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उम्र के नाजुक मोड़ पर बढ रहा तलाक का ग्राफ!

लखनऊ , 21 दिसम्बर (आईएएनएस)। उम्र का आखिरी पड़ाव वह दौर माना जाता है जब पति-पत्नी एक दूसरे की जरूरत को बेहतर ढंग से समझते हैं और इस बीच यदि गिले-शिकवेआ भी जाते हैं तो वे एक-दूसरे की गलतियों को अनदेखी कर क्षमा कर देते हैं लेकिन पारिवारिक न्यायालय की तस्वीर जुदा है। यहां तलाक के 60 फीसदी से ज्यादा मामले ऐसे हैं जिनमें 45 से 60 वर्ष की आयु के पति-पत्नियों के बीच एक-दूसरे से तलाक मांगी गयी है। हैरानी की बात यह भी है कि अधिकतर मामलों में अलग होने की पहल पति ने की है।

पिछले छह-सात वर्षों में बहुतायत में आ रहे इस तरह के मामलों ने खुद पारिवारिक न्यायालय को अचम्भे में डाल दिया है। इसके लिए एडवोकेट जहां बचपन में कर दी गयी शादी को जिम्मेदार मान रहे हैं। वहीं आधुनिक जीवनशैली भी इन मामलों को हवा देने में पीछे नहीं है। यही नहीं उत्तर प्रदेश के पारिवारिक न्यायालय में ऐसी पहल उन पतियों द्वारा सबसे ज्यादा की जा रही है जो उच्च पदों पर कार्यरत हैं।

हाल में आये ऐसे ही केस का हवाला देते हुए पारिवारिक न्यायालय के राम उग्रह शुक्ला बताते हैं अभी गत दिनों 50 वर्षीय पत्नी और 53 वर्षीय पति के संबंधों की परिणति तलाक के रूप में हुई है। पति सरकारी विभाग में वरिष्ठ अधिकारी है। पत्नी सीधी-साधी घरेलू महिला शिक्षा से उसका दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं था। नाबालिग अवस्था में हुए इस विवाह ने एक-दूसरे को कुछ भी समझने का मौका नहीं दिया। उच्च पद पर तैनात पति को इस विवाह  ने धीरे-धीरे हीनता से भर दिया।

आखिरकार उसने अपने बच्चे के दायित्व से मुक्ति पाने के साथ पत्नी को सोची समझी साजिश के तहत पहले तो मायके भेज दिया। इसके बाद तलाक का नोटिस भिजवा दिया। इतना ही नहीं उसने अपने साथ काम कर रही महिला से गुपचुप तरीके से विवाह भी कर लिया। पत्नी को इस बात से इतना दुख पहुंचा कि उसने बिना किसी आपत्ति के तलाक की सहमति दे दी।

पारिवारिक न्यायालय ही नहीं राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण भी इस बात की काफी हद तक पुष्टि करता है। उनका भी मानना है, सुलह-समझौते के आधार पर निर्णय के मामले में करीब आधे मामले इसी प्रकार के आ रहे हैं।

न्यायालय के एक अन्य अधिवक्ता पी.सी. श्रीवास्तव कहते हैं ऐसे मामलों में कई बार पति अपनी पत्नी को इतना ज्यादा उत्पीड़ित कर देता है कि पत्नी खुद-ब-खुद तलाक के लिए राजी हो जाती है। वह बताते हैं अभी कुछ दिन पहले एक बड़ी कम्पनी में कार्यरत पति ने दूसरी महिला से विवाह करने के लिए यही हथकंडा अपनाया। उसने अपने चार बच्चों व पत्नी को इतना उत्पीड़ित करना शुरू कर दिया कि पत्नी खुद तलाक के लिए सामने आ गयी। हालांकि उक्त व्यक्ति अपने परिवार को अच्छा भरण पोषण दे रहा है। उन्होंने इसके लिए बचपन में हुए विवाह को जिम्मेदार ठहराया।

बहरहाल इस उम्र में बढ़ते तलाक के ग्राफ  को देखकर न्यायालय से लेकर राज्य विधिक प्राधिकरण तक चिन्तित है। राज्य विधिक प्राधिकरण के तहत परिवारिक न्यायालय की सलाहकार रही व मनोवैज्ञानिक डा. मधु पाठक कहती हैं कि इन वादों में वादी केवल 'तलाक' की ही मांग कर रहे हैं वह किसी समझौते के लिए तैयार नहीं होते। वह बताती हैं महिलाओं ने तलाक की गुहार तभी लगायी है जब उम्र के लम्बे दौर में पति से मार खाते खाते सब्र का बांध टूट गया। लिहाजा बच्चों की जिम्मेदारी पूरी होते ही इस रिश्ते से अलग होने का फैसला ले लिया। उधर न्यायालय के अधिवक्ता यह भी कहते हैं कि कुछ वर्षों से तलाक के वह मामले भी देखने को मिल रहे हैं जो वर्षों से 'कोर्ट में लम्बित पड़े थे। जिनका निस्तारण उन दोनों की युवावस्था की बजाय अब हो रहा है। 

21 दिसम्बर 2007

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

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