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यात्रा वृत्तान्त
नांगखिलैम के जंगल में

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जग्ध्वाऽरेण्येष्वधिकसुरभिं गन्धमाध्राय चोर्व्याः।।

सारंगास्ते जललवमुचः सूर्यायष्यन्तिमार्गम्।।

कालिदास -मेघदूत

वर्षा प्रारम्भ होते ही अधपके हरे पीले कदम्ब के फूलों पर भौंरे मँडराने लगते हैं, कछारों में नई फूटी हुई कदली की कोपलों को चरते हुए हरिण और जंगल की धरती की तीखी सुगन्ध को सूंघते हुए हाथी, मेघ को उसके मार्ग की जानकारी देते हैं

लगभग सौ वर्ष पूर्व, मेघालय को एशिया का वानस्पतिक समृध्दतम क्षेत्र माना जाता था और अब, संभवतया, बहुत सी विलक्षण जातियों की वनस्पति लुप्त हो जाने के बाद और बहुत सी विलक्षण जातियों के अस्तित्व को खतरे में लाने के बाद, वह क्षेत्र उस ऊंची स्थिति से गिरकर 'संकट ग्रस्त' क्षेत्र में आ गया है लौह खनिज तथा कोयला खादानों का दोहन और झूम की खेती (जंगल जलाकर प्रतिवर्ष नए स्थान पर खेती करना) सौ वर्ष पहले भी होती थी और आज तक हो रही है अंतर यह है कि पहले जंगल के एक टुकडे पर खेती करने के बाद, दुबारा उस पर खेती करने की बारी लगभग 25-30 वर्ष बाद आती थी तो अब 3-4 वर्ष, बाद आ जाती है उन 25-30 वर्षों में वे जंगल के टुकडे पूर्व रूप से पुनर्जीवित और जीवन्त हो जाते थे और पूरे जंगल का थोडा हिस्सा ही खेती में लगता था अब जंगल का अधिकांश खेती में लगा है और जंगल तो बचा सा ही नहीं है मेघालय के ऊपर उडते समय कितनी बार देखा है कि सारी पहाडियों के जंगलों को जैसे काटकर नंगा कर दिया हो जंगलों के नाम पर अधिकतर केले और बाँस के जंगल नजर आते हैं और चावल, मक्का तथा आलू मुली के खेत

इस बन की क्षति का सबसे बडा कारण तो आबादी का बढना है झूम शैली की खेती में, यदि 25 वर्षोपरान्त ही दूबारा उस टुकडे पर खेती करना हो तो मेरी गणना से, बमुश्किल एक प्रतिवर्ग किमी क्षेत्र में एक छोटा परिवार ही गुजरबसर कर सकता है अर्थात झूम शैली के लिए आबादी का बिरल होना नितान्त आवश्यक है जबकि लगभग 22,000 वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले मेघालय की आबादी लगभग 13 लाख (1981) है इस वृहत आबादी और झूमशैली की खेती का सहअस्तित्व असंभव है और यदि मेघालय को बचाना है तो न केवल सरकार को वरन सभी नागरिकों को, विशेषकर बुध्दिजीवियों को युध्दस्तर पर कार्य करना पडेग़ा पूरी निष्ठा और समर्पण से यदि हम झूम खेती नहीं रोक पाए (प्रति परिवार प्रतिवर्ग किमी की दर तक) तब जैसा कि चेरापूंजी में प्रतिवर्ष शीतकाल में पानी का अकाल पडता है, वैसा सारे मेघालय में पडेग़ा मुझे अपनी एक कविता, इस प्रसंग में याद आ रही है _

अनंत का अंत

हिन्दुस्तान में
संख्याओं का विस्फोट
चुपचाप
घुएं और धूल के बादलों से
सूरज को
ढँक रहा है
सारा का सारा आकाश
अँधेरे में
झिलमिल लैम्पों से
सजाकर अपनी दुकान
जंगलों के जंगल
नदियां और झील
और कल के वायुमण्डल
बेच रहा है

कल के लगे हुए दरख्तों की
इस सौदेबाजी में
कल के लिए
कोई बीज नहीं लगा रहा है
आज तो अनंत भी
क्षण का
मुंह ताक रहा है
हिन्दुस्तान का भ्रष्ट व्याकरण
कल को काल में बदल रहा है

सौ वर्ष पूर्व मेघालय में बिरली आबादी के साथ एक और महत्त्वपूर्ण परंपरा थी जिसके फलस्वरूप झूमशैली के बावजूद मेघालय वनस्पति समृध्दि में एशिया में अग्रणी था जब झूम शैली हो तब कुछ जंगलों को अछूता छोडना अत्यावश्यक हो जाता है क्योंकि जंगलों के भी पुरातन संस्कार होते हैं, ऐतिहासिक परम्पराएं होती हैं और तभी वे समृध्द तथा जीवन्त रहते हैं मेघालय में 'पावन वनों' की लगभग 5000 वर्ष पुरानी परम्परा है वैसे तो सारे भारत में मंदिरों तथा तीर्थ स्थानों के आसपास, यदि जंगल नहीं तो, बट वृक्ष तथा पीपल आदि के वृक्षों को पूजित मानने की परम्परा है महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट में भी पावन वन हैं किंतु मेघालय में यह परम्परा अधिक जीवन्त रही है उन्होंने पावन वनों को पाँच श्रेणियों में बाँटा था सबसे ऊंची श्रेणी को वे कहते हैं 'की लाव लिंग्डो' लाव या ख्लाव का अर्थ होता है जंगल तथा लिंग्डो का अर्थ होता है पुजारी अर्थात ये वन एक पुजारी के पूर्ण रूप से अधीन रहते हैं ऌन वनों की किसी भी उपज लकडी अथवा फल, का उपयोग निषेध है, ये वन पूर्णतया वनदेवता को समर्पित माने जाते हैं

शिलांग के पास ही एक पावन वन इस श्रेणी का है - माव फ्लांग इसका क्षेत्रफल मात्र लगभग तीन वर्ग किमी है इसमें घूमने के लिए न केवल वन विभाग की अनुमति लेना पडी वरन मावफ्लांग ग्राम परिषद की भी अब पुजारियों की शक्ति परिषदों ने ले ली है उस दिन आकाश स्वच्छ था और सूर्य की प्रखर किरणें, उस शीतकालीन दिन, अपनी उष्णता से हमें सहला रही थीं मावफ्लांग समुद्रतल से लगभग 4500 फुट की ऊंचाई पर है जंगल के बाहर कोई मेला सा लगा था और फुटबाल मैच हो रहे थे जमीन सूखी थी

