मुखपृष्ठ  कहानीकविता | कार्टून कार्यशालाकैशोर्यचित्र-लेख |  दृष्टिकोणनृत्यनिबन्धदेस-परदेसपरिवार | फीचर | बच्चों की दुनियाभक्ति-काल धर्मरसोईलेखकव्यक्तित्वव्यंग्यविविधा |   संस्मरण | सृजन स्वास्थ्य | साहित्य कोष |

 

 Home | Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact | Share this Page!

 Click & Connect : Prepaid International Calling Cards 

 
चैनल्स  

मुख पृष्ठ
कहानी
कविता
कार्यशाला
कैशोर्य
चित्र-लेख
दृष्टिकोण
नृत्य
निबन्ध
देस-परदेस
परिवार
फीचर
बच्चों की दुनिया
भक्ति-काल धर्म
रसोई
लेखक
व्यक्तित्व
व्यंग्य
विविध
संस्मरण
सृजन
स्वास्
थ्य
साहित्य कोष
 

   

 

 

सूक्ष्म एवं स्थूल जगत

अकसर देखा जाता है कि धर्म एवं ईश्वर के विषय में गिने चुने व्यक्तियों को छोडक़र बाकी सभी मनुष्य अंधविश्वास से ग्रस्त होते हैं प्रस्तुत लेख में अत्यंत संक्षिप्त सरल एवं क्रमध्द तरीके से धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझाने का प्रयास किया गया है

1- ब्रह्मांड
2-
स्थूल जगत
3-
सूक्ष्म जगत
4-
ज्ञान
5-
मनुष्य की आध्यात्मिक संरचना

6- मनुष्य पर सूक्ष्म जगत का प्रभाव
7-
विज्ञान एवं आध्यात्म में अन्तर
8-
सूक्ष्म जगत में प्रवेश करने का तरीका
9-
ध्यान
10-
निष्काम एवं सकाम साधनाएं

ब्रह्मांड
हमारे ब्रह्मांड का मुख्य घटक द्रव्य है, इसे हम दो भागों में बांट सकते हैं, 1 सूक्ष्म 2 स्थूल द्रव्य सूक्ष्म रूप में रहता है, जबकि पृथ्वी सहित अन्य ग्रहों एवं उपग्रहों पर सारा द्रव्य स्थूल रूप में रहता है
हमारा सारा ब्रह्मांड गतिशील एवं परिवर्तनशील है हम देखते हैं कि यहां प्रत्येक जीव एवं वनस्पति का जन्म होता है एवं उसका जीवन काल पूरा होने पर मृत्यु होती है, इसी प्रकार निर्जीव पदार्थ बनते एवं नष्ट होते रहते हैं, परंतु वास्तविकता यह नहीं है यहां न किसी का जन्म होता है न किसी की मृत्यु होती है यहां सिर्फ द्रव्य का रूप परिवर्तन होता है इसी को हम जन्म मृत्यु का नाम दे देते हैं, इसलिए इस संसार को मायावी जगत या नश्वर जगत भी कहते हैं यह द्रव्य ईश्वर से लेकर स्थूल पदार्थों तक अपना रूप परिवर्तन करने में सक्षम होता है, सूक्ष्म द्रव्य जैसे प्रकाश तरंग शब्द विचार मन आदि स्थूल पदार्थ जैसे सजीव निर्जीव ग्रह उपग्रह आदि, सब इसी द्रव्य से उत्पन्न होते हैं एवं इसी द्रव्य में लीन होते हैं स्वयं ब्रह्मांड भी इससे अछूता नहीं है इसका भी जन्म एवं मृत्यु होती है हमारा सूर्य अपने अंतिम समय में फैलने लगता है एवं अपने सभी ग्रहों को भस्म कर अपने में लीन कर लेता है इसके बाद इसका ठंडा होना एवं सिकुडना शुरू होता है अंत में यह ब्लेक होल एक कृष्ण विवर में बदल जाता है जिसमें कि असीमित गुरूत्वाकर्षण होता है इतना कि यहां से कोई तरंग या प्रकाश भी परावर्तित नहीं हो सकता अत: इन्हें किसी प्रकार देखा नहीं जा सकता वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांड में इनकी उपस्थिति का पता लगा लिया है, इसी प्रकार जब ब्रह्मांड के सभी सूर्य एवं तारे कृष्ण विवर में परिवर्तित हो जाते हैं तब ये अपने असीमित गुरूत्वाकर्षण के कारण एक दूसरे में समा जाते हैं एवं एक पिंड का रूप ले लेते हैं इस पिंड में ब्रह्मांड का सारा द्रव्य ईश्वर रूप में होता है इतने अधिक दबाव पर द्रव्य परमाणु या अन्य किसी रूप में नहीं रह सकता इसी को जगत का ईश्वर में लीन होना कहते हैं जब इस पिंड का संपीडन अपने चरम बिंदु पर पहुंचता है तब इसमें महाविस्फोट होता है इस महा विस्फोट के कारण ब्रह्मांड असंख्य वर्षों तक फैलता रहता है

