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भाग-२
तत्त्वमसि

जंगल
वह उतना ही फ्रेम में जड़ा हुआ है, जितना हो सकता है। जो नहीं हो सकता, बाहर खड़ा है।
हम दोनों एक ही ताल के सहयात्री हैं- नैनीताल के...। इस पार से उस पार तक फैला हुआ ताल...। उसके एक किनारे छोटा-सा बसा हुआ हर... दूसरी तरफ ऊंचे-ऊंचे पहाड़...। एक तरफ आप किसी को भी बड़े मजे से ढ़ूंढ़ सकते हैं... वहां सब कुछ है, जिसे सूंघते-सूंघते लोग वहां तक आ जाते हैं। क्या बीन-बटोर लेते हैं अपनी थूथनी से वे इस हर की दलदल से... और कितना मुक्त अनुभव करते हैं वे उस दलदल में फंसकर भी ? क्या दैनिक जीवन का बदलना सचमुच इतना आह्ादकारी है कि उस बदलाव के लिए हम किसी भी दलदल में कूदने को तैयार रहते हैं ?
दूसरी तरफ ऊंची-ऊंची पहांड़ियां- उन पर गर्व से सिर उठाए मजबूती से टिके वृक्ष। ाम होते ही एक अंधेरा उस पार से उस पार तक फैल जाता है। जिसे गुमना है, बड़े मजे से गुम सकता है। पर इसे भी छोड़ा कहां लोगों ने, ऊबड़-खाबड़ रस्तों पर भी रास्ते बना लिए। उन तक पहुंचने के लिए या उनसे दूर जाने के लिए- पता नहीं।
किसी में बिना गुमे उसे किस तरह पाया जा सकता है, बकौल उसके, वह आज तक नहीं जान पाया। वह हर बरस आता है यहां अपनी पेंटिंग्स के लिए दृश्यों की तलाश में .......।
वह उस तरफ नहीं जाता- जब तक कि उसकी दैनिक जरुरतें उसे ठेल-ठाल कर वहां नहीं ले जातीं। वहां जहां रंग है, रोशनी है, चमक है, नशा है, भूलने का सुख है। सोचो तो अपना होना कितना कष्टदायक लगता है, कि जब तक उसका विसर्जन ही न हो जाए, चाहे क्षणिक सही, हम मारे-मारे फिरते हैं। वह मानता है कि संसार की सारी कलाओं की उत्पत्ति मनु य की इसी छटपटाहट की देन है। वह भटकता रहता है-ब्दों, प्रतीकों, बिंबों की तलाश में, रंगों, बादलों, तारों-आसमानों की तलाश में........। सिर्फ उतनी ही काफी नहीं होता आदमी के लिए जो जिलाए रखता है। कुछ और भी चाहिए होता है आदमी को, जो उसे दिन-रात दौड़ाता रहे...। जितना ज्यादा वह उस अमूर्त-सी चीज, विचार या खूबसूरती के पीछे दौड़ेगा, वह उसे पाने के बाद उतनी ही बड़ा सुख देगी।
मैंने उसे पहली बार वहीं देखा था- रंगों के दरिया में डूबते-उतराते।
'' हॅलो......। '' मैंने उसे पीछे से आवाज दी। वह चौंककर पलटा, मुझे देखकर मुस्कुराया-
'' हाय.......। ''
मैंने उसकी आंखें देखीं- एक ही रंग था वहां- नीला.......। इधर-से-उधर तक फैला हुआ...... आसमान की तरह...। वे आंखें एक बार फड़फड़ाई और मुस्कुरा दीं-
'' कैसे आना हुआ ? ''
'' इस हर में या आपके पास ? ''
'' हर में तो आप वैसे ही आई होंगीं, जैसे दूसरे सैनानी आते हैं- मन बहलाने। मेरे पास...। ''
'' वैसे मैं आपकी जानकारी के लिए बता दूं, इसहर में मैं वैसे नहीं आई हूं, जैसे दूसरे सेनानी आते हैं। रहा सवाल आपका- मैं पिछले कुछ दिनों से आपको देख रही हूं- आप कितनी लगन से अपनी पेंटिंग बनाने में जुटे हुए हैं। दरअसल मैं यहां आपके लिए रुकी हुई हूं ........ ''
'' थैंक्स। क्या मैं सह सोंचने की हिम्मत कर सकता हूं कि आप यह आप सब मेरा दिल रखने के लिए नहीं कर रही हैं ? ''
