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दुबई: मरुस्थल में बिखरी माया

लक्ष्मी शर्मा

दिनांक- 13.11.19

अपने शहर, अपने देश से काले कोसों तो नहीं पर हजारों कोस दूर... सात

समंदर तो नहीं पर एक समन्दर पार... रेगिस्तान के सीने पर खुबी बुलंद इमारतों के बीच किसी इमारत की इकत्तीसवीं मंजिल पर, जहां से कुछ ही दूर पर बहता समंदर अपनी आवाज नीचे से आ रहे ट्रैफिक के शोर से हार जाता है... एक घर में, दोपहरी की नींद से जागना, जहाँ मन्दिर में दीपक जल रहा हो और रसोई में अपने देश के खाने और उसकी महक के साथ बरतन बतिया रहे हों... अद्भुत है. ये घर मेरे बड़े पुत्र का है, दुबई में.

दुबई हवाईअड्डे पर उतरते ही आयतों की तरह गाई जा रही मीठी अरबी उद्घोषणा आपका मन मोह लेगी और मिठबोले, चतुर, व्यवहारिक (हूबहू भारत के बनियों जैसे) लोग आपका खैर मक़दम और सहायता करने को तत्पर मिलेंगे। आप कई किलोमीटर में फैले हवाई अड्डे से डरें तब तक अगले गन्तव्य तक ले जाने के लिए मेट्रो रेल आपके सामने आ खड़ी होगी। बाहर निकलते ही जिधर तक नज़र जाए रेगिस्तान के सीने पर खड़ी हो कर आसमान में अपना गर्वित सिर गड़ाए खड़ी इमारतें, एक दो, सौ, दो सौ नहीं, हजारों... दो, चार, आठ, नहीं अनगिन लेन में बँटी सड़कों का जंजाल जो हवाई पुल के मकड़ जाल में लखनऊ के भूलभुलैया को भी मात करता है... इन सब के बीच पसरी खूब सारी खाली जमीन, लेकिन पार्किंग के लिए एक इंच नहीं, अगर सोच भी लिया तो सोच सुधारने के पहले ही आपके बैलेंस में से आपका जुर्माना कट चुका होगा... समंदर के शोर को पीछे छोड़ता महँगी गाड़ियों का अंतहीन शोर जो चौबीस घंटों में एक पल के लिए भी नहीं चुप होता... लेकिन इस सब ऐश्वर्य के बीच आदमी...? सड़क पर एक भी नहीं दिखेगा, न पैदल, न दुपहिया पर। और कारों में बैठे चेहरे भी मशीनी रोबोट से ज्यादा नहीं दिखते और इन के इंसान बनने की चाहत भी ये सरकार कतई नहीं करती। खुदा न ख़्वास्ता, कोई एक्सीडेंट हो ही गया तो नौ मिनिट के भीतर दुनिया की सब से मुस्तैद पुलिस एम्बुलेंस के साथ आ जाती है, लेकिन तब तक आप ने घायल को संभालने के लिए रुकना तो अलग गाड़ी की गति कम भी कर ली तो आपका हिरासत में होना तय है। क्योंकि यहाँ नागरिकों के अलावा सब या तो श्रमिक है या पर्यटक, जो इन के जीवन और गति से छेड़छाड़ करने की अनुमति और हिम्मत दोनों का हक़दार नहीं है। और इसलिए भी कि तुरन्त ही जाने किस आसमान से मय एम्बुलेंस पुलिस उतर आती है... आप रास्ता भूल ही गए हैं तो, जो कि कदम कदम पर लगे निर्देश चिह्नों के चलते नामुमकिन सा है, शुरता (पुलिस कर्मी) आपको गन्तव्य तक छोड़ने के लिए तैयार है... अगर आप पैदल चल रहे हैं तो आपको भी नियमानुसार सड़क पार करनी है, लेकिन आप अपने भारतीय तरीके से ट्रैफिक नियमों को धता बताते सड़क पर चल ही पड़े हैं तो दुबई के राजकुमार की गाड़ी भी आपके लिए थम जाएगी... आप उन्हें जाने को कहते रहें गाड़ी आपके सड़क पार कर लेने तक एक सेंटीमीटर नहीं हिलेगी। बाद में चाहे जुर्माना ठोक दें।

 

