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भाग-7
तत्त्वमसि
नदी

मैं चांद को देखे जा रही हूं.......टक लगाकर। वह आहिस्ता-आहिस्ता बादलों के बीच से चलता हुआ, कभी मेरे समीप आता लगता है- कभी छिप -सा जाता है पलभर को.......। मैं आंखें नहीं हटाती वहां से........मैं उसे देखती जा रही हूं........मेरी देह में एक अजीब -सी सिहरन है। मैं उसे देखते हुए सबकुछ भूल जाना चाहती हूं......हां, मैं अपने आपको भूल जाना चाहती हूं.........। मेरी आंखों में आंसू भरने लगे हैं- मैं उसे देखना बंद नहीं करती-कोई चीज मेरे अंदर उठना चाहती है- कोई चीज मेरी शिराओं को चीरकर बाहर आना चाहती है। मैं बहुत देर उसे रोक नहीं सकती। मुझसे कुछ भी सहा नहीं जा रहा.......क्या है मेरे अंदर? इतनी बेहिस व्याकुलता.......ऐसी छटपटाहट.....। मेरी दे हके अंदर घूम रहा है कुछ........मैं उससे एकाकार होना चाहती हूं.........। आंसू मेरे गालों तक बह आए हैं.......। मेरे होंठ सख्ती से भिंचे हैं। मैं सबकुछ भूलती जा रही हूं। कौन हूं मैं? क्यूं खड़ी हूं यहां? क्यूं रूकी हूं यहां? मेरे मस्तिष्क में सन्नाटा है........। दूर-दूर तक फैला असीम सन्नाटा......कोई चेहरा नहीं है वहां, कोई शब्द नहीं, फिर भी कुछ ऐसा है जरूर, जो मुझे मेरी याद दिलाए जा रहा है। मैं अभी खुद को भूली नहीं पूरी तरह- मैं खुद को पूरी तरह भूल जाना चाहती हूं।

      एक दृढ़ निश्चय के साथ मेरे होंठ और सख्ती से भिंचे.........। मैंने एक गहरी सांस भरी और बाहर छोड़ दी। मैं पीछे हटी अपनी जगह से........मैंने अपना हटना देखा और देखा खुद को नृत्य की मुद्रा में उतरते........।

      मैं देख रही हूं......... देह को अपनी........वह नाच रही है, पूरी गति से, पूरी तीव्रता से, किसी अदृश्य ताकत के हाथों वशीभूत हो........ बिल्कुल पागलों की तरह.......श्बिना सुर-ताल, बिना संगीत के......। नहीं, संगीत तो होगा कहीं, उसके अंदर........बहुंत अंदर कुछ बजता-सा। जिसकी लय पर पैर इस तरह उठ रहे हैं.......श्बाल बिखर गए हैं......कपड़े हवा में उड़ रहे हैं.......छाती तेजी से उठ गिर रही है.......सांसें तेज होती जा रही हैं.........। सबकुछ......सबकुछ सिमट आया है उसके करीब......पर कोई उसे छूने की हिम्मत नहीं कर रहा ......कोई उसे रोक नहीं रहा.......अैर वहगति निरंतर तेज जोती हुई पागलपन की हदों को छू रही है.......। तेज........और तेज........एर तेज.क.......। सहसा वह लड़खड़ाती है.......संभलने की कोशिश नहीं करती और फर्श पर ढेर हो जाती है.......मैं उसे गिरते देखती हूं.........बिखरी हुईसांसों, कपड़ों, बालों, भगे हुए गालों, कांपते हुए होठों के साथ.....। आंखें आंसुओं से भरी हुईहैं...। वह कुछ कहने की कोशिश कर रही है, शब्द उसके मुंह से निकल नहीं रहे....... वह पूरी ताकत लगाती है......अपनी हांफती सांसों केबीच। मैं झुक आती हूं उस पर - मैं उसे सुन लेना चाहती हूं.........। मैं अपने कान उसके होठों से लगाती हूं.......। एक आखिरी कोशिश वह पूरी तीव्रता से करती है........। शब्द उसके होठों से निकलता है.....वृत्त बनाता हुआ मुझें तक पहुंचता है। मैं थाम लेती हूं उसे उसकी तरंगों में।

      वह यही कहेगी.........मैं जानती हूं.....वह यही कहेगी.....। मैंने उसे देखा-वह फर्श पर अचेत पड़ी है...........।

 

गाड़ी अपनी मध्दम रफ्तार सेश् आगे बढ़ रही है। वैसे दिल्ली की सड़कों पर मैं अक्सर भटक जाती हूं और गंतव्य तक पहुंचते-पहुंचते देर हो जाती है। शायद इसीलिए बिना ड्राइवर के विक्रम मुझे कहीं नहीं जाने देता।

      ''अकेले जाना हो तो 'मैप' ले लिया करो।'' वह कहता है।

      'मैप' हो तो क्या भटकने से बचा जा सकता है? नही बल्कि और आसानी हो जाती है। जो अनंत में भटकना चाहे...........भटक ही रहा हो जो अनंत में वह ...........। जो वापस न आनिा चाहता हो वह......। जिसके वापस आने के सारे रास्ते खत्म हो गए हों, वह.........।

      विक्रम , तुम नहीं जानते, पीड़ा उन्हीं की गहरी होती है, जो भटकने के बाद वापस आने के रास्ते ढूंढ़ते हैं..........। जो चलते ही भटकने के लिए है।............ उनकी पीड़ा किस तरह की होगी...यह मैं कैसे बताऊं? कुछ चीजें बिना अनुभवन के नहीं जानी जा सकतीं। हम उनके बारे में जितनी बातें करेंगे, वे उतनी ही असत्य होती जाएंगी। वैसे सिध्दार्थ के साथ भटकना, भटकना हो कहां पाता है? वह वापस खींच लेता है अपनी तरफ...। इसे देखकर लगता है, यह सब जानता है। इसे कहां जाना है, क्यों जाना है? यह सबकुछ चुन लेता है अपने लिए, बड़ी सहजता से......द्वंद्व नहीं है यहां, दुविधा नहीं है..........। जो है, सहज है, सुंदर है........। और एक मैं हूं- प्रश्न......प्रश्न......। क्या इन सबका कहीं अंत है? क्या सचमुच कहीं कोई ऐसी जगह है, जहां पहुंचकर सारे प्रश्नों कोअंतर हो जाता है? सारी जिज्ञासाओं का, सारी व्याकुलताओं का... । क्या सचमुच इस तरह कहीं पहुंचा जा सकता है? एक नामालूम-सा सवाल मेरे अंदर सिर उठाता है......... मैं खुद को बरजती नहीं- हालांकि  मेरी निगाहें सामने जीम हैं.......और हाथ यंत्रचालित-से स्टीयरिंग पर अपना काम कर रहे है.........।

      मेरी बगल वाली सीट पर वह बैठा है। उसे हैरानी हुई थी, जब मैंने सुबह उसे फोन करके कहा था कि दस बजे तक घ्शर आ जाए और रोमी के स्कूल जाने के बाद हम कहीं घूमने चलेंगे। मेरे घूमने का अर्थ मेरा भटकना ही होता है। मुझे कहीं नहीं जाना होता और मैं हर जगह चली जाती हूं...। कभी अपने साथ........कभी अपने आपको छोड़कर...........।खुद को यह याद दिलाते हुए कि मुझे लौटना है। क्या ऐसी कोई जगह नहीं, जहां से लौटना न पड़े?

      मैंने पलभर खुद से बाहर आकर उसे देखा-

      ''इतने चुप क्यों हो?''

      ''तुम कल परेशान थीं?''

      उसने मुझे ध्यान से देखा। एक तूफान मेरे अंदर उठा........मैंने अपने होंठ भींच लिए।

      'तुमने एक बार कहा था सिध्दार्थ, अगर मैं कहूं- मैं तुमसे प्रेम नहीं करता तो क्या तुम मान लोगी? और अगर मैं कहूं, मैं तुम्हें प्रेम करता हूं तो क्या तुम जान लोगी?'

