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कैसा अवसर
?

नानाजी का स्वर्गवास हो गया। उम्र करीब 70 वर्ष थी। लगभग स्वस्थ ही थे। सुबह-शाम खेतों में खूब टहलते थे। लेकिन माटी के इस शरीर की क्या निश्चितता ? आज है, कल नहीं। दिल का हल्का दौरा पड़ा। बस, पल भर में सब खत्म हो गया!

नानाजी का परिवार दूर-दूर तक फैला था। बेटे-बहुएं, बेटियां-दामाद, नाती-नतिनी, पोते-पोतियां। सभी बड़े शहरों या फिर विदेशों में जा बसे थे। गांव आने का और एक-दूसरे से मिलने का अवसर उन्हें विरले ही मिलता था।

संदेश के कई सुलभ माध्यमों के इस युग में पल भर में ही सभी को इस दुखद समाचार की सूचना हो गई। जो नजदीक थे, वे दाह-संस्कार में सम्मिलित हो गए। बाद में धीरे-धीरे सभी आने लगे। बड़ा शोक का माहौल था। श्राध्द के दिन तक सभी आ गए। इस बीच शोक का वातावरण भी कमजोर पड़ने लगा। श्राध्द कर्म सम्पन्न हुआ। फिर सभी कुछ सामान्य सा दिखने लगा। बेटियां पिता को भूल अपना-अपना दु:ख-सुख बतियाने लगीं। बेटे भी आपस में एक-दूसरे का हाल-चाल लेने लगे। घर की बहुएं आपस में गप्पें लड़ाने में मशगूल हो गईं थीं। सभी बहुत दिन बाद जो मिले थे। सबसे छोटी बेटी की शादी में बहुत से रिश्तेदार नहीं आ पाए थे। उन्हें घर के नए दामाद से मिलवाया जा रहा था। एक बेटे ने विदेश में ही शादी कर ली थी। एंग्लो इंडियन बहू से मिलने में सभी बड़ा आनन्द आ रहा था। बच्चों की तो चांदी ही हो गई थी। खूब शोर-शराबा और हुड़दंग मच रहा था। तेरह दिन पहले जो शोक के बादल थे, अब कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे।

एक दिन जब सभी इकट्ठे बैठे थे तो बड़ी बहू ने प्रसन्न होकर कहा, '' हम सभी एक-दूसरे से मिलने के लिए तरस कर रह गए थे। चलो, बड़ा अच्छा रहा। हम सभी एक-दूसरे से मिल पाए। फिर न जाने कब मिलना हो। ''

उधर नानीजी एक कमरे में नानाजी की तस्वीर के सामने उदास बैठी थीं। वे बड़ी किंकरत्तव्यविमूढ़ थीं। वे समझ नहीं पा रही थीं कि वे दुखी रहें या बच्चों को खुश देखर उनका साथ दें।  

जब किसी के निधन पर हम सभी इकट्ठे होते हैं तो कोई-न-कोई यह टिप्पणी जरूर कर देता है कि चलो इसी बहाने हम सभी को आपस में मिलने का बहाना तो मिला। यह टिप्पणी बहुत बुरी होती है। हम यह भूल जाते हैं कि हम आपस मिल तो रहे हैं मगर कोई हमारा अपना हमसे हमेशा के लिए बिछुड़ गया है। ऐसी टिप्पणी हमारे स्वार्थी होने का द्योतक है और हमें उस दिवंगत के प्रति कृतघ्न भी साबित कर देता है, जो कल तक हमारा सब कुछ था और हमारे लिए बहुत कुछ सोचता और करता था।

श्री एम. के. वर्मा


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