ज्योंही हम लोग जंगल के पास पहुंचे तब दलदलों के चक्कर लगाकर उनसे कतराना पडा जंगल में प्रवेश करते ही एकदम अंधेरा, उमस और शतिलता बढ ग़ई अधिकांश वृक्षों को वन देवता ने विभिन्न आर्किड पुष्पों से सजाया था जंगल के अन्दर कोई पगडण्डी भी न थी हम लोग बस आर्किडों द्वारा प्रेरित होकर याहच्छिक रूप से घूम रहे थे कई स्थानों पर झाड ग़िरे पडे थे, उन पर काई, कुछ किस्म की 'फर्न' (पुष्पहीन पौधे), कुछ परजीवी और कुछ पराश्रयी पौधे पनप रहे थे सम्हलकर चलना पड रहा था उस मध्दिम प्रकाश में यदि गलती से किसी लता को उसके प्रेमी वृक्ष के प्रेमपाश से छिटक दिया तब वह शरीर को खंरोच देती शिलांग में पाए जाने वाले (मात्र 15-20 किमी दूर) अधिकांश वृक्ष - खासी चाड - यहाँनजर नहीं आ रहे थे। यहाँउष्ण कटिबंधीय चौडे पत्ते वाले, विशाल वृक्षों की अधिकता थी

जगह जगह लगी काई और फँफूंद वन के निर्वाध स्वतंत्र होने का - पावन होने का जैसे 'पोस्टरों' द्वारा प्रचार कर रही थी उनसे अधिक उद्धोषणा कर रहे थे असंख्य कीट - जैसे कि बच्चे शाला में छुट्टी के समय अपने आनंदमय जीवन की अथवा अरूणोदय के समय पक्षी अपने कलरव से करते रहते हैं। हाँ पक्षी वहाँबिरले ही नजर आ रहे थे मेघालय में पक्षियों के दर्शन थोडा कठिनाई से ही होते हैं सम्भवतया दोपहर के तीन चार बजे पक्षियों की अपने कार्य से छुट्टी न हुई हो, वरना इस सुरक्षित जंगल में तो पक्षियों का होना आवश्यक था जंगलों में आबादी का घनत्व जब एक छोटा परिवार प्रति वर्ग किमी हो तब यदि किशोर लडक़े पक्षियों का शिकार करें तब पक्षियों की आबादी उस नुकसान को सहन कर सकेगी किन्तु जब आबादी 60 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी हो तब तो पक्षियों का अस्तित्व बहुत कठिन है पक्षियों का शिकार पूर्वांचल की लगभग सभी पहाडियों पर प्रचलित है जो आज के घनी आबादी के जमाने में पर्यावरण को बहुत नुकसान पँहुचाता है

मावफ्लांग की गंध जैसे आदिम गंघ हो, मेरी नाक में आज भी ताजी है वह गंध, पेड, फ़ूल, पत्तों, सडाँद, काई, फँफूंद, कीडों आदि सबसे मिलकर बनी आदिम वन की गंध थी बतलाया गया था कि यद्यपि मावफ्लांग में साँप विशेषकर वृक्ष-सर्प बहुत हैं, किन्तु शीतकाल में वे सब धरतीमाता की गोद में सोते हैं, इसलिए डरने की आवश्यकता नहीं है माव फ्लाँग का क्षेत्र वैसे तो चट्टानी है किन्तु सब तरफ खूब हरियाली है मावफ्लांग का खासी भाषा में अर्थ होता है 'पत्थर घास' सोचा था कि नाम 'माव लाव' अर्थात पत्थर-जंगल होना चाहिए था किन्तु घूमने के बाद लगा कि मावफ्लांग भी सटीक है क्योंकि वह जगह जहां पत्थर पर भी घास हो जाए मावफ्लांग कहलाएगी

पावन वनों की दूसरी श्रेणी है 'की लाव किंटांग' जिसका अर्थ है पावन वन इन वनों में धार्मिक कृत्यों तथा धार्मिक बलिदानों की अनुमति रहती है'मावस्माई' पावन वन दूसरी श्रेणी के वन का एक उदाहरण है जो कि चेरापूंजी के लगभग पाँच किमी उत्तर की ओर एक गाँव है और इसका क्षेत्रफल लगभग दस वर्ग किमी है

पावन वनों की तीसरी श्रेणी है 'की लाव नियम' खासी भाषा में नियम का अर्थ धार्मिक नियम है अर्थात धार्मिक कार्यों के लिए इन वनों की उपज का उपयोग हो सकता है चौथी श्रेणी है 'की लाव एडांग' जिसका अर्थ है 'वन कानून', अर्थात कानून के अनुसार, वन को क्षति पँहुचाए बिना, उसका उपयोग कर सकते हैं, पाँचवी श्रेणी है 'की लाव श्नांग' जिसका अर्थ है वनस्थली इन वनों को बिना नुकसान पँहुचाए, वन की उपज का उपभोग गाँव के नियमों के अनुसार किया जा सकता है

