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मासूम
उसका चेहरा मेरे चेहरे पर चिपक गया है। उसकी मुस्कान मारक है। घातक है। जो कभी हतप्रभ छोड़ जाती है तो कभी इतना त्रस्त करती है कि मैं उसपर चीखता हूं , ''गेट आउट ........ '' इस पर भी वह बाहर नहीं निकलता, ''हमने क्या किया ?उसका मासूम चेहरा न कांपता है न डोलता है।बस, आंखों में देखता है और मुझे इरि‌टेट' करता है.

''तुमने कुछ नहीं किया ........बट आइ से ........ ग़ेट आउट........ ''

''तो क्यों निकालता टीचर ?''

''मैं पागल हूं ........?'' उसके सवालों से मेरा गुस्सा बढ़ता है।

''नईं सर ........लेकिन?'' वह अपनी निर्दोषिता पर सवाल करता है।सवाल मुझे अच्छे नहीं लगते।मुझे उसकी पैंट से बाहर निकली कमीज़ , किसी तरह गले में फंसी टाई और जूतों से बाहर लटकते मोटे-मोटे फीते देखकर कोफ्त होती है ........

''तो निकलो .......''. मैं उसे धकेलते हुए क्लॉस से बाहर कर देता हूं।मेरी क्लॉस में ही ऐसा होता हो ,ऐसा नहीं है।दिन के नौ पीरियड में से छह पीरियड तो वह कक्षा से बाहर कभी खड़ा तो कभी 'नील डाउन' आदेश का अपनी ही बेफिक्री में पालन करते हुए मिलता है।अकेला भी नहीं होता।उसी की तरह के लगभग दस लड़के क्लॉस में और हैं।हर दिन सोचता हूं कि कोई और रास्ता निकालूंगा मगर क्लॉस से बाहर निकालने के अलावा कोई और सूरत फिलहाल नज़र नहीं आती।और अपनी मुस्कान के साथ वह मुझपर सवार हो जाता है।यह मुस्कान सबके चेहरे पर नहीं मिलती।मगर यही मुस्कान मुझे त्रस्त करती है ........

   गर्मियों की छुट्टियों के बाद आज पूरे दो महीने और दो दिन बाद जब स्कूल खुला तो सबसे पहले वही मिला।मैं कार से निकल रहा था और वह वहीं स्कूल बस से उतरा।आंखें मिली।उसने मुस्कान फेंकी।मुझे कोफ्त-सी हुई और मैंने मन ही मन कहा कि पहले ही दिन , सबसे पहले तुम्हारी ही सूरत देखने को किस्मत में थी। सोचा , कि इतने के बाद वह मेन गेट की ओर बढ़ लेगा लेकिन उधर बढ़ने के बदले वह मेरी ओर बढा।हाथ मिलाया और पूछा , '' टीचर ........ 'हाउ इज योर सन ........ ?आई प्रेड फॉर हिज गुड हेल्थ ........ ''

''या ........  य़ा ........ही इज फाइन ........'' सकपका गया मैं।अवाक-सा हुआ औपचारिकता तक भूल गया और उससे यह भी नहीं पूछ सका कि इन छुट्टियों को उसने किस तरह गुज़ारा।सिर्फ़ उसके गालों को छुआ। कर्ज़ उतारने की यह कैसी कोशिश थी ।पिछले तीन महीने मैंने बहुत छटपटाते हुए बिताए हैं ........

जवान बेटा विज़िट पर आया।एयरपोर्ट पर उसे इमिग्रेशन से बाहर निकलते देखकर ही लगा कि कुछ गड़बड़ है।इतना खराब स्वास्थ्य।सिर्फ दस महीने ही तो वह हमसे दूर लखनऊ में रहा है। फिर  सोचा कि ऐसा तो नवजवान लड़कों के साथ होता ही है।मगर हालत खराब थी और , और खराब होती गई । हालत इतनी बिगड़ गई कि जो लड़का दवा की गोली और सूई के नाम से डरता था , उसने एक बजे रात को कहा, ''पापा ........मुझे हॉस्पिटल ले चलें ........'' उसके वाक्य ने मुझे हिला दिया

   कई टेस्ट हुए और पता चला कि उसे खतरनाक स्थिति तक पहुंची हुई जांडिस है।मेरा दिल कांपता रहा।पूरे बावन दिन वह बिस्तर पर रहा।इस दौरान सभी जानने-पहचानने वाले उसका हाल-चाल लेते रहे।देखने आते रहे।बेटे की देखभाल के लिए एक दिन मैं तो दो दिन पत्नी छुट्टी लेती रही।छुट्टी के बाद वापस आने पर और कोई पूछता न पूछता पर फलेबियन ज़रूर पूछता , ''टीचर , तुमारा बेटा कैसा है .......'' मैं बताता कि धीरे-धीरे उसकी हालत में सुधार हो रहा है।गर्मियों की सालाना छुट्टी हो गई। दो महीने की .......