दिनांक 15.11.19

दुबई का सबसे खूबसूरत हैपनिंग और महंगा इलाका पाम जुमेरा आइलैंड जहाँ एक और सुरमई नीले रँग का पानी अरब सागर (जो कि मूल रूप से फारस की खाड़ी है) के रूप में फैला है और साँझ की बेला में जब इस सुरमई रँग पर ढलते सूरज की ललछौंही आभा गिरती है तो ये समंदर लैला में बदल जाता है जिसकी साँवली जिल्द पर भीतर से झलकते लहू की आंच मिल कर उसके सरापे को तांबे सी दमक दे रही है। और दूसरी तरफ अटलांटिस जैसे भव्यतम होटल और उसके अतिथियों की शान ओ शौकत से दमकते इस इलाके में प्रशासन ने पर्यटकों के लिए भौतिक चकाचौंध के अलावा और भी बहुत कुछ कर रखा है जिस के कारण यहां जल, जल-जीव और जलजीवन-प्रेमी पर्यटकों का उत्साह भी इस जगह में बना रहता है।
समंदर के नीचे बनी सुरंग से होकर या धरती की सतह पर शानदार हरियाली के दृश्यों के बीच जलोद्यान के ऊपर से गुजरती मोनोट्रेन की सवारी का आनंद लेते हुए जब आप जुमेरा पहुंचते हैं तो ‘लॉस्ट चैंबर्स एक्वेरियम’ नामक एक विशाल जादुई लोक अपनी बाहों में समंदर की हजार रँगी छटाएँ खोले आपको मुग्ध-विस्मृत कर देने के लिए बाहें पसारे आपका स्वागत करता है। पारम्परिक एक्वेरियम की छवि और अवधारणा से पूरी तरह अलग इस एक्वेरियम में न पानी न मछली कैद है अपितु उनके घर, उनके जीवन की सुविधा से एक्वेरियम ही वहां पहुंचा है। एक मिलीमीटर की मछली से लेकर शार्क मछली तक है यहां। और इस सीमित क्षेत्र में समुद्री जीवन के जितने रँग कोई भर सकता है उससे ज्यादा दुबई सरकार ने भरने का सार्थक और सुरुचिपूर्ण प्रयास किया है जिसके लिए वो अभिनन्दन की पात्र है।
इस मछलीघर के कक्ष, कक्ष नही अपितु जरा सी दीवारों में घिरे समुद्र ही हैं। जहां इन प्राणियों के साथ मनुष्य भी इस समंदर में बेखौफ अटखेलियां कर लेता है।
सब को अचंभित भाव से देखते हुए मैं लगातार सोचती रही कि हर कक्ष में एक जैसी मछलियों को लाना रखना कैसे सम्भव हुआ क्योंकि मूल रूप से तो हर कक्ष समंदर से जुड़ा दिखता है, और प्रत्येक कक्ष में इतनी स्वच्छता? मरहबा? पर्यटन उद्योग के लिए दुबई सरकार की दूरदृष्टि और उसके सार्थक सुरुचिपूर्ण प्रयास दिल से अभिनन्दन के पात्र हैं।
एक्वेरियम देखने के बाद हम होटल अटलांटिस के ऐन पीछे ‘द पॉइंट’ देखने गए. समुद्र के पानी को भीतर तक खींच कर उस पर छोटे द्वीप की तरह विकसित किया ये हैपनिंग प्लेस पर्यटकों का दिल जीत लेता है। यहाँ खड़े हो कर देखने पर अटलांटिस किसी विशाल प्रासाद की तरह भव्य और विशाल दिखता है और जिसकी रात के समय समुद्र में पडती रोशनी रोशनी इंद्रपुरी की रोशनी सी गिरती है। दुबई के प्रत्येक पर्यटन स्थल की तरह यह जगह भी खरीददार के लिए स्वर्ग है।
हम वहाँ पहुँचे तो वातावरण में मधुर संगीत और कर्णप्रिय सुर गूँज रहे थे, जो एक मंजिला इमारत की खुली छत से आ रहे थे। अरबी धुन का वो जोशीला गीत-संगीत मुझे अपनी भूख भुला कर ऊपर खींच ले गया, एक आलीशान रूफ टॉप अरबी रेस्टोरेंट में जहाँ भद्र, शालीन अमराती लोगों की बहुतायत थी, महँगी सुरा और शीशे की महक से वातावरण महक रहा था. हालांकि ये दोनों ही मुझे नागवार है लेकिन उस संगीत की महफ़िल में जाने का लालच भारी पड़ा और मैं वहाँ पहुँच गई जहाँ एक खुले गवाक्ष जैसी जगह पर लाइव कंसर्ट चल रहा था। अर्थ न पकड़ आने पर भी हम काफी देर वो मीठा वृन्द गान सुनते रहे। दो प्रस्तुतियों के बीच के अंतराल में गायकों के साथ फोटो खिंचवाया और उनका एक छोटा सा साक्षात्कार भी लिया।
वहां से आकर हमने वहाँ के प्रसिद्ध अरबी रेस्टोरेंट ‘सफादी’ में ब्यालू किया। लेबनानी और अरबी व्यंजनों के लिए मशहूर इस खुले रेस्तरां में लेंटिल सूप, खुब्ज, फलाफल, हुम्मस, स्पिनीच पाई, बाबा गनुश और मुतब्बल का आनन्द उठाया।


17.11.19


दुबई के सिर का मुकुट, उसकी शान और सबसे बड़ा खिताब है दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज खलीफा. 829.8 मीटर ऊंचाई वाली ये इमारत दुनिया की ‘सबसे ऊंची फ्रीस्टैंडिंग इमारत’, ‘सबसे तेज और लंबी लिफ्ट’, ‘सबसे ऊंची मस्जिद’, ‘सबसे ऊंचे स्वीमिंग पूल’, ‘सबसे ऊँचे नाईट क्लब’, सबसे ‘ऊंचे अवलोकन डेक’ और ‘सबसे ऊंचे रेस्तरां’ को भी अपनी गोद में समेटे है और 163 तलों वाली यह इमारत दुनिया के ‘सबसे ज्यादा तलों वाली इमारत’ भी है.
छह साल और आठ अरब डॉलर की लागत से बनी, लगभग पूरे दुबई से नज़र आने वाली और हवाईजहाज से भी बहुत देर तक दिखाई देने वाली पतली सलाई सी ये बिल्डिंग नजदीक जा कर ही पूरी समझ आती है। इसकी ऊंचाई को हम इस तरह समझ सकते हैं कि इमारत के टॉप फ्लोर पर तापमान ग्राउंड फ्लोर की अपेक्षा 15 डिग्री सेल्सियस कम रहता है. निर्माण के समय बुर्ज दुबई के नाम से आरम्भ हुई इस इमारत का नाम बदल कर बुर्ज खलीफा हो गया क्योंकि इस के निर्माण में संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख खलीफा बिन जायेद अल नाहयान ने वित्तीय सहायता की थी।
इस इमारत की लिफ्ट 124वें तल पर स्थित अवलोकन डेक 'एट द टॉप' तक मात्र 1.10 मिनट में पहुंच जाती है. पर्यटकों को केवल 148 और 124 मंजिल तक जाने की अनुमति है लेकिन टुरिस्ट सीजन में 148 मंजिल की टिकिट्स हमेशा बुक रहती हैं तो हम केवल 125 मंजिल तक जा पाए। बरसते पानी में बादलों के कारण दुबई का बहुत स्पष्ट दृश्य तो हम नहीं देख सके लेकिन जो भी देखा अदभुत था। दुबई के अन्य स्काई स्क्रेबर्स भी इस ऊँचाई से माचिस की डिब्बियों से दिख पड़ रहे थे और आसमान से झुकी घटाएँ बुर्ज के बोसे लेती सी लग रही थी। इमारत के प्रांगण में दिखाया जाने वाला फव्वारा शो भी इस इमारत की खूबसूरती में चार चाँद लगाता है। रात के समय इस पर की गई रोशनी की सजावट जब अलग-अलग रंग-रूप धरती है तो देखने वाला मुग्ध हो जाता है।
मुझे दुबई की भौतिक चकाचोंध और तकनीक वाले निर्माण में जो प्रशंसनीय बात लगी वो ये कि उस सब में एक सुरुचिपूर्ण कला का समावेश है जो इस में भी स्पष्ट झलकती है। बुर्ज खलीफा से सटा दुबई मॉल, वहाँ के सर्वश्रेष्ठ मॉल्स में एक। इसे देख कर लगता है कि शायद कुबेरनगरी ऐसी ही हो। तीन मंजिल से गिरता पानी, आलीशान फानूस, सब भौतिक चकाचौंध, क्या नहीं है वहाँ। लेकिन मुझे जिस चीज ने आकर्षित किया वो था एक डायनासोर का जीवाश्म। सारी चकाचौंध औऱ प्रबल सत्ताएँ भी एक दिन इसी गति को प्राप्त हो जानी है, कोई कितना भी बली हो उसे एक दिन फानी हो जाना है और उसका फानी होना भी किस तरह से होगा ये कौन जानता है। यह युवा मादा डायनासोर भी भूख अथवा चोट से मरी है और आज इस गति में ठहरी हुई है। इस विशाल शाकाहारी देह को जिस अनुपात में अत्यंत छोटा मुख मिला था उसमें हर समय भोजन और उसके न मिलने पर मृत्यु का निर्धारण पहले ही तय था।आधुनिक कुबेरनगरी में रखी ये देह जीवन के बहुत बड़े फलसफे को कह जाती है बशर्ते कि कोई उसे पकड़ कर उस से जीवन के इस अनिवार्य सत्य को पकड़ना चाहे।


