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एक चिकित्सक के मनोचिकित्सक बनने की रहगुज़र

डॉ विनय कुमार

डॉक्टर विनय से हम सब 'यक्षिणी'  कविता संग्रह की लोकप्रियता के चलते परिचित हैं, इसके पहले 'एक मनोश्चिकित्सक के नोट्स' ने भी खूब चर्चा बटोरी थी। देश के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक और इंडियन सायकियाट्री काउंसिल के ऑनरेरी जनरल सैक्रेट्री रह चुके डॉ विनय कुमार के एक युवा संघर्षशील चिकित्सक से यहाँ तक पहुंचने की डायरी में दर्ज़ यात्रा है।

 

इब्तिदा

25  नवंबर   1989

आज शाम को सिर्फ़ तीन ही मरीज़ आए। दिन में पाँच आए थे। 100 रुपए भी नहीं हुए। यह हफ़्ता कुछ ज़्यादा ही नरम गया। कैसे चलेगा ? ज़िंदगी साली विजय सुपर स्कूटर हो गयी है।जब तक किक मारते-मारते  थक न जाओ, गूँ-गाँ भी नहीं करती। कई ज़रूरी काम रुके हैं। पैरों को सिकोड़ने की भी एक हद होती है।

आज एक दोहा कहा -

हासिल क़द का क्या करें कितना मोड़ें पाँव । 

घड़ी-घड़ी घटती हुई निठुर नीम की की छाँव।।

सियावर रामचन्द्र  की  जय’  भी बोल ही दूँ क्या ? होगा कुछ शुभ लाभ ?

 27 मई 1990

किचन और मेरे चेम्बर के बीच की कॉमन दीवार में जो रोशनदान है वह तड़का और भुनाई की महक पहुँचा ही देता है। कई बार चाहा कि बंद करवाने के लिए अपने मकान मलिक बैजू बाबू से कहूँ या खुद ही प्लाईबोर्ड ठोक दूँ, मगर मंजु रोक देती है। वजह जो भी होमुस्कुराकर  कहती है  कि बीबियों के लव लेटर्स ऐसे ही होते हैं। यह सुनकर मुस्कुराने के सिवा और क्या किया जा सकता!  बेचारेव मरीज़ छौंके-बघारे नुस्ख़े के साथ विदा लेते हैं। नए, साधन-विहीन और सस्ते डॉक्टर से इलाज के अजीब से साइड इफ़ेक्ट्स हैं ये। मुहल्ले की प्रैक्टिस है, इसलिए ज़्यादातर मरीज़ों को पता होता है कि ये धुआँ कहाँ से उठता है ! शायद इसीलिए मुस्कुराकर रह जाते हैं।

 मगर उस दिन तो हद ही हो गयी। अनिल ने कहा कि भाभी आज आपने बेगारी से दाल बनायी है, तो कुढ़कर बोली - बग़ल के कमरे में खाँसी-बुखार बलगम-शलगम की कैफीयत पूछी जा रही हो तो खाना क्या ख़ाक बनेगा। खाना बनाने के लिए हवादार किचन चाहिए और बग़ल में एक गार्डेन। मगर ये आप लोगों की एमडी की पढ़ाई  और कंगाली से मुक्ति मिले तब न !

ठीक ही कहती है। ....... अपने पाँवों पर ठीक से खड़ा तो होना चाहता हूँ मगर क्या करूँ, पैरों के नीचे तो बस एक पाँव टिकाने भर की ज़मीन है ।

 31 जुलाई 1992

आज शाम अखिलेश नहीं आया था। अकेले ही काम किया। वह नहीं आता तो सबसे बड़ी मुश्किल फ़ीस लेने में होती है। बहुत झिझक। मुँह खोलकर माँग नहीं पाता। कई होशियार लोग पुराने नुस्ख़े को सामने रख पूछते हैं - पिछली बार इन दवाओं से फ़ायदा हुआ था। फिर से वही तकलीफ़ शुरू हो गयी है। खाकर देखें क्या? फ़ायदा नहीं हुआ तो फ़ीस देकर दिखा लेंगे । ... कोई बतलाए कि हम बतलाएँ क्या !

