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इतने अदृश्य थे हमारे वे हमवतन कि सबके लिए दृश्य हो गए

- तेजी ग्रोवर

लॉकडाउन के दौरान जो कवि ज़मीन पर उतर कर अपने उन हमवतनों के संग उतर कर आए हद से गुज़र कर उन मजदूरों के साथ खड़े रहे , जहाँ क्ष्से संभव हुआ हरसंभव सहायता ली और लौटा कर दी उनमें से एक नाम तेजी ग्रोवर का है, जो रुस्तम जी के साथ मिलकर इन सर्वहाराओं के पक्ष में खड़ी थीं , लगातार सोशल मीडिया पर भी उनके डेली अपडेट्स आ रहे थे जो कि अब एक दस्तावेज हैं --- गुज़र कर देखिए कि क्या गुज़रा उन पर

मार्च 2020 के अंतिम सप्ताह में देशभर में जो हालात पैदा हुए और जिनकी भयावह गिरिफ्त में अधिकांश देशवासी और सड़कों पर घूमते हुए पशु अभी तक हैं, उन हालात से स्वयं को कुछ हद तक बचाने के उपाय कई लोग कर रहे थे और अभी तक उनमें मुब्तिला हैं. भोपाल में आये दिन युवा लोग अपनी जान को ही त्याज्य मान इस दुनिया से कूच करना शुरू हो रहे थे. इनमें से जो भूख की मार से बचे हुए थे, उन्हें सूझ ही नहीं रहा था वे अपने साथ क्या करें, अपने साथ एक सीमित स्पेस में कैसे रहें; न उन्हें यह सूझ रहा था कि अगर वे संकट-ग्रस्त हमवतनों को अपना कठिन समय अर्पित कर सकें तो अपने जीवन को तजने की उनकी इच्छा एक सार्थक कर्म में रुपान्तरित हो जाएगी. लेकिन अवसाद-ग्रस्त मानस यह सब सोचने में भी प्राय: अक्षम ही होता है. ग़नीमत कि रुस्तम और मैं देश-देहात के हालात देखते उस आत्मघाती मनस्थिति में ढह गिरने के ठीक पहले पुकार लिए गए, क्योंकि यह पुकार सबसे पहले हमारे आवासीय परिसर के पड़ोस से आयी, जहाँ छतीसगढ़ के दो प्रवासी परिवार धूल-धक्कड़ से भरी एक अधबनी इमारत में फंसे हुए थे. निर्माण कार्य बंद हो चुका था और बिल्डर या उनके ठेकेदार उन्हें अपने हाल पर छोड़कर भाग खड़े हुए थे. लेकिन बाकी कई बेरहम बिल्डरों की तरह उनसे साईट ख़ाली करने को नहीं कह रहे थे. नौ लोगों के उस समूह में मुंगेली जिले की उन्नीस वर्षीय नव-विवाहिता सोना रात्रे भी थी जो बड़े अरमान लेकर अपनी सास और अपने पति के साथ पहली बार भोपाल आयी थी. पगार आना बंद हुई और उसे समझ में आया कि उसे गर्भवती महिलाओं को महसूस होने वाले लक्षणों ने भी घेर लिया था. उन परिवारों को अपने ही परिवार के सदस्य मान रुस्तम और मैं आगे बढ़ते हुए एक से दूसरे परिवार और फिर अंततः छह राज्यों में फंसे अधिकतर छत्तीसगढ़ के मजदूर परिवारों के क्रमशः सम्पर्क में आते चले गए. मानसिक और आर्थिक परेशानीयों का एक बेहद दमघोंटू आलम हर तरफ़ से हरेक संवेदनशील को हर पल पुकार रहा था: “अगर आपका पेट भरा है तो हमसे भी अपना राशन साझा करो. हम अदृश्य लोग हैं, लेकिन क्या आपको मालूम नहीं कि आपकी दुनिया हमारे ही दम पर बसी हुई है?” या फिर यह पुकार इस तरह आती: “ हम वे पशु लोग हैं आपको दूध देते रहे हैं... आपके वाहन हमें टक्कर मार कर घायल कर जाते हैं. हम आपके फेंके कचरे में मुंह मारते मरने की कगार पर पहुँच जाते हैं. हम वे श्वान हैं जिनके खाने के अन्य स्रोत बंद पड़े हैं...हमें भी भूख लगती हैं, हम भी आपके स्नेह के भूखे हैं.”
लॉकडाउन के दिनों में यही पुकार हमें सुनती रहीं, और कुछ भी नहीं. आसपास की हरियाली की सरसराहट और तितलियों-पाखियों की उड़ानें, उनके रंग और स्वर बीच-बीच में पल भर के लिए हमें भरमा भले ले जाते लेकिन देश के कई हिस्सों में वायरल हो चुके हमारे लगातार बजते हुए फ़ोन हमें उस पुकार के भीतर पुन: स्थित कर देने लगते जो अब हमारी खुद की मांस-मज्जा के भीतर से ही आती हुई भासने लगी थी. हम लोगों का अपना खाना-पीना-सोना सब अनिश्चित होता चला जा रहा था. यूं भी जिस तरह क्नुत हाम्सुन के उपन्यास भूख की तीन साल लम्बी अनुवाद प्रक्रिया के दौरान मेरे लिए खाना खाना हमेशा एक अप्रिय काम हुआ करता था, इन दिनों भी ठीक वैसा ही हुआ. लगातार व्यापक स्तर पर राशन-भोजन की व्यवस्था में उलझे हम लोग रोज़ झटपट बनाई खिचड़ी से ही दोनों वक़्त गुज़ारा कर रहे थे. जो निश्चित था वह सिर्फ यही कि दिन-रात में भेद किये बिना हम लोग हर फ़ोन का जवाब देंगे, और उधर की दास्तान को सविस्तार सुनकर जो बन पड़ेगा उसे निश्चित ही अविलम्ब कर गुजरेंगे. फ़ोन पर सुनी जा रही कहानियां धीरे-धीरे जटिल होती जा रही थीं, और राशन और पैसे की सख्त ज़रूरत से बढ़कर अब अक्सर घर पहुँचने की अदम्य बेचैनी को व्यक्त करने लगी थीं. ये वे लोग थे जिन्हें पैदल निकलने से रोकने की भरपूर कोशिश हम रोज़ किया करते थे. और उन्हें हर सम्भव आश्वासन देते रहा करते कि हम उनकी यात्र्सा की व्यवस्था करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.