स्थूल जगत

स्थूल जगत का सबसे सूक्ष्मतम रूप परमाणु होता है, इस पृथ्वी में इनकी मात्रा सीमित है न तो इन्हें पैदा किया जा सकता है न ही इन्हें नष्ट किया जा सकता है, अब तक पृथ्वी पर 105 विभिन्न गुण धर्म वाले परमाणु खोजे गए हैं इनका गुण धर्म इनके भीतर स्थित प्रोटान न्यूट्रान एवं इलेक्ट्रान की संख्या के ऊपर निर्भर करता है, इनकी संरचना हमारे सौर जगत के समान होती है, जिस प्रकार सूर्य के चारों ओर ग्रह निश्चित दूरी पर रहकर अपनी कक्षा में घूमते हुए सूर्य का चक्कर लगाते रहते हैं ठीक उसी प्रकार परमाणु के भीतर नाभिकीय केन्द्र के चारों ओर इलेक्ट्रान अपनी कक्षा में घूमते हुए नाभिक का चक्कर लगाते रहते हैं
विज्ञान की भाषा में इन्हें तत्व कहते हैं, जैसे हाइड्रोजन, आक्सीजन, लोहा, सोना, तांबा, पारा आदि हाइड्रोजन परमाणु में एक प्रोटान एक न्यूट्रान एवं एक इलेक्ट्रान होता है इसी प्रकार आक्सीजन परमाणु में प्रत्येक की संख्या 8, लोहा में 26, एवं सोना में 79 होती है यदि लोहा में इनकी संख्या 79 हो जाय तो यह लोहा न रहकर सोना बन जायगा परंतु ऐसा करना अभी विज्ञान के लिए संभव नहीं है पृथ्वी पर हम जो भी सजीव एवं निर्जीव वस्तुऐं देखते हैं ये सब इन्हीं परमाणुओं के मेल से बनती हैं हमारा शरीर भी इन्हीं परमाणुओं के मेल से बनता है, वायु, जल, जीव, वनस्पति एवं पूरी पृथ्वी सभी कुछ इन परमाणुओं के मेल से ही बना होता है पृथ्वी पर चाहे जितने जीव एवं वनस्पति पैदा होकर वृध्दि करते रहें, इससे पृथ्वी के भार में कोई फर्क नहीं पडता क्योंकि ये सारे जीव एवं वनस्पति सारा द्रव्य पृथ्वी से ही प्राप्त करते हैं सारे जीव एवं वनस्पति अपने जीवन काल में आवश्यक आहार भोजन जल एवं वायु भी पृथ्वी से ही प्राप्त करते हैं मनुष्य को सुख एवं वैभव के साधन भी प्रथ्वी से ही प्राप्त होते हैं सिर्फ जीवनी शक्ति हमें सूर्य से प्राप्त होती है एवं जीव की मृत्यु के बाद सब पृथ्वी में ही मिल जाते हैं इसलिए धर्म ग्रन्थों में पृथ्वी को माता एवं सूर्य को पिता का दर्जा दिया गया है स्थूल जगत के सभी तत्वों की तीन अवस्थाएं होतीं हैं, 1 ठोस 2 द्रव 3 वायु रूप स्थूल जगत में द्रव्य के ठोस द्रव एवं वायु रूप में प्रत्येक अवस्था के निम्नतम एवं उच्चतम स्तर होते हैं जैसे हम लोहे को गर्म करते हैं तब यह मुलायम होता जाता है एवं अंत में द्रव रूप में बदल जाता है और अधिक गर्म करने पर पतला होकर वायु रूप में बदल जाता है हम एक समय में द्रव्य की एक ही अवस्था को देख सकते हैं अर्थात जब लोहा ठोस रूप में रहता है तब इसके द्रव एवं वायु रूप को नहीं देख सकते एवं जब वायु रूप में होता है तब ठोस एवं द्रव रूप को नहीं देखा जा सकता हमारे नेत्र स्थूल जगत के लगभग चालीस प्रतिशत भाग को ही देख पाते हैं अतः परमाणुओं को हम खाली आखों से नहीं देख सकते परंतु शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शी यंत्र से इन्हें देखा जा सकता है

