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कहानी में, जो लड़की होती है
घर से सिर्फ एक हजार स्र्पये मिलते थे। बहन एम स़ी ए़ कर रही थी, वह बी ई़ ।
कॉलेज की वार्षिक फीस घर देता था, इसलिए मासिक खर्च के लिए एक हजार से जियाद:
की न औकात थी, न गुंजाइश। पिता बिल्कुल नहीं चाहते थे। किटकिट करते थे। इतने
पैसों में दोनों बहनों के हाथ पीले कर सकते थे। छोटी आय। कस्बे का माहौल।
हर कोई चोंच चलाता, अरे! शहर में अकेली रह कर पढ़ रही हैं। पढ़ाई के नाम पर
आजकल लोग धंधा करवाते हैं! गैंग के गैंग पक़डे जाते हैं शहरों में कॉलगर्लों
के। कॉलेज-यूनिवर्सिटी की लड़कियाँ और अच्छी-अच्छी मॉडल और हीरोइनें तक धंधा
अपनाए हुए हैं। थोड़ी सी फिगर ठीक हो- आगे-पीछे के पहाड़, अच्छी हाइट, फेयर
कलर, अठारह से बाईस की एज और अधकचरी हिंदी-अंग्रेजी।।। फिर देखो कैसा नामा
चीरती हैं आजकल लड़कियाँ शहरों में!
माँ दोनों ओर के क्लेश उठाती। पर बेटियों की आँखों में संघर्ष की चमक देख
उसका आत्म विश्वास पुख्ता हो जाता हर बार। वह किसी बात पर कान न देती। पति से
जिद करती, पढ़ने दो। हाथ तो पीले हो ही जायेंगे एक दिन। लड़की किसी की कुँआरी
रही है? करने दो अपने मन की।।।। अपने भले के लिए कर रही हैं। अड़ंंगा नहीं
डालो। तुम पे जितना बने दो, बाद बाकी का टयूशन-ब्यूसन करके खुद कर लेंेगी।।।।
और बाद बाकी का खुद कर रही थीं वे। नमिता मैथ पढ़ाती थी एक कोचिंग इंस्टीटयूट
में, नीति इंग्लिश। नीति एम।सी।ए। कर रही थी। एक पुराना कम्प्यूटर सिस्टम
अरेंज कर लिया था।
कमरे में ही खाना बनाती थीं। एक पलंग, एक टेबिल-कुर्सी और गैस
सिलेण्डर-स्टोव्ह के अलावा किताबें, जूते-चप्पल तमाम अटरम-शटरम भी वहीं मौजूद
रहता। लेट-बॉथ कॉमन। नीचे का रहना। आजू-बाजू और सामने पढ़ने-पढ़ाने वाले
लड़के रहते। सब उन्हीं की तरह संघर्षरत्। कोई पी।ई।टी।, पी।एम।ई। की तैयारी
करते टयूशन पढ़ाते। कोई बी।ई। के बाद प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज में
प्राध्यापकी करते गैट वगैरह की तैयारी करते।।।। सभी अपने लक्ष्य के लिए
समर्पित। औसत वक़्त किताबों में मशगूल। अपने सपनों में विचरते। ।।।कस्बे के
लोग आकर देखते तो बहुत से भ्रम मिट जाते जो सिनेमा, टीवी फैलाते हैं।।।।
नीति का एम।सी।ए। हो गया। उसे लौटना पड़ा। उसी साल हाथ पीले हुए। नमिता की
बीई का आखिरी साल था। नीति के बॉयफ्रेंड की एमसीए रह गई। बीच में घर से फीस
नहीं मिली। अब वह नमिता का बॉयफ्रेंड था। हैल्प बतौर वह कभी सब्जी दे देती।
कभी साथ खिला लेती सुबह या शाम। कभी वह उसे पढ़ने देता और खुद बना देता।
ज़िंदगी लगभग सांझे चूल्हे में ढल गई थी।
उसके दोस्त बहुत थे। बरसों सेे रह रहा था-न! एक था श्रीकांत। वह तो
नीति-नमिता का भी फेमिली फ्रेंड था। अब सहारा सिटी होम्स भीलवाड़ा में
मुलाज़िम है। उसने आश्वासन दे रखा है कि जगह होते ही बुला लेगा सोमेश को भी।
तब तक डिग्री कम्पलीट करले। ।।।और एक था सोनू, जो बी।एम।ई। कर चुका था।
कभी-कभार अपनी गर्लफ्रेंड को लेकर उसके रूम पर आ जाता। तब वह नमिता के कमरे
में जाकर पढ़ने लगता। वह कॉलेज गई होती। नहीं गई होती तब भी कोई एतराज नहीं
जताती। लेकिन मक़ान मालकिन जो कि ऊपर रहती थी, उसने हर बार डांटा सोमेश को।
वह बहुत पैनी नज़र रखती थी। वह बाक़ायदा गिना देती कि कब-कब लड़की,
कितने-कितने घंटे के लिए लेकर आया उसका दोस्त! और कब-कब बदल कर लाया!
