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छुटकारा
'' अम्मां जी, एक घर का बायना कम है।''
आंगन में बैठी अम्मां ने रंगीन कागज़ बिछी डलिया पर नजर डाली। फिर से गिनती की - चौंतीस कचौडियां, चौंतीस लडडू।
''
पूरे हैं।'' अम्मा ने लकीरों भरे चेहरे को ऊपर उठा कर बायना बांटने वाली जवान लडक़ी सिम्मी से कहा, जो अपने दुपट्टे को करीने से ओढने में मशगूल थी।
''
कैसे पूरे हैं? सत्रह घरों का बायना बैठता है, एक घर कौनसा छोड दूं? '' लडक़ी जिरह पर उतर आयी।
''
सत्रह ही घर तो हैं। अब भी तू अठारह घर गिन रही है क्या? छन्नो का घर छोडना है, कितनी बार बताऊं? अम्मां के ढीले होठ इतना सब कहने के बाद भी कुछ बरबराते रहे।
''
उसके घर नहीं दूं? '' लडक़ी ने अम्मां को फिर खींचा।
''
नहींऽऽ। उससे मोहल्लेदारी नहीं निभानी। तेरी समझ में भुस भरा है? कहते हुए अम्मा की आंखें निकल आईं और दुर्बल काया कांपने सी लगी।
लडक़ी ने डलिया उठाई, सिर पर रखी और बाहर निकल गयी।


उमेश की बहू सुरेखा दखि रही थी। समझ गयी कि एक घर का बहिष्कार हो गया, छन्नो के कारण। उसने सास को छेडना नहीं चाहा। नहीं तो मन में आया था कि पूछे - छन्नो को बायन दिया ही नहीं जायेगा? अम्मा जी जो अस्पष्ट सा बर्रा रही थीं, अब साफ तौर पर को लगीं - बायने जाते हैं मेहतरानियों के घर? वह खुद देहरी आ कर ले जायेंगी, आंचर में डाल देंगे। त्यौहारी पावन देने का अपना ढंग होता है। ''
सुरेखा को बिना पूछे ही जवाब मिल गया। अम्मा जी की बात पर बरबस ही उन्हें अपनी शादी का किस्सा याद आ गया। उसके मायके में सास, ननद और देवरानी - जिठानियों के नाम पर पांच कीमती साडियां आई थीं। उमेश अम्मा के कान में कुछ कह कर उन साडियों को आंगन में ले गये थ। पौरी में खडी छन्नो से पूछ रहे थे - '' बता तुझे कौन सा रंग पसंद है?''

इतना मान! सुरेखा ने घूंघट में से आंखें तरेर कर देखा था झीने घूंघट में से उसकी नजर छन्नो ने भांप ली वह मझोले कद की हृष्ट - पुष्ट स्त्री पान चबाती हुई उमेश की ओर मुस्काई थी अपनी छींटदार उजली सी धोती के आंचल को होंठों पर ढकती हुई बोली, '' भइया, बहू जी!''
छन्नो उन साडियों में से एक साडी ले गयी
नहीं उमेश ने जबरदस्ती दी सुरेखा का मन बुझ गया ठेस लगी, नहीं पसन्द थी तो बता देते साडियां बदल जातीं मेहतरानी को देकर अपमान क्यों किया?


बायना बांट कर सिम्मी लौट आयी। अम्मा जी आंगन में कुर्सी पर बैठी थीं। लडक़ी ने अनाज और चवन्नियां पडी ड़लिया उनके सामने रख दी।
''
उठा ले अपनी बख्शीश।'' लडक़ी ने अनाज एक छोटे से थैले में भर लिया चवन्नियां रूमाल में बांध लीं।
''
छन्नो मिली थी?''
''
हां, दरवाजे में ही खडी थी। पूछने लगी किसका बायना बांट रही है?''
''
कहा नहीं कि घर आकर अपना हिस्सा ले जाये?''
''
आपने कब कहा था मुझसे?''
''
अब कह रही हूं। बोलती जाना कि वह साथ में बर्तन भी ले आये। रात के साग - पूरी बचे हैं।''
''
तेरे संग गुड्डू तो नहीं गया था?'' उसकी मां ढूंढ रही है, दूध नहीं पिया।''
''
गया था अम्मा जी, छन्नो के घर घुस गया। कहता था रज्जो कंचे देगी।''
''
ला पकडक़र नासपीटे को। जब देखो वहीं मंडराता रहता है।''
इतने में गुड्डू आ गया। छ: साल के बच्चे के हाथ में कंचे नहीं, छोटी सी गेंद थी।
''
यहां आ, पहले यहां आ तू।'' अम्मा ने गहरी सांस लेते हुए पुकारा।बच्चा पास आया तो एक चनकटा दिया गाल पर - '' अब जायेगा? कितने बार कहा है कि उसके घर में नहीं घुसते। अब तू याद रखेगा।''