सूक्ष्म जगत

सूक्ष्म जगत को समझने से पहिले ईश्वर तत्व को समझ लें जिस प्रकार स्थूल जगत का सूक्ष्मतम रूप परमाणु होता है उसी प्रकार सूक्ष्म जगत का सूक्ष्मतम रूप ईश्वर होता है अर्थात ईश्वर सारे
ब्रह्मांड का सूक्ष्मतम रूप होता है धर्म ग्रन्थों में लिखा है कि ईश्वर एक है उसके रूप अनेक हैं, यहां एक का मतलब संख्या से नहीं है इसका मतलब है कि ईश्वर गुण धर्म का एक ही तत्व है इसे हम स्थूल तत्व आक्सीजन से समझ सकते हैं, पृथ्वी पर आक्सीजन के गुणधर्म वाला एक ही तत्व है इसका मतलब यह नहीं कि पृथ्वी पर आक्सीजन का एक ही परमाणु है आक्सीजन तो सारे वायुमंडल में व्याप्त है, इसके बिना कोई प्राणी दस मिनट भी जीवित नहीं रह सकता इसी प्रकार ईश्वर सारे ब्रह्मांड में व्याप्त है इसके बिना कुछ भी सम्भव नहीं इसलिए कहा जाता है कि ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता आक्सीजन एवं हाइड्रोजन के संयोग से जल बनता है जल को देखकर हम यह नहीं कह सकते कि इसमें आक्सीजन या हाइड्रोजन नहीं है इसी प्रकार सारे ब्रह्यांड में जो भी द्रव्य जिस रूप में है सभी में ईश्वर व्याप्त है, इसीलिए ईश्वर को सर्वव्यापी कहा गया है

परमाणु नाभिक के केन्द्र में भी ईश्वर स्थित होता है, इसके चारों ओर एक प्रभामंडल होता है जिसे ज्ञान का प्रकाश कहते हैं
इसके बाद अन्य कण स्थित होते हैं परमाणु का सबसे बाहरी कण इलेक्ट्रान होता है जो ज्ञान के प्रकाश से प्रेरणा प्राप्त कर समस्त स्थूल जगत की रचना करता है एवं नष्ट करता है स्थूल जगत की किसी भी सजीव एवं निर्जीव बस्तु के बनने एवं नष्ट होने में इस कण की प्रमुख भूमिका होती है यह स्वतंत्र अवस्था में भी रहता है विज्ञान ने इस कण पर नियंत्रण प्राप्त कर आज इस युग को इलेक्ट्रानिक युग में बदल दिया है परमाणु में ईश्वर की खोज के लिए भी वैज्ञानिक प्रयोग जारी हैं