वह जानता था। लेकिन यह मानने को तैयार न था कि वे उसके बिस्तर पर हम-बिस्तर
होते हैं। जैसा सोनू ने उसे समझाया कि पिछली लड़की दगा दे गई। वह कितना रोया,
उदास रहा! पता है सोमेश को- दोस्ती और लव का मानी ़़फकत बॉडी रिलेसनशिप नहीं
होता। मगर ज्यादातर लोगों कोे दोस्ती और लव में सेक्स के सिवा कुछ दिखता
नहीं। नई लड़की उसके घाव भर रही थी कि तभी पुरानी फिर आ गई।।।। सोनू के लिए
वह बेवफ़ा होकर भी बहुत अहम थी। सोमेश नहीं समझता कि इतनी उलझनों के बीच
प्रेमालाप और सेक्स कूद पड़ेगा।।।। उसे मकान मालकिन अव्वल दर्जे की मूर्ख
नज़र आती थी।
मगर एक रोज़ पापा का फोन आया तो उसने सोमेश को बुलाने से पहले कह दिया, उसका
रूम तोे अव बन गया है। रोज़ बदल-बदल कर लड़कियाँ आ रही हैं! हम तो इसे निकाल
रहे हैं।।।।
उस दिन से पापा ने उससे बात करना बंद कर दी। हालांकि उसने मक़ान मालकिन को
समझा लिया। पर क्या फायदा, मासिक खर्च मिलना बंद हो गया। अब वह बैंक वगैरह
में इंट्रीज करके खर्च निकाल रहा है। शेेष बचे सेमिस्टर हेतु फीस का अकाल दिख
रहा है। एमसीए होता दिखता नहीं। तमाम समय तो जॉब में सिर मारते निकल जाता है।
पढ़ाई हो कैसे?
उन्हीं दिनों वह नमिता को शायद, प्रेम भी करने लगा- जो उसने अपने कम्प्यूटर
पर यह कविता। लिखी: और बाद में डिलीट कर दी कि कहीं पढ़ न ले!
खामोश रातों में
क्या देखती हो तुम
आइने के सामने ख़डे होकर?
आँखोें में उतर आई चमक को
या
स्याह जुल्फों को
जो ढलक आई हैं शानों पर!
नहीं।।।
शायद, पढ़ती हो
चेहरे पर तहरीरें मोहब्बत की
लिखावट उन उंगलियों की।।।
वह कह नहीं सकता था। चुपके-चुपके देखता जरूर था। चौबीसौ घंटे साथ रहने की
कोशिश करता। कोई अंग छू जाता तो अजीब-सी अनुभूति से भर उठता। कह नहीं पाता,
पर शो जरूर करता कि वह उसकी गर्लफ्रेंड है। जाहिर है, थी भी। उसने श्रीकांत,
सोनू और कई मित्रों को कान्टेक्ट नम्बर उसी के मोबाइल फोन का दे रखा था।
ज्यादातर करीब होता। सुबह ६ से ९ बजे तक और शाम ५ से रात १०-११ बजे तक। घंटी
बजते ही नमिता बटन दबाकर हलो कहती। वह मुँह फाड़ हाथ बढ़ाने को होता। फोन उसे
पक़डा देती।
़़जिंदगी इसी तरह गुज़र जाय। वह इससे ज्यादा कुछ और नहीं चाहता। बी।ई। के बाद
नमिता गैट की तैयारी करेगी। एम।टेक। करेगी वह। गैट क्वालीफाय करना जरूरी है।
फ्री सीट पर एडमीशन मिल जायेगा। और स्कॉलरशिप मिलेगी सो अलग। तभी तो कर पाएगी
एम।टेक।।
उसने ठान लिया है। वह हर तरह की मदद करता रहेगा। किचेन से लेकर पढ़ाई तक। मगर
घर वाले पीछे पड़े हैं कि बी।ई। के बाद ही नमिता के हाथ पीले कर दें! यही
संकट है। वह रोज़ भरता है कि शादी को अभी ४-६ साल और टालो तुम। ।।।अड़ जाओ-
मुझे एमटेक करना है। जॉब ढूंढ़ना है। फिर देखूँगी।।।।
नमिता कश्मकश में है। विवशता आँखोें में झलकती है। सब कुछ जाति-बिरादरी में
ही होगा। होगा कैसे नहीं! उसकी क्या बिसात?
