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सन्तुष्टी                   लघु कथा

आलोक के जाते ही कनु अन्दर कमरे में पलंग पर धम्म से गिर सी गई । उसे लगा, हर चीज़ घर में उससे रूठ सी गई है । आलोक से घर भरा सा लगता था कहीं गानों की आवाज, कहीं टी.वी. पर मैच की आवाज, तो कभी उसके दोस्तों के ठहाके । आज घर खाने को आ रहा है । अचानक अतीत ने उसे झंझोड़ा । इसी कमरे में ब्याही आई थी वह, आज से २५ साल पहले । आलोक दादी के आगे- पीछे घूमता था । छोटी-छोटी प्यारी आँखों से उसे देखता, निहारता रहता । घर का कोई सदस्य भी उसे माँ के पास आने नहीं देता था क्योंकि सौतेली माँ से बढ़कर कोई गाली नहीं होती । औरतें सदैव आलोक की दादी को कहती, जब तक वो हैं उसकी माँ भी है, व कनु की अपनी गोद हरी होते ही, आलोक उसकी आँखों का कांटा बन जायेगा । कभी-कबार किसी कारणवश आलोक को कभी दादी कनु के पास छोड़ जाती तो वह सदैव एक ही बात कहता, नई माँ, मुझको मारोगी क्या ? कनु का दिल बैठ सा जाता, उसकी ममता हिलोरे लेती व वह उसे ज़ोर से छाती से लगा कहती कभी नहीं । शादी को करीब ६-७ माह बीत गये । अमित के चेहरे पर दोहरी जिम्मेदारी की वजह से असली मुस्कान कभी न आई । एक दिन जब वह छत पर बाल सुखा रही थी तो आलोक अमित की गोद में वहाँ आ गया । कनु के बाँह पसारते ही आलोक लपक कर माँ से लिपट गया था व तोतली भाषा में कहने लगा, ``पापा नई माँ अच्छी है न'' अमित ने संगिन्ध सा सिर हिला दिया । कनु ने न जाने किस हिलोर में कह डाला, ``अमित, मैं नहीं चाहती कि कोई आलोक का प्यार बांटे, क्या ऐसा नहीं हो सकता।'' अमित ने कनु, आलोक को बाँहों में भर लिया था व खुशी के आँसुओं से भिगो दिया था ।


शबनम शर्मा

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