18.11.19

ग्लोबल विलेज, दुबई का वह आकर्षण जो उसकी गगनभेदी, पथरीली भौतिक तड़क-भड़क की नुमाइंदगी करती इमारतों के विपरीत जमीन पर फैला हुआ उपक्रम है. जो अपनी व्यावसायिकता के बावजूद जीवन, कला और संस्कृति के स्पंदन से उर्जित, उष्मित है।
नवम्बर से अप्रैल तक खुले रहने वाले, शेख जायद रोड पर एक विशाल प्रांगण में पसरे इस विश्व ग्राम में केवल मध्य एशिया के ही पांडाल नहीं अपितु विश्व भर के नब्बे से अधिक देशों के पांडाल बने हैं जो अपने देश की कला, संस्कृति, समाज और स्थापत्य के प्रतिनिधि हैं। यहाँ एफिल टॉवर है तो गीजा के पिरामिड भी और ताजमहल भी। यहाँ सुसी खा सकते हैं तो फलाफल भी और आगरा की चाट और राजस्थान की दाल-बाटी भी.
यहाँ से आप वो चीजें खरीद सकते हैं जो उस देश की खासियत है. जापानी वेशभूषा में खड़ी स्त्री के साथ फोटो खिंचा सकते हैं, शहद, खजूर बेचने वालों के द्वारा निशुल्क पेश किए जा रहे कहवा का आनन्द उठा सकते हैं और आश्चर्य चकित हो सकते हैं कि इतने बड़े पांडाल और इतनी भीड़ के बाद भी यह मेला इतना साफ और सुव्यवस्थित कैसे है।
बोस्निया के पूर्वी अमरीकी स्थापत्य, ईरान के गलीचे, कुवैत का शहद, चीन-जापान के खिलौने, अलग-अलग देशों के मसाले, कृत्रिम झील में नावों पर चल रहा बाजार और उसके चीनी व्यंजन दर्शकों को खूब लुभा रहे थे।
ताजमहल और चारमीनार की प्रतिकृति से सजे भारत के दूधिया सफेद मंडप के बाहर खड़े होते ही हमारा भारतीय मन देश के लिए पुलक उठा और कुछ देर के लिए भावुक भी। पंडाल के बाहर चल रहा शानदार कठपुतली नृत्य और भीतर बजती ‘आवो नीं पधारो म्हारे देस...’ की धुन ने इस भावुकता को नॉस्टेल्जिया में बदल दिया। और राजपूती पोशाक पहने राजस्थान की चीजें बेचती स्त्रियों ने तो हमें ऐन जयपुर में ही ला खड़ा किया, लहरिया, चूनर, कंगन, चूड़े, बंदनवार, मसाले अहा.. इसके अलावा कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी भी वहाँ था ही।
वैसे तो वहाँ हर देश के पांडालों पर खरीददारी हो रही थी लेकिन सबसे ज्यादा बिक्री अफ्रीका के लकड़ी के सामान, शिया बटर, स्किन केयर प्रोडक्ट, दूसरी सजावटी चीजों और पाकिस्तान के गर्म कपड़ों और रेग्जीन जैकेट और पर्स की हो रही थी। हमने भी शिया बटर, मॉइस्चराइजर, लकड़ी की बनी खूबसूरत चम्मचें, कंघा और कुछ सजावटी समान खरीदा। वहां टहलते अमीराती किशोरों के साथ दोस्ती की, बोस्निया की कार्पेट बनाने वाली आत्मविश्वास से भरी, दमदार हसीना से मिले, किमोनो पहने जापानी सुंदरी के साथ पिक खिंचवाया, एक पढ़ते किशोर छात्र को कुछ देर पढ़ाया, चीन के कुएँ से पानी खींचा, भारत के पंडाल के बाहर ‘संदली-संदली नैना विच तेरा नाम मुंडिया.. गीत के साथ कठपुतली नाच देखा और ढेरों तस्वीरों में वहाँ की मीठी यादें लिए घर लौट आए। दुबई जा कर अगर आपने ये विश्व ग्राम नहीं देखा तो बहुत सारी वैश्विक जानकारी समृद्धि से वंचित रह जाएँगे.
एक सलाह, देखें-गुने ज्यादा, सौदे के चक्कर में कम पड़ें, क्योंकि बाजार आपको देखना नहीं भरमना सिखाते हैं और पर्यटन का मूल उद्देश्य अनुभव खरीदना है न कि बाजार को झोले में भर घर लाना।


