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अपने अपने अरण्य

हरे भरे पेडों और झाडियों से ढक़ी पहाडियों से घिरे इस विशाल जंगल के एक छोर पर बसी इस छोटी सी बस्ती में जब सवेरे की पहली बस आकर रुकती हैं, तो यहां के ठहरे हुए जीवन में जैसे एक हलचल सी आरंभ हो जाती हैंबीती रात की अच्छी बारिश के बाद सवेरे तक जारी बूंदाबांदी अब पूरी तरह बंद हो चुकी थी और भूरे-मटमैले बादलों की लगातार आवाजाही के बावजूद आसमान मौन थाहलकी सी आवाज के साथ बस के साथ आकर रुकते ही आसपास के ढाबों और थडियों से निकलकर लोग बस को घेरकर खडे हो गए थे

बस्ती के नाम पर यहां ज्यादातर तो नेशनल पार्क के लिए बनाए गए कुछ भवन और मकान हैं
उनके अलावा कृषि, पशुपालन, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, डाकतार जैसे महकमों के भी छोटे-छोटे भवन और एक दो वन विभाग का गैस्ट हाउस, जिसमें ज्यादातर तो वन विभाग और सरकारी महकमों के अधिकारी आते हैं, कभी-कभार कुछ सैलानी भी आकर ठहर जाते हैंथोडे बहुत कच्चे मकानों में आसपास के गांववासी है, जे पहले कभी इन्ही पहाडियों के बीच बसे गांवों में अपना गुजर बसर करते थेबस्ती में एक प्राथमिक स्कूल है और डाकखाना भी है जो यहां के कर्मचारियों और निवासियों की सुविधा के लिए बनाया गया हैपार्क के मुख्यद्वार के आगे से होकर गुजरती इस खुली सडक़ का सिरा आगे जाकर राष्ट्रीय राजमार्ग से जुडज़ाता है और दूसरा पास ही के जिला मुख्यालय सेसडक़ पर दिन भर वाहनों की आवा-जाही बनी रहती हैइस रूट पर चलने वाली ज्यादातर बसें और यात्री वाहन पार्क आने वाले सैलानियों से ही भरे होते है, जिन्हे इसी मुख्यद्वार पर लाकर उतार दिया जाता है और वापस लौटने वाले भी इसी द्वार के पास बने शेड के नीचे य सडक़ के पार बनी चाय की कच्ची थडियों और ढाबों के आसपास बैठकर वाहनों का इंतजार करते हैं

रुकी हुई बस के बीच वाले गेट से एक-एक कर उतरती सवारियों के बीच अपने ढीले-ढाले लिबास को संभाले जब मानसी ने सामने खडे लोगो की ओर नजर दौडाई, तो उसे मुस्कुरा कर हाथ हिलाते हुए रोहित दिख गए थे, उसने भी अभिवादन में अपना दाहिना हाथ ऊपर उठा दिया था और अगले ही क्षण वह बस से नीचे उतर आई थीरोहित के साथ खडे वन कर्मी ने आगे बढक़र उसका सूटकेस और बैग अपने हाथों में संभाल लिया था और सामान लेकर वह रोहित से कुछ दूरी पर जाकर रुक गया थाबस से उतरकर मानसी सीधे रोहित के सामने आकर खडी हो गई थी - उसके मुस्कुराते चेहरे के पार कुछ और भी तलाश करती हुई सीउसे अपनी ओर इस तरह देखते अनायास ही रोहित ने पूछ लिया था -

