मुखपृष्ठ  |  कहानी कविता | कार्टून कार्यशाला कैशोर्य चित्र-लेख |  दृष्टिकोण नृत्य निबन्ध देस-परदेस परिवार | फीचर | बच्चों की दुनिया भक्ति-काल धर्म रसोई लेखक व्यक्तित्व व्यंग्य विविधा |  संस्मरण | सृजन स्वास्थ्य | साहित्य कोष |

 

 Home |  Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact | Share this Page!

 Click & Connect : Prepaid International Calling Cards 

You can search the entire site of HindiNest.com and also pages from the Web

Google
 
चैनल्स  

मुख पृष्ठ
कहानी
कविता
कार्यशाला
कैशोर्य
चित्र-लेख
दृष्टिकोण
नृत्य
निबन्ध
देस-परदेस
परिवार
फीचर
बच्चों की दुनिया
भक्ति-काल धर्म
रसोई
लेखक
व्यक्तित्व
व्यंग्य
विविध
संस्मरण
सृजन
स्वास्
थ्य
साहित्य कोष
 

   

 

 

शुतुरमुर्ग

लौटा तो चार बज चुके थेछ: बजे गाडी ज़ाती थी वह सिर तक ओढे चारपाई पर लेटी हुयी थीसारे दिन की भाग दौड से मैं थक गया थाधम्म से सोफे पर बैठ गया, इससे वह चौंकी और रजाई हटा कर मुँह खोलाउसका चेहरा लाल था शायद बुखार रहा होदिन भर के कार्यकलाप के बारे में मैं ने उसे बतायाकहा कि सब कुछ ठीक - ठाक हो गया है और परसों वह स्कूल ज्वाईन कर लेस्कूल जाने के पहले वह परिषद् के दफ्तर में बडे बाबू से मिल लेप्रधानाध्यापिका के नाम बडे बाबू एक आदेश दे देंगे, जिससे प्रधानाध्यापिका उसे ज्वाईन करने से नहीं रोकेगीझगडे वाले पिछले दो महीनों के वेतन के लिये भी वह पूरा केस बना कर निदेशालय को संस्तुति के साथ भेज देंगे, जहाँ वह स्वीकृत हो जाएगाउसने हल्की सी शंका प्रकट की कि कहीं परसों उसे फिर दिक्कत न हो; किन्तु मैं ने उसे आश्वस्त किया कि कार्यकारी अधिकारी से बात हो चुकी है, सारी चीजें तय हो चुकी है और अब इसमें कोई संशय नहीं है। वह निश्चिंत हो गई।

मैं ने पूछा - ''क्या बात है, कुछ तबियत खराब है? ''
''सिर में दर्द है, शायद बुखार भी है।''
मैं ने उसका सिर दबाया। विक्स लगाई। मैं बडे असमंजस में था। इस हालत में जाने को कैसे कहूँ। किन्तु रुकना मंहगा पड सकता था। घर में झगडा होने का खतरा था। अत: अपराधबोध को दबा कर मैं ने सकुचा कर कहा, ''मेरी गाडी क़ा समय हो रहा है।''

'' कल तो इतवार है, क्या करेंगे अभी जाकर? ''
''दो दिन हो चुके हैं घर से आये। छुट्टी में रुकने का कोई औचित्य भी नहीं है।''
''दरअसल आप ऊब जाते हैं। मुझसे पिण्ड छुडा कर भागते हैं।''
''नहीं। तुम मेरी दिक्कत जानती हो। यों ही घर में झगडा होता है, देर करने से और गडबड होगी।''
''मैं नौ साल से आपके साथ हूँ। आखिर मेरा भी तो कोई हक है। वह तो घर में बैठी है बच्चों के साथ, इज्जत और सारी सामाजिक गरिमा के साथ। यहाँ मैं बीमार हूँ, अकेली हूँ। हर त्यौहार-पर्व पर रोती रहती हूँ। मेरे बच्चे इधर-उधर लोगों का मुँह देखते रहते हैं। मैं आज आपको नहीं जाने दूंगी।''
''जाना तो एकदम जरूरी है।''
''मैं नहीं जाने दूंगी।''
''अगर फिर न आना होता तो बात और थी। मैं जल्द ही आऊंगा।'' मैं ने समझाया।
''मेरा सिर फटा जा रहा है, मुझे तंग न करो।''
'' मैं चला जाऊंगा तो दर्द ठीक हो जाएगा।''
''इसके मायने कि मैं नाटक कर रही हूँ! ''
''नहीं। दर्द इस झगडे क़ो लेकर है जो हम लोगों के बीच है। जाने से चूंकि समस्या ही मूल से खत्म हो जाएगी, दर्द भी जाता रहेगा।''
''चाहे कुछ कहो मैं नहीं जाने दूंगी।''
''जाँऊगा तो जरूर। तुम हर बार ऐसे ही लडती हो।''

