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फरेब

चाचा..! .बाई.. ? चाचा, अम इरानी....अय..बाई , इदर देको..दर से उदर देको  ...चाचा , उदर से इदर देको  ..सब दुका... ... ..रानी का अय... पूरा जूट.. झूठ का दुनीया अय.... ...ये ई नईं पूरा दुनीया ई... ज़ूट का दुनीया अय..  समजा... इदर आओ.. अमारे पास आओ.. अम असली समान (सामान) देता.. देगा.. ..असली समान देगा.. चाचा, तुमको क्या मांगता.. '' मैंने कार वहां रोकी भर थी, अभी उतरा नहीं था  सिर्फ ड्रायविंग सीट की ओर का दरवाज़ा खोला था कि चौबीस-पचीस साल का गोरा-चिट्टा और खूब स्वस्थ नौजवान शब्दों को लम्बा करते और आवाज लगाते हुए मेरी ओर आने लगा था  मुझे लगा कि यदि मैंने कार कुछ पीछे या आगे कहीं भी और किसी भी जगह रोकी होती तो इसी अंदाज में कोई दूसरा बुलाता पहली पॉर्किंग की जगह मिलते ही मैंने कार रोक दी थी  क़ार की एक्ससरीज बेंचने वाली लाइन से लगी दुकानों की पट्टी के सामने घटित हुआ यह एक ऐसा दृश्य था और इसतरह आंखों के आगे आया कि अचानक इससे मिलते-जुलते दो दृश्य याद आ गए और मुझे बहुत पीछे ले गए...

 बाबूजी खाने के शौकीन थे पीने के कतई नहीं  सीलिए मैंने कहा ,खाने के शौकीन बुधवार और इतवार को गोश्त बनता  सोमवार और शनिवार को मछली  मंगलवार को इलाके में मांस-मछली बिकता नहीं था और वृहस्पति और शुक्रवार को उन दिनों बाजार लगती नहीं थी  वे दिन मेरे बचपन के थे....मैं यही कोई तेरह -चौदह वर्ष का रहा होऊंगा...

 बाबूजी फैक्टरी से जबतक घर आते तबतक शाम के साढे सात बज जाते  ज़ाहिर था कि गोश्त और मछली लाने का जिम्मां मुझपर होता  साफ हिदायत थी कि गोश्त खरीदते समय सीना और जंघा लेना है  और, मछली रोहू  क़भी-कभी मांगुर  मछली तो मुझे कस्बे की बाजार में मिल जाती लेकिन गोश्त के लिए रावतपुर जाना पडता दो बजे दिन से ही वहां बकरे कटने लगते  मैं शाम को करीब पांच बजे जब वहां पहुंचता तो सौ-दो सौ लोगों की भीड लगी होती एक किस्म का छोटा-सा मेला  ख़ुले मैदान में लगी गोश्त बेंचने की उस बाजार में कुल चार-पांच दुकानें होती  क़टे हुए बकरे लकडी क़े क्रॉस पर लटके होते और दुकानों के मालिकों के छोटे-छोटे लडक़े गाहकों की ओर चिल्लाते हुए दौडते रहते , ''बाऊजी...धर आओ...धर...ये देखो.... . .बकरा है बकरा.... . . अरे ॐक़हां जा रए हो उधर......तो अपनी अम्मां की 'वो'...बेंच रिया है...'' लडक़ा कटे हुए बकरे के दोनों अण्डकोश पकडक़र कहता, ''बकरा है बाऊजी...बकरा...हम बकरी नहीं काटते...ये साले तो अपनी अम्मां की 'वो' बेंचते हैं...''

''अरे नईं बाऊजी...वो झूठ बोल रिया है.... ज़रा पूछो तो क्या 'ये 'उसके अब्बा का है...ज़ो.... . . दूसरे दुकानदार का लडक़ा पायजामे के ऊपर से अपने लिंग की ओर इशारा कर रहा है...एक बकरा काट के मां का....दिन भर बकरियां काटता है.... .क़यामत के दिन तो....इस बइमान की.... . . .इसकी तो मइया.... बाबूजी.... ''

उस चिल्लाहट में कोई-कोई लडक़ा तब और जोर से चीखने लगता जब वह किसी बकरे को कान पकडक़र जिबह करने के लिए लाता, ''ये देखो...धर आओ बाऊजी...लो काट दिया बकरा आपके ढाई सौ ग्राम के लिए...'' लडक़ा बकरे को घुटनियाये रहता और उसका बाप बकरे की गरदन पर छुरी फेर देता  उस उम्र में यह पता नहीं था कि झटका और हलाल क्या होता है...