      कहने से कुछ भी नहीं जान जा सकेगा सिध्दार्थ। कुछ बातें हमेशा अनसमझी रहती हैं, उन्हें वैसी ही छोड़ देना चाहिए।

      मेरी बेचैनी, मेरी तड़प् कैसे कहूं तुमसे? क्या मैं कह पाऊंगी? क्या तुम समझ पाओंगे? और ऐसा भी नहीं कि यह सब मैं अकेली ही सह रही हूं, हो न तुम भी कहीं न कहीं शामिल।

      तुमने तो कभी नहीं कहा मुझसे-कुछ भी। मैं भी कितना समझ सकी हूं- पता नहीं.........। तुम्हारी आंखें...तुम्हारे होंठ......तुम्हारी भाव-भंगिमाएं भी वही कहती हैं.........जो अतिरिक्त होता है...छलकता हुआ.......छलक जाता है कभी जरा-सा तो देख पाती हूं..........। बाकी सब तो छिापा ही रहे हैं हम एक-दूसरे से........।

      ''मानसी।'' उसने मेरा सिर थपथपाया। मैंने एक गहरी सांस बाहर फेंकी और मुस्कराने की कोशिश की।

      मैं जानती हूं, तुम मुझे उदास नहीं रहने दोगे। रह भी नहीं सकती मैं......। तुम्हारे भीतर अपने को देखना.....तुम्हारी आंखों में खुद को देखना...। जीवन के अत्यन्त दुर्लभ क्षण हैं ये।

      प्रेम है ही दुर्लभ.........।

      ''अच्छा बताओं, कहां ले चलूं तुम्हें?'' मैंने मुस्कराकर वातावरण को हल्का बनाने की कोशिश की-

      ''जहां तुम ले जाना चाहो।''

      ''मैं कहीं नहीं जाना चाहती आज।''

      ''तो?''

      ''मैं भटकना चाहती हूं...........।''

      ''तो?''

      ''तुम राजी हो?'' मैंने पूछा।

      ''राजी मैं कब नहीं था? अैर इसके पहले भी तुमने पूछा कब था?''

      उनसे कहा तो हम हंस दिए, एक विषादपूर्ण हंसी।

      मेरा गला सूख रहा है-

      ''पीछे की सीट पर कोल्ड-ड्रिंक्स पड़ीं हैं। पिओगे ?''

      उसने कोल्ड ड्रिंक्स उठाई और एक खोलकर मुझे थमा दी -

      ''मानसी ठहर जाओ जरा-सी देर, ऐसी भी क्या जल्दी है ?''

      मैंने गाड़ी की रफ्तार कम कर दी।

      ''सिध्दार्थ।''

''हां मानसी।''

''कभी-कभी मुझे लगता है, कि मैं बहुत थक गई हूं। जब से होश संभाला है -सिर्फ भाग रहीं हूं। इधर से उधर ......... जगहें बदल रही हैं......... पर मैं वहीं की वहीं हूं.........। एक बात बताओ सिध्दार्थ, क्या सचमुच कुछ ऐसा है, जिसे पाने के बाद कुछ और पाना शेष नहीं रहता - कुछ और पाने की चाह कोई अर्थ नहीं रखतीं।''

''अभी तुम परेशान हो मानसी। थोड़ी देर के लिए कुछ मत सोचो। वैसे भी तुम बहुत देर नहीं भटक सकतीं। तुम वापस आ जाओगी।''

''तुम कैसे जानते हो ?''

''मैं जानता हूं, तुम वापस आ जाओगी।''

''अगर न आई........।''

''मैं तुम्हें भटकने नहीं दूंगा मानसी।'' उसने मेरे हांथ पर अपना हांथ रख दिया।

काफी देर दिल्ली की सड़कों पर भटकने के बाद हम कुतुब मीनार के प्रागंण में आ गए। हम पत्थर की एक बेंच पर बैठें हुए हैं। हमेशा की तरह यहां काफी भीड़ है। टूरिस्ट बसों से हजारों लोग यहां आते हैं, पता नहीं क्या ढ़ंढूते हैं ? इन पत्थरों में जीवन की कौन सी हकीकतें छिपी होती हैं, जिन्हें वे पहचानने की कोशिश करतें हैं। और अंतत: कोई छोटा-सा पत्थर का टुकड़ा, किसी टूटे ख्वाब की खोई स्मृति....... कोई अनचीन्ही यातना, जिसे वे आखिर तक नहीं पहचान पाते और लौटने लगते हैं। कितनी अजीब बात है- मैं यहां आकर अक्सर सोचतीं हूं- न इनके बनते वक्त हम इन्हें ठीक-ठीक देख पाते हैं, न इनके उजड़ते वक्त हम इन्हें देख पाते.........। हम जब भी इन्हें अपने अंदर दोहरातें हैं......... आधी, अधूरी स्मृतियों के बीच........। स्मृतियां, जो कहीं नहीं ले जातीं......... और हमारा एक हिस्सा हमेशा इनके बीच झूलता रहता है.......... इनके साथ जीने को लालायित, पर इनसे बहुत दूर.........।

उससे बात करते, उसे देखते हुए कभी मुझे भ्रम होता कि वह मुझसे दूर चला गया है.......। कभी जब वह मुझे देखता तो मुझे लगता........... यह उसका 'न होना' है। मैं उसका 'न होना' पकड़ने की कोशिश नहीं करती। मैं जानती हूं, तेज हवा में सूखे कपड़ो-सी फड़फड़ाती स्मृतियों को बचाए रखने की कोशिश कितनी जानलेवा होती है। वह कहीं-न-कहीं वापस जाता होगा.........। कहीं-न- कहीं अपना 'होना' ढूंढ़ता होगा और ठिठककर देखने लगता होगा। क्षणभर की हंसी या क्षण भर का दूसरे से छुआ जाना हमारे अंदर स्मृतियों के कितने झरोखे खोल देता है।

तेज हवा का झोंका आता है और सामने का दृश्य धुंधला जाता है। इसी तरह हवा में चलते हुए एक दिन हम सब बिला जांऐगे- जीवन का अर्थ खोजते हुए........... पर मैं ऐसा क्यूं सोच रही हूं, जीवन निराशा नहीं हैं.........।

उस क्षण मैंने सोचा-जिस राह पर हम चलते हैं, क्या उसी पर वह सत्य पाया जा सकता है-जीवन का वह सत्य-जो मैं ढूंढ़ रही हूं..........। और जो मैं जी रहीं हूं, क्या वह भी एक सत्य नहीं हैं ?

मैंने आंखें ऊपर कीं-टूटी हुई मीनारों के बीच......... वहां ऊपर ऐ आदमी खड़ा है.......... कुछ सोचता..........कुछ ढूंढ़ता-सा.......... नीचे के सच से ऊपर-ऊपर के सच से नीचे........... बिलकुल बीच में......... ठहरा-सा........।

आज मैंने इससे कितनी सारे बातें की हैं........ सिवाय दर्शन के.....। उसकी बातों के, उसकी हंसी के छोटे-छोटे टुकड़े मेरे अंदर उड़ रहे हैं- हवा में डोलते हुए......... कोहरे की तरह कभी सघन, कभी विरल होते हुए......... कभी बारिश की चंद बूंदों की तरह तपते मन पर पड़ते और खो जाते.......।

मैंने उसका चेहरा देखा....... उसके चेहरे पर एक निस्पृह-सा वीरानापन है....... जैसे हरी दूब पर पीली रोशनी.......। इसे देखते हुए अचानक मुझे खयाल आता है....... हम दोनों के बीच एक तारतम्य है, एक गति है, एक संगीत है, पर एक तरह की विपरीतता भी हैं। तो इन दोनों का जोड़ने वाला सेतु क्या है ? वह क्या है जो दो विपरीतताओं को जोड़ता हैं ?

मैंने अपना हांथ उसकी तरफ बढ़ाया तो उसने थाम लिया और उठ खड़ा हुआ.......। हम एक-दूसरे का हांथ पकड़े चल रहे हैं अपने आपमें डूबे.......।

हमारे आसपास लोगों का बातें करने का शोर है........ बच्चों के हंसने का........ एक दूसरे को पुकारने का.......। कभी-कभी मुझे लगता है, लोगों में अनदेखी जगहें देखने का क्या सचमुच इतना उत्साह होता है या वे इससे सिर्फ खुश रखते हैं अपने आपको।

मैं अपना सिर झटकती हूं.......। मैं याद करती हूं......... पिछली बार बातों का क्रम कहां टूटा था..........। मैं उससे पूछती हूं......... तो वह मुझे याद दिलाता है। और मुझे याद आ जाता है-

''कस्मिन भगवो विज्ञाते, सर्वं इदम् विज्ञातम् भवति''- भगवन्, वह कौन-सी ऐसी वस्तु है, वह कौन-सा ऐसा तत्व है, वह कौन-सी ऐसी चेतना है, क्या है वह - जिसे जानने से सबकुछ जान लिया जाता है ?

