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एक दिन का मेहमान-2

वह एक क्षण अनिश्चय में खडी रहीअब वापस मुडना निरर्थक था, लेकिन इस तरह उसके सामने खडे रहने का कोई तुक नहीं था
वह स्टूल खींच कर टी वी के आगे बैठ गई

'' कब आये?'' उसका स्वर इतना धीमा था कि आदमी को लगा, टेलीफोन पर कोई दूसरी औरत बोल रही थी

'' काफी देर हो गई मुझे पता भी न था कि तुम ऊपर कमरे में हो!''
स्त्री चुपचाप देखती रही

आदमी ने जेब से रुमाल निकाला, पसीना पौंछा, मुस्कुराने की कोशिश में मुस्कुराने लगा
'' मैं बहुत देर तक बाहर खडा रहा, मुझे पता नहीं था, घंटी खराब हैगैरेज खाली पडा था, मैं ने सोचा तुम दोनों बाहर गई होतुम्हारी कार?
उसे मालूम था, फिर भी उसने पूछा

'' सर्विसिंग के लिये गई है
'' स्त्री ने कहावह हमेशा से उसकी छोटी बेकार की बातों से नफरत करती आई है, जबकि आदमी के लिये वे कुछ ऐसे तिनके थे, जिन्हें पकड क़र डूबने से बचा जा सकता थाकम से कम कुछ देर के लिये
'' तुम्हें मेरा टेलीग्राम मिल गया था? मैं फ्रेंकफर्ट आया था, उसी टिकट पर
यहाँ आ गया; कुछ पौण्ड ज्यादा देने पडेमैं ने तुम्हें वहां से फोन भी किया, लेकिन तुम दोनों कहीं बाहर थे''
'' कब?'' औरत ने हल्की जिज्ञासा से उसकी ओर देखा, '' हम दोनों घर में थे
''
'' घण्टी बज रही थी, लेकिन किसी ने उठाया नहीं
हो सकता है, ऑपरेटर मेरी अंग्रेजी नहीं समझ सकी और गलत नम्बर दे दिया हो! लेकिन सुनो'' वह हंसने लगा,'' एक अजीब बात हुईहीथ्रो पर मुझे एक औरत मिली, जो पीछे से बिलकुल तुम्हारी तरह दिखाई दे रही थी, यह तो अच्छा हुआ मैं ने उसे बुलाया नहीं हिन्दुस्तान के बाहर हिन्दुस्तानी औरतें एक जैसी ही दिखाई देती हैं''
वह बोले जा रहा था
वह उस आदमी की तरह था जो आंखों पर पट्टी बांध कर हवा में तनी हुई रस्सी पर चलता है, स्त्री कहीं बहुत नीचे थी, एक सपने में जिसे वह बहुत पहले कभी जानता था, किन्तु अब उसे याद नहीं आ रहा था कि वह उसके सामने क्यों बैठा था?

वह चुप हो गयाउसे ख्याल आया, इतनी देर से वह सिर्फ अपनी आवाज सुन रहा है, उसके सामने बैठी स्त्री बिलकुल चुप बैठी थीउसकी ओर बहुत ठण्डी और हताश निगाहों से देख रही थी
'' क्या बात है?'' आदमी ने कुछ भयभीत होकर पूछा

