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रीढ़ विहीन पुरूष की अभिशप्त प्रेमिका

हे प्रिय पाठक तो आप भी इस कथा के शीर्षक के सम्मोहन से बच नही
पाये ।
आप भी सोचते होंगे यह भी क्या नाम हुआ भला ?

रीढ़ विहीन पुरूष की अभिशप्त प्रेमिका सच मानिये मेरे लिये भी यह उतना ही चमत्कार पैदा करने वाला है जितना कि आपके लिये ।

इस कथा में केवल दो ही पात्र हैं एक रीढ़ विहीन पुरूष और दूसरी उसकी प्रेमिका यानि की मैं ।

मैं एक सुन्दर सुशील शिक्षित स्वलम्बी महिला हूँ जिसनें अपनी आयु के २३ बसंत रसिकों के हृदयों पर पैर रख रख कर पार किये हैं । जिस पूरे अंतराल में मैनें अपशब्द बतौर न जाने कितनी ही बार लोगों को रीढ़ विहीन कहा है ।उस समय मुझे आभास भी नहीं था कि जिस शब्द से इतनी घ्रणा है जो कि सुन्ने मे ही कितना लिजलिजा लगता है वही एक दिन मेरे जीवन की धुरी बन जाएगा ।

खैर अपने बारे मे ज़्यादा न बता कर कथाचक्र ठीक यहीं से तेजी से बाएं घुमाते हैं तो अतीत के कई सजीव चित्र उल्टे क्रम में सट सट कर किन्हीं शैतान बच्चौं की तरहा पंक्ति बना कर खड़े होजाऐगे ।

उनका मेरे जीबन मे आना ``इसे घुसपैंठ कहें तो ज़्यादा उपयुक्त होगा'' क्योकि मैने तो कभी सपने में भी नहीं चाहा था कि ऐसा हो पर उन्होने हमेशा ऐसी इच्छा रखी थी और ईश्वर ने उनकी चिर कालिक इच्छा पूरी भी कर डाली थी ।

और वैसे भी आचार्य वात्सायन के मापदणों पर यदि इन्हें तोला जाये तो यह कहीं से भी मेरे लिये उपयुक्त नहीं थे ।पर सवाल यह उठता है कि यदि वह मेरे लिये उपयुक्त नहीं थे तो मैनें उनसे प्रेम किया ही क्यों ?

 खैर जब यह प्रश्न ही किया जा रहा है तो मुझसे पूर्व राधा जी से किया जाये कि उन्होने श्री कृष्ण जेसे निष्ठुर से प्रेम क्यों किया ?

उर्मिला से किया जाये जो आधुनिका होने के बाद भी साकेत मे रहकर वियोग की वेदना में क्यो जलती रहीं ?

वैसे वह स्वम् भी मुझसे सैकड़ों बार यही सवाल पूछ चुके हैं ।खैर उनका पूछना तो  उनके अन्दर की हीन भावना का हिस्सा मात्र है ।पर आप को इसका जवाब ज़रूर दूंगी मैने भी यह गूढ़ रहस्य इन तीन वर्षो के सुदीर्घ अन्तराल मे जाना
है ।
उनके अंदर कुछ ऐसा है जिसने मुझे मेरे स्त्रीत्व से परिचित कराया और शायद यही वह बलवती इच्छा थी जिसके चलते मैनें समान वैचारिकता वाले सम्बन्ध को विस्तार देदिया था यूं कहें कि अपनी चाबियां उनको थमां दी थीं जिसके वह एक लम्बे समय से प्रतीक्षार्थी थे

उन्होने भी मुझे बहुत प्रेम किया पर तृष्णा थी कि बढ़ती जा रही थी ।फिर अगर मैनें स्थायित्व चाहा तो कौनसा पाप किया ?

 अब चाहे इसे प्रजातिगत दोष कहें या कुछ और पर मैं भी एक स्त्री की तरहां सोचने लगी थी ।यहां तक भी सब कुछ ठीक चला पर यहीं से आगे की यात्रा दुरूह होगयी थी।एक स्त्री से ही समर्पण की इच्छा क्यूं रखी जाती है पुरूष क्यों समिर्पत नही होते

``तुम बहुत प्रिय हो पर जीवन भर की जिम्मेदारी नहीं ले सकता'' ``तुम्हारे साथ समागम में भावनाओं के समंदर मे गोते लगा सकता हूं पर जीवन के ज्वार भाटे में साथ नहीं दे सकता''

``मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं। बस जब तुम्हें आवश्यकता हो उसके अतिरिक्त ।मैं दो दिन सब कुछ भूल कर तुम में खोजाना चाहता हूं और बाद मे तुम अपनी परेशानियों मे खोई रहो यह भी चाहता हूं ।``

आप उन्हें कम कहीं से मत आंकिये रीढ़ विहीन तो वह केवल मेरे लिये है अन्यथा चन्द्रमा की चौदह कलाओं में से शायद ही कोई कला ऐसी होगी जो उन्हें नही आती होगी ।