उसने कसकर मेरी ऊंगलियां पकड़ी हुई हैं.......। मैं खुद को ढीला छोड़ देती हूं उसके हांथ में..........।

'क्लिक' की आवाज से मैं चौककर सिर उठाती हूं........। कोई विदेशी टूरिस्ट है, जिसने हमारी तस्वीर ले ली है। मैं पलभर को हतप्रभ होती हूं.........फिर हम एक दूसरे को देख मुस्कुराते हैं। मुझे याद आता है हमारी एक भी तस्वीर नहीं हैं, जिसमें हम साथ हों...........। यह रहेगा, पर हमारे पास नहीं। एक 'थैंक्स' का आदान-प्रदान होता है और हम आगे बढ़ जाते हैं -

''एक संतुलित, स्वस्थ, सद्गृहस्थ व्यक्ति शौणक का प्रश्न है यह, मुडंक उपनिषद् में, अंगरिस से।''

वह बहुत धीरे से कहता है। धूप उसके चेहरे पर पड़ रही है...........। उसके सुनहरे बाल चमक रहे है।.........। एक नामालूम-सी गंध से मैं घिरी रहती हूं, जब उसके साथ होती हूं..........। वैसे भी जब से वह आया है, मैं कहीं ठहर नहीं पा रही..............। उसकी मौजूदगी एक अजब-सी राहत और एक अजब-सी बेचैनी भर रही है मेरे अंदर.......जिसकी बाबत् मैं कोई फैसला नहीं लेती  िकवह दर असल है क्या? मैं जानती हूं , मैं जानबूझकर कोई फैसला नहीं ले रही। मुझे बीच में खड़े रहना अच्छा लग रहा है.........एक उनींदा-सा अनसमझापन।

''हां, अंगिरस का आश्रम है। शौणक का प्रश्न है। सद्गृहस्थ का.........।'' मैं कहती हूं।

''सोचता हूं , सद्गृहस्थ का यह प्रश्न, वह भी आश्रमवासी से...........।''

उसने मुझे देखा.........। वह जब मुझे देखता है, मुझे कई बार लगता है, वह मेरे भीतर देख रहा है। मैं उसे रोकती नहीं। ऐसा है क्या, जो वह नहीं जानता। इसी ने मुझमें वह देखा है, जो मैं खुद कभी नहीं देख पाई........।

एक गर्म आंच में मैं खुद को पता महसूसती हूं। उसने एक बार कहा था, ''मानसी, मैं तुम्हें जब भी देखता हूं, प्रकृति में देखता हूं.......। तुममें इस समूची प्रकृति की झलकियां पाता हूं.........। जैं जब आसमान को देखता हूं.........। तुम दिखाई देती हो......। मैं जब इंद्रधनुष को देखता हूं.........। रिमझिम बरसती बारिश को..........रात में दूर-दूर तक फैले तारों को........और चांद को....... तो तुम ही नजर आती हो। वह सबकुछ जो मनुष्य नहीं बना सकता, वह तुम हो मानसी।''

''यह तो प्रक्रिया रही है उपनिषद् काल की। कोई प्रश्न हो मन में, समाधान चाहिए अगर। आश्रम चले गए। हर स्थापित गृहस्थ का कोई न कोई गुझ होता ही रहा है, उस काल में। और फिर, कई बार तो, यूं ही चले गए। दर्शनार्थ। क्या फर्क पड़ा इससे।''

वह मेरा हाथ फिर पकड़ लेता है..........। आज उसने ग्रे जीन्स पहनी है........ व्हाइट शर्ट के साथ....और मैंने ब्लू जीन्स ........ ब्लैक टी शर्ट के साथ। टूरिस्ट्स पर से होती हुई मेरी निगाह वापस आती है और मैं सिर झुकाए चली जा रही हूं।

''हां मानसी। लगता यही है, लेकिन ऐसा नहीं है यह। प्रक्रिया नहीं है यह.......।''

उसका स्वर हवा में उठता हुआ सारी बाधाएं पार करता हुआ मुझ तक आता है--

''क्योंकि प्रश्न सामान्य नहीं है यहां। रीजनिंग से निकला हुआ प्रश्न नहीं है यह । इंद्रिय सत्ताा से परे जो कुछ है, अतींद्रिय सत्ताा को भी समझ देता हो जो, उस अद्वितीय की गहराइयों में डूबते हुए, कुछ आभास हुआ है, शौणक को।''

''यह आभास कि कुछ है, कुछ है ऐसा, जिसके जान लेने पर सर्व विज्ञातं भवति-सबकुछ जान लिया जाता है।''

क्या सचमुच? क्या है ऐसा, और मैं क्यूं नहीं जान पा रही इतरी कोशिशों के बावजूद। मैं अपने में डूबी उसी तरह चल रही हूं।

''हां, जान लिया है इतना--और इतना काफी है, उथल-पुथल कर डालने को। और इस आभास के साथ संतुलित उतावलेपन में आया है, वह अंगिरस के पास।''

वह कहता है तो मैं उसका चेहरा देखती हूं--

''कैसे जान लेते हो सिध्दार्थ, यह सबकुछ?''

मुस्कान उसके होठों पर चिड़िया की तरह आ बैठती है........। मैं जानती हूं, किसी भी वक्त यह उड़ जाएगी ओर वहां एक ऐसा खालीपन छोड़ जाएगी-- जिसे सिर्फ छूकर महसूस किया जा सकता है........। पर उस पल मैं अपनी आंखें उसी चिड़िया पर टिकाए हूं--

''यह उतना महत्तवपूर्ण नहीं है मानीस।'' ज बवह 'मानसी' कहता है, मैं उसके होठों को देखती रहना चाहती हूं। इसके होठों से निकलकर एक साधारण- सा नाम भी अपना रूप, अपना रंग, अपना दृश्य बदल लेता है....। मुझे लगता है, यह नाम इसके होठों पर एक नन्हें फूल की तरह उग आया है.......जिसे मैं सिर्फ अपने होठों से चुन सकती हूं..........। मैं जब अपने होंठ उसके होठों के समीप ले जाऊंगी--यह नाम हमारे होठों के बीच भटकता रहेगा। क्या मैं ठीक उस पल को पकड़ सकती हूं-- जब मैं इसकी आंखों में उतरते ही असाधारण-सी हो उठती हूं.........कि सवयं को देख हतप्रभ हो जाती हूं।

मैं उसके होठों को ही देख रही हूं--अगर मैं यह नाम इसके होठों से चुन लूं तो पाऊंगी --वहीं रह गया है वह, जो हाथ आया है, वह है 'सिध्दार्थ'

''अस्सर्टिव ही सही, यह मानना है मेरा, जानना नहीं। और मानना गलत भी हो सकता है। इससे फर्क नहीं पड़ता। जो महत्वपूर्ण है, उकसे गलत नहीं होना चाहिए। वास्तव में जो जिंदगी हम जी रहे हैं, ठीक उसी तरह की जिंदगी, कोई और जी रहा है, या जी चुका है, तो उसके बाबत् कहने में, कह सकने में आसानी होती है-- तो महत्वपूर्ण यह नहीं है मानसी। महत्वपूर्ण है वह प्रश्न जो शौणक ने किया है।''

''और महत्वपूर्ण यह भी है सिध्दार्थ.........।'' मैं उस चिड़िया को उड़ता हुआ देख रही हूं--और उस खाली जगह को........ओर उस प्रतीक्षा को....... जो वहां आकर ठहर गई है--

''जो तुमने पोस्टुलेट किया है-- कई बार 'मानना' गलत होने की संभावनाओं के साथ भी, महत्वपूर्ण ही होता है। सत्य की संभावनाओं के बहुत करीब होता है वह। दर्शनिक का सच है वह । जैसे कई बार मिथक भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। मिस्टिक का सच। रहस्यवादी अभिव्यंजना.....।''

उस खाली जगह को सहलाती मेरी आंखें वापस लौट आती है।

वह कई पल मुझे देखता रहा। मुझे लगता है, उसने मेरी उदासी पकड़ ली है। मेरा हाथ जो चलते-चलते छूट जाता है उसके हाथ से ......एक आतुर प्रतीक्षा से भर उठता है, जब उसका हाथ आगे बढ़ेगा, और उसे अपने में ले लेगा......।

''मानसी, वृहदारण्यक का वह मिथक बहुत पसंद है तुम्हें।' उसने अपना हाथ आगे किया तो मैंने अपना कांपता हाथ दे दिया उसे। मेरी उंगलियों में एक अजीब-सी सिहरन है......। मेरी देह में एक अजीब-सा पागलपन......। दो कदम की दूरी पर है वह........। अगर मैं कदम आगे बढ़ाऊं तो खो सकती हूं उसमें.......