क्लिनिक बंद कर घरवाले हिस्से में घुसा ही था कि लगा कोई शटर पीट रहा है। थोड़ी खीझ तो हुई कि खाने-सोने के समय में कौन आ गया। मगर किसी को मना कर पाना फ़ितरत में ही नहीं और हालात भी ऐसे नहीं कि तीस रुपए की आमदनी को नज़रंदाज़ कर दूँ। जाकर शटर उठाया तो देखा एक अट्ठारह-उन्नीस साल का लड़का खड़ा है। मुझे देखते ही बोला - भाई जी, डॉक्टर साहब से काम है। हमारे मकान मलिक की तबीयत बहुत ख़राब है। कॉल पर ले जाना है। मुझे थोड़ी हँसी आयी। नए डाक्टर्स के साथ अक्सर होता यह कि कम्पाउंडर नहीं हो और आप अपना सारा काम ख़ुद करते दीखें तो तो लोग आपको डॉक्टर नहीं समझते। एक बार तो क्लिनिक में झाड़ू लगाता पकड़ा गया था। बहरहाल, मैंने उससे कहा - मैं ही डॉक्टर हूँ। चलता हूँ तुम्हारे साथ ।

 रात के नौ बजे थे। बूँदाबाँदी हो रही थी। मैने स्कूटर स्टार्ट किया, लड़का पीछे बैठ गया। एक दोमंज़िले  मकान के सामने लड़के ने स्कूटर रुकवाया और बोला - मैं दरवाज़ा खुलवाता हूँ। वैसे दरवाज़ा खुला ही था। लड़के के साथ अंदर गया तो देखा एक आदमी चौकी पर लेटा है। कमरे में और कोई नहीं। बस एक पीला बल्ब जो शायद चालीस वॉट का होगा, वही उसका तीमारदार था। पास गया तो देखा, एक बूढ़ा आदमी कराह रहा है। बाल-दाढ़ी सफाचट्ट मानो घर में किसी की मौत हुई हो। लगा, इसे मैंने कहीं देखा है, मगर याद नहीं कर पाया। तकलीफ़ पूछी और एग्ज़ामिन करने लगा, कि तभी उस लड़के ने जैसे कमेंटरी की - डॉक्टर साहब, इनके इकलौते बेटे की मौत ११ दिन पहले हुई थी। वे बैंक में काम करते थे।कहीं यह बुखार सदमा से तो नहीं। मैंने कहा - सर्दी-खाँसी के साथ बुखार है। अभी फ़्लू का मौसम भी है। नुस्ख़ा बनाने के लिए नाम अब पूछा। मेरा सवाल सुन बूढ़े ने करवट बदल ली। लड़के ने कहा बालेश्वर सिंह और मैं यूँ चौंका कि हाथ से क़लम गिर गयी।

 नुस्ख़ा देकर बाहर निकला तो लड़का मुझे ३० रुपए देने लगा।मैंने मना कर दिया और पूछा पूछा - तुम इनके कौन हो ? उसने बताया - जी, किरायेदार। ऊपर की मंज़िल पर चार कमरे हैं जिसमें हम छः स्टूडेंट्स रहते हैं।’ 

-ये फ़ीस के रुपए तुम्हें इन्होंने दिए।

-जी नहीं, मैंने और मेरे रूम मेट ने कंट्रिब्यूट किया है। ये तो इतने कंजूस हैं कि पूरे घर के बिजली-बिल के पैसे हम बच्चों से ही वसूलते हैं। इनका अपना वाला मीटर तो चलता ही नहीं।

मैंने लड़के से कहा - तुम बहुत अच्छे हो।

 जब चला तो बारिश तेज हो गयी थी। लेकिन मेरे मन में तूफ़ान। .. यह बालेश्वर सिंह जब पहली बार आया था क्लिनिक में तो साथ में एक छोटा बच्चा था जो इसे बाबा कह रहा था। मरीज़ यह खुद था, लक्षण अमीबिएसिस के थे।नुस्ख़ा हाथ में आते ही इसने गुज़ारिश किया था - मेरा इस दुनिया में कोई नहीं। बहुत मामूली रक़म पेंशन की। किराए के घर में रहता हूँ। मैने पूछा था - आपके बच्चे ? एक बेटी है, उसकी ज़िम्मेवारी भी मेरे ऊपर ही। मैने टोका था - यह बच्चा तो आपको बाबा कह रहा। इसके पिता क्या करते हैं? उसने कहा - मेरा कोई बेटा नहीं। बस एक बेटी।....उसने कुछ और भी बातें कही थीं जिसे सुनकर मन पिघल जाए । मैंने उसके नुस्ख़े पर फ़्री लिख दिया था। उसके बाद दो-तीन बार और दिखाने आया था। हर बार फ़्री। और मुझे आज पता चलता है कि वह दोमंज़िले मकान का मालिक है और बेटा जो नहीं रहा, वह बैंक में काम करता था।

 यह दिन कभी नहीं भूल पाऊँगा मैं। कभी नहीं भूल पाऊँगा कि थोड़े से रुपए बचाने के लिए कोई ऐसा झूठ भी बोल सकता है जो खुद उसके लिए एक त्रासद भविष्यवाणी साबित हो।