 बकरा कटने भर की देर होती ग़ोश्त के बिकने में तो जरा भी वक्त नहीं लगता था ठ बजे रात तक बकरे कटते रहते थे  ग़ोश्त बिकता रहता था उस बाजार में गाहकों को फंसाने की ऐसी ही चालें चली जातीं  लेकिन खरीदने वाले भी धीरे-धीरे सब समझ जाते और सबकी कोई एक दुकान हमेशा के लिए तय हो जाती लोग यह भी जान गए कि एक-दूसरे को मां-बहन की गालियां देकर गोश्त बेचने वाले सभी दुकानदार एक ही खानदान के हैं और उन गालियों का उनके लिए कोई मतलब नहीं है मैं गफ्फ़ार मियां की दुकान का स्थायी गाहक हो गया  वर्षों तक मैं गफ्फ़ार मियां की दूकान से ही गोश्त लेता रहा  अब भी कभी-कभी उन्हीं की दुकान पर जाता हूं  ग़फफ़ार मियां बूढे हो चुके हैं और उनकी दुकान पर जो लडक़े बकरों को गरदनियाते थे , गडांसा लिए ठीहे पर बैठने लगे हैं...

 दूसरा दृश्य उन दिनों का है जब मैंने पहली बार अखबार में काम किया था  रात को एक बजे तक अखबार छप जाता  उसके छपने तक मैं कार्यालय में रहता और ताजे अखबार की एक कॉपी लेकर घर लौटता  क़भी-कभी थोडा जल्दी निकलने का मौका मिलता तो टेबल पर बैठने वाले सभी एक साथ रोटी वाली गली में जाते क़िसी सस्ते होटल में बैठते  फ़िर वहां बैठकर हॉफ फ्राइ अण्डों या आमलेट के साथ दारू पीते जहां दीवारों पर लिखा होता 'यहां सराब पीना और फालतू बैठना मना है '...बाद में खाने के लिए रूमाली रोटी और गोश्त का ऑर्डर देते...

 होटल के सामने की सडक़ों पर गलियां थीं  शहर की सबसे बदनाम गलियां वहां दिन हो या रात ,जिन्दा गोश्त बिकता था यह अलग बात थी कि उन गलियों में दिन की उदासी रात को खो जाती थी उनमें रण्डियां रहती थीं 

वे अपनी-अपनी कोठरी के सामने सस्ते पाउडर और फूहड-सी दिखने वाली लिपिस्टिक से ओठ पोते खडी दिखतीं  क़ुछ एक को छोडक़र सब बदसूरत और निहायत भद्दी दिखाई देतीं उनसे भद्दे उनके इशारे होते थे सडक़ से गुजरने वालों को वे अपनी बेशर्म और बाजारू अदाओं से लुभाने की कोशिश करतीं  क़भी-कभी कोई बुलातीं, ''आ जा रे.......राज्जा...ये देख ना.... ...ज़ोबन और ये देख जांघ...औरत की जांघ अइसी होती...चढ न आके...चढ ना...झूला झुलाऊंगी '' कोई दूसरी कहती, '' शरमाता काए को रे...तेरी अम्मीं ना हूं...क़ि दूध पिलाऊंगी.... ...आ ....बार-बार आएगा...बस एक बार मेरी कमर के झटके झेल...ज़िन्दगी भर करण्ट की याद आएगी....... '' उन्हीं में एक गीता थी  वह जवान नहीं थी ख़ूबसूरत तो बिल्कुल नहीं  मगर उसका दिल बहुत खूबसूरत था  उसमें मेरे लिए जगह थी  मुझे उस गली में गए हुए तीसेक साल हो गए  पता नहीं कि गीता अब कहां होगी  होगी भी या नहीं वैसे भी यह उसका असली नाम नहीं है.... .....नहीं था...सलिए उसके बारे में किसी किस्म की दरियाफ्त वहीं जाकर ठहर जाएगी जिसके आगे लिखा होगा , सावधान, गली आगे बंद है...

 आज एक लम्बे अरसे के बाद जब किसी ने मुझे वैसी ही पुकार के साथ घेरा तो बीते समय की यादें उभर आईं  अब मैं पचास वर्ष का हो गया हूं  दाढी क़े सारे बाल सफेद हो गए हैं और कनपटियों पर भी सफेदी झलकने लगी है  रानी नौजवान अगर मुझे चाचा ही कहता तो ज्यादा अच्छा लगता उसका भाई कहना अखर रहा था मेरा सबसे छोटा भाई भी चालीस पार कर रहा है...

''चाचा...बाई...बोलो क्या मांगता..असली देगा अम....''

''शीशों पर फिल्म लगवानी है...''