और देखो- मोहब्बत की सौ अलामतें! उस दिन `नाच' देख रहा था अभिषेक के साथ।
इंटरवल तक थियेटर चौथाई रह गया। उसने मोबाइल माँगा। नमिता को लगाया, बस आ रहा
हूँ। तुम पढ़ना। मैं आकर बना लूँगा।
-लड़की का सेलफोन है! अभिषेक ने कहा।
-तूने कैसे जाना? उसके चेहरे पर सलज्ज मुस्कान थी।
-जान लिया, लड़की का नम्बर है।।। उसने मोबाइल चमकाते हुए कहा।
-ए, कॉल नहीं करना, वो ऐसी लड़की नहीं है।
-सारी लड़कियाँ एक जैसी होती हैं।
-नहीं होतीं।
-पटा के दिखाऊँ?
वह डर गया।
-नहीं, नहीं! तू फोन नहीं करना।।।। वह स्र्आँसा हो आया।
-नहींं करूँगा, मर मत।।।।
मगर भयभीत था वह। नम्बर आ चुका था अभिषेक के मोबाइल में। दो दिन उसने फोन
नहीं किया। उसे राहत मिली। तीसरे दिन रात में लगा दिया-
हलो! एक खनकदार आवाज कान के परदे पर चस्पां हो गई।
-हलो- नीरो है?
-कौन नीरो, सॉरी- नीरो नहीं है!
-नहीं, काटना नहीं, आपकी आवाज बहुत मीठी है।।।
नमिता चुप।
-क्या करती हैं? -मेरे पापा कहते हैं, फोन का पूरा इस्तेमाल करना चाहिए!
सिऱ्फ- जी! शेष- नमिता चुप।
-बताया नहीं अपने बारे में।।।
-बी।ई।।
-अरे! कौन से कॉलेज से?
-एम।पी।सी।टी।ई।।
-ब्राँच?
-मैकेनिकल।
-सुनो- फोन रखना नहीं।।। मैं भी हूँ मैकेनिकल में। एम।आई।टी।एस। से।
-अच्छा! आपके कॉलेज की रेपुटेशन तो अच्छी है। वह दब गई।
-अरे- कुच्छ नहीं, अब तो सब दूर कचड़ा है। रीसेम। फी भी और पढ़ाई भी। और
डिग्री का वज़न भी! कंपनी वाले घर बैठे बुलाने से रहे।।।। फायनल है। अब तो
दूध का दूध, पानी का पानी नज़र आने लगा।।।।
-मेरा भी है।।।
कहने के बाद उसने स्विच ऑफ कर दिया। बाद में कहा- होगे, क्या करना। ।।।सुबह
सोमेश से कहा- तुमने परसों टॉकीज से जिस नम्बर से फोन किया, रात में उसी ने
इंटरव्यू ले लिया।।।।
वह भयभीत-सा अपराधबोध से भर गया, देखना- बता नहीं पाया, वो मेरा फ्रेंड
अभिषेक।।। वो भी बीई।।।
-पता चल गया।।। नमिता हँसी, चिपकू है।।।।
उसे तसल्ली हुई।
उसे खेद था कि यह उसने क्या किया। उसे डर लगा कि अब वह रोज़-बरोज़ रिंग
मारेेगा! लेकिन फिर ढांढ़स बंधा मन को, नमिता रिस्पॉन्स नहीं देगी।
दिन गुजरते रहे। सर्दियाँ थीं। मौका श्रीकांत की मैरिज रिसेप्शन का। वे लोग
टैम्पो से जरा जल्दी पहुँच गए। कस्बे से जुड़े थे इसलिए। पांडाल सजा हुआ मगर
खाली था उस वक़्त। सोमेश ने पॉलीमिन की रेड टीशर्ट, जीन्स की ब्लू पैंट पहन
रखी थी। मरकरी लाइट्स में अलहदा चमकता हुआ।।।। मन प्रफुल्लता से हुमकता हुआ।
लोग जहाँ कोट, जैकेट, स्वेटर और कोई-कोई स्कार्फ, कनटोपे पहने- उनके बीच वह
कितना स्मार्ट नज़र आ रहा था! जरा भी सिकुड़ नहीं रहा। सीना फुलाए इधर से
उधर। सर्र-सर्र। ठंड जैसे छू भी नहीं रही।।।। नमिता का साथ- कंधे से कंधा और
और क़दम से क़दम मिला हुआ! जाने क्या सोच कर उसने भी आज पुलोवर, कार्डीगन या
कोट नहीं पहना। पिंक कलर के सलवार सूट से मैच करता शॉल कंधे पर टुपट्टे की
तरह सजा लिया था ़़फकत। ।।।श्रीकांत और तमाम दोस्तों से हाथ मिला सोमेश का,
नमिता की नमस्ते। जोड़े पर नज़रें टिकी रह जातीं।
श्रीकांत सूट में नहीं था अभी। इंतजाम देख रहा था। नमिता को होटल में भिजवा
दिया उसने, जहाँ वधु की सजावट चल रही थी। सोमेश वुफे व्यवस्था चैक करने लगा।
गार्डन में सब ठीक था। श्रीकांत विचलित। स्वजन आये नहीं थे अब तक। परिवार
बड़ा था। माँ तो साथ थी, पर पापा, दादा, ताऊ, ताई, भाई, भाभी तक नहीं आए!
