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रोजगार गारंटी से सामंतवाद को चुनौती

 

हरदुआ, रीवा (मध्य प्रदेश) 21 जनवरी(आईएएनएस)। जीवन की अस्मिता के लिए संघर्ष करने वाले हरदुआ के 600 मजदूरों में से ही एक मजदूर हैं, रामभरण साकेत। जिन्होंने बघेलखंड में सदियों से पनप रहे सामंतवाद के खिलाफ मोर्चा खोला। वह निरक्षर हैं, लेकिन संघर्ष के ज्ञान से भरपूर हैं।

 

अक्टूबर-नवम्बर 2007 के दो महीनों में हरदुआ के इन मजदूरों ने अपने रोजगार-आजीविका के अधिकार के लिए आवाज उठाई, जो सीधे जाकर सामंती व्यवस्था से टकराई और इसकी प्रतिध्वनि अब पूरे राज्य में सुनी जा सकती है। लेकिन इस संघर्ष की रामभरण ने भयंकर कीमत अदा की है। उनकी बेटी पहले लापता हुई फिर उसकी हत्या कर दी गई, उसकी रिपोर्ट नहीं लिखी गई और उसके पोस्टमार्टम के लिए सैकड़ों किमी साइकिल पर लाष लादकर उनको भटकना पड़ा। हरदुआ में शोषण के शिकार अकेले रामभरण नहीं हैं। इसी गांव के शिवमंगल साकेत की भूख से मौत हो गई। उसके मौत के कई सप्ताह पहले ही उसके घर पर अनाज  का दाना नहीं था, फिर भी उनका नाम गरीबी की रेखा की सूची में नहीं था।

 

सरकारी आंकड़ों की जादूगरी देखिए कि इसी गांव के 60 एकड़ सिंचित जमीन, ट्रेक्टर और बोलेरो गाड़ी के मालिक हरीसिंह का नाम गरीबी की रेखा की सूची में बदस्तूर शामिल था। शोषण की यह कहानी बेहद लंबी, घुटनभरी है। सरकार ने गांव में जो हैंडपंप लगाए थे, वे हरिजन बस्ती में नहीं लगे बल्कि कुर्मी पटेलों की बस्ती में लगाए गए और उनकी बस्ती में चमड़े का काम करने वाली जाति की संज्ञा के साथ जीने वाले चर्मकार (साकेत) समुदाय को प्रवेश करने की भी इजाजत नहीं है। इस तरह के जाति आधारित गांव में बंधुआ मजदूरी न हो, भला यह कैसे संभव है।

 

आजादी के बाद से देश में अब तक के जितने भी कानून बने हैं, उनमें सबसे प्रभावी और कं्रातिकारी कानून है, राष्टीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना। जिसने करोड़ों बेरोजगार, वंचितों को कानूनी लड़ाई का ऐसा अधिकार दिया है, जो अब रोजगार के उस मौलिक सवाल को उठा रहे हैं, जिन पर पहले दलितों-वंचितों का बात करना भी अपराध माना जाता था। इस कानून की ताकत की ताजा मिसाल रीवा जिले का हरदुआ बना है, जहां दो महीनों तक दलित आदिवासियों ने रोजगार गारंटी कानून के जरिए अपने हक को सामंती चंगुल से पाया है।

 

हरदुआ में वंचितों की जीत सही अर्थों में एक केस स्टडी है कि बदले समय में किस तरह से ताकतवर लोगों का मुकाबला किया जाना चाहिए। जो लोग बघेलखंड, बुंदेलखंड के जाति आधारित समाज को समझते हैं वह जानते हैं कि ऐसे परिवेश में ब्राहमणों, ठाकुरों के सामने अपने हक की बात करना और उस पर 60 दिनों तक डटे रहना कितनी बड़ी जीत है। हरदुआ के संघर्ष को जरूरत है व्यापक प्रचार ,मीडिया सहयोग कि जिससे वंचितों का मनोबल बढ़े और उनका लोकतांत्रिक मूल्यों पर विश्वास गहरा हो सके। 60 दिनों तक चले इस संघर्ष में कोई भी वरिष्ठ सरकारी अधिकारी कार्यस्थल या मजदूरों की बस्ती तक नहीं गया। सिरमौर के अनुविभागीय दण्डाधिकारी और जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी की यात्राायें हरदुआ के सरपंच के निवास पर खत्म होती रही और यही अफसर मिथ्या सूचनायें सरकार को भेजते रहे; जिससे यह माना जाने लगा कि आदिवासी और दलित सरकार के खिलाफ संगठित होकर कानून और व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं। यही मानकर तीन श्रमिक नेताओं पर पुलिस केस भी दर्ज कर दिये गये। जब सरकार ने उनकी मांग को सही माना तो भी उन्हें केवल 12 रुपये के हिसाब से मजदूरी दी।

 