सूक्ष्म एवं स्थूल जगत कोे क्र्रमशः चेतन एवं जड भी कहा जाता है चेतन द्रव्य ज्ञान युक्त होता है एवं जड में ज्ञान नहीं होता
जड उसे कहते हैं जिसका रूप बदलता रहता है या जन्म मृत्यु होती है चाहे वह सजीव हो या निर्जीव चेतन उसे कहते हैं जिसका रूप नहीं बदलता एवं जो जन्म मृत्यु से मुक्त होता है स्थूल जगत समय की सीमा से बंधा होता है, परंतु सूक्ष्म जगत के लिए समय की कोई सीमा नहीं होती जिस प्रकार स्थूल जगत में द्रव्य की तीन अवस्थाएं होतीं हैं इसी प्रकार सूक्ष्म जगत में भी द्रव्य की तीन अवस्थाएं होतीं हैं 1- सत् 2- रज् 3- तम् सूक्ष्म जगत का सारा द्रव्य तरंग रूप में होता है हम सूक्ष्म जगत की एक चीज प्रकाश को ही देख पाते हैं खाली आँखों से हम प्रकाश का भी तीस प्रतिशत भाग ही देख पाते हैं सूक्ष्म जगत स्थूल जगत की तुलना में बहुत ही अधिक विशाल एवं शक्तिशाली होता है क्योंकि हमारे ब्रह्यांड में सूर्य तारों ग्रहों उपग्रहों के बीच जो भी खाली स्थान है जिसे हम अंतरिक्ष कहते हैं सभी में सूक्ष्म तरंगें प्रवाहित होती रहतीं हैं सभी स्थूल पदार्थों में हमारे शरीर में एवं परमाणुओं की कक्षा के भीतर जो भी खाली स्थान रहता है उसमें भी ये तरंगें विद्यमान रहतीं हैं द्रव्य की ठोस द्रव एवं वायु रूप अवस्था को जड तथा सत रज एवं तम अवस्था को चेतन कहते हैं जिस प्रकार स्थूल जगत में हम एक समय में द्रव्य के एक ही रूप को देख पाते हैं इसी प्रकार सूक्ष्म जगत में भी हम एक समय में द्रव्य के एक ही रूप को देख सकते हैं जब सत का प्रभाव होता है तब रज और तम अवस्था को नहीं देख सकते, जब रज का प्रभाव होता है तब सत और तम को नहीं देख सकते इसी प्रकार जब तम का प्रभाव होता है तब रज और सत को नहीं देख सकते इसमें भी प्रत्येक अवस्था के निम्नतम् एवं उच्चतम् स्तर होते हैं सत को ज्ञान रज को क्रियाशीलता एवं तम को अज्ञान कहते हैं अज्ञान भी ज्ञान का ही एक प्रकार है अतः इसे मिथ्या ज्ञान समझना चाहिए, अज्ञान के बाद जड अर्थात स्थूल अवस्था आ जाती है ज्ञान युक्त द्रव्य स्वतः क्रिया करने में सक्षम होते हैं परंतु अज्ञानता अर्थात तम का प्रभाव बढने पर ज्ञान कम होता जाता है तम के बाद सूक्ष्म से स्थूल अवस्था अर्थात परमाणु अवस्था में जानेपर लेश मात्र ज्ञान उन्हीं परमाणुओं में रह जाता है जो अपूर्ण अर्थात जिनकी कक्षा में इलक्ट्रान भरने की जगह होती है, होते हैं अपूर्ण परमाणु स्वतः दूसरे अपूर्ण परमाणु से मिलकर अणु बना लेते हैं अणु बन जाने पर ज्ञान शून्य हो जाता है ये अणु तब तक कोई क्रिया नहीं कर सकते जब तक इन्हें किसी चेतन तत्व द्वारा उर्जा प्राप्त न हो