इस सब के बीच शाम का कुछ वक़्त कुत्तों को खाना खिलाने में बीतता, और यह सिलसिला अभी तक अटूट बना हुआ है. मार्च 23, 2020 से पहले शाम के वक़्त क़रीब के एक रेस्तरां में हर शाम कॉफ़ी पीने के बाद हम लोग अधिक से अधिक चार या पाँच कुत्तों के खाने की व्यवस्था किया करते थे. लॉकडाउन के पहले कुछ ही दिनों में देखते ही देखते यह संख्या 22 तक पहुँच गयी. हमारे पडोसी भगवान और नीलू पवार का हमारे परिसर के सामने बना रेस्तरां बंद हो चुका था. जिसका अर्थ था कि कुत्तों और गायों के भोजन की कोई वैकल्पिक व्यवस्था तुरंत होना अत्यन्त आवश्यक था. रेस्तरां के बंद होने से पड़ोस के सब्जी वाले भी पिट चुके थे क्योंकि रेस्तरां के लिए सब्जी उन्हीं से ख़रीदी जाती थी. और शाम ढले सब्ज़ी के ठेलों से फिंके छिलकों आदि से गायों का पेट भी भरता था. बिरला मंदिर के पास झुग्गी कॉलोनी में बसा हमारा एक चिर-परिचित और विशाल संयुक्त परिवार मन्दिर के बंद होने के साथ ही दाने-दाने को मोहताज हो चुका था, क्योंकि वे सब कमाने-खाने वाले स्वाभिमानी लोग थे. उनके फ़ोन भी रोज़ आ रहे थे. मध्य प्रदेश में तो सत्ता का पासा-पलट और उसका प्रबन्धन ही सियासत का एकमात्र मुद्दा था. प्रशासन की कान पर एक जून तक रेंगाने की हमारी साथी एक्टिविस्टों और हमारी सभी कोशिशें लगभग नाकाम सिद्ध हुईं. सबसे पहले हमारी प्रिय लेखक और पुलिस अफसर पल्लवी त्रिवेदी की ओर से राशन की किट्स आयीं जो अपने आसपास के प्रवासी परिवारों के तुरन्त पल्लवी के स्टाफ ही ने बाँट दीं. हमारी सरकार तो सिर्फ और सिर्फ हमारे दोस्त थे, हुक्मरान तो कोई भी खरा नहीं निकला. केरल से रति सक्सेना अपनी राज्य सरकार को पूरे अंक दे रही थीं, जो सही भी था, लेकिन अन्य सरकारें केवल दिखावा कर रही मालूम पड़ती थीं.
इसके तुरन बाद हम लोगों ने फेसबुक के माध्यम से अपनी बात व्यापक स्तर पर साझा कर राहत कार्य में सहयोग लेने की गर्ज़ से अपने काम के बारे में कुछ-कुछ छिटपुट नोट्स लिखना शुरू किया. पड़ोस की सोना रात्रे के फ़ोन आना बंद हुए तो हम लोगों ने जाकर उन लोगों के हालचाल लिए. पता पड़ा कि लगभग सभी के फ़ोन रिचार्ज होने वाले हैं. तब समझ में आया कि दूसरी व्यवस्थाओं से पहले सबके फ़ोन चालू रहें, यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है. फेसबुक पर अपील करने और मित्रों से फ़ोन पर आग्रह करने से आनन-फानन में सैंकड़ों फ़ोन रिचार्ज होने लगे. फिर न केवल श्रमिक परिवारों बल्कि मनुष्येतर प्राणियों के भोजन के लिए भी सहयोग आना शुरू हुआ. राशन की किटों से हमारा छोटा सा घर कुछ ही दिनों में गोदाम जैसा दिखने लगा. अनिरुद्ध उमट के सुझाव पर हमने लेखक और CISF कमांडेंट श्री वर्तुल सिंह से राशन के लिए कई बार बात की और वे हमेशा एकाध दिन ही में कुछ व्यवस्थाएं कर दिया करते. (बाद में पता चला कि वे अशोक वाजेपयी और उनके परिवार से भी जुड़े हैं और वे सब भी इस काम में चुपके से हमारी मदद कर रहे हैं). अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं और संगठनों से तुरंत हमारा जुड़ाव हो जाना स्वाभाविक ही था. नर्मदा बचाओ आन्दोलन और भारत ज्ञान विज्ञानं समिति के कर्मठ और अनुभवी एक्टिविस्ट भी हमें अपने उपक्रमों का अभिन्न अंग मानने लगे और छत्तीसगढ़ के कुछ जुझारू एक्टिविस्टों ने हमारे साथ संयोजन कर कई फंसे हुए परिवारों की हर लिहाज़ से विधिवत मदद करना शुरू किया, जबकि हमारी समझ में उनकी राज्य सरकार कोई बड़ा कदम उठाने