'' ऑफकोर्स, कर सकते हैं। ''
और हम दोनों हंस पड़ते हैं।
'' मेरा नाम सिद्धार्थ है, आपका...। '' उसने हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा।
'' मानसी...। '' मैंने हाथ मिलाया।
एकदम लड़कियों के-से हाथ थे उनके। गोरे-गुदगुदे, भरे-भरे से...। मैंने वह छुअन अपने अंदर महसूस की।
'' बैठिए। '' उसने बड़े से पत्थर की ओर इशारा किया।
'' आपको डिस्टर्ब होगा। '' मैं झिझकी।
'' नहीं, आप जैसे लोग कभी-कभी आते हैं इस प्लेनेट पर। और जब आते हैं, एकदम छा जाते हैं। जैसे इस वक्त आप...। ''
'' तो...। '' मैंने अनसमझी निगाह से उसे देखा।
'' तो क्या ? '' उसने मुझे ध्यान से देखा, फिर धीरे से कहा-
'' कुछ सच हमसे बहुत बड़े होते हैं। उन्हें समय से पूर्व जानना अनावश्यक है। ''
मैं मुस्कुरा दी। कितनी खूबसूरत बात कही थी उसने। मैं उस पत्थर पर बैठ गई। वह फिर अपनी पेंटिंग बनाने में जुट गया। मैं उसे देखती रही...
'' आप पहली बार आई हैं यहां ? ''
'' हां...। पर आपको कैसे मालूम ? ''
'' आपकी आंखों में उत्सुकता है जैसे छोटे बच्चे की आंखों में होती है। आप इस हर को उलट-पलटकर देख लेना चाहती हैं। वैसे मैं आपको बता दूं, हर भी इनसानों की तरह होते हैं। एकदम से उसे आप नहीं जान सकते। वक्त लगता है। और कभी-कभी तो बिलकुल नहीं जान पाते। ''
'' दरअसल मैं इस हर को नहीं, अपने आपको जानने आई हूं। ''
'' एक ही बात है। हम खुद को जानने के लिए दूसरे के पास जाते हैं। बिना कहीं और गए हम कुछ नहीं जान सकते। ''
मैं चौंक गई।
वह अपनी पेंटिंग में रास्ते बना रहा है।
'' यह रास्ता किधर जाता है ? ''
'' कोई भी रास्ता वहां नहीं जाता, जहां हम पहुंचना चाहते हैं। हम सिर्फ ढ़ूंढ़ते हैं। ''
मैंने पहली बार उसे ध्यान से देखा... गेहुंआ रंग, लंबा कद, लंबा-सा चेहरा, माथे पर उड़ रहे बाल, नीली आंखें, इकहरा जिस्म...। उसके होठों पर हल्की-सी फड़कन थी, आंखें मुझ पर टिकी हुईं...।
वह ब्र्श रखकर मेरे पास आ गया। मैं अपनी उदासी छिपाए बगैर उसकी आंखों में देखने लगी...
'' एक बात कहूं ? ''
'' कहिए। ''
'' ये जो ऊंचे-ऊंचे पहाड़ देख रही हैं न आप, ये जितने ऊंचें और अविजित दिखाई देते हैं, उतने हैं नहीं। इन पर कोई भी चढ़ सकता है। इन्हें कोई भी तोड़ सकता है। थोड़ी मेहनत करो तो इन्हें खोदा जा सकता है। इनकी सारी हकीकतें जानी जा सकती हैं। ''
'' तो ? '' मैंने एक बार पहाड़ों की ओर देखा फिर उसकी ओर- ।
'' आप ऐसी मत बनिए। ''
वह उठकर अपनी पेंटिंग के पास चला गया। मैं स्तब्ध बैठी रही। वह जानता है, अब मैं सीधे उसके तरफ नहीं देख पाऊंगी। वह भी कोशिश नहीं करता।
मैं उठती हूं और वापस लौट पड़ती हूं। हर इनसान एक चलता हुआ अजायबघर है। टूटे हुए पंख, अधबने इतिहास, सपनों के चमगादड़ जो इस दीवार से उस दीवार तक टकराते हुए चीखते हैं-
ढ़हते खंडहर- जहां इक्का-दुक्का यात्री भटकता हुआ पहुंचता भी है तो घबराकर वापस हो लेता है। काली चांदी के सिक्के... अधबनी मूर्तियां, पाप और पुण्य की टूटी हुई आकृतियां... पता नहीं क्या-क्या ?





