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विज्ञान कथा लेखक की डायरी की कुछ टीपें

राजेश जैन

मालवा प्रवास’
११ दिसंबर ’१६ को लिखी डायरी का अंश-

पिछले पांच दिनों से मालवा की भूमि पर इधर उधर हो रहा हूँ-इंदौर ..पीथमपुरा..खरगौन(महेश्वर)..फिर इंदौर..अब यहाँ से भोपाल ...अनायास ही मेरी संवेदना , पचास वर्ष पूर्व के परिवेश को बतौर रिफरेन्स याद कर रही है.१९६३-७१ तक इंदौर में था.आठवीं से लेकर इंजीनियरिंग की पढाई तक .किशोरावस्था और युवावस्था का संधिकाल(प्रथम उपन्यास –‘गीली धूप’ की कथा -वस्तु एवं भूमि ) .सघन अनुभूतियों और रोमांचक परिवर्तनों का दौर.जो मानसिक स्थितियां तथा चरित्र तब आसपास थे ,उनकी तुलना रहरहकर वर्तमान के व्यक्तियों से कर रहा हूँ .वे , वे तो नहीं ,पर उनकी बोली,रूख और लहजे में ,मालवा का मावा वैसा ही ठस्स है. मोबाइल और घनघोर नेट संस्कृति के बावजूद हर किसी का कदाचित निश्छल सकारात्मक उदार रूख .वो उन्माद विहीन सहज प्रवृत्तियां दिल्ली में तो सिरे से गायब हैं –चार दशकों से ..हर क्षण सतर्क और चौंकन्ना रहने को विवश करता हुआ अज्ञात संघर्ष से बोझिल जीवन.
खरगौन जाते हुए गुजरी से गुजरा – बाल सखा लेखक स्व. प्रेम कासलीवाल का कस्बा –नर्मदा की सहायक ,घाघरा नदी के किनारे बसा.एक बार उसके साथ यहाँ आया भी था ,वह अपनी स्म्रतियों और पात्रों से मिलवाना चाहता था.उस समय नर्मदा की महिमा से अपरिचित था शायद.घर की मुर्गी दाल बराबर .दिल्ली में यमुना की दरिद्रता(नाटक –चिमनी चोगा) के कारण ,नदियों से यूं भी मोहभंग हो चुका था.
इंदौर क्या ,मध्य प्रदेश ही ,नर्मदा प्रसंग के बगैर अधूरा है. .नर्मदा जल ..नर्मदा योजनायें ..वगैरह वगैरह .तब सुनता मात्र था –अब अमरकंटक ,धुंआधार ,महेश्वर .ओम्कारेश्वर आदि की यात्राओं के बाद .उसकी संस्कृतिक विरासत(अमृत लाल बेगड़ के नर्मदा –परिक्रमा आधारित संस्मरण / अहिल्याबाई द्वारा निर्मित भव्य मंदिर) का आभास हुआ.गंगा का जो महत्व बिहार यूपी और बंगाल में है ,वही नर्मदा का मध्य प्रदेश और गुजरात में है प्रवास के दौरान लिखी कविता ‘छिन्न भिन्न‘.. मुलाहिजा फरमाइए- ‘छिन्न भिन्न ‘
मालवा के एक गाँव में
सुबह खेतों की ओर निकले,
तो काली मिटटी की उत्पादकता,
हरी फसलों का खिलापन
आकाश का खुलापन –
पंछियों की काव्यात्मक उड़ान ,
जैसे दिशाओं की सजावट में जुटाया गया
रंगबिरंगी झालरों का सामान.
मित्रों और क्षणों की
स्म्रतियों का कम्पन लिए
हरियाली के सरोवर में डूब गए –
पूरी सैर में
हम अपने साथ थे ,
पर घर लौटे ,खाली हाथ थे .
पता नहीं स्वयं
खुद से कहाँ छूट गए?
टुकड़ों को समेटा
अपने को रिअसेम्बल करके दोबारा बनाया,
सामने जो आया
उसमे अपना तो कम
दूसरों का नया अंश ही और अधिक पाया .
 