से हिचक रही थी. बल्कि श्रमिकों की यात्राओं की व्यवस्थाएं भी सरकारी फैसलों से बाधित हो रही थीं. अन्य कवियों-कलाकारों-लेखकों में से कुछ ने हमारा बहुत साथ दिया, कुछ ने नहीं भी, लेकिन हमें समझ में आया यह हमारे लिए कविता और चित्र-समय नहीं था. मेरे लिए तो कतई नहीं, रुस्तम की कविता इस कटु-तिक्त और दारुण पुकार को सुनते और भी समृद्ध हुई, मेरी कविता और भी असमंजस में पड़ी क्योंकि इस कठिन समय के ठीक पहले वह बार्दो थोडोल यानि तिब्बती मरण ग्रन्थ के गर्भगृह में कुण्डलीमार पड़ी थी, और मुझे मृत्यु-स्वीकार्य में दीक्षित करने की कोशिश में मुब्तिला थी. फिर तो उसे धीरे-धीरे उस कठिन स्थल से उठकर देशभर में चल रहे मृत्यु के नंगे-नाच का सामना करना पड़ा. उसे इस तरह का पहला अनुभव 1984 के दंगों में हुआ था और उसके कुछ माह के बाद भोपाल की गैस त्रासदी के दौरान. लेकिन मेरी कविता के बारे में कोई कुछ भी कहे वह इस भीषण नाच के सामने एकदम चुप हो जाया करती है और मेरे देहात्म को तजकर कुछ समय के लिए चली जाती है ताकि मैं उससे मुक्त हो कुछ अन्य ज़रूरी काम कर सकूं. या यह कह लें कि वह मुझे छुपा-छुपी का खेल खेलती इन दिनों त्रासदपूर्ण पदयात्राओं, भुखमरी, और अभी तक अदृश्य रहे आये असंख्य हमवतनों और हिंसक हो उठते भूखे पशुओं के बीच छोड़ रही थी, मानो मुझसे कह रही हो, अब मैं भी यहाँ हूँ, और तुम लोग भी यहीं रहने का हठयोग करो.
मेरे लिए प्रतिबद्धता का यह अर्थ भी है कि मैं अपनी कविता से वह काम न लेने लगूं जो सामाजिक-राजनैतिक अनुभव के ठोस धरातल पर टिके रहकर भी मेरी कविता से बनता नहीं है. अगर ऐसी “प्रतिबद्ध” कविता की ज़रूरत मुझे कभी-कभी महसूस होती है तो बजाय इसके कि मैं अपनी कविता का संकोची स्वभाव भंग कर बैठूं, मैं अपने अन्य प्रिय कवियों की शरण में जाना मैं बेहतर समझती हूँ. ऐसा तो असद ज़ैदी तक को करना पड़ता है जब वे कहते हैं कि इस बर्बर हुकूमत के चलते यह उनकी सातवीं ईद है जिसके लिए एक निरीह सी ईदी वे उन लोगों को भेज रहे हैं जिनकी मदद हम लोग करने की कोशिश कर रहे हैं.
विडम्बना यह है कि घर लौटने की जितनी भी यात्राओं को हमारे सामूहिक प्रयासों की “ईदी” नसीब हुई, अब वही यात्राएं करने वाले लोग उन्हीं बेरहम शहरों में लौटने के लिए मजबूर हैं जो उनकी पनाहगार साबित नहीं हुए. आजकल हमारे फ़ोन पुन: शहर वापसी की बातों को लेकर बजते हैं, और वह बिलख और वह पुकार अब पहले से भी अधिक घनी होती जा रही है!
तो असद ज़ैदी की एक पोस्ट के साथ ही मैं “महाविस्थापन” के इस खौफ़नाक आलम के दौरान नींद की कीमत पर हड़बड़ी में फेसबुक पर लिखी अपनी डायरी के कुछ चुनिन्दा अंश आपके समक्ष रख रही हूँ. अगर हम लोग फेसबुक का सहारा न लेते तो हम अकेले में यह काम कतई नहीं कर पाते. इस काम को अंजाम देने में हमें असंख्य मित्रों का सहयोग मिला है भले ही वे हमारे रोज़मर्रा के मित्र हूँ, या केवल आभासी दुनिया के मित्र जिन्हें हम अब अपने क़रीबी दोस्तों में शरीक मानते है. नाम नहीं ले पाऊँगी. वे इतने हैं और इतने फ़राख दिल कि कोई भी जगह उनके लिए कम पड़ेगी. (है न बाबुषा कोहली और रूपा सिंह?) इस सिलसिले में सबसे अहम पोस्ट 9 मई की है जब हम लोगों ने हिंदी कवि अशोक वाजपेयी से अपील कर एक अब काफ़ी फैल चुकी मुहिम की शुरुआत की थी : POETS WITH WORKERS. फेसबुक की यह डायरी सघन रूप से जुलाई के मध्य तक चलती रही, हालाँकि हमारा काम अभी तक चल रहा है क्योंकि पहले ही की तरह कुछ मित्र हमारी मदद से सीधे श्रमिकों के खाते में अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर रहे हैं. और इसमें अब केवल छत्तीसगढ़ के परिव्र्हे नहीं बल्कि भोपाल के ख़स्ताहाल हो चुके दिहाड़ी मजदूर और ठेले-गुमटी से गुजर करने वाले परिवार भी शामिल हैं, और घरेलू कामगार भी.
असद ज़ैदी ने एक दिन इसी आभासी दुनिया में यह एंट्री दर्ज की थी :
धूप में जलती हैं ग़ुरबत-वतनों* की लाशें
तेरे कूचे में मगर साया-ए दीवार न था
मीर तक़ी मीर (1723-1810)
*ग़ुरबत-वतन = घर/वतन से दूर परदेस में पड़े लोग