दरिया में पाँव

 12  अगस्त 1995

कल राजेंद्रनगर  साइकाएट्री  क्लिनिक का श्रीगणेश! आज दूसरा दिन। कोई मरीज़ नहीं। निकलनेवाला ही था कि  एक अधेड़ सज्जन आए। मैंने उनसे बैठने को कहा और क़लम खोलकर पूछा- आपका  नाम ? उन्होंने कहा - नाम भी बता देंगे, मगर पहले आप मेरी कहानी सुन लीजिए। मैंने कहा - ज़रूर सुनूँगा। लेकिन नाम, उम्र, पता और प्रोफेशन तो पहले नोट कर लूँ। सज्जन ने कहा - पहले मेरी कहानी सुनिए।मुझ जैसे नए साइकाएट्रिस्ट के सामने चारा भी क्या था! सज्जन कोई चालीस मिनट तक तफ़सील से अपने मर्ज़ के बारे में बताते रहे। चालीस-पचास पुराने प्रेसक्रिप्शंस भी दिखाए। मैंने धैर्य और ध्यान से उनकी बात समझने की कोशिश की। जब वे चुप हुए तो मैंने कहा - अब, आप अपना परिचय लिखवाइए और मेरे कुछ सवालों के जवाब दीजिए। मगर सज्जन तो दूसरे उद्देश्य से आए थे। बोले - डॉक्टर साहब, मैं बहुत अमीर आदमी हूँ। मुझे पैसे की कोई दिक़्क़त नहीं। मैं तो बस इसलिए आया था कि आपसे यह पता करूँ कि इस देश में मेरी बीमारी का सबसे अच्छा डॉक्टर कौन है। उनका सवाल सुन मन में आया कि चिल्ला कर कहूँ - गेट आउट। ऐसे वक़्त पर नाम का असर बड़ा काम आता है। आज भी काम आ गया। मगर यह तो न मेरे स्वभाव में और न ही ट्रेनिंग में। मैंने उन्हें NIMHANS Bangalore के डॉ सुमन्त खन्ना का नाम बता दिया। सज्जन OCD  के मरीज़ थे और सुमन्त ने इस रोग पर सबसे अधिक रीसर्च पेपर्स लिखे थे।

सज्जन बाहर गए तो अखिलेश अंदर आया और बोला - कह रहे कि दिखाया नहीं, बस बातचीत की है। मैंने कहा - ठीक कह रहे, उन्हें सादर विदा कर दो।

यह क्या था, जो हुआ ? एक भद्दा मज़ाक़ ही तो जो बहुत क्रूर भी। बहुत अमीर आदमी जिसने मेरा पौन घंटा लिया, सिर्फ़ साठ रुपए देने से मुकर गया। .. याद रहेंगे आप सर, व्यक्ति की तरह नहीं एक प्रवृत्ति की तरह जो सितम को करम कहती है।

27  मार्च 1996

कई दिनों से गुनगुनाते-गुनगुनाते जैसे-तैसे दो बंद पूरे हुए हैं। अब अंदर ख़ालीपन है। प्रैक्टिस का हाल तो यह कि सरसों ज़्यादा तेल कम! सिविल सर्जन सैलरी भी रिलीज़ नहीं कर रहा और दादा की किडनी हारती जा रही। सिरम क्रिएटिनिन 4.8 हो गया है। डायलिसिस के लिए रुपए कहाँ से आएँगे। क़ैद ए हयात बंद ए ग़म असल में दोनों एक हैं। ग़ालिब और निराला कैसे लिख लेते थे। मेरे तो छंद ही छितरा गए हैं। इस कविता को भी कविता क्या कहें। दोराहे पर खड़े ट्रैफ़िक पुलिस ने इशारा कर दिया है कि बेटे कविता को भूल जाओ। तुम्हारा रास्ता उधर है। पता नहीं किसकी लाइन है यह - गीत कवित्त सभी बिसरे जब हाथ परे घर की लकड़ी। कितनी बड़ी बात और कितनी सरलता से। क्या मैं कभी लिख पाऊँगा ऐसी पंक्तियाँ या कैसी भी पंक्तियाँ अभी फ़िलहाल इसे ही जीवन की अंतिम कविता मानकर दर्ज कर लेता हूँ।