भोपाल जून १७

भोपाल में रामलीला और फितर-उल-ईद – आज २६ जून ’१७ को ईद है,और मैं परसों से भोपाल में हूँ-ईदगाह हिल्स स्थित अपने पैतृक निवास जज कालोनी में.
२४ जून को बड़े भाई विकास जैन (सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)की सत्तरवीं वर्षगांठ का कार्यक्रम आयोजित किया था ,परिवार की युवा पीढ़ी ने .हम सब घर वाले(पांचों भाई बहन –विकास,राजेश,मंजू,अलका और आलोक) तथा अन्य अन्तरंग परिचित, सायाजी होटल में एकत्र हुए.उस शाम को मैंने ‘रामलीला’ की संज्ञा दी .वह इसलिए कि हमारे पापाजी का नाम था- आर सी जैन यानी राम चन्द्र जैन और वे मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा के अंतर्गत जज थे.हम सब उनके वंशज, उनकी लीला के परिणाम हैं.सो हुई न वंश –वृक्ष की ‘रामलीला’.फिर जैसा कि मुंगावली(१९५६ -५९) के बालसखा राकेश मिश्र (वर्तमान में सेवानिवृत्त जज) ने पुराने समय को याद करते हुए कहा -‘ बचपन में विकास बहुत शांत और गंभीर था ,जबकि राजेश (यानी मैं) बहुत क्रोध करता था..’
उनकी टिपण्णी से ही मैंने निष्कर्ष निकाला-पिताजी के खानदानी पेशे यानी जज गिरी को विकास भाई ने ही आगे बढाया.मैं और छोटा भाई आलोक ,क्रमश: इंजिनियर डाक्टर बने .पापा की रामलीला को आगे बढ़ाने और बडा भाई होने के नाते ,विकास भाई हमारी पीढ़ी के ‘राम’ ही हैं,और मैं छोटा भाई ‘लक्ष्मण ‘.सुना है ,लक्ष्मण भी विद्रोही और शीघ्र उग्र हो जाया करते थे . इस माने में राकेश मिश्र की टिप्पणी सटीक ही हुई न.
फुफेरे बड़े भाई अनिल जैन (सेवा निवृत्त जिलाधीश) ने हमारे पापा के साथ साथ दादाजी (उनके नाना) कस्तूरचंद जैन को याद कर डाला जो अपने समय (स्वतंत्रता पूर्व) में इलाहाबाद विश्व विद्यालय से कानूनी परीक्षा में गोल्ड मेडलिस्ट थे-फिर हितकारणी ला कालेज जबलपुर में प्राचार्य और उच्च न्यायालय के वकील भी रहे.उन्होंने ही स्कूल के रजिस्टर में मेरा नाम ‘राजेश’ की जगह, अपने हाथ से ‘राजेन्द्र’ लिखा था ,यह कहकर कि मेरा यह पोता ‘डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद’ की तरह नाम कमाएगा?
समय की रील जैसे रिवाइंड हुई और अधिकांश (जिनमे पापा और विकास भाई के समकालीन न्यायाधीशों से लेकर परिवार के अन्तरंग शुभचिंतक तथा सेवादार भी थे)ने बीते प्रसंग दोहराकर ‘रामलीला’ के इस एपिसोड में नए नए रंग भर दिए .
और आज यानी २६ जून को सुबह सुबह ईद का माहोल .जज कालोनी के इस बंगले में पापाजी के समय से ही हम प्रति वर्ष इस दिन यह अदभुत नजारा देखते आ रहे हैं.हमारी छत से एशिया की सबसे बड़ी ‘ताज-उल- मस्जिद’ स्पष्ट नजर आती है ,(जिसका विस्तृत विवरण मेरी यात्रा –संस्मरणों की पुस्तक-‘पैर,पंख और पहिये’ में शामिल है –आलेख –भोपाल :कई जहाजों का सफर ) अपने दो भव्य स्तंभों के साथ .धर्मगत खानपान की तमाम विविधताओं के बावजूद ,भोपाल के कई मुस्लिम परिवारों से हमारा निकट का सम्बन्ध रहा है. फितर ईद की सुबह सुबह ईदगाह की एतिहासिक पहाड़ी पर चारो ओर से सफ़ेद वस्त्र धारण किये टोपीधारी मुस्लिम भाइयों का आना शुरू हो जाता है.कतार दर कतार .लाखों की तादाद में इंसानों का सैलाब . नमाज शुरू होने तक सब मैदान पर नहीं पहुँच पाते-वहां उतना स्थान भी नहीं होगा?सो नमाज शुरू होते ही बचे लोग ,सड़कों पर ही सिजदा करने बैठ जाते.तोप के इशारे के साथ सबका एक साथ ..झुकना.. उठना ..वाह,इबादत की यह पाक कविता हमारे घर के गेट को छूती हुई गुनगुनाती सी लगती है.
इस बार नयापन देखा कि घर के बगल में ही तम्बू लगाकर सिख समुदाय के कार्यकर्त्ताओं ने भाई चारे का सराहनीय उदहारण प्रस्तुत किया- माइक पर नमाजियों को लगातार ईद मुबारक कहा और उन पर पुष्प वर्षा करते हुए सांप्रदायिक सदभाव की दुहाई दी.
मीडिया क्षेत्र से जुडी मेरी भतीजी स्वाति ने तत्काल मोबाइल से शूट करके एक विडिओ ही बना डाला.