हरदुआ के कोल और आदिवासी कुर्मी, पटेलों, ब्राहम्णों के खेतों में निंदाई, जुताई, गुड़ाई और कटाई के साथ-साथ जानवरों की देखभाल और चौकीदारी भी सदियों से करते रहे हैं। उनका जीवन बंधुआ मजूदरों की तमाम परिभाषाओं को अभिव्यक्त करता है। इन लोगों को बमुश्किल ही भरपेट खाना नसीब होता है। क्योंकि सवर्णों की मान्यता है कि यदि दलितों का पेट भर गया तो वह गर्दन उठाकर बात करने लगेगा। हरदुआ के इस संघर्ष में कुर्मी (पटेल) समाज की भी अहम भूमिका है। एक समय ब्राम्हणों और ठाकुरों के शोषण के शिकार रहे बघेलखंड के कुर्मियों ने बाहुबल को विद्रोह का आधार बनाया। भूमिहीन कुर्मियों ने इस बदलाव के लिए मूलत: बंदूक को अपनी मुक्ति के उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया।

 

गयाप्रसाद कुर्मी 50 साल पहले बंदूक उठाकर दस्यु बना। इसके बाद शिवकुमार कुर्मी (ददुआ), राधे कुर्मी और अंबिका प्रसाद पटेल (ठोकिया) ने इस समुदाय को एक अलग आतंक के पर्याय के रूप में स्थापित किया। इस तरह एक हद तक तो कुर्मी सवर्ण सत्ता के प्रभाव से मुक्त हुए हैं किंतु फिर भी ब्राहम्णों और ठाकुरों की राजनीति और अफसरशाही पर गहरी पकड़ होने के कारण वे व्यवस्था को पूरी तरह से बदल नहीं पाए हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि सामंती व्यवस्था से संघर्ष करने वाला समाज आज खुद दूसरों (दलित-आदिवासियों) के लिए आंतक का पर्याय बन गया है। कुर्मी बघेलखंड में नवसामंतवाद के प्रतीक बन कर उभरे हैं और दलित - आदिवासी समुदाय पर शासन के अवसरों पर कब्जा कर रहे हैं। अब इस क्षेत्र में तेंदूपत्ता, जंगल के संसाधन और लोक निर्माण विभाग के ज्यादातर काम यह पिछड़ी हुई जाति हथिया रही है, जिससे दलित-आदिवासियों की स्थिति  दयनीय होती जा रही है, क्योंकि उन पर शासन करने वालों में ब्राहमणों, ठाकुरों के दल में एक नया शासक वर्ग शामिल हो गया है।

 

गौरतलब है कि मप्र के 23 जिलों में कोल जाति जनसंख्या 9.55 लाख है। इनके पिछड़ेपन का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि सभी आदिवासियों में सबसे कम 12 प्रतिशत काश्तकार कोल हैं, जबकि सबसे ज्यादा कोल (70.4 प्रतिशत) कृषि मजदूरी करते हैं। बघेलखंड, बुंदेलखंड में दलित और आदिवासी पूरी तरह से भूमिहीन हैं। सागर,,टीकमगढ़,रीवा, सीधी, सतना जैसे जिले सामंती आचरण वाले जिले हैं, जहां दलित-आदिवासियों का शोषण के खिलाफ पंचायत में बोलना तक अशिष्ट माना जाता है।

 

पहली नजर में यह प्रकरण विवरणों की अधिकता लग सकते हैं, लेकिन सामंती संरचना वाले समाजों जैसे बघेलखंड, बुंदेलखंड में यह रोजमर्रा की बात है। यहां शोषण, बंधुआ मजदूरी को परंपरागत अधिकार के रूप में देखा जाता है। संभवत: यह पहला अवसर है, जब रीवा जिले का हरदुआ गांव इस प्रमुखता से चर्चा में आया है। पिछले दो महीनों में यह गांव मप्र में सामंतवादी सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ दलित-आदिवासी मजदूरों के संयुक्त संघर्ष के कारण सुर्खियों में आया और सामाजिक संघर्ष, सम्मान की लड़ाई के संदर्भ में एक उल्लेखनीय उदाहरण बन गया।

 

देश में 2 फरवरी 2006 से गांव में रहने वाले हर परिवार को रोजगार का कानूनी हक देने वाले रोजगार गारंटी कानून ने यहां चिंगारी का काम किया है। रीवा में इसी साल (अप्रैल 2007 से) यह कानून लागू हुआ , परंतु छह महीने बीत जाने के बाद भी कहीं किसी कोने में रोजगार का अधिकार अंकुरित होता नजर नहीं आया। ऐसी स्थिति में 15 सितंबर 2007 को हरदुआ पंचायत के 341 दलित-आदिवासी मजदूरों ने पंचायत से काम की मांग की लेकिन गांव के सर्वशक्तिमान पटेल (कुर्मी) समाज ने इस मांग को सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था के विपरीत माना। 

 

