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पतझड़ इधर भी, उधर भी

दिल्ली से चण्डीगढ़ आईएसबीटी में वे ठीक वक्त पर पहुंच गये थे। रात नौ बजे। तोशी से उनका संपर्क सात बजे हुआ था। तब वे करनाल और अम्बाला के बीच किसी जगह पर थे। 'पापा आप बस स्टैण्ड पहुंचो। वहीं मिलूंगा।'     

बस अड्डे पर सवारियों की ज्यादा भीड़ नहीं थी। रात के वक्त यूं तो यह बस अड्डा जीवन्त रहता है। दिन के वनिस्वत ज़ाहिरा तौर पर यात्रियों की आमदोरफ़त कम हो जाती है। वायदे के मुताबिक तोशी को बस स्टैण्ड में न पाकर उनका तनावग्रस्त होना लाज़मी था। 'अजीब शख्स है। कहां रह गया ? तोशी के मोबाइल पर वे बार-बार सम्पर्क करने का प्रयास कर रहे थे। रिंग के बावजूद दूसरी तरफ से कोई रिस्पांस नहीं। इस बीच कंधे पर एयर बैग लटकाए वे बस अड्डे के दो चक्कर लगा आए थे। बेमतलब से। दिल्ली से चण्डीगढ़ के पांच घंटे के उस ऊबाऊ सफर में वे पूरी तरह पस्त हो चुके थे। उस पर बरखुर्दार का नादारद होना उनकी सहनशीलता को चुनौती दे रहा था। बेहतर होता ग़र उस मरदूद से उनका सम्पर्क न हुआ होता। सीधी बस लेकर घर पहुंच जाते।

घोर निराशा, असमंजस के आलम में सीमेन्ट के काले बैंच पर एक कोना तलाशकर बैठ गये। सोचा क्यों न चाय पी जाए। हो सकता है तोशी पापा की तलाश में पहुंच ही जाए। उन्होंने टीबैग चाय का डिस्पोजेबल कप लिया और पुन: बैंच पर बैठ गये। बोरियत और कैफियत को कुछ हद तक कम करने की वह नाकाम सी कोशिश थी। इस दरम्यान वे कई दफा बेटे के मोबाइल ट्राई कर चुके थे।

क्या वजह हो सकती है। तोशी स्कूटर लेकर आने वाला था। कहीं कोई .... अपशकुन की आशंका ने उन्हें कुछ क्षणों के लिए जकड़ लिया। लगा वे जड़वत से होते जा रहे हैं। पत्नी को फोन मिलाया। रूआंसा स्वर में उससे सूरते हाल सांझा किया। 'हो सकता है कि गलती से उसने मोबाइल साइलेन्ट मोड पर रख दिया हो।' पत्नी ने ढाढंस बांधने का यत्न किया।

'अजीब बात कर रही हो तुम। वो तो मुझे यहां लेने आने वाला था। उसके घर का  पता भी मुझे मालूम नहीं है। किसी डायरी में लिखा था। हां याद आया नीली डायरी। स्टडी में होगी। मेज पर। देखो, ढूंढो शायद मिल जाए।

'क्या जरूरत है? कोई बस पकड़ कर घर पहुंच जाओ। रात के ग्यारह बज रहे हैं। मोहाली में भी तो कई सैक्टर हैं। न जाने कहां रहता होगा?

'अरे भई उसके न पहुंचने के पीछे क्या वजह हो सकती है? इसकी मालूमात जरूरी है। मैं तो किसी अनहोनी की आशंका से परेशान हूं। हौल उठ रहे हैं दिल में।' उन्होंने पत्नी को तनावग्रस्त कर दिया। वह भी रात भर फिकर में घुलती रहेगी।

'जैसा ठीक समझो। करो। तुमने तो मुझे भी डिस्टर्व कर दिया। अब रात भर नींद नहीं आएगी। बीवी ने फोन पटक दिया।' सोने की चिन्ता है बस। वे यहां बस स्टैण्ड में गर्मी, उमस को बर्दाशत कर पसीना पसीना हुए जा रहे हैं। नाइट बसों में आपने अपने गन्तव्य पर पहुंचने वाले यात्रियों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। लगता है रात बैंच पर ही बैठे-बैठे गुजारनी पड़ेगी। उन्हें नींद की झपकी आने लगी तो बैंच पर बैठी एक अधेड़ महिला के कंधे पर उनका सिर लुढ़क गया। महिला सकपका गई। यकीनन उसे अटपटा लगा होगा। आखिर ये बढ़ऊ क्यों लुढ़का जा रहा है उस पर। 'भाई साहब। ठीक से बैठिए।'