१५ जुलाई '१७

आखिर १५ जुलाई '१७ को अपने चालीस साल पूर्व लिखे गए व्यंग्य नाटक 'धक्का-पंप 'से गुडगाँव (रंगभूमि ओपन एयर थिएटर ) में मुलाकात हो ही गई.सौभाग्य से ,कई धक्के खाकर भी नाटक शुरू होने के पहले पहुंच ही गया.-थैंक आशीष .
महसूस हुआ ,चार दशकों पूर्व अपना जो बच्चा बिछड़ गया था ,वो आज एकाएक सामने आ गया .
अब माहौल कितना बदल गया है .लेकिन यह सत्य नहीं बदला -हमारी रोजमर्रा व्यवस्था और जिन्दगी का कि अगर कुछ लक्ष्य पाना है या करना है तो धक्के खाने भी पड़ते हैं और लगाने भी. उनका सकारात्मक /नकारात्मक होना ,परिस्थितियों पर निर्भर करता है..नाटक यही बडबडा रहा था.
सुहासनी रस्तोगी और उसके 'अविघ्न' ग्रुप को बहुत बहुत बधाई तःथा आभार.


18 दिसम्बर१७ से तीन दिन जोधपुर में गुजरे –नया काम , एयर पोर्ट का और नए शहर का बदला हुआ खानपान .दिल्ली की प्रदूषित सर्दी से चंद दिनों की राहत ..वाह ..शरीर और मन ,दोनों को खुराक मिली.
बीस वर्ष पूर्व बाल-सखा ,जादूगर आनंद के निमंत्रण पर तब जोधपुर आया था –वहां उसके मेजिक शो चल रहे थे.तब मेहरानगढ़ किले पर भी गए थे ,सब कुछ जल्दी में था इसलिए सिर्फ इतना याद आया कि ऊपर से दिख रहीं , पहाड़ के नीचे आसपास, बस्ती के कई घरों की छतें नीले रंग से रंगी हुई थीं –कारण, अब स्पष्ट हुआ ,जब एअरपोर्ट पर ‘ब्रह्मपुरी ‘ का पोस्टर देखा था .मेजबान भाटी साहब ने बताया था-‘ब्रह्मपुरी यानी ब्राहमणों का मोहल्ला . क्षत्रिय परंपरा थी कि जिन घरों में ब्राह्मण रहते हैं,उनकी अलग पहचान के लिए छतों को नीला रंग दिया जाता था,ताकि युद्ध के समय कोई भी राजपूत (दुश्मन भी ) वहां हमला नहीं करता था.’
जोधपुर का इतिहास तमाम युद्धों से भरा पड़ा है –उस नजरिये से उक्त नियम का अपना अलग महत्व लगा .
तब हॉल में आनंद के जादू देखे थे किन्तु अब एक जादू ,हमारे कैब ड्राईवर शंकर लाल जी ने भी कर डाला .किले के रास्ते में रूककर मैंने फोटो लेनी चाही तो उन्होंने क्लिक करने के पहले ,राजस्थानी मिठास के साथ अनुरोध करके मुझसे मेरा दाहिना हाथ ऊपर उठवाया और कहा-‘चित्र में आपकी हथेली के नीचे दिखेगा मेहरानगढ़ का किला ..’ वाह , इतना बड़ा किला आपकी मुट्ठी में ..है न जादू?
जोधपुर पहुँचते हुए दो बातें मन में आ रहीं थीं .एक सलमान खान से जुड़ा काले हिरन के शिकार का मामला और दूसरा ,टी वी सीरियल ‘हम लिखेंगे रिश्ता नया’(पहले जिसका नाम था –पहरेदार पिया की .).यूँ भी राजस्थानी संस्कृति पर केन्द्रित कई सीरियल आजकल आ रहे हैं, और लालची मन, जैसे ,माहौल में उन्हीं जैसे पात्रों की खोज कर रहा था.
दिन में जब ट्रेन जोधपुर पहुँच रही थी तो आसपास खेतो में हिरणों के झुण्ड देखकर रोमांच हो आया .अभी तक इस तरह चरते हुए भेड़ ,बकरियों या गाय भैंसों के झुण्ड ही देखे थे .एक जगह उस झुण्ड में एकमात्र काला हिरन भी नजर आया जो अलग ही दिख रहा था .यह बाद में पता चला कि लगभग सौ सामान्य मादा हिरणियों के पीछे ,कुनबे में सिर्फ एक काला नर हिरण होता है – इसलिये स्थानीय जाति इसे पवित्र मानकर इनकी पूजा करती है और इनका शिकार करना,कानूनी तौर पर वर्जित है.अगर कोई इसे मारता है तो उसे सौ हिरणियों को विधवा बनाने का पाप भी लगता है.
अनेक जानकारियों के बीच ,शंकर लाल जी ने एक रामायण सम्बन्धी जानकारी यह भी दी –‘जोधपुर पहले मंडोर था .मंडोर यानी रानी मंदोदरी का मैका ..जी हाँ ,यह रावण की ससुराल थी.उसकी पत्नी रानी मंदोदरी को यहाँ की राजकुमारी कहा जाता है.’