'' मैं ने तुमसे मना किया था; तुम समझते क्यों नहीं?''
'' किसके लिये? तुमने किसके लिये मना किया था?''
'' मैं तुमसे कुछ नहीं चाहती मेरे घर तुम ये सब क्यों लाते हो; क्या फायदा है इनका?''
पहले क्षण वह नहीं समझा, कौन सी चीजें? फिर उसकी निगाहें फर्श पर गईं शांति निकेतन का पर्स, डाक टिकट का एल्बम, दालबीजी का डिब्बा - वे अब बिलकुल लुटी - पिटी दिखाई दे रही थीं, जैसे वह कुर्सी पर बैठा हुआ था, वैसी वे फर्श पर बिखरी हुई
'' कौनसी ज्यादा हैं? '' उसने खिसियाते हुए कहा, '' इन्हें न लाता तो आधा सूटकेस खाली पडा रहता''
'' लेकिन मैं कुछ नहीं चाहती तुम क्या इतनी सी बात नहीं समझ सकते?'' स्त्री की कांपती हुई आवाज ऊपर उठी, जिसके पीछे जाने कितनी लडाइयों की पीडा, कितने नरकों का पानी भरा था, जो बांध टूटते ही उसके पास आने लगा, एक एक इंच आगे बढता हुआ
उसने जेब से रूमाल निकाला और अपने लथपथ चेहरे को पौंछने लगा
'' क्या तुम्हें इतनी देर को आना भी बुरा लगता है?''
''
हाँ।'' उसका चेहरा तन गया, फिर अजीब हताशा में वह ढलिी पड ग़ई, '' मैं तुम्हें देखना नहीं चाहती - बस!''

क्या यह इतना आसान है? वह जिद्दी लडक़े की तरह उसे देखने लगा जो सवाल समझ लेने के बाद भी बहाना करता है कि उसे कुछ समझ में नहीं आया
'' वुक्कू!'' उसने धीरे से कहा, '' प्लीज!''
'' मुझे माफ करो!'' औरत ने कहा

'' तुम चाहती क्या हो?''
'' लीव मी अलोन
इससे ज्यादा मैं कुछ और नहीं चाहती''
'' मैं बच्ची से भी मिलने नहीं आ सकता?''
'' इस घर में नहीं, तुम उससे कहीं बाहर मिल सकते हो?''
'' बाहर!'' आदमी ने हकबका कर कहा, '' बाहर
कहाँ?''

उस क्षण वह भूल गया कि बाहर सारी दुनिया फैली है, पार्क, सडक़ें, होटल के कमरे - उसका अपना संसार, बच्ची कहाँ कहाँ उसके साथ घिसटेगी?

वह फोन पर हंस रही थीकुछ कह रही थी - '' नहीं, आज मैं नहीं आ सकतीडैडी घर में हैं, अभी अभी आ रहे हैं नहीं मुझे मालूम नहींमैं ने पूछा नहीं'' क्या नहीं मालूम? शायद उसकी सहेली ने पूछा था, वह कितन िदिन रहेगा? सामने बैठी स्त्री भी सायद यह जानना चाहती थी, कितना समय, कितनी घडियां, कितनी यातना अभी और उसके साथ भोगनी पडेग़ी?

शाम की आखिरी धूप भीतर आ रही थी टी वी का स्क्रीन चमक रहा था लेकिन वह खाली था और उसमें सिर्फ स्त्री की छाया बैठी थी, जैसे खबरें शुरु होने से पहले एनाउन्सर की छवि दिखाई देती है, पहले कमजोर और धुंधली, फिर धीरे धीरे ब्राइट होती हुई वह सांस रोके प्रतीक्षा कर रहा था कि वह कुछ कहेगी हालांकि उसे मालूम था कि पिछले वर्षों में सिर्फ एक न्यूज रील है जो हर बार मिलने पर पुरानी पीडा का टेप खोल देती है, जिसका सम्बन्ध किसी दूसरी जिन्दगी से है चीजें और आदमी कितनी अलग हैं! बरसों बाद भी घर, किताबें, कमरे वैसे ही रहते हैं, जैसा तुम छोड ग़ये थे; लेकिन लोग? वे उसी फिन मरने लगते हैं, जिस दिन से अलग होजाते हैं मरते नहीं, एक दूसरी जिन्दगी जीने लगते हैं, जो धीरे धीरे उस जिन्दगी का गला घोंट देती है, जो तुमने साथ गुजारी थी