आज रोमी से ' प्रॉमिस' किया है, हम बहुत दूर घूमने जाएंगे और बहुत देर से लौटेंगे। पर बारिश हो गई हैं। तेज हवा में उड़ती पानी की महीन बूंदें.........। हम दोनों अपने हटेल की बालकनी में आकर खड़े हो जाते हैं- पानी सिर्फ पानी और एक मिनट में पूरे भीग जाते हैं। जी चाहता है, इसी बारिश में दौड़ती हुई बादलों में खो जाऊं- बादलों के सिवा कभी कुछ दिखा है मुझे? जब देखा-उन्हीं को देखा.......।
''मम, आज कहीं नहीं जा पाएंगे?'' भीगा हुआ रोमी मुझसे पूछ रहा है।
''चलें, बारिश में? '' मैं हंसकर पूछती हूँ
''आप कहेंगी, मुझे सर्दी लग जाएगी।''
''वह तो लगेगी ही, अगर तुम इसी तरह खड़े रहे। चलो अंदर चलते हैं। दोपहर के बाद देखेंगे।''
मैं उसे अंदर ले आती ूँ हम दोनों 'चेंज' कर लेते हैं। मैं उसे अपने पास बिठा लेती ूँ
''मॅाम, हम यहां कितने दिन रहेंगे?''
''जब तक तु चाहो।''
मैंने उसे अपनी गोद में बिठा लिया है।
''मुझे यहां  रहना अच्छा अगेगा। मुझे यह जगह बहुत अच्छी लगती है।''
''पूरी छुटिटयां यहीं रह जाएं।''
मैं उसकी बड़ी-बड़ी आंखें चूम लेती ूँ  इसके पास बहुत कुछ है- पर इसकी आंखें! मैं मुग्धभाव से उसे निहारती ूँ
''नहीं, फिर मुझे पापा की याद आएगी।
उसकी आंखों में अपने पापा के लिए प्यार है।
''उन्हें भी यहीं बुला लेते हैं। वैसे भी वो आएंगे।''
मैं उसके बालों से खेलती रहती ूँ
''मॅाम, पापा को फोन करें?'' वह कहता है।
''हां जरूर , मैं बोलती ूँ रिसेप्शन पर............।''
मैं 'रिसेप्शन ' पर दिल्ली फोन मिलाने की कहती हॅू। वह कहता है, बारिश्। की वजह से लाइन खराब है, ायद ही मिले।
दोपहर तक बारिश हल्की हो जाती है। मुझे बारिश में घूमना अच्छा लगता है, पर रोमी की वजह से नहीं जा पाती। कल भी यह थका हुआ सो रहा था और मैं घूमने चली गई थी और उस पेंटर से मुलाकात हो गई थी। क्या करता होगा वह पेंटिंग के अलावा? कितनी बारीकी से उसने मेरी उदासी पकड़ ली थी? क्या कहा था उसने--''ये ऊंचे-ऊंचे पहाड़ जितने ऊंचे और अविजित दिखाई देते हैं, उतने हैं नहीं। थोड़ी मेहनत करो तो इन्हें खोदा जा सकता है। इनकी सारी हकीकतें 'जानी' जा सकती है।' सोचकर मैं मुस्करा दी।
अविजित क्या है यहां, कुछ नहीं। अगर कुछ हो तो-- तो ? ायद चैलेंज हो जाए उसे जानना। हमें हमेशा वहीं चीजें आकर्षि  करती हैं, जो अजनबी होती हैं। जो दूर होती हैं हमसे। तमाम पूर्वग्रहों के बाद भी हम जोखिम से गुजरना पसंद करते हैं।
---- ०० ----
हम ाम को झील की तरफ आते हैं। ठंड बढ़ गई है। चारों ओर कोहरे का खेल है। कभी-कभी लगता है बादल झुक आए हैं हमारे कंधों पर। मैं बादलों के पार देखना चाहती  कुछ नहीं दिखता सिवाए धुंध के.........