'' कैसी हो मानसी?''
''
जी कैसी हो सकती हूं आपके बगैर?'' हल्की सी मुस्कराहट के साथ यकायक निकल आये इस सवालिया जवाब में जैसे उसने बहुत कुछ कह दिया था। सुनकर एक बार अचकचा गया था रोहित।
''
मेरा मतलब है रास्ते में कोई तकलीफ तो नहीं हुई?'' अपने को संभालते हुए उसने बात आगे बढाई।
''
नहीं, तकलीफ कैसी ये तो पूरा रास्ता ही इतना खूबसूरत है और फिर सुबह ही बारिश ने तो इसे और भी खुशगवार बना दिया''
''
इसलिए तो सैलानी ऐसे ही मौसम में यहां आना पसंद करते है। वैसे घर चलना पसंद करोगी या गैस्ट हाउस'' उसके स्वर में शराारत थी या कुछ और, वह ठीक से पकड नही पाई। बस हल्की सी उदासी के साथ इतना ही कह पाई
''
जैसा आप ठीक समझें।''
उसे लगा मानसी बुरा मान गई।
''
ओ के बाबा, ऑय एम सॉरी! सामान घर ले चलो भैया।'' उसने अपने से थोडी दूर पर खडे वनकर्मी को निर्देश दिया और वह दोनो पैदल ही घर की ओर चल दिए, जे ज्यादा दूर नहीं था।

रोहित चालीस कै उम्र पार करता दरम्याना कर्दकाठी का हंसमुख सा इंसान था, जिसे वन अधिकारी के रूप में इस छोटी सी बस्ती के कर्मचारी और निवासी ही नहीं, जंगल के जानवर भी उतने लगाव से जानते थेरास्ते में जो भी मिलता, उससे हंस कर दुआ-सलाम जरूर करता

मानसी को यह देखकर अच्छा लगा कि उसका बंगला खूब खुला-खुला और साफ सुथरा थाघर के चारों तरफ हरी घास का लॉन और चहार दीवारी के पास ऊंचे-ऊंचे अशोक और मोरपंखी के पेड थे अंदर के कमरों का एक बार मुआयना कर लेने के बाद वह हाथ-मुंह धोने बाथरूम में चली गई थी और रोहित उसका सामान लेकर बैडरूम मेंजब वे दोनो वापस बैठक में आये, तब तक रोहित का सेवक गोपाल चाय बनाकर ले आया थाहाथ-मुंह धो लेने से वह काफी तरो-ताजा महसूस कर रही थीअभी कपडे नहीं बदले थे, अलबत्ता जूडे में बंधे हुए बालों को उसने अवश्य खोल दिया थाचाय का प्याला उठा कर पहला घूंट लेते हुए उसी ने बात शुरू की थी -

'' और आप कैसे है?''
''
बस जैसा हूं, तुम्हारे सामने हूं खुद ही जान लो'' वह नहीं जान पाई कि वह वाकई खुश है ये उसी की तरह भीतर से उन्मन।
''
और कौन लोग रहते है, यहां आपके आसपास?''
''
बहुत लोग र्है पार्क का स्टाफ है, गांववासी है, गोपाल हैऔर तमाम तरह के जानवरो से भरा हुआ जंगल है''

रोहित ने इसी तरह हास परिहास के माध्यम से माहौल को जैसे हल्का-फुल्का बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन मानसी, उसका यह उत्तर सुनकर भी जैसे और कुछ जानने की गरज से उसी के चेहरे की ओर देखती रही

'' बच्चे कैसे है?'' थोडा संजीदा होते हुए रोहित ने पूछ लिया था।
''
अच्छे है, लेकिन तुम्हे बहुत मिस करते है मैं उन्हे क्या समझाऊं रोहित? अब वह बडे हो रहे है क्या तुम्हे उनकी याद नहीं आती?'' यही पूछते हुए मानसी यकायक उदास हो गई थी।
''
आती क्यों नहीं मानसी। इसलिए तो पूछ रहा हूं।  अपने काम की कुछ मजबूरियां है आए दिन जंगल में जानवरों के मारे जाने की घटनाएं हो रही है जिनकी वजह से यहां का काम बढ ग़या है लेकिन उम्मीद है जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा। और कैसी चल रही है उनकी पढाई वगैरह?''
''
वैसे तो ठीक ही चल रही है बस तुम्हारे लिए जब पूछने लगते है, तो समझाना मुश्किल हो जाता है फिर कोशिश करती हूं'' बोलते-बोलते वह अचानक रुक गई थी। उसे लगा कि वह इस तरह ज्यादा देर तक सहज रह कर बात नहीं कर पायेगी।
''
खैर चिन्ता की कोई बात नहीं, मैं खुद जल्दी ही आऊंगा बच्चों के पास।'' वह बात को समेटते हुए जैसे उठने की तैयारी में था।
''
तो अभी वापसी में मेरे साथ नहीं चलेंगे?'' पूछते हुए थोडी रुंआसी सी हो आई थी मानसी, लेकिन फिर तुरंत अपने आप को संभाल लिया।
''
देखता हूं बात करनी होगी हेड ऑफिस से।'' इतना कहते हुए रोहित अपनी जगह से उठ गए थे।