ARCH 22ND,
जो लोग गली-मोहल्ले के कुत्तों को खाना खिलाते हैं, आज रात 9 के बाद बाहर निकलकर उन्हें खाना खिलाएंगे, उम्मीद करती हूँ।


MARCH 25TH,
 कोरोना मनुष्य-केंद्रित सोच के लिए एक बड़ी चुनौती है।

 MARCH 30TH,
 किसी जीव की भूख शांत करते वक़्त क्षण भर के लिए हमारे छोटे से दिल में आसमान झलक आता है। फिर वही हम और हमारा छोटा सा दिल!
 

 APRIL 1ST,
 हमारे जो दोस्त प्रवासियों के पैदल सफ़र की तीरथ यात्राओं से तुलना कर रहे हैं, उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि किसी भी जन्म में उनके खुद के साथ ऐसा न हो। सुना है नास्तिकों की दुआएँ ज़्यादा शिद्दत से सुनी जाती हैं। इसी देश में एक ऐसा मुख्यमंत्री भी है जो रात के एक बजे भी संकटग्रस्त लोगों का फ़ोन सुन लेता है, तुरन्त कार्यवाही करता है.
 
 APRIL 2ND,
 AN EMAIL FROM SOUTH AFRICA, FROM CLOSE FRIENDS.


Dearest Teji and Rustam,
Although we are not great communicators we think of you all the time and especially at this terrible time. I fear your country like ours has not yet experienced the worst. Plus you have such terrible disruption as well. We are also under lockdown but at least we had 4 days warning and not 4 hours and were able to return to our homes in time.
Please let us know if you are safe and healthy.
Fondest love,
X and Y

APRIL 3RD,

इन दिनों हम क्या - क्या कर सकते हैं?

आज हमारी फ्लेमिंगो सोसाइटी के भीतर 100 बन्दर कूद आये। गुड़हल और सेमल के फूल आदि खाने लगे और कुछ फलदार पेड़ों पर भी चढ़ गए। गार्ड उन्हें भगाने की नाकाम कोशिश करने लगे। मैंने बड़े प्यार से उनसे कहा जैसे आपके पेट हैं वैसे उनके। लेकिन वे क्या करते, वे तो हुक्म का पालन कर रहे थे! मित्रो आजकल बहुत से जीव भूखे घूम रहे है। साहब, दिये आदि जलवाने से केवल आपकी ताक़त का इज़हार होगा, लेकिन इसकी बजाय अगर आप अपने देशवासियों से इल्तजा करें कि वे कम से कम इन विकट दिनों में अपने आसपास के हर प्रजाति के भूखे जीवों को खिलाते रहें, तो इससे बिना जलाए दिए जल जाएंगे, और हम जैसे लोग भी आपसे संवाद बना पाएंगे।
1 पक्षियों के लिए दाना
2 कुत्तों के लिए जो भी आपसे बन पड़े। वे टमाटर तक खा लेते हैं।
3 गायों के लिए किसी फल वाले से ढीले केले भी खरीदकर डाल सकते हैं, या जो भी आपको ठीक लगे।
4 लोगों से सिर्फ हाल चाल लेने से नहीं चलता। उनके लिए संकोच की स्थिति पैदा करने की बजाय खुद पहल कर उनकी ज़रूरतों को पूरा करें।
आप में से कई प्रिय मित्र तो ऐसा कर ही रहे हैं। उनके सुझाव आएंगे तो बढ़िया होगा। आजकल इस तरह सक्रिय हुए मित्रों को रोज़ कुछ नया समझ में आ रहा है न? साझा करें!



 APRIL 6TH

अभी पता चला कि भोपाल lockdown की चपेट में छत्तीसगढ़ के 9 मज़दूर हमारी सोसाइटी के बिल्कुल पास में. वे 23 को पैदल नहीं निकले थे।


APRIL 6TH, #भोपालमें #फंसेछत्तीसगढ़केलोग


जैसा कि रुस्तम ने अपनी पोस्ट में लिखा अब यह साफ़ है कि जो लोग 23 मार्च को घर के लिए पैदल नहीं निकले उनकी हालत भी पदयात्रियों जितनी ही खराब है। आज पहले हमें 10 कंस्ट्रक्शन वर्कर्स का पता चला, फिर उन्हीं के माध्यम से भोपाल में अन्य जगह फंसे कम से कम 24 और लोगों की जानकारी मिली जो 21 मार्च को ही भोपाल पहुंचे थे। और भी बहुत से लोग फंसे होंगे, ज़ाहिर है। जिस जगह उन्हें रहना पड़ रहा है वहाँ स्नानादि की सुविधाएं तो दूर, पीने के पानी की कमी भी ज़रूर होगी। ऐसे में क्या वे भी इस बीमारी की गिरिफ्त में नहीं आ सकते जिससे बचाव करने की कोशिश में उनके ये हाल कर दिए गए हैं?
फिर भी सम्पर्क करने पर उन्होंने चावल-दाल-गेहूँ की ही मांग की। तैयार खाने की नहीं। सरकारी helpline काम नहीं कर रही और दिन में एक बार सड़क पर पांत लगाकर बैठने पर कहीं कहीं पूड़ी सब्ज़ी मिलती है जो छोटे बच्चे नहीं खा पा रहे। इस त्रासदी का पैमाना इतना बड़ा है कि केवल निजी प्रयत्नों से काम नहीं चल सकता। तिस पर सुपर lockdown की वजह से मदद करने वाले ग्रुप सड़क पर नहीं निकल सकते। कुछ को ही शासन से अनुमति मिल पाई है।
घरों में कारें साफ करने वाले, कपड़े प्रेस करने वाले, नारियल पानी डिलीवर करने वाले लोग भी बिना किसी कमाई के भुखमरी की कगार पर हैं। और उनकी मदद करने वाला कोई भी नहीं है। कम से कम जो उनकी सेवाओं का फायदा लेते हैं उन्हें तो बिना एहसान जताए उनके लिए कुछ करना चाहिए न?
आज चूंकि सब्ज़ी के ठेले भी बंद हैं , उनके आसपास बैठे पशु भी भूखे बैठे हैं। नहीं तो उन्हें भी शाम ढलते खाने को मिल जाया करता था। नगर निगम वाले भला कितने शवों को ढोकर ले जाएंगे? और फिर पशुओं को खिलाने वाले लोग भी तो बाहर नहीं आ पा रहे। पुलिस उन्हें बारबार रोक रही है, लेकिन अपने आसपास भूख का यह खौफनाक मंज़र देख आप अपने लिए न ठीक से खाना बना सकते हैं, न खा सकते हैं। इस सब के बारे में लिख भी ठीक से नहीं सकते क्योंकि शब्दों का मन भी रूठा हुआ है।

 APRIL 7TH,

2 persons in their sixties struggling to keep stray animals alive... Exhausted, need help! Bhopal.

