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तूफान

ठीक बाईस साल बाद मिल रहे थे हम फोन पर उसकी आवाज पहचानते देर न लगी वही खनकवही रुतबावही हंसीवही बात करने का अन्दाज और वही दूसरों को अपने व्यंग्यात्मक शब्दजाल से क्षत विक्षत करने की शैली

'' क्या तुम मुझसे मिलने होटल में नहीं आओगी? असोका लेक व्यू में रुके हैं हम। कल शताब्दी से वापस जाना है। कहाँ कहाँ से पता करके लिया तुम्हारा फोन नम्बर।''
''
घर के होते हुए होटल में क्यों रुकी हुई हो ? ''
''
हमें भरोसा थोडी न था कि तुमसे बात हो जाएगी।'' वह शिकायती लहजे में बोली।
''
देखो इतने साल बाद मिल रहे हैं तो बैठेंगे। गप्पें लगाएँगे। पुरानी यादें ताजा करेंगे। सच कितना मजा आएगा।'' मैं ने उत्फुल्ल होकर कहा।
''
इनको नहीं जमेगा। अपना क्या, अपन तो फिर भी रह लेंगे।''
''
तुम मेरे पास ही रुक जाना। जीजाजी को मैं राजी कर लूंगी।''
''
अच्छा देखेंगे, अब तुम जल्दी से आ जाओ या इनकी गाडी ज़ल्दी आ जाती है तो मैं आ जाँऊगी।''

उसके आने की खबर सुन कर मैं बहुत खुश थी इतनी खुशी कि जैसे किसी अलभ्य वस्तु को प्राप्त करके होती हैअपनी पुरानी सहेली को देखने का लोभ थामिलने का हुलास थाअपने जीवन की, उसके जीवन की एक एक बात जानने की तीव्र उत्कंठा कुलाँचे भरने लगीकितनी खुश होगी वो मुझे यूं देखकरमैं जानती हूँ वह मुझे उतना ही प्यार करती होगी जितना पहले करती थीबाईस साल पुराना चेहरा सामने आ खडा हुआथोडा सा स्थूल शरीरगरदन अन्दर को धंसी हुई सीपाकार आंखों में लगा काजल ऊपर को बंधी दो चोटियांचौडी प्लेट वाला स्कर्ट और शर्ट, कैसी लगती थी तब! मैं मुस्कुरा दीअब भी वैसी ही लगती है या बदल गई हैस्कूल के दिन, स्कूल की सैकडों शरारतें, हंसी ठहाके, और भी जाने कितनी रहस्यमयी...बेवकूफी भरी...हृदय की गहराईयों में समायी बातें, कितनी जगहें और वे तमाम चेहरे याद करके मैं रोमांचित हो उठी थी जिस सुन्दर सुरम्य निश्छल भावनाओं से भरी दुनिया से मैं कोसों दूर चली आई थी, वही थिरकती हुई दुनिया अचानक मेरे सामने आ खडी थीवह एकाकी नहीं आ रही थी अपितु साथ ला रही थी पूरे कालखण्ड कोसशरीर! ताज्जुब कि अपना ही बीता हुआ जीवन मैं क्यों और कैसे विस्मृत कर बैठी थी? क्या मैं तेज भागती रही या समय मुझसे आगे निकल गयामैं ने घर को ठीक ठाक किया परदे, चादरें बदलीं

'' माँ, आज आपको क्या हो गया है? क्यों कर रही हो इतना सब?
 इतना तो आप किसी के लिये नहीं करतीं! ''
''
मेरी सहेली आ रही है न। तुम नहीं समझ सकोगे। तुम तो जल्दी से ये सामान ला दो।''

मैं ने उसकी पसन्द की एक एक चीज मंगवाई वह कितनी खुश होगी यह जानकर कि मुझे आज भी उसकी एक एक पसन्द याद हैमेरे साथ उसकी एक बहुत पुरानी फोटो थीपता नहीं किस एलबम में थीकाफी देर तक ढूंढने के बाद मिलीउसको अच्छा लगेगा ये सोचकर, तुरन्त फोटो फ्रेम में लगा दीइस फोटो में हमारी उम्र की मोहक छवि झलक रही थी

'' ये आप हो माँ! '' बच्चे जोर जोर से हंसे जा रहे थे।

घर में पैसा है या नहीं यह मैं ने देखा हो सकता है होटल जाना पडे सबको लेकर क्या करुं किससे उधार मांगूं? अच्छा भी तो नहीं लगता है मांगनामम्मी को फोन लगाया, '' मम्मी दो हजार रुपये दे दोगी? मेरी सहेली आ रही हैहाँ वहीवैसे तो पैसे हैं मेरे पास मगरउसके सामने कम नहीं पडने चाहिये'' मैं ने सकुचाते हुए कहाछुट्टी की एप्लीकेशन भिजवा दीबहुत जरूरी काम थे ऑफिस में मगर मेरी सहेली का आना इन सबसे ज्यादा मायने रखता थाबेचैनी के साथ तैयार होकर मैं उसकी प्रतीक्षा करने लगीमेरे घर का एक एक पत्ताहवा में लहराते परदेफूलसभी कुछ उसका स्वागत करने को उतावले लग रहे थे