सुरेखा अम्मा जी के व्यवहार से तमतमा गयी और बोली - '' बच्चा क्या जाने? ''
'' हां हां, तुम भी कहां जाने हो! ऐसा ही वह उमेश, मौहल्ले की हवा नहीं देख रहा,
अपने हाकिम का भजन करता है
कितनी बार समझाया कि तुम्हारे दफ्तर अफ्तरौं की बात अलग है घर परिवारों का माहौल अलग दोनों को गडमड मत करो तू भी सुरेखा उसके भरमाये भरम रही है''
सुरेखा कुछ नहीं बोली,
गुड्डू की बांह पकड क़र अपने कमरे में चली गयी

'' अरी,
इसे नहला दे
'' अम्मा जी की आवाज आयी।

सुरेखा के सामने छन्नो का सारा इतिहास खुला पडा है उमेश बताते हैं - विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की डिग्री लेने के बाद दो बरस कठिन गुजरे जिस दिन उनका भाग्य खुला, उस दिन सबेरे - सबेरे छन्नो अपनी डलिया झाडू क़े साथ सामने पडी थी हमारी गली के पंडित डंबर प्रसाद कहा करते हैं कि यह बात शतिद्दया है कि मेहतरानी के प्रात: दर्शन शुभ होते हैं सच में ही उमेश को उस दिन सेनेटरी इंसपेक्टर की पोस्ट मिली थी उमेश उत्साह में आकर कहते हैं - मैं ने अपने आत्मीयों, देवताओं के साथ छन्नो का नाम भी शामिल कर लिया था जिनके आर्शिवाद, कृपा और दर्शन में चमत्कार है

अम्मा जी बताया करती है- छन्नो का इस गली में आना - जाना आज से नहीं, वह तब से संडास कमा रही है जब वह महज चौदह साल की थीछन्नो की सास जब गुजरी तो बेटा मिस्सी अठारह का था ब्याह हुआ न था सो अकेला था पेट के लिये चार रोटी चूल्हे पर सेंकना उसके लिये कोई मुश्किल बात न थी पर सीता गली के घर? मेहतर बस्ती की औरतों ने लडक़े को समझाया कि वह यह धंधा नहीं कर पाएगा संडास कमाने में जनानियां माहिर होती हैं मिस्सी ने सबकी बात सुनी पर की अपने मन की मां की सीता गली भला वह इन औरतों के हाथ बेच दे! नहीं उसने अपना ब्याह करने की ठानी और एक महीने के भीतर अपने मामा की मदद से छन्नो को ब्याह लाया

ये ही अम्मा जी सुनाया करती थीं - चौदह साल की दुल्हन रेश्मी घाघरा - पोल्का पहने और पीली ओढनी में लिपटी हुई जब गली में घुसी तो कंचा गोली खेलते बच्चे खेल बन्द करके अपने घरों में भागे खबर ऐसे दी कि गली जाग उठी सच में पान से पतली फूल से हल्की गुडिया सी लडक़ी हाथों में चांदी के दस्तबंद, बांहों में बाजूबन्द और गले में गुलूबन्द से सजी परी - सी लग रही थी अपने मेहतर की बहू, घर की मालकिनें धान - फूल, गुड - बताशे थाली में सजाने लगीं छन्नो जिसकी चौखट पर शीश टेकने जाती वही उसका आंचल भर देती

सामान इतना हो गया कि छन्नो के आंचल में समाये नहीं मिस्सी ने गली में चादर बिछा दी फिर क्या था मनों गेहूं, पसेरियों गुड, सेरों बताशे जमा हो गये चूडी, बिन्दी, बिछिया, चुटीला से लेकर चांदी की तोडियां तक ओढनी के भीतर छन्नो की आंखें झुकी हुई थीं वह बार बार चौखटों पर सिर टेकती बडी बूढियों ने ऊंची आवाज में रोका - बेटी बस कर कमर रह जायेगी
डंबर प्रसाद ने पूजा के जल में भीगे चावल दूब छिडक़े
हल्दी के छींटे देकर कोई मंत्र पढा छन्नो गली में दंडवत लेट गयी

वह दिन है और आज का दिन, छन्नो ने सीतागली को अपनी ओढनी की तरह उजला रखा है ईंटों के खरंजे वाली ये गली जब लाल रंगत में दमकती है तो यहां से गुजरने वाले डाह से देखते हैं रामघाट रोड से शुरु होने वाली गली विष्णुपुर बजरिया में जा खुलती है एक और दो मंजिल वाले कच्चे - पक्के घर इस आठ फीट चौडी ग़ली के आजू - बाजू ऐसे खडे हैं, जैस गले मिलना चाहते हों सीवर लाइन की व्यवस्था न होने के कारण फ्लश सिस्टम नहीं है इतनी संकरी गली में सेप्टिक टैंक बनना भी मुमकिन नहीं कारीगरों की राय है कि गली में फिर बदबू के कारण रुका नहीं जायेगा अत: देसी संडासों की सम्पदा बहाल है जो छन्नो की अपनी संपत्ति है डलिया, खपरा और झाडू क़े जरिये वह हर ओर से इन्हें निखार - पखार कर रखती है

