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ठठरी

दो साल खाली रहने के बाद जब उसे नौकरी मिलने के कुछ आसार लगे तो जैसे उसे त्रिलोक का राज ही मिल गया या जैसे महीनों के भूखे को रोटी मिलीउसने सोचा अब वह पिता को इतना सुख देगा कि बेरोजगारी के दिनो में उसके प्रति किए गए अपने व्यवहार से वह शर्मिन्दा हो उठेगें और विभाग में अपने काम से ईमानदारी और कर्मठता की मिसाल कायम करेगाअगले ही क्षण उसे अपने सोच पर शर्मिन्दगी हुईउसे लगा पिता के बारे में इस तरह सोचने से उसने पाप किया हैउसे याद आया कि किस तरह तकलीफें उठा कर पिता ने उसे पढाया थाघर गिरवी रख दिया था और मां की बीमारी का इलाज भी वह ठीक से नहीं करा पाये थेहालांकि वह सोचता था कि जो होना होता है वही होता है और मां की मौत या घर के हाथ से निकल जाने के लिए खुद को जिम्मेदार मान कर उसका दु:खी होना बेमतलब भावुक होना ही है

अचानक उसे मां की याद आ गई थकी, उदास पर स्नेहिल मांऔर फिर पिर्ता चुप्पे और क्रोध से भुनभुनाते हुएपिता उसे सुबह जल्दी उठा देते जिससे उसे सबसे ज्यादा चिढ होतीरात में भी पिता उसे जल्दी नहीं सोने देतेक्या था उनमें? कैसी छटपटाहट थी जो उन्हे चैन नहीं लेने देती थी? लगता जैसे वह चाहते हो कि दो साल का डिप्लोमा वह छ: महीने में ही पास कर लेंपिता के व्यवहार से हमेशा ऐसा लगता था जैसे उसके पास वक्त बहुत कम हैजैसे वह जल्दी में हैं जैसे तैसे ये साल गुजरे और उसने सिविल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा पास कर लियापर इस बीच पिता का धैर्य चुक गया थावह उसे जल्दी से जल्दी नौकरी में लगा हुआ देखना चाहते थेपर कहां थी नौकरी? सुबह से शाम तक वह ठोकरें खाता और रात देर गए घर लौट आता ज्यों-ज्यों दिन बीतते गए पिता का सब्र का बांध टूटता गयादो-तीन महीने बीतते बीतते वह उसे कोसने लगे, गालियां देने लगेमां का हत्यारा और घर उजाडू क़हने लगेउसे कभी कभी बडा बुरा लगता इच्छा होती कहीं डूब मरे य पिता का गला घोंट देवह सोचता और छटपटाता, क्या होता है बेटे का मतलब? कर्तव्य! मां-बाप की आंखो में संतोष की किरण! नौकरी की अंतहीन तलाश! उसका बडा मन होता कि इस कर्तव्य नामक हिंस्र जीव को अपने सर से उतार फेंके और एक बार अपनी निजी मुक्त आंखो से इस दुनिया को देखेसर्दियां आने से पहले गुनगुनी हवाओं में अपने शरीर के अंदर बजते संगीत को सुने

राम-राम करके दो साल बीतेपर इस बीच पिता को प्लूरेसी हो गईउसे पी ड़ब्लू  ड़ी  में नौकरी तो मिली पर नियुक्ति नए सृजित जनपद पिथौरागढ में हुई जहां विकास की अनेक योजनाएं आरम्भ हो रही थीपर वह चाहता था कि उसे मुजफ्फरनगर के आर्सपास है कहीं उसे नौकरी मिले ताकि वह पिता की देखभाल कर सके और उपेक्षित पडी ग़ांव की थोडी सी जमीन और ढहते हुए मिट्टी के छोटे से मकान की भी साज संभाल कर ले