मैं ने अटैची उठाई। तब तक साढे पाँच बज चुके थे। देर करने से गाडी छूट सकती थी।
'' चलिये, आपके पीछे-पीछे मैं भी आती हूँ। देखती हूं कैसे जाते हैं! कोई तमाशा है चाहे जब चले आए, चाहे जब चल दिये। कोई जिम्मेदारी कोई फर्ज नहीं।''
''तुम ऐसे ही लडती हो। पागल हो। तुम्हें कोई बहाना चाहिये।''

'चारपाई से वह उठे इसके पहले ही मैं चल दिया। कुछ दूर पर रिक्शा मिला। स्टेशन पहुंचातो गाडी क़ा समय हो चुका था। किन्तु गाडी आधा घण्टा लेट थी। मुझे भूख लगी थी। स्टेशन के जलपानगृह में पूडियाँ लेकर मैं खाने लगा। तभी जाली के दरवाजे से वह दिखाई दी प्लेटफार्म पर तेज़-तेज़ चलती हुई, बौखलाई सी, पागल सी, बदहवास और अस्त-व्यस्त सी। मैं ने उसे पुकारा। पूडियाँ खाने को कहा। उसने इनकार कर दिया। पैरों के पास रखी अटैची उसने उठा ली।

''बोली, चलिये घर।''
''तुम समझती क्यों नहीं कि मेरा जाना कितना जरूरी है।''
''मैं कुछ नहीं समझती पर आप वापस चलिये।''
''मैं नहीं जाँऊगा। लाओ अटैची दो।''
''अटैची नहीं दूँगी।''
''क्यों बेमतलब की बात करती हो? मैं दो-तीन दिन में फिर आऊँगा।''
''कल इतवार है। आप दफ्तर जाने का बहाना भी नहीं कर सकते। चलिये वापस।''

मुझे गुस्सा आता जा रहा था। गुस्से को दबा कर धीमी किन्तु सख्त आवाज में मैं ने कहा,'' अटैची दो।''
 ''नहीं दूँगी।''
 ''मैं ऐसे ही चला जाँऊगा।''
 ''चले जाओ।''

गाडी आने ही वाली थी। स्टेशन पर हलचल बढ ग़ई थी। मुसाफिर सतर्क हो गये थे। कुलियों ने भागा-दौडी आरम्भ कर दी थी। जब गाडी स्टेशन पर आ लगी तो मैंने फिर अटैची मांगी पर उसने इनकार कर दिया। गाडी क़ेवल पाँच मिनट ही रुकती थी। जब गाडी चलने लगी तो मैं एक डिब्बे में चढ ग़या। चढ तो मैं गया। किन्तु सोचा कि घर पहुँच कर झगडा होगा। लाख बहाना करुंगा किन्तु पत्नी यही कहेगी कि, उसी के पास गये होंगे; अटैची वहीं छोड आए होंगे। अत: चलती गाडी से मैं उतर आया। तब तक गाडी क़ो चलता देख वह प्लेटफार्म से बाहर निकल चुकी थी। जब मैं प्लेटफार्म के बाहर पहुंचातो वह रिक्शे में अटैची रख कर बैठने जा रही थी।

मुझे देख कर बोली,''आइए, बैठिये।''
''मैं घर नहीं जाँऊगा। मैं एक तरफ चल दिया।'' अटैची उठाए वह भी मेरे पीछे-पीछे पैदल चल दी। मैं बहुत गुस्से में था।