इस तरह हम देखते हैं कि एक तरफ सामाजिक आवश्यकताओं का ध्यान रखा गया है और दूसरी तरफ पर्यावरण की सुरक्षा का इस सब नियमों को धार्मिक सांस्कृतिक रूप देने से उनके पालन में एक स्वाभाविकता आ जाती है, अनुशासन अपने आप आ जाता है, शासन अथवा पुजारी का दबाव मात्र कुछ उच्छृंखल लोगों के लिए ही आवश्यक होता है समाज और प्रकृति का सहअस्तित्व स्वाभाविक हो जाता है और जब तक यूरोपीय धर्म प्रचारक मेघालय नहीं पहुंचे थे खासी अपने सांस्कृतिक नियमों और परंपराओं के आधार पर प्रकृति के साथ एकरस जीवन व्यतीत कर रहे थे मिशनरियों ने अपने धर्म को ऊंचा सिध्द करने के लिए खासी मान्यताओं पर आक्रमण किए उन्होंने कहा कि वन कैसे पावन हो सकते हैं? उनमें वृक्षों को काटने से भगवान कैसे गुस्सा हो सकते हैं, कोई वन-देवता है ही नहीं और उन्होंने कुछ पावन वनों में घुसकर वृक्षों को काटा और दिखलाया कि वनदेवता उनको कोई भी दण्ड नहीं दे सके इस तरह खासी विश्वासों और मान्यताओं को निराधार तथा व्यर्थ सिध्द करना शुरु करके, इसाई धर्म का प्रचार किया गया तब भी उन धार्मिक प्रचारकों को बहुत कठिनाइयां उठाना पडीं क़िन्तु अन्ततः शासन का वरद हस्त रहने से और मेघालय की सारी शिक्षा उनके हाथ में रहने से उन्हें खासी संस्कृति को कमजोर करने से सफलता मिल ही गई उसके अन्य अच्छे परिणाम जो हुए हों से हुए हों, किन्तु एशिया के समृध्दतम वनों के स्थान से वे वन संकटग्रस्त वन की स्थिति में आ गए और सहस्त्रों वर्ष पुरातन खासी संस्कृति भी

भारतवर्ष में मात्र कानून बनाने से कार्यों में सफलता मिलना बहुत मुश्किल है उस अवधारणा को या कानून को सांस्कृतिक मान्यता मिलने से ही उसकी सफलता हो सकती है अब चूंकि पढने लिखने वालों की संख्या बढती जा रही है इसलिए किसी भी उद्देश्य की अवधारणा को, उसके कारण-परिणाम को समझना भी आवश्यक हो गया है सेंग खासी संस्था मेघालय में इस तरह के कार्य बडी लगन से कर रही है

मैं मेघालय के एक वन में, जो कि अपेक्षाकृत कम नष्ट हुआ है और अब अभयारण्य घोषित कर दिया गया है, भी घूमने गया नांगखिलैम शिलांग से कोई 80 किमी उत्तर में शिलांग-गोहाटी मार्ग में उमलिंग से 20 किमी हटकर है वन विश्रामगृह हम लोग दोपहर को पहूँच गए थे4 बजे जंगल घूमने निकल पडे उमटूनदी में अच्छा पानी था जबकि वह जून का महीना था और वर्षा ॠतु प्रारंभिक अवस्था में ही थी मेघालय के प्रमुख वन संरक्षक ने आगाह कर दिया था कि उस क्षेत्र में हाथी अभी भी बहुत हैं खासी लोग हाथियों को अपनी पूज्य शिलांग देवी के दूत मानते हैं, इसलिए प्रयत्न करते हैं कि उन्हें हाथियों को न मारना पडे क़िन्तु आधुनिक संतति अब विकास के नाम पर उनके परंपरागत वनों में घुसकर गाँव बना रही है जिसके फलस्वरूप हाथियों ने गणेश जी के शांत गुणों को त्याग कर रौद्ररूप धारण कर लिया है वे हमेशा तो आक्रमण नहीं करते किन्तु उनसे बचकर रहने में बुध्दिमता है उन्होंने सलाह दी कि हम लोग विश्राम गृह से तीन-चार सौ मीटर से अधिक दूर न जाएं

हम लोग जंगल घूमने, नदी के किनारे किनारे पगडंडी पर निकल पडे विश्राम गृह के वृक्षों पर ही आर्किड खिल रहे थे वैसे शिलांग-गुहाटी मार्ग को छोडक़र जब हम लोग वन की तरफ चले थे, तब रास्ते भर अनेक वृक्ष अपने आश्रित नीलरुण 'ऐयराइडीज मल्टी फ्लोरम' आर्किडों की सुन्दरता का अपनी उपलब्धि के समान प्रदर्शन कर रहे थे कि जैसे उन्होंने इन सुन्दर मनहर आर्किडों का पालन पोषण किया हो जब कि बिचारे आर्किडों ने उनकी सशक्त काली दरदरी पीढों पर मात्र अपनी जडें टिकाई थीं लगता है कि समस्त वन जून माह को 'ऐयराइडीज मल्टीफ्लोरम' माह के उत्सव रूप में मनाता है विश्रामगृह में 'सीलोजाइन पंक्टयुलाटा' आर्किड ने दर्शन दिए तो उनका जून उत्सव में यह सहयोग आकर्षक लगा इनका रंग भी नीलारूण था मैंने कहीं पढा था कि नीलारुण रंग सामान्य लोगों का मनपसन्द रंग नहीं है, वह विशिष्ट लोगों को ही पसंद होता है यद्यपि मानव के किसी भी कार्य को इतनी सरलता से श्रेणियों में बा/टने पर मेरा विश्वास नहीं है, किन्तु इन निराले आर्किडों पर वह अवलोकन शतप्रतिशत घटित हो रहा था

हमलोग थे तो मेघालय में ही, किन्तु यहाँपक्षियों का कलरव, उमटू नदी के किशोरावस्था-पार के प्रणय गान में, वृन्दगान की तरह सम्मिलित हो रहा था जब कि आमतौर पर नदी का छलछल तथा कीटों के तार स्वरों के वृन्दगान में पक्षियों के एकल या जुगल गान प्रमुख रहते हैं किन्तु इस समय नदी की चढती युवावस्था 'पक्षी-कंचेर्टो' के स्थान पर इस समय 'उमडती नदी-कंचेर्टो' प्रस्तुत किया जा रहा था

