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किराये का इन्द्रधनुष बम्बई की बरसात भी बस ! मुसीबत ही है। कहां तो सोचा था कि इन दो-तीन दिनों में पूरी बम्बई घूमूंगा। इस मायानगरी को खुद अपनी पहुंचने से देखूंगा, जानूंगा और कहां फंसा पडा हूं इस गेस्ट रूम में। जब से यहां आया हूं, यह झडी ज़ो लगी है, रूकने का नाम ही नहीं ले रही। इस कमरे में चहल-कदमी करते-करते थक गया हूं। लेटने की कई बार कोशिश की है परन्तु इतना नरम बिस्तर होते हुए भी तुरन्त उठ बैठता हूं। कमरे की एक-एक चीज को कई-कई बार देख चुका हूं। सारी पत्रिकाएं तो कल ही देख ली थीं, लेकिन मन में जो एक अजीब-सी कडवाहट घर कर रही है - गुस्से की, बेचैनी की, उससे वक्त काटना और भी मुश्किल हो रहा है। और ऊपर से यह बरसात, मेरे भीतर उठते तूफान को और तेज कर रही है। पता नहीं, कब तक इस कैद में रहना होगा। मैं इसे कैद क्यों कह रहा हूं ! यह इतना बढिया गुदगुदे मैट्रेस वाला डबल-बैड, आरामकुर्सियां, किताबों से अटी पडी अल्मारियां, शो-केस, अटैच्ड बाथरूम, जिसमें ठण्डे-गर्म पानी की सुविधा है। सब कुछ साफ-सुथरा। सब कुछ तो यहां है! क्या हुआ जो इस कमरे में समुद्र की ओर खुलने वाली कोई खिडक़ी नहीं है। और तो कोई कमी नहीं। फिर बम्बई जैसे महंगे शहर में तीन-चार दिनों के लिए इतनी अच्छी तरह से रहने और साथ में खाने-पीने की सुविधा को मैं कैद कह रहा हूं? जिसे मैं कैद कह रहा हूं कभी सपने में भी कफ परेड जैसे पॉश इलाके में 20 वीं मंजिल पर इतने आलीशान फ्लैट के गेस्ट रूम में रहने के बारे में सोच सकता था। क्या मेरी इतनी औकात है कि मैं इतनी खूबसूरत जगह में आराम से पसरा रहूं और चाय, नाश्ता सब कुछ मेरे कमरे में पहुंचा दिया आए और यह सब सेवा एक ऐसी नौकरानी करे जो मुझसे भी अच्छी अंग्रेजी बोलती है, और स्मार्ट तो इतनी है कि कल जब मैं दिन में यहां पहुंचा था और दरवाजा उसी ने खोला था तो मैं उसे खन्ना अंकल की लडक़ी रितु ही समझा था और उसे विश भी उसी के हिसाब से किया था। कल शाम को तैयार होकर जब कमरे से बाहर निकला तो उस वक्त आंटी ड्राइंग रूम में फोन पर किसी से बात कर रही थीं। मैं यही चाह रहा था कि कोई-न-कोई ड्राइंग रूम में मिल जाए, नहीं तो फिर किसी को बुलवाने के लिए या तो आवाज देनी पडती या फिर रूबी को ढूंढना पडता। आंटी जब तक फोन पर बात करती रहीं, मैं वहीं सोफे की टेक लगाए खडा रहा। फोन रखते ही जब वे मुडीं तो मुझ पर नजर पडी। चेहरा एकदम तुनक नया। अभी तो फोन पर हंस-हंसकर बातें कर रही थीं ! -
क्या बात
है मनीश ! कहीं जा रहे हो क्या! उन्होंने चेहरे की तुनक कम किए बिना साडी क़ी
प्लीट्स ठीक करते हुए पूछा था। मैं एकदम सकपका गया था,
फिर भी
हिम्मत जुटाकर बोला था - वो सुबह से कमरे में बैठा-बैठा बोर हो रहा हूं। इस समय
