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सिर्फ एहसास है ये
 

साहित्य जो किसी समाज और देश का आईना होता है, वह मेरे ख्याल से एहसास के सिवा कुछ भी नहीं है; सम्वेदनाओं का यह एहसास जिसकी गहरी चोट हृदय को भेद देती है तो एहसास की इस चोट के फलस्वरूप जो प्रतिक्रिया होती है वह किसी मनुष्य की लेखनी द्वारा साहित्य में परिणत हो जाती है और एक सामान्य मनुष्य, कवि, लेखक और शायर के रूप में प्रस्फुटित होता है आदिकवि कहे जाने वाले संस्कृत महाकाव्य रामायण के रचयिता महाकवि वाल्मीकि ने अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ से पूर्व अनेकों हत्याएं कीं, लोगों को लूटा एक दिन जब वे ध्यान में मग्न थे कि देखते हैं एक हंस का जोडा तालाब में कलरव कर रहा है इतने में एक शिकारी के तीर से हंस के जोडे में से एक मर जाता है, दूसरा वहां से अकेले उड ज़ाता हैफिर यही हंस शिकारी के जाने के बाद बार बार उसी स्थान पर आकर अपने बिछुडे हुए साथी को देखता है यही सम्वेदनापूर्ण एहसास कठोर व क्रूर वाल्मीकि के हृदय पर ऐसी चोट कर बैठता है कि उनके अन्दर छिपी हुई करुण भावनाएं साहित्य के प्रथम श्लोक के रूप में प्रस्फुटित हुईं हिन्दी के महाकवि कहलाये जाने वाले जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में ठीक ही लिखा है _

 '' वियोगी  होगा  पहला कवि,    आह से उपजा  होगा  गान।
 उमड क़र आंखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान।।''

गोस्वामी तुलसीदास जो कि रामचरित मानस जैसे जन जन में प्रिय व पूज्य ग्रन्थ के रचयिता थे, उनके साहित्यिक जीवन का आरंभ भी कुछ ऐसा ही नहीं था क्या? जब विवाह के कुछ दिनों बाद ही रत्नावली अपने भाई के साथ मायके चलीं गईं तो उनका वियोग तुलसीदास सहन नहीं कर सके और घनघोर अंधेरी धुंआधार बरसती रात्रि में एक लाश पर नदी पार कर रत्नावली के गांव तथा सांप को रस्सी समझ रत्नावली के मायके के कमरे में ऊपर पहुंच गये इस पर रत्नावली ने उन्हें बहुत धिक्कारा और व्यंग्य का तीर मारते हुए कहा कि, '' मेरे इस हाड - मांस के शरीर के प्रति जितनी तुम्हारी आसक्ति है, उसकी आधी भी अगर प्रभु भक्ति में होती तो तुम्हारा जीवन संवर गया होता'' फिर क्या था व्यंग्य का यह तीर तुलसीदास जी के हृदय पर इस कदर आहत कर गया कि वे एक क्षण भी रुके बिना वहां से चल दिये और गृहस्थ जीवन का परित्याग दिया शब्द बाण से नये गोस्वामी तुलसीदास का जन्म हुआ जिसने रामचरित मानस जैसे महाकाव्य की रचना की

महाकवि कालीदास तथा वात्सल्य सम्राट सूरदास के साथ भी कुछ ऐसे ही करुण एहसास जुडे हैं गालिब के हृदय में भी इश्क के जज्बे ने वो असर किया कि उन्हें शायरों का शहंशाह बना दिया _

 '' इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया।
 वरना हम भी आदमी थे काम के।।''

छायावाद की महान कवियत्री महादेवी वर्मा का हृदय करुण भावनाओं से ओत प्रोत हो बिलख उठा और हृदय से भाव उठा, लेखनी से फूटा _

 '' मैं  नीर  भरी  दुख की  बदरी
 उमडी क़ल थी मिट आज चली।''

वैसे तो सामान्यत: लोग निद्रावस्था में मस्तिष्क से स्वप्न देखते हैं, लेकिन कवियों की भी क्या निराली दुनिया है कवि हरिवंश राय बच्चन कहते हैं _

कौन कहता है कि स्वप्नों को
न आने दे हृदय में
देखते सब हैं इन्हें
अपनी उमर अपने समय में

ऐसे ही कोमल, मन को छूकर गुजरते एहसास एक सामान्य इन्सान को भी कवि बना सकते हैं एक कोमल भाव, एक ऐसी घटना जो मन छू जाये लेखनी में उतर कर साहित्य सृजन की वजह बनती है सिर्फ एक बार अपने जीवन के साथ घटित होने वाले किसी नाजुक़, करुण पल का एहसास कीजिये, आपके हृदय में कविता रूपी तरंगे स्वत: उठ जायेंगी

--- योगेश द्विवेदी
दिसम्बर 20, 2002

   

   

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