 APRL 7TH,

जिनके पास खाना पहुंच रहा है उन्हें ईंधन और कुछ पैसा भी चाहिए।


APRIL 7TH

,Amazing people have been calling us since yesterday. Animal lovers in particular. Offers of help and support are pouring in.


APRIL 8TH,

 अगर खाना वितरित करने वाले एक वालंटियर की मानें तो पुराने भोपाल में बहुत से लोग भूखे मरने वाले हैं। सतर्क रहें।


 APRIL 8TH,

We need volunteers who will top up/recharge phones of stranded people. WORK FROM HOME!@@!

APRIL 9TH #हमारे#देश#के#लोग

हमारे पड़ोस की सोसाइटी में फंसे छत्तीसगढ़ के 9 लोगों के समूह की लाडली सोना ने अपने हाथ से लिखकर यह लिस्ट भेजी है। मित्र Pallavi Trivedi उन्हें कुछ सामान भिजवा चुकी हैं कुछ दिन पहले। अब ख़त्म होने को है सामग्री। आप देखेंगे कि बहुत प्यार से पूछने पर भी कितने संकोच से सूची बनाती है सोना। मैंने कहा भी था कुछ दिन निकल जाएं इस हिसाब से सूची बनाना। आप सोचिए सोना की उम्र की लड़कियों की कुछ और भी ज़रूरतें होती हैं। बच्चों की भी...


APRIL 10TH

 जिन्होंने हमारे घर बनाए,वे आज बेघर हैं,गाँव जाने को तरस रहे हैं, आभार व्यक्त कर रहे हैं। आभार किसको व्यक्त करना था और कर कौन रहा है!



 APRIL 16TH , #हमारेदेशकेलोग
अभी अभी पढ़ा कि 20 अप्रैल से कंस्ट्रक्शन का काम शुरू किया जा सकता है। यानी बाहर से कोई नहीं आएगा लेकिन जो श्रमिक स्थानीय हैं या बाहर से आये हुए हैं और साइट पर या आसपास उपलब्ध हैं वे काम शुरू कर पाएंगे। इस वक़्त हमारे लिए इससे अच्छी खबर और कोई नहीं हो सकती। पूरा दिन सर्वेक्षण, नई सूचियां बनाने और भोजनादि की व्यवस्था के संयोजन और वितरण में निकल रहा है। *अपना खाना रोज़ झटपट बनाई बोरिंग खिचड़ी ही रहती है।* लेकिन जो परिवार सीधे हमारे सम्पर्क में हैं वे हमारे परिवार के सदस्य जैसे हो गए हैं।
अगर कुछ राशि हमारे पास बच रही होगी उसे उन परिवारों में समान रूप से वितरित करना होगा जिन्हें दिहाड़ी पगार से वंचित रहना पड़ा है। लेकिन अभी कुछ पता नहीं दरअस्ल क्या होने वाला है।
अगर यह काम वाक़ई शुरू हो जाएगा तो समझ में आ रहा है कि घर में डस्टिंग का काम फिर बढ़ जाएगा। लेकिन अब हम लोग इसे करते हुए खिन्न नहीं होंगे। मुझे हर क्षण इस धूल में उन लोगों के चेहरे दिखाई देते रहेंगे जो इस संकट के दौरान हमारे बहुत क़रीब आ गए हैं।
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 APRIL 21ST,#हमारेदेशकेलोग
कोई माने या न माने, कुछ राज्य सरकारें पूरी तरह दृष्टिविहीन हैं। अगर हम जैसे लोगों को किसी न किसी माध्यम से रोज़ बीसियों ऐसे परिवारों की खबर पहुंच रही है जिनके पास कोई मदद नहीं पहुंच रही, तो प्रवासी श्रमिकों और दिहाड़ी मज़दूरों के दरअसल क्या हाल हो रहे होंगे, बहुतों के लिए कल्पनातीत होगा।
आज हमें एक साथ छत्तीसगढ़ के 75 खस्ताहाल परिवारों की जानकारी मिली है जिनके पास कोई मदद नहीं पहुंची।
4 बुंदेलखंडी परिवार जिन्हें हम पुलिस से बचते-बचाते जैसे तैसे सप्ताह भर का राशन पहुंचा आये हैं, एकदम कगार पर पहुंचे हुए थे। हम पूरा दिन श्रमिक-परिवारों को ट्रेस करने, सूची में जोड़ने, अनाज वितरित करने और फोन कर सबको आश्वस्त करने में लगे रहते हैं। उनमें से कई लोगों, खास तौर पर महिलाओं, वृद्धजनों और बच्चों की कुछ खास ज़रूरतें भी होती हैं। जिन्हें हम सीमित तौर पर ही पूरा कर पाते हैं।
छत्तीसगढ़ की सोना तो मेरी बिटिया की तरह मुझे जब-तब फोन कर कहने लगती है: आंटी जी, हमारे गांव में अब कुछ नहीं है। आप तो किसी तरह हमें यहीं काम दिला दो। लौटेंगे तो भूखे मर जाएंगे। हम लोग तो थोड़ा बहुत पढ़े-लिखे भी हैं। कोई काम तो इत्ते बड़े शहर में मिल ही सकता होगा न!