शायद बरसात रूकी हुई है,
सोच रहा
था,
कहीं घूम आऊं। लिफ्ट का बटन दबाने के बाद मैं आँखें मूंदे दीवार के सहारे खडा हो गया था। मुझे बाउजी पर गुस्सा आने लगा था - क्यों भेजा उन्होंने मुझे यहां अपने वन-टाइम लंगोटिया यार और इस समय एक बहुत बडे आदमी - कृष्ण गोपाल खन्ना के घर पर ठहरने के लिए? मैं कहीं भी दस-बीस रूपये वाले होटल वगैरह में ठहर जाता। वहां कम-से-कम मुझे हर वक्त ज़लील तो न होना पडता। मुझे अपने आउटसाइडर होने का या मेरे छोटेपन का अहसास तो न कराया जाता और फिर उस हालत में मैं चार दिन के लिए थोडे ही आता। इन्टरव्यू वाला दिन और उससे एक दिन पहले यानी दो दिन की बात होती और फिर मैं सेकेण्ड क्लास से आया हूं और वापसी की टिकट भी तो सेकेण्ड क्लास का बुक करवाया है, जबकि कम्पनी मुझे दोनों तरफ का फर्स्ट क्लास का किराया दे रही है। उससे जो पैसा बचता, वह रहने-खाने के काम आ जाता। लिफ्ट आ गई थी। मैं नीचे आ गया। सडक़ पर आने के बाद मैंने आस-पास देखा, पानी थमा हुआ था लेकिन लोग तेजी से आ-जा रहे थे। मैंने यह बात सुबह भी नोट की थी, अब भी देख रहा था कि यहां पर लोग और शहरों की तुलना में ज्यादा तेज चलते हैं, कहीं देखते नहीं, बस लपकते से रहते हैं। सुबह चर्चगेट के बाहर तो मैंने कई औरतों को भागते हुए देखा था। औरतों को इस तरह भागते देखना सचमुच मेरे लिए एक नया दृश्य था। एक बहुत मोटी औरत, जिसने स्कर्ट पहना था, भागते हुए बहुत ही अजीब लग रही थी। अभी मुश्किल से मैंने सडक़ पार ही की थी कि एक तेज बौछार ने मुझे पूरी तरह भिगो दिया। लोगों ने फटाफट अपने फोल्डिंग छाते खोल लिये। मुझे आस-पास कोई ऐसी जगह नजर नहीं आई जहां शरण ले सकता। ऊपर वापस जाने का कतई मूड न था। नतीजतन भगता हुआ बस-स्टाप की तरफ ही चलता रहा। मूड और खराब हो गया था। अब घूमने की भी कोई तुक नहीं थी। तुक तो मुझे पहले ही नजर नहीं आ रही थी क्योंकि मुझे यहां जगहों के सिर्फ नाम ही मालूम थे, उनकी दिशा या दूरी का कोई अन्दाज नहीं था। किसी से कुछ भी पूछना बेकार लगा। बस-स्टाप से पैदल चल पडा। यूं ही काफी देर तक भटकता और भीगता रहा। भीगना मुझे अच्छा लगता है, लेकिन आज भीगने से मूड और भी बिगडता चला जा रहा था। तभी कोलाबा वाली सडक़ पर एक अच्छा-सा बार दिखाई दिया। मुझे इस वक्त अपना अकेलापन काटने का इससे अच्छा कोई रास्ता नहीं दिखाई दिया। बीयर बार में जा घुसा। बीयर पीते हुए मुझे हमेशा इस बात का अहसास होता रहता है कि आसपास कोई है जिससे मैं अपने मन की बातें कह रहा हूं। हालांकि मैं उस समय बातें खुद से ही करता हूं। जो बात किसी से कहने को बेचैन हो रहा होता हूं, किसी के सामने मन की भडास निकालना चाहता हूं तो खुद से बातें करके बहुत सुकून पाता हूं। इस वक्त भी मुझे सुकून की जरूरत