'' मैं सिर्फ बच्ची से नहीं '' वह हकलाने लगा, मैं तुमसे भी मिलने आया था।''
''
मुझसे?'' औरत के चेहरे पर हंसी, हिकारत, हैरानी एक साथ उमड आई, '' तुम्हारी झूठ बोलने की आदत अभी तक गई नहीं।''
''
तुमसे झूठ बोलकर अब मुझे क्या मिलेगा?''
''
मालूम नहीं, तुम्हें क्या मिलेगा- मुझे जो मिला है, उसे मैं भोग रही हूँ।''
उसने एक गहरी ठंडी निगाह से बाहर देखा। '' मुझे अगर तुम्हारे बारे में पहले से ही कुछ मालूम होता, तो मैं कुछ कर सकती थी।''
''
क्या कर सकती थीं?'' एक ठण्डी झुरझुरी ने आदमी को पकड लिया।
''
कुछ भी। मैं तुम्हारी तरह अकेली नहीं रह सकती; लेकिन अब इस उम्र में  अब कोई मुझे देखता भी नहीं।''
''
वुक्कू!'' उसने हाथ पकड लिया।
''
मेरा नाम मत लोवह सब खत्म हो गया।''

वह रो रही थी; बिलकुल निस्संग, जिसका गुजरे हुए आदमी और आने वाली उम्मीद - दोनों से कोई सरोकार नहीं थाआंसू, जो एक कारण से नहीं, पूरा पत्थर हट जाने से आते हैं, एक ढलुआ जिन्दगी पर नाले की तरह बहते हुए, औरत बार बार उन्हें अपने हाथ से झटक देती थी
बच्ची कब से फोन के पास चुप बैठी थी
वह जीने की सबसे निचली सीढी पर बैठी थी और सूखी आंखों से रोती मां को देख रही थीउसके सब प्रयत्न निष्फल हो गये थे, किन्तु उसके चेहरे पर निराशा नहीं थीहर परिवार के अपने दुस्वप्न होते हैं जो एक अनवरत पहिये में घूमते हैं; वह उनमें हाथ नहीं डालती थीइतनी कम उम्र में वह इतना बडा सत्य जान गई थी कि मनुष्य के मन और बाहर की सृष्टि में एक अद्भुत समानता है - वे जब तक अपना चक्कर पूरा नहीं कर लेते, उन्हें बीच में रोकना बेमानी है

वह बिना आदमी को देखे मां के पास गई; कुछ कहा, जो उसके लिये नहीं थाऔरत ने उसे अपने पास बैठा लिया, बिलकुल अपने से सटाकरकाउच पर बैठी वे दो बहनों - सी लग रही थींवे उसे भूल गई थीं कुछ देर पहले जो ज्वार उठा था, उसमें घर डूब गया था लेकिन अब पानी वापस लौट गया था और अब आादमी वहां था, जहां उसे होना चाहिये था - किनारे परउसे यह ईश्वर के वरदान जैसा जान पडा; वह दोनों के बीच बैठा है अदृश्य! बरसों से उसकी यह साध रही है कि वह मां और बेटी के बीच अदृश्य बैठा रहेसिर्फ ईश्वर ही अपनी दया में अदृश्य होता है- उसे यह मालूम थाकिन्तु जो आदमी गढहे की सबसे निचली सतह पर जीता है, उसे भी कोई नहीं देख सकतामां और बच्ची ने उसे अलग छोड दिया था; यह उसकी उपेक्षा नहीं थीउसकी तरफ से मुंह मोडक़र उन्होंने उसे अपने पर छोड दिया था; यह उसकी अपेक्षा नहीं थीउसकी तरफ से मुंह मोडक़र उन्होंने उसे अपने पर छोड दिया था - ठीक वहीं - जहां उसने बरसों पहले घर छोडा था