नई मेहतरानी लडक़ी जब संडास कमाने का काम शुरु करती है तो छन्नो के पास पूर्व प्रशिक्षण को जरूर आती है खपरा और झाडू क़े मेल से संडास के भीतर से इस तरह से मैला खींचना है कि कहीं एक रेशा न चिपका रह जायेऔर फिर राख बिछी डलिया पर किस कौशल से छन्नो रखती है कि एक बूंद भी टपके नहीं मेहतरानियां देखती रह जाती हैं छन्नो की बांहों की ताकत कि पुख्ता कमर का जोर सारी गंदगी झाडू क़े सहारे नालियों में खींचती हुई बडी नाली तक ऐसे पहुंचा देती है, जैसे नाली के बीच में कहीं सकिंग पंप लगा हो

सवेरे से मुंह नाक पर बंधा आंचल दोपहर तक खुल जाता है वह एक नजर मुग्ध हुई देखती है - गली चमाचम है कोई देख ले तो पहले सकुचा जायेगी फिर पान रचे होंठों से हंसेगी और नखरे के साथ कहेगी - ऐसे ही नहीं रहती सीता गली बनी संवरी, हर महीने झाडू - ख़परा और डलिया बदलती हूं। मैल से मैल कटता है कहीं? अम्मा जी कहती थीं - सीतागली के माथे छन्नो मढ ग़यी कि छन्नो के गले सीतागली पड ग़यी छुट्टी - नागा का नाम भी तो नहीं लेती हमें याद नहीं कि छन्नो ने गली को कभी गंदा मैला छोड क़र एक दिन अपने घर बिताया हो हारी - बीमारी, रोग - क्लेश या तो उसके जीवन में आये नहीं या उसने बताये नहीं बस एक बार पंद्रह दिन के लिये दूसरी मेहतरानी काम करने आनप लगी थी घरों के मर्दों ने पूछा - छन्नो कहां है? बताया गया कि उसके यहां बेटी पैदा हुई है

बच्ची का जन्म हुआ और घर - घर कुर्ता - टोपी सिले जाने लगे झुनझुने और चांदी के ताबीज आये काले धागों से कोंधनी बटी गयी स्वेटर मोजे जमा हुए अम्मा ने जिद करके निवाड क़ा पालना मंगाया वे गली की औरतों के मुकाबले कुछ विशेष देना चाहती थीं पंडित जी के घर से लड्डू आये और मुंशी जी ने फल दिये पेशकारनी ने थोडी सी मेवा बांध दी राजपाल सिंह के घर से आधा किलो घी आया ऐसा ही तमाम सामान दो स्कूटरों पर लादा गया उमेश और राजपाल सिंह स्कूटरों पर मेहतर बस्ती गये थे चलते समय अम्मा ने कहा था - छन्नो बहू बन कर आयी थी गली में, आज तुम बहन मान कर छोछक लिये जा रहे हो

सामान से लदे - फदे बस्ती पहुंचे तो वहां के लोग चकाचौंध हो गये झटपट दो खाटें बिछा दी गयीं खाटों पर बैठने की फुरसत किसे थी? सारा सामान छन्नो के बसेरे में रखवा दिया उसकी बस्ती में लोग आयें और वह न मिले? छन्नो अपनी नवजात बेटी को लेकर चली आयी रंगत एकदम सफेद हो गयी थी बदन भी कमजोर सा शरमा रही थी कि बोल नहीं पा रही थी बस बांहों सधी बेटी को आगे कर दिया कुलबुलाता हुआ गुलाबी सा फूल! उमेश और राजपाल सिंह की आंखें चमक उठीं तभी पंडित डम्बर प्रसाद का संदेशा भी दे डाला - छन्नो, पंडित जी ने पत्रा में से इस बेटी का नाम सोधा है  राजरानी छन्नो ने राजरानी को रज्जो कहकर पुकारा

उसकी अपनी जिन्दगी में अपना ब्याह और बेटी का जन्म दोनों मुबारक मौके थे एक बार वह गम के भीषण दरिया से भी गुजरी थी मिस्सी पलटन में सफाई कर्मचारी था घुसपैठ क्षेत्र में डयूटी लग गई एक दिन उसके गायब होने की खबर मिली तो छन्नो का दुख गली बर में फैल गया और जब उसकी मौत की शिनाख्त हुई तो सीतागली शोक में डूब गयी हर घर से एक एक सदस्य छन्नो के पास पहुंचा औरतें तो पास खडी होकर बाकायदा रोईं साथ ही कुछ रूपए, कुछ अनाज और कुछ कपडे सां5वना रूप में उसे दिये और आगे के लिये हौसला बंधाया कामगर स्त्री, मेहनत मशक्कत के चलते शोक से जल्दी उबर आई आंसुओं की जगह पसीने ने ले ली