थी। बीयर के दो घूंट भरते ही मैं अन्तर्मुखी हो गया। मेरे भीतर की सारी सुगबुगाहट बुलबुलों के साथ ऊपर आने लगी। फिर से सारी चीजें दिमाग पर हावी होने लगीं। खुद पर गुस्सा आने लगा - क्यों ठहरा मैं खन्ना अंकल के घर पर। बाऊजी को कम-से-कम एक बार तो सोच लेना चाहिए था कि इन पंद्रह-बीस सालों में उनका दोस्त कितना बदल चुका होगा। ठीक है उनकी खतो-किताबत होती रहती है, लेकिन वह अलग बात है, और फिर मुझे इस बात से क्या मतलब कि खन्ना पर बाउजी के कितने अहसान हैं या दोनों बचपन के दोस्त हैं और दोनों ने मुफलिसी के दिन एक साथ काटे हैं। बाउजी किस तरह अपनी और खन्ना की दोस्ती के चर्चे किए जा रहे थे। अब मैं अगर बाउजी को बताऊं कि जिस दोस्त की उन्होंने अपने बच्चों का पेट काट कर मदद की थी, यहां तक कि एक बार हम बच्चों के लिए दीवाली पर पटाखे न खरीदकर उनके लिए बम्बई टिकट तक जुटाया था, वह आज इतना बडा आदमी हो गया है कि उसके पास उसी दोस्त के लडक़े के लिए जरा-सा भी वक्त नहीं। गर्मजोशी तो दूर, ढंग से बात करने तक की जरूरत ही नहीं समझी गयी। ये बातें सुनकर उन्हें कैसा लगेगा ! मैं बीयर पीते-पीते दुखी हो रहा था। सुबह से आया हुआ हूं और कोई बात तक नहीं कर रहा। आने पर ड्राइंग रूम में चाय पीते हुए जो दो-एक बातें हुई थीं, बाऊजी के हालचाल पूछे गए थे, उसके बाद तो मुझे जो गेस्ट रूम में पहुंचा दिया गया है, तब से वहीं घिरा बैठा था। अब बाहर निकला हूं। यहां तक कि मेरा नाश्ता और खाना भी रूबी वहीं गेस्ट रूम में पहुंचा गई थी।बीयर अपना काम कर रही थी। मैं कुढ रहा था और सभी को दोषी मान रहा था। मुझे माँ पर भी गुस्सा आ रहा था, क्यों उसने इतनी मेहनत करके खाने का सामान बना कर दिया है खन्ना के बच्चों के लिए। उसे पता तो चले कि बम्बई के बच्चे ये सब चीजें नहीं खाते। पता नहीं क्या खाते हैं ! आंटी हलवे पकवानों का डिब्बा देखते ही किस तरह मुंह बनाकर बोली थीं - क्या जरूरत थी इतना सब भेजने की? यहां तो ये सब कोई नहीं खाता। रूबी ये तुम ले जाना अपने घर, और मैं अवाक रह गया था ! माँ ने कितनी मेहनत से यह बनाया था। कितने घंटे मेहनत करती रही थी बेचारी और बाऊजी भी तो जिद किए जा रहे थे, खन्ना को ये पसन्द है, वो पसन्द है। पता नहीं बम्बई में उसे ये खाने को मिलते होंगे या नहीं! देख लें न यहां आकर ! और रितु को देखो, क्या नखरे हैं! मंजू ने इतना शानदार कार्डीगन बनाकर दिया और वो किस तरह मुंह बनाकर बोली - मुझे नहीं पहनना ये सडा हुआ कार्डीगन।