श्रीकांत ने भीलवाड़ा में रहते हुए कोर्टमैरिज कर ली थी। अब रिसेप्शन देकर
सामाजिक स्वीकृति ली जा रही थी, अपने देश में! कस्बे से लोग आ नहीं रहे थे।
उसके तनाव का कारण यही था। बार-बार मोबाइल लगा रहा था। पता चल रहा था- वहाँ
से निकल चुके हैं। रास्ते में हैं- कहाँ? पता नहीं! शायद, मुरैना। शायद,
मुरैना और ग्वालियर के बीच।।। क्या पता अम्भा और मुरैना के बीच लटके हों।
किसी पर मोबाइल नहीं। कोई सम्पर्क भी नहीं कर रहा उससे कि घबराये नहीं, देरी
का कारण अमुक-अमुक है। १० बज गए। ९ से ११ का टाइम था। पांडाल में २-२, ५-५
मिनट कुर्सी गर्माकर लोग गार्डन में खाने पर टूट रहे थे। और मंच सूना था।।।।
सोमेश उकसा रहा था- तू तैयार होकर आ! जा- बैठ मंच पर! रस्म होने दे।।।। पहली
कतार में वधु पक्ष के मेहमान बैठे हुए। श्रीकांत रिक्त स्थान की पूर्ति-सा
दोस्तों और अपने गुस्र्जनों से उनका परिचय करा रहा था।।।।
सोमेश ने उसका हैंडसैट लेकर नमिता को मैसेज दे दिया कि भाभी को ले आओ।।।। वह
तो इसी प्रतीक्षा में थी! दस मिनट के अंतराल में वीडियो कैमरे की तेज़
चकाचौंध के बीच नमिता और श्रीकांत की मम्मी के मध्य वह भारी परिधान और गहनों
से झुकी, श्रीकांत की वधु खुशबू, डग-डग भरती चली आ रही थी। ।।।तब उसने जोर
देकर जैसे आखिरी बार कहा श्रीकांत से, अब तू भी झट से तैयार हो आ और जाकर बैठ
जा मंच पर।
-उसके साथ तो अब जिंदगी भर बैठना ही है! वह झुंझलाया। गेट की ओर मुँह फाड़ता
बेमन चल दिया तैयार होने। ।।।मिक्स सोंग काटने को दौड़ रहे थे। तभीे एक
धूलधूसरित गाड़ी आकर स्र्की, जिसमें से श्रीकांत के परिवारजन निकल पड़े। वह
सबके चरणों में झुक कर बेहाल होने लगा। कंठ स्र्ंध गया खुशी से। दादा के गले
लग कर बोला, कितनी देर लगादी।
ताऊ ने उलाहना दिया, तूने लव और मैरिज की हवा भी लगने दी?।।।
वह शरमा गया, सॉरी-सॉरी! आई थिंक, बाइ द वे, अदर कास्ट में जाता तो क्या
होता!
-जाता तो जाता ही! उस वक़्त होश था तुझे? भाभी ने और शर्मसार कर दिया।
मिलेजुले गुस्सा और प्यार के साथ वे लोग अग्रपंक्ति में आकर बैठ गए। श्रीकांत
के तइंर् जीवन का अनमोल क्षण था वह। वह झटपट सूट पहन कर आ गया। वीडियो कैमरे
की तेज़ लाइट में चेहरे फिल्मी सैट से दमकते हुए। नमिता खुशबू की तरफ, वह
श्रीकांत की तरफ ख़डा मूर्तिवत्! गिफ्ट देने वालों का ताँता लगा हुआ। सब को
खाने की पड़ी थी। जो खा चुके थे, उन्हें जाने की। नमिता उधर, वह इधर गिफ्ट
पैकेट संभालते हुए। कैमरों के फ्लैश बार-बार चेहरों को चमकाते, आँखों को
चौंधियाते हुए। वह भी कुछ अनोखा महसूस कर रहा था। जैसे, श्रीकांत की जगह खुद
बैठा है! और खुशबू वाली चेयर पर नमिता! मन में गुदगुदी-सी उठ रही थी। इसी बीच
अभिषेक ने आकर हाथ मिलाया। ख्वाब में थोड़ा व्यवधान पड़ा। पर वह गले से लिपट
गया। खुशी छलकी पड़ रही थी। जैसे, उसी की मैरिज सेरेमनी हो!