सीता गली में घुसते ही दांयी ओर का पहला मकान मिर्जा रामनाथ का है। उनकी बैठक बडी है। दो पंखे लगे हैं। पानी का घडा रखा रहता है। गली की कोई समस्या हो, उस पर यहीं विचार किया जाता है। आज ऐसी ही एक मीटिंग थी। यह मीटिंग दो दिन पहले ही हो जाती, लेकिन गली के कुछ लोग शहर से बाहर थे। आज सब को इत्तिला दी गयी। सबको रोका गया। मामला छन्नो का था। गज़ब!
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नहीं। गली के साथ विश्वासघात।
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हाथ में चार पैसे आ गये तो हमारे सिर पर नाचेगी।
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अजी किसी को कानों कान खबर नहीं होने दी।
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क्या हुआ?
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तुम्हारा सिर। कहां रहते हो? इतना भी नहीं मालूम कि कुसुमी की अम्मा का घर छन्नो ने खरीद लिया।
-
छन्नो! छन्नो ने?
-
गली के बीचों - बीच आगे समझ लो।
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पंडित डम्बर प्रसाद ही समझेंगे। इनका घर उसके ठीक सामने खुलता है।
-
पंडिताई गयी अब ऐसी - तैसी में।
सभा में यह संवाद भौरों की तरह भिनभिना रहे थे। रामनाथ मिर्जा ने अपना बूढा मगर कडियल हाथ उठा कर सबको चुप रहने का इशारा किया। एक पल के लिये अपनी मेंहदी लगी नारंगी दाढी पर हाथ फेरा फिर ताजा आगवाली चिलम का कश खींचा। सामने के एक दांत की खोह से हवा निकालते हुए बोले - '' होने को तो छन्नो भी इंसान की मूरत है। भगवान की बनाई हुई औरत। पर यह मेहतरानी यहां बस जाती है मानो और इसके नाते - रिश्तेदार यहां आते जाते हैं मानो तो गली के लोंडों का क्या होगा? मेहतरानियों की नस्ल बडी शैतान होती है, क्योंकि मिली - जुली होती है। बला का हुस्न क्या ऐसे ही उतरता है? ऊपर से बेशर्म निगाहें। छन्नो की लोंडिया ही कल से इश्क की कबड्डी खेलेगी। मोहब्बत के खेल और हुस्न के किस्से बराबरी वालों में फबते हैं। गैरबराबरी का इश्क तो दीन इलाही अकबर भी नहीं झेल पाया था।''

सच में ही लोगों को मिर्जा जी से यही आशा थी कि वे एक बात में ही छन्नो का घर घूरा कर देंगे शेर - गज़ल कहने वाले मिर्जा जी पेंशनयाफ्ता पटवारी हैं पतली - पतली कमर वाले तीन चार लोगों को शेरो शायरी की दीक्षा देते हैं दोपहर भर बैठक में किवाड बन्द रखते हैं मिर्जा जी की पीठ के ठीक पीछे बैठे बालूशाही वार्ष्णेय ने जोर से बोला - '' मुकर्रर'' अब यह दीगर बात है कि मिर्जा जी और बालूशाही वार्ष्णेय की जानलेवा अदावत चल रही है, क्योंकि बालूशाही का परिवार तीन पुश्तों से मिर्जा के घर की ऊपरी मंजिल में किरायेदार होकर भी बेकिराये काबिज है परन्तु यह बात निपटेगी कचहरी में आज तो सीतागली के निवासियों के संगठन की बात है सो बालूशाही ने आगे जोडा, '' लडक़े तो लडक़े, ये सरकशों की खाला बूढों तक का ईमान डिगा दें और इनके मर्द इसी बात पर ऊंची जाति की टांग खीचें बडा संगीन मामला है साहब''
कुसुमी की अम्मा के ठीक बराबर वाले मकान में रहने वाले पेशकार साहब अपनी काली और घनी, करीने से कटी मूंछों पर ताव देते हुए हाथ उठा कर कहने लगे, '' बडी साफ बात है जी, इस गली में अब मेहतरानियां रहेंगी तो अपना गुजारा यहां नहीं,
भले मकान बेचना पडे
मुरब्बत की भी एक हद होती है''

लोगों के बीच से पहलवान राजपाल सिंह बोले - '' वाह जी वाह! तुम क्यों मकान बेचोगे? आने दो साली को, मजा चखा देंगे अपनी औकात भूल गयी''
पंडित डम्बर प्रसाद आंखें बन्द किये धीरे - धीरे सिर हिला रहे थ
उसी समय पेशकार ने कहा, '' झाडू, ख़परा डलिया तो पंडित जी की नाक के आगे ही गंधायेंगे गू - मूतों से भरे टोकरे भिनकेंगे कितनी बार टोकेगा कोई? उसकी तो जब मर्जी होगी तब फेंकने जायेगी''
मुंशी जी का सांवला अधेड चेहरा बिना कुछ कहे ही तमतमा कर तांबिया पड ग़या
नाक के पास छोटी सी फडक़न उठती और होंठ बुरी तरह कांप जाते एक कम उम्र का लडक़ा पीछे से हंस पडा बोला, '' मुंशी जी से कहो, छन्नो को नौकरी दे दें ये तो रोजग़ार विभाग में हैं वह संडास कमाना छोड देगी''
मुंशी जी किचकिचा पडे, '' संडास क्या तेरी मां साफ करेगी? बोल तैयार है?''
लडक़ा सिटपिटा गया
किसी ने लडक़े का हाथ दबाते हुए कहा, '' चुप रहा करो छोटे मुंह बडी बात ऐसा ही होता तो मुंशी जी अपने कबूतरबाज लडक़े को नौकरी न दिला देते? दुखती रग मत छेडो।''