और वह स्वेटर वहीं पटककर अपने कुत्ते को गोद में लिए अपने कमरे की ओर चली गई थी। सच, उस समय तो मेरा खून ही खौल गया था। मन हुआ था कि अभी अटैची उठाकर चल दूं कहीं और। साला यह भी कोई तरीका है बात करने का! माना तुम लोग रईस हो गए हो। ट्रांसपोर्ट के बिजनेस में ब्लैक की कमाई करके बीस-तीस लाख के आदमी हो गए हो लेकिन इसका ये तो कोई मतलब नहीं है कि दूसरों की इस तरह इज्जत उतार लो। अभी तो मुझे आए हुए कुल आधा घंटा ही हुआ था और किस तरह से यहां से मोहभंग हो गया था। मन में हल्की-सी तसल्ली भी हुई थी कि अगर हम रईस नहीं हैं तो कम-से-कम इन्सानी मूल्यों पर तो टिके हुए हैं, तहजीब से बात तो कर सकते हैं। अब यही लोग मेरठ आए होते तो इनको बता देते कि मेजबानी क्या होती है! सारा परिवार इनकी जी-हुजूरी में एक टांग पर खडा होता। क्या मजाल कि कोई जरा ऊंची आवाज में बोल कर तो दिखाए। बाउजी की यही तो खासियत है। न तो किसी की बेइज्जती करते हैं, न अपनी होने देते हैं। अब उनको मैं ये सब बताऊंगा तो देखना-खन्ना अंकल से बातचीत तब बंद न हुई तो बात है। सवालों के जवाब मैं बीयर के घूंट भरते हुए खुद से पूछता रहा। बीयर के सुरूर में खुद को, सबको कोसने के बाद मैं हलका महसूस कर रहा था। सोचा, कल स्टेशन जाकर इंटरव्यू वाले दिन की टिकट की कोशिश करूंगा, ताकि फालतू में यहां दिमाग खराब न होता रहे।
दरवाजा अंकल
ने खोला था।
ड्राइंग रूम में हलकी रोशनी थी।
उनके
हाथ में भरा हुआ गिलास था और ड्राइंग रूम के कोने में बने उनके शानदार बार में
बत्ती जल रही थी।
बार
स्टैण्ड पर आइस-बॉक्स,
सोडा फाउन्टेन और खुली बोतल रखी थी। मैं उनसे नजरें नहीं मिलाना चाहता था, क्योंकि मूड अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ था और मैं नहीं चाहता था कि उन्हें पता चले कि मैं बीयर पीकर आया हूं। वैसे भी अपनी और फजीहत करवाने की इच्छा नहीं थी। बेशक अंकल ने कोई ऐसी बात नहीं की थी, जिसे मैं अन्यथा लेता, लेकिन वे सुबह हो रहे पूरे ड्रामे में तो मौजूद थे। जब मैंने शहर देखने की इच्छा व्यक्त की थी तो वे भी तो मुझे गाइड कर सकते थे या रितु या ड्रायवर को मुझे घुमा लाने के लिए कह सकते थे, या फिर आंटी और रितु को चीजें रख लेने के लिए कह सकते थे। -तुम्हारा
खाना तुम्हारे कमरे में रखा है,
हमें पता
नहीं था तुम कितने बजे तक लौटोगे।
कोनेवाली मेज पर ढका हुआ खाना और पानी का जग वगैरह रखे हुए थे। देखा-दो एक सब्जियां, चावल और रोटी थीं। भूख होने के बावजूद खाने की इच्छा नहीं हुई। अगर मेरी इतनी ही चिन्ता थी तो मुझे उसी वक्त बता देते या कह देते, बाहर ही खा लेता। लेकिन फिर सोचा-अगर मैं खाना न खाऊं और सुबह होने पर आंटी देखेंगी तो फिर भिनभिनाएंगी - एक तो स्पेशियली खाना बनवाया और छुआ तक नहीं। नहीं खाना था तो मना करके जाते। और मैं खाना खाकर सो गया था। सबेरे से फिर वही रूटीन चल रहा है, बरसात हो रही है और मैं कमरे में बन्द हूं। रूबी एक बार सुबह पूछ भी गई थी वीडियो पर कोई फिल्म देखना चाहेंगे। लेकिन मैंने मना कर दिया था। फिल्म देखने का मतलब