनुष्य की कल्पना शक्ति और बुद्धि इस तरफ और क्या रंग दिखाती है ये देखना दिलचस्प होगा।


6 March 2014
सुरक्षित समाज का असुरक्षित युवा

"आजकल लंदन का मौसम कुछ ज्यादा ही खराब हो गया है। बारिश है कि रुकने का नाम ही नहीं लेती। सुना है कल कुछ धूप निकलेगी, फिर अगला पूरा हफ्ता यही बारिश है।"
"इस बार ईस्टर की छुट्टियों में स्पेन की टिकटें सस्ती मिल रही हैं। ग्रीस भी काफी चर्चा में है। "

विगत कुछ वर्ष पहले तक लंदन के पार्क, सड़क या स्टेशन पर किसी से बातचीत करने के ऐसे ही विषय हुआ करते थे। बात मौसम से शुरू होती और हालिया छुट्टियों की योजना पर ख़तम हो जाया करती।
बच्चों, युवाओं के पास छुट्टियों से पहले क्लास में, इस बार कौन- कहाँ जा रहा है और छुट्टियों के बाद, अपनी छुटियाँ कहाँ- किस तरह बिताईं इस बात की चर्चाएं ही आम हुआ करती थीं।

परन्तु अब लंदन में मौसम की ही तरह इन तरुणों की जिंदगी भी अनप्रिडिक्टिबल सी हो गई लगती है। जहाँ बारिश ही बारिश है, ठंडी हवाएं हैं और धूप का सिर्फ इंतज़ार।
छुट्टियों में स्पेन, ग्रीस की जगह कोचिंग क्लासेस हैं और भविष्य की योजनाओं के प्रति उत्साह की जगह असुरक्षा और क्षोभ।
स्कूल में हर पल बढ़ता पढ़ाई और प्रतिद्वंदिता का बोझ है और घर में, इस महंगे होते शहर में किसी तरह स्थापित होने को जूझते, समझौता करते माता पिता।


अभी कुछ दिन पहले एक घर देखने जाने के दौरान एक बुजुर्ग महिला बताने लगीं कि इससे अच्छा समय तो द्वितीय विश्व युद्ध के समय का था। "विपदा का समय था परन्तु फिर भी कुछ तो व्यवस्था थी। अपनी शादी के समय उनके पास एक कमरे का घर था परन्तु अपना था, एक साधारण सी ही थी, पर एक नौकरी थी। जितनी क़ाबलियत थी और जितना सम्भव था जिंदगी में मिलने की सम्भावनाएं थीं।
परन्तु आज के इन बच्चों के पास क्या है। इतनी मेहनत, इतने दबाब के बाद भी उन्हें क्या मिलता है ? न घर, न रोजगार, न साथी और न ही जीवन का कोई रस। मिलता है तो बस लोन से दबी अवसाद और कुंठा भरी जिंदगी। अगर आज मैं एक टीनेजर होती तो मैं बेहद ही गुस्से में होती और उस गुस्से में मैं न जाने क्या कर बैठती, या आज अगर मेरी कोई तीन एजर औलाद होती तो उसे मैं कैसे संभालती यह मेरी सोच से भी बाहर की बात है। मुझे बाकियों की तरह इस नई पीढ़ी से शिकायत नहीं, इनसे सहानुभूति है"

वाकई देखा जाये तो इस महानगर की यह नई पीढ़ी बेहद असुरक्षा और अवसाद में जीती हुई प्रतीत होती है ।
बेचारे ये नव युवा आखिर जाएँ तो जाएँ कहाँ कोई उत्साह दिखाएँ तो किस लिए, जिंदगी से प्यार करें तो किस तरह। भटकते हुए जहां जो साधन मिला उसमें जिंदगी की तलाश करते हुए ये अब जिंदगी खोने लगे हैं।

कुछ समय पहले एक १३ वर्षीय लड़के ने खुद को फांसी लगा कर मार डाला। क्योंकि गलती से उसने एक बहुत महँगा विडियो गेम अपलोड कर लिया था। उसे अपनी माँ के गुस्सा होने का डर था जिसने उससे कहा था कि अब उसे क्रिसमस पर कोई उपहार नहीं मिलेगा।

वहीं एक महंगे बोर्डिंग स्कूल में पढ़ने वाली एक बेहद अमीर घर की एक नवयुवा बच्ची ने आत्महत्या कर ली, क्योंकि जिससे वह प्यार करती थी उससे उसे वह प्रतिक्रिया नहीं मिल रही थी जो वह चाहती थी।