''मुझे भी.....।'' मेरी आंखें उठीं तो फिर उसकी आंखों ने लौटने नहीं दिया--

''प्रारंभ में कुछ नहीं था। न दिन था, न रात थी। चारों ओर अंधकार ही अंधकार था। मृत्यु फैली हुई थी चारों ओर। ......और ......उसने इच्छा की........। 'मैं' चित्त का धारर्णकत्ता बनूं और वह चित्त का धारर्णकत्ता बना.......।''

हम दोनों वहीं ठिठके पता नहीं कितनी देर एक-दूसरे को देखते रहे। मेरे अंदर सबकुछ ठहर गया उस पल........। और जब हमने चलना शुरू किया, मैंने अत्यन्त धीमी आवाज में पूछा--

''इस मिथक का रहस्य क्या है सिध्दार्थ?''

'' 'नायनात्मां, प्रवचनेन् लभ्यों' बहुत पढ़ लेने मात्र से उपलब्ध नहीं हो जाती यह आत्मा। 'न बहुनाश्रुतेन्' बहुत सुनने से भी नही।''

उसकी आवाज जैसे बहुत दूर से आ रही है-- हवा की तरह बहती हुई-- अपने साथ एक ऐसी गंध बहाकर लाती-- जिसे मैं जितना पहचानती हूं, उतना नहीं पहचानती। क्या मैं इस आवाज के बारे में कुछ भी कह सकती हूं?

'' ' न मेधया' बहुत ज्ञान हासिल कर लेने से भी उपलब्ध नहीं होती यह। यही न।''

मैं उस आवाज की लय में अपने आपको डुबोती हूं.........।

''और तुम क्या कहते हो?''

''जिसे चुनती है, यह आत्मा, उपलब्ध होने के लिए। वही होता है उपलब्ध। 'य मे वैष वृणुते, नेनलभ्य स्तषै:।' -- और जिसे चुनती है, यह वही........हां वहीं, 'मेडीटेट्स अपॉन.......हिमसेल्फ'........प्रेरित होता है तपस्या के लिए......। मानसी, एक मिथक है-- सुनोगी?''

उसकी आवाज भरे हुए बादल की तरह मुझ पर आकर ठहर गई है। मैं उस बादल का आहिस्ता-आहिस्ता अपने अंदर उतरना महसूसती हूं.....। मैं उसे अपनी सांसों में भरती हूं........फिर आहिस्ता से छोड़ती हूं.......

''हां कहो, सिध्दार्थ....।''

''मैंने इच्छा की चित्त का धारर्णकत्ता बनूं। और मैं....। और तुमने इच्छा की चित्त का धारर्णकत्ता बनूं। और तुम, चित्त का धारर्णकत्ता बनीं और तुमने तपस्या की।....... मेडीटेटेड अपॉन योरसेल्फ...... और मैंने तपस्या की 'मेडीटेटेड अपॉन योसेल्फ'.......और हमने तपस्या की.......।''

मैं बादलों के घेरे में हूं-

''तुमने तपस्या की....... मेडीटेटेड अपॉन योरसेल्फ। .......और जल के अनंत स्त्रोत फूट पड़े। आह्वादित हो उठे हम...... और हमने कहा.......हमने कहा........।''

मैं हतप्रभ उसे देख रही हूं........। भरे हुए बादल सहसा बरस पड़े हैं....। मैंने आहिस्ता-से पलकें मूंदीं। दो बूंदे पानी बाहर आया........

''क्या ???'' मेरे मुंह से निकला।

''........ यही है प्रेम। यही है, प्रेम। यही है सृष्टि। .......यही हो तुम।''

मैंने दो कदम आगे बढ़ाए और उसमें बिला गई। साीर सृष्टि बरस रही है हम पर और हम चुप खड़े हैं.......... एक दूसरे में डूबे........ तल्लीन.........

''अग्नि हो तुम........।'' मैंने अपने कांपते होंठ उसके जलते माथे पर रखे।

''मानसी........।''

''हां सिध्दार्थ........।''

आगे के शब्द मुझमें ही बिला गए। उस बारिश में भीगे हुए हम देर तक खामोशी से चलते रहे। उसकी एक बांह मेरे गले से होती हुई मेरे कंधे पर है। मैंने अपने कंधे पर उसका गर्म हाथ थामा हुआ है.......। तीव्र लहरों की तरह मन में जाने क्या-क्या उठता है ? सिर्फ अपनी दूसरी बांह आगे बढ़ानी है और इसमें समा जाना है...........। मैंने अपने चारों ओर देखा........''गलत जगह चुन ली मैंने।''

उसने मेरे कंधे से अपनी बांह हटा ली है और सहज होकर चलने लगा है.......। बहुत देर की चुप्पी के बाद मैंने पूछा-

''सिध्दार्थ, मुंडक उपनिषद् में एक रूपक आता है- दो पक्षी जो हमेशा ही ऐ साथ रहते हैं, ऐ ही वृक्ष पर, जिनके नाम भी समान हैं। उनमें से एक, उस वृक्ष के फलों का आस्वाद करता रहता है, और दूसरा, सिर्फ यह सबकुछ देखता रहता है-

'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया।

समानं वृक्षं परिसस्व साजे।'

क्या है इस रूपक का अर्थ ? सांख्य के 'प्रकृति' और 'पुरूष' का संबंध ? या 'रयि' और 'प्राण' की कंपेनियनशिप ? या कुछ और ? क्या सिध्दार्थ !''

      ''मानसी, 'प्रकृति' और 'पुरूष' का संबंध नहीं है यह। 'रयि' और 'प्राण' की अपोजिट कंपेनियनशिप ? भी नहीं। .......फलों का आस्वाद कर रहा है....... और फिर भी दु:खी है। कष्ट में है यह। और जो द्रष्टा है, मात्र द्रष्टा, आनंद में है वह। लेकिन, इतना ही उद्देश्य नहीं है इस रूपक का...........। ऐसा लगता है,'द्रष्टा' कह रहा हो जैसे.......... आखिर क्यों ? क्यों तुम, इस वृक्ष के फलों का आस्वाद कर रहे हो ?

क्यों ? क्या मिल रहा है तुम्हें ? 'एनीथिंग यू गेट ? एक्सेप्ट मिजरी............ देन व्हाई ? क्यों ?''