24-9-18

विष्णु खरे का जाना एक सामयिक दुर्घटना है .ऐसे अवसर पर यादें जागरूक हो ही जाती हैं.
सन१९९२ में ईस्ट दिल्ली आई पी एक्सटेंशन स्थित अपने फ्लैट में आया था और यहाँ 'वीथिका' शुरू की थी - हर रविवार साहित्य -गोष्ठी होती थी .पूर्वी दिल्ली के साहित्यकारों का समागम .मयूर विहार नव भारत टाइम्स अपार्टमेंट में ,दोनों विष्णु (खरे और नागर ) ,आसपास रहते थे .दोनों से एक एक बार उनके निवास पर मिलने भी गया था.
एक बार गोष्ठी में , लखनऊ से नरेश सक्सेना भी आये थे तब विष्णु खरे बोले थे - मेरे द्वारा सम्पादित कविता -संग्रह 'यंत्र-सप्तक' (हिंदी के सात इंजिनियर कवियों की मन ,मनुष्य और मशीन केन्द्रित कवितायेँ ) पर .विनोद वश कही उनकी टिपण्णी आज भी याद है -'ईस्ट दिल्ली में अब इतने बुद्दिजीवी रहते हैं कि अगर पाकिस्तान, भारत को हराना चाहे तो उसे यहाँ बम गिरा देना चाहिए ..?'