मैं वनदेवी द्वारा प्रस्तुत संगीत का आनन्द ले रहा था कि देखा एक नीला पक्षी पास के वृक्ष से उडक़र नदी पार कर रहा था नीलकंठ के दर्शन, दशहरा तो क्या, हमेशा ही शुभ मानता हूँ। वैसे नीलकंठ का सही नाम नीलपंख होना चाहिए क्योंकि उसके पंख नीले तथा गर्दन हल्की गुलाबी होती है परन्तु भारतीय संस्कृति तो जीव जीव में परमात्मा का अंश देखती है एक वृक्ष से एक भुजंगा उडा और उसने एक सुनहले पक्षी पर झपट्टा मारा किन्तु यह सुनहली चिडिया दिल्ली की सामान्य लडक़ी सी न थी जो कि झपट्टे से हाथ मारकर अपना हार चुराने वाले से हार न बचा पाए इस पीलक ने भी पैंतरा बदला और चिल्लाया, ''क्या मुझे कोई उडने वाला कीट समझ रखा है जो यूं ही पकड लोगे माना कि तुम तीरन्दाज हो किन्तु कीडों के लिए तो जाओ उन्हें पकडो।'' अपने की सरकसी समझने वाले ड्रांगो को भी समझ में आ गया और वे महाशय चुपचाप दूसरे तरफ तेजी से उड ग़ए मैंने गौर किया कि इस पीलक ने, सुनहरे पीलक के समान अपनी सारी सुनहरी देह का घमंड न कर, अपने सिर पर काला घूँघट डाल लिया था - 'कृष्ण सिर पीलक' थी यह साहसी चिडिया वैसे मैंने भुजंगे की मस्त चपल उडान का आनन्द अक्सर उठाया है किन्तु किसी चिडिया उस पर झपट्टे मारते पहले बार ही देखा है जब माहौल खराब हो तब साधारण राहगीर भी चोर-उचक्के बन जाते हैं

थोडा आगे जाने पर ही, नदी के पार से एक जोडी ऌस पार सागौन के वृक्ष पर आकर बैठी वह कृष्ण-गर्दन कठफोडवा की जोडी थी उसी के पास एक वृक्ष में पक्षी बारातियों की तरह (या कहूँ दूल्हे की तरह) सजधजकर इस शाख से उस शाख उडक़र धूम मचा रहे थे वह वृक्ष बेर से भी छोटे (मके के दाने के बराबर) नारंगी और लाल लाल गोल फलों के गुच्छों से लदा था, मानो जनवासे में बारातियों के लिए स्वागत व्यवस्था की गई थी नारंगी रंग पकने पर लाल हो गया था, किन्तु ये बाराती इतने भुखमरे थे कि इन्होंने कच्चे पके का कोई भेद नहीं किया इन्होंने चोंच पर लाल लिपस्टिक, पैरों में लाल माहुर, नयन रतनारे कितनी सजधज की थी और इनके साथ में बिलकुल बिना मेकअप किए हुए उनके समान एक अंगुष्ठ बडी चिडिया भी थीं पक्षियों के संसार में तो नर खूब मेक-अप करके बनठन के रहता है और मादा अधिकतर शांत हल्के रां पसन्द करती है मुझे लगता है कि शायद आज भारत की कानून व्यवस्था को देखते हुए, भारतीय नारियां भी अक्सर आभूषणहीन निकलना ही पसन्द करती हैं खैर, ये आकर्षक और अति चपल पक्षी थे 'पीलीदुम फूल चुही'

हम लोग, इस तरह विश्राम गृह से लगभग चार-पाँच सौ मीटर आ गए होंगे और देखा कि पगडंडी पर ही हाथी की लीद पडी थी, और शायद एक दिन पुरानी और हम लोगों को प्रमुख वन संरक्षक द्वारा दी गई चेतावनी याद आ गई मेरी पत्नी ने सलाह दी कि अब आगे जाना खतरे से भरा है इसलिए वापिस लौटना चाहिए किन्तु मेरी इच्छा और वन के भीतर जाने की थी, उसी तरह मेरी बिटीया की और मेरे मित्र की भी तब पत्नी ने कहा कि हाथी सामने पडने पर वे तो भाग भी न सकेंगी और यदि हम लोगों को उनकी सही सलाह नहीं मानना है तो वे वापिस जाएंगी और वापिस चली गईं

हम लोग आगे चले मैंने गीता से पूछा कि हाथी आ जाएगा तो हम लोग उस मोटे भारी भरकम जानवर से तो तेज ही भाग सकेंगे इसलिए डरने की इतनी बात तो नहीं है गीता वन्य जीवन संस्थान में 'वन्यजीवन' विषय में एमएससी पढ रही थी उसने बतलाया, ''जब हाथी गुस्से में पीछा करता है तब आदमियों से तेज भागकर उन्हें मसल देता है इसलिए डरने की बात तो है किन्तु हम लोग यदि सावधानी पूर्वक अपने आँख और कान खोलकर चलें तो दूर से ही उनकी उपस्थिति का पता कर सकते हैं और भी, हाथी शेर की तरह दबे पाँव चलने वाला जानवर नहीं है, इसलिए ध्यान रखने पर उनके हल्ले से उनकी स्थिति पता लग जाती है''

अब डर लगा अब मैं चौकन्ना हो गया देखा बाएं तरफ छोटी सी पहाडी थी और उस पर घने जंगल पगडंडी भी शायद उस पहाडी क़ो काटकर बनाई गई थी मैंने गीता से कहा, ''बाईं तरफ दस बारह फुट की सीधी कटाई है, इसलिए बाईं तरफ से तो कोई खतरा नहीं होना चाहिए'' उसने जवाब दिया''हाथी के लिए यह ऊंचाई चढना मुश्किल होगी, किन्तु उतरना कोई मुश्किल नहीं और आम तौर से यह उसके पथ में नहीं होगा किन्तु गुस्से वाला हाथी आसानी से उतरकर हमला कर सकता है मैंने कहा कि दाहिने तरफ नदी है और हमारे तथा नदी के बीच में छोटा सा जंगल है इस पर तथा सामने ज्यादा ध्यान रखेंगे और बाएं तरफ भी डर भी लग रहा था और आगे जाने की भी इच्छा तीव्र थी जंगल में पता लगा कि आंखों के साथ ज्ञानेनद्रिय कर्ण का भी कितना महत्त्व है मैंने ध्यान से सुना एक तो सिकाडा (कीटों की आवाज क़ा कोरस चल रहा था, दूसरे, नदी की कलकल ध्वनि, नदी दूर होने से थोडी मन्द हो गई थी कुछ पक्षी चहचहा रहे थे, बाकी सन्नाटा था, वरन हमारे हृदय की धक धक भी सुनाई दे रही थी आगे सामने थोडी दूर पर एक पगडंडी बाएं से आकर दाहिने तरफ जा रही थी हम लोग रुक गए पगडंडी के वृक्षों की दशा देखकर गीता ने कहा यह तो हाथियों की पगडंडी है और ध्यान से आवाजें सुनी कोई खडक़ा नहीं कोई खटका नहीं। झाडों में भी कहीं कोई हिलता डुलता नजर नहीं आ रहा था पक्षी भी सामान्य रूप से चहचहा रहे थे, उनकी ध्वनी में कोई नई सी, कोई चेतावनी से आवाज नहीं हम लोग आगे बढे