    मैं कहीं नहीं जा सका।बेटे की देखभाल में ही मैं और पत्नी लगे रहे।स्वास्थ्य में उत्तरोत्तर सुधार तो हो रहा था मगर प्रगति की गति बहुत धीमी थी।मूली, सलाद, कच्चे नारियल का पानी ,मौसमी का रस, गन्ने का जूस, खीरा, तरबूज और अनार का रस।कमरा पूरा फलों की  मण्डी बना हुआ था।इसके अलावा पाकिस्तानी हक़ीम साहब की दवा भी पीनी होती जो सुबह तीन लीटर पानी में बनाई जाती।यह दवा मेरे शुभचिन्तक खुर्शीद भाई डेढ़ सौ किलोमीटर दूर से हक़ीम साहब से लाते थे।नॉन वेज खाने का शौकीन लड़का किसी तरह बमुश्किल क्वॉपरेट कर रहा था .......

    खैर, वक्त गुज़रा।स्वास्थ्य में सुधार होना शुरू हुआ और जो बीस-पचीस पाउण्ड वज़न कम हुआ था वह धीरे-धीरे बढ़ना शुरू हुआ।स्कूल खुलने को आ गया।उसका वीज़ा भी खत्म होने को आ रहा था।उसके वापस लखनऊ  जाने की तैयारियां शुरू हो गई थीं।तैयारियों में हिदायतें ही सबसे ज्य़ादा होतीं।ऐसे रहना।ये खाना।ये मत खाना।बाहर कहीं पानी मत पीना।फिलटर ले जा रहे हो तो सबसे पहले इसे लगवाना।ज़ाहिर है कि बेटा खीझता और बोलता, ''आया था कि जिंजर चिकेन ....... बटर चिकेन खाऊंगा .......बर्गर खाऊंगा .......पिज्जा खाऊंगा वेट बढ़ाऊंगा और ....... य़हां मै दाने-दाने को तरस गया। लखनऊ पहुंचते ही सब कुछ खाऊंगा .......'' मैं घबराता।फिर भी यक़ीन था कि वह जो कह रहा है, वैसा करेगा नहीं।और इसी बीच स्कूल खुलने की तारीख आ गई और पहले ही दिन सबसे पहले बेटे के स्वास्थ्य के बारे में पूछने और उसके लिए प्रार्थना करने वाला फ्लेबियऩ .......

उसने मुझे हतप्रभ तो किया ही है , साथ ही इस दशा में भी छोड़ा है कि मेरा चेहरा सपाट हो गया है।याद है कि .......                      

प्राय: मैं उसपर चीखता ही रहा हूं।क्योंकि इस तरह हतप्रभ छोड़ जाने के मौके तो उसने बहुत कम दिए हैं .......

   उसका चेहरा आंखों के आगे है।आंखों में बस गया है।वह मेरे दिल के किसी कोने में शायद पहले से ही घुसा हुआ है।घुसपैठिया।शायद उसने अतिक्रमण किया है।ठीक वैसे ही जैसे लोग ज़मीनों पर अनधिकृत कब्ज़ा कर लेते हैं।मगर किस बल से ? लड़ाई हमेशा शस्त्र-बल से ही तो नहीं जीती जाती।क्या यह पुत्रात्‌ शिष्यात्‌ पराजयम्‌ की भावना है या मेरा व्यक्तिगत स्वार्थ ? उसने मुझे इस हाल में भी नहीं छोड़ा कि मैं किसी को बताऊं  कि देखो यार, यह बारह-तेरह साल का लड़का ....... फ़्लेबियन .......इसने मुझे झकझोर कर रख दिया है ....... फ़्लेबियन से मेरी पहली मुलाकात लगभग दो साल पहले हुई थी।पहली मुलाकात .......