कुछ ही समय पहले लंदन के एक रईस के नवयुवा बेटे की लाश घर से बहुत दूर पाई गई जिसका कि गला काट कर उस व्यक्ति ने मार डाला था जिससे वह इंटरनेट पर हुई दोस्ती से प्रभावित होकर एक दोस्त की चाह में अपने माता पिता से झूठ बोलकर मिलने गया था।

यह कुछ ही उदाहरण हैं जबकि समाचार पत्र आजकल इसी तरह की ख़बरों से भरे रहते हैं।
आखिर दिन प्रतिदिन युवाओं में गहरे बैठती इस निराशा और असुरक्षा के लिए जिम्मेदार कौन है ? वे माता पिता ? जो बदलती परिस्थितिओं में अपना और अपने बच्चों का भविष्य संवारने में इतने व्यस्त हैं कि उनके पास उन बच्चों के लिए ही समय नहीं। या वे स्कूल ? जो पाठ्यक्रम और बढती प्रतिद्वंदिता के चलते मजबूर हैं बच्चों पर दबाब बनाने के लिए और कमी आ रही है उनमें जिंदगी के प्रति आशा का संचार करने में।या यह व्यवस्था ?जो इस महानगर को महान और आर्थिक रूप से सदृढ़ बनाये रखने के लिए बना रही है नित नई योजनाएं पर असफल हो रही है इसके कर्णधारों को उनके भविष्य के प्रति सुरक्षा देने में ?

वजह कुछ भी हो , कारण चाहे कोई भी बने परन्तु यह तो निश्चित है कि यदि जल्दी ही स्थितियों को सम्भाला नहीं गया तो एक असुरक्षित, अवसादपूर्ण, और कुंठित नई पीढ़ी के साथ एक सृदृढ़, सक्षम और सुरक्षित समाज को बनाये रखना एक सपना ही कहलायेगा।


20 March 2014-

विवाह या लिव इन ?


कुछ समय पहले अपनी विवाह की वर्षगाँठ पर चॉकलेट लेकर ऑफिस पहुंची तो एक सहकर्मी ने पूछ लिया, कितने साल हो गए शादी को ? मेरे बताने पर वह ज़रा सकुचा गया। धीरे से बोला "वाह। हमें तो अभी ७ साल ही हुए हैं साथ रहते, वो भी बिना विवाह के। हालाँकि अब सोच रहे हैं कि शादी कर लें। इसीलिए एक बड़ा घर ले रहे हैं"। कहते हुए उसका संकोच कम हुआ और चेहरा खिल उठा।
हालाँकि उसने काफी सहज होकर यह बात कही थी परन्तु फिर भी एक संकोच उसकी आँखों में मुझे नजर आया।
वह एक अंग्रेज था, उसके समुदाय में "लिव इन रेलेशनशिप" काफी आम बात है, किसी के साथ रहने के लिए विवाह की बाध्यता नहीं है, बच्चे पैदा करने के लिए पति/ पत्नी का तमगा नहीं चाहिए "पार्टनर" काफी है। फिर भी मुझे ऐसा लगा कि कुछ है जो विवाह के समकक्ष नहीं है। ऐसा कुछ जो विवाह की बात करने पर उसके चेहरे पर एक चमक ले आता है।

पिछली गणना के मुताबिक इंग्लैंड और वेल्स में "लिव इन रेलेशन" में रहने वालों की संख्या 4 करोड़ थी। यह एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ शादी के बाद के कानूनी बंधन नहीं होते। बाद में सम्बन्ध-विच्छेद हो जाने पर किसी तरह की एलिमोनी या देखभाल का खर्च देने लिए वे कानूनी रूप से बाध्य नहीं होते और बिना किसी कानूनी अड़चन के अलग हो सकते हैं ।

और यही आकर्षण अब एशियाई देशों और समुदायों को भी इस व्यवस्था की ओर खींच रहा है।
बहु संस्कृति और भौतिकवाद की राह पर तेज़ी से बढ़ता यह समाज, रिश्तों में असुरक्षा से ग्रस्त और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के पक्षधर आधुनिक लोगों को इस व्यवस्था में आसान जिंदगी नजर आती है।

