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(तिब्बत मसले पर विशेष लेख)

चीन से यारी में जरूरी है होशियारी

 

चीन के बारे में दो तरह के विशेषज्ञों की भरमार है। एक वे जो मानते हैं कि चीन हमारा पहले नंबर का विस्तारवादी शत्रु है, जिसकी बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता और ऐसे चीन पर दबाव डालना है कि वह तिब्बत आज़ाद कर दे।

 

दूसरे विशेषज्ञ वे हैं जो वामपंथी रूझान के हैं और चीन की किसी-भी कार्यवाही में गलत देखना पसंद नहीं करते। चीन ने 1952 में जब तिब्बत में सेनाएं भेजीं, तब भी वे चुप रहे, 1962 में जब भारत पर हमला किया, उसकी भी उन्होंने कभी भर्त्सना नहीं की और जब वह अरूणाचल प्रदेश पर दावा करता है तब भी वे चुप ही रहते हैं।

 

भारत-चीन संबंधों को अतिरेकी धाराओं से परे होकर ही देखा जाना चाहिए। 1952 में चीन ने तिब्बत में अपनी सेनाएं भेजकर कब्जा कर लिया था। तब तक तिब्बत में दलाई लामा का स्वतंत्र राज्य था, उनकी अपनी मुद्रा थी और स्वतंत्र राट्र था। लेकिन एक कमजोर और सद्य: स्वतंत्र भारत ने तिब्बत पर चीनी कब्जे का विरोध करने के बजाय उसे स्वीकार कर लिया और तिब्बत को चीन का अविभाज्य अंग मान्य कर दिया।

 

उसके बाद 1959 में दलाई लामा तथा उनके हज़ारों अनुयायी चीनी सेना द्वारा प्रताड़ित और पीड़ित होकर भारत आए। यहां उन्हें शरण दी गई। तब से तिब्बती शरणार्थियों का भारत आने का सिलसिला जारी ही है।

 

इसमें संदेह नहीं कि भारतीय नेताओं की यथार्थ से परे स्वप्नदर्शी कूटनीतिक नीति के कारण तिब्बत पर चीनी कब्जे का न विरोध किया गया और न ही उसे नीतिगत अस्वीकार किया गया। 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में कश्मीर के सेनापति जनरल जोरावरसिंह ने कैलास मानसरोवर वापस भारतीय सीमा में लाने हेतु तिब्बत में सैन्य अभियान छेड़ा था और फिर बहुत बहादुरी से तकलाकोट के पार तक विजय पताका फहराते हुए पहुंचे भी थे, परन्तु ब्रिटिश दुरभि संधि के कारण वे 12, दिसंबर 1841 को हुए अचानक हमले में गोली का शिकार होकर वहीं वीर गति को प्राप्त हो गए।

 

उनकी बहादुरी से प्रभावित होकर तिब्बतियों ने तकलाकोट के पास तोया गांव में उनकी समाधि भी बनाई जो कुछ वर्ष पूर्व तक सुरक्षित थी। मुझे उस समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर मिला है। यह उल्लेखनीय है कि 17, अक्टूबर, 1842 को महाराजा रणजीत सिंह के लाहौर दरबार (जिसके अंतर्गत कश्मीर राज्य था) तथा ल्हासा के बीच हुई संधि में तत्कालीन सीमाओं को ही भारत तथा तिब्बत के बीच स्थाई सीमा माना गया था।

 

माओ त्से तुंग के समय चीन ऐतिहासिक और प्राचीन चीनी विस्तार की बात करता था और लद्दाख, नेफा(वर्तमान अरूणाचल प्रदेश),भूटान, सिक्किम ही नहीं बल्कि मंगोलिया, लाओस और कम्बोंडिया तक 'ऐतिहासिक चीन' की सीमाएं मानता था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सिंज्यांग पर भी उसने इसी दावे के साथ कब्ज़ा किया था।

 

आज की वस्तु:स्थिति यह है कि तिब्बत पर चीनी कब्ज़े को भारत और अमेरिका भी अधिकृत तौर पर मान्यता दे चुके हैं। परम पावन दलाई लामा भी वर्तमान यथार्थ को स्वीकार करते हैं। ऐसी स्थिति में उचित यह होगा कि भारत-चीन संबंध अमेरिकी कूटनीतिक चालों तथा उसके अंतर्गत भू-राजनीतिक जटिलताओं से परे केवल राष्ट्रीय हित की दृष्टि से देखे और परखे जाने चाहिए।

 

यद्यपि यह भारत के हित में था कि भारत और चीन के मध्य तिब्बत एक स्वतंत्र देश के रूप में स्थिर रहता, परन्तु आज यह स्थिति नहीं है, अत: लद्दाख से अरूणाचल प्रदेश तक चीन के साथ सटी सीमा और नेपाल में चीन के बढ रहे प्रभाव को देखते हुए वर्तमान परिस्थिति को अपने हित के संदर्भ में मजबूत बनाना होगा। यह रास्ता दोधारी तलवार पर चलने के समान है।

 

इस समय भारत-चीन सीमा लगभग 4 हज़ार कि.मी. लम्बी है। दोनों देशों के संबंध दस्तावेज़ी साक्ष्यों के आधार पर 2000 साल पीछे तक जाते हैं, दोनों ही विश्व की प्राचीनतम सभ्यताएं हैं। पिछले हज़ारों वर्षों के इतिहास में भारत और चीन का केवल एक बार ही युद्ध हुआ है-1962 में, वह भी जब चीन में कम्युनिस्ट शासन स्थापित हुआ। दोनों देश आर्थिक दृष्टि से बहुत तीव्रता से आगे बढ़ने की यात्रा पर चल रहे हैं। चीन  एकतंत्रीय और एक पार्टी तानाशाही के माध्यम से विश्व की बड़ी शक्ति बनने की दिशा में अग्रसर है तो दूसरी ओर भारत एक जीवंत और मजबूत लोकतंत्र के माध्यम से इस दिशा में अग्रसर है।