यह भी एक विभिन्न अनुभव था क्या भरोसा था कि हमें हाथी देखने मिल ही जाएंगे, जैसे हम 'डर' या 'भय' की अनुभूति के लिए ही वन में चल रहे थे मुझे काजीरंगा का तारा घास (हाथी घास) के भीतर, गैंडे क़े क्षेत्र में, भटकने वाला अनुभव याद हो आया किन्तु उस समय हमारे साथ वन रक्षक वह ताराघास के 'अन्धकार' में डूबे हुए भटकने का भय से साक्षात्कार भी अच्छा ही लगा था फिर मेरे आँख और कान वापिस नांगखिलैम के जंगल में एकाग्र होकर लग गए इस एकाग्रता का साक्षात्कार भी नया अनुभव था जैसे सारा शरीर इंद्रियां मन और प्राण एकदम चेतनमय हो गए थे, और सब एक ही ध्येय से तन्मयता पूर्वक काम कर रहे थे हृदय की धडक़न सामान्य से कुछ अधिक थी

हस्ती राजमार्ग से हम लोग काफी आगे आ गए थे कि अचानक सिकाडा झींगुरों ने अपना संगीत बन्द कर दिया, अन्य झींगुरों का कोरस अब अधिक स्पष्ट सुनाई देने लगा था, नदी की वही मन्द कलकल, पंछियों का बीच बीच में चहचहाना, बस आबाज क़ी दुनिया में और काई परिवर्तन नहीं। आंखों को भी कोई खतरनाक संकेत नहींकुछ जंगली फूल दिख रहे थे, उनमें से एक तो रक्त से भी अधिक लाल था उसका फोटो लेने के लिए नदी की तरफ थोडा नीचे उतरना पडा, जहां वह खिला था बस अब मेरे कैमरे की तिपाई के खुलने और बन्द होने वाली धातु की तेजधार सी आवाज हुई और हम लोग फिर आगे बढे ग़ीता पक्षियों पर अधिक ध्यान दे रही थी

अब गौर किया की आवाजें, यद्यपि कोई खडक़ा या खटका नहीं हो रहा था तब भी एकरस नहीं होतीं पक्षियों की बदलती चहचहाहट के साथ झींगुरों के कोरस में भी उतार चढाव होते हैं कि अचानक पत्ते खडक़ने की आवाज आई। हम सब रुक गए वही जंगल का वाद्यवृन्द किन्तु जानवर के चलने से खडख़डाहट दुबारा नहीं आई हम लोग ध्यान से सुन रहे थे, धडक़न थोडा और बढ गई थी जंगल पर सारा ध्यान इतना एकाग्र था कि इस समय मुझे अपने मस्तिष्क के भीतर उद्भूत हो रहे नाद की आवाज अा गई, जैसी कि ध्यान करते समय शुरू में आती है थोडी देर जंगल का वाद्यवृन्द सुनने के बाद जब उसमें 'चैल्लो' (बहुत बडा वायलिन सदृश वाद्य) तथा 'डबल बेस' (चैल्लो से भी बडा, लगभग आदमकद वायलिन सदृश वाद्य) सरीखी आवाज नहीं आई तब हम लोग आगे चले (मुझे याद आ गया था, बर्लियोज क़ी 'सिम्फनी फैंतास्तीक' का एक 'मूवमेन्ट' जिसमें सांगीतिक संरचना में जहां तक मुझे याद है, 'चैल्लो' तथा 'डबल बेस' द्वारा हाथियों के चलने कार् मूत्त रूप दिया गया है

अभी सूर्यास्त तो नहीं हो रहा था किन्तु घने जंगल में ज्योंही सूरज थोडा सा क्षितिज की तरफ झुका कि अधेरा पुनः अपना राज्य स्थापित करने के लिए अपने गुप्तचर भेज देता है ये गुप्तचर पक्षियों को घोंसलों में वापिस भेजकर उन्हें चुप करा देते हैं कुछ नए किसम के (वृक्ष पर) झींगुर बोलने लगते हैं और पहले वाले चुप हो जाते हैं सामने वृक्ष पर एक गप्तचर ने 'घू घू' का उद्धोष किया हम लोगों ने भी संदेश समझा और वापिस चल दिए, किन्तु उसी सतर्कता के साथ हम लोग कुछ वैसे ही शांत और चुपचाप चल रहे थे जैसे कि छुटपन में मंदिर में पिताजी के डर से चुपचाप चलते थे मैं भावनाओं के विचित्र मिश्रण में घूम रहा था : साहस, उद्यम, भय, आनन्द के साथ उत्साह, किन्तु कोई दुष्चिन्ता नहीं हाथी के अचानक सामने पडने का भय तो था किन्तु ऐसा भी लग रहा था कि हम भागकर बच जाएंगे यह आदिम गंधभय वातावरण ललकार रहा था और मैं मनुष्य होकर उसे कैसे न स्वीकारता यह ठीक है कि मेरी संवेदनाए आदिम मनुष्य सी पैनी न होकर नागरी जीवन में रहकर कुछ भोंथरी हो गई थीं किन्तु एक तो यह वातावरण इतना खतरनाक भी नहीं था दूसरे मेरी संवेदनशीलता पैनी भी हो रही थी

जब लौटकर विश्राम गृह के पास पहुंचे तब हम लोग बडे ख़ुश थे वन में हाथी या हरिण या हुलॉक (भारत में पाया जाने वाला मात्र वन-मानुष या पुच्छहीन बानर) कुछ भी देखने नहीं मिले थे, हां जंगल, पक्षी, नदी, फूल ये खूब देखे थे - और एक अकथनीय आनन्द 'जंगल' को अनुभव करने को मिला था उस अनुभव में मैं संभवतया कोई पाँच हजार वर्ष पहले चला गया था कितना चेतनमय जीवन, प्रकृति से एकरस, अपनी शक्ति की ऊंचाई और निचाई का अनुभव!