कविता फ़ुरसत फूल फ़लसफ़ा ।

आँगन  से  हो  गए  हैं  दफ़ा ।

रोटी तोड़ रही ऐसे जैसे कोई शमशीर बुतों को

सीने से चिपकाए बैठा लहूलुहान कबीर बुतों को

कैसी रेत खेत में भरकर

लौटा किस दरिया का हलफा।

आग हुई जाती पनिहारिन पानी उड़ता पवन खटोला

मिट्टी कहती माधो बन जा तभी बचेगा तेरा चोला

एक जान से लड़ न सकोगे

यह संसार-समर दोतरफ़ा ।

5 जुलाई 2001

आज शाम बारिश हुई और ख़ूब हुई। इस मौसम की पहली बारिश। घर के पिछवाड़े की सूखी मिट्टी से ख़ूब महक उठी। कितनी  बड़ी नियामत कि कंकड़ों के बाग़ में  500 वर्ग फ़ीट ख़ाली ज़मीन मयस्सर है। मुझ गँवार को यह सोंधी महक जब भी मिलती है, मन में उत्सव का धमाल मच जाता है। एक नशा सा छा जाता है। वे दिन याद आते हैं जब बूँदाबाँदी के बीच खेतों की तरफ़ भागता था। तब तो नहीं समझता था, मगर अब दावे के साथ कह सकता हूँ कि इसी महक के इश्क़ में मिट्टी खाना शुरू किया होगा मैंने। डाँट-डपट और कान-खिंचाई से यह शौक़ तो गया, मगर इस महक के लिए जो दीवानगी है वह कहाँ छूटनेवाली। लेकिन जो जीवन चुना है उसमें इसकी गुंजाइश कितनी कम है। हाल तक यह हाल था कि वो महबूब महक तभी मिलती थी जब मिट्टी के कुल्हड़ में चाय मिले। आज भी ऐसी चाय के बाद जब कोई पूछता है - कैसी चाय थी, तो मेरा जवाब होता है - कुल्हड़ की चाय में चाय को कौन पूछता है! क़िस्मत की बात कि घर ऐसा मिला जिसके पास धड़क सकने वाला दिल और कुछ पैदा कर सकने वाली कोख है। वायव्य कोण में पीपल महाराज विराजते हैं और ईशान कोण में  देवी आम्रपाली। आम्रपाली जी  वस्तुत: एक रसाल तरु हैं और व्याकरण के हिसाब से पुल्लिंग, मगर पुरुष कब अपनी काया से कुछ रच पाता है! इसलिए मैं इन्हें मातृशक्तियों में शुमार करता रहूँगा।

पिछले बरस पाँच सौ से ज़्यादा रसीले वरदान मिले थे और इस बरस भी ख़ूब फली हैं।

मुझ गँवार को और क्या चाहिए !

फ़ैसले की रात

7 सितम्बर 2001

यह उलझन की रात है। सितारों के सिवा और कोई नहीं जाग रहा। कमरे में भी बस नींद की आवाज़ है। कितनी देर से मंजु की साँसों को सुन रहा हूँ।एक बज गया। तारीख़ कब की बदल चुकी। मगर मुझसे यह फ़ैसला नहीं हो पा रहा कि कल अनिल को क्या जवाब दूँ। वैसे तो  ऑफ़र रजनीश का है, मगर अनिल भी चाहता है कि मैं वहाँ आ जाऊँ। उसकी तड़प भी वाजिब है। वह ख़ुशी तो किसी के  भी साथ साझा करता रहा है मगर उदास लम्हे सिर्फ़ मेरे साथ बाँटता रहा है। ऑफ़र बुरा नहीं है। असोसीयट स्पेशलिस्ट का जॉब। अभी जितना कमा रहा उससे काफ़ी ज़्यादा रुपए... हद है... मुझे पाउंड लिखना चाहिए था। कहीं यह फ़्रायडियन स्लिप तो नहीं। यानी मेरा अनकॉन्शस रुपया की तरफ़ है। पाउंड उसे नहीं नहीं रिझा पा रहा। लेकिन UK जाने का मन तो बहुत था। वरना IELTS के टेस्ट क्यों देता। पहले टेस्ट का स्कोर तो उस समय के हिसाब से सही था। जी एम सी से कॉल भी आ गया था। मगर अगले महीने फिर एक चिट्ठी .. स्कोर बेटर करो। लेकिन  इस देहाती से बेटर क्या होना था। दो बार और ज़ोर लगाया मगर फिसल ही गया। और आज फिरंगियों को कुछ नहीं चाहिए। उन्हें डॉक्टर चाहिए तो सारे नियम शिथिल।

हाँ कह दूँ क्या? चला ही जाऊँ? रजनीश कहता है। वीक में पाँच दिन काम और मरीज़ भी 5 से 10 के बीच में ही।

ललचा रहा है कि कविता के लिखने में लिए ख़ूब समय मिलेगा और नैचरल ब्यूटी भी। अनिल छेड़ता  है - सजीव मूर्तियाँ। फिर जोड़ता है - क्वालिटी ऑफ़ लाइफ़! ..अब इन समझदारों को कैसे समझाऊँ कि अगर इनके दम से ही कविता मुमकिन होती तो विलायत में सभी कवि होते। ईस्ट इंडिया कम्पनी की जगह वेस्ट पोयट्री कम्पनी बनाते।