APRIL 21ST,

छत्तीसगढ़ से आया हमारा पड़ोसी परिवार। अंतहीन कहानियां।



APRIL 26TH, #हमारेदेशकेलोग
आज कुत्तों को खाना खिलाने निकले तो अचानक इकट्ठा हुए क़रीब बीस लोग हमसे ठीक उसी समय राशन की मांग करने लगे। वे वहाँ इसलिए नमूदार हुए होंगे क्योंकि उसी पॉइंट पर 15 या 20 दिन में एक बार नगरनिगम की गाड़ी आकर रेतीला आटा या फिर पूड़ी भाजी बांटती है। 15 कुत्तों को खाना खिलाते वक़्त आपको पूरी तरह एकाग्र रहना होता है कि किसी को कम-ज़्यादा न मिले और आपस में वे लड़ने न लग जाएं।
उस वक़्त कोई कॉल भी आ जाए तो खिलाना कठिन हो जाता है। और हमारा फोन helpless नहीं helpline है इसलिए उसे साथ ही घुमाने लाना पड़ता है।
अजीब स्थिति थी। वे भले लोग आपस में भी थोड़ा बहुत लड़ रहे थे और हमसे तुरन्त मदद की अपेक्षा भी कर रहे थे। इस बीच होड़ते हुए कुत्ते हमें ज़रा भी बख्श नहीं रहे थे।
सच कहूँ तो हम थोड़ा डर भी गए थे। किसी भी दिन भूख से बिलबिलाते हमारे आसपास के लोग हमसे सख्त नाराज़ हो सकते हैं। यानी जब उन्हें यह लगने लगे कि बाक़ी लोग उनसे बाज़ी मार ले गए हैं। (और उनका यह सोचना भी स्वाभाविक होगा कि कुत्तों को खिला सकते हैं तो हमें क्यों नहीं)
हमने उन्हें देखा ही पहली बार था। उनसे उनकी लोकेशन का पता कर हमने धीरज से पूछा कि क्या वे पका खाना लेना पसंद करेंगे।
कल से एक पड़ोस के रेस्टोरेंट में कुछ अन्य नए और युवा मित्रों ने रसोई चालू करने और 200 से 300 तैयार भोजन के पैकेट बांटने का संकल्प लिया है। हम उनकी यथासम्भव मदद करेंगे और आज की शाम मिले परिवारों तक कम से कम एक समय का खाना पहुंचाने की कोशिश करेंगे।

 APRIL 28TH
#Migrant_Workers_In_Lockdown

पिछले कई दिनों से छत्तीसगढ़ के कई ऐसे भले और संवेदनशील लोगों से बातचीत चल रही थी जिन्हें लगता था/है कि वे अपनी राज्य-सरकार से मध्य प्रदेश में फंसे प्रवासी मज़दूरों के लिए कुछ करवा पाएंगे। इनमें कई पत्रकार और अपने अपने क्षेत्र में सक्षम प्रोफेशनल हैं जिनका वास्ता सरकार से पड़ता रहता है। फ़ोन पर की जा रही ये बातें बहुत लम्बी होती हैं। हरेक के कान और जबड़े दुखने लग जाते हैं क्योंकि इन बातों में धड़क होती है, प्राणवान होती हैं ये बातें, जिन्हें करने में दिलोजान पूरी तरह भिड़े हुए होते हैँ। छत्तीसगढ़ के इन दूरभाष मित्रों को सलाम कि वे मुझ जैसे किसी शख्स की बात को एहमियत देते हैं। वर्ना कवि लोग किसी काम के कहाँ होते हैं भला!
हम लोग जो निरंतर इन अतिथि श्रमिकों के संपर्क में हैं और राशन के अतिरिक्त भी उनकी हर ज़रूरत को पूरा करने में लगे हैं, अब एकदम निराश होने की कगार पर पहुंच गए हैं। सरकार के पास उन्हें किसी भी किस्म का आश्वासन देने की तैयारी नहीं है। कइयों को फ़ोन ज़रूर किया सरकार के किसी महकमे ने। पता चला अतिथियों को राशन मिल रहा है। वे सुनकर खुश हो जाते हैं कि गुज़ारा चल रहा है। और हमारे अतिथि उन्हें यह भी नहीं बता पाते कि यह राशन उन्हें मप्र सरकार से नहीं कहीं और से मिल रहा है। कोई नहीं जानता साधन जुटाने, सूचियां बनाने, लगातार फ़ोन और सड़कों और बस्तियों में बने रहकर, खुद अपने खाने-पीने और सेहत का ध्यान न रख पाने वाले हर वय के ये लोग कब तक सरकारों के निकम्मेपन को पूरते रह पाएंगे।
सिविल सोसाइटी के हों या ग्रुप्स से जुड़े लोग, वे दिनरात एक कर जो व्यवस्थाएं करते हैं वे केवल राशन की व्यवस्थाएं नहीं है।
सरकार के लिए राशन का अर्थ केवल इतना है: एक परिवार के लिए (पता नहीं कितने हफ़्तों की मग़ज़मारी और प्रतीक्षा के बाद हाथ लगता) केवल पांच किलो आटा या चावल। वह भी मिले तब तो जानें! वह भी कहाँ पहुंच रहा है! और दरअसल कहाँ चला जा रहा है इसकी कहानी लंबी और उबाऊ हो सकती है।
केवल "राशन" पर कोई दाता एक दिन भी जी कर दिखा दे, तब उसके दिए को हम भी आहार मान लेंगे।
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 APRIL 29TH
#हमारेदेशकेलोग