परन्तु दुःख की बात यह है कि ऐसे बहुत से जोड़ों को यह भ्रम होता है कि एक ही व्यक्ति के साथ कई वर्षों तक रहने के पश्चात उन्हें वह सारे अधिकार मिल जायेंगे जो एक शादी शुदा जोड़े को मिलते हैं। यानि उनपर भी आम विवाह कानून लागू होगा। परन्तु दुर्भाग्य वश ऐसा है नहीं ।
यानि यदि आप बिना विवाह के एक साथ रहते हैं तो ऐसे बहुत से लाभ से वंचित होते हैं जो एक शादी शुदा जोड़े को मिलते हैं जैसे - एक साथी की मौत के मामले में दूसरा धन के लिए दावा नहीं कर सकता। जब तक कि एक अलग कानूनी दस्तावेज में उल्लेख न किया गया हो।
न ही साथी से रिश्ता खत्म होने के बाद अन्य को गुजारा भत्ता या रखरखाव के खर्च के लिए किसी भी तरह का भुगतान किया जाता है।
रिश्ता ख़तम होने पर, घर / अपार्टमेंट एक साथी के नाम पर है और दूसरे को बाहर जाने के लिए कहा जाता है तो उस घर में उसे रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। और एक सीमा संख्या के बाद बिरासत की राशि पर भी साथी को टैक्स देना होता है।
यहाँ तक कि कई उदाहरण मिले जब एन एच एस (नेशनल हेल्थ सर्विस) द्वारा भी आपातकाल में सूचना देने के लिए "नेक्स्ट टू किन" लिस्ट में कई बार इस तरह के सम्बन्धों को मान्य नहीं किया गया जब तक कि लिखित रूप से इजाजत न दी गई हो और इन रिश्तों में सम्मिलित बच्चों की जिम्मेदारी दोनों की ही होती है यदि वे कानूनी रूप से अविभावक हैं।
यानि कि इस तरह के रिश्तों में जो लाभ है वह सिर्फ यह कि ये जोड़े कानूनी बंधनों से एकदम आजाद होते हैं और आजकल के बदलते परिवेश में रिश्तों के टूटने के बाद किसी तरह की कानूनी परेशानी का सामना उन्हें नहीं करना पड़ता।
हालाँकि यही वजह है कि यू के में यह व्यवस्था काफी लोकप्रिय हो चली है। परन्तु राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय 2010 की सांख्यिकीय में सिद्ध किया है कि "लिव इन" में रहने वाले जोड़ों की अपेक्षा विवाहित जोड़े बहुत कम अलग होते हैं और लिव इन में रहने वालों को शादी शुदा जोड़ों की अपेक्षा कम गम्भीरता से लिया जाता है।
इससे साफ़ तौर पर देखने में आता है कि बेशक यह लिव इन की अवधारणा आपको कुछ जिम्मेदारियों से मुक्त करती है। परन्तु बात जहाँ सामाजिक महत्ता, सुरक्षा और रिश्तों में विश्वास की आती है वहाँ आज भी विवाह ही मान्य माना जाता है। और इस बिनाह पर विवाह संस्था का पलड़ा हमेशा भारी दिखाई पड़ता हैं।
अत: किसी भी व्यवस्था को आधुनिकता के नाम पर आँखें मूँद कर अपनाने से पहले एक बार विचार करना आवश्यक है क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि आज भी अपने एक आधुनिक समाज का आधुनिक नागरिक जब अपने स्टेटस की बात करता है या अपने पार्टनर के साथ कानूनी रूप से स्वतंत्र रहते हुए भी वह जब उसके साथ कानूनी बंधन में बंधने की बात करता है तो उसकी आँखें चमकती हैं। आज भी वह विवाह की वर्षगाँठ पर बढ़ते हुए वर्षों की संख्या पर गर्व की अनुभूति करता है। और आज भी "लिव इन" की स्वतंत्रता के ज्यादा उसे वह बंधन पसंद है जिसमें सुरक्षा, प्रेम और अधिक विश्वास है।

-शिखा वार्ष्णेय
 

शिखा लंदन में रहती हैं। लेखक हैं, यू के में साहित्य की विभिन्न संस्थाओं से जुड़ी हैं। शिखा की ब्लॉग के रूप में रूस डायरी और पुस्तक के रूप में लंदन डायरी बहुत लोकप्रिय हुए। लंदन की मौजूदा स्थितियों पर ये टीपें आपको लंदन की बाहरी चमक - दमक के पीछे की विडम्बना की झलक दे जाती हैं। इसीलिए यह डायरी महत्वपूर्ण हो जाती है। भाषा की जादूगर शिखा अब कहानी पर हाथ आजमा रही हैं

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