ज्ञान

यहां ज्ञान शब्द का प्रयोग किया गया है अतः ज्ञान के संबंध में जान लेना उचित होगा। यहां ज्ञान का मतलब स्कूली या किताबी ज्ञान से नहीं है बल्कि ब्रह्म ज्ञान से है, एक अनपढ व्यक्ति भी ज्ञानवान हो सकता है एवं एक पढा लिखा व्य्क्ति अज्ञानी हो सकता है पढना - लिखना एक कला है एवं ज्ञान ईश्वरीय चेतना है ज्ञान मनुष्य की खोज नहीं है , मानव जाति का विनाश हो जाने पर भी ज्ञान का विनाश नहीं हो सकता जब तक ईश्वर है एवं ब्रह्मांड हैे, तब तक ज्ञान भी रहेगा ज्ञान दो प्रकार का होता है, 1 - यथार्थ ज्ञान 2 - मिथ्या ज्ञान यथार्थ ज्ञान को ज्ञान शब्द से एवं मिथ्या ज्ञान को अज्ञान शब्द से संबोधित करते हैं यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति मनुष्य को ध्यानावस्था में ही होती है अज्ञान के प्रभाव से मनुष्य अनित्य में नित्य, दुःख में सुख, अपवित्र में पवित्र एवं अनात्मा में आत्मा समझता है अर्थात् अज्ञान के प्रभाव से मनुष्य जङ को ही चेतन समझता है

मनुष्य की आध्यात्मिक संरचना

मनुष्य के उपर सूक्ष्म तथा स्थूल के प्रभाव को समझने से पहले मनुष्य की आध्यात्मिक संरचना को समझ लें
धर्म ग्रन्थों में लिखा है कि मनुष्य का शरीर पंच तत्वों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश से बना हुआ है, यहां पृथ्वी का मतलब ठोस, जल का द्रव, अग्नि का ऊर्जा, वायु का वायु रूप, आकाश का सूक्ष्म रूप है पृथ्वी का गुण गंध, जल का रस, अग्नि का रूप, वायु का स्पर्श एवं आकाश का शब्द कम्पन है इन्हीं गुणों के आधार पर मनुष्य के शरीर में क्रमशः पांच ज्ञानेन्द्रियां होती है

1 घ्राण अर्थात् नाक 2 रसना अर्थात् जीभ 3 नेत्र 4 त्वचा 5 श्रोत अर्थात् कान।

सूक्ष्म से स्थूल की ओर चलने पर मनुष्य के शरीर को निम्न आठ भागों में बांटा गया है

1 परमात्मा अर्थात् ईश्वर 2 आत्मा 3 मन 4 बुध्दि 5 प्राण 6 वायु रूप 7 द्रव रूप अर्थात् जल रस रक्त आदि 8 ठोस रूप अर्थात् मांस हड्डी आदि।

क्र्रमांक 1 से 5 तक सूक्ष्म शरीर एवं 6 से 8 तक स्थूल शरीर या परमाणुमय शरीर कहलता है उपरोक्त क्रमांक 1 से 8 तक के कार्य इस प्रकार हैं

1.      ईश्वर किसी क्रिया में लिप्त नहीं होता वह सिर्फ दृष्टा होता है परंतु उसके बिना कुछ संभव नहीं

2.     आत्मा शरीर में ज्ञान स्वरूप होती है एवं मनुष्य इंद्रियों द्वारा किए गए कर्मों का फल भोगती है

3.     मन मनुष्य के शरीर में सबसे महत्वपूर्ण चीज है इसका काम जानना है एवं यह आत्मा तथा बुध्दि के बीच सेतु का काम करता है गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने कहा है कि''मन एवं मनुष्याणां कारणं बंधमोक्ष्योः'' अर्थात् मनुष्य के शरीर में मन ही बंधन एवं मोक्ष का कारण है मनुष्य के शरीर में मन एक ऐसा मुकाम है जहां से दो रास्ते विपरीत दिशाओं में जाते हैं एक मोक्ष की ओर ले जाता है दूसरा बंधन की ओर, मोक्ष एवं बंधन को क्रमशः योग एवं भोग, ज्ञान एवं अज्ञान, सुख एवं दुख भी कह सकते हैं