मानसी रोहित के व्यवहार में आए इस ठण्डे बदलाव से थोडी और चिन्तित हो उठीउसे लगा कि रोहित के मन में पिछली बातों का तनाव अभी भी बना हुआ हैवह खुद अपनी उलझनों से बहुत संतप्त रहती आई है और वह नहीं चाहती कि उसका कोई अपना उसी की तरह आत्म-संताप से पीडित रहेअनिकेत ठीक ही कहते है, कई बार आवेश के क्षणों में हम अपना संतुलन खो बैठते है, जीवन के छोटे-छोटे संदेह हमारे समूचे जीवन विवेक और अनुभव पर भारी पड ज़ाते है और जब तक हमें इस बात का एहसास हो पाता है, हम अपने समय और संबंधों का पर्याप्त नुकसान कर चुके होते हैअपने पत्रों में वह बार-बार रोहित को यहीं समझाने की कोशिश करती रही कि उनके बीच की उलझनों का असर बच्चों पर न पडे, लेकिन यह सब अकेले उसके हाथ में तो नहींअपने पिछले पत्र में तो जैसे उसने समूचे प्राण ही उडेल दिये थे, उसके बावजूद जब रोहित घर नहीं लौटा और न ही उसका कोई जवाब आया, तो उसे लगा कि वह उसे खो देगीउसे खुद से ज्यादा अपने बच्चों की फ्रिक थी, जो अपने पिता को बेहद प्यार करते थे और जिन्हे उनकी सख्त जरूरत थीइस दौरान अनिकेत जब भी मिले, उसे यहीं सलाह देते रहे कि वह फौरन रोहित से खुद जाकर बात करें, पति-पत्नी के बीच किसी तीसरे माध्यम के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती, चाहे वह कितना ही अजीज़ और आदरणीय क्यों न होअगर अनिकेत ने इतना आग्रह न किया होता तो शायद आज वह यहां न होती और न ही रोहित के स्वभाव में आ रहे इस बदलाव को जान पाती

'' तुम चाहो तो थोडी देर आराम कर लो, मैं तब तक ऑफिस का कुछ जरूरी काम निपटा कर आता हूं। दोपहर का खाना हम साथ खायेगे। और अगर कुछ नाश्ता करना हो तो गोपाल को बता देना, वह बना देगा।''

यह कहते हुए रोहित बाहरी दरवाजे की ओर बढ ग़ए थे और वह उसी तरह अपनी जगह पर बैठी उसका जाना देखती रही उसकी चाय कबकी खत्म हो गई थी, लेकिन खाली प्याला अब भी उसके हाथों में मौजूद थावह उसी तरह सोच में डूबी रहीकुछ देर बाद उसे लगा कि कोई उसके पास खडा उससे कुछ पूछ रहा हैजब वह अपनी संज्ञा में लौटी तो सामने गोपाल खडा था और उससे खाली कप मांगते हुए पूछ रहा था -