वह दौडा दौडा लखनऊ गया और सिविल सर्जन द्वारा दिया गया पिता की बीमारी का प्रमाण पत्र चीफ इंजीनियर को दिखाकर उनसे अनुरोध किया कि उसे मुजफ्फरनगर के आस पास तैनात कर दिया जाए, क्योंकि उसके घर में कोई भी और बीमार पिता की देखभाल करने वाला नहीं हैचीफ इंजीनियर ने कहा,'' मै आपके इस प्रमाण पत्र पर शक नहीं कर रहा हूंपर अभी तक जितने भी लोगो को हमने सीमान्त क्षेत्रों मे नियुक्त किया है बिना किसी अपवाद के सभी ने स्वयं अपनी, पत्नी, मां या बाप की बीमारी के मेडिकल सर्टिफिकेट हमें दिए है जो बाकायदा मेडिकल अफसरों और सिविल सर्जनों द्वारा जारी किए गए हैपर हम विभाग को बंद नहीं कर सकतेहमें काम करना है और देश के विकास को गति देनी है''

उसने गिडग़िडाते हुए विनती की,'' कुछ तो ख्याल कीजिए साबमेरे पिता बूढे और बीमार हैकोई नहीं जिसके भरोसे मैं उन्हे छोड सकूं''

चीफ इंजीनियर ने शायद कुछ द्रवित होते हुए य उसे लगा कि वह द्रवित हुए है, कहा,'' ठीक हैअभी तो आप ज्वाइन करें मैं अक्टूबर में दौरा करता हूं आप वहां मुझे मिलेंजो कुछ हो सकेगा आपके लिए किया जायेगा''

पिथौरागढ ज़ाने के अलाव कोई चारा नहीं थापिता को साथ लेकर वह पिथौरागढ पहुंचा और वहां ज्वाइन कर लियाशुरु में उसे बडा अजीब लगता थाविचित्र गोरखधंधा था वहां सामान्य मानवीय व्यवहार, जिससे अब तक वह परिचित था, वहां नहीं थाआपसी संबंधों और शिष्टाचार के लिए भी वहां के नियम कुछ भिन्न प्रकार के थेबेटे की उम्र के असिसटेन्ट इंजीनियर बाप की उम्र के ओवरसीयरों को गुलामों की तरह डांटतेओवरसीयर भी साहब लोगो के सामने कुत्तों की तरह दुम हिलातेजिसकी दुम जितनी ही लंबी होती वह उतना ही सफल होतासाहब लोगो के सभी निजी काम भी ओवरसीयर ही करतेओवरसीयर अपने अपने घरों से सुबह सात-आठ बजे तक निकल जातेवे संबंधित एक्सीक्यूटिव और असिटेन्ट इंजीनियर के घर आते, जहां वे राजकीय और अफसरों के निजी कामों के बारे में उनसे आवश्यक निर्देश लेतेअफसर के बच्चे के दाखिले का मामला हो, मेम साब को डॉक्टर के पास ले जाना हो, सिनेमा के टिकट लाने हो या संपूर्ण रामायण, सत्यनारायण की कथा या बच्चे का जन्मदिन का मामला हो, ओवरसीयर हर जगह तत्पर मिलतेअफसरों के बीच हए सप्ताह एक गेट-टूगैदर होता था जिसमें शामिल हुए बगैर ओवरसीयर उसका भी सारा इंतजाम करतेकुछ ओवरसीयर ऐसे भी होते जो अफसरों के घरों में सब्जियां, गेहूं, चावल आदि से लेकर साडियां, सूट और जूतों तक का प्रबन्ध करतेऐसे ओवरसीयरों का सारा इंतजाम बडा टंच रहता और सभी अफसर उनसे प्रसन्न रहतेऐसे ओवरसीयर अंदर से बडे घाघ होते हैवह बडी होशियारी से अपने आपको उन प्रपंचो से बचाए रखता

अचानक एक रात जब वह अपने एक मित्र के यहां से खाना खाकर अपने घर लौटा तो उसने अपने पिता को मरा पायावह धाड मार-मारकर रोने लगा कालोनी में रहने वाले सभी उसके सहयोगी, बाबू और अफसर इकट्ठे हो गएएक्स्क्यूटिव और सुपरिटेन्डिग इंजीनियर भी दौडे-दौडे आए। सुपरिटेन्डिग इंजीनियर ने तुरन्त एक ट्रक का इंतजाम करवाया, पिता की लाश को ट्रक में रखवा कर दो आदमियों के साथ सुबह होते-होते उसे उसके घर पर मुजफ्फरनगर भेज दिया