ये हो क्या रहा ? तय तो यह किया था कि डायरी लिखते हुए विचार करूँगा। मगर यह लाइन कैसे लिख गया। यह ताना जो उपनिवेशवाद के नाम। जब जाने के लिए कोशिश कर रहा था तब भी तो विलायत वही था - क्लाइव और डलहौज़ी और मेकाले और डायर का देश।

लो, फ़ैसले में सरसों-भर हासिल इतिहास ज्ञान भी दाख़िल हो चला। लेकिन बात तो सच है। कहीं वहाँ काम करते वक़्त यह भाव मन में आ गया तो? लेकिन कैसे आएगा, जिस नेता के नाम से ही नफ़रत है, किसी के इलाज के लिए उसके घर जाना पड़ा, तो गया न!

तो फिर करूँ क्या ? हाँ, कह देता हूँ।

लेकिन हाँ कहने का मतलब मुझे पटना को ना कहना पड़ेगा। पटना को यानी बिहार को यानी इंडिया को। उस इंडिया को ना कहना पड़ेगा, जहाँ मैं पैदा हुआ जिसके कल्चर ने मुझे बनाया। वह हिंदी सिखायी जिसमें कविताएँ लिखता हूँ। गाँव, माँ-मौसी और बाबूजी सबको ना। इतने सारे मरीज़ों को ना। झारखंड अलग होने के बाद बिहार में २० से भी कम साइकाएट्रिस्ट बचे हैं। नौ-दस करोड़ की आबादी के लिए सिर्फ़ बीस ! क्या इन्हें ना कहना सही होगा ? माना कि पटना मेडिकल कॉलेज में योग्यता के बावजूद पढ़ाने का मौक़ा नहीं दिया सरकार ने, छोड़नी पड़ी नौकरी। लेकिन क्यह कैसे भूल सकता हूँ कि इसी सरकार ने इसी राज्य की जनता से पैसे से मुझे पढ़ाया है। एमबीबीएस और एमडी की फ़ीस मिला दें तो १००० रुपए के आसपास। क्यों ? क्या इसीलिए कि मैं विलायत चला जाऊँ?

ग़ालिब याद आ रहे :

ईमाँ मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र

काबा मिरे पीछे है कलीसा मिरे आगे

लेकिन कलीसा दिलकश है! तो क्या फ़ैज़ से मदद लूँ ?

अब भी दिलकश तेरा हुस्न मगर क्या कीजे!

ईमान सलीब पे लटकवा दे तो ? बिहार में किडनैपिंग तो रुकने का नाम ही नहीं ले रही। एक सीन्यर साइकाएट्रिस्ट भी शिकार हो चुके। वहाँ इस आफ़त से सुरक्षा तो मिलेगी। लेकिन कैसे मिलेगी ? क्या सबको साथ के जा पाऊँगा? अभिज्ञान नाइन्थ में है। अगले साल बोर्ड इग्जाम देगा। इस मोड़ पर ट्रैंज़िशन ? यह अन्याय नहीं होगा उसके साथ ? वो नहीं जाएगा तो मंजु नहीं जाएगी और मंजु नहीं जाएगी तो आस्था नहीं जाएगी । यानी मैं अकेले? सबको छोड़कर? आस्था से लेकर देश तक को छोड़कर? और शायद कविता को भी ! यह मोहतरमा भी तो तभी नुमायाँ होती हैं जब आराम न हो।

अनिल को कहने की हिम्मत जुटाने की कोशिश करूँगा कि भाई, तू तो है ही वहाँ, यहाँ जो ज़मींदारी और दोस्तियाँ छोड़ गए हो उन्हें कौन सम्भलेगा ?

कश्मकश हो तो लिखकर सोचना एक अच्छा रास्ता है।

सुबह हो रही है, मंजु के जगने से पहले चाय बना लूँ। लेकिन क्या छिपा पाऊँगा उस रात के निशानात जो मेरे भीतर बीती है।  चाय का सिप लेते हुए पक्का बोलेगी - सोए नहीं नऽ... बुट्टी के पापू आप सच में थोड़े पागल हैं।