'' थोडी और चाय बना दूं मेम साब।''
''
नहीं गोपाल, बस रहने दो।''
''
जी मेमसाब।'' छोटा सा उत्तर देकर उसने मानसी के हाथ से खाली प्याला थाम लिया और टेबल पर रखे बाकी बर्तन समेटने लगा। मानसी ने देखा, वह एक बीसेक साल का मासूम स लडक़ा था, जवानी की दहलीज पर कदम रखता हुआ सा।
''
यहीं रहते हो, साहब के साथ?'' उसने यूं ही पूछ लिया था।
''
नहीं मेमसाब, पास में ही क्वाटर है, वहीं मां के साथ रहता हूं।''
''
और कौन-कौन है घर में।''
''
बस मां है और दो छोटी-छोटी बहनें।'' इतना बताकर वह चुप हो गया था।
''
और पिताजी?''
''
वो नहीं हैंदो साल पहले इसी जंगल में एक हादसे का शिकार हो गए थे। उनकी खाली जगह पर साहब ने मुझे रख लिया है।'' यह सब बताते हुए थोडा उदास हो गया था गोपाल।
''
ओह आय एम सॉरी गोपाल।'' उसे सांत्वना देती हुई वह भी जैसे उसी के दुख में डूब गयी थी। गोपाल ने सारे बर्तन उठाकर ट्रे में रख लिए थे।
''
अच्छा गोपाल, ये बर्तन रसोई में रखकर तुम अभी घर चले जाओ, मैं थोडी देर आराम करूंगी। चाहो तो दोपहर में खाने से पहले लौट आना।''
''
जी, अच्छा मेमसाब।'' छोटा सा उत्तर देकर वह रसोई की ओर लौट गया।

गोपाल के चले जाने के बाद मानसी ने नहाकर अपने कपडे बदले और थकान दूर करने के लिए कुछ देर बाद वहीं सोफे पर लेट गईउसे भीतर कहीं लग रहा था उसकी यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है - उसका गंतव्य अभी और आगे हैवह कब बेसुध होकर अपने गुजरे दिनों की ओर लौट गई, उसे कुछ सुध न रही

अनिकेत के साथ उसकी अंतरंगता की एक अलग ही पृष्ठभूमि हैउसे मित्रता के सामान्य मापदण्डों से समझ पाना आसान नहीं हैखुद अनिकेत को उसके अपने घर-परिवार वाले भी कम ही समझ पाते है, पत्नी भी कई तरह की आशंकाओ से घिरी रहती है, लेकिन अनिकेत अपनी निजी जिंदगी के बारे में कभी कोई चर्चा नहीं करतेमानसी जो भी थोडा बहुत उनके बारे में जान पाई, वह इधर-उधर से टुकडों-टुकडों में प्राप्त हुई जानकारियां थी, लेकिन अनिकेत से इस मसले पर बात करने की जब भी कोशिश की, वे टाल जाते थेबेशक वे भिन्न स्तरों पर एक दूसरे की रूचियों और रचनात्मक उपलब्धियों से प्रभावित होकर ही एक दूसरे के प्रति आकर्षित हुए हो, लेकिन पारिवारिक व्यक्ति के रूप में अनिकेत की अपने घर के प्रति जबावदेही और साफगोई ने उन तमाम आकर्षणों को वक्त आने पर इस तरह छांट-तराश दिया कि खुद मानसी को ही अपने व्यक्तित्व में एक अलग तरह की परिपक्वता और परिवर्तन महसूस होने लगाअनिकेत का सारा लगाव इस बात पर टिका हुआ था कि मानसी की रचनाशीलता में उसे एक अलग तरह ही ताजगी और तडप दिखाई दी थीउसकी दूधिया कविताओं और कैनवस पर उभरते अमूर्त आकारों में जो मौलिकता और संभावनाए उसे दीख रही थी, वह उसका सही विकास और विस्तार देखना चाहता था

मानसी अपने व्यक्तिगत जीवन में इस बात का श्रेय अनिकेत को ही देती है कि रोहित के साथ उसका रिश्ता और पारिवारिक जीवन उसी के आग्रह और प्रयत्न का प्रतिफल हैउस बात को उसके परिवार वाले मानते हैरोहित से अनिकेत की यह रिश्ता तय होने से पहले कोई व्यक्तिगत मुलाकात नहीं थी, लेकिन उसके बारे में अनिकेत ने इतनी जानकारी अवश्य प्राप्त कर ली थी कि वह एक संजीदा और संवेदनशील युवक हैउसका वानिकी सेवा में चयन भी निश्चित हो चुका था और उसे वह मानसी के लिए हर तरह से उपयुक्त जीवनसाथी लगा थामानसी के प्रति भी उसे यह विश्वास जरूर था कि वह जिसे भी अपनाएगी उसे अपने आत्मिक लगाव और उसके जीवन में अपनी अथक साझेदारी से उसे संवार लेगी