 

इसी वर्ष 8 से 24 अगस्त तक चीन में ओलंपिक खेल भी होने वाले हैं। चीन सैन्य और आर्थिक शक्ति के क्षेत्र में तो महाशक्ति बना ही है, खेल के क्षेत्र में भी उसने अपना असाधारण स्थान बनाया है।  भारत केवल आईं टीं ,विज्ञान, टेक्नोलॉजी  तथा चिकित्सा के क्षेत्र में बढ़त दिखा पा रहा है। सैन्य ताकत और आर्थिक शक्ति के क्षेत्र में वह अभी भी चीन से काफी पीछे है।

 

दोनों देशों के मध्य व्यापार 20 अरब अमेरिकी डालर तक स्पर्श कर रहा है। इसके बावज़ूद दोनों देशों के मध्य संबंधों में संदेह बना रहता है। इसका कारण 50 के दशक में हिन्दी-चीनी भाई-भाई के नारे और पंचशील सिद्धांत की मायावी लोक-लुभावन छाया के बाद 1962 का विश्वासघात है। पहली बार 1979 में तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की चीन यात्रा के बाद संदेह और नफरत की जगह सहयोग और विश्वास का रास्ता खुला। इस यात्रा के परिणामस्वरूप 1981 में कैलास मानसरोवर तीर्थ यात्रा पुन: प्रारंभ हो पाई जो दलाई लामा को भारत में शरण देने एवं 1962 के युद्ध की पृष्ठभूमि में दो दशकों से बंद थी।

 

 दिसंबर 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की ऐतिहासिक चीन यात्रा के बाद आर्थिक, वैज्ञानिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में सहयोग की शुरूआत हुई। दिसंबर 1991 में चीन के प्रधानमंत्री ली फंग भारत आए और मई 1992 में भारत के राष्ट्रपति आरं वेंकटरमन चीन यात्रा पर गए। उसके बाद से चीन में भी आर्थिक परिवर्तन के क्रांतिकारी दौर आए तथा समाजवादी अर्थव्यवस्था के स्थान पर चीन के महानायक तंग स्याओ फंग ने निजीकरण को व्यापक तौर पर स्थापित किया

 

भारत और चीन दोनों ने ही अपने सीमा विवाद वार्ता के माध्यम से सुलझाने के समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं और इन वार्ताओं के छ: दौर सम्पन्न हो चुके हैं। इन वार्ताओं से सामाधान निकालने के लिए चीन को प्रत्यक्षत: कोई जल्दी नहीं है क्योंकि उसने पहले से ही अक्साई चिन और काराकोरम क्षेत्र में भारत की ज़मीन हड़पी हुई है तथा अरूणाचल पर वह अलग से दावा जताता है। भारत के विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी के एक बयान के अनुसार चीन भारत की 90,000 वर्ग कि0मी0 भूमि पर कब्जा जताता है।

 

अक्साई चिन में चीन पहले से ही भारत की 38 हज़ार वर्ग कि.मी. भूमि पर कब्जा किये हुए है और पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से हड़पे गए कश्मीर से भी 5180 वर्ग कि.मी. भूमि वह 'उपहार में' ले चुका है। भारत की संसद ने चीन से अपनी खोई हुई ज़मीन वापस लेने का सर्वसम्मत संकल्प पारित किया हुआ है लेकिन ऐसे संकल्प शक्ति के आधार पर ही पूरे किये जा सकते हैं।

 

वास्तव में चीन एकान्तिक देश भक्ति और एकतंत्रीय तानाशाही के माध्यम से विश्व की महाशक्ति बनने का अपना सपना पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है, और इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए वह न तो तिब्बत में और न ही भारत चीन सीमा पर किसी भी प्रकार का तनाव चाहता है। भारत अपने प्रभाव के क्षेत्र अर्थात दक्षिण एशिया (भारतीय उप-महाद्वीप) और पूर्व एशिया (प्राचीन स्वर्ण भूमि क्षेत्र या हिन्देशिया) में अमेरिका की बढ़ती कूटनीतिक उपस्थिति तथा चीन का वर्चस्व  घटाते हुए अपना प्रभुत्व बढ़ाने की स्पर्धा से सुपरिचित है।

 

 इस कारण भारत को चीन के साथ अपने संबंधों पर अमेरिकी सामरिक हितों की छाया नहीं पड़ने देनी चाहिए। भारत के लिए आवश्यक है कि वह अपनी सैन्य और आर्थिक शक्ति को इतना मजबूत बनाये कि भविश्य में चीन से किसी भी प्रकार के खतरे के प्रति उसकी स्थिति अविजेय बन जाए। इस स्थिति को प्राप्त करने तक भारत को अपनी सीमाओं पर शांति और सुरक्षा अकाटय बनानी होगी।

 

चीन के संदर्भ में हमें आत्मविश्वास और भारत हित सर्वप्रथम की नीति ही अपनाकर सम्मानजनक मित्रता की दिशा में काम करना होगा।

 

(लेखक: भाजपा के थिंक टैंक डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध अधिष्ठान के निदेशक हैं। )

 

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

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