कहा अभिषेक ने, चल भूख लग रही है, श्रीकांत को बैठने दे!
-खैर। मैं तो बाद में लूँगा, चल तुझे पहुँचा दूँ।।। उसने नमिता को भी देखा-
तुम भी ले-लो! जैसे, आँखों से बोला।
वह साथ हो ली।
अभिषेक पीछे पलट कर बोला- हाय!
-हाय! वह चौंक गई।
-आप लोग परिचित हैं, अच्छा रहा मैंने पहल नहीं की!
-तेरी गर्लफ्रेंड है, ना- नमिता! उसने कानाफूसी की।
-हाँ! पर तूने कैसे जाना? तेरे हैंडसैट पर चेहरा आ जाता है-क्या!
-नहीं-यार! ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं।।।। अभिषेक हँसा।
नमिता बेवजह लजा गई।
-मैं बताने वाला था, वह घबराया-सा बोला, देखना- मिस नमिता एमपीटीसीई से
मैकेनिकल ब्राँच में।।।
-फाइनल में है-ना! अपन भी तो।।। तूने अब तक बताया नहीं? हैल्प मिल जाती हम
लोगों को।
उसने जैसे डिप्रैश किया।।।।
मेजों पर लोग टूट रहे थे, प्लेटें नदारद।
भीड़ बहुत थी। खाना कम। प्लेट एक भी नहीं।।।।
-श्रीकांत का फ्रेंड सर्कल बड़ा है, वह हँसा।
-सभी कार्डों पर विद फेमिली लिखा गया था, नमिता ने जुगलबंदी की।
-और एक-एक कार्ड पर १००-१०० दोस्तों के नाम।।। अभिषेक ने कहकहा लगाया।
सोमेश प्लेटों के लिए मारा-मारा फिरा। यहाँ-वहाँ, कहीं मिली नहीं।।।।
-चलो, जब तक चाट खाई जाय।।। अभिषेक ने कहा।
स्टॉल पर जमकर भीड़ थी। वह चीला के लिए बार-बार हाथ बढ़ाता, बलवान हाथ नीचे
झुका देते। तमाम देर बाद एक जैसेतैसे हाथ आया, उसे भी एक दूसरे पंजे ने झपट
लिया। एक कौर रह गया मुट्ठी में। उसने पलट कर नमिता की ओर बढ़ाया। वह मुस्करा
कर रह गई, लिया नहीं। तब तक अभिषेक दो रसगुल्ले ले आया। नमिता ने एक उठा
लिया। हाफ-हाफ दोनों ने। फिर सोमेश गया रसगुल्लों के स्टॉल पर। थाल खाली
मिला! जबकि अभिषेक एक चीला ले आया, नमिता ने ना-ना करके खा लिया।।।।
ता़़ज्जुब, उसने सोमेश को उकसाया टिक्की के लिए!
जोरदार धक्के पड़ रहे थे चारोंतरफ से। टिक्की सिंक नहीं पाती, बँट जाती। हाथ
फैला रह जाता उसका।।।। तभी अभिषेक नमिता को लेकर आगया बगल में। अपने हाथ में
लेकर उसका हाथ आगे बढ़ा दिया, लड़कियों को पहले दो, लड़कियों को।।। वकालत
करने लगा वह। थोड़ी-सी असफलता जनित खिसियाहट से भरा वह सरकता गया पीछे।
टिक्की वाला यूं भी लड़कियों को ही दौने पक़डा रहा था। पर लड़कियों के हाथ भी
दर्जनों थे। चार-छह टिक्कियाँ सिंकतीं और दौने झपट लिए जाते। फिर दसियों मिनट
प्रतीक्षा। मन ही मन एक से हजार-पाँचसो तक की गिनतियाँ। ।।।आखिर तमाम
मश़़क्कत के बाद दो दौने झपट लिए उन्होंने।
स्टॉल से हट कर दूब पर ख़डे सोमेश के पास आ गए, जो अब ठिठुरन महसूस कर रहा
था। एक आलू टिक्की नमिता के पेट में और हाफ-हाफ उन दोनों के। भूख और तेज़ हो
गई।।।। लेकिन तब तक प्लेटें आ गइंर्। जर्द पड़ गए चेहरे चमकने लगे। टेबिलों
पर लगे थालों की कतारों की ओर बढ़ गए फोरन। नीचे फ्लेम चमक रही थी, ऊपर पुलाव
नदारद। मटर पनीर, रोटी, पूरी भी नहीं। दाल, मिक्सवेज, सलाद और रायता बचा था-
बस! खालो, पीलो मौज उड़ालो।।। हँसी से पेट में बल पड़ने लगे। वे बचीखुची
चीजें प्लेटों में भरकर गार्डन के बीचोंबीच बैंच पर आ बैठे। अभिषेक टेंट के
पीछे तंदूर के पास जा घुसा। सोमेश ने नमिता से कहा, पहले कितने थाल भरे थे-
पालकपूरी, छौले, तंदूरी, बेड़मी।।। क्या नहीं था!