      उसके चेहरे पर एक पारदर्शी उजलापन है........ जो उस दुपहर की लौटती धूप में चमक रहा है-

      ''मानसी........बुध्दि की अपना सीमाएं हैं।.......... एक सीमा तक...........लेकिन........उसके बाद........बुध्दि असीम है........ और........ यही है....... वह द्रष्टा। 'दी आबसर्वर'''

      ''तंत्रिका तंत्र विज्ञान, मानता रहा है अब तक कि मस्तिष्क, 'द ब्रेन', जो भौतिक पिंड है, शरीरिक पिंड, वही उत्तरदायी है, समस्त संभावित ज्ञान के उद्गम का। और यह एक पोस्टुलेट है। स्वयं सिध्द प्रमाण के रूप में स्वीकृत..........।'' मैं सोचती हुई-सी कहती हूं।

      ''कब पढ़ लिया तंत्रिका तंत्र ?'' वह मुझे देख मुस्कुराता है, मैं हंस देती हूं।

      ''हमारा जीव विज्ञान, तंत्रिका तंत्र विज्ञान, भौतिकी का अनुगामी रहा है, मानसी। प्रतिबध्द चिंतन का अनुगामी। पदार्थ को सबकुछ मान लेने की विवश प्रतिबध्दता।''

      वह मेरे चेहरे पर दृष्टि जमाए है। मुझे हमेशा लगता है, देखे वह कहीं भी, देखता वह मुझे ही है। पर जिस मसय सीधा मुझे देख रहा होता है, ठीक उस समय अपनी जगह पर खड़े रहना- अपने आपको रोके रखना कितना तकलीफदेह होता है - यह में जाने कितनी बार महसूस कर चुकीं हूं।

      ''भौतिकी, जो यह मानती रही है कि पदार्थ कुछ नियमों के अधीन गति करता है। और यह नियम शाश्वत नियम है।''

      ''लेकिन भौतिकी के नियम........'' उसके माथे पर सोच की रेखाएं उभर आती हैं। वह दूर कहीं देखने लगता है--

      '' 'पदार्थ के अतिविखंडन की स्थिति में, पदार्थ पर लागू नहीं हुए।' ......भौतिकी के ही नियम लागू नहीं हुए, भौतिकी पर........। और वैज्ञानिक, शुध्द वैज्ञानिक, नॉट द पोस्टुलेटेड वन, शनै:-शनै: रहस्यवादी होता चला गया। मिस्टिक........। तो, बुध्दि की एक सीमा हैं, और उस सीमा तक, पदार्थ के, और चित्त के, 'प्रोजेक्टेड माइंड' के नियम लागू होते हैं, उस पर। लेकिन उस सीमा के पार, चित्त के नियम या ब्रेन का आधार, कुछ भी उस पर लागू नहीं होता।........रहस्य है यह । बुध्दि एक रहस्य है मानसी.......। ओर उसे ही जानना है। ......जाना जा सकता है, वह .......।''

      ''तो एक खास सीमा के पार, पदार्थ के नियम बुध्दि पर लागू नहीं होते, यही कहना चाहते हो न तुम?''

      मैं उसकी तरफ देखती रही। हम चलते-चलते एक पत्थर की बेंच पर बैठ गए हैं। शाम को धूप गुंबदों पर मुस्करा रही है। धूप का एक टुकड़ा वहां से उठकर उसकी आंखों में आ ठहरा है.......।

      ''हां माकनसी, परिभाषित नहीं हो सकी बुध्दि आज तक। न प्रेम ही परिभाषित हो सका। न समय।''

      क्षणभर पहले का आवेश अब उसके स्वर में नहीं है। उसकी आवाज अब अपनी ओर मुड़ रही है.....अंदर की ओर ....।

      ''कृष्ण कहते है 'कालों अहं', मैं ही हूं समय। ......कृष्ण कहते है......'योगक्षेमं वहामिअहं'......सबकुछ का धारर्णकत्ता तो मैं ही हूं........।''

      मैं उस धूप के टुकड़े को अपनी आंखों से छूती हूं.......। वह पलकें झपकाता है.....वह टुकड़ा वहीं ठहरा रहता है......हल्के-हल्के कांपता......।

      ''हां।'' उसकी आंखें कहती हैं और चु हो मुझे निहारती रहती है॥

      ''ईसा कहते हैं, मैं ही हूं प्रेम। ज्योति हूं मैं। मार्गदश्रक हूं।'' मैं आगे कहती हूं।

      ''हां, लेकिन क्यों? क्यों है इतना सघन विश्वास। क्या है वह जो यह सब कहला देता है?''

      ''क्या है सिध्दार्थ?' मेरी आवाज में अधीरता भर आई है।

      ''अपने होने का आभास देती है बुध्दि। ओर यह भी कि अपने होने के 'अतिरिक्त' भी कुछ है, वह। -इस 'अतिरिक्त' को जान लो......और तुम ही हो कृष्ण, ईसा हो तुम। बुध्द भी ओर महावीर भी। 'उद्गीथ' हो तुम, 'मौन' भी तुम। 'द मोस्ट इर्रेलेवेंट रेलेवेंसी यू आर। रादर द मोस्ट रेलेवेंट इर्रेलेवेंसी।''

      उसने पता नहीं कब अपना हााि आगे बढ़ाया और मैंने आपना हाथ उसके हाथ में दे दिया। उसने अपनी दोनों हथेलियों से उसे ढांप लिया। उसकी देह की गर्माहट मैंने अपने अंदर महसूस की....ग्रहण किया वह संदेश.....जो उसने मुझे दिया.....। मेरी पलकें भीग गई। मैं उसे देखती रही.....

      धूप का वह टुकड़ा उसकी आंखों में जलने लगा है.......। मैं अपनी आंखें वहां से नहीं हटा पाती। सम्मोहित-सी देखती रहती हूं।

      ''सिध्दार्थ.......।'' मैं बहुत आहिस्ता से कहती हूं। दूसरे हाथ से उसका एक गाल छू लेती हूं बस.....।

      ''कैसे जाना जाए, इस 'अतिरिक्त' को? यह भी तो तुम ही बताओंगे न? पर क्यों अत तक रूके हो? जान सकती हूं मैं......? व्हाई? एण्ड व्हेन? व्हेन द टाइम टु कम। ......कब तक कहते रहोगे......लेट द टाइम कम.......।''

      ''क्वीलिन......।'' वह कहीं दूर खो गया.......''प्रारंभ में प्रारंभ नहीं था। इन द बिगनिंग देयर वाज नो बिगनिंग। ओर उस प्रारंभ में जो प्रारंभ नहीं था, वह चित्त का धारर्णकत्ता बना। ......वह ......नाइदर 'ही', नार 'शी', वह 'देट'.....'देट'......। अनवस्था दोष नहीं है यह। नो रिग्रेशन।''उसने जैसे थककर अपना सिर झुका लिया। मैं उसके बाल देखती हूं.......मेरे होठों से थोड़ी दूर.......। हवा में उड़ते हुए......उनके इस तरह होने में एक निमंत्रण है.....। मेरा हाथ बेसाख्ता आगे बढ़ता है....उसके बालोें से उलझता हुआ....उसके चेहरे तक आता है.....। उसका चेहरा गर्म है.....। पता नहीं धूप की वजह से या......। मैं उसके स्पर्श का एक गहरा गर्म घूंट भरती हूं......। और बहुत आहिस्ता से उसका चेहरा ऊपर उठाती हूं......अपनी तरफ.......।

      ''क्वीलिन? क्या है सिध्दार्थ?''

      उसने अपनी आंखों मुझ पर टिका दीं। कुछ ढूंढ़ती-सी.....मेरे समूचे चेहरे को अपने घेरे में लेतीं......

      ''जो प्रश्न करें, उत्तर भी वहीं दे......।'' उसके होंठ कांपे.....।

      '' 'क्लीलिन' है वह। सूत्र दे ओर उस सूत्र का भाष्य भी वही दे, 'क्वीलिन' है वह। प्रेम में हो और प्रेम का अर्थ भी पूछे, 'क्वीलिन' है वह। मानसी,'क्वीलिन' हो तुम।''

      रोशनी की उस दुनिया में मैं उसके साथ खड़ी हूं........उस पल के साथ .....उस संपूर्णता के साथ.....। रोशनी की उस साफ स्वच्छ नदी में हम साथ बह रहे हैं......। एक दूसरे में डूबे.......पूरे.....तृप्त......संपूर्ण......'

--00--

''बुध्दि अपने होने के अतिरक्ति भी कुछ है, कैसे जाना जाए?''