लडक़ी मां को छोड क़र उसके पास आकर बैठ गई
'' हमारा बाग देखने चलोगे?'' उसने कहा

''अभी?'' उसने कुछ विस्मय से लडक़ी को देखा। वह कुछ अधीर और उतावली - सी दिखाई दे रही थी, जैसे वह कुछ कहना चाहती हो, जिसे कमरे के भीतर कहना संभव न हो।
''
चलो, '' आदमी ने उठते हुए कहा, '' लेकिन इन चीजों को तो ऊपर ले जाओ।''
''
हम इन्हें बाद में समेट लेंगे।''
''
बाद में कब? '' आदमी ने आशंकित होकर पूछा।
''
आप चलिये तो।'' लडक़ी ने लगभग उसे घसीटते हुए कहा।
''
इनसे कहो, अपना सामान सूटकेस में रख लें।'' स्त्री की आवाज सुनाई दी।
उसे लगा, अचानक किसी ने पीछे से धक्का दे दिया हो। वह चमक कर पीछे मुडा, '' क्यों?''
''
मुझे इनकी जरूरत नहीं है।''
उसके भीतर एक लपलपाता अंधड उठने लगा, '' मैं नहीं ले जाऊंगा, तुम चाहो तो इन्हें बाहर फेंक सकती हो।''
''
बाहर?'' स्त्री की आवाज थरथरा रही थी, '' मैं इनके साथ तुम्हें भी बाहर फेंक सकती हूँ।'' रोने के बाद उसकी आंखें चमक रही थीं। गालों का गीलापन सूखे कांच सा जम गया था, जो पौंछे हुए नहीं सूखे हुए आंसुओं से उभर कर आता है।
''
क्या हम बाग देखने नहीं चलेंगे?'' बच्ची ने उसका हाथ खींचा - और वह उसके साथ चलने लगा। वह कुछ भी नहीं देख रहा था। घास, क्यारियां और पेड एक गूंगी फिल्म की तरह चल रहे थे। सिर्फ उसकी पत्नी की आवाज एक भुतैली कमेन्ट्री की तरह गूंज रही थी - बाहर, बाहर!

'' आप मम्मी के साथ बहस क्यों करते हैं?'' लडक़ी ने कहा।
''
मैं ने बहस कहाँ की?'' उसने बच्ची को देखा - जैसे वह भी उसकी दुश्मन हो।
''
आप करते हैं।'' लडक़ी का स्वर अजीब सा हठीला हो आया था। वह अंग्रेजी में  यू  कहती थी, जिसका प्यार में मतलब  तुम होता था और नाराजगी में  आप। अंग्रेजी सर्वनाम की यह संदिग्धता बाप बेटी के रिश्ते को हवा में टांगे रहती थी, कभी बहुत पास, कभी बहुत पराया- जिसका सही अन्दाज उसे सिर्फ लडक़ी की टोन में टटोलना पडता था। एक अजीब से भय ने आदमी को पकड लिया। वह एक ही समय में मां और बच्ची दोनों को नहीं खोना चाहता था।

'' बडा प्यारा बाग है।'' उसने फुसलाते हुए कहा, '' क्या माली आता है? ''
''
नहीं, माली नहीं।'' लडक़ी ने उत्साह से कहा, '' मैं शाम को पानी देती हूँ और छुट्टी के दिन ममी घास काटती हैं इधर आओ, मैं तुम्हें एक चीज दिखाती हूँ।''