तेरहवीं के बाद वह लौटासितम्बर का अंतिम सप्ताह था आमतौर से आसमान साफ रहने लगा था पिथौरागढ क़ी घाटी अपनी जादुई छटा दिखाने लगी थीचारों तरफ आडू, ख़ूबानी, अलूचों के पेडों पर अभी तक फल आ रहे थे और सेबों के पेड फ़ूलने लगे थेसडक़ के किनारे पर धूल और गर्द से अंटी किडमौडे क़ी झाडियों में फल लगने ही वाले थेदूर चोटियों पर कुहासा छाया रहता थापर भटकोट की ऊंची कालोनी से सुबह और शाम को मौसम साफ होता तो, बर्फ से ढकी चोटियों का सिलसिला दिखाई देतावह डूबते सूरज को वहां अठखेलियां करते देखता था और पन्त की पंक्ति '' पल परिवर्तित प्रकृति वेश '' दोहरातारात के गहन अंधकार में तारे लपलपाते रहतेपर इन सारे कार्र्यकलापो के बीच उसे चीफ इंजीनियर का इंतजार रहतावह चीफ इंजीनियर का इंतजार करता रहा और पिता के न रहने से बडा दु:खी रहता

पर एक जानलेवा निषिध्द सवाल के पंजे में उसका मन हमेशा फडफ़डाता रहता कि क्या वाकई वह पिता के न रहने से इतना दुखी है या उसका असली दु:ख यह है कि पिता की मौत के रूप में पिता के सामने अपने को एक आज्ञाकारी और आदर्श बेटा सिध्द करने का सुनहरा अवसर उससे छीन लिया गया है

कभी-कभी उसके मन में पिता के लिए दबा दबा सा क्रोध उठता कि वह उसे पराजित करके चले गए हैउसकी इच्छा कि वह पिता को दिखायेगा कि दुखी असहाय और अपने आश्रित व्यक्ति से, चाहे वह बेटा या बाप क्यों न हो, कैसे व्यवहार किया जाता है, धरी की धरी रह गईअगले ही क्षण उसे अपने विचार बडे अश्लील और खतरनाक लगते और वह जानबूझ कर उस दृश्य को याद करने लगता जब पिता की मौत के वक्त वह अनाथ बच्चे की तरह रो-रोकर कह रहा था कि उसने चीफ इंजीनियर से कहा था कि पिथौरागढ मत भेजो और सुपरिटेन्डिग इंजीनियर ने उसका कंधा थपथपाकर उसे सांत्वना देते हुए कहा था - अक्टूबर में चीफ इंजीनियर के आने पर तुम्हारा तबादला तुम्हारे घर के आस-पास करवा देगें'' उसे सुपरिटेन्डिग इंजीनियर का हाथ अबभी अपने कंधे पर महसूस होता और उसे बडी ताकत मिलती

चीफ इंजीनियर जब आए तो वह उनसे मिला सुपरिटेन्डिग इंजीनियर भी वहां थे सुपरिटेन्डिग इंजीनियर ने चीफ इंजीनियर से उसके पिता की दर्दनाक मौत का किस्सा संक्षेप में बयान करते हुए सिफारिश की कि उसे कही मैदानी इलाके में भेज दिया जाएउसने भी कहा,'' साब, मैने पहले ही आपसे कहा था कि मुझे यहां मत भेजिए आपने वादा भी किया था कि अक्टूबर में जब आप यहां आयेगे तो मेरा तबादला कर देगेंअब तो मेरे पिताजी भी नहीं रहेमैं निपट अकेला और असहाय रहा गया हूं''

चीफ इंजीनियर ने कहा,'' वेरी सॉरी! आप के पिता के लिए मुझे बडा दुख हैपर अब आप को क्या परेशानी है? आपको दिक्कत पिता को लेकर थीअब वे नहीं है तो आप परेशानी से मुक्त हुए''

उसने जब फिर जिद की तो चीफ इंजीनियर ने सख्ती से कहा,'' अभी आप जवान हैइस्तीफा देकर चले जाइए आसपास क्यों, मुजफ्फरनगर में ही आपको कोई नौकरी मिल जाएगीबहुत सी प्राइवेट फैक्ट्रियां है वहांअब मेरा वक्त और बरबाद मत काीजिए''