      हम दोनों वापस लौट रहे हैं। रोमी के आने से पहले मुझे वापस पहुंचना है.......। मैं गाड़ी की रफ्तार बढ़ा देती हूं।

      ''कैसे जाना जाए? यह जानने के पहले यह जाना जाए कि क्या है यह 'अतिरिक्त''द एबाउट ऑफ इट।' - 'नॉट द ऑफ इट' एंड नॉट द 'इन इट। - मानसी इस 'अतिरिक्त' के संदर्भ में हमारे सारे कथन 'एबाउट ऑफ इट' के रूप में ही होगें। यह 'अतिरक्ति' जानने की स्थिति नहीं है। जीने की स्थिति है यह। 'प्रेम' जानने की स्थिति नहीं होती मानसी, जाने की स्थिति होती है।''

      उसने मुस्कराकर मुझे देखा, फिर सामने देखने लगा।

      ''क्या है यह 'एबाउट ऑफ इट'? ''मैने पूछा।

      ''जिस सीमा तक संसार के संबां में जानना चाहते हैं हम। माध्यम बनती है, बुध्दि। 'अपरा' है यह ।''

      ''अपरा। 'अपरा विद्या' कहता है मुंडक उपनिषद्।''

      ''हां, 'लोवर नॉलेज' है यह। अपरा विद्या। लोअर स्टोरी नॉलेज। इनफीरियर मत कहना इसे। बुध्दि के साथ, इनफीरियर या सुपीरियर कुछ भी नहीं होता। नॉलेज इज नॉलेज।''

      उसके बाल हवा में उड़ रहे है॥ मैं एक पल उसके चेहरे को देखती हूं फिर सामने देखने लगती हूं.......। स्टीयरिंग घुमाते कभी मेरी बांह उसकी बांह से छू जाती है, तो एक गर्म स्पर्श मेरे अंदर हिलौरें लेने लगता है........।

      ''विज्ञान की जानकारी, धर्म की, दर्शन की जानकारी सभी कुछ तो अपरा है।'' मैं कहती हूं।

      ''हां।'' वह हल्के से सिर हिलाता है, सामने देखता हुआ.......

      ''विज्ञान की समस्त जानकारी अपरा है। साथ ही तार्किक निर्गमों से प्राप्त समस्त दार्शनिक जानकारी भी अपरा है।''

      ''और धर्मशास्त्रों से .......।''

      ''धर्मशास्त्रों, आप्त प्रमाणों से प्राप्त जानकारी अपरा भी है, परा भी। जब यह जानकारी अपने-आपको जान लेने की दिशा में संकेतक बनती है, फ्लैश देती है जब, ज्ञानी इसे परा कहते हैं--अपर नॉलेज। अपर स्टोरी नॉलेज......।''

      ''बुध्दि, अपनी सीमाओं के साथ, नीचे के तल पर है, संसार है, पदार्थ है, पदार्थ के नियम हैं। अपनी सीमाओं से हटकर, 'अतिरिक्त' है बुध्दि 'एक्स्ट्रा सेंसरी' हैं वह, सुपर नेचुरल है......।''

      मैं कहती जाती हूं। कभी-कभी लगता भी है, क्या पागलपन है! छोड़ों यह सब। पर फिर पता नहीं वह कौन-सी बात है, जो मुझे फिर इधर खींच लेती है।

      ''हां, और इससे अधिक कुछ नहीं कह सकते हम। सिर्फ इतना कि इसे जानना है, तो इसका एक ही रास्ता है, 'वह है जीना इसमें।' 'टू नो दाईसेल्फ इज टु लिव इन इट।''

      ''क्या तात्पर्य है तुम्हारा?'' मैंने उसे देखा तो उसने हाथ बढ़ाकर मेरा चेहरा सामने कर दिया--सड़क की ओर......। मैंने अपना एक हाथ उसके हाथ में दे दिया।

      '' 'टू नो दाईसेल्फ इज टु लिव इन इट......।' इसे जानना है तो जीना है इसमें--क्या अर्थ है इसका? और फिर बाई द वे -- योग सूत्राों में उल्लेख है, सिध्दियों का। इसे किस प्रकार की विद्या मानोगे तुम?''

      ''जिस सीमा तक संसार के संदर्भ में जानना चाहते हैं हम। माध्यम बनती है बुध्दि। अपरा है यह उस सीमा तक। अपनी ही वृतियों के अधीन। मानसी, विल यू प्लीज एलाबोरेट इट। प्रोसीड.....।''

      मैने एक क्षण उसका चेहरा देखा--

      ''और जिस सीमा तक संसार की शक्तियां हासिल करना चाहते हैं हम, माध्यम बनती है यह बुध्दि। अपरा है तब भी। अपनी ही वृत्तियों से अटी-पटी......।''

      ''यस मानसी। नाइस ऑफ यू। माय लव। संसार से हटकर जब अपने आपको जानने के लिए......।''

      ''सिध्दार्थ, एक बात पूछूं?''

      मैने उसका हाथ पकड़ लिया। उसने अपने हाथ पर ठहरे मेरे हाथ को देखा-उस पर अपना दूसरा हाथ रखा--

      ''हां।''

      मैने वह गहराई एक बार फिर अपने अंदर महसूस की।

      ''मुझे ही क्यों चुना तुमने, इस सबके लिए।''

      मेरी आवाज भर आई। उसने मेरा हाथ अपने हाथों में भींच लिया--

      ''मानसी, मुझे ही चुना है मैंने......।''

      फिर उसने मेरा हाथ वापस स्टेयरिंग पर रख दिया। उसकी बांहों में सिर छुपाकर अपने-आपकों खाु देने की चाह........। मेरी कांपती उंगलियां स्टेयरिंग संभाल रही है.....।

      ''जस्ट प्लीज......। संसार से हटकर जब अपने आपको जानने के लिए आगे बढ़ती है यह .....आभास देती हैं जब अपना.....तब भी होती यह, संसार में ही है। .........बुध्दि अपने ही संकल्प से, संकल्प जो खुद भी बुध्दि की ही वृत्ति है.....अपनी ही किसी वृत्ति को मजबूती के साथ धारण करती है जब.....उस समय.......चित्त की यह सघनता ही ......सिध्दि है......।''

      उसने थाम रखा है स्वयं को। उसके लिए आसान होगा यह सब.......पता नहीं। कभी उसकी आंखों में मचलते तूफान दिखाई देते है-- कभी शांत-स्थिर भाव से बहती नदी......। कभी बादल उतर आते हैं.....बरस पड़ने को आतुर......और कभी साफ - स्वच्छ नीला आसमान.......।

      ''यह भी अपरा विद्या ही हुई है।'' मैंने स्वयं को संयत करने की एक लाचार कोशिश की।

      ''हां, समस्त सिध्दियां, अपरा विद्या के अंतर्गत ही हैं.....। बुध्दि अपनी वृत्तियों के साथ 'चित्त' है। और 'चित्त' की उपस्थिति में उपलब्ध समस्त जानकारीक, संसार की ही जानकारी है। 'द सब्जेक्टिव फीलिंग ऑफ द आबजेक्टिव वर्ल्ड......।' .....द सब्जेक्टिव विलिंग ऑफ  द बाबजेक्टिव वर्ल्ड......।'' वह उसी तरह अपने सामने ही देख रहा है--

      ''और.......और........'द सब्जेक्टिव क्रिएशन ऑफ द आबजेक्टिव वर्ल्ड......' यही है सिध्दि । इससे अधिक क्या स्पष्ट करूं?''

      ''और कुछ पूछूं।'' मैंने मुस्कराकर उसकी ओर देखा।

      ''हां.......हां.....।''

      ''थक तो नहीं गए.......।''

      ''थका भी हूं तो, तुम छोड़ना मत मानसी।'' उसकी आवाज में पता नहीं क्या था कि मैं सहसा चुप हो गई।

      उसने मेरे हाथ पर अपना हाथ रखा--

      ''कहो मानसी।''

      ''बुध्दि अपनी वृत्तियों के अधीन चित्त है। वृत्तियों के साथ.......। और वृत्तियों से हटकर।''

      ''मानसी। वृत्तियों से हटकर बुध्दि........। ....... वह तो तुम हो मानसी। हां तुम 'एतद् वैतद्'......'' उसका हााि मेरे हाथ पर कस गया।

      ''सिध्दार्थ, मुझे ही क्यों चुना तुमने?'' मैंने कांपती आवाज में पूछा।

      ''उद्दालक क्यों चुनता है श्वेतकेतु को।'' उसने मुझे देखा--

      ''याज्ञवल्क्य क्यों चुनते हैं मैत्रेयी को......। .....और मानसी.......कृष्ण क्यों चुनते हैं राधा को.....। हैव यू आन्सर?''