21.11.19

दुबई की शौहरत और चकाचौंध में एक नया अध्याय जोड़ने वाली दुबई फ्रेम... एक विशाल फ्रेम की शक्ल की इमारत जो दुबई के मर्मस्थल पर खड़ा है और जो एक तरफ से दुबई के तड़कभड़क वाले नए और दूसरी तरफ से परम्परागत रूप वाले पुराने चेहरे से रूबरू करवाता है। इसे बनाने के पीछे सोच यह है कि दुबई का भूत, वर्तमान और भविष्य लोगों को एक साथ दिखाई दे जाए। इमारत में दाखिल होने से पहले एक प्रदर्शनी के बीच से गुजरना मेरे जैसे अतीत को पकडने वाले लोगों के लिए बेहद समृद्धिकर है.
इसमें दुबई के पुराने इतिहास, मछली पकड़ने वालों और घुमंतू कबीलों की बस्ती के दुनिया के सबसे आधुनिक शहर में बदलने की कहानी जीवंत रूप में कही गई है, लहसन-अखरोट बेचते दुकानदार, खाना पकाती और कालीन बुनती गृहणियाँ मानो बातें करती हैं।
आगे काँच की पारदर्शी लिफ्ट से दुबई के नज़ारे देखते हुए 150 मीटर ऊपर 48 मंजिल, जहां पहुंचते ही मन मुदित स्तब्धता से भर जाता है. लिफ्ट को इतनी ऊँचाई तय करने में 75 सेकंड का समय लगता है। दोनों खंभों को जोड़ने वाले ब्रिज की ऊंचाई से दुबई के शानदार नज़ारे दिखाई देते हैं।
ब्रिज के दाएँ या दक्षिण दिशा की तरफ नई दुबई है जिसकी नुमाइंदगी करता बुर्ज खलीफा और अन्य गगनचुंबी इमारतें दिखाई देती हैं और बाएँ या उत्तर दिशा की तरफ पुराने दुबई का इलाका दिखाई देता है। बर और देरा का इलाका, जहाँ छोटी-छोटी इमारतें और पुराने शहर की बसावट दीख पड़ती है।
स्काई डेक, यानि फ्रेम की ऊपरी पट्टी के बीच बना काँच का फर्श। यहाँ से पर्यटक जमीन से 150 मीटर ऊपर कांच (जिस पर सैंकड़ो लोग एक साथ चलते हैं) के पारदर्शी फर्श पर पहला कदम रखते ही नीचे अनंत गहराई दिखाई देती है जो मन आश्चर्य से भर देती है। हॉल में लगे ‘गोल्डन रेशो’ या ‘रूल ऑफ थर्ड’ का आकार और इबारत को पढ़ कर नवीन ज्ञान दृष्टि मिली जिससे मैं अब तक इस से अपरिचित थी।
यहां से नीचे उतर कर दूसरे हॉल में 3D स्क्रीन पर करीब 10 मिनट के लिए एक बेहद रोमांचक फ़िल्म दिखाई जाती है जिस में भविष्य की दुबई है, जब उड़न टैक्सी और ड्रोन काम करेंगे और भविष्य का दुबई तकनीक से लैस होगा। इमारत के बाहर म्यूज़िकल फाउंटेन लगा है जो थोड़ी-थोड़ी देर में चलता रहता है। इस इमारत को देखना आनन्द और जानकारी दोनो की दृष्टि से मजेदार रहा।
इमारत के बाहर म्यूज़िकल फाउंटेन लगा है जो थोड़ी-थोड़ी देर में चलता रहता है। इस इमारत को देखना आनन्द और जानकारी दोनो की दृष्टि से मजेदार रहा।