चीफ इंजीनियर तुरन्त मुंह घुमाकर सुपरिटेन्डिग इंजीनियर से किसी सडक़ की प्रगति के बारे में पूछताछ करने लगे वह अपमानित और पराजित वहां से चला गयाउसकी इच्छा हुई कि चीफ इंजीनियर को जूते ही जूते लगाएसुपरिटेन्डिग इंजीनियर, सारे अफसर और सहयोगी जो बेसब्री से चीफ इंजीनियर के आने का इंतजार कर रहे थे और तरह तरह के दावे कर रहे थे कि उसका तबादला करा के ही दम लेगे, चुप हो गए और पहले से भी अधिक मनोयोग से चीफ इंजीनियर की सेवा में जुट गए, क्योकि इस प्रसंग से लोगो को लग रहा था कि चीफ इंजीनियर का मूड थोडा बिगड ग़या है

कुछ दिन वह उखडा-उखडा सा रहा फिर उसमें एक अप्रत्याशित बदलाव आयाकेवल पैसा कमाना उसने जीवन का ध्येय बना लियादूसरे, उसने महसूस किया कि अफसर बहुत बडी चीज हैअफसर खुश है तभी जीवन में आनंद है वरना कुछ नहींअत: उसने उसूल बना लिया कि अफसर को प्रसन्न करने का कोई भी मौका कभी भी हाथ से नहीं जाने देगा पिथौरागढ क़ी तहसील मुनसियारी से एक ओवरसीयर भाग खडा हुआवहां काम बहुत था और आमदनी अच्छी थीतुरन्त वहां एक ऐसे ओवरसीयर को भेजा जाना था जो वहां स्वयं अपनी इच्छानुसार जाना चाहता हो वहां जाकर काम कराये और डर कर भाग न जाए, क्योंकि वहां की सर्दी, अकेलापन और अन्य दिक्कतों के कारण हर आदमी वहां नहीं जाना चाहता थामुनसियारी बहुत ऊंचाई पर है और साल में कई महीने बर्फ से ढकी रहती हैपर अब उसको इन बातों से क्या फर्क पडता थासभी जगह उसे एक जैसी थी उसे तो पैसे की जरूरत थी और वह मुनसियारी में थाउसने अपनी सहमति दे दी और उसे मुनसियारी भेज दिया गया

मुनसियारी में कई सडक़ो का निर्माण हो रहा थाएक सडक़ थी मुनसियारी-मिलममिलम जग प्रसिध्द ग्लेशियर है जो और भी अधिक ऊंचाई पर हैवह क्षेत्र बिल्कुल सुनसान रहतागरमियों मे कुछ केवल कुछ सैलानियों को छोडक़र या सरदियों में तिब्बत के और भी ऊंचे पठारों से नीचे की ओर जाते हुए भेडाे के रेवडाे के साथ स्थानीय निवासियों के अतिरिक्त वहां कोई भी और नहीं आतासच पूछो तो उस समय यानि सन साठ तक तो वहां सैलानी भी नहीं आते थेसरदियों में लकडी क़े मकानों की निचली मंजिले बर्फ से ढक़ जातीवहां लकडी क़े दो मंजिले मकान होतेलोग ऊपर मंजिल में रहते धूप ढलते ही एक अकेला छोटा सा बाजार ऊंघने लगतालोग घरो में दुबकने लगते ठंडी हवाएं डरावने डैने फैलाने लगती और सन्नाटा अजगर की तरह पसरने लगतागरमियों के दिनो में निचली घाटियों में बुरूंस के पेडों पर फूल आग के कौधों की तरह लपकते सारी घाटी अंगारे की तरह लाल हो जाती ऊपर चारो ओर देवदार और फर के पेड समान को छूते होते और पहाड क़े ऊंचे नीचे अंतहीन सिलसिले इधर-उधर फैले दिखाई देते न संगी साथी थे, न मन बहलाने के और समय काटने के साधनऊब थी, अकेलापन था और सन्नाटा थाबर्फ थी, हवाएं थी, धूप थी और चीखती चिल्लाती चांदनी थी