सेक्शन एफ।कक्षा सात।तीस लड़के।सभी नए।सेण्ट जोसेफ स्कूल से आए।टाइम टेबल के हिसाब से मेरे हिस्से आया सेक्शन एफ।पहला दिन।मैं क्लॉस में घुसा।सभी लड़के खड़े हुए और एक स्वर में बोले, ''नमस्ते शिक्षिकाजी .......'' आदत हो गई है। द्वारा महिलाओं  पढ़ाए हुए बच्चे यही बोलते हैं।सुधारने के मेरे प्रयास असफल होते रहे हैं।मैं भी तंग आ गया हूं।अब उन्हें सुधारने की कोशिश भी नहीं करता। परिचय के दौर को ख़त्म करते हुए मैंने कहा, ''कल से पढ़ाई शुरू .......।'' तभी अगली पंक्ति में बैठा हुआ एक लड़का मेरी टेबल के सामने आ खड़ा हुआ, ''टीचर .......''
''यस?''
''
तुम ....... सबसे अच्चा है .......'' दूसरा कोई लड़का उसे डांट रहा है, ''तुम नईं ....... आप .......''
''
हां टीचर .......आप सबसे अच्चा है.......''
''
किसने कहा ?''
''
पूरा अबूधाबी मालुम ( मालूम ) .......'' टीचर को खुश करने की यह तरकीब हर बच्चा जानता है।
''
तो ?''
''
आज तो पी टी दो ना ....... फ्रर्स्ट डे .......''
''
क्यों .......? आज तुम्हारे बाप का बर्थ-डे है ?'' मैंने खीझते हुए भी मजाक किया।
''
टीचर, तुमको कैसे मालुम .......हां , आज मेरे डैड का बर्थ -डे है .......अब तो पी टी देगा न ?''सप्ताह में एक पीरियड ही पी टी का टाइम टेबल में है ।बच्चे कब और कहां खेलें? आकाशचुम्बी इमारतें और उनके आस-पास खेलने की कोई जगह नहीं , और भारतीय शिक्षा-प्रणाली में पाठ्यक्रम को पूरा कराने का ही समय नहीं तो खेलने की बात कौन करे।
''
पहले अपनी शर्ट और टाई ठीक करो .......''
''
हां टीचर .......'' उसने जल्दी-ज़ल्दी शर्ट ठीक करते हुए पूछा, ''अब देगा पी टी ?''
''
हां देगा .......ज़ाओ प्रिंसिपल से पूछकर आओ .......''                            ''क्यों टीचर.......?''  
''
हम तुमको पीटी देगा तो वो मुझे स्कूल गेट के बाहर करते हुए हमेशा के लिए पी  टी  देगा .......चलो बैठो अपनी सीट पर.......क़्या नाम है तुम्हारा?''
''
फ्लेबियन .......''अपनी निराशा में वह सीट पर जा बैठा लेकिन जो कुछ मेरे पास छोड़ गया वह एक चेहरा था जिसपर एक मुस्कान थी।पहला दिन।नए बच्चे।मैंने कोई कठोरता नहीं बरती। यह ज़रूर समझा दिया कि डिसिप्लिन बहुत ज़रूरी है  लेकिन समझाने से क्या होता है।वे अनसुना करके क्लॉस में एक सिरे से दूसरे सिरे तक टहलने लगे।एक को पकड़कर बैठाता तो दूसरा चल पड़ता।दूसरे को जबतक सीट दिखाता तब तक कई एक नींद में चलने लगते।बेमकसद। उन्हें बाहर निकालना ही क्लॉस को कुछ पढ़ा पाने का रास्ता बचता था।मगर यह कोई हल तो था नहीं।मैं मन को मनाता कि बच्चे हैं।थोड़ी शरारतें तो करेंगे ही। उन्हें खुश करने के लिए कभी-कभी पी टी भी देता मगर मामला वही, ढाक के तीन पात।कभी-कभी इतना गुस्सा आता कि मैं चीख लेने के बाद एकदम चुप हो जाता। ऐसे  ही एक दिन जब मैं डांट-बोलकर चुप बैठ गया तो फ्लेबियन मेरी टेबल के सामने , ''तुमको इतना गुस्सा क्यों आता? हाई ब्लडप्रेशर तो नईं?च्च् उसके चेहरे पर वही मुस्कान मगर उस मुस्कान में एक चिन्ताजनक सवाल ......
''
पता नहीं ....''
''
आज चेक कराओ ...इतना गुस्सा ठीक नईं ...मर जाएंगा ...मेरे डैड को गुस्सा आता ...हाई बी. पी.है समजा ..'' वह फिर अपनी सीट तक गया मगर बैठा नहीं। आदत के मुताबिक टहलने लगा।
''
फ्लेबियन ..... बैठो .''