25.11.19

कहते हैं हमारे देश में एक पत्थर उछालें तो वह किसी कुत्ते को लगे उस से ज्यादा संभावना इस बात की है कि वो किसी कवि को लगेगा। ठीक यही बात दुबई पर लागू होती है कि दुबई में आप एक पत्थर उछालें तो वह किसी बिल्ली को लगेगा उस से ज्यादा संभावना इस बात की है कि वह किसी भारतीय उपमहाद्वीप के व्यक्ति को, खासकर किसी मलयाली को लगेगा। स्वाभाविक है कि संयुक्त अरब अमीरात का सबसे धनाढ्य दुबई देश खुद तो काम करने से रहा तो उसने सारे विश्व के लोग आमंत्रित करके ही अपना यह विशाल आधुनिकतम व्यापारिक ढांचा खड़ा किया है। योरोपियन से लेकर तमाम अफ्रीकन और एशियाई देशों के लोग यहाँ दूध में चीनी की तरह मिल कर रहते हैं, जिन में भारतीयों की बात ही कुछ और है।
हम भारतीय भले ही भारत छोड़ कर कहीं भी चले जाएँ भारत हमें कभी नहीं छोड़ता . करामा, डेरा, बर दुबई में भारतीयता का यह आलम है कि आप भूल जाएंगे कि आप भारत में नहीं हैं। सब्जी-भाजी, सौदा-सुलफ लाती और आराम से बिना नियम के सड़क पार करती पृथुल गृहणियां, गपियाते लोग, रोते बच्चे और दुकानों के बाहर रखे सामान आपको नॉस्टेल्जिक करे बिना न मानेंगे।
करामा के बाजारों में दुकानों के बाहर हिंदी में लिखे बोर्ड्स, होटल में हिंदी में लिखे मीनू, ठेठ भारतीय व्यंजन और गिरस्ती के सामान, मसाले सब की बहार है तो दुकानों के बाहर लटकी साड़ियां और सूट भारत की याद दिलाते हैं। इन दुकानों से आप गोंद, मूसली, सोंठ, सूखी काचरी, दवा की सुपारी, पठानी लोध से ले कर मंगोड़ी, पापड़, आँवला, मेथी, सुआ (dyl leaves) तक खरीद सकते हैं और बीकानेर वाला, हल्दी राम की दुकान पर तमाम तरह के चाट और नमकीन का स्वाद ले सकते हैं। आप भारत के जिस राज्य का स्वाद लेना चाहें उसकी दुकान हाजिर है। दक्षिण भारत के भोजन की तो बात ही करना व्यर्थ है बंगाली, गुजराती मराठी, राजस्थानी भी यहां खूब प्रचलित है, केर-सांगरी, दाल-बाटी, बेसनगट्टे, मिर्च पकौड़े का आनंद भी मारवाड़ी बन्धु यहाँ ले सकते हैं।
डेरा की पुरानी गलियां, जो मन्दिर की ओर जाती है, में घुस कर एक पल को लगता है कि आप हरिद्वार या अमृतसर की संकरी गलियों में घूम रहे हैं। मकानों की गली की सड़क पर ही उतरती सीढ़ियां देख कर तो मैं सच में अचंभित रह गई थी। छोटी-छोटी दुकानों में अटा भारतीय माल, भारतीय दुकानदार, हिंदी-गाने, पूजा-पाठ का सामान, दीये, बत्तियां, नारियल, शोर, अफरातफरी और जरा सी गन्दगी भी, सब हूबहू भारत।
और पेड़ के नीचे बैठे तिलक, छाप लगाए, जनेऊ धारी पण्डित जी का पुकार कर तिलक लगाने के लिए बुलाना और फिर दक्षिणा के लिए बोलना...अहा आनंदम। ये मन्दिर वैसे तो हमारे मंदिरों से जरा अलग है कि एक ही प्रांगण में सब भगवान समधर्म, समभाव, की भावना से विराजते हैं समय की पाबंदी है और ‘तनिक’ स्वच्छता है, बाकी जहां-जहां भारतीय हैं वहां भारत क्यों न हो।
सब कुछ है जी! मंदिर वाली गली में जूते खोलने की जगह के पास लगे बोर्ड्स हाथ से लिखा ‘कृपया यहाँ गुडखा खाकर थूकना मना है, अपना मन्दिर और अपना घर को स्वच्छ रखें धन्यवाद’ और ‘मेहरबानी करके यहाँ हाथ पैर न धोएँ, यह पीने का पानी है.’ देख कर मन संतुष्ट हो गया.
सच कहूँ तो इस सब को देख कर भारत, भारत की सनातन आस्था और अपने सारे गुणों पर सहज ही गर्व करने को मन करता है कि दुबई जैसी अनुशासन प्रिय सरकार ने भी हमारा लोहा मान लिया और जगह-जगह कुछ हिस्से हमें दे कर उधर से हाथ झाड़ के बैठ गई, कि लो कर लो जो करना है। जानती है न कि इस देश की जनता का कुछ नहीं हो सकता, राजस्थानी ट्रक साहित्य के अनुसार 'या तो अइयाँ ई चालेली।"
बहरहाल, ये सब देखकर हम गोल्ड सूक देखने चले गए, जहाँ घुसते ही दुकानों के शोकेस में टँगे सोने के कपड़े, सोने के सेहरे-हिजाब, पाँच-पाँच किलो के हार और हाथी की शृंखला जैसी मोटी-मोटी गले में पहनने की जंजीरें देख कर काफी देर तक मुँह खुला का खुला रह गया. हे भगवान! इतना सोना. बहरहाल हमने भी अपनी मध्यवर्गीय जेबानुसार सोना खरीदने का शगुन पूरा किया और निकल आए.

बर दुबई, असली, पुरानी, पारम्परिक दुबई का खाँटी, अकृत्रिम रूप डाउन टाउन की आसमान की बुलंदी में धँसी जाती इमारतों से दूर बर दुबई जैसी पुरानी बस्तियों में मिलता है। अरब के रेगिस्तान पर बसी संस्कृति धड़कती है. पुराने अरबी स्थापत्य के पीली मिट्टी पुते मकान, मध्यमवर्गीय लोगों के घर, और धनाढ्य लोगों के बड़े घर, उनकी बुर्जियां, उनके छज्जे, झरोखे सब... लोगों का पैदल चलता, हँसता, ठहराव वाला जीवन, बुरकों और हिजाब में लिपटी खातूनें... देसी मसालों की दुकानें, रोटियों के तंदूर, शीशे की दुकानें, कंदुरे, बुरकों, सलमा, जरदोजी के काम वाले कुरते, इत्र, शहद और अरबी जेवरों की माल्स के विपरीत छोटी सामान्य सी दुकानें. घरों से उठती सालन और मछली की महक, मस्जिदों से उठती अजान की आवाज, समंदर में खड़ी पारम्परिक धाव जो यहाँ के जीवन की सांस्कृतिक पहचान भी है और चौराहे पर, म्यूजियम के बाहर से लेकर माल्स तक में शान से रखी रहती है और सामान्य प्रयोग में आने वाले आबरा भी अरबी लोक की पहचान है।
खुशकिस्मती से आज ही चूंकि का राष्ट्रीय दिवस था और हर नागरिक के लिए बेइंतहा खुशी का दिवस.. स्थापना दिवस के दिन खुशियों, जोश और जुनून में डूबा दुबई, हर जगह रोशनी और सजावट, जगह-जगह आतिशबाजी, इमारतों से लेकर गाड़ियों तक राष्ट्रीय ध्वज की शान, राष्ट्रभक्ति में झूमते गाते अमीराती लोगों के समूह और जगह-जगह चलते अन्य कार्यक्रम इस देश के प्रति अपने नागरिकों के अथाह प्यार की बानगी है. यहाँ की धुम्र-चिंगारी रहित, बिजली से चलने वाली आतिशबाजी सरकार के द्वारा की जाती है. नगर, नागरिकों और पर्यावरण के लिए पूरी तरह सुरक्षित इस दिलकश आतिशबाजी को सारा विश्व देखने आता है.
आज का भ्रमण सच्चे अर्थों में सच्चे पर्यटक के लिए वो खुराक थी जो इन गलियों में भटके बगैर नहीं मिलतीजिसके लिए निदा फ़ाज़ली साहब ने कहा है- "धूप में निकलो, घटाओं में नहा कर देखो, जिंदगी क्या है किताबों से हटा कर देखो।"