है - ड्राइंग रूम में बैठना और ड्राइंग रूम चूंकि सभी कमरों के बीच में पडता है, अतः सबकी निगाहों के बीच बैठना मुझे कतई गवारा नहीं था। रितु के कमरे से अब म्यूजिक की आवाज आनी बन्द हो गई है, लगता है कि किसी किताब वगैरह में मन लग गया होगा। फर्स्ट ईयर में है रितु। सुन्दर है, पर है अपनी माँ की तरह नकचढी। एक ही नजर में आप मालूम कर सकते हैं - माँ-बाप की बिगडैल और जिद्दी लडक़ी है। बस ड्राइंग रूम में ही कल जो हैलो हुई थी, उसके बाद नजर तो कई बार आई है लेकिन आँखें न उसने मिलाई हैं न मैंने ही जरूरत समझी है। खासकर कार्डीगन वाले प्रसंग से तो मुझे उसकी शक्ल तक से नफरत हो गई है। इस घर में मुझे एक ही आदमी ढंग का लगा है - टीपू। सत्रह साल का टीपू देखने में खासा जवान लगता है, स्मार्ट भी है। टैन्थ में पढता है। इतना अच्छा लडक़ा, लेकिन अफसोस कि वह गूंगा-बहरा है। समझता है वह भी सिर्फ अंग्रेजी लिप मूवमेंट के सहारे। अपनी बात माइमिंग से ही समझाता है या कभी-कभी लिखकर भी। उससे आज बहुत ही शानदार ढंग से मुलाकत हुई। इन्टरव्यू के सिलसिले में कुछ तैयारी कर रहा था कि दरवाजे पर वह दिखाई दिया। पहले तो मैंने पहचाना नहीं लेकिन जब अन्दर आ गया और उसने हाथ बढाया तो मुझे याद आ गया। कल जब मैं यहां पहुंचा तो वह स्कूल जा रहा था। शायद पैसों की किसी बात को लेकर आंटी उसे डांट रही थीं। बाऊजी ने भी मुझे उसके बारे में बताया था कि खन्ना उसकी ट्रेनिंग और पढाई की वजह से काफी परेशान रहते हैं। उसने बहुत गर्मजोशी से मेरा हाथ थामा। मुझे बहुत अच्छा लगा। कोई तो है जो यहां शब्दों के बिना भी इतनी अच्छी तरह से कम्यूनिकेट कर रहा था। हम हाथ मिलाने भर में एक-दूसरे के मित्र बन गए। मुझे उसका आना अच्छा लगा। वह अचानक उठा और दरवाजा बन्द कर आया। हालांकि उस वक्त हम दोनों और रूबी के अलावा घर में कोई और न था। उसने जेब से सिगरेट की डिब्बी और माचिस निकाली और एक सिगरेट ऊपर करके मेरे आगे बढायी। अच्छा तो यह बात थी! सिगरेट कभी-कभार मैं पी लेता हूं। चार्म्स मेरा ब्रांड भी है, परन्तु यहां अंकल के घर पर रहने के कारण मैंने फिलहाल स्थगित कर रखी थी। अब सिगरेट देखकर तलब तो उठी लेकिन एक सोलह-सत्रह साल के लडक़े के साथ इस तरह सिगरेट पीना न जाने क्यों अच्छा नहीं लगा - हालांकि ऑफर वही कर रहा था। मेरे मना करने पर उसे आश्चर्य हुआ। उसके सिगरेट सुलगाने और पीने का अन्दाज बता रहा था कि वह पुराना खिलाडी है। उससे खुलकर बातें करना चाहता था पर कभी ऐसी स्थिति से वास्ता न पडा था कि माइमिंग के सहारे बात करनी पडे या ऊंची आवाज में अंग्रेजी बोलते हुए होंठों से सही मूवमेंट्स के जरिए अपनी बात समझानी पडे।
उसने इशारे
से पूछा - यहां
किस
सिलसिलें में आया
हूं।
-
लेकिन
इतने पैसे कहां से लाए तुम?