'' माँ, आज आपको क्या हो गया है? चार्ली चैपलिन की तरह काम कर रही हो।'' बच्चे मुझे चिढा रहे थे मगर इस समय मैं कुछ भी नहीं सुन रही थी। मेरा मन उड रहा था और निगाहें सडक़ की ओर लगी हुईं थीं एकदम दूर तक। सरकारी जीप से उसे उतरते देखा तो भाग कर नीचे जा पहुंची मैं सडक़ के उस पार। गले लग कर लगाजैसे बहुत ऊंची चोटी से गिरते ऊष्म, निनादित झरने को छुआ हो वही ऊष्मा, वही ध्वनि मैं ने महसूस की आंखों से बहते आंसू थम नहीं रहे थे। जब कभी हम नाराज हो जाते थे तो अपने छोटे भाई बहन के हाथों खूब लम्बे लम्बे खत लिख कर अपने हृदय की बातें, शिकायतें प्यार वफा जीवन भर न भूलने के वायदे और नाराजग़ी व्यक्त किया करते थे और सामने मिलने पर यूं ही रोया करते थे। बेशब्द मुस्कुराते हुए। कैसी अद्भुत दुनिया थी वोआकाश की तरह अनन्त। नक्षत्रों की तरह प्रकाशवान। हवाओं की तरह वेगवान।

मैं ने देखा उसकी सीपाकार आंखों में आंसू सूख चुके हैं और वो हल्के से मुस्कुरा कर बोली, '' अरे तुम तो वैसी की वैसी होहमीं मोटे हो गये हैं क्या बहुत काम करती हो या डायटिंग कर रही हो या नौकर वगैरह नहीं रखे हैं'' क्षण भर के लिये मैं सकपका गईबच्चे उत्सुकता तथा विस्मय के साथ देख रहे थेसुनेंगे तो क्या कहेंगे कि जिस सहेली के बारे मैं सुबह से उन्हें बताए जा रही थी, तारीफ किये जा रही थी, उसने आते ही ऐसे सवाल पूछना शुरू कर दियेऊपर आकर उसने चारों तरफ गहरी बींधती लम्बी खोजती दृष्टि से देखावह दृष्टि खाली नहीं थी बल्कि भरी हुई थी तमाम प्रश्नों, जिज्ञासाओं और शंकाओं सेमैं बार बार उस फोटो की तरफ देख रही थी ताकि वह उसे देख सके मगर उसने उडती हुई नजर से उस तरफ देखा, जैसे कोई बासी चीज पडी हो

'' अभी तक रखा है इस फोटो को! मैं ने तो फाड दिया, छि: कितनी गन्दी है।''
उसने मुंह बनाते हुए कहा।
''
यह हमारे बचपन का स्मृतिफलक है।'' मैं ने वापस रखते हुए कहा।
''
तुमने तो एकदम सम्बन्ध ही तोड दिये। कभी चिट्ठी तक नहीं लिखी। न शादी की खबर दी। हमीं हैं जो अपने को रोक न सके। क्या करती रहीं इतने सालों तक? तुम्हारे लिये तो दोस्ती बहुत मायने रखती थी मगर तुम्हीं दोस्ती के नाम पर कलंक निकलीं।''

वह अपने लाल होंठों को गोल घुमा कर बोली उसके होंठों की भाषा मेरे मन पर खुदती जा रही थीउसके पूछने पर मैं संभल गई उसको हक था शिकायत करने का, मेरे बाईस वर्षों की जिन्दगी की परतें उधेडने का क्योंकि पुरानी सहेली जो थीतब हम बच्चे थे बल्कि यौवन की दहलीज पर कदम रखते हुए अपनी देह और आत्मा से बेफिक्रअल्हडअपनी ही मौज में डूबे हुए घर गृहस्थी, रूपया पैसा  जाति पांति, छोटा बडा सबकुछ हमारे लिये महत्वहीन थाअपरिचित थाबस पढाई और दोस्ती यही तो था हमारा जीवनपानी की धारा की तरह बहता हुआ स्वच्छधवलअबाधमैं चुपके से उठ कर गई और मामा को फोन लगाया