26.11.19

दुबई के विश्व-प्रसिद्ध माल्स में जाए बिना किसी का दुबई भ्रमण पूरा होता तो हमारा होता. जाने कितने माल्स में बेटे जी हमे ले गए सभी अच्छे भी हैं लेकिन इनमें विशेष दर्शनीय और उल्लेखनीय हैं दुबई माल, इब्न बतूता, मॉल ऑफ़ एमिरेट्स, जिनमें बुर्ज-खलीफा से सटे दुबई माल का उल्लेख मैं कर चुकी हूँ. अन्य दो माल ‘इब्न बतूता’ और ‘सुक मदीना’ मुझे शायद इसलिए पसंद आए कि वे मेरे मिजाज से मिलते हैं.
इब्नबतूता, बाहर से सामान्य वास्तु में ढले इस इकहरे माल के भीतर जाते ही इसकी सुरुचिपूर्ण, आधुनिक तकनीक और कल्पनाशीलता पर्यटक को मुग्ध कर देती है. भारत, चीन, फारस, ट्यूनीशिया, मिस्र, और एन्डालुसिया की वास्तु और सांस्कृतिक झांकी के आधार पर पवेलियन में बंटे ट्यूनीशिया के पवेलियन की कृत्रिम छत और उसपर टिमटिमाते साँझ के तारे और प्राचीन इमारतों की बुर्जें देख कर जल्दी से विश्वास नहीं होता कि ये सब असली नहीं है.
इस माल में लगभग सब मिलता है, और बहुत कुछ सामान्य दरों पर. विशेष कर ग्रोसरी, कपड़े और पर्स और जूते जो बजट में होने के कारण हमने भी भर झोला खरीदे, बढिया चाय फिर ब्यालू का भी आनन्द उठाया और घर लौट आए.

27.11.19

अबुधाबी, संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी। बेशक यहाँ भी गगनगामी इमारतें, मॉल्स, वैभव, महँगी कारें और वो सब है जो इस धनाढ्य देश की पहचान है, लेकिन फिर भी बहुत कुछ है जो इसे दुबई से अलग करता है। इसे हम वैसे ही समझ सकते हैं जैसे लखनऊ की पुरानी, हर तरह से समृद्ध, बनावट, बसावट और जीवन शैली और आधुनिकतम तकनीक से लेस नए गुड गाँव का पोश सेक्टर।
जहाँ दुबई की आबादी में महज दस प्रतिशत मूल अमीराती हैं अबुधाबी में इनका अनुपात बीस प्रतिशत के आसपास है जो स्पष्ट दीखता भी है। यहां ज्यादातर रहवासी और अन्य इमारतें पारंपरिक हैं, विशाल और भव्य। लोगों की पारंपरिक वेशभूषा में परम्परा के लिए श्रद्धा और प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखती है। जीवन में आपाधापी की जगह ठहराव और अकृत्रिम रवानगी है, राजा के प्रति दीवानगी है और स्वयं के लिए श्रेष्ठता बोध भी।
इसी अबुधाबी में है विश्व (कुछ मामलों में) की तीसरी सब से बड़ी मस्जिद ‘शेख जायद मस्जिद’, जिसे बड़ी मस्जिद भी कहते हैं।
मरहबा, जैसे अरब के पीले रेतीले समंदर पर रखा एक नायाब मोती, जैसे शायर की हक़ीक़ी महबूबा मुमताज़ के लिए गढी ताजमहल सी गज़ल, जैसे चांदनी का टुकड़ा और चाँद का ठिकाना। राजस्थान के मकराना पत्थरों से तामीर इस इमारत में जो भी भव्य, सुरुचिपूर्ण और दिलकश है सब लगा है। विशाल, बेहद खूबसूरत फानूस, छह हजार फीट का गलीचा, पच्चीकारी का काम, अल्लाह के निन्यानबे नाम, मीनाकारी, क्रिस्टल, सुनहरे पानी से चित्रित एक हजार स्तम्भ, सब अप्रतिम। चालीस हजार नमाजियों को सजदे में झुका देखकर इस की बुलंद लेकिन विनयावनत सी दीखती मीनार को कैसा मीठा अनुभव होगा ये हम यहाँ पर तैनात टीम को देख कर समझ सकते हैं। पूर्णतया निःशुल्क इस प्रांगण में हर बन्दा सहयोगी और दिखावा रहित विनम्र है। एक हाथ से दुआ करते फोटो को देख कर उनका कहना 'एक हाथ से की दुआ कुबूल नहीं होती मामा, इस पिक को साथ मत ले जाइए।' मन को कैसे तो छू जाती है,हालाँकि इस मीठी बात के पीछे परोक्ष रूप से फोटो नहीं खींचने का निर्देश ही है।
बस मन को जो चुभा वही स्त्रियों के लिए बुरके की अनिवार्यता और पुरुष को बरमूडा-बनियान में जाने की छूट. बहरहाल ये एक खुशलिबास, खुशमिजाज, खुशखुलूस इबादतगाह के साथ एक बहुत अच्छी मुलाकात थी.
’बड़ी मस्जिद' को देखकर निकलने के बाद चाय की तलब हुई तो सबसे पहला नाम यहाँ के प्रसिद्ध रेस्टोरेंट 'फिली' का आया जिसकी अरब के खाडी देशों के साथ भारत और ब्रिटेन में भी शृंखला है, और अपनी शानदार जाफरान चाय के लिए जाना जाता है। फिली के चाय-समोसे सच मे शानदार थे और आशानुकूल मालिक मलयाली। सड़क किनारे बने फिली में बिल्ली के घायल बच्चे के साथ खेलते हुए जाफरान चाय पीना आंनददाई अनुभव था।