4.     बुध्दि मनुष्य के मस्तिष्क को संचालित करती है इसका कार्य निर्णय करना एवं कर्मेन्द्रियों को कार्य करने हेतु प्रेरित करना है जब मन किसी कार्य को करने की इच्छा करता है तब बुध्दि हमारे शरीर की सुरक्षा एवं प्रकृति के नियमों को ध्यान में रखते हुए निर्णय करती है कि इच्छित कार्य करने योग्य है या नहीं इसी आधार पर यह कर्मेंन्द्रियों को कार्य करने के लिए प्रेरित करती है, शरीर में मन एवं बुध्दि का द्वंद्व हमेशा चलता रहता है , इस द्वंद्व में यदि मन का पलडा भारी होता है तब मनुष्य अपराध की ओर या प्रकृति से विपरीत कार्यों की ओर मुड ज़ाता है यदि बुध्दि का पलडा भारी होता है तब शरीर में तनाव एवं चिंता उत्पन्न होती है तथा मनुष्य धीरे-धीरे रोगी बन जाता है, असाध्य क्रॉनिक रोगों का इसके अलावा कोई दूसरा कारण नहीं होता इसी आधार पर होम्योपैथी में मन का इलाज किया जाता है न कि रोग का, निरोग रहने के लिए शरीर में मन एवं बुध्दि का संतुलन आवश्यक है

5.     प्राण, इसे जीवनी शक्ति भी कहते हैं इसका कार्य सारे शरीर में एवं सूक्ष्म नाडियों में वायु प्रवाह को नियंत्रित करना तथा सूक्ष्म ऊर्जा प्रदान कर शरीर को क्रि्रयाशील रखना है प्राण के निकल जाने पर शरीर मृत हो जाता है एवं प्राण के कमजोर होने पर शरीर कमजोर होता जाता है तथा बीमारियों से लडने की शक्ति समाप्त होने लगती है मनुष्य के शरीर पांच महाप्राण एवं पांच लघु प्राण होते है महाप्राण को ओजस् एवं लघु प्राण को रेतस् कहते हैं प्राणायाम् हमें प्राणों पर नियंत्रण रखने की विधि सिखाता है, क्योंकि प्राणों के ऊपर ही शरीर की क्रियाशीलता निर्भर करती है

6.     वायु से शरीर ऑक्सीजन प्राप्त करता है जिससे शरीर में होने वाली रासायनिक क्रियाओं के लिए ऊर्जा प्राप्त होती है

7.     द्रव- इसका कार्य शरीर से आवश्यक तत्वों को ग्रहण करना एवं अशुध्द एवं अनावश्यक तत्वों को शरीर से बाहर निकालना है

8.     ठोस - इसका कार्य रक्त प्रवाह एवं स्नायुओं के लिए सुरक्षित मार्ग बनाना , शरीर के कोमल अंगों को सुरक्षा प्रदान करना तथा शरीर को स्थिर एवं सुडौल बनाए रखना है

- आगे पढें

Top
 

Hindinest is a website for creative minds, who prefer to express their views to Hindi speaking masses of India.

             

 

मुखपृष्ठ  |  कहानी कविता | कार्टून कार्यशाला कैशोर्य चित्र-लेख |  दृष्टिकोण नृत्य निबन्ध देस-परदेस परिवार | बच्चों की दुनिया भक्ति-काल धर्म रसोई लेखक व्यक्तित्व व्यंग्य विविधा |  संस्मरण | सृजन साहित्य कोष |
प्रतिक्रिया पढ़ें! |                         प्रतिक्रिया लिखें!

HomeBoloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact

(c) HindiNest.com 1999-2015 All Rights Reserved. A Boloji.com Website
Privacy Policy | Disclaimer
Contact : manishakuls@gmail.com