'' मामा, शाम को दो घण्टे के लिये गाडी मिल जायेगी?''
''
क्यों क्या बात है? कोई इमरजेन्सी है क्या?
''
नहीं मामा, मेरी सहेली आई है। उसको घुमाना चाहती हूँ अगर गाडी फ़्री हो तो।'' मैं न चाहते हुए भी गाडी क़े लिये विवश करने लगी।
''
मुझे जाना था बेटे।''
''
क्या दो घण्टे के लिये नहीं दे सकते आप?''
''
अरे इतनी औपचारिकता क्यों करती हो। सहेली ही तो है कोई गवर्नर तो नहीं, फिर भी मैं कोशिश करुंगा।''
मैं आश्वस्त हो उसके पास बैठ गई।
''
जीजाजी क्या करते हैं? सिर्फ तनख्वाह में घर चल जाता है या कमाई का और भी कोई साधन है। बच्चे कौनसे स्कूल में पढते हैं? उन्हें कौन पढाता है? तुमने तो आया रखी होगी।''

बच्चों को सामने बैठा देखकर भी अनदेखा करती हुई बोली वहउसका गदराया हुआ शरीर पारदर्शी ब्लाउज में से दमकता हुआ दिखाई दे रहा थामैं पति और बच्चों के बारे में बताने लगीआखिर उसकी जिज्ञासाओं को शान्त करना मेरा फर्ज था!

'' और सुनाओ।'' उसने पांव पसार कर बैठते हुए कहा। मेरा मन हल्का सा बेचैन तथा उदास हो गया। उसके आने से पूर्व जो उद्दीपत थिरकती हुई खुशी थी वह मंद होने लगी। उसकी उपस्थिति ने घर के माहौल में अजीब सी हलचल पैदा कर दी थी। लग रहा था मेरे घर की हर चीज उसके निशाने पर है।

'' तो तुमने यह भी जानने की कोशिश नहीं की कि हम लोग कहाँ पर हैं, किस हाल में हैं?'' वह रूठते हुए बोली। मैं ने देखा उसने अपने बालों को रंगवाया हुआ है सफेद जडों को छुपाने के लिये बार बार बाल संभाल रही है। मेरा मन हल्का सा व्यथित तथा चिन्तित हो उठा। इसके बाल पक गये हैं? क्यों! क्या कोई तनाव है। पूछूंगी।
''
क्या बताऊं पिछले कई वर्षों से इतनी अधिक व्यस्त रही बल्कि घर परिवार में डूबी रही कि बाहर की दुनिया से सम्पर्क ही कट गया था। कौन कहाँ है यह सोचना तो अलग मैं खुद कहाँ हूँ इस बारे में सोचने तक का वक्त नहीं मिला। समय तो अपनी गति से चलता ही है। हमीं पीछे रह जाते हैं। सच तुमने आकर मेरे भावों को जगा दिया, तुमने याद तो किया।'' मैं भावुक होकर बोली।
''
तो क्या ससुराल वालों से कोई समस्या है? सब साथ में रहते हैं या अलग?'' मेरी भावुकता को रूपान्तरित करते हुए बोली वह।
''
नहीं, अब तो सारी जिम्मेदारियों से मुक्त हूँ बस, बच्चों का भविष्य देखना है।''
''
बच्चों का क्या भविष्य देखना? वे खुद अपना भविष्य बना लेंगे। हमारा भविष्य किसने बनाया था? कोई पूछता था? देखता था? जो भी हो, तुम बहुत मतलबी निकलीं। इनको देखो हम चुप नहीं बैठे। एक एक के घर जा चुके हैं, पता करते रहते हैं कि कौन कहां पर है? क्या कर रही है? दिशा ने तो बहुत बडा मकान बना लिया है, हस्बैन्ड इन्जीनियर है सो कमाई भी अच्छी है। उमा यहीं पर है, उसके पति का बिजनेस है और माधुरी जिसे लडक़े चिट्ठियां लिखा करते थे चली गई  आर्मीवाले से शादी की है और अनुराधा का तलाक हो गया। नौकरी करके दिन काट रही है।'' वह लगातार साथ में पढने वाली लडक़ियों का जीवन परिचय बताए जा रही थी और मैं उचाट मन से सुन रही थी, हालांकि थोडी बहुत जिज्ञासा मेरे मन में भी थी सबके बारे में जानने की।
''
चलो कहीं घूमने चलते हैं, बहुत दर्शनीय जगहें हैं यहां। कुछ मौज मस्ती करेंगे।'' मैं ने मौसम की सुन्दरता तथा शीतलता देखते हुए कहा।
''
क्या रखा है तुम्हारे शहर में? घूमने तो हम कुल्लू मनाली, दार्जिलिंग या साउथ जाते हैं।'' उसने एक वाक्य में ही पूरा भारत भ्रमण करवा दिया।
''
मैं ने गाडी बुलवाई थी कि तुम जरूर घूमना पसन्द करोगी खैर नहीं जाना चाहती हो तो घर में ही बैठते हैं, तब तक तुम बुक्स देखो।''