''पिलम अम असली देगा.... बाई...ये जूट का दुनीया अय...तइवान का पिलिम अमरीकी कर्टून में दिकाके सब बेंचता अय...उदर से इदर तक...सब दुकान जाके देको...ज़ूट का दुनीया अय...अम असली पिलिम अमरीका का देगा 180 दिरअम....सस्ता बी देगा...चाचा...तुमारा मर्जी . . .तइवान का लेगा तो 70 दिरअम से 110 दिरअम का....लेकिन बाई , अम गरण्टी नई देगा...तीन मईना में पिलिम का रंग नई रएगा...500 दिरअम का बी अय...लेगा तो अम तीन साल का जिम्मा लेगा.... . .चाचा, अब तुम बताओ...''

''इतनी मंहगी फिल्म नहीं लेनी...''

''तो अइसा बोलो बाई , तुम 180 वाला ई लो...एक साल का जिम्मा अय...अम फतूरा रसीद देगा....तारीक लिकेगा...क़राब पिलिम ओ तो अमको बताओ...अम नया देगा...''

''कुछ कम करो उस्ताद...ज्यादा है...''

''जूट का दुनीया अय...अबी अम 200 बोलता तो बी तुम कम करने को बोलता...अम 180 बोला तो बी तुम कम चाअता...बाई, जूट का दुनीया अय...देको, अम 160 से कम का नई देगा...क़ुदा कसम 5 दिरअम के लिए दंदा करता...ज़ूट का दुनीया अय चाचा...अबी बोलो...''

''ठीक है.... लगा दो...''

लम्बा-तगडा ईरानी नौजवान कार के शीशों को मुस्तैदी से ग्लास क्लीनिंग शैम्पू से साफ करके फिल्म रोल को शीशों की नाप के हिसाब से काट-काटकर लगाने लगा  यह सारा तामझाम मुझे अपने छोटे बेटे की जिद पर करना पड रहा था  उसे कार में खूबसूरत इण्टीरियर के साथ बहुत कुछ चाहिए था  मसलन, अच्छा स्टीरियो, सी ड़ी  प्लेयर ,पॉवरफुल स्पीकर और शीशों पर काली फिल्म  मैंने और चीजों के लिए तो आपत्ति नहीं की लेकिन ये काले शीशे मुझे पसंद नहीं थे पहले तो ये अलॉउड ही नहीं थे  वतनी औरतों को ही अधिकार था कि वे अपनी कार के शीशे डॉर्क कराएं  लेकिन हुआ उलटा  वतनी औरतों के नाम पर रजिस्टर्ड कार को उनके मर्द चलाते और फ्रांस की तरह कार में अपनी रखैलों, रण्डियों या प्रेमिकाओं के साथ संभोग करते  क़ाले शीशों वाली गाडी बदनाम कही जाती  लेकिन दो-तीन साल तक ही यह कानून चला होगा कि सरकार ने खसूसी ह्य व्यक्तिगत हृ कारों में शीशों को तीस प्रतिशत तक काला कर लेने की सुविधा सबको दे दी  एक किस्म से यह अय्याशी की अलिखित सार्वजनिक छूट थी  बहुत-सी खडी ग़ाडियां विचित्र अंदाज में हिलती दिखी हैं मैंने इस कानून के लागू होने के बाद भी कई महीने तक बेटे की जिद को टाला लेकिन जब मामला अपरिहार्य हो गया तो फिर उसे सरप्राइज देने की नीयत से बलदिया म्युनिसपैलिटी के सामने लाइन से लगी दुकानों में से एक के सामने पॉर्किंग पाने पर खडा हुआ और सौदा तय हो गया था...

 ईरानी नौजवान फिल्म लगाते हुए बातें भी कर रहा था  वह कुछ बतूना था मगर उसके हंसमुख चेहरे की वजह से उसकी बातों में एक आकर्षण स्वतः जन्मा हुआ था अभी कार के सभी शीशों पर फिल्म लगी भी नहीं थी कि एक टोयोटा लेक्सेस आकर मेरी कार से दस मीटर की दूरी पर दूसरी दुकान के सामने की पॉर्किंग में खडी हुई  क़ाली कार  घनघोर काले शीशे क़ार बिल्कुल नयी थी और उस पर जो नम्बर प्लेट थी वह साफ बता रही थी कि कार किसी प्रभावशाली की थी  क़ार के शीशों पर जो फिल्म लगी थी वह तीस प्रतिशत की काली फिल्म लगाने के कानून का बुरी तरह मखौल उडा रही थी  सरकारी कानून था कि जिस कार के ड्रॉइवर का चेहरा बाहर से न दिखे उसपर 10,000 दिरहम का मुखालफा जुरमाना लगाया जाए  लेकिन किसी वतनी की कार पर कोई पुलिस वाला मुखालफा ठोंकने का जोखिम कैसे लेता उसे देखते ही ईरानी नौजवान सूखे पत्ते की तरह कांपा  उसका चेहरा मुस्कान खो बैठा और उसके लरजते ओठों से आवाज भी फुसफुसाहट बनकर निकली, ''आ गया...क़ल बी आया था...चार दीन  से जान आपत में अय...या अल्ला . . ....क़ैर कर...''