''हां टीचर ...'' उसने कहा तो ज़रूर मगर टहलता रहा।मेरा ध्यान उसके पूछे सवाल पर आ गया था.

उस दिन स्कूल से छुट्टी के बाद मैंने अपने डॉक्टर से ब्लडप्रेशर चेक कराया और उसी शाम से एक टैबलेट टेनॉरमिन शुरू हो गई।बी.पी. हाई था ...अगले दिन फ्लेबियन फिर मेरे सामने, ''चेक कराया ?''
''
हां...''
''
हाई था न ?''
''
हां...''
''
दवा लिया ?''
'
''हां...''
''
दवा बन्द नईं करने का..क़बी नईं..समजा?''
''
हां...थैंक्स...''वह चला गया।अपनी वही मुस्कान छोड़कर।मगर उसकी इस मुस्कान में एक सन्तोष था। जैसे उसने अपना कोई कर्त्तव्य पूरा किया हो।आचरण उसका बिल्कुल नहीं बदला।दिन गुज़रते रहे।स्कूल अपना कैलेण्डर पूरा करता रहा।इम्तहान आ गए।फ्लेबियन एक दिन फिर पूरी क्लॉस के  सामने, ''टीचर, इस क्लॉस में तुम सबको फेल करेगा...?''
''
तुम क्या सोचते हो ..?''
''
फेल करेगा....''
''
ठीक सोचते हो .. पूरा क्लॉस ही फेल होने के लायक है ...''
''
लेकिन पूरा अबूधाबी मालुम ...तुम किसी को फेल नईं करता ....''             
वह मेरी टेबल से हट गया और क्लॉस में अपनी आदत के मुताबिक टहलने लगा।उसे बैठा पाना बहुत कठिन था
...

दिनों को गुज़रना होता है।वार्षिक परीक्षाएं हो गईं।फ्लेबियन पास होकर  आठवीं में आ गया।इस कक्षा में भी उसका सेक्शन मुझे ही मिलना था।मिला ...

एक दिन इण्टरवल में स्टैडियम की सीढ़ियों पर अकेले बैठा बच्चों को खेलते देख रहा था।उंगलियों में सिगरेट थी।मैंने देखा कि फ्लेबियन अपनी ही चाल से चलता हुआ आ रहा है , ''टीचर , तुम बिमार है ....?''   
''
हां, गला खराब है....''
''
सिगरेट फेंको ना ... क्या करता तुम ...तुम समझता क्यों नईं ...सिगरेट से मरेंगा .. दवा लिया?''
''हां...''

''सिगरेट नईं फेकेंगा तो मरेगा तुम.. क़ैसा टीचर है ..सिगरेट पीता है ...'' अस्फुट शब्दों में अंट-शंट बोलते हुए वह कैंटीन की ओर बढ़ गया।मैं सोचने लगा कि यह लड़का किस जन्म की दुश्मनी निकाल रहा है।क्यों इतना करीब आ रहा है। पिछले दो दिनों से गला खराब होने के कारण मैं क्लॉस में कम बोल रहा था।सभी कक्षाओं में बच्चों ने यह बात नोट की होगी लेकिन पास तक आकर पूछने और सलाह देने की हिम्मत कहूं ,या अपनाइयत , फ्लेबियन ने ही दिखाई।उसका चेहरा फिर चिपक गया और अपनी मुस्कान के साथ स्थिर हो गया।मगर इस मुस्कान में चिन्ता थी।अपने अध्यापक के स्वास्थ्य की चिन्ता।इस लड़के को न जाने कितनी बार तमाचे लगा चुका हूं ।न जाने कितनी बार क्लॉस से बाहर निकाला है।न जाने कितनी बार हेड-मॉस्टर से इसकी शिकायत की है।गुस्से में न जाने क्या-क्या इसके मां-बाप से कहा है।मुझे याद नहीं।लेकिन क्या इसे भी कुछ भी याद नहीं? अगर ऐसा है तो अध्यापक और छात्र का इससे बेहतर कोई रिश्ता नहीं हो सकता......

आज दो महीने बाद वह मेरे बेटे के स्वास्थ्य की प्रार्थना के साथ दिखा। उसका मासूम चेहरा खुदा के चेहरे से भी आगे खड़ा है ....उसकी प्रार्थना की ताकत सबसे बड़ी है ...जिसने मुझे और मेरे बेटे को ज़िन्दा रखा है ''...आई सेल्यूट यू फ्लेबियन...''

कृष्ण बिहारी
जनवरी 11, 2007

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