दो तीन महीने बीतते उसमें कुछ नई रुचियां पैदा होने लगीवह दो घंटे पूजा करता, स्थानीय बनी शराब पीता और पहाडी लडक़ियों से अपना दिल बहलाता और अपने काम में मेहनत से जुटा रहतामुनसियारी मिलम सडक़ का निर्माण एक दुष्कर कार्य थासडक़ का दौरा करने के लिए कम से कम 50 कि  मी  पैदल चलना पडतारास्ते दुर्गम और खतरनाक थे अत: बडे अफसर यानी एक्स्क्यूटिव और सुपरिन्डेटिंग इंजीनियर जो पचास के ऊपर हो गए थे और जिनका मुख्यालय पिथौरागढ में था मुनसियारी तक पहुंचते-पहुंचते हिम्मत हार बैठते यद्यपि हर बार पिथौरागढ से यह निश्चय करके निकलते कि इस बार मुनसियारी-मिलम सडक़ का दौरा अवश्य करेगें

हल्के-हल्के वह बडा कुशल और चतुर ओवरसीयर हो गया थावह कभी किसी अफसर को शिकायत का मौका नहीं देताअफसरों को खुश करने में वह सिध्द हो गया थाअफसर चाहे उसे डांटे और दुत्कारे वह कभी पलट कर जवाब नहीं देता और  र्है हैं  करता रहताअफसरों को वह दाता कहता अफसरों की डांट फटकार तथा थोडी ज्यादती को वह अनुशासन के लिये आवश्यक मानताद्याह कहता, विभाग में पैसा कमाने आए हैं, नाक उंची करने नहींमुनसियारी में वह अधिकारियों की हर तरह सेवा करताखानेपीने से लेकर ऐश आराम तक जैसा वे चाहते अफसरों को उपलब्ध कराताउन पिछडे अन्दरूनी पहाडी लाकों की किशोरियाँ जो झरनों और पेडों की तरह निश्छल होतींलेकिन गरीब भीऔर जिन्हें रंगबिरंगे इन लकदक अफसरों को देख कर पहले तो डर लगता फिर कौतुक होता, आमतौर पर खुशी खुशी उनका खाना बनाने और रात में सेवा टहल करने पहुंच जातीबर्फ गिर रही होती, सांभर का मांस पक रहा होता, बांज की लकडियों से रेस्ट हाउस के कमरे गर्म हो रहे होते और पहाडी क़िशोरिया अफसरों की बांहो में किलोले कर रही होतीबाहर वह खुश हो रहा होता उसने दो दूरबीनों का इंतजाम कर रखा होताउस पहाडी मुनसियारी-मिलम पर जहाजहां बडे-बडे मोड( हेयर पिन बैन्ड) प्रस्तावित थे, उन्हे उसने बिल्कुल साफ कटवा रखा होताबाकी सडक़ पर उसने कोई काम न करवाया होताजब सुबह होती तो अधेड अफसरों पर खुमारी छायी रहतीउनके बदन टूटते रहते चाय की चुस्कियों के बीच वे उससे सडक़ की निर्माण संबन्धी जानकारी लेतेवह उन्हे बताता कि काम लक्ष्य से अधिक हो चुका हैवे चाहे तो चल कर देख ले बल्कि वह जोर देकर अनुरोध करता कि वे सडक़ पर अवश्य चले ताकि ठेकेदारों को भुगतान किए जा सके, क्योकि ठेकेदारों ने अनुबन्ध से अधिक काम कर दिया हैअफसर लोग तेज तेज बोलते वे कहते कि बस वह तैयार हो कर चलते है ताकि शाम ढलने से पहले लौट सकेंपर वह जानता होता कि यह केवल दिखावटी जोश हैऔर सचमुच अफसरों की सडक़ पर जाने की हिम्मत नहीं पडतीवे वहीं रेस्ट हाउस में पडे-पडे क़ागजों को निपटाते रहते, उसे डांटते रहते, चाय और दारू पीते रहते, खाना खाते रहतेइस बीच वह उनके हाथों में दूरबीन पकडा देता जिससे वह तथाकथित नव निर्मित सडक़ को देखतेउन्हे सडक़ के मोड क़टे और निर्मित नजर आते जिससे उनके दिलों पर विश्वास हो जाता कि सडक़ का निर्माण कार्य पूरा हो चुका हैंऔर उन्हे सडक़ पर जाने की कोई जरूरत नजर न आतीउनके दिमाग में ये बात भूले से भी नहीं आती कि कोई इतनी चालाकी भी कर सकता हैं कि केवल मोड पर ही काम कराए और बाकी सडक़ यूं ही छोड देइस बीच वह ठेकेदारों के बिल भुगतान के लिए प्रस्तुत करता जिन्हे साहब लोग पास कर देते

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