-इससे तो अच्छी गाँव की पंगत होती है। नमिता ने कहा।
-हाँ! सबको भरपेट मिल जाता है।।। टाटपट्टी पर न सही, स्टेण्डर मुताबिक
कुर्सी-टेबिल पर कर दो।।।।
-वो बेहतर।।। उसमें सम्मान है- खिलाने, पूछने वाले तो हैं! इज्जत है, मेहमान
की।।।।
अभिषेक लौट आया, बहारो फूल बरसाओ, एक तंदूरी मिली! उसने रोटी उठा कर हिलायी।
सोमेश और नमिता के गालों में मुस्कान के गड्ढे बने।
-सैक़डों लोग ख़डे हैं-सैक़डों।।। भैया कसम! वह हँसी से दोहरा हो रहा था,
तंदूर बुझ चुका-था।।। फिर से गर्म हो र-हा है।।। किसी ने आटे पर मटर की थैली
गिरा दी। गजब की मारामारी मची है। भूखे-बेहाल डॉक्टर-इंजीनियर।।। बंदरों-सी
खोंखों मचाए हैं।।। खाकर ही जायेंगे। घरों में कौन रसोई रचेगा अब।
-तू हँस, हँसता रह! मुस्कराते हुए सोमेश ने रोटी उठा ली। आधी नमिता को पक़डा
दी।
उसे लग रहा था, अभिषेक नहीं मिलता तो सचमुच भूखी लौट जाती।।।। सोमेश के बस की
नहीं थी मारा-मारी! अब कौन आटा माड़ता! दुपहर की सूखी खिचड़ी दो-दो कौर गटक
कर आँखें मूंद लेते। बाद में श्रीकांत को दावत का मज़ा चखाते।
और थोड़ी देर में अभिषेक नान से भरी प्लेट लिए चला आ रहा था।
-अबे! सर्ब करने वाले लड़के से छीन लाया-क्या? सोमेश चपल था। नमिता की आँखें
धन्यवाद उगल रही थीं। दो-दो, तीन-तीन अपनीअपनी प्लेटों में लपक लीं उन्होंने!
आसपास के लोग भी अभिषेक पर झपटने लगे।।।।
-भैया कसम, हलवाई रो रहा है! अभिषेक ने एक और फुवारा छोड़ा, श्रीकांत ने
ढाईसौ का आर्डर देकर हजार लोग ख़डे कर दिए।। जै हो! जल्वे हैं श्रीकांत
तेरे।।।
फिर वह उड़ा और तीन-चार दौने गाजर का हलुवा झपट लाया! गर्मागर्म! नमिता और
सोमेश की अंतड़ियाँ तृप्त हो उठीं। स्वादिष्ट डकारें आने लगीं। घंटे भर पहले
की सारी कोफ्त मिट गई। अभिषेक मज़ेदार लग उठा सोमेश को भी। यारों का यार!
नमिता ने सोचा। ।।।उस पर बाइक थी। गुड नाइट बोल कर चला गया। वापसी में टैम्पो
नहीं मिला। सोमेश ने तोलमोल कर एक ऑटो पटाया। फिर भी चालीस देने पड़े! लेकिन
नमिता के बगल में बैठा तो लगा कि खुशबू को विदा करा कर ले जा रहा है! अनुभूति
से रोमरोम खिल गया। हृदय अजीब से स्पंदनों से भर उठा।
रास्ते में वह बोली, कैसा बासी-बासी सा लग रहा था।।।।
-हाँ!
-रिसेप्शन तो शादी के दूसरे-तीसरे दिन ही अच्छा लगता है, ना!
-हाँ, देखना- ताज़गी तो नहीं थी।।। उसने संभल-संभल कर कहा, एक-दो महीने हो
गए-ना मैरिज को।।।। घर वाले कुढ़े हुए थे,
-वही तो! नमिता बोली, शादी की उमंग-उत्साह ही दूसरा होता है। वो मज़ा नहीं
था। श्रीकांत भैया के चेहरे पर भी चमक नहीं रही। ।।।भाभी भी बुझी-बुझी सी थी।
-हाँ, ये तो है! उसने ताईद की, अरेंज मैरिज-सा माहौल, वो मज़ा तो नहीं था।।।।
फिर थोड़ी देर बाद नमिता ने कहा-
`लेकिन ये हो जाता है आजकल,' ऑटो भाग रहा था।
`पहले बाहर नहीं निकलते थे। मिलना-जुलना नहीं होता था आपस में। तब अरेंज
मैरिज ही एक मात्र विकल्प थी। लेकिन अब तो साथ रहते, काम करते, मिलते-जुलते
और फिर उम्र का भी तक़ाजा।।।
वह मुँह ताक रहा था नमिता का!
