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(चीयर लीडर्स विवाद पर विशेष लेख)
चीयर लीडर्स का विरोध कहीं तालिबानी मानसिकता का परिचायक तो नहीं!

 

नई दिल्ली, 29 अप्रैल (आईएएनएस)। कुछ सालों पहले तालिबान शासित अफगानिस्तान में संस्कृति और धर्म के नाम पर एक ऐसा मामला सामने आया था जिसके अंतर्गत लोगों की दाढ़ी की लंबाई मापकर उन्हें इस्लाम विरोधी और इस्लाम हितैषी करार दिया जाता था। जो इस्लाम विरोधी पाए जाते थे उन पर तो तालिबान का कहर बरपता ही था, कभी-कभी तो उन्हें सरेआम जलील भी किया जाता था।

 

लेकिन संस्कृति की दुहाई के नाम पर ऐसा करने वाले सिर्फ तालिबान में ही नहीं है। भारत सहित कई अन्य देशों में भी यह विद्यमान है। खुद को संस्कृति का ठेकेदार कहने वाले भारत में भी ऐसे लोग हैं जो इस प्रकार के तालिबानी फरमान जारी करने में थोड़ी भी हिचक नहीं दिखाते कि जनता कौन सी फिल्म देख सकती है, वह कौन सी किताब पढ़ सकती है और उसे किस प्रकार के कपड़े पहनने हैं।

 

चीयर लीडर्स को लेकर देश में इन दिनों एक नई बहस छिड़ी हुई है। विरोध करने वाले इसे अपसंस्कृति को बढ़ावा देने वाला बता रहे हैं और चीयर लीडर्स पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं। आश्चर्यजनक रूप से यह मांग वामपंथी दलों के नेताओं की ओर से जोरशोर से उठाई जा रही है।

 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के नेता डी. राजा चीयर लीडर्स का सबसे पहले विरोध करने वालों में शुमार थे। रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) के अबनी राय तो एक कदम आगे बढ़कर इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) को ही प्रतिबंधित किए जाने की मांग कर देते हैं। उनका तर्क है कि आईपीएल के मैच परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर देखे जाने लायक नहीं हैं।

 

लेकिन इन सबके बीच सबसे मजेदार बयान आया पश्चिम बंगाल सरकार के खेल मंत्री सुभाष चक्रवर्ती का। उन्होंने ऐसा बयान दिया कि जिसकी जरूरत नहीं थी। बहरहाल, उनके बयान को उनकी खींझ के रूप में देखा जा रहा है। क्योंकि हालिया दिनों केरल में हुए पार्टी कांग्रेस में पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु के सुझाव के बावजूद उन्हें पार्टी पोलित ब्यूरो में शामिल नहीं किया गया।

 

वामपंथी खासकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) नेताओं की ओर से आए इस प्रकार के बयानों को उन्हें मौजूदा राजनीति में नजरअंदाज किए जाने के बाद एक फिर से अपनी जगह बनाने के प्रयासों के रूप में देखा गया।

 

बहरहाल, संस्कृति और परम्परा दो ऐसे शब्द हैं जिन्हें आज अपशब्द के रूप में देखा जाने लगा है। बहुत कम ही लोग है जो यह विस्तार से चर्चा करना चाहेंगे कि भारत की सभ्यता क्या रही है और क्या इसकी संस्कृति रही है। क्या यह ऐसी चीज है जिसे इतने बड़े और इतनी भिन्नता वाले समाज में इतनी आसानी से परिभाषित किया जा सकता है।

 

भारत में खजुराहो और कोणार्क के मंदिर हैं तो यहां प्रेम के प्रतीक के रूप में ताजमहल भी है। कामसूत्र भी भारत की ही संस्कृति का हिस्सा है। ऐसे में चीयर लीडर्स को अशीलता से कैसे जोड़ा जा सकता है।

 

यदि यह हमारी संस्कृति पर प्रहार है तो भारत क्यों फिर विदेशी निवेश की ओर आंखे गडाए बैठा है। क्यों इस देश की अधिकांश आबादी द्वारा अपने बच्चों का भविष्य संवारने के लिए उन्हें विदेशों के प्रसिध्द स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ने भेज दिया जाता है। क्या यह संभव है कि यह बच्चे इन देशों की संस्कृति से अछूते रह जाएंगे।

 

कुछ दिनों पहले की ही घटना है जब उत्तर पूर्व के एक राज्य में साड़ी की जगह पारम्परिक वस्त्र पहनने के कारण एक राजनयिक को उसके वरिष्ठ अधिकारियों ने प्रताड़ित किया गया। कोलकाता में ही कुछ दिनों पहले एक छात्रा को कक्षा में उपस्थित नहीं रहने का फरमान सिर्फ इसलिए जारी कर दिया गया क्योंकि साड़ी की जगह वह सलवार सूट पहन कर कालेज चली आई थी।

 

वास्तव में कपड़ों से अशीलता नहीं झलकती है। यह लोगों के दिमाग में होती है। बलात्कार संबंधी शायद ही कोई ऐसा मामला सामने आया हो जिसमें पीड़िता ने कम कपड़े पहने हो और उसके चलते उसके साथ बलात्कार किया गया हो।

 

इसलिए, चीयर लीडर्स और आईपीएल पर प्रतिबंध लगाने से बेशक ही कुछ नेताओं के राजनीतिक अंक बढ़ जाए लेकिन किसी विदेशी मेहमान पर इस प्रकार अति प्रतिक्रिया करना भारत की विश्वनीयता व परिपक्वता पर सवाल जरूर खड़ा करेगा।

-प्रणय शर्मा

(लेखक आईएएनएस में कूटनीतिक सम्पादक हैं)

 

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

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