जो कुछ
उसने बताया,
वह मुझे चौंकाने
के लिए काफी था।
मुझे उस पर तरस आया। बेचारे को अपने प्यार का इजहार करने के लिए क्या-क्या करना पडता है। मैंने यूं ही पूछा - कभी फिल्म वगैरह भी जाते हो, लेकिन तुरन्त ही अपने सवाल पर अफसोस होने लगा - टीपू बेचारा कैसे इन्जॉय कर पाता होगा। लेकिन मुझे टीपू की मुस्कराहट ने उबार लिया। उसने इशारे से बताया कि वे कई फिल्में एक साथ देख चुके हैं। मैं कुछ और पूछता इसके पहले ही टीपू ने मुझे घेर लिया - आपकी कोई गर्ल फ्रैंड है क्या! पहुंचने के सामने मृदुभा का चेहरा उभर आया और याद आयी यहां आने से पहले उससे हुई आखिरी मुलाकात। जब मैंने उससे पूछा था - तुम्हारे लिए क्या लाऊं बम्बई से, तो उसने कहा था - तुम सफल होकर लौट आना, मुझे और कुछ नहीं चाहिए। मैं अभी उस मुलाकात के ख्यालों में ही डूबा था कि टीपू ने मेरा कंधा हिलाकर अपना सवाल दोहराया। मैं मुस्करा दिया - हां है एक। उसने तुरन्त नाम पूछा, क्या करती है, कैसी है। उसकी पहुंचने में चमक थी। मुझे अच्छा लगा कि मैंने सिगरेट की तरह इस मामले में झूठ नहीं बोला है। मेरी गर्ल फ्रैण्ड की बात जानकर वह खुद को मेरे और करीब महसूस करने लगा था। मैंने उसे बताया कि वह फिजिक्स में एमएससी कर रही है अभी। -
और आप?
उसने
मुझसे पूछा। बताया-उसके टयूटर के आने का वक्त हो गया है। उसने अपनी चीजें सहेजीं और फिर मिलने का वादा करके चला गया।वह अपने पीछे कई सवाल छोड ग़या है। कितना अकेलापन महसूस करता होगा टीपू। क्या रितु उससे उसी तरह लड-झगड क़र लाड-प्यार जताती होगी जिस तरह सामान्य भाई-बहन करते हैं। क्या आंटी अपने क्लब और पार्टियों से फुर्सत निकालकर इसके सिर पर हाथ फेरने या होमवर्क करवाने का टाइम निकाल पाती होंगी। क्या इसके उस तरह के दोस्त होंगे जो इसे अपने खेलों, अपनी दिनचर्या में खुशी-खुशी शामिल करते होंगे। क्या उदिता और टयूटर के अलावा भी कोई उससे बात करता होगा। मैं तो यहां दो दिनों के अकेलेपन से ही टूट रहा हूं, बेचारा टीपू तो कब से अकेला है। मुझे नहीं लगा कि वह अपनी दिनचर्या में इतना खो जाता हो कि उसे किसी साथी की जरूरत ही न होती हो। उसने अपनी एक अलग दुनिया बनायी तो होगी लेकिन उसका कितना दिल करता होगा कि कोई उसकी अकेली दुनिया में आए। देर तक उसके ख्यालों में खोया रहा। इन्टरव्यू बहुत अच्छा हो गया है। मैं चुन लिया गया हूं और मुझे मेरे अनुरोध पर दिल्ली हैडक्वार्टर दिया गया है। दिल्ली, पंजाब और हरियाणा कवर करना होगा। अपॉइन्टमेंट लैटर दस दिनों में भेज दिया जाएगा। तुरन्त ज्वाइन करना है और पन्द्रह दिन की ट्रेनिंग के लिए फिर बम्बई आना होगा। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं है। मेरे संघर्ष खत्म हो रहे हैं। मनपसन्द नौकरी मिल गयी है। अच्छी पोस्ट, बडी क़ंपनी, अच्छा वेतन, और टूरिंग जॉब। मैं इतना उत्साहित हूं कि जी कर रहा है कि किसी भी व्यक्ति को रोककर उसे अपने सेलेक्शन के बारे में बताऊं। बाऊजी को तुरन्त तार दूं, लेकिन तार तो कल ही पहुंच पाएगा। फोन कर दूं, पडौस के सचदेवा के घर, लेकिन उन लोगों से तो आजकल ठनी हुई है। कहीं मेरा नाम सुनकर ही फोन रख दिया तो मेरे तीस-चालीस रूपयों का खून हो जाएगा। मैं तो इसी वक्त और