'' तुम बडी बेशर्म हो। खुदगर्ज हो, नीच हो। केवल अपनी ही बात सोचती हो।''
''घर चलिये। बाजार में लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे।? घर पर चाहे कुछ कहियेगा।
नहीं जाँऊगा। तुमको शर्म नहीं आती। जिन्दगी तबाह कर दी तुमने।''
''घर चलिये।''

एक दुकान पर मैं ने कुछ पत्रिकाएं खरीदी और फिर प्लेटफार्म पर आ गया।वह मेरे पीछे-पीछे थी। अटैची भारी थी। उसे बुखार था। वह हांफ रही थी। मैं ने सोचा यह इस हालत में कैसे अटैची ढोएगी। कहा, ''तुम थक गई होगी, अटैची मुझे दे दो।'' पर वह नहीं मानी। प्लेटफार्म पर मैं एक बैन्च पर बैठ गया। वह भी मेरे पास बैठ गई। दूसरी गाडी साढे आठ बजे आती थी। लगभग आठ बज रहे थे। कहा,  ''देखो एक गाडी छूट चुकी है। साढे आठ बजे वाली गाडी से मुझे चले जाने दो।''

'' मैं नहीं जाने दूंगी। क्यों नहीं रहते मेरे साथ कुछ दिन? मुझसे अकेले नहीं रहा जाता बीमार रहती हूँ। बच्चे तंग करते हैं। घर संभालो, पांच मील सायकिल से स्कूल जाओ और लौटो।''
'' तुम बिलकुल बेवकूफ हो।''
''मैं बेवकूफ ही सही, पर घर चलो। अगर न गए तो मैं भी आज इसी गाडी क़े नीचे कूद कर जान दे दूँगी।''

मेरे क्रोध का पारावार न रहा। लगा कि यह सोचती ही नहीं । मेरी मजबूरी और दिक्कत को समझना नहीं चाहती। केवल अपनी बात करती है।

'' दे दो जान। मर जाओ।रोज़-रोज़ के झंझट से तो मुक्ति मिले।''
''मैं तो पहले ही मर जाती। इसीसे बचती रही कि कहीं आप न फंस जाएं।''
''मेरी चिन्ता न करो। जो भी होगा एक ही बार न होगा! भुगत लूंगा। दो-चार, दस-बीस हजार रुपया ही तो खर्च होगा, झगडा तो खत्म हो जायेगा। आज तुम्हारी रोटी की समस्या, कल नौकरी की, परसों मकान की, फिर बच्चों की, फिर बीमारी। रोज कुछ न कुछ।''
''मैं क्या अपने आप समस्या पैदा करती हूँ? कौन सुखी हूँ इस तरह आपके साथ? मैं तो उस समय को कोसती हूँ ज़ब आपको देखा था। सब कुछ तबाह हो गया। इस दयनीय हालत में पहुंचा दिया आपने। कहीं कुछ नहीं है। मेरा पति, माँ-बाप सब छुडवा दिये। बच्चे बडे होंगे तो वे भी गाली देंगे। कहेंगे - हमारी माँ चरित्रहीन थी। सारी दुनिया भी बच्चों पर थूकेगी। ताने देगी कि इनकी माँ कलंकिनी थी, अपने आदमी को छोड क़र सरे आम दूसरे के साथ रहती थी।''
''क्यों क्या बहुत अच्छी हालत में आईं थीं तुम मेरे पास? याद है उस दिन ट्रेन में भिखारिन को देख तुमने कहा था कि ऐसी ही हालत तुम्हारी भी हो जाएगी।''
''आपको यही तो दुख है कि मेरी वैसी हालत नहीं हुई।''
''तुम एकदम कमीनी हो। इस तरह सोचती हो।''