जिन दिनों वह अनिकेत से मिली थी, वे उसके जीवन के सबसे कठिन दिन थेउसने कभी सोचा भी नहीं था कि जिस गौरव को उसने जवानी की दहलीज पर कदम रखने से लेकर अगले चार साल तक जी-जान से प्यार किया, जिसके लिए अपने घर-परिवार वालों की सारी नाराजगियां सही, अपने शुभचिन्तकों की हर सलाह की अनदेखी की और जिसके लिए वह हर मुसीबत का सामना करने के लिए तैयार थी, वहीं गौरव वक्त आने पर बाहरी दबावों के आगे झुक गया और बिना बताए इस तरह उसे मंझधार में छोडक़र भाग खडा हुआ जैसे कभी कुछ हुआ ही न होउसे तो एकबारगी सारे रिश्ते-नातों पर से जैसे आस्था ही उठ गई थी, यहां तक की खुद अपनी जिंदगी से भी जैसे कोई मोह नहीं रह गया थावे तमाम सराही जाने वाली रचनाएं और कैनवस पर उभरती आकृतियां उसी टूटन को ही तो व्यक्त कर रही थी उस वक्त यह अनिकेत ही तो थे, जिन्होने उसे मानसिक यंत्रणा और टूटन के बीच और बिखरने से रोक लिया थाऐसे ही कठिन दौर में अनिकेत उसकी जिंदगी में एक सच्चे दोस्त की तरह आये और आत्मीय संरक्षक की तरह उसे उस मानसिक ऊहापोह और मंझधार से बाहर ले आएउन्ही ने उसके अंत:करण में यह बात बिठाई कि किसी एक बुरे अनुभव से अपनी अनमोल और संभावनाओं से भरी हुई जिंदगी को बेवजह सजा देना खुद अपने साथ भी अन्याय करना है

अनिकेत के इतने लगाव से समझाने का मानसी पर यह अनुकूल असर अवश्य पडा कि वह थोडे ही दिनों में गौरव की बेवफाई के बुरे अनुभव से बाहर निकल आईउसने अपनी बकाया पढाई पूरी कीअपनी रुचियों के कामों को और दिलचस्पी से करने लगीजब वह पी एच डी कर रही थी, उसी वर्ष एक प्रतिष्ठित वार्षिक कला-प्रदर्शनी में उसकी भी चार कलाकृतियां प्रदेश के बडे क़लाकारों के साथ प्रदर्शन के लिए चयनित कर ली गई थी - इससे वह बहुत उत्साहित थीउसी कला-प्रदर्शनी से जुडी एक विचार-गोष्ठी में अनिकेत ने जिस तरह प्रदर्शित विभिन्न कला कृतियों की बारीक व्याख्या की, जिसमें मानसी की कला-कृतियों का विशेष उल्लेख था, उसे सुनकर वह बहुत देर तक अभिभूत रहीपहली बार किसी ने उसके काम को सार्वजनिक रूप से इस तरह सराहा थावह मन ही मन में अनिकेत के प्रति कृतज्ञता और लगाव से भर उठी थी