राजपाल सिंह के दिमाग में एक बात और आई, उन्होंने सभा के सदस्यों से पूछा, '' इतने रुपये उसके पास आये कहां से? माना कि घर कच्चा - पक्का और अत्यन्त छोटा है पर पच्चीस तीस हजार से कम तो गया होगा किस यार से ले आई रकम?''
पंडित डम्बरप्रसाद झुंझला गये, ''
अरे यार लाई होगी कहीं से
अब तो यह समस्या है कि उसे यहां आने से रोका कैसे जाये? इसमें तो पुलिस भी मदद नहीं देगी''
मिर्जा ने सुझाव दिया, '' ऐसा करो,
उस घर को चन्दा करके खरीद लो
उसने तीस में लिया है, हम पैंतीस दें आगे की बात भी तो समझो गली के विरोध के बाद यह परकाला न मालूम किस भडुवे को बेच जाये? याद करो, कुसुमी की मां क्या कहती थी, खसम की ढोलक ने पूरी गली को सुना कर कहा था - इस घर में भंगिन बसा कर जाऊंगी कि गली के लोगों की मूछों पर झाडू फ़ेरती रहे मेरी आतमा सताने वाले नरक में डूबेंगे''
पंडित डम्बरप्रसाद ने झटके से दो तीन बार अपना सिर हिलाया,
मानो वह दीवार से टकरा - टकरा कर अपनी खोपडी फोड लेना चाहते हों
फिर कडवा मुंह बना कर बोले, '' मेहतर बस्ती चलना होगा''
'' नहीं नहीं पंडित जी,
आप समझदार होकर ऐसी बात पेशकार चिल्ला पडे

 

सारी बातें छन्नो के खिलाफ थीं गली में जहरीली हवा के थपेडे रहे थे उमेश का मन आहत सा हो उठा क्या हो गया अगर घर खरीद लिया तो? आजकल इतना भेदभाव कहां चलता है? उनके अपने दफ्तर का माहौल कैसा है, साहब वाल्मीकी हैं, फिर भी सब झुक कर सलाम करते हैं उसके झूठे गिलास उठाते हैं पहले थोडा अजीब सा लगता था लेकिन अब यह माना कि वह दफ्तर है और यह गली छन्नो के ऊपर भी आश्चर्य होता होता है, ब्राह्मण बनियों और कायस्थ ठाकुरों की इस गली में आने से पहले एक बार भी नहीं सोचा कि यहां बसने की इजाजत उसे कौन देगा? हद है हिम्मत की उमेश को इतना तो पता था कि पच्चीस हजार उसे पति के फण्ड से मिले हैं अब इतने दिनों बाद कागजात वह उमेश को ही दिखाया करती थी यह बात वे सभा में कह सकते थे, मगर नहीं कही यह भी नहीं बोल पााये कि उस पैसे को वह ऐसी चीज में खर्च करना चाहती थी जो उसकी बेटी की शिक्षा और सुरक्षा का साधन बने कैसे कहते? उस बैठक में तो लोगों के तेवर इतने चढे हुए थे कि कोई बात पर गौर न करता और करता भी तो उमेश को छन्नो का हिमायती बता कर मीटिंग से उठा देता आगे होने वाली बातों से वे अनभिज्ञ रह जाते सभा समाप्त हुई तो यह बात पक्के तौर पर समझ आ गयी कि अब लोग छन्नो की जिन्दगी के बारे में नहीं, तबाही पर विमर्श करना चाहते हैं आगे क्या अनहोनी हो!
सारी बातें उमेश ने सुरेखा को बतायीं
कुछ सोचने समझने के बाद कहने लगे, '' मैं मेहतर बस्ती जाता हूं। छन्नो को समझाऊंगा कि फिलहाल इस गली में रहने का ख्वाब छोड दे लोगों की मंशायें बडी भयानक हैं जवान बेटी को लेकर यहां आना

रात हो गयी थी गली में अंधेरा था उमेश जूते कसने के बाद टॉर्च मांगने लगे बोले, '' गली के लट्ठों के बल्ब टूट गये हैं रोशनी थोडी ही सही, टॉर्च से रास्ता तो सूझेगा कुसुमी की अम्मा वाले घर के आगे बल्ब जल रहा था उमेश ने हाथ की टॉर्च ऑफ कर दी सामने देखा दो रिक्शे चले आ रहे हैं अच्छी तरह पहचान लिया, अगले रिक्शे पर लदे सामान के साथ छन्नो बैठी है और पिछले में कन्धे पर बैग सा लटकाये, थोडा सा सामान लिये छन्नो की सोलह वर्षीया बेटी रज्जो चली आ रही है पिछला रिक्शा आगे वाले को जल्दी चलने के लिये घण्टी दे रहा है उल्टे लौट लिये उमेश अब आगे जाकर उसे रोकने का कोई मतलब न था, गली तक आकर वह लौटेंगी, इस बात पर भरोसा न था