उसे ताज्जुब था- बड़े गहरे अनुभव से बोल रही है। यानी मानसिक रूप से तैयार
है! अगर परिस्थिति बनी तो लोहा ले सकेगी।।।। उसे अच्छा लगा। दिली खुशी हुई।
संभावना कि उसके लिए जगह बन रही है!
फाटक अंदर से बंद था। ताला अंदर से पड़ता था। चाबी फाटक के पार बॉटनी वाले सर
के कमरे की ख़िडकी पर टंगी रहती। रात के डेढ़-दो बज रहे थे। सर्दियों की
रातें। चिल्लाने पर भी नींद नहीं खुलती। खुल भी जाये तो रजाई के भीतर दुबके
लड़के ठण्ड में बाहर नहीं निकलते। ऊपर मकान मालकिन सुन भी लेगी तो उतरेगी
नहीं। बच्चों को भेजने का तो सवाल ही नहीं। दीवान जी होते तो जरूर फाटक खोलने
आ जाते! डिस्टरबेन्स से बचने के लिए ही तो मकान मालकिन ने डोरबैल हटवा दी है!
-चीखो! नमिता ने कहा, सामने वाले पीएससी-पीएमटी वाले सुन लेंगे! ।।।नहीं तो
एनआईटीएम वाले सर निकल आएंगे।।।।
फाटक सिर से कोई ज्यादा ऊँचा नहीं! मगर ऊपर नुकीले सरिये हैं। सोमेश ने कहा,
चढ़ कर उतर जाऊँ?
-उलझ गए तो।।। वह डरी।
-फिर!
-चीखो-खटकाओ।।।
-खोलना % ।।।देखना- स%र! खोलना। अमित % खोलना! विवेक % सुनना-जरा!
उसे हँसी आ रही थी। आज के समूचे प्रकरण पर। क्या बिगनिंग, क्या एण्ड!
-देखना % खोलना-सर % ।।।सोमेश चीख रहा है। वह बजा रही है फाटक- खटखटखट।।।।
-कहाँ गए थे तुम लोग।।। बापरे! मकान मालकिन उतर रही है! जीने पर स्वर से भी
पहले उसके पैर, घड़ फिर गर्दन नज़र आती है! आँखें मींजती हुई। अलसाया मगर
चिड़चिड़ाया स्वर, रात मैं भी चैन नहीं। फिल्मों से पेट नहीं भरता, मौजमस्ती
से %
धत्तोरे की! सब कूड़ा! सारा मज़ा किरकिरा हो गया।।।
-देखना।।। वह मिमियाया, दीदी।।। वो श्रीकांत है-ना, उसी का मैरिज रिसेप्शन
था। हजीरे से यहाँ तक पहले तो कोई साधन नहीं मिला, फिर ऑटो लिया। तो भी देर
हो गई।
-देर हो गई।।। उसने मुँह बिचकाया, आने दो तुम्हारे पापा को- कहूँगी, बड़ा
पढ़ता है।।। रात-रात भर आवारा हुआ घूमता-फिरता है।।।।। बड़बड़-बड़ और ख़डख़ड
करके ताला खोल कर चली गई।
फाटक खुल गया, छुट्टी हुई। वे बहस करते तो और फँसते! सीधे अपने कमरों पर आ
लगे। मगर नमिता पर्स टटोलते ही घबरा गई! गिफ्ट निकालते कहीं चाबी सरक गई
उसकी! सोमेश टॉयलेट से लौटा तो वह कमरे में बैठी मिली। ।।।वह भी विचलित हो
गया थोड़ी देर के लिए, अरे! कहाँ-कैसे? फिर सोचसमझ कर बोला, दो-तीन घंटे बचे
हैं।।। देखना- एक एक करवट यहीं सो लेते हैं! अभी तोड़ेंगे तो सब इकट्ठे हो
जाएंगे, तमाशा होगा।।।
बात सच थी। ।।।वह भी टॉयलेट से लौट कर फर्श पर बिछे इकलौते बिस्तर पर अपनी
करवट लेट गई। ।।।फिर पता नहीं चला कब झपक गई।
मगर उसे नींद नहीं आ रही थी। सोती हुई नमिता उसे फरिश्ते-सी पवित्र और फूल-सी
निष्कलुष लग रही थी।।।। वह कम्प्यूटर खोल कर `जोगर्स पार्क' देखने लगा। ।।।एक
जज खिलाफ था प्रेम के, दुनिया भर के प्रेमियों के, प्रेम विवाहों के।।।।
आफ्टर रिटायरमेंट मार्निंगवॉक के लिए जाते जोगर्स पार्क में मिली युवती के
साथ योगा करते, प्रेम संबंधों पर बतियाते-बतियाते जीवन भर की धारणा बदल गई।
वह खुद प्रेम करने लगा उस युवती से।।।
सोमेश की आँखों में नींद नहीं। अब कोई शुरूवात है! अब पूरी संभावना है! दिल
धड़क रहा था। हालांकि वह प्रेम करने नहीं पढ़ाई करने आया था। अगर प्रेम करता
तो नमिता की बहन नीति से ही कर लेता। नीति में ज्यादा संभावना थी। उसका तो
कोई खास लक्ष्य भी नहीं था। मगर नमिता की नज़र तो चिड़िया की आँख पर है।
कितना संघर्ष कर रही है। रूखा-सूखा खा-लेना। दो-चार घंटे सो लेना। फिर पढ़ाई,
कॉलेज, कोचिंग। ।।।एडमीशन की फीस जुटा रही है धीरे-धीरे। फाइनल के बाद कोचिंग
देना छोड़ देगी। गैट के लिए खुद कोचिंग लेगी। तब एक-एक पैसा काम आयेगा।
हफ्ते भर बाद अभिषेक का मैसेज आया, नमिता के मोबाइल पर- कहाँ रहती हो?