--- 00 ---

''नहीं सिध्दार्थ, मेरे पास किसी बात का जवाब नहीं.........किसी का भी तो नही। सिर्फ प्रश्न है.....प्रश्न और प्रश्न......। और इन प्रश्नों के जवाब में कहां-कहां नहीं खोजती सिध्दार्थ.......कहां-कहां नहीं भटकती । आखिर वह कौन-सा जवाब है, जिसके जानते ही मै। सबकुछ जान लूंगी.....सबकुछ।''

      हम दोनों में से काफी देर तक कोई कुछ नहीं बोला। हम जिस भाव-दशा में थे, उसमें से उबरकर कुछ पूछना... मुझे कभी अच्छा नहीं लगता और मैं बहुत देर चुप रही.......। विभिन्न रास्तों से होती हुई गाड़ी अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रही है.......।

      ''सिध्दार्थ, शौणक पूछता है, अंगिरस से 'कस्मिन भगवों विज्ञाते, सर्वं इदम् विज्ञातम् भवति।' - किसे जानने से, सबकुछ जान लिया जाता है?''

      बहुत देर बात जब मैंने कुछ पूछा, तो वह यही प्रश्न था। मेरी आवाज में पता नहीं कैसी बेबसी भर आई है.....

      ''कैसे जाना जा सकता है सिध्दार्थ? यह सबकुछ। हम हर बार, वहीं पर आकर क्यों रूकते है।?''

      उसने मुझे देखा--दिलासा देती आंखों से ओर मेरा सिर थपथपाया। मैंने एक गहरी सांस बाहर फेंकी।

      ''आसान है, मानसी। वह जानना। बशर्ते हम इसे जानना चाहें। 'स्व' को जानने का अर्थ है,ख् जानना 'स्व' को ही है। इसे ही जानना है। और इसे जानने का अर्थ है, इसके प्रति जागरूक होना। 'बीइंग इज सेल्फ अवेयरनेस ऑफ बीइंग।''

      उसने आहिस्ता-आहिस्ता मुझे समझाते हुए कहा।

      इतने शोर में भी मैं सिर्फ उसी को सुन पा रही हूं......। ज बवह बोलता है कभी-कभी तो मुझे लगता है- किसी प्राचीन मंदिर में मंत्रों की ध्वनियां उठ रही हैं......एक लयबध्द तरीके से उठती......। सबकुछ को अपने आगोश में समेटती।

      ''छांदोग्य उपनिषद् में नौ द्रष्टांत है।''

      वह क्षणभर रूककर कुछ सोचने लगा। मैं प्रतीक्षा करती रही--वहीं ठहर कर....।

      ''अस्तित्व को बतलाना है कि वह ही अस्तित्व है। श्वेतकेतु को बतलाना है, और यह काम कर रहा है उद्दालक, उसका पिता। वह पिता, जो खुद भी नहीें जानता अस्तित्व को। 'बीइंग और अवेयरनेस' का पता, उसे खुद भी नही।-- फिर भी प्रयास कर रहा है। द्रष्टांतों का आधार ले रहा है। स्पष्टता का अहसास दिला रहा है।''

      उसने जब कहा, तो मैं उसके साथ-साथ चलने लगी। उसके साथ इस तरह चलते हुए कभी-कभी एक दिव्य-सी अनुभूति होती। लगता है, हम इस ग्रह के प्राणी नहीं, किसी ओर ग्रह से आए, भटके हुए प्राणी हैं........।जो ढूंढ़ रहे हैं.......सिर्फ ढूंढ़ करहे हैं.......पता नहीं क्या?

      ''क्यों?'' मैंने पूछा।

      ''इसलिए कि 'अस्तित्व' के ही अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है, श्वेतकुतु ने। 'नास्ति से उत्पत्ति कैसे हो सकती है अस्तित्व की?' यह प्रश्न है श्वेतकेतु का। 'एब्सर्डिटी' है यह, कहता है वह। और 'एब्सर्डिटी की भी क्या कोई शिक्षा हो सकती है?' इज देयर एनी टीचिंग? पूछता है, श्वेतकेतु पिता से, उद्दालक से। और रहस्यवादी चिंतन यह बतलाता है कि श्वेतकेतु उपलब्ध हुआ। जान सका 'बीइंग' को, अपने 'अस्तित्व' को। उद्दालक नहीं जान सका आखिर तक। मानसी डू यू अंडरस्टैड मी?''

      ''क्या मतलब? क्या अर्थ तुम्हारा?'' मैंने चौककर उसे देखा। स्टेयरिंग गड़बड़ाया, पर मैंने उसे संभाल लिया।

      'हाउ एव्हर? लीव इट।'' उसने प्रत्यक्ष लापरवाही दिखाते हुए कहा--

      ''द्रष्टांतों की बात कर लें हम। नौ द्रष्टांत।'' चलो अभी जाने दो। नहींतो तुम कहोगे--'लेट द टाइम कम मानसी।' मैंने मुस्कराते हुए सोचा-एक दिन तुम खुद ही बतलाओंगे। बतलाओगे ही। मैं जानती हूं।

      ''नौ ही द्रष्टांत क्यों दिए?'' मैं अपनी बात पर आ गई।

      ''यही मैं भी सेचता हूं। क्या ये पूर्णता का अहसास दिलाने के लिए माइथॉलाजी की कोई बध्दता है? आर्यभट्टीय कुशलता का प्रतीक। या फिर--'नव द्वारे पुरे गेही'''हठ योग का कोई रहस्य।''

      ''पहला द्रष्टांत है उस मनुष्य का, जो सोया हुआ है?'' मैंने कहा।

      ''मनुष्य से संबंधित तीन द्रष्टांत हैं मानसी। जानती हो तुम, फिर भी बतला रहा हूं। पहला, सातवां औरा नौवां। मनुष्य से प्रारंभ होता है सबकुछ और उस पर ही रूकता है, सबकुछ। 'द बिगनिंग एंड द एंड'''

      ''मैन इज द मेजर ऑफ ऑल थिंग्स।''

      ''हां मानसी। यू आर द मेजर ऑफ ऑल थिंग्स। सृष्टि के आरंभ से अब तक.......।''

      ''सिध्दार्थ, प्लीज........। तुम्हें मेरे सिवा कुछ नजर नहीं आता क्या?''

      वह मुस्करा देता है। कैसे मुस्कराहट, यह तो वही जाने। कुछ चीजों को शब्द देने की कोशिश करना अपनी असमर्थता के ओर ज्यादा रू-ब-रू होना है शायद।

      ''पहला द्रष्टांत 'सोए हुए मनुष्य का है'--सातवां-'भूले-भटके मनुष्य का' ओर अंतिम द्रष्टांत ऐसा है, जहां परमात्मा भी पूछने लगे, मनुष्य से कि बता, आखिर तू चाहता क्या है?'' मैं कहती जा रही हूं।

      ''हां मानसी। अग्नि हो तुम, शाश्वत अर्थ मेरा।''

      मैं गाड़ी की रफ्तार धीमी कर उसे देखती हूं। अभी इस क्षण स्टीयरिंग छोड़ दूं और तुम्हारी बांहों में समा जाऊं......ओ, खुदाया। मैंने खुद को संभाला.......

      ''कॉफी पिओगे?''

      ''हां। मानसी, एक बात पूछूं?''

      ''क्या?''     

      ''बाजरे की खिचड़ी के मंगोड़े बनाते समय, खिचड़ी में आटा मिला जाता है या बेसन?''

--- 00 ---

पता नहीं कितना वक्त हुआ है ओर मुझे नींद आ रही.......। दिनभर की सारी बातें गड्डमड्ड हो मन में बार-बार दुहरती हैं। उसके साथ जिा हर पल बार-बार दुहरता है मन में। मन को शांत करने के लिए मेडीटेशन भी कर चुकी मैं। अपेक्षाकृत अच्छा लग रहा है, पर नींद। विक्रम का ख्याल आता है। मेरा फोन अभी भी खराब है। आज सिध्दार्थ को बाहर से फोन करते वक्त सोचा था कि विक्रम को भी फोन कर लूं। मैं जानती हूं, वह किस हॉटेल में ठहरता है, नंबर भी है मेरे पास। पर फिर-पता नहीं क्यों? क्या मैं ऐसे मौकों पर घबराती हूं? अगर इन दिनों विक्रम यहां तोता तो क्या मैं सिध्दार्थ के साथ इस तरह घूम सकती? अगर विक्रम आकर पूछेगा कि मैंने उसे फोन क्यूं नहीं किया तो क्या कहूंगी मैं? कि सिध्दार्थ आ गया था, और.......और........मेरे पास समय नहीं था। या कि मैं घबराती थी......। तुम्हें क्या कहूंगी, यह सोचकर।

      'विक्रम।' मेरे होंठ कांपे। मेरा मन पछतावें से भर उठा। मेरी आंखें गीली  हो गई। मुझे फोन तो कर ही लेना था। अब? 'टेलीपेथी' बिजली की गति से मेरे मन में कौंधा......