कुछ मित्रों से सुन रहे हैं मदद लेने वाले लोग चालाकी से दो-दो बार ले रहे हैं, या एक ही परिवार के लोग सूची में अलग अलग शामिल हो अधिक लोगों का राशन लिए जा रहे हैं।
पहली बात कि ऐसा बहुत कम हो रहा है। हो भी रहा है तो हर बार किसी नए और रोचक ढंग से। इस सब की कहानियाँ लिखने वाला शायद कभी भविष्य में पैदा हो ही जाए!
ज़्यादा अहम बात यह है कि जो लोग अपने घर में 6 माह का राशन रखकर भी असुरक्षित हुए बैठे हैं, क्योंकि शायद कारें खुद धोना पड़ रही हैं, वे कभी जान पाएंगे कि भूख कितनी भयावह चीज़ है? वे तो अपने फ़ोन के pre-recorded message सुन-सुनकर मान चुके हैं कि घर से निकलना ख़तरनाक है।
हाँ घर से निकलना इसलिए भी खतरनाक है कि हम जैसे लोग रोज़ रूखे-भूखे चेहरों से घिरकर ही सिहर जाते हैं और रात भर ये चेहरे हमें उखड़ती नींद में भी घेरे हुए रहते हैं। रोज़ सुबह उठकर सबसे पहले रुस्तम और मैं कुछेक लोगों को फ़ोन कर उनके हालचाल लेते हैं, और जब पता चलता है कि किसी के फ़ोन में पैसा नहीं है तो मित्रों से आग्रह कर उनके फोन रिचार्ज करवाते हैं। अगर वक़्ते-ज़रूरत वे फोन नही कर पाए तो?
और फिर ये दो बार राशन लेने जैसी निरीह चालाकियाँ मृत्यु को सामने खड़ी देख क्या आप और हम भी नहीं करेंगे?



 MAY 1ST,

श्रमिक दिवस पर एक नास्तिक की प्रार्थना जो ज़रूर सुनी जाएगी: "हम" और" वे" कुछ दिन के लिए एक समान भूख से लड़कर देखें!


 MAY 3RD,

आप ऐसे बिल्डर से क्या कहेंगे जो मजूरी और राशन तो दूर छत्तीसगढ़ के एक परिवार का पानी कनेक्शन भी काट गया है? सुझाव दें!

MAY 5TH,#MIGRANT_WORKERS_IN_LOCKDOWN


कल एक्सटॉल कॉलेज के पीछे रह रहे उन 61 छत्तीसगढ़ श्रमिकों की ओर से फोन आया कि राशन ख़त्म है। पहला रिस्पांस यही होता है अब कि अरे इतनी जल्दी? सभी साथी वालंटियर कगार पर पहुंच चुके हैं। CHATTISGARH समूह के ग्रुप लीडर बोले 85 किलो अनाज था और कितने दिन चलता,आप ही बताइए।
आज से एक एक दिन के स्पांसर ढूंढ रहे हैं। मेरे हिसाब से केवल दाल चावल का रोजाना करीब 3000 बैठेगा। अगर चावल उसी रेट पर मिल गए जैसे अब तक मिलते आये हैं। यह सिर्फ़ एक समूह के साथ खाना साझा करने की गरज़ से। ( कल ही एक साथी से सीखा "बांट" नहीं रहे, शेयर कर रहे हैं।)
THIS DRY RATION CAN BE DELIVERED EVERYDAY.


 MAY 6TH,

तिरे आज़ाद बंदों की न ये दुन्या न वो दुन्या।
इंतिज़ार हुसैन ( via Manisha)



 7TH MAY
#OUR_PEOPLE_IN_LOCKDOWN


गैस रिसने की ख़बर के साथ ही मुझे एक बार फिर याद आया कि मध्य प्रदेश आकर बस जाने का फ़ैसला भोपाल गैस कांड की वजह से ही लिया गया था। आप में से कुछ लोग जानते ही हैँ कि इसी प्रदेश में मैं पहली बार दुनिया भर के अविश्वसनीय एक्टिविस्टों के सम्पर्क में आई थी जो अपने काम धंधे छोड़ भोपाल पहुंचकर एक बड़े जन-संघर्ष से जुड़े थे। मेरा वह पहला सामाजिक-राजनैतिक अनुभव था।
Lockdown के तुरंत बाद से अपने श्रमिक परिवारों के दुख-दर्द बांटते हुए उस से इस दुनिया के सफ़र को मैं आज पुनः याद कर रही हूँ। इतना आक्रोश, इतना दुख, पहली बार भोपाल गैस पीड़ितों के बीच आकर ही महसूस किया था।
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आज जो बात सामने आई तो फिर वही आक्रोश, वैसी ही भीषण पीड़ा! मैं अपने पड़ोस के सागर बिल्डर को कोस रही हूँ, जिसके ठेकेदार छत्तीसगढ़ और मप्र के प्रवासी मज़दूरों को 500 रुपया प्रति सप्ताह ब्याज पर उधार देकर उन्हें बन्धक बनाकर रखे हुए हैं। इन 195 मज़दूरों का पता हमें कुछ दिन पहले ही चला, क्योंकि अफवाह थी कि सागर कंपनी अपने लोगों का ध्यान रख रही है। हमारे सर्वे और सूचियां इतनी लंबी हो चुकी थीं और राशन साझा करने की व्यवस्था इतनी कठिन कि उस अफ़वाह पर हमनें विश्वास कर लिया।
जब मैं हर परिवार से अलग अलग बात कर रही हूँ तो समझ में आ रहा है कि वे डर रहे हैं ठेकेदार की शिकायत की तो और भी बड़ी मुसीबत में फंस जाएंगे।
अभी उन्हें अन्य साथियों की मदद से दोपहर का भोजन पहुंच रहा है। और छत्तीसगढ़ प्रशासन की मदद से सबकी रेजिस्ट्रेशन हो रही है। लेकिन वे लोग बहुत डिप्रेशन में हैं।
 