यहीं अपनी खुशी बांटना चाहता हूं। कितनी अजीब बात है, असीम दुख के क्षण मैंने तनहा काटे हैं और कभी किसी को अपने दुख का हमराज नहीं बनाया है। आज मैं अपनी खुशी के क्षणों में भी अकेला हूं। कोई हमराज है ही नहीं यहां। हालांकि खुशी बांटने के लिए कब से तरस रहा हूं। घर पर तार डाला। मृदुभा को सांकेतिक भाषा में कार्ड डाला। थोडी देर मैरीन ड्राइव पर टहलता रहा। मन बहुत हलका हो गया है। समुद्र ज्वार पर है। लगा, मानो वह भी मेरी खुशी में शामिल है और लहरों के हाथ बढाकर मुझे बधाई दे रहा है। बहुत खूबसूरत है शहर का यह हिस्सा। वापिस आने का मन ही नहीं है। घर लौटते हुए शाम हो गई है। एक मन हुआ कि मिठाई का एक डिब्बा ही ले लूं अंकल वगैरह के लिए। लेकिन टाल गया। मुझे पता है मिठाई का भी वही हश्र होना है जो पकवानों और कार्डिगन का हुआ है। मुझे और फजीहत नहीं करानी अपनी, न ही मूड खराब करना है।
घर पर सिर्फ
टीपू और रूबी हैं।
मैंने
टीपू को खबर सुनायी है।
वह
तपाक से मेरे गले मिला है।
मैंने
खुशी से उसका गाल चूम लिया है और उसके बाल बिखरा दिए हैं।
वह
बहुत खुश हो गया है।
मुझे
अच्छा लगा है कि घर पर सिर्फ टीपू मिला है।
आंटी
वगैरह को तो मैं बताता ही नहीं।
रूबी
ने चाय के लिए पूछा,
लेकिन टीपू ने मना कर दिया है।
अंदर आते समय मेरा मन मध्यमवर्गीय दब्बूपन की वजह से डर रहा है, लेकिन टीपू की चाल में ऐसी कोई बात नहीं है। वह लापरवाही के अन्दाज में मेरी बांह में बांह डाले चल रहा है। मेरा सारा ध्यान आसपास की रौनक और शानोशौकत पर लगा है। मेरी निगाहों में चकित भाव है जिसे मैं छुपाने की नाकाम कोशिश कर रहा हूं। हम पहली मंजिल पर स्थित रेस्तरां में पहुंचे। इत्तिफाक से ठीक समुद्र वाली खिडक़ी के पास की एक मेज खाली मिल गयी। समुद्र अपना असीम विस्तार लिए हमारे सामने है। दूर खडे बडे-बडे ज़हाजों की बत्तियां बहुत अच्छी लग रही हैं। छोटी-बडी क़िश्तियां ऊंची लहरों पर इतरा रही है। इससे पहले कि मैं मीनू पर निगाह डालूं, टीपू ने दो बीयर का आर्डर दे दिया है। हमारी निगाहें मिलती हैं तो दोनों मुस्करा देते हैं। टीपू मुझसे मेरे इन्टरव्यू के बारे में पूछता है। मैं बतलाता हूं कि किस तरह सत्ताइस लडक़ों में से पांच को इन्टरव्यू के बाद भी रूकने के लिए कहा गया था। उन पांच में मैं भी था। उन्हें कुल तीन लडक़े लेने थे। बाद में इन्फॉरमली बातचीत के लिए बुलाया गया था और तभी मुझे बता दिया गया था कि मैं चुन लिया गया हूं। बीयर आ गयी है। साथ में भुनी हुई मूंगफली और सलाद। सर्विस बहुत अच्छी है और वेटर वगैरह बहुत नम्र। हम धीरे-धीरे सिप करने लगे हैं। मैं टीपू से उसके दोस्तों, उसके परिवार वालों के व्यवहार के बारे में पूछना चाहता हूं। परिवार वालों का नाम सुनते ही उसने मुंह बिचकाया है। मुझे पहले ही आशंका थी कि उसे बहुत अच्छा ट्रीटमेंट नहीं मिलता। वह माइमिंग करके बताता रहा कि किस तरह पापा से बात किए हुए उसे कई दिन बीत जाते हैं, सिर्फ हैलो, हाय से आगे वे कभी बात नहीं करते। अव्वल तो वे घर पर होते ही नहीं। क्लब, पार्टियां, बिजनेस ट्रिप्स वगैरह और जब घर पर होते हैं तो या तो अपने बैडरूम में बैठे रहते हैं और बिजनेस के फोन वगैरह करते रहते हैं या शाम के वक्त अ |