संयोग से उन्ही दिनों मानसी के घर में उसके रिश्ते की भी बात चल रही थी, लेकिन मानसी अभी शादी न करने की जिद पर अडी हुई थीउसने गौरव को तो मन से निकाल दिया था, लेकिन वह नये रिश्ते के लिए भी अपने को तैयार नहीं कर पा रही थीउधर लडक़े वाले जल्दी फैसला करने के बारे में तकाजा कर रहे थेमानसी के मां-बाप की दुविधा बढती जा रही थीउन्ही दिनों अनिकेत भी दो-एक बार बहुत आग्रह करने पर मानसी का काम देखने उसके घर भी आ चुके थे, यों वे मानसी के पिता को पहले से ही जानते थे और मानसी के पिता भी इस बात को जानते थे कि मानसी अनिकेत का बहुत आदर करती हैइसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होने पिछली मुलाकात के दौरान अकेले में अनिकेत से यह अपेक्षा अवश्य की थी कि वे मानसी को एक अच्छे रिश्ते के लिए मनाने में उनकी मदद करेंअनिकेत ने उन्हे आश्वस्त किया था कि वे कोशिश करेंगे

उस दिन आर्ट गैलरी के पास बने रेस्तरां में चाय पीते हुए अनिकेत ने बहुत अपनेपन से मानसी से उस रिश्ते के बारे में बात की तो पहले तो वह यहीं कह कर टालती रही कि वह अपनी पढाई पूरी करना चाहती है, लेकिन जब अनिकेत ने ज्यादा जोर दिया तो वह अपनी इच्छा और मनोभावों को दबा कर नहीं रख सकीउसने दबे स्वर में यह बता दिया कि वह तो उन्ही को पसंद करती हैउसकी यह अप्रत्याशित बात सुनकर वह एकाएक गंभीर हो गया थावह गौरव के साथ मानसी के बुरे अनुभव से परिचित था और वह नहीं चाहता था कि वह फिर से किसी तनाव का शिकार हो, इसलिए अनिकेत ने बहुत आत्मीयता और संजीदगी से समझाया कि वह जो सोचती है, वह असंभव हैयह अनिकेत की इतनी आत्मीयता और धैर्य से समझाने का ही परिणाम था कि मानसी ने उसी दिन घर पहुंच कर रोहित से अपनी शादी का रिश्ता कुबूल कर लियाअनिकेत अपनी व्यस्तताओं के कारण मानसी और रोहित की शादी में तो शरीक नहीं हो पाया, लेकिन शादी से कुछ दिन पहले, जब मानसी उसे शादी का कार्ड देने आई थी तो उसने उसे यह आगाह अवश्य कर दिया था कि अब उसे अपने पारिवारिक रिश्तों, स्कूल कॉलेज के दिनों की अपनी दोस्तियों और अपनी रुचियों से जुडे उन तमाम संपर्को और संबधों के बारे में नये सिरे से सोचना और व्यवहार करना होगा, उन्हें अपने पारिवारिक सुख और पति-पत्नी के अंतरंग रिश्तों की रोशनी में नये सिरे से जांचना-परखना होगा कि वे किस तरह उनके पारिवारिक जीवन को ऊष्मा और गति प्रदान कर सकते है

मानसी ने अब अपना एक मानस बना लिया था और वह अपने मनोभावों की कोई और परीक्षा नहीं चाहती थीउसने शादी में आने के लिए अनिकेत से बहुत आग्रह भी नहीं कियाइस आखिरी मुलाकात के बाद अगले सात सालों तक उनके बीच कोई सम्पर्क नहीं रहामानसी अपने पारिवारिक जीवन में रम गई थी और अनिकेत उसी विश्वविद्यालय में पढाते हुए अब रीडर हो गए थेइसी बीच उनकी कुछ किताबें भी प्रकाशित होकर चर्चा में आ चुकी थीपत्रिकाओं में भी उनकी कहानियां और लेख आदि छपते रहते थेउन्ही दिनों एक पत्रिका में छपी कहानी पर उन्हे अपनी डाक में एक छोटे से पत्र के रूप में मानसी की प्रतिक्रिया मिली और उसी से यह जानकारी भी वह उन्ही के पास के एक शहर में रोहित का तबादला होने के कारण आ चुकी हैउसने यह भी आग्रह किया था कि वे जब भी कभी उनके शहर में आएं, उनसे मिले बिना न जाएंरोहित को भी उनसे मिलकर बहुत अच्छा लगेगा और इस तरह एक अन्तराल के बाद आत्मीयता का वह सूत्र फिर से जुड ग़या

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