 MAY 9TH,
#शहर_अब_भी_सम्भावना_है

“कल सुबह से एक नयी शुरुआत” #PoetsWithWorkers


हृदय-विदारक ख़बरों के बीच एक छोटी सी पहल हम लोग कर रहे हैं. स्वयं हमसे जुड़े अतिथि मजदूर परिवार भीषण हादसों के शिकार हो रहे हैं, और फ़ोन पर बिलख-बिलख कर हमें दुर्घटनाओं और अकल्पनीय निष्करुण प्रसंगों से अवगत करवा रहे हैं. रुस्तम और मैं एकदम भंगुर और निष्कवच, तब भी हर तरह से अतिथि परिवारों के साथ बने हुए हैं, और पूरा दिन इस काम को सप्रेम अंजाम देने से पीछे नहीं हट रहे. एक विशाल संयुक्त परिवार बन निकला है. जिसमें कुछ समय के लिए ही सही, कोरोना और वर्गभेद दोनों ही भुलाए जा चुके हैं.
इस सदी के एक महाकवि कह गए हैं कि आदमज़ात यथार्थ के अतिरेक को नहीं सह सकती. सह तो हम भी नहीं पा रहे, और आप भी नहीं. (इक्कीसवीं सदी का सबसे अविस्मरणीय बिम्ब रेल की पटरी की बीच बिखरी हुई रोटियां या फिर कुछ और होगा, अभी से कहना मुश्किल है.) हममें से कोई भी ठीक से धीर-धरे सह-समझ नहीं पा रहा इस अंधकार को. फिर क्यों न हम सब भी साथ हो लें? इसी गर्ज़ से परसों हमने सर्वप्रथम हिंदी कवि अशोक वाजपेयी को एक विनम्र सन्देश भेजा कि वे पहले कवि हैं, जिनसे हम छत्तीसगढ़ के उस परिवार के साथ हो लेने का आग्रह कर रहे हैं जो lockdown शुरू होते ही हमें अपने पड़ोस में सबसे पहले मिला था : मुंगेली जिले का एक नविवाहित दम्पति जो विवाह के एक दिन बाद ही भोपाल आ गया था और बिना एक धेला बचाए अधबनी इमारत में कैद होकर रह गया. ज़ाहिर है बिल्डर-ठेकेदार सब साईट से ग़ायब हो चुके हैं. सोना और तरुण (नाम बदल दिए गए हैं) अन्य लाखों लोगों की तरह एक शहर का निर्माण कर रहे हैं जो उन्हें खुद को पनाह देने में सक्षम नहीं है. नवविवाहिता सोना रात्रे बताती है कि बारिश से पहले उनके परिवार को किसी भी तरह गाँव से निकल जाना होता है क्योंकि उनका अपना घर बारिश की मार से उन्हें बचा नहीं पाता. वे दोनों अपने समूह के अन्य सात लोगों की ही तरह दौड़ कर घर चले भी जाना चाहते हैं और नहीं भी. रोज़ी-रोटी वहां नहीं है, सिवा उनके लिए जो मौसमी मजदूर हैं और धान की बुआई के लिए घर चले जाते हैं.
अशोक जी ने फेसबुक पर ज़िक्र करने से रोका था हमें, लेकिन उनसे क्षमा मांग कर आग्रह करते हैं कि यह वक़्त अपने संग-साथ को साझा करने का है, छिपाने का नहीं. उन्होंने फ़ासीवादी और साम्प्रदायिक ताकतों के ख़िलाफ़ पहले भी जो राजनैतिक स्टैंड लिए हैं, किसी से छिपे नहीं हैं. इस वक़्त भी एक हाथ को पता होना चाहिए दूसरा क्या साझा कर रहा है क्योंकि यह कोई दान नहीं है ... हम सबने अपनी सुख-सुविधाएँ सोना और तरुण जैसे लोगों के दम पर ही जुटाई हैं. तभी तो चहों ओर नागरिक समाज में इतना ममत्व उमड़ आया है कि बच्चे तक अपनी गुल्लकों को तोड़ अपनी चिल्लर से मानो कोई ऋण उतारने की कोशिश कर रहे हों..
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कल के दिन (जी, रेल हादसे के ही दिन) अशोक वाजपेयी ने छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले के एक परिवार के खाते में एक सम्मानजनक राशि ट्रान्सफर की है ताकि यह परिवार जिसमे कुल नौ लोग हैं घर लौटकर अगले दो माह की गुज़र कर सकें, और अपने घर की मुरम्मत का खर्चा भी वहन कर सके. अशोक जी को जो क़रीब से जानते हैं (मैं स्वयं उन खुशनसीबों में से नहीं हूँ) वे बताते हैं कि वे बड़ी से बड़ी मदद की भनक भी किसी को नहीं लगने देते, इतना सूक्ष्म होता है किसी के दुःख-दर्द में उनका साथ हो लेना, वह मित्र हो या अमित्र.
आप अगर ऐसा करना चाहें तो ज़रूरी नहीं आप हमारे सम्पर्क में आये श्रमिक परिवारों के साथ हो लें. आप कहीं से भी शुरुआत कर सकते हैं, और जितने परिवारों के साथ होना चाहें हो सकते हैं. हमसे जुड़े परिवारों के साथ होना चाहें तो हम उन ख़ाली हो चुके खातों के विवरण आपको भेज सकते हैं. आप अगर स्वयं किसी परिवार को चुनकर ऐसी पहल करते हैं तो हमसे साझा ज़रूर कीजिए. इससे बहुत मदद मिलेगी हमें, मनोबल बढेगा और देश-देहात के चूल्हे-चौंके ठप्प नहीं हो जाएँगे. आप सब मित्रों को कवि मानकर ही यह पोस्ट लिखी जा रही है.


नोट: यह सिलसिला 15 जुलाई तक इसी तरह चलता रहा है।


तेजी ग्रोवर
 

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