चंद तस्वीर ए बुतां

16  जून 2006 

२१ साल की उस लड़की ने आत्महत्या की दूसरी कोशिश की थी। पहली के बाद देखा था। शहर के बड़े नयूरोसर्जन की सिफ़ारिश थी - वी आइ पी ट्रीटमेंट देना, मेरे बेहद करीबी हैं और सचमुच के वी आइ पी भी। लड़की Bipolar थी और lithium-lamotrigene का बढ़िया रेस्पॉन्स भी  मिला था, मगर तीन महीने में ही दवा बंद। बीच में थोड़ी hypomanic रही जिसे सबने बदमाशी समझा और आज ..। मुझे क्रोध आ रहा था। लेकिन बेहद नियंत्रण रखा। संजीदगी से अस्सेस किया और फिर ट्रीटमेंट प्लान बनाया। साथ में माँ और बहन थी। ज़रूरी हिदायतों के लिए माँ को रोक उन दोनों को बाहर भेज दिया। और तभी अचानक मेरा क्रोध फूट पड़ा- आप पढ़े-लिखे लोग हैं। याद आ रहा कि पिछली बार भी कितना समझाया था। डॉक्टर चौधरी के क़रीबी हैं आप लोग। वजह जो भी हो लेकिन हर बार फ़ोन आता है उनका देखो वीआइपी ट्रीटमेंट देना।और आप लोगों ने तीन महीने में दवा बंद कर दी, जबकि ढाई साल चलनी थी। आख़िर क्यों ? उसकी माँ रो पड़ीं - ठीक लगने लगी  तो इसके पापा बोले कि बंद कर दो। अंग्रेज़ी दवा से किडनी ख़राब हो जाती है। वही पुराना क्लीशे! मैंने सख़्ती से कहा - इसके पिता हैं यहाँ? बुलवाइए, मैं उनसे बात करूँगा। वह सहमकर बोली - उनका आना सम्भव नहीं। मैंने पूछा - क्यों ? बिज़ी हैं बीमार ?” जवाब था - बिज़ी, जिसे सुनकर चिढ़ हुई। मैंने कहा - क्या बिज़ी कि बेटी के लिए भी फ़ुरसत नहीं। करते क्या हैं ?”

वे बोलीं - कैबिनेट मिनिस्टर हैं। यह सुनते ही मैं तनिक और सख़्त हो गया - सो व्हाट! बुलवाइए उनको या मुझसे बात करवाइए। यह बाप की बेटी है, मंत्री की नहीं। उन्होंने कहा - बुलवाती हूँ। वे बाहर गयीं और तो मुझे लगा, मेरा अप्रोच अनप्रोफेशनल था। ग्लानि सी हुई। कौन होता हूँ मैं इतना कटु बोलनेवाला ! एक पल के लिए यह भी मन में आया कि पिछली सरकार होती तो क्या मंत्री शब्द सुनने के बाद मेरे तेवर ऐसे ही सख़्त रह पाते। मरीज़ बहुत थे सो मैं अपने काम में लग गया। थोड़ी ही देर बाद  मंत्री जी के आने की सूचना मिली।  मैंने उन्हें ड्रॉइंग रूम में बिठवाया और सामने के मरीज़ को देखकर उनसे मिलने गया। मंत्री जी विनम्र लगे। मैंने उन्हें बाइपोलर डिसॉर्डर और उसके इलाज की बारीकियों के बारे में समझाया और बेटी पर अतिरिक्त ध्यान देने का आग्रह किया। तब तक चाय आ गयी थी मगर मंत्री जी चुप्प। मैंने चाय का कप बढ़ाया तो फफक पड़े। थोड़ी देर बाद संयत होकर बोले - बड़ी बेटी विधवा हो गयी और यह ..... इस हाल में। मेरा काम ऐसा कि एक पाँव पटना और दूसरा कन्स्टिचूयन्सी में। मैं वैसा नेता नहीं डॉक्टर साहब। लोगों के बीच रहता हूँ और दफ़्तर में भी काम करता रहता हूँ। मुझे एक डॉक्टर ने ही कहा था कि दिमाग़ के  डॉक्टर की दवाएँ हानिकारक होती हैं। गलती हो गयी। और उन्होंने हाथ जोड़ दिए। मंत्री जी के दुःख से मेरा मन भी भीग गया। आज यह लिखते हुए सोच रहा हूँ कि जजमेंटल होने से बचना कितना ज़रूरी है और यह भी कि प्रोफ़ेशनल आनेस्टी का अहंकार ज़रूरी विनम्रता के लिए कितना घातक !

28  मई 2014

आज एक अजीब वाक़या हुआ। एक साहब  जो मेरे पुराने मरीज़ हैं (बाइपोलर डिसॉर्डर विथ माइल्ड ओसीडी) ग़ुस्से से तमतमाते हुए चेम्बर में आए। मुझे लगा मेनिया का अटैक है। मगर तशरीफ़ रखने के बाद जब बोलने की बारी आयी तो मियाँ -बीबी दोनों एक साथ मुझ पे फट पड़े - आपका स्टाफ़ बदतमीज़ है। उसने हमारे ऊपर चोरी का इल्ज़ाम लगाया है, और वह भी 1200 रुपए के सड़े मोबाइल की चोरी का। ज़ोर हमारे पर था। मतलब यह कि सौ से ज़्यादा लोगों को नौकरी पर रखनेवाले उद्योगपति पर! अपनी शिकायत लिए साकेत भी दरवाज़े पर खड़ा था, घुसा और बोला- यही उठाए थे और जब हम लोग  सर्च की बात करने लगे तो अपने मोबाइल पर बात करते हुए बाहर चले गए और लौटे तो बोले कि भीतर-बाहर देख तो लो क्या पता लेनेवाले  ने तलाशी के डर से  कहीं फेंक दिया हो। भीतर तो हम देख ही चुके थे, बाहर पेड़ के पास जहाँ खड़े होकर ये बात कर रहे थे, वहाँ गए तो फ़ोन दिख गया। एक दिन और ..। मैंने साकेत को चुप कराकर कहा कि सॉरी बोलो और बाहर जाओ। मैंने भी माफ़ी माँगी ।