वह उसके पीछे पीछे चलने लगा लॉन बहुत छोटा था- हरा, पीला, मखमली! पीछे गैराज था और दोनों तरफ झाडियों की फेन्स लगी थीबीच में एक घना, बूढा विलो खडा थालडक़ी पेड क़े पीछे छिप - सी गई, फिर उसकी आवाज सुनाई दी, ''कहाँ हो तुम?''
वह चुपचाप, दबे पांव पेड क़े पीछे चला आया और हैरान - सा खडा रहा
विलो और फेन्स के बीच काली लकडी क़ा बाडा था, जिसके दरवाजे से एक खरगोश बाहर झांक रहा था; दूसरा लडक़ी की गोद में थावह उसे ऐसे सहला रही थी, जैसे वह ऊन का गोला हो, जो कभी भी हाथ से छूट कर झाडियों में गुम हो जायेगा
'' ये हमने अभी पाले हैं पहले दो थे, अब चार
''
'' बाकी
कहाँ हैं?''
'' बाडे क़े भीतरवे अभी बहुत छोटे हैं
''
पहले उसका मन भी खरगोश को छूने को हुआ, किन्तु उसका हाथ अपनी बच्ची के सिर पर चला गया और वह धीरे धीरे उसके भूरे, छोटे बालों से खेलने लगा
लडक़ी चुप खडी रही और खरगोश अपनी नाक सिकोडता हुआ उसकी ओर ताक रहा था
'' पापा?'' लडक़ी ने बिना सिर उठाये धीरे से कहा, '' क्या आपने डे रिटन का टिकट लिया है?''
'' नहीं; ऐसा क्यों?''
'' ऐसे ही, यहां वापसी का टिकट बहुत सस्ता मिल जाता है
''

क्या उसने यही पूछने के लिये उसे यहां बुलाया था? उसने धीरे से अपना हाथ लडक़ी के सिर से हटा लिया
'' आप रात को कहां रहेंगे?'' लडक़ी का स्वर बिलकुल भावहीन था

'' अगर मैं यहीं र
हूँ तो?''
लडक़ी ने धीरे से खरगोश को बाडे में रख दिया और खट से दरवाजा बन्द कर दिया

'' मैं हंसी कर रहा था, '' उसने हंस कर कहा, '' मैं आखिरी ट्रेन से लौट जाऊंगा
''
लडक़ी ने मुडक़र उसकी ओर देखा, '' यहां दो तीन अच्छे होटल भी हैं
मैं अभी फोन करके पूछ लेती हूँ।'' लडक़ी का स्वर बहुत कोमल हो आयायह जानते ही कि वह रात घर में नहीं ठहरेगा, वह मां से हटकर आदमी के साथ हो गई; धीरे से उसका हाथ पकडा, उसे वैसे ही सहलाने लगी, जैसे अभी कुछ देर पहले खरगोश सहला रही थीलेकिन आदमी का हाथ पसीने से तरबतर था

'' सुनो, मैं अगली छुट्टियों में इण्डिया आऊंगी - इस बार पक्का है।''
उसे कुछ आश्चर्य हुआ कि आदमी ने कुछ नहीं कहा; सिर्फ बाडे में खरगोशों की खटर पटर सुनाई दे रही थी।
''
पापा तुम कुछ बोलते क्यों नहीं?''
''
तुम हर साल यही कहती हो।''
''
कहती हूँ, लेकिन इस बार आऊंगी, डोन्ट यू बीलीव मी?''
''
भीतर चलें? ममी हैरान हो रही होंगी कि हम कहाँ रह गये।''

अगस्त का अंधेरा चुपचाप चला आया था हवा में विलो की पत्तियां सरसरा रही थींकमरों के परदे गिरा दिये गये थे, लेकिन रसोई का दरवाजा खुला थालडक़ी भागते हुए भीतर गई सिंक का नल खोल कर हाथ धोने लगीवह उसके पीछे आकर खडा हो गया; सिंक के ऊपर आईने में उसने अपना चेहरा देखा - रूखी गर्द और बढी हुई दाढी और सुर्ख आंखों के बीच उसकी ओर हैरत से ताकता हुआ - नहीं, तुम्हारे लिये कोई उम्मीद नहीं
'' पापा, क्या तुम अब भी अपने आप से बोलते हो?'' लडक़ी पानी में भीगा अपना चेहरा उठाया - वह शीशे में देख रही थी