हमारी छोटी-सी नाव दूर तक फेली झील पर तैर रही है। रोमी खोया-खोया सा इधर-उधर देख रहा है। पता नहीं क्या ढूंढ रहा है यह? मैं इसके अंदर नहीं उतरना चाहती।
कोहरा उतरता है। उसने हमारी नाव को ढंक लिया है। दूसरी नावें हमें नहीं दिखतीं। रोमी एक गहरी उत्सुकता से झील में तैर रही बत्तखों को पापकार्न खिलाता है। उसकी आंखों में हल्की-सी खुशी उतर आई है। मैं उस खुशी को पकड़कर दूर तक घिसटती जाती ूं
कोहरा छंटता है तो अपनी नाव की बगल में एक बड़ी-सी नाव गुजरती देखती ूं पूरी नाव में सिर्फ लड़कियां हैं... रंग-बिरंगे कपड़े हने हुए- रंग- बिरंगे स्कार्फ, रिबने और पुलोवर, रंग-बिरंगी हंसी, रंग-बिरंगी उत्सुकता- उनकी देह से जैसे फुलझड़ियां फूट रही हैं। वे हंस रही हैं जोर-जोर से किसी बात पर.........। वे अपने हाथों से पानी उछाल रही हैं। रोमी उन्हें देखकर मुस्कराता है तो वे रोमी पर पानी उछाल देती हैं। मुझे अपना बचपन याद आता है...सीमा,शालू, बीना, ोभा, भारती.....कहां होंगी वे सब? कैसा होगा उनका जीवन?
मुझे कई बरस पहले की अपनी लिखी कहानी की कुछ पंक्तियां याद आत हैं--
''खूबसूरत लड़कियां जब सड़कों पर चलती है, सपने बांटती हैं। लोगों, उन्हें रोको मत, मना मत करो। उनके बगैर जीवन खाली ढोलक है, जिसे तुम कैसे भी बजाओ-- उसमें से सिर्फ ोर मचाती आवाजों के सिवा कुछ नहीं निकलेगा। संगीत तो जीवन में लड़कियां पैदा करती हैं, जब वे हवा के साथ छम-छम करती चलती है। जब वे फूलों की तरह सिर हिला-हिलाकर बातें करती हैं और जब वे झरने की तरह टूटकर तुम पर गिरती हैं। और तुम जो सदियों से रूके हुए हो एक ही जगह पर, अचानक उनके साथ बह निकलते हो। वे नदी की तरह गाती हुई तुम्हें अपने साथ बहा ले जाती हैं। वे ऐसा परिंदा हैं जो तिनके की तरह तुम्हें अपनी चोंच में दबाकर आसमानों की सैर करा देती हैं। तुम इनकी धरती से बीज बनकर फूटते हो और फसलों की तरह चारों कोनों में लहलहाते हो। यह मोर की तरह नृत्य करती हुई धरती के गीत गाती हैं। इनके पंखों में तुम बदलते हुए आसमानों के रंग देख सकते हो। इनकी प्रार्थना से भोर होती है और इनके अवसाद से रात बर्फ की तरह तुम पर गिरती है। जिसके नीचे तुम दफन होने लगते हो। जब यह खुशबू की तरह फेलती हुई तुम्हारे चारों ओर लिपट जाती हैं, तुम्हें इनके सिवा कुछ भी दिखाई नही देता।''
मैं सोचती रह जाती ूं, नाव हमसे दूर चली जाती है।
यहांाम बहुत जल्दी हो जाती है, ाम से पहले। मैं रोमी का हाथ पकड़ उसे नीचे उतारती ूं
हम दोनों सीढ़ियों की तरफ बढ़ जाते हैं कि मेरी नजर उस पर पड़ती है। वह सीढ़ियों के ऊपर खड़ा है--शाम की रोशनी में चमकता हुआ, किसी से बातें कर रहा है। उस दिन की मुख मुद्रा से बिल्कुल अलग, जीन्स और सफेद र्ट में-- नीले रंग का पुलोवर उसके गले में बंधा पीठ पर झूल रहा है। बार-बार उसकी निगाहें इधर-उधर भटकतीं, हलरों से टकरातीं ओर अपने में लौट आतीं--खाली हाथ। दूर से आती हुई नावों को वह अपने समीप आने तक देखता था। भीड़ से घिरा वह बेपरवाह-सा चेहरा...।
मैंने अपने आपको उसकी तरफ बढ़ जाने दिया। मेरे अपने समीप पहुंचने से पहले ही उसने मुझे देख लिया और एक खुशी उसकी आंखों में लहरा गई--
''हॅलो।'' वह बच्चों की तरह किलककर बोला।
मैंने मुस्कराकर सिर हिलाया।
''मैं नहीं कहता था, दुनिया बहुत छोटी है और हम फिर मिलेंगे....।''
''कब कहा था?'' मैंने हैरत से पूछा।
''नहीं कहा था? अच्छा अब कहता ूं''
वह रोमी की ओर झुका-
''हॅलो, लिटिल मास्टर, हाउ आर यू?''