लेक्सेस से एक औरत उतरी वह ईरानी नौजवान की दुकान की ओर बढी . उसने आंखों पर गहरा काला चश्मा लगाया हुआ था चार कदम ठमककर चलने के बाद उसने चश्मा उतारकर अगल-बगल देखा और ईरानी नौजवान को मेरी कार में काम करता देख पास आ खडी हुई  यूं तो उसका पूरा जिस्म अबाया बोरके  में था लेकिन अबाया केवल फॉल्स कवर भर था उसके नीचे उसने जो कुछ पहन रखा था वह साफ दिखता था ज़ींस की पैंट पर उसने डिजाइनर स्लीवलेस गहरे गले की ऐसी छोटी कमीज पहनी हुई थी जिससे छातियां तो बाहर निकलने को बेताब थी हीं, नाभि के नीचे का हिस्सा भी उफना रहा था छातियों के ऊपर ब्रॉ के पतले फीते और नीचे पेट खुला था  छिदवाई नाभि पर एक छल्ला लगा था जो साफ दिखता था  मगर चेहरे पर केवल आंखें ही दिखती थीं हाथों के पंजे खुले थे ख़ुली हथेलियों से उसके जिस्म की गोराई दिखती थी उन्तीस-तीस वर्ष की औरत के ओठों पर गहरे स्याह रंग की लिपिस्टक थी  खों की बरौनियों और भौंहों को इसतरह तराशा गया था कि उसकी आंखें कुछ नशीली और बडी दिखती थीं उसने ईरानी नौजवान से कुछ अरबी में कहा उन नपे-तुले शब्दों में न जाने कैसा आदेश या कि सम्मोहन था कि वह मेरी कार का काम छोडक़र औरत के पीछे-पीछे गया और लेक्सेस में पिछली सीट उसके साथ बैठ गया दरवाजा बन्द हो गया क़ार का इंजन ऑन था  ज़ाहिर है कि एयर कण्डिशनर भी चालू था...

दस मिनट...बीस मिनट...तीस मिनट...चालीस मिनट...एक घण्टे का वक्त निकल गया मैं उकता गया था  ज़िस दुकान के सामने लेक्सेस पॉर्क की गई थी उसका मालिक अकुताकर अंट-शंट बक रहा था उसकी जगह घिर जाने से वहां कोई कार खडी नहीं हो सकती थी और उसकी रोजी-रोटी मारी जा रही थी  क़रीब एक घण्टे के बाद ईरानी नौजवान जब वापस आया तो उसका चेहरा कुछ ज्यादा ही बुझा हुआ था , ''सौरी...बेरी सौरी.... .चाचा  बाई  अम पंस गिया...चार दीन पैले उसका कार में पिलिम लगाया...तबसे मसीबत....मसीबत ओ गिया...अमको ये अउरत बोलता कि बात करो.... . चाचा अम क्या बात करेगा...अम बोला कि अमारे पास काम अय...वो बोलता ,काम चोड.... . . . .अमारा काम करो...अम पइसा देगा....उसका खाविंद इदर-उदर जाता.... . ज़रूर जाता...चार बीवी ओगा...चालीस अउरत ऊपर से...ये बी जाएगा...लाजिम जाएगा.... . .चाचा...बाई... तुम अपनी अउरत को नई देकेगा तो वो किसी दूसरे को अपना समान दिकाएगा.... अउरत के पास समान ओता...वो देकने का...ज़ूट बोलने का...बताने का...तारीप करने का...तुमारा समान अच्चा अय...तुम अच्चा अय...तब अउरत कुश...अउरत कुश तो समजो जिन्दगी कुश...अमारा निकाअ नईं उआ...मगर इतना जानता अय...ये परेब का दुनीया अय.... . .सौरी चाचा...सौरी बाई...माप करना...तुमारा काम में देरी ओ गिया...या अल्ला . ....वो कल पिर आएगा...उसका बात नई सुनेगा तो वो बोलिस  पुलिस  को कुच्छ भी बोलेगा  दर बोलिस बस अउरत का सुनता ...परेब का दुनीया अय...चाचा...अम कारिजी लोग अय...दो पइसा कमाने आया अय...क़ुदा रहमकर...'' वह शीशों पर फिल्म तो लगाने लगा मगर जबतक फिल्म लगाता रहा बहुत सहमा हुआ दिखा उसका मन आने वाले कल के डर से भरा हुआ दिखा  .

_ कृष्ण बिहारी
मई 1, 200
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