''
हाँ, लेकिन अब मुझे कोई सुनता नहीं'' उसने धीरे से बच्ची के कन्धे पर हाथ रखा, '' क्या फ्रिज में सोडा होगा? ''
'' तुम भीतर चलो, मैं अभी लाती
हूँ।''
कमरे में कोई न था
उसकी चीजें बटोर दी गईं थीं सूटकेस कोने में खडा था; जब वे बाग में थे, उसकी पत्नी ने शायद उन सब चीजों को देखा होगा; उन्हें छुआ होगावह उससे चाहे कितनी नाराज क्यों न हो - चीजों की बात अलग थीवह उन्हें ऊपर नहीं ले गई, लेकिन दुबारा सूटकेस में डालने की हिम्मत नहीं की थीउन्हें अपने भाग्य पर छोड दिया था

कुछ देर बाद जब बच्ची सोडा और गिलास लेकर आई, तो उसे सहसा पता चला कि वह कहाँ बैठा हैकमरे में अंधेरा था- पूरा अंधेरा नहीं - सिर्फ इतना, जिसमें कमरे में बैठा आदमी चीजों के बीच चीज जैसा दिखाई देता है
'' पापातुमने बत्ती नहीं जलाई?''
'' अभी जलाता
हूँ।'' वह उठा और स्विच ढूंढने लगा, बच्ची ने सोडा और गिलास मेज पर रख स्यिा और टेबल लैम्प जला दिया
'' ममी कहां हैं?''
'' वह नहा रही हैं, अभी आती होंगी
''
उसने अपने बैग से व्हिस्की निकाली, जो उसने फ्रेंकफर्ट के एयर पोर्ट पर खरीदी थी गिलास में डालते हुए उसके हाथ ठिठक गये, '' तुम्हारी जिंजर - एल
कहाँ है?''
'' मैं अब असली बियर पीती
हूँ।'' लडक़ी ने हंस कर उसकी ओर देखा, '' तुम्हें बर्फ चाहिये?''
'' नहीं लेकिन तुम कहां जा रही हो?''
'' बाडे में खाना डालने नहीं तो वे एक दूसरे को मार खायेंगे
''

वह बाहर गई तो खुले दरवाजे से बाग का अंधेरा दिखाई दिया - तारों की पीली तलछट में झिलमिलाता हुआहवा नहीं थीबाहर का सन्नाटा घर की अदृश्य आवाजों के भीतर से छनकर आता था उसे लगा, वह अपने घर में बैठा है और जो कभी बरसों पहले होता था, वह अब हो रहा हैवह शावर के नीचे गुनगुनाती रहती थी और जब वह बालों पर तौलिया साफे की तरह बांधकर निकलती थी, तब पानी की बूंदे बाथरूम से लेकर उसके कमरे तक एक लकीर बनाती जाती थीं- पता नहीं वह लकीर कहाँ बीच में सूख गई? कौनसी जगह, किस खास मोड पर वह चीज हाथ से छूट गई, जिसे वह कभी दोबारा नहीं पकड सका?

उसने कुछ और व्हिस्की डाली; हालांकि गिलास अभी खाली नहीं हुआ थाउसे कुछ अजीब लगा कि पिछली रात भी यही घडी थी जब वह पी रहा थालेकिन तब वह हवा में था जब उसे एयर होस्टेस की आवाज सुनाई दी कि हम चैनल पार कर रहे हैं तो उसने हवाईजहाज की खिडक़ी से नीचे देखा कुछ भी दिखाई नहीं देता था, असल में कहीं भीतर है - उसकी एक जिन्दगी से दूसरी जिन्दगी तक फैला हुआ; जिसे वह हमेशा पार करता रहेगा, कभी इधर, कभी उधर, कहीं का भी नहीं, न कहीं से आता हुआ न कहीं पहुंचता हुआ
'' बिन्दु
कहाँ है? '' उसने चौंक कर ऊपर देखा, वह वहां कब से खडी थी, उसे पता ही नहीं चला था'' बाहर बाग में '' उसने कहा, '' खरगोशों को खाना देने''