जब मेरे सवाल उनसे जवाब मांगते तो वह मुझे अपने और मेरे बौध्दिक स्तर का फर्क सम्झाते । एक शैतान की आंत से ज़्यादा लम्बी सुचि होती उनकी परेशानियों की जिसके आधार पर मुझसे रियायत चाही जाती ।बेचारगी लिया मासूम चहरा जिसे देख मेरे अंदर का सारा रोष पिघल जाता और मैं  शिकवे शिकायतें भूल एक ममतामयी माँ की तरहां सारी गल्तिया मांफ कर बँाहें फैला देती ।एसे ही न जाने कितने अचूक फार्मूले थे उनके पास ।मेरे सवालों का शिकंजा जब ज़्यादा कसने लगता तो वह अपना ब्रम्हास्त्र प्रयोग करते और सिर झुका सारी गल्तियां मान लेते और एक बार में ही मुझे चारों खाने चित कर देते ।मैं ठगी सी खडी रह जाती पूरे साहस से प्रण करती कि मैं फिर कभी सवाल पूछ कर इन्हें शर्मिन्दा नही  करूंगी ।और पहले से अधिक वेग से प्रेम करने को तैयार होजाती हमेशा स्वंम को विश्वास दिलाती कि एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा कि तुम्हारे समर्पण का प्रतिदान तुम्हें आवश्य मिलेगा उन्हें तुम्हारी सुध अवश्य आएगी पर ऐसा नहीं होता ।मेरी सहन शक्ति की सीमा भी निकट आती जारही थी अब तुम्हारे स्पर्श में वो ऊष्मा कम ही महसूस होती थी वैसे भी महिलाआें की कामेक्षा का सम्बंध उनकी भावनाओ से होता है ।और मेरी भावनाएं लगातार आहत होने से सुप्तावस्था की ओर अग्रसर हो रही थी मैं जोकि उनके बिना एक क्षण भी जीने के बारे मे सोच कर रो पढ़ती थी आज निस्पंदित होचुकी हूं ।मैं आज तुम्हें बता दूंगी की जिस शरण स्थली की तलाश मे मैं स्वम् शरण स्थली बन गयी थी वह मुझे मिल गयी है एक समय था जब तुम्हारे लिये कोई भी समझौता करने को तैयार थी आज स्वम् तुमको छोड़ रही हूं बिना उन आंसुओं का हिसाब मांगे जो मैनें तुम्हारे लिये बहाये ।

बिना उन दुआओं का हिसाब लिये जो मैनें तुम्हारे लिये रातौ को जाग कर ईश्वर से मांगीं।पर दुख तो केवल इस बात का रहेगा कि मैनें किसी ऐसे इंसान को टूटकर चाहा था जो इसके क़ाबिल नहीं था ।

मैं तुम्हारे चहरे पर ठुकराये जाने के दंश की वेदना देखना चाहती हूं ।

``फियर आफ रिजैक्शन'' यही कहते हैं ना

बहुत डर लगता है ना तुमको इस बात से ।यह वाक्य शूल बन कर जीवन भर चुभता रहेगा तुम्हारे हृदय मे कि जो तुम्हैं पूजता था तुम उसकी क़द्र नहीं कर सके और वह आज उसी तीव्रता से किसी और पुरूष को चाहेगा तब तुम रोओगे चिल्लओगे। पर वो नातो अपनी ज़ुबान से तुम्हारे  आंसू पौछने आएगा और न ही बांहें पसारे तुम्हारी राह देखेगा कि तुम कब  अपनी क्लान्त्ता मिटाने उनमें समा जाओ ।

यह सब सोच सोच कर मेरा सांस फूल रहा है जब तुमसे कहुंगी यह सब तो कितने ही हार के साऐ तुम्हारे दमकते चहरे को मलिन कर देगे ।

``जानू एक बात मै तुम्हें हकीकत बता दूं कि मुझे तुम्हारी बहुत ज़रूरत है''(हां हमेशा तुम्हें अपनी ज़रूरत ही दिखाई देती है )।

``मैं दो दिन तक सब कुछ भूल जाना चाहता हूं'' आते ही तुमने अपनी जरूरतों का पिटारा खोल दिया।

तुम्हारे चहरे की मासूमियत देख मेरा तो साहस ही छूटता जा रहा था ।तुम्हारी आंखों के लाल डोरे जिन्हे देख हमेशा मै पिघल जाती थी सो आज भी पिघल गयी और बस इतना ही कह पायी ``मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं''

और सब एक क्षण में भूल गयी। अरे यही तो वह उपक्रम है जिसे मैं पिछले तीन वर्षों से निरन्तर दुहरा रही हूं हर बार यह कसम खाती हूं कि इस बार सब छोड कर चली जाऊगी।मुक्त होजाऊगी इस अभिशाप से।

आप अश्चचिकार्त बिलकुल न हों मैनें तो शुरू में ही कह दिया था `` मैं अभिशप्त जो हूं ऐसा करने के लिये''

 

कायनात क़ाज़ी
जुलाई 1 , 2006

 

 

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