8.12.19

'सुरग में सौ सुख पर मिनख गूँगे.' दुबई में रहते हुए घर से सटी, बंगलों वाली बस्ती को जितनी बार फ्लैट की बॉल्कनी की ऊंचाई से या नियमित रात्रि-भ्रमण के समय देखा, हर बार यही अनुभव हुआ। वैसे तो ये हर देश के बड़े शहरों का रोना है, लेकिन दुबई में ये मौन ज्यादा दिखा। कई बार तो आपको ऐसा लगता है जैसे ये शहर केवल मोटरगाड़ियों के लिए ही बना है, क्योंकि ये ही हैं जो चौबीसों घंटे सड़कों पर दिखती हैं, अगर इन्हें रौनक मानें तो दुबई में खूब रौनक है। इंसान भी हैं लेकिन या तो पर्यटकों के रूप में या कारों में बन्द भागते रोबोट के रूप में।
और तो और इन के घर भी निर्वासित लोगों की बस्ती से ही दीखते हैं, सूने, जनहीन। शानदार, संयोजित, साफ-सुथरी सड़कों वाली बस्ती के घरों के हरियाली छाए बड़े-बड़े दालान, खूब चौड़े, हरे कच्च लान और पिछले आंगनों में छलकते स्विमिंग पूल, बच्चों के खेलने के लिए फिसलपट्टी और ट्रेंपोलिन जैसे उपकरण, लेकिन बच्चे जाने कहाँ रहते हैं. उनकी हँसी और जिद की एक आवाज तक नहीं आती। बड़ों के बैठने के लिए लगी मेज-टेबलें, झूले सब सूने पड़े रहते हैं, बरतने के लिए कोई नज़र ही नहीं आता। कोई बैठा-बतियाता, हँसता-लड़ता, चाय पीता नज़र नहीं आता, टीवी या किसी संगीत के सुर बाहर नहीं आते। खाना पकने की कोई महक तक बाहर नहीं निकलती। बंगलों के भीतर कुत्ते भौंकते तो सुनाई देते हैं लेकिन दीखते कभी नहीं। केवल कभी-कभार कोई हेल्पर या परिचारिका गार्बेज लिए या कोई सामान लिए दिख गई तो दिख गई। पास में एक बहुत बड़ा स्कूल है, ऊपर फ्लैट तक बच्चों की आवाज तो क्या आनी हुई लेकिन बस में चढ़ते-उतरते बच्चे भी जाने किस जगह से चढ़ते-उतरते हैं कि इतनी ऊंचाई से भी नज़र नहीं आते। छुट्टी होने पर उनका बतियाते, मस्ती करते हुए भागना-दौड़ना शायद इस देश की रवायत में ही नहीं है। हां, खेल वाले कालांश में बच्चे अपने प्रशिक्षक के साथ कुछ खेलते दिखाई तो देते हैं लेकिन रोबोटिक नियमितता से।
मैं सबसे ज्यादा दंग यही देख कर होती हूँ कि इस देश में बच्चे कहाँ हैं, और हैं तो इतने अच्छे क्यों हैं कि उनकी किलकारियां भी नियमों ने खा ली। सड़क पर न दिखें, छतों पर न दिखें लेकिन बच्चों के शोर के बिना क्या तो घर के आँगन और क्या स्कूल। इस फ्लैट में आजकल मुझे यही काम है कि बॉल्कनी में बैठे, आते-जाते या खड़े होकर मैं बार-बार बाहर देखती हूं और किसी चिड़िया, किसी पैदल राहगीर, किसी बच्चे को देखकर दिन का सबसे बड़ा सुख पाने का अनुभव करती हूं। साथ ही इंसानों के मशीन में बदलते जाने का दुख भी।
लेकिन नहीं, वहाँ भी सब है, जरूरत है कि आप एक दोस्त की तरह चप्पल चटकाते हुए उसमें रमें और माशूका के लिए तड़पते कैस की तरह बिना किसी जल्दबाजी के इस गन्दुमी लैला की बाहों में समा जाएं। फिर देखिए इसके गेसुओं की तरह बिखरी हरियाली और बरौनियों की झालर में आंसुओं की तरह छुपा पानी कैसे अपनी झलक दिखाता है।
दुबई में केवल खजूर और पाम ही होते हैं ये दूसरी मिथ्या धारणा है, शहर की बहुत सारी बड़ी-बड़ी सड़कों के बीच में और किनारे पर खिले बड़े पेड़ और फूलों वाली झाड़ियां भी इसी दुबई में दिख जाती हैं। चलिए ये तो सरकार की जिम्मेदारी है लेकिन यहां का आम बाशिंदा भी कुदरत की बेनज़ीर सौगात हरियाली से बहुत प्रेम करता है। ये उन गलियों से गुजर कर ही जान सकते हैं। मेरे बेटे जहां रहते हैं वो तो खैर बहुमंजिली इमारत है, फिर भी उसमें यथास्थान-यथासम्भव पौधे लगे हैं लेकिन इस के पास ही एक बस्ती है, एक जैसे बंगलों वाली, लगभग अढ़ाई किलोमीटर लंबी, इतनी साफ सुथरी मानो राजा जी का महल हो।
खैर, मुद्दे की बात यह नहीं, यह है कि उस बस्ती में मुझे लॉन में ही नही सड़कों के किनारे भी खूब पेड़-पौधे दिखे, केवल खजूर नहीं बहुत से पौधे। कुछ परिचित कुछ अपरिचित। हर बंगले की मुँडेर पर छाई, कई रंगों में खिली लहलहाती बोगनवेलिया तो खैर रेगिस्तान में फलने-फूलने वाला वनस्पति है उसे देख कर अचम्भा नहीं हुआ, गमलों में खिले अडेनियम, साइकस, क्रोटन और पाम देख कर भी अचंभा नहीं हुआ।
अचम्भा हुआ वहाँ गमकती नीम की महक से, गुलमोहर और गुलतोड़ी पर झूमते सुर्ख गुच्छों को देख कर, अविश्वसनीय आकार की श्वेत चंपा देख कर और सफेद नीले मदार के पौधे देख कर। सोसायटी के उद्यान में बनी कृत्रिम झील के आसपास कच्च हरी घास और खूब स्वस्थ छोटे-बड़े पौधे देख कर कौन कह सकता है कि ये वही सहरा है जो गले में तिडकती और ओठों पर चटकती प्यास के लिए बदनाम है। यहाँ तो भरा-पूरा चमन खिलखिला रहा है जिसमें फूलों पर मंडराती तितली और पेड़ों पर डोलते-बोलते पक्षी भी है।
घरों के लान की घास में झींगुर भी बोल रहे हैं और ताल के पास मेंढक की आवाज भी आई थी। लेकिन ये पौधे आते कहाँ से हैं इतने दिन में कहीं एक भी नर्सरी नहीं दिखी। फिर याद आया हमारे घर की बालकनी और बैठक में बहुरानी ने भी तो बीसियों पौधे लगा रखे हैं, शायद कुछ दूसरे घरों में भी हों। वो भी तो कहीं से लाए ही होंगे न. आहा, ये सब जीवन की निशानी ही तो है जो दुबई जैसे सहरा में नखलिस्तान बन के फैली है।
दुबई, जो कि बाहरी कामगारों के भरोसे ही चल रहा है, में भारत सहित दुनिया के हर देश के पुरुषों के साथ बड़ी तादाद में ऐसे मर्द भी रहते हैं जो न ज्यादा शिक्षित हैं न सो कॉल्ड संस्कारी। (यहाँ जरा पूर्वाग्रही लग सकती हूँ, क्षमा।) और यहां दुनिया की सब से खूबसूरत मानी जाने वाली फिलिस्तीनी, लेबनीज सहित हर देश की स्त्रियां भी हैं और उनके रूप, यौवन, शृंगार, वस्त्र विन्यास की डिटेल में जाए बिना बस ये कहना काफी है कि वो किसी भी पुरुष को आकर्षित करने के लिए काफी से बहुत ज्यादा है। और जो इस शहर में रहे/गए हैं वो भी जानते हैं कि यहां रात, लड़की, और एकांत मिल कर कोई भय कतई नहीं बनता। मैं और मेरी पुत्रवधू काफी रात तक सुनसान, एकांतिक गलियों में घूमते रहते हैं।
समंदर के किनारे संक्षिप्त तम वस्त्र में धूप स्नान करती सुंदरियाँ वैसे ही रहती हैं जैसे वहां की चट्टानें। और गजब कि कोई मर्द आँख उठा के नहीं देखता। सब घूमते हैं जैसे परनार को आंख उठाकर देखना महापाप हो या भारत की दीवारों पर गुप्त रोगों का प्रकट विज्ञापन करते डॉक्टर की दवा ले रहे हों।
क्यों, क्योंकि यहां बलात्कार की सजा मौत है और यह भय मर्द की मर्दानगी (जो भारत में शान का विषय हो जाती है) पर भारी पड़ता है, इतना कि देह के अन्य अंग तो क्या आँखें तक अदब में रहती हैं।