''फाइन अंकल, थैंक्स.....।'' उसने हाथ मिलाया।
''माय सन रोमी।'' मैंने परिचय दिया। उसने बड़ी गर्मजोशी से उसे बांहों में भर लिया-
''हाउ स्वीट, मैं मान ही नहीं सकता, आपका बेटा है। इतना सुंदर.....इतना प्यारा........''
मैं हंस दी। रोमी भी। उसने अपने साथ खडे सज्जन को विदा किया और हमारे साथ चलने लगा।
''आप कहां से आ रही हैं?'' वह रोमी का हाथ पकड़कर चल रहा है।
''दिल्ली से, ओर आप?''
''इलाहाबाद।'' कहकर वह चुप हो गया।
जब उसने कुछ और नहीं पूछा, तो मैंने उसकी तरफ देखा--
''और कुछ नहीं पूछना?''
''नही, क्यों?'' वह चौंका।
''नहीं, मैं सोच रही थी, शि टाचार खत्म हो तो एक कप कॉफी पी ली जाए......।''
मैंने सामने क केफेटेरिया की तरफ इशारा किया।
''आपसे क्या शिष्टाचार........?'' वह धीरे से हंसा।
कॉफी के दौरान उसने बताया कि वह इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में फिलॅासफी पढ़ता है।
''सच ?'' मेरी आवाज आश्चर्यमिश्रित खुशी से कांप गई।
उसने न समझने वाले भाव से मुझे देखा।
''दरअसल मैं सायकालॉजी पढ़ती हूं और मुझे फिलॉसफी में भी गहरी दिलचस्पी है। बल्कि इस संबंध में मुझे कई ांकाएं हैं। अच्छा है, इस बार छुटि्टयां अच्छी बीतेंगी।'' मैं मुझकुराई।
''ओह...नो...।'' उसके स्वर में आतंक है-
''अगर आप सायकालॉजी पढ़ती हैं तो मुझे आपसे सावधान रहना पड़ेगा...।''
''मुझे आपसे और ज्यादा...।''
''ज्यादा क्यूं ?''
''क्योंकि सार्त्र फ्रायड से ज्यादा खतरनाक है।'' और हम हंस पड़ते हैं।
''आप कब तक हैं यहां ?''
'' कह नहीं सकती। यह विक्रम पर निर्भर करता है कि वे कब आएंगे। फिर हम एक साथ लौटेंगे। तब तक रोमी और मैं यहीं हैं, और आप...।''
''पता नहीं कितने दिन मुझे यहां होना है ?''