बेलारी का उदास किला’
२८ फरवरी से २ मार्च ‘१९ तक दक्षिण(कर्नाटक) के बेलारी थर्मल प्लांट में था.दिल्ली से हैदराबाद और फिर वहां से छोटे डग्गा विमान की एक घंटे की उडान से विद्यानगर एअरपोर्ट, (जो शायद जिंदल स्टील वालों की निजी हवाई पट्टी है.) पर उतरकर जब टैक्सी में बैठे तो ड्राईवर ने बताया यह कर्नाटक के सुप्रसिद्ध राजा कृष्णदेव राय का विजयनगर वाला क्षेत्र है. सहसा रोमांच हो आया क्योंकि इन दिनों हम टी वी पर ‘तेनाली रामा’ सीरियल बराबर देख रहे थे ,जिसमे विजयनगर का नाम आता ही रहता था.तो यह वही विजयनगर है...वाह .
जब बेलारी शहर के होटल ग्रैंड इदानता में मुझे कमरे की चाबी दी गई थी तो कमरे का नंबर ३०२ देखकर मैं चौंका –दफा ३०२ ,मेनेजर से पूछ बैठा-‘ भई ,इस कमरे में कभी कोई मर्डर तो नहीं हुआ था?’-पहले वह सकपका गया ,फिर मुस्कराने लगा.
दूसरे दिन सुबह उठा तो खिड़की से जो पहाड़ी दिखाई दी ,उस पर उदास मायूस सा एक किला दिखाई दिया-जरूर यह कृष्ण देव राय से ताल्लुक रखता होगा? -मैंने सोचा ?
प्लांट के लिए निकलते वक्त ड्राईवर से पूछा तो उसने बताया-‘इसे कृष्ण देव ने नहीं बनवाया था .यह किला बेलारी की रानी का था ,जिसने कृष्णदेव राय से युद्ध किया था और हारने पर अपना ब्लाउज फाड़कर टांग दिया था ,यह कहकर-‘मैं बल हारी ..’अर्थात मैं सब कुछ हार गई ..वह किला छोड़कर चली गई .तबसे इस जगह का नाम पड़ गया-‘बल्लारी’ जो अब ‘बेलारी’ कहलाता है.
पॉवर हाउस में काम करते हुए अनेक स्थानों पर जाना पड़ा –हर कोण से प्लांट का नजारा देखकर ,अतीत में खो गया –दर्जनों, वे सुपरिचित प्लांट याद आये जो मैंने देखे थे और याद आईं उनसे प्रेरित अपनी किताबें –‘रौशनी के खेतों में’ (कविता संग्रह), ‘कोयला, चला हंस की चाल’(नाटक) और उपन्यास ‘सूरज में खरोंच’ आदि आदि.

जुलाई 2020


आजकल ‘कोरोना काल’ चल रहा है.मैं लगभग प्रतिदिन शाम में एक नई फिल्म देख रहा हूँ .और इस क्षेत्र के अदभुत अनुभव पा रहा हूँ.कभी कभी निराशाजनक भी.’
गत दिनों ‘शकुंतला देवी’ देखी-विश्व प्रसिद्द गणित की जादूगर (ह्यूमन कंप्यूटर) के जीवन पर उनकी बेटी की नजर से लिखी गई ,इस फिल्म को ‘साइंस फिक्शन ‘कहा जा सकता है,क्योंकि इसमें अंकों का दुर्लभ तालमेल उजागर हुआ है-जो ब्रह्माण्ड में व्याप्त असंख्य परमाणुओं (विज्ञान का आधार) के सामंजस्य की भांति रहस्यमयी है –और कलात्मक भी.
फिल्म देखते हुए मुझे बारंबार याद आये-१९७४-७८ के अपने वे जबलपुर के दिन ,जब मध्य प्रदेश विद्युत् मंडल में नौकरी कर रहा था और पापा नरसिंहपुर में जिला जज थे. बम्बई-कलकत्ता मेल के रस्ते में नरसिंहपुर ,जबलपुर से अगला स्टेशन था किन्तु दूरी कम होने के कारण ‘फ़ास्ट ट्रेन’ में वहां का टिकिट नहीं मिलता था.मुझे जब भी जाना होता तो ट्रेन आने के बाद टी टी से निवेदन करके ,मेरा एक सहयोगी , जबलपुर में उतरे किसी यात्री का टिकिट, नरसिंहपुर तक एक्सटेंड करवा कर मुझे थमा देता था .एक दिन मैं सकपका गया-जब देखा कि कलकत्ता से जबलपुर का जो आरक्षित टिकिट मुझे एक्सटेंड करके दिया गया था ,उसमे यात्री का नाम –‘शकुंतला देवी’ लिखा था ,जो इत्तफाक से , मेरी मां का भी नाम है..


राजेश जैन वैज्ञानिक और विज्ञान कथा लेखक हैं। उनकी वैज्ञानिक दृष्टि और साहित्यिक रचनाशीलता का ताल-मेल उनकी लेखनी को तार्किक और रोचक बनाता है। उनकी डायरी के कुछ अंश....

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