जब वे बाहर गए तो मैंने साकेत को बुलाकर पूछा - एक दिन और? क्या हुआ था उस दिन ? उसने बताया कि रवि का हेल्मेट काउंटर पर रखा था। जब ये दवा लेकर निकलने लगे तो उसे हाथ में लिए और आराम से आगे बढ़ गए। रवि को कहीं जाना था। बाथरूम से आकर हेल्मेट खोजने लगा तो ग़ायब। तभी एक मरीज़ ने बताया कि हेल्मेट तो वो ले गए जो सिल्क का कुर्ता और पजामा पहने थे। रवि बाहर गया तो देखता है कि वे एक हाथ में हेल्मेट हाथ में लिए गाड़ी के पास खड़े हैं। रवि बोला - सर, ई हेल्मेट तो हमारा है। तो ये साहब अचकचा के बोले - अरे, गलती से उठा लिया। लेकिन रवि बोल ही दिया - सर, आप तो हमेशा फ़ॉर्चूनर से आते हैं तब हेल्मेट कब पहनते हैं! साहेब खिसिया के गाड़ी में बैठके चले गए थे ।

मैंने साकेत को समझाया कि यह इनकी बीमारी का एक लक्षण है। आगे से ध्यान रखना और इन्हें कुछ मत कहना। अगर ऐसा कुछ करें तो मुझे बता देना।

जब वह गया तो मुझे हँसी आयी - साइकोबायोल्जी को विडम्बना पर । एक बाइपोलर उद्योगपति की कोमोर्बोडिटी कम्पल्सिव स्टीलिंग यानी क्लेप्टमेनिया।

वाह रे क़ुदरत ! तेरे खेल भी ख़ूब !!  

12 जून 2019

युवक के हाथ में काग़ज़ का पुलंदा है और एक बड़ा लिफ़ाफ़ा। उसमें एमआरआई स्कैन की रिपोर्ट होगी। दो और लिफ़ाफ़े थोड़े छोटे, इनमें ईईजी की रिपोर्ट्स होंगी। युवक की नयी शर्ट मगर मैली है मगर चेहरा शर्ट से भी अधिक मेला। दाढ़ी बढ़ी है और आँखों के नीचे कालापन। साथ में एक और युवक है। चिंतित तो वह भी है मगर इस क़दर नहीं।  इन दोनों के साथ एक साँवली-सलोनी युवती है। उसके कपड़े   नए भी हैं और साफ़ भी। उसके हाथ में कलाई के पास इंट्राकैथ लगा है। यानी किसी अस्पताल से ऑन रिक्वेस्ट डिस्चार्ज होकर निकली है। वैसे उसके बाल चमकीले हैं और शैम्पू किए हुए। आँखों में चमक ऐसी कि अचानक बिजली गुल हो जाए तो आप उसकी  कौंध में टॉर्च या माचिस की डिबिया खोज सकते हैं और मुँह ऐसा कि मुखारविंद कहा जा सके।

युवती का मर्ज़ यह कि सर में दर्द होता है, बहुत तेज़ और बेहोश हो जाती है। यह बेहोशी कोई घंटा भर तक तारी रहती है। पूछने से पता लगता है कि नयी मगर मैली शर्ट वाले युवक  और उसकी शादी कोई १५ दिन पहले हुई है। दूसरा युवक जो भाई है, बताता है कि शादी के पहले बिलकुल ठीक थी। मैली शर्ट वाला युवक बताता है कि यह तकलीफ़ शादी के तीन दिन बाद से शुरू हुई है। वह तकलीफ़ और इलाज के बारे में तफ़सील से बताता है और अपनी आँखें पोछते हुए कहता है - बहुत महँगे-महँगे टेस्ट हुए हैं सर, मगर  किसी में कुछ नहीं निकला है। महँगी-महँगी दवाएँ चल रहीं, मगर कोई फ़ायदा नहीं।

मनोचिकित्सक दोनों युवकों से कहता है - आप दस मिनट का समय दें। थोड़ी देर बाहर बैठें। वे बाहर चले जाते हैं और मनोचिकित्सक युवती की तरफ़ मुख़ातिब होता है - आप किसी बात से परेशान तो नहीं ?