उसने अनिश्चित मुद्रा में हाथ हिलाया-
' फिलॉसफर ' मैंने कॉफी सिप करते हुए मन-ही-मन यह ब्द दोहराया-
'' आपकी पत्नी नहीं आईं ? '' मैंने पूछा।
रात बहुत हो गई है। मैं अपने अंदर अकेली खड़ी हूं। चुप, एक खास ऊंचाई पर...। विक्रम से फोन पर बात नहीं हो सकी। लाइन खराब चल रही है। वे फिक्र कर रहे होंगे। मैंने कहा भी, पूना हम सब साथ चलते हैं- वहीं से चलेंगे नैनीताल। रोमी की जिद थी कि इस बार नैनीताल ही जाएगा और कहीं नहीं। और विक्रम को हमारा इधर-उधर धक्के खाना पसंद नहीं, सो उसने हमें पहले भेज दिया।
''मैंने पूरा प्रबंध करवा दिया है। तुम लोग वहां ' एन्जॉय ' करो। मैं जल्दी आऊंगा। '' उसने कहा था।
फिर मेरा ध्यान भटककर सिद्धार्थ की ओर चला गया। कुछ घंटों का उसका साथ, उसकी एक अपनी खुशबू थी। उसकी बातें कभी मुझे गर्म लू के थपेड़ों-सीं लगती और मैं भाग-भागकर जगहें बदलती। कभी ठंडी हवा के झोंकें...। वह हमें बहला रहा था, जैसे हवा पेड़ों को...।
मैं अपने अंदर के जंगल में भटकती हूं। कितने पेड़ काट डाले मैंने- कितने पौधे नष्ट कर डाले। कितनी सूखी पत्तियों को बटोरकर उसमें आग लगाई और सबकुछ फूंक डाला। इधर-से-उधर उड़ती हुई विचारों की वह पत्तियां, जो कभी-कभी हवा के साथ मिलकर इतना ोर मचातीं कि फिर दूर-दूर तक कुछ सुनाई नहीं देता। वे पत्तियां ढ़ंक लेती हैं मन की धरती और मैं उन्हें उठाते-उठाते हांफने लगती। उनसे छुटकारा पाने का एक ही तरीका है- उन्हें जला दो। हांलांकि यह उनका अंत नहीं है क्योंकि पतझड़ का अंत नहीं है।
एक रहस्यमय अंधेरे से भरा हुआ वह जंगल, आधी रात के बाद अंदर छिपे हुए जंगली जानवर बाहर आ जाते हैं और एक-दूसरे को नोंचने-काटने लगते हैं, कई गज धरती उनके खून और अधखाये मांस के टुकड़ों से लाल हो जाती है। जब देह सो रही होती है तब मन ही जंगल का सबसे खूंखार पशु होता है।
सायकालॉजी पढ़ने का यही नुकसान है। मैं करवट बदल लेती हूं। हम हमेशा उसी तरह सोंचने के आदी होने लगते हैं।
इस वक्त, आधी रात के वक्त मेरा मन हुआ, किसी वेग से गिरते झरने के समीप खड़े होकर उसका स्वर सुनूं। प्रार्थना के उन स्वरों की तरह जो हमारे अंदर से बहकर बाहर अनंत में विलीन होती है। मेरे पास एक लंबा घना फैला हुआ सन्नाटा है, जिसमें कभी-कभी किसी चिड़िया के पंख फड़फड़ाने का स्वर भी अनायास आश्चर्य में डाल देता है।
-------००-------

अलस्सुबह फोन की घंटी बजती है।
''हॅलो...।'' मैं फोन उठाती हूं।
''विक्रम बोल रहा हूं।''
हां तुम, तुम्हीं हो, बस तुम्हीं... तुम्हीं हो सकते हो, तुम्हारे सिवा और कौन ? अंदर फैला हुआ सन्नाटा लरजा और ढ़ेर-सी चिड़ियां ोर मचाने लगीं। मेरी सांस गले में अटकने लगती है-
'' कैसी हो डियर...। ''
कैसी हो सकती हूं तुम्हारे बगैर... जैसे बगैर धूप वाला दिन- धूमिल-मटमैला दिन... जैसे बिन बारिश वाले बादल- एकदम खाली और रंगहीन। जैसे सूनी सपाट सड़क-इधर-से-उधर फैली हुई- तन्हा... खामोश। कैसे हुआ जाएगा मुझसे कभी, तुम्हारे बगैर कुछ भी...।
वह बोल रहा है। जैसे काली रात के बाद सुब

 

जया जादवानी
दिसम्बर
13, 2006

अंक -  1 / 3 / 4 / 5 / 6 / 7/ 8

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