हां, लौटते समय लगा कि उमेस के भीतर पंडित डम्बर प्रसाद, रामनाथ र्मिज़ा, मुंशी जी, राजपाल सिंह और पेशकार की आवाजें उठ रही हैं - उन आवाजों को दबाते हुए वे घर की ओर चले जा रहे हैं तो वो लोग लताडने पर उतर आये साले तुम तो आजकल उस भंगी की मातहती में भंगी हुए जा रहे हो, जो तुम्हारी नौकरी का ताल्लुकेदार है तरक्की प्रमोशन के लालची मुंह सिल कर गली को गलीज कराने पर तुल गये कर रहे हो समाज का कल्याण! सब ढोंग, स्वार्थ
उमेश ने कश्मकश में रात काटी
सोचा सबेरे छन्नो से मिलेंगे और समझा देंगे कि उसका हित यहां रहने में नहीं उसको सताया गया तो उन्हें बुरा लगेगा


छन्नो सबेरे जब डलिया, खपरा और झाडू संभाले काम के लिये निकली तब उमेश बीस मिनट पहले से गली में खडे थे। उन्होंने इशारे से उसे बुलाया और गली के मुहाने के बाहर ले गये। दूसरी गली के आगे मकान की ओट देकर बातचीत करने का सिलसिला बनाना उचित समझा।
''
मैं तुम्हें रोकने आ रहा था छन्नो।''
''
काम से?'' उसने मुस्कुरा कर पूछा। लेकिन आंखों में आशंका तैर गयी।
''
काम से नहीं, यहां आकर रहने से।''
''
गली के लोग कुछ'' जैसे वह भी आगत को जानती हो।
उमेश ने कुछ वाक्यों के जरिये मुख्य लोगों की राय बता दी। उनके दृढ संकल्प उजागर कर दिये। आगे आने वाले खतरों से होशियार किया।
छन्नो पान रचे होंठों को बन्द किये उमेश को घूरने लगी। बीच में गहरी सांसे लेती।
''
तुमने भी गुपचुप मकान खरीद लिया। किसी से पूछा तो होता?''
उसकी आंखों में लपक सी पडी। होंठ हरकत में आ गये।
''
मुझे बहुत चिन्ता लग रही है तुम्हारी।''

जिस गली में उमेश और छन्नो खडे थे वहां बहुत आवाजाही न थी, फिर भी उमेश चौकन्ने थे छन्नो के चेहरे पर तैश था उमेश बोले, '' जो कहना हो धीरे कहना कि हम लोगों पर किसी का ध्यान न जाये गली का माहौल भडक़ा हुआ है''
उसने कहा, '' उमेस भैया,
हमारी भी लालसा थी कि हम मैली उजडी बस्ती से हटकर आप लोगों के संग रहें
रज्जो यहीं सिलाई करेगी उसे खूब काम मिलेगा मेहतरों की बस्ती में नये कपडे क़ौन सिलवाता है, रज्जो को सिलाई सिखाने से पहले हमने यह सोचा नहीं पास ही सिलाई का स्कूल खुला था, लडक़ी वहां आने - जाने लगी पर इतना भी सुन लो खाली उसी लालसा की खातिर यह घर नहीं लिया सफाई के लिये एक दिन आऊं तो कैसा नरक मच जाता है डंबर प्रसाद पंडित जी के यहां कथा हुई थी, तुम क्या थे नहीं? पूरे दिन हमें रहना पडा रात के बारह बजे घर पहुंचे अब सयानी लडक़ी को इतना अकेला तो नहीं छोड सकते मेहतर बस्तियों में आये दिन हमले हो रहे हैं गधा से पेस नहीं गयी, गधइया के कान उखाडे भडु हमें दबोच लेते हैं, बस और भला देखो कि छिपने - ढुकने की जगह नहीं
न्याय की कहना भइया,
लडक़ी की परवाह छोड क़र हम तुम्हारे टट्टी - पेशाबों के रेले समेटते रहते हैं
बजबजाती नालियां धोते दिन कटता है, पर इस बस्ती का आदमी यह नहीं कहता कि छन्नो अपनी लोंडिया को लेकर यहीं किसी कोठरी में आ रह

मिर्जा जी आज हमारी हरमजदगी उघाड रहे हैं भूल रहे हैं चार - पांच महीने पहले बीमार हुए थे अकेले घर में हगासे - मुतासे पडे रहते थे जब कोई न आया तो खाट के ढिंग ढिंग गू के छत्ते जमा कर लिये उस दिन ऐसा मन अकुलाया कि भगवान से अरज करी कि तू हमारे पांवों में पहिये लगा देता तो यह बूढा मैले में तो न गिंजता रहता फिर दो दिन हम अपनी बस्ती नहीं गये मिर्जा जी हगें और हम उठावें घर में बदबू की रमक जो छोडी हो
ऐसे ही मुंशी जी की महतारी मरी थी तब हुआ
पन्दह दिन पहले नींद चैन गंवा चुके थे परमात्मा डुकरिया सई संझा ही चल दी तो मुंशियानी पर बुरी बीतेगी वह बेचारी रोयेगी कि सास के लत्ते कपडे उठायेगी? रोना छोड क़ाम करती डोले तो गली के लोग ही थूकेंगे आदमियों ने सारी थुक्का - फजीहत जनानियों के सिर छोड रखी है अब झूठा ही सही बूढी क़े लिये रोआ - राट तो करना ही पडेग़ा हमारी रज्जो हमें रोकती रह गयी पर हम तो जैसे जमराज के पीछे हो लिये हों, कांटी बंधने से पहले ही गली में आ पहुंचे मुंशियानी ठाठ से रोई हमने उन्हें तिनका तक न उठाने दिया डुकरिया के उढऌया - बिछइया से लेकर फूंस बांस तक सगुना दिये