वन के बाहर खुले में आते ही देखा कि सूर्यास्त के लिए अभी समय था, उमटू का जल कई हजार वर्षों पूर्व सा सूर्य की कोमल अरुण किरणों के साथ खेल रहा था देखा कि नदी के बीच कुछ चट्टानें जैसे उसके तीव्र प्रवाह को ललकारते हुए खडी थीं हम लोग भी थोडी देर में वहाँपहुंचगए और सोचा कि सूर्यास्त का आनन्द लिया जाए किन्तु थोडी ही देर में देखा कि हम लोगों पर जोंकों ने हमलाकर दिया था हम लोग चट्टान से क्षमा माँगते हुए जोंकों की ललकार से डरकर भाग खडे हुए

इन्हीं वनराज शेरों, जंगलों के पटवारी हाथियों के दर्शनार्थ मैंने कितनी रातें जंगलों में घूम घूम कर काटी हैं और कितने कम दर्शन इन राजा महाराजों ने पर कितना कुछ सुन्दर अन्य देखने को मिला है कि मैं अभी भी कितनी ही रातें उसी तरह घूमने के लिए तैय्यार रहता हूं याद आती है स्वीडी कवियित्री मारिया वीने की कविता : खोजती हूँ ग़ुलाब/पाती हूँ बर्फ/ खोजती हूँ बर्फ / पाती हूं/ गुलाब / जब कुछ भी नहीं खोजती हूँ/ पाती हूँ दोनों / गुलाब और बर्फ अब मैं सोच रहा हूँ हाथी और शेर दोनों की खोज बन्द कर दू/, तब दोनों मिल जाएंगे भाई वाह ! क्या पते की बात कही है मारिया वीने ने बजाय खोजने के जीवन को ईमानदारी से जिओ, गुलाब और बर्फ, शेर और हाथी सब मिलेंगे टूरिस्टों सरीखे खोजने से नहीं मिलेंगे गुलाब, बर्फ, शेर और हाथी !!

सूर्योदय और सुर्यास्त, विशेषकर वर्षाकालीन मेघों से अर्ध आच्छादित आकाश में होने वाले, मुझे बहुत आनन्द देते हैं केवल इसी सूर्यास्त के आनन्द से हम जोंकों द्वारा वंचित नहीं किए गए थे नोन तेल लकडी क़ी जोंकों ने जीवन के न जाने कितने सूर्योदयों और सूर्यास्त से वंचित किया है संभवतया इसीलिए, जब कोई सुन्दर मनहर सूर्योदय और सूर्यास्त से साक्षात्कार हो जाता है तब अकथनीय आनन्द मिलता है शिलांग चोटी के सूर्योदय सूर्यास्त तो प्रसिध्द हैं इस समय एक ऐसे ही सूर्यास्त की याद आ रही है

शिलांग चोटी जो खासियों की शिलांग देवी का आवास है, एक पावन वन भी है जो विशिष्ट वनस्पतियों में बहुत समृध्द है (था?) शिलांग चोटी पर एक सूर्योदय और सूर्यास्त विलोकन स्थल है जिसका नाम 'राकेशशर्मा स्थल' है यह नाम हमारे 'अंतरिक्ष मानव' के नाम पर रखा गया है जो मुझे सटीक लगा अधिकतर इस स्थल पर सूर्यास्त के समय भीड हो जाती है उस संध्या किसी कारण वश मैं अकेला उस अनिर्वचनीय आनन्द को लूट रहा था सूरज ने उस संध्या अपने घर लौटते समय अपना मुंह बादलों में नहीं छुपाया था, जब कि आसमान में बादल थे सूरज ने हमेशा की तरह उदारमना होकर, अपनी लाली सारे बादलों को बांट दी थी इस अनुराग को पाकर सारे बादल जैसे नृत्य कर रहे थे अरे ये बादल नृत्य क्या इसीलिए कर रहे हैं अथवा कोई और प्रेरणा है? फिर समझ में आया कि वे संध्या को लुभाने के लिए नृत्य कर रहे थे संध्या भी कितनी सजधज कर आई थी, और उसका मुख भी लाल हो गया था, सुन्दर रेशम के मलमली परिधान उसने पहन रखे थे जो उसकी सुन्दरता और बढा रहे थे

सन्धया को अपनी दिशा में आते देख, बादल मोर जैसे पंख थिरक थिरक कर नृत्य कर रहे थे वे नहीं जानते कि सन्धया उन जैसे मनचलों के पास नहीं जाएगी जो मात्र हवाओं में ही अपने प्रेमपत्र लिखते हैं किन्तु वे पूरे उत्साह और उमंग से थिरके जा रहे थे जब देखा कि संध्या उनके पास नहीं रूकी और आगे चली गई तब उनका अरुणिम मुख म्लान होकर थोडा साँवला पड ग़या था संध्या चलती जा रही थी, अब बढते अंधकार के कारण उसने एक दीपक जला लिया था और उसे हवा से बचाने के लिए उसने हाथ की ओट दे दी थी, कितना दीप्तिमान लग रहा था उसका हाथ, दीपक को ओट दिए वह दूर चलती जा रही थी, अब दीपक की ज्योति भी मन्द पड ग़ई थी, किन्तु वह अपने प्रेम के बल पर चलती जा रही थी और सूरज था, कि किसी झील की गोद में सो गया था

जब विश्राम गृह में लौटे तब जूते वगैरह खोलकर, आराम से बैठकर वन वाद्यवृन्द के पाार्श्वसंगीत के साथ चाय पीने का कार्यक्रम बनाया वन वाद्यवृन्द की प्रस्तुतियां समय के अनुसार बदलती रहती हैं सूर्यास्त के समय की पक्षियों की चहचहाहट अब समाप्त हो गई थी क्योंकि सूर्यास्त हुए लगभग आधा घंटा हो चुका था, वैसे भी घने जंगल के भीतर सूर्यास्त के बाद अंधेरा एकाएक आ जाता है उस अंधेरे के घनेपन को और गहरा कर देते हैं झींगुरों और भृंगों के तारसप्तक के स्वर उसी समय देखा कि उल्लुओं में होड लग गई कि कौन किसको कितने गौर से देखता है वैसे तो हमारे पास बायनाक्युलर थे जो हमारी दृष्टि को गिध्द दृष्टि की सी ताकत दे रहे थे, किन्तु बढते अंधेरे में, मुझे लगा कि हम लोग उनका मुकाबला नहीं कर पाएंगे, और हुआ ऐसा ही, हालांकि वे हम लोगों से बमुश्किल दस बारह मीटर ही होंगे