हम लोग कुत्तों की तरह झगडने लगे थे। सारे तर्क खत्म हो गए थे। केवल गुस्सा ही बाकि था और विरोध के लिये विरोध। हम लोग भूल गए थे कि पिछले नौ वर्षों में हमने कितने दुख उठाए थे। इस धर्मशाला से उस होटल, इस शहर से उस शहर भागते रहे थे। दुनिया और समाज की निरकुंश और कुटिल वृत्तियों से साथ लडते रहे थे। कितने संघर्ष के बाद, जिल्लत और अपमान सहने के बाद यहाँ पहूँचे थे कि किसी तरह उसके पास एक नौकरी थी और सिर छिपाने के लिये एक छत। हम भूल गए थे कि कितने मकानमालिकों ने किस-किस प्रकार बेइज्जत करके हम लोगों को मकानों से निकाला था और कितनी नौकरियाँ उसे छोडनी पडी थीं। पर शायद हम लोग टूट चुके थे। शायद वह मुझे सम्पूर्ण और अकेले चाहती थी। वह नहीं चाहती कि मैं किसी भी दूसरी स्त्री के पास जाँऊ। और घर में मेरी पत्नी थी।

वह बोली,  ''जीते जी नहीं जाने दूँगी।''
हर प्रयत्न विफल हो चुका था। मैं ने कहा,  ''एक शर्त पर रुक सकता हूँ कि तुम सुबह आठ बजे की गाडी से जाने से नहीं रोकोगी।''
''ठीक है, पर आप रात में घर पर झगडियेगा नहीं। आप तो गाली देकर, मुझे अपमानित करके चले जाते हैं। कभी सोचा है कि पीछे कैसे जिन्दगी ढोती हूँ? मैं थक गई हूँ, तंग आ गई हूँ। बच्चों को इस तरह नहीं देखा जाता। बेचारा दस वर्ष का लडक़ा खाना बनाता है, पानी लाता है, बाजार से सामान लाता है, बर्तन साफ करता है। अब मुझसे नहीं होता यह सब कुछ। यह तो नहीं होता आपसे कि मुझे कुछ सहारा दें। उपर से डाँटते हैं। इतनी तंगी है कि एक पैसा हाथ में नहीं है। आपसे भी कहाँ तक कहूँ? कितना करें आप भी? माँ ने आने को लिखा है। पिछली बार जब आई थी तब भी घर में कुछ नहीं था। उसी ने सारा खर्चा किया था। बच्चों से लोग तरह-तरह की बातें करते हैं। वह जो वकील है बडे से पूछ रहा था, तुम्हारे कितने बाप हैं?  दोनों बच्चे झगडते रहते हैं। मुझसे उठा नहीं जाता। छोटे के जूते बिलकुल फट गए हैं। स्कूल नहीं जा पा रहा। लोगों को क्या जवाब दूँ? कहते हैं,  रखैल की तरह रहती है फिर भी इस तरह फटेहाल! रखैल शब्द सीने में गोली की तरह लगता है। मैं ने तो प्यार में शहीद हो जाने के, मर-मिट जाने के सपने बुने थे; पर कहाँ पहुँच गई मैं? पिताजी के न रहने से एकदम अनाथ महसूस करती हूँ। वैसे भी वो जब थे तो तभी क्या कर सकते थे? न देख पाते थे, न चल-फिर पाते थे। फिर भी एक भरोसा-सा था। लगता था कोई है। एक-एक करके दाँत गिरते जा रहे हैं। डॉक्टर ने एक्सरे को कहा है। सीने में दर्द रहता है और बुखार भी। क्या करूं? आप तो कुछ कहते नहीं, बस डाँटते रहते हैं। आपकी परेशानी समझती हूँ। फिर भी मैं बहुत दिन नहीं रहूँगी आपको तंग करने के लिये। मेरे बाद मेरे बच्चों का क्या होगा? इस बेगैरत जिन्दगी का क्या अर्थ हो सकता है?''

आगे पढें

 

Hindinest is a website for creative minds, who prefer to express their views to Hindi speaking masses of India.

             

 

मुखपृष्ठ  |  कहानी कविता | कार्टून कार्यशाला कैशोर्य चित्र-लेख |  दृष्टिकोण नृत्य निबन्ध देस-परदेस परिवार | बच्चों की दुनिया भक्ति-काल धर्म रसोई लेखक व्यक्तित्व व्यंग्य विविधा |  संस्मरण | सृजन साहित्य कोष |
प्रतिक्रिया पढ़ें! |                         प्रतिक्रिया लिखें!

HomeBoloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact

(c) HindiNest.com 1999-2015 All Rights Reserved. A Boloji.com Website
Privacy Policy | Disclaimer
Contact : manishakuls@gmail.com