वह जानते थे कि यदि मजदूरों को काम मिला तो वे जल्दी ही शुरू होने वाली फसल की कटाई का काम नहीं करेंगे और ज्यादा मजदूरी की मांग करेंगे। गांव के बच्चों ने रोजगार गारंटी के पर्चे और पोस्टर में पढ़कर मजदूरों को यह बताया था कि वे जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी से काम की मांग कर सकते हैं। उन्होंने यही किया और जनपद ने सरपंच को काम शुरू करवाने के निर्देश दिए। सरपंच को पंचायत की पंचवर्षीय कार्ययोजना के अनुसार दस्तावेज में पहले स्थान पर दर्ज शिव तालाब की सफाई और गहरीकरण का काम शुरू करना पड़ा। एक सप्ताह श्रम करने के बाद मजदूरों ने कानूनन मजदूरी के भुगतान की मांग की। इस मांग के एवज में सरपंच ने काम बंद करने के निर्देश दे दिए, परंतु दलित-अदिवासी मजदूर यह तो अब तक यह समझ चुके थे कि कानूनन उन्हें कम से कम 14 दिन का लगातार काम मिलेगा और जब काम पूरा नहीं हुआ तो उसे बंद नहीं किया जा सकता है। अब हरदुआ के दलित और आदिवासी समुदाय हर रोज एक साथ बैठने-मिलने लगे थे, क्योंकि उन्होंने समझ लिया था कि बड़े सामंतों से अकेले नहीं लड़ा जा सकता है। अब इन मजदूरों की एक दिन बैठक दलित बस्ती में होती थी तो दूसरे दिन आदिवासी बस्ती में। इसके दूसरी ओर हरदुआ के सरपंच ने मजदूरों की एकजुटता को तोड़ने के लिए कुछ मजूदरों को बड़ागांव -हरदुआ के बीच बन रही सड़क पर काम करने को कहा परंतु विभाजनकारी राजनीति से बचते हुए मजदूरों के समूह ने एक साथ काम करते रहने का निर्णय लिया।

 

इस दौरान उन्होंने रोजगार गारंटी कानून के कार्यक्रम अधिकारी, कलेक्टर, संभागायुक्त सहित हर स्तर के अफसरान से मजदूरी के भुगतान की मांग की परंतु उनकी मांग की कोई सुनवाई नहीं हुई। तब 28 सितंबर 2007 से हरदुआ के मजदूरों ने सिमरिया तहसील कार्यालय के प्रांगण में क्रमिक भूखहड़ताल शुरू कर दी। इन्होंने 60 दिन तक भूखे रहकर बिना मजदूरी श्रम किया और अंतत: 10000 मानव दिवस की मजदूरी हासिल करके हक की लड़ाई का पहला परचम लहराया।

 

हरदुआ के मजदूरों की आवाज बुलंद करने में जनमाध्यमों (मीडिया), जनसंगठनों का साथ और न्यायपालिका द्वारा स्थापित की गई व्यवस्था की सक्रियता सबसे अहम भूमिका का निर्वाह किया है। सभी के संयुक्त प्रयासों से ही सर्वोच्च न्यायालय के आयुक्त के सलाहकार ने जिला प्रशासन को निर्देश दिए थे कि वह 30 नवंबर 2007 तक मजदूरों की मजदूरी का भुगतान करे और महिलाओं-बच्चों को तत्काल संरक्षण प्रदान करे,, क्योंकि यहां के 40 बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित थे। प्रषासन की चिंता इससे उजागर होती है कि वह 59वें दिन हरदुआ के मजदूरों के बीच पहुंचा और उनके कानूनी अधिकार को स्वीकार किया लेकिन लापरवाही और गैर-जवाबदेहिता की पूरी जिम्मेदारी सरपंच के मत्थे मढ़ दी गई और भ्रष्ट-प्रशासन स्वच्छता के साथ एक किनारे खड़ा हो गया। इसके बाद मजदूरों को मूल्यांकन के जाल में फंसा दिया गया। सरकार ने अंतत: उन्हें बताया कि मजदूरों ने 12-12 रुपए रोज की मजदूरी की है पर गांववालों ने इसे स्वीकार करने से मना कर दिया। क्योंकि इससे उनके संघर्ष को कानूनी मान्यता मिल गई है। अब मजदूरों का संघर्ष उनके उचित हक के लिए होगा, क्योंकि सरकार ने उनके कानूनी हक को तो स्वीकार कर ही लिया है। इस लड़ाई ने दलितों-आदिवासियों को बेहद जरूरी आत्मविष्वास की खुराक दी है कि अंधेरा गहरा तो है, मगर अपराजेय नहीं है। हरदुआ के मजदूरों ने एक रोटी, भूखे पेट रहकर खाकर यह लड़ाई लड़ी है ताकि गरिमा के साथ जीवन जी सके। हालांकि उनकी जिंदगी तो अब और भी कठिन होगी, क्योंकि सामंतवाद अपनी इस हार को आसानी से पचाने वाला नहीं है। सघर्ष जारी है!!!
 

- सचिन कुमार जैन

(लेखक 'विकास संवाद' नामक गैर सरकारी संगठन से जुड़े हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं।)

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