- जी बिलकुल नहीं।

- ससुराल में कोई कष्ट तो नहीं ?

- जी बिलकुल नहीं।

- सास ?

- पुलिस की नौकरी में थीं। पिछले साल रिटायर हुई हैं

- आपको मानती हैं ?

- जी बिलकुल, बेटी जैसी।

- और ननद ?

- नहीं है।

- ससुर ?

- किसान हैं। सीधे-सादे आदमी।

-और पति ?

- बहुत अच्छे ! बहुत प्यार करते हैं।

- यानी कोई मुश्किल नहीं। कोई पुराना प्यार ?

- जी नहीं।

- मुझे लग रहा है, आप झूठ बोल रही हैं। मुझे आपका पति थोड़ा अजीब  आदमी लग रहा है। रोंदू है। पुरुष कही रोते हैं!

- डॉक्टर साहब, आपका अनुमान ग़लत है। वे बहुत अच्छे इंसान हैं। बीमार मैं हूँ और आप कॉमेंट उन पर कर रहे। वे पुरुष हैं और पूर्ण पुरुष। वे तो ....

कहते-कहते उसका चेहरा  शर्म और ग़ुस्से से लाल। मनोचिकित्सक के मन में शोले का डायलॉग याद आया - बड़ा याराना लगता है रे ! मगर प्रकट में बोला - जो भी हो, बंदा है थोड़ा दब्बू सा ..।

बात पूरी होने से पहले युवती तनिक खीझकर बोली - उस घर में कोई भी ऐसा हो जाएगा। पुलिस के पहरे वाला घर है।

अब मनोचिकित्सक के मुस्कुराने की बारी थी - मतलब, सास थोड़ी कड़क हैं ?

- जी।

-किसी बात से अप्रसन्न भी ? मतलब दान-दहेज ?

-- दान-दहेज तो पूरा मिला है। वादे के मुताबिक़ पूरा। भैया से पूछ लीजिए।

- तो मुश्किल ?

- मेरी शादी यह कहकर की गयी थी कि मैं बीए पास हूँ। मगर सच तो यह कि मैं सिर्फ़ दसवीं..। इसी बात पर वे ग़ुस्से में हैं। कह रहीं - मैं अपने बेटे की दूसरी शादी करवाऊँगी।

ये सामने कुछ नहीं बोलते। कमरे में आकर रोते हैं।

- हुमम्म!

मनोचिकित्सक घंटी बजाता है और  मैली शर्ट वाले युवक को अंदर बुलाता है। उठकर दरवाज़ा बंद करता है और पूरी कहानी उन दोनों के सामने दुहराते हुए युवक से पूछता है - मामला क्या है ?

युवक पूछता है - इसी बात से परेशान है यह ?

- हाँ । तुम्हें ही कुछ करना होगा। इसका रोग दवाओं वाला नहीं।

- करूँगा सर । सब करूँगा। बताइए क्या करना होगा ?

- तुम दोनों एक दूसरे के आमने-सामने खड़े हो जाओ और एक उसका हाथ यूँ पकड़ो  जैसे  शादी में पकड़ा था। ... गुड! अब वादा करो .. मैं तुम्हारे साथ हूँ।

युवक युवती का हाथ पकड़ भावुक हो जाता है। आँखों  आँसू।कहता है - मैं तो सिर्फ़ बीए पास हूँ, तुम्हें एम ए तक पढ़ाऊँगा। माँ की चिंता मत करो। वे टीचर बनना चाहती थीं। आठवीं के बाद पढ़ाई छूट गयी तो पुलिस की नौकरी में चली गयीं, पिता जी के विरोध के बावजूद। हम दोनों मिलकर माँ को समझा लेंगे कि .. ... टीचर बन जाएगी।

युवती भी रो पड़ती है । युवक अपनी  उँगलियों से उसके आँसू पोंछ देता है। मनोचिकित्सक ताली बजाकर कहता है - मुलाक़ात का वक़्त ख़त्म और तीनों एक साथ हँस पड़ते हैं।

युवक पूछता  है - डॉक्टर साहब, पहले वाली दवाएँ?

मनोचिकित्सक कहता है - ओ एल एक्स पर बेच दो !

डॉ.  विनय ने हिंदी जगत को रचनात्मकता और लेखक के जटिल अंतस को ध्यान में रखते हुए कोरोना समय में उल्लेखनीय लाईव आख्यान दिए हैं। बहुत लोग जानते हैं उन्होंने बरसों हिंदी जगत को  'मनोवेद' जैसी पत्रिका भी दी है

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