वह अलग खडी थी, बैनिस्टर के नीचेणहाने के बाद उसने एक लम्बी मैक्सी पहन ली थीबाल खुले थेचेहरा बहुत धुला और चमकीला सा लग रहा थावह मेज पर रखे गिलास को देख रही थीउसका चेहरा शांत था, शावर ने न केवल उसके चेहरे को, बल्कि उसके संताप को भी धो डाला था

'' बर्फ भी रखी है।'' उसने कहा।
''
नहीं, मैं ने सोडा ले लिया, तुम्हारे लिये एक बना दूँ।''
उसने सिर हिलाया, जिसका मतलब कुछ भी था, उसे मालूम था कि गर्म पानी से नहाने के बाद उसे कुछ ठण्डा पीना अच्छा लगता था। अर्से बाद भी वह उसकी आदतें भूला नहीं था, बल्कि उन आदतों के सहारे ही दोनों के बीच पुरानी पहचान लौट आती थी। वह रसोई में गया और उसके लिये एक गिलास ले आया। उसमें थोडी बर्फ डाली। झब व्हिस्की मिलाने लगा, तो उसकी आवाज सुनाई दी- '' बस, इतनी काफी है।''
वह धुली हुई आवाज थी, जिसमें कोई रंग नहीं था, न स्नेह का, न नाराजग़ी का - एक शांत तटस्थ आवाज। द्याह सीढियों से हटकर कुर्सी के पास चली आई थी।
''
तुम बैठोगी नहीं?'' उसने कुछ चिंतित होकर पूछा।

उसने अपना गिलास उठाया और वहीं स्टूल पर बैठ गई, जहां दुपहर को बैठी थीटी वी के पास लेकिन टेबललैम्प से दूर - जहां सिर्फ रोशनी की एक पतली सी झांई उस तक पहुंच रही थी
कुछ देर तक दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला फिर स्त्री की आवाज सुनाई दी, '' घर में सब लोग कैसे हैं?''
'' ठीक हैं ये सब चीजें उन्होंने ही भेजी हैं
''
'' मुझे मालूम है, '' औरत ने कुछ थके स्वर में कहा, '' क्यों उन बेचारों को तंग करते हो? तुम ढो ढो कर इन
चीजों को लाते हो और वे यहाँ बेकार पडी रहती हैं''
'' वे यही कर सकते हैं,'' उसने कहा, '' तुम बरसों से
वहाँ गई नहीं हो, वे बहुत याद करते हैं''
'' अब जाने का कोई फायदा है?'' उसने गिलास से लम्बा घूंट लिया, '' मेरा अब उनसे कोई रिश्ता नहीं
''
'' तुम बच्ची के साथ तो आ सकती हो, उसने अब तक हिन्दुस्तान नहीं देखा
''
वह कुच् देर चुप रहीफिर धीरे से कहा, '' अगले साल वह चौदह वर्ष की हो जायेगी कानून के मुताबिक तब वह कहीं भी जा सकती है
''
'' मैं कानून की बात नहीं कर रहा; तुम्हारे बिना वह कहीं नहीं जायेगी
''
स्त्री ने गिलास की भीगी सतह से आदमी को देखा, '' मेरा बस चले तो उसे वहां कभी न भेजूं
''
'' क्यों?'' आदमी ने उसकी ओर देखा

'' वह धीरे से हंसी, '' क्या हम दो हिन्दुस्तानी उसके लिये काफी नहीं हैं?''