मैं ने सारी चीजें पौंछ कर चमका कर रख दी थींमैं खाना बनाने की तैयारी करने लगीबाई को मना कर दिया था उसकी मनपसन्द चीजें मैं अपने हाथों से बना कर खिलाऊंगी मेरा मन अतिउत्साही था और हाथ मशीन की तरह काम कर रहे थे वह मेरे पास किचन में आकर बैठ गई बडे बुजुर्ग़ों की तरह मेरी किचन का मुआयना करने लगीउसकी तीक्ष्ण निगाहें एक अलमारी में विराजमान मूर्तियों पर आकर टिक गई

'' यह क्यातुम और पूजा?'' वह मेरा मजाक उडाते हुए बोली। उसका चेहरा हंसी से खिंचने के कारण थोडा चौडा सा लग रहा था किसी सपाट वस्तु की तरह।
''
क्यों! ऐसा क्यों कह रही हो? '' मैं ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा जिनमें उपहास के भाव लहरा रहे थे। ''इसलिये कि तुम्हें तो कभी विश्वास न था भगवान पर, व्रत उपवासों में।''
''
वो तो आज भी नहीं है। पर उस परमात्मा पर पूरा अखण्ड विश्वास है। अपने किये का सारा लेखा जोखा वह यहीं इसी जगत् में हमें दिखा देता है। किसी के कहने न कहने से क्या फर्क पडता है? मैं तो अपनी आत्मा को मानती हूँ और सब कुछ उसी पर छोड देती हूँ।''
वह मेरी बात सुनकर जोरोंसे हंस पडी क्योंकि किसी भी बात से सहमत होना उसके स्वभाव में था ही नहीं। '' तो तुम जगत् से परे हो! दार्शनिक हो गयी हो! अगली बार आऊंगी तो पता चलेगा, सन्यासिनी बन गई हो! है न!''
मैं आहत सी उसका चेहरा देखती रह गई।
''
तुम इतना काम कैसे कर लेती हो? हमसे नहीं होता। थक जाते हैं। क्या तुम थकती नहीं हो? गुस्सा नहीं आता। हमने तो चार चार नौकर लगा रखे हैं। हमारा बुढऊ (ससुर) जो साथ रहता है। उससे जरा नहीं पटती हमारी। वो तो इनकी वजह से बर्दाश्त कर रहे हैं।'' मैं ने बाहर झांक कर देखा कहीं ये वाक्य बच्चों के कान में तो नहीं पड ग़ये, वरना क्या जवाब दूंगी उन्हें?
''
मजबूरी में कहो या डयूटी करनी पडती है। मैं नहीं करुंगी तो कौन करेगा? '' मैं ने खाना परोसते हुए कहा, '' पहले खाना खाते हैं फिर आराम से बैठेंगे।''
''
हम तो खाएंगे नहीं। सब बन्द कर दिया है। सिर्फ अंकुरित दालें और अनार का रस लेते हैं।''
''
मैं ने तो तुम्हारे लिये ही बनाया था सबकुछ। तुम्हारी पसन्द का।''
''
मैं ने कब कहा था? हम याद नहीं रहे, हमारी पसन्द याद रही, वाह क्या तरीका है मोहित करने का।'' पूर्ण घृष्टता के साथ वह बोली।सब्जियों से उठती भाप में मेरी आंखों की नमी भी उड क़र अदृश्य हो गयी।
''
अच्छा तुम ये बताओ तुम खुश हो अपनी जिन्दगी से? इस शादी से। जीजाजी से। तुम्हारी पसन्द से हुई थी शादी या आंख मूंद कर हां कह दी थी ?''

मैं हतप्रभ सी उसका चेहरा देखती रह गई उसने तो जीवन का सत्व ही निकाल लिया था वो जीवन जो नितान्त मेरा था जिसकी संरचना के लिये मैं ने इतनी लम्बी यात्रा की और इस यात्रा के दरम्यान सोचा ही न था कि बच्चों तथा पति से कैसे खुशी का हिसाब किताब करके कैसे खुश व संतुष्ट हुआ जा सकता है? वैसे भी अभी जिन्दगी जी कितनी थी जो परिणाम निकालती। हाँ जिन्दगी को बेहद खूबसूरत और स्वप्नमयी बनाने के लिये निरन्तर संघर्ष चल रहा थाउस संघर्ष के बाद जो कुछ प्राप्त होता था, वही मेरे लिये अमूल्य और सुखद होता था

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