उसने बटन दबाये, सी-५२, पी।एन।टी। कॉलोनी।
तुरंत बाद फोन कॉल- पीएनटी में कहाँ?
-पानी की टंकी के पास, पुलिस में एक दीवान जी हैं, उन्हीं के मक़ान में।
-वहीं-कहीं सोमेश भी तो है।।।
-उसी के सामने वाले रूम में हूँ!
-ओ % बताया नहीं उसने कभी!
-क्या पता।।। उसने कंधे उचकाये।
मौज में ऐसा करती है कभी-कभी। मस्ती में होती है तब अक्सर गुनगुनाने लगती है।
लेकिन सोमेश को बताना भूल गई यह वाक्या! रात जब सारे कामों से निबट कर
बारह-साड़े बाहर के लगभग मेडीटेशन पर बैठी- वही निरर्थक शब्द, पों।।। पों।।।
पों।।। जो मंत्र कह कर दिया गया था, दोहराते ध्यान केन्द्रित हुआ, अचानक याद
आया! वह दौड़ी। ।।।सोमेश सोतेे समय तक गेट सिऱ्फ भेड़ कर रखता है! क्योंकि
उसे हरदम इंतजार रहता है और वह अक्सर आती भी रहती है! कमरे में झांक कर बोली,
बताया सब कुछ- उसका मैसेज, फोन कॉल! वह कम्प्यूटर पर बैठा था, बुझ गया। सेंध
लगा रहा है अभिषेक धीरे-धीरे! उसे एक नया सदमा घेरने लगा। नींद उड़ने लगी।
अगले दिन वह कॉलेज नहीं गया, न बाजार। सारा दिन बेकार गुज़ार दिया। अभिषेक
आया नहीं। और जब उम्मीद नहीं बची। उसकी जान में जान आने लगी तो रात में यमदूत
की तरह दस-साड़े दस बजे अक्समात् प्रकट हो गया। सीधे नमिता के कमरे पर ही
दस्तक दी। जैसे, इधर आता तो वह ले नहीं जाता। यहीं बुला लेता नमिता को और
यहीं से चलता करता उसे!
यक-बयक अपनी गरीबी पर शरमा गई वह। कहाँ बिठाये। एक पलंग, एक कुरसी। पलंग पर
थाली रखे खाना खा रही थी पढ़ती हुई। ।।।अभिषेक चेयर पर बैठ गया। नमिता ने
हड़बड़ी में थाली उठा कर गैस के पास रख दी। अभिषेक ने कहा, खा-लो इत्मीनान
से, मैं खाकर आया हूँ, बाई गॉड!
-अच्छा, चाय लोगे!
-हाँ, चल जायेगी।।।।
वह उठ कर सोमेश की किचेन में गई। दूध उठा कर उसके कमरे में झांकी, अभिषेक आया
है! चाय बनाती हूँ।।। तुम भी पियोगे?
-हाँ, नहीं।।। वह हड़बड़ा गया, देखना- अभी कॉफी बनायी थी। तुम लेती नहीं,
इसलिए पूछा नहीं, कब आया?
सोमेश ख़डा हो गया। लेटा था जमीन पर बिस्तर में। उसका रूम तो नमिता से भी
छोटा है। मगर उन्हीं पैसों में किचेन जुड़ी हुई है।
-अभीअभी! आओ, तुम भी।।। नमिता लौट गई।
वह लुंजपुंज हाथपांव से पीछे-पीछे चला आया। अभि |