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बाल कविताएं

धूप तौलिया

क्या वर्षा पर्वत की माँ है
क्या वह
माँ पूरी धरती की
क्या वह सागर की भी
माँ है
क्या वह
माँ पेड-पौधों की
देख न
माँ जैसे तू मुझको
प्यार प्यार से नहलाती है
वैसे ही तो
माँ वर्षा भी
इन सबको
हाँ नहलाती है
पर
माँ इनके पास तौलिया
नहीं न फिर ये कैसे पोंछें
धूप तौलिया भी तो है ना
बस उससे ही ये सब पोंछें

- दिविक रमेश
मई
15, 2001

 

   


 

अगर
पेड भी
चलते होते

अगर पेड भी चलते होते
कितने मजे हमारे होते
बांध तने में उसके रस्सी
चाहे ज
हाँ कहीं ले जाते

जहाँ कहीं भी धूप सताती
उसके नीचे झट सुस्ताते
जहाँ कहीं वर्षा हो जाती
उसके नीचे हम छिप जाते

लगती भूख यदि अचानक
तोड मधुर फल उसके खाते
आती कीचड-बाढ क़हीं तो
झट उसके उपर चढ ज़ाते

अगर पेड भी चलते होते
कितने मजे हमारे होते

  

- दिविक रमेश
मई
15, 2001

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