मुझे उल्लू दर्शन का एक और मौका याद आया धुंधलके का वक्त था, मैं कहीं जंगल से लौट रहा था कि देखा सामने पगडंडी पर मात्र पाँच सात मीटर दूर बैठा था मैं ऐसा सुनहला मौका देखकर एकदम रूक गया, और दोनों ने एक दूसरे को गौर से देखा कितना सतर्क, कितना आत्मविश्वास और निडर भूरे रंग में सफेद छींट, शरीर की तुलना में मुंह बहुत बडा - दो बडी बडी आँखें मेरा अवलोकन कर रही थीं फिर मुझे लगा कि जंगल है, आसपास देख तो लूं । मैंने बहुत ही धीरे धीरे अपना सिर घुमाकर पीछे की तरफ देखा, सब शान्त था, मैंने फिर धीरे धीरे सिर सामने की तरफ किया और देखा तो वह 'चुगद' जैसे अंतर्ध्यान हो गया हो मुझे उसके उडते समय, उसके पंखों की फरफराहट की आहट तक न आई पक्का शिकारी है, एक तो अँधेरे में भी निशाना लगा सकता है और दूसरे, उसके शिकार को उसके उडने की आहट भी न मिले, वरना चूहे जैसे चपल जीव कहाँ किसी की पकड में आने वाले, मगर उल्लू से नहीं बच पाते पता नहीं क्यों रात के इस प्रहरी को जो किसान के खेतों की चूहों और कीडों से रक्षा करता है, बोलचाल में, लोक संस्कृति में अशुभ माना जाता है संभवतया मात्र इसलिए कि यह रात में कार्यशील होता है, वृक्ष के कोटरों में या खण्डहरों में वास करता है तथा रात्रि में इसकी आवाज चौंका देती है इस जागरूक मित्र पक्षी को व्यर्थ ही बदनाम किया है वरन गीता के दूसरे अध्याय के उनसठवें श्लोक - 'या निशा सर्वभूतानामरस्यां जाग्रति संयमी यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्य्तो मुनेः।।' - के अनुसार इसे यदि मुनि की नहीं तो संयमी की उपाधि तो मिलना ही चाहिए

इस तरह सागौन के उस उल्लू को देखते देखते मैं जूते खोलना भूल गया था अब जब खोले तो मोजों को रक्तरंजित पाकर बडा आश्चर्य हुआ - तब देखा कि चार-पाँच मोटी ताजी जोंकें मस्त कुलाटी खाती हुई भाग रही थीं उन्हें जूते से मसल दिया - उन्होंने तुरन्त ही सारा रक्त उगल दिया मैंने समझा कि वे मर गईं किन्तु थोडी ही देर में देखा कि वे सिर पर पैर रखकर भाग रही थीं उन्हें कई बार मसलना पडा तब जाकर उनकी नमनीय देह नष्ट हुई जोंक में न केवल विकट चिपककर खून चूसने की शक्ति होती है, वरन अपने जीवन से भी वे उतनी ही उत्कटता से जुडी रहती हैं - बस देखने भर में नाजुक लगती हैं खैर, प्रकृति में सभी तरह के प्राणी होते हैं-छीने से निश्छल, बाघ से खूंख्वार तथा जोंक से विशुध्द परजीवी

दूसरे दिन हम लोगों ने एक स्थानीय आदमी को अपना प्रदर्शक बनाया वह तो सारे जंगल को इतनी अच्छी तरह जानता था जितनी अच्छी तरह वर्षों रहने के बाद भी में दिल्ली को नहीं जानता उससे कहा था कि हाथी देखने मिलना चाहिए और हुलाक पुच्छाहीन वानर हम लोग जंगल तो खूब घूमे, किन्तु न हाथी के दर्शन मिले और न हुलाक के मेघालय में लगभग दो हजार हाथी हैं, भारतवर्ष में सर्वाधिक, और क्यों न हों खासियों की देवी शिलांग के दूत माने जाते हैं ये हाथी इसलिए इन हाथियों को विशेष खतरा वन्य चोरों से नहीं है किन्तु बढती आबादी के कारण हाथियों के पारम्परिक क्षेत्रों में जब मानवों ने घुसपैठ करना शुरू कर दिया है तब आपस में टकराव स्वाभाविक है और इस मुश्किल को यदि हमने पैदा किया है तब इसका उचित हल भी हमें ही निकलना है वह हल उचित तब होगा जब हम यह मानकर चलें कि हाथियों को भी जीने का हक है

पुच्छहीन वानरों में भारत में मात्र हुलाक गिबन ही मिलता है और वह भी मात्र पूर्वांचल में हुलाक के दर्शन तो नहीं हुए किन्तु उसकी शक्तिशाली हूप सुननु अवश्य मिली हुलाक है तो मात्र एक मीटर ऊंचा किन्तु इसकी हूप घने जंगल को चीरती हुई लगभग दो किमी तक चली जाती है हम लोग एक बार इस आवाज के पीछे पीछे गए किन्तु वे मानवों से इतना डरते हैं या इतना शरमाते हैं कि वे हमसे दूर होते गए जंगलों के कम होने से हुलाक का अस्तित्व भी खतरे में है यह देखने में आ रहा है कि चार्ल्स डारविन के विकासवाद सिध्दान्त का प्रतिनिधित्व का सिध्दान्त अच्छी तरह परखा जा चुका है और वह हमेशा खरा उतरा है उसके सूक्ष्म विवरणों में कुछ उन्नति की जा सकी है किन्तु मूल सिध्दान्त के सही होने में किसी जैव वैज्ञानिक को संदेह नहीं है किन्तु मैं बात कर रहा हूँ उस सिध्दान्त के प्रसिध्द मुहावरे की - 'सरवाइवल आव द फिटैस्ट' इस मुहावरे का अर्थ कई लोग 'बलिष्ठतम की अतिजीविता' लगाते हैं और उदाहरण स्वरूप सिंह, शेर और हाथी का नाम लेते हैं यह अर्थ तो सरासर गलत है यदि सिंह और शेर अतिजीवी हैं इस मुहावरे का सीमित अर्थ एक ही जाति के अन्दर लगाने का प्रयत्न किया जा सकता है सिंहों के बीच एक सीमित वन-क्षेत्र में बलिष्ठतम सिंह ही बचेगा क्योंकि वह अपने से कमजोर सिंहों को द्वन्द्वयुध्द में या तो घायल कर देगा या उन्हें पलायन के लिए मजबूर कर देगा किन्तु इस सीमित उदाहरण से वह मुहावरा सीमित अर्थ में भी खरा नहीं उतरता क्योंकि सिंह्वनियों में अतिजीविता हेतु प्रतियोगिता नहीं होती, और एक सिंह्व की आठ दस सिह्वनियां होती हैं और भी ऐसे बहुत से जीव हैं जिनमें नरों में भी इस तरह की प्रतियोगिता नहीं होती-जंगली कुत्ते अपनी अतिजीविता अपने समूह की शक्ति द्वारा करते हैं, गैंडॉं में भी अधिकांशतः इस तरह की कोई प्रतियोगिता नहीं होती