रज्जो नादान आते आते याद लगवाती रही थी - अम्मा, मरी डुकरिया के लत्ता मत लाना हमें डर लगता है मैं ने कहा - लडक़ी, तू मालिकों के बालकों की तरह डरने की बात करेगी तो गली के घर कैसे कमायेगी? वह बोली - नहीं कमाने हमें तेरी गली के घर गू - मूतों में सनी लिसडी तू ही रह हमें तो डलिया छूते बास आती है स्कूल में सब हंसी उडाते हैं
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हाय बेहा
खायेगी क्या? सिलाई कढाई हमारा किसब नहीं कोई काम दे कि न दे?
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नौकरी करूंगी
सिलाई सीखी होगी तो कोई काम भी मिलेगा
उमेस भैया, ऐसे ही इसका बाप नादान था,
कचरे का काम छोड क़र पलटन में भाग गया
मुझसे भी बोला
 
गली छोड दे
तुझे वहां करके आया तब मुझे अकल नहीं थी पूछो अब मूरख से कि गली छोड देती तो क्या करती? अरे यह कौन कह रहा है कि मुर्दों के ऊपर से उतरे कपडे पहनो ओढो। कौन देखता है? पर रिवाज तोडना सब देखते हैं लडक़ी को कैसे समझाऊं कि हम रिवाज तोडते हैं तो मालिकों के दिल टूटते हैं''

दिल तोडना! छन्नो इस मामले में बडी क़मजोर निकली, दिल नहीं तोड पाती पेशकार का दिल, पेशकारनी का दिल गली में जोरों की चर्चा फैली थी कि पेशकार के बेटे के कनछेदन में छन्नो पेशकारनी ने नाचने - गाने बुलाई थी बडी - बूढियों का मानना है कि हिजडा, मेहतरानी और कुम्हार, नाइयों की असीसें बच्चे को बुरी नजरों से बचाती हैं उस दिम मेहतरानियों की जमात सीतागली में आ जुडी थी गली घेर ली आवा जाई बन्द हो गयी ऐसा नाच हुआ कि झनकार आसमान तक गयी ढोलक की थाप हवा में गूंजने लगी छन्नो चुनरी छाप लाल साडी पहनकर बांहें लहराती हुई नाच रही थी -
 जुलम करि डाला देख काली टोपी
सितम करि डाला देख काली टोपी
जुलम करि डाला, सितम करि डाला
गजब करि डाला देख काली टोपी

सर्दी का मौसम, जाडे भरे दिन पेशकार साहब का जवान जिस्म शेरवानी में और जुल्फोंदार सिर काली टोपी में, नाच देख कर मुग्ध हो गये छन्नो उन्हीं की सरकश जवानी की दाद दे रही है टोपी में छिपी जुल्फों से घायल है शाम से रात तक गीत की कडी उनके होठों पर थिरकती रही
आधी रात! मेहतर बस्ती,
चौकन्ने लोग
कुत्तों का जबरदस्त पहरा उन्होंने छन्नो का द्वार खटखटाया
'' कौन है भाई?''
पडौस वाले घर में से एक मर्द निकला वे धीमे से बोले, '' मैं पेशकार, सीता गली का। परोसा लाया हूं।''
'' अरे! आओ,
आओ माई बाप
''
पास पहुंच कर सामान धरती पर धर दिया
आवाज में अपनत्व लपेट कर बोले, '' सदा झूठन कभी पत्तल - परोसा भी तो हो मुशे शाम से ही तुम लोगों की याद आ रही थी''
मेहतर मर्द फूल उठा
मेहतरानियां बाहर निकल आईं'' अरी देख तो री, कौन आया है?'' छन्नो को जगाया गया

कच्चे घरों से घिरे चौक में स्वादों के सोते फूटे थे साग - रायतों के कुल्हड पूरी कचौरियां, बंधी पत्तलों में से उठती जायकेदार खुश्बू, शकोरों में दही बूरा लड्डुओं का झावा अलग मेहतरों की किस्मत! छन्नो की देह चिडिया जैसी हल्की हो गयी लगा कि पंख भी निकल आये उडने को जी चाह रहा था छत्तीस व्यंजन, छप्पन भोग लेकर फरिश्ता उतरा है छन्नो को देख रहा है वह भी देवता को निहार रही है देवता की आंखों से उठती चाह! छन्नो सकपका गयी नजरों में न्यौता, उसने आंखें फेर लीं मगर दया - कृपा का बोझ