12.12.19

आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले...`
दुबई प्रवास की आखिरी रात है, और मन की कैफियत बयान के बाहर है. रात के एक बज रहे हैं और मैं बालकनी में बैठी हूँ...
सियाह काली शब के जहरी डंक से जागे हुए मुसाफिर के लिए महफिले रतजगे का आलम और तन्हाई के पियाले में छलकती ख़यालात की पुर सुरूर मय। रोशनी के चकाचौंध के ऊपर साँवले आसमान के दामन ने नींद में गाफिल जमाने को आगोश में छुपा लिया है। पराया देश, पराई रुत, पराई जमीं, पराए चाँद, पराए तारों, पराए बादल और पराई बूंदों के साथ वाली आधी रात का ये बेगाना सा मंज़र... जरा दूर पर छटपटाते समंदर की बेचैनी किसी के लिए आहें भर रही है, कितना भी सिर पटक ले उसके हाथ खाली ही लौटते हैं। हां, एक टूटता-बनता सा अक्स उसके दामन में ठहर-फिसल रहा है। ये देख कर सितारे शरारत से खिलखिला रहे हैं और दोशीज़ा हवाएँ भी बदली का आँचल ओठों में दबाए मुस्करा रही है। शाम को बरसे पानी की नमी और महक सहरा की बालू को अब तलक नम किए हुए हैं और वो महकती रातरानी से होड़ लेती हुई नाच रही है। जाने कौन सा पखेरू जाने कहाँ से जाने किसे पुकार कर थक चुका है, लेकिन फिर भी पुकार रहा है। शायद जानता भी है कि कोई नहीं सुनेगा, लेकिन उसकी आस और प्यास को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वो अपनी धुन में बोले जा रहा है कि राग का राही रँग कब देखता है और हिज्र के मारे को विसाल की परवाह कब हुई। और ऐन इसी लम्हे में मन की कैफियत बदल जाती है, कौन पराया, कौन बिदेसी है यहां। ये चाँद मेरे देस से किसी के जलवों का नूर ले के आया है, ये तारे दो रोशन निगाहों में भी तो चमक कर आए हैं, इन बूंदों में किसी के पसीने की खुश रँग शबनम भी है और इस हवा में किसी के घुंघराले बालों की गमक आलूदा है। इस जमीं ने कभी किसी जन्म में उस माशूक ए हकीकी के कदमों के बोसा लिया होगा और इस आसमान ने उस आशिक ए मजाजी की रूमानी आवाज में इश्क़ के तराने सुने होंगे। आह, कहीं कोई नहीं पराया, न ये क़ायनात, न कुदरत, न आशिक, न माशूक, न ये शब ए हिज्रां। इक तू ही तू ही तू ही.

-डॉ. लक्ष्मी शर्मा

डॉ. लक्ष्मी शर्मा माहिर कथाकार हैं। प्रोफेसर रह चुकी लक्ष्मी में वह प्राध्यपकीय रिजर्वेशन न के बराबर हैं। अपने एक क्था संग्रह और दो उपन्यासों से चर्चित लक्ष्मीके लिए दुबई दूसरा घर है। दुबई पर उनकी इस डायरी के अंश बेहद रोचक हैं। पाठकों को बहुत पसंद आएंगे।

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