कुछ लोग इस मुहावरे का अर्थ 'योग्यतम की जय' मानते हैं यह भी सीमित रूप से सही है'जय' के अर्थ में जो योग्यतम न हो वह भी जी सकता है किन्तु विजयी के रूप में नहीं, जैसे साँभर, चीतल आदि इसके अर्थ में 'योग्यतम' की परिभाषा समझना आवश्यक हो जाता है एक ही वन में शेर, तेंदुआ, हाथी, साँभर, चीतल, बारासिंगा, गौर, भेडिया, भालू, खरगोश, साँप, मेंढक, चीते, कीडे, मकोडे अादि आदि रहते हैं अर्थात सभी योग्यतम हैं अर्थात योग्यता उस जीव के अपने पर्यापरण के अनुसार ढालने हैं यदि पर्यावरण बदल जाए तो योग्यतम जीव भी संभवतया न बच पाए जैसा कि लभगभ छ-सात करोड वर्ष पूर्व उस समय के योग्यतम डायनोसोरों के साथ हुआ-पर्यावरण, किसी महत घटना के कारण बदला और वे जो उस समय निष्कंटक राज्य कर रहे थे-समाप्त हो गए क्योंकि वे बदले पर्यावरण के अनुरूप अपने को नहीं ढाल पाए ठीक मुहावरा होगा 'अनुकूलनीयता में ही सुरक्षा है, अतिजीविता है' यह सोचना गलत है कि सभी जीवों में मानव में सर्वाधिक अनुकूलनीयता है वास्तविकता यह है कि ऐसे असंख्य जीवों में से वह एक जीव है अब यदि बढती आबादी और बढते उपभोग से जो खतरा पैदा हो रहा है उसके अनुरूप यदि मानव अपने को नहीं ढाल सका तो उसकी सुरक्षा और अन्ततः उसका अस्तित्व ही खतरे में पड ज़ाएगा उसे यदि बचना है तो बढती आबादी पर नियंत्रण और बढते उपभोग पर नियंत्रण अत्यावश्यक है

मानव यह सोचे कि वह बिना जंगलों के तथा वन्य जीवों के भी अपना अस्तित्व बनाए रख सकेगा तब वह बहुत ही घातक गलती करेगा मानव की अनुकूलनीयता सीमित है, उसमें मदद करते हैं अन्य जीव जिनके साथ वह जीवन-चक्र में गु/था हुआ है पता नहीं कौन सा बैक्टीरियम या कौन सा वाइरस जो अभी तक जीवों के चक्र में काम करने से दबा हुआ है, जीवन चक्र के टूटने से, भडक़ जाए और सारी मानवजाति को समाप्त कर दे

ये विचार मेरे मन में हाथी और हुलाक को न देख पाने की निराशा के कारण नहीं आए क्योंकि वह दिन जंगल में बडा ही आनन्ददायक रहा कितनी बार पुलकित किया सामान्यतया पाए जाने वाले पक्षियों जैसे बुलबुल, ड्रांगो आदि को न गिने तब भी मेरी सूची काफी लम्बी है : चिकबरी (मेगपाइ) राबिन, स्वर्णासन फूल चुही, हरित मेग पाई, कृष्ण सिर पीलक (ओरिओल), लघु पीतग्रीव कठफोडवा, पीत पृष्ठ मधुभक्षी (सन बर्ड), वृहद चोंध सिमिटार, कालीज फ़ैजैन्ट आदि मालूम था कि दिन भर जंगल में घूमने के बाद, एक दर्जन जोंकें तो अवश्य लग गई होंगी, इसलिए उसी आदमी से इनका इलाज पूछा एक तो मैने देख ही लिया था उसने हाफ पैंट और आधी बांह की कमीज पहनी थी हम लोगों के पहनावे के बिलकुल विपरीत - हम लोग तो जानबूझकर पूरी बाँह की कमीज फ़ुलैंट जूते मोजे में थे जंगल में घूमते समय, वह हर पाँच सात मिनिट में अपने शरीर का अवलोकन करता और दाव (एक बडा छुरा) से चोंकों को निकाल देता सुके बदन से एक बूंद खून नहीं निकला और हम लोगों के बदन से तो पिछले दिन के जोंकों द्वारा बनाए गए घावों से, उस दिन भी खून धीरे धीरे रिस रहा था जोंक खून चूसने के पहले एक विरकंदक (जो खून को जमने से रोकता है) रसायन डाल देती है जिससे कि उसके द्वारा किए गए सूक्ष्म छिद्र से भी खून बहता रहे रिसना बन्द करने के लिए उसने बताया कि जिस कागज में बिडी क़ा क्ट्टहा पैक होकर आता है उसकी राख लगाने से रिसना बिलकुल बन्द हो जाता है और हम लोग जब लौटे तब फिर एक दर्जन नए घाव थे किन्तु उस राख से सब बन्द हो गए

विश्वमोहन तिवारी, पूर्व एयर वाईस मार्शल
सितम्बर 28, 2004

 

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