'मानसिक संदेश'......अगर मैं विक्रम को भेजूं  िकवह जल्दी आ जाए तो क्या वह जान पाएगा? पकड़ पाएगा वह? वहां, जरूर पकड़ पाएगा? हर पल वह मुझे ही सोचता होगा--मेरा ही इंतजार करता होगा। मैं जानती हूं--सिर्फ मेरी आवाज सुनने के लिए कितना पागल रहता है वह? अगर वह जल्दी आ जाए और सिध्दार्थ से मिल ले एक बार। हां,, उसे मिलना ही है।

'टेलीपेथी' के संबंध में मैंने पूछा था सिध्दार्थ से.............'मानसिक संदेश' की प्रक्रिया के बारे में.....कि क्या हर व्यक्ति द्वारा यह संभव है?

उसने कहा था--मुस्कराते हुए--

''हर व्यक्ति सिध्द होता है मानसी। मात्रा के फर्क हो सकते हैं। 'चित्त की वृत्तियों के प्रति'-- किसी खास समय में, किसी खास वृत्ति के प्रति, सघनता का संकल्प ही सिध्दि है। मानसिक संदेश भेजने की मानसिकता हो यदि, और ग्रहण करने वाले के द्वारा, उस संदेश को ग्रहण करने की मानसिकता हो-तब यह संदेश अवश्य ही पहुंचेगा उस तक। प्रेम भी मानसिक संदेश ही है।''

''कैसे संभव होती है यह ?'' मैंने पूछा था।

''कैसे संभव होती है, यह उतना महत्तवपूर्ण नहीं हैं। संभव होती है, यह सत्य है। फिर भी मायर्स की धारणा है कि यह 'हमारी इंद्रिय शक्तियों से परे किसी अन्य शक्ति से संचालित होती है।' सिगमंड फ्रायड भी यही मानता है। प्रख्यात गणितज्ञ जे.बी. रायन इसे 'एक्स्ट्रा सेंसरी परसेप्शन' कहता है। दिक् और काल के प्रभाव से मुक्त है यह। परासायकॉलाजी की खोज का विषय। लेकिन क्या जरूरत है यह सब जानने की ?''

''जरूरत है सिध्दार्थ। तुम्हें क्या मालूम कितनी जरूरत है ? या शायद मालूम है तुम्हें-तुम मरे मुंह से सुनना चाहते हो। खैर परासायकॉलाजी का भी तो यही सब्जेक्ट मैटर है।''

''हां मानसी। टेलीपेथी, हेलुशिनेशंस, क्लेयरवायेन्स, एक्सोरसिज्म, स्टिगमाटा सबकुछ-बुध्दि के ही खेल हैं ये 'चाइल्डिश प्ले।' जब भी व्यक्ति 'बुध्दि के वास्तविक स्वरूप' को, उस 'अतिरिक्त' को जानने के लिए, आगे बढ़ता है - अटकता है यहीं पर-कहते हैं जानकार।''

''तुम्हारा क्या कहना है सिध्दार्थ ?''

वह हमेशा पहले दूसरों की बातें सामने रखता है। सबसे आखिर में अपनी-बहुत पूछने पर।

''मैं नहीं जानता कुछ। मुझे नहीं होते 'एपारिशंस' या 'स्टिगमाटा' या और कुछ।''

''मुझे हुआ है-'एपारिशन इसी बीच।' '' मैंने कहा तो वह हंस दिया।

''जो व्यक्ति अपने आपको जानने की दिशा में आगे बढ़ रहा हो-'एपीरिशन' या 'स्टिगमाटा', क्या अर्थ है इनका ? बाहर की यात्रा है यह। प्रेम की यात्रा। डिवोशन की यात्रा। ज्ञान की यात्रा नहीं है यह।''

''जब से तुमसे मिली हूं, बाहर की ही यात्रा कर रही हूं सिध्दार्थ। तुम्हारी यात्रा। प्रेम में हूं मैं। और ज्ञान में भी। प्रेम और ज्ञान में विरोध नहीं हैं सिध्दार्थ।''

''किसने कहा मानसी ? कहां है विरोध ? ज्ञान ही है, जो प्रेम को अर्थ प्रदान करता है।''

''इस आशय को कुछ बदलकर देखो सिध्दार्थ'' मैंने मुस्कुराते हुए कहा था।

''कैसे ?''

''प्रेम ही है, जो ज्ञान को सार्थकता देता है।''

''हम दोनों 'पाला' बदल चुके हैं शायद।'' उसने स्वर में कहा था।

''व्हाट ?''

'' 'पाला' बदल चुके हैं हम। 'यू स्पीकिंग इन मी। ऑय स्पीकिंग इन यू'''

''यही है सिध्दार्थ 'इम्पेथी''सेंबलेंस' भी यही है। यही है वह, जो 'स्टिगमाटा' को जन्म देता है। प्रश्न और उत्तर साथ-साथ।''

--00--

 

कैसे संभव होती है यह ? यह तो उसने बताया ही नहीं था। मुझे उसके 'पाला बदल चुके हैं हम' शब्द याद आए और मैं मुस्करा दी-क्या सचमुच ? क्या ऐसा संभव है ?

      उसने एक बार कहा था- 'मानसी, यू डाेंट नो, व्हाट यू आर।' वह तो खैर पागल है। पता नहीं कैसी-कैसी असंभव-सी कल्पनाएं कर लेता है वह, मेरे संबंध में। उसे मेरी सामर्थ्य पर इतना ज्यादा भरोसा है कि मुझे कभी नहीं रहा। कुछ भी करते समय पहले यही सोचती हूं, क्या मैं कर सकूंगी ? वह तो एक पल में कह देता है- तुम कर सकोगी मानसी, तुम्हीं कर सकोगी।

      मैंने उससे कहा भी था-'तुम मुझे पता नहीं क्या-क्या समझते हो सिध्दार्थ और मुझे डर लगता है.........। मैं तो कुछ भी नहीं जानती।'

''तुम जानती हो मानसी।'' उसने बेहद विश्वास के साथ कहा था-

''फर्क सिर्फ इतना है कि तुम नहीं जानती कि तुम जानती हो।''

कितना अजीब लगा था यह सुनकर। मैं क्या नहीं जानती, क्या जानती हूं ? और जो नहीं जानती कि मैं जानती हूं, वह कैसे जानूंगी ?

उससे कहो तो वह कहेगा-'लेट द टाइम कम मानसी। लेट द टाइम कम।'

कितने सारे सवालों के जवाब वह नहीं देता। मैं जानती हूं, वह जानता है। कभी-कभी लगता है, उपनिषदों के ऋषियों की तरह वह कहीं मेरी अपात्रता देखकर चुप रहता हो ? हो सकता है। पर फिर यह क्यों कहता है - तुम ये हो कि तुम वो हो।

'उसने प्रेम किया है मानसी, और प्रेम में।' छोड़ो-मैंने खुद को बरजा-अभी वह सब नहीं सोचना। अभी मुझे विक्रम को बुलाना है-टेलीपेथी से-कैसे ? कैसे क्या ? मैं बैठ जाती हूं- एकाग्रचित होकर और भेजती हूं उसे मानसिक संदेश.......। कैसे नहीं होगा कुछ, होगा जरूर, मैं जानती हूं। जब हमारे बिना कुछ कहे हमारे सामने बैठा व्यक्ति हमारी सोच को पकड़ लेता है तो विक्रम कैसे नहीं जानेगा ? उसने मुझे ही तो जाना है आज तक।      

       जया जादवानी
 अगस्त 13, 2007

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