वह बैठा रहाकुछ देर बाद रसोई का दरवाजा खुला, लडक़ी भीतर आई, चुपचाप दोनों को देखा और फिर जीने के पास चली गई जहां टेलीफोन रखा था
'' किसे कर रही हो?'' औरत ने पूछा

लडक़ी चुप रही, फोन का डायल घुमाने लगी
आदमी उठा, उसकी ओर देखा, '' थोडा सा और लोगी?''
'' नहीं'' उसने सिर हिलाया
आदमी धीरे धीरे अपने गिलास में डालने लगा
'' क्या बहुत पीने लगे हो?'' औरत ने पूछा

'' नहीं'' आदमी ने सिर हिलाया, '' सफर में कुछ ज्यादा ही हो जाता है
''
'' मैं ने सोचा था, अब तक तुमने घर बसा लिया होगा
''
'' कैसे ? '' उसने स्त्री को देखा, '' तुम्हें यह कैसे भ्रम हुआ?''
औरत कुछ देर नीरव आंखों से उसे देखती रही, '' क्यों उस लडक़ी का क्या हुआ? वह तुम्हारे साथ नहीं रहती?''त्री के स्वर में कोई उत्तेजना नहीं थी, न क्लेश की कोई छाया थीजैसे दो व्यक्ति मुद्दत बाद किसी ऐसी घटना की चर्चा कर रहे हों जिसने एक झटके से दोनों को अलग छोरों पर फेंक दिया था

'' मैं अकेला रहता
हूँ माँ के साथ'' उसने कहा
औरत ने तनिक विस्मय से उसे देखा, '' क्या बात हुई?''
'' कुछ नहीं मैं शायद साथ रहने के काबिल नहीं
हूँ।'' उसका स्वर असाधारण रूप से धीमा हो आया, जैसे वह उसे अपनी किसी गुप्त बीमारी के बारे में बता रहा हो, '' तुम हैरान हो? लेकिन ऐसे लोग होते हैं'' वह कुछ और कहना चाहता था, प्रेम के बारे में, वफादारी के बारे में, विश्वास और धोखे के बारे में; कोई बडा सत्य, जो बहुत से झूठों से मिलकर बनता है, व्हिस्की की धुंध में बिजली की तरह कौंधता है और दूसरे क्षण हमेशा के लिये अंधेरे में लोप हो जाता है

लडक़ी शायद इस क्षण की ही प्रतीक्षा कर रही थी; वह टेलीफोन से उठकर आदमी के पास आई, एक बार मां को देखा, वह टेबल लैंप के पीछे अंधेरे के आधे कोने में छिप गईं थीं, और आदमी? वह गिलास के पीछे सिर्फ एक डबडबाता - सा धब्बा बनकर रह गया था

'' पापा, '' लडक़ी के हाथ में कागज का पुरजा था, '' यह होटल का नाम है, टैक्सी तुम्हें सिर्फ दस मिनट में पहुंचा देगी।''
उसने लडक़ी को अपने पास खींच लिया और कागज जेब में रख लिया।
कुछ देर तीनों चुप बैठे रहे, जैसे बरसों पहले यात्रा पर निकलने से पहले घर के प्राणी एक साथ सिमटकर चुप बैठ जाते थे। बाहर बहुत से तारे निकल आये थे, जिसमें बूढा विलो, झाडियों और खरगोशों का बाडा एक निस्पन्द पीले आलोक में पास पास सरक आये थे।

उसने अपना गिलास मेज पर रखा, फिर धीरे से लडक़ी को चूमा, अपना सूटकेस उठाया और जब लडक़ी ने दरवाजा खोला, तो वह क्षणभर देहरी पर ठिठक गया, '' मैं चलता हूँ ।'' उसने कहापता नहीं, यह बात उसने किससे कही थी, किन्तु जहाँ वह बैठी थी, वहाँ से कोई आवाज नहीं आई। वहाँ उतनी ही घनी चुप्पी थी, जितनी बाहर अंधेरे में, जहाँ वह जा रहा था

 निर्मल वर्मा

 पहला पन्ना                   

 

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