एक दिन एकान्त में बांहों में भर ली छन्नो अहसान से दबी थी कि अपने ही अन्दर झुकी हुई? जो उसे छूने से बचते हैं, उनमें से ही कोई उसकी देह से लिपटना चाहता है अरज पर उतर आया अब छन्नो क्या करे? दिल तोड दे या निहाल कर दे?
रात क्या था, सबेरे क्या हुआ?
पेशकारनी के घर में घुसते समय छन्नो की टांगे कांपने लगीं
संडास धोती रही बांहें थरथराती रहीं कान ऊपर की मंजिल से लगे थे - पेशकारनी कराह कर रो रही है छन्नो ने कलेजा बांधकर पुकार लगाई,
'' पेशकारनीऽऽऽ!''
आवाज क़ंठ में फंस गयी

रात होती, सबेरा निकलता छन्नो कश्मकश के हिंडोले पर सवार थी कभी पेशकार को दुत्कार देती, कभी गले लगा लेती कभी दोनों ही बातें गलत लगतीं कभी दोनों सही बातचीत और सोचने - समझने में कितना समय बीत गया पता ही न लगा छन्नो ने ही ध्यान तोडा, '' उमेस भैया, काम का टैम है दोपहर को घर आऊंगी''

पंडित डंबरप्रसाद का दरवाजा अब तक न खुला था छन्नो कुछ देर बन्द किवाडों पर खडी रही समझ भी गयी कि द्वार उसके ऊपर ही बन्द किया गया है उमेश ने ऐसा ही इशारा तो किया था चलो चार छ: दिन में गुस्सा थूक देंगेछन्नो संडास के पीछे वाली गैलरी से घुसी और मैला समेट कर डलिया में भर लिया घडे में पानी भरा था, उसी से पाखाना धो डाला पांच दस मिनट तक खडी देखती रही, कोई निकले शायद, मगर घर तो सुन्न हो गया हो जैसे कहां पंडित जी अब तक नहा धो कर जोर जोर से मंत्र पढते हुए पूजा कर रहे होते थे
दिल में उथल पुथल सी मचने लगी
सारा उत्साह काफूर हो गया कहीं अपनी ही गलती


आगे बढी। मुंशी जी सामने पड ग़ये। धोती धारी लम्बे कद वाले मुंशी जी का चेहरा रौबीला, बुलन्द आवाज, छन्नो से बतियाते बिना निकलते नहीं। वह भी दांत खोलकर मुस्करा पडती है। मुस्कराती हुई पास आ रही थी। मुंशी जी ने खखार कर ऐसा थूका कि सारी गली गूंज गयी। छन्नो को ऐसी निगाहों से देखा जो कह रही थी - थूकने के लिये ऐसे थूका जाता है। थू पर जोर देकर। उसके पांव अनजाने बंधने लगे। मुंशी जी भी पीछे लौट लिये।
गली के लोगों में सचमुच रोष है। रात भारी गुजरी। दूसरे दिन रज्जो सिलाई के स्कूल के लिये तैयार हुई। छन्नो पीछे पीछे चली। क्यों? अनचाहे ही सोलह वर्ष की सजी - धजी रूपवती लडक़ी। मिर्जा जी का द्वार अचानक खुला। छन्नो लपकी और रज्जो से कहने लगी - मिर्जा जी को पालागन करना। बच्चों के लिये सबका दिल नरम होता है।
तभी किसी ने जलती बीडी रज्जो के ऊपर फेंकी। दहकती चिनगारी दुपट्टे में फंस गयी। दुपट्टा जलने लगा। रज्जो आग - आग चिल्लाई।

मिर्जा जी के छज्जे के ऊपर उनका पतली कमर वाला चेला ठठाकर हंस पडा रज्जो आगबबूला हो गयी, '' आजा नीचे, तुझे मजा चखा दूं हरामी खसिया''
छन्नो ने बेटी को बरजा और लडक़े से कहने लगी, '' भइया आग और आदमी का नाता जानता है? मिर्जा जी ने यही सिखाया है?
वैसे यह लडक़ी बीडी नहीं पीती
''
रज्जो घर आकर मां से लडी थी, '' इसी गली के गुन गाती थी? इसमें तेरे भइया - भतीजे रहते हैं कि कटखने कुत्ता?''

तभी बाहर से मुनादी जैसा शोर आया, '' रंडी आ गयी है बहन की लौंडी बनती है सीता हम भी इन भंगिनों से निपट लेंगे सालियों की टांग पर टांग रख कर चीर देंगे''
अब! आग,
गालियां और धमकियां

उसने बाहर जाकर कहा, '' किसी का क्या बिगाडा है हमने?
पुलिस में रिपोट कर दूंगी
'' तभी तडातड पत्थरों की वर्षा होने लगी कहां छिपे थे इतने दुश्मन? रज्जो ने तेजी से भाग कर खिडक़ी के पल्ले बन्द कर लिये
लेकिन यह एक दिन की बात नहीं थी
रोज रोज क़ा सिलसिला, दिन रात का मुकाबला देह और पत्थरों की मुठभेड ने मां बेटी को लहूलुहान कर डाला

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