'ओह! मुआफ कीजिएगा। नींद आ गई थी।' महिला के प्रति वे याचनाभाव से देखने लगे। इसी बीच मोबाइल घनघना उठा। तोशी का होगा। उनके चेहरे पर उम्मीद, उत्सुकता के मिश्रित भाव उभरे। स्क्रीन पर फोन नम्बर देखकर उत्साह की वह क्षीण सी किरण बुझ सी गई। 'लिखो पता।' पत्नी का स्वर था। जेब से पेन निकाला और तुड़ी मुड़ी मुरझाई सी अखबार के किनारे पर मोहाली में बेटे के घर का पता नोट करने लगे। क्या करूं? पौने बारह बज रहे हैं। यह उसकी डयूटी का वक्त होता है। खुदा जाने ।घर मिलेगा या नहीं।

'अजीब हो तुम। कोई तो होगा वहां। ऑटो लेकर जाओ। जान सांसत में अटकी रहेगी। घर पहुंच कर उसकी कुशलक्षेम तो पता चलेगी। वरना मैं यहां और तुम बस अड्डे पर बैठे बैठे चिन्ता में सूखते रहोगे।

ठीक ही तो कह रही है पत्नी। उसका मशवरा मान लेना चाहिए। क्या है मां बाप के प्रति औलाद का फर्ज़? शिट! कोई संवेदना नहीं। आत्मा मर चुकी है इस पीढ़ी की। साले को पाल पोस कर बड़ा किया। बाप के प्रति कतई लापरवाह। वे गर्मी में रात भर सड़ते रहें बैंच पर उसकी प्रतीक्षा में। यही उनकी नीयति है? फिर उनकी ही क्यों देश के लाखों करोड़ों बुज़ुर्गों के यही हालात हैं। लावारिसों की मानिन्द वे हर पल मरते रहते हैं। भीतर ही भीतर। मौन हाहाकार के समन्दर को दिल में समेटे।

इस बीच दो चक्कर हिमाचल रोड़वेज़ इन्क्वायरी के काट आए थे। एडवांस बुकिंग सायं छह बजे तक थी। दिल्ली व अन्य स्थानों से चण्डीगढ़ से होकर धर्मशाला जाने वाली बसों की समय सारणी की पूछताछ कर चुके थे। उन्हें बताया गया था कि टूरिस्ट सीज़न में डीलक्स भी अमूमन भरकर आती हैं। भीड़ भड़के में सीट मिलना मुश्किल है। ऐसे में क्या वे सवारियों की भीड़ से भिड़ पाएंगे?

बैंच पर बैठे-बैठे उनकी रीढ़ में मिर्गी सी भरने लगी थी।

गर्म हवा के थपेड़ों से हिम्मत टूटने लगी थी। जीवटता की संघर्ष गाथा में बेटे के प्रति वह मोहभंग का मंजर था। तोशी का यूं उन्हें लाचार छोड़ देना उन्हें अपनी गरिमा की ठेस लगा।

पांच दशक पुराना वह बस स्टैण्ड उन मुश्किल क्षणों में उन्हें सुलगते चूल्हे सा लगा। बसों की आवाजाही ने आईएसबीटी के समूचे परिसर को गाढ़े धूप की गिरफ्त में ले लिया था। फिज़ां में तारी धूप, धूल के कण किरचें बन उनकी आंखों को शूल सा चुभो रही थीं। ताऊम्र जिज़ीविषा के संघर्ष से वे जूझते रहे थे। मगर ऐसी असहाय सी स्थिति में उन्होंने खुद को शायद पहली दफा घिरा हुआ पाया था।

किसी तरह उन्होंने खुद को मानसिक रूप से तैयार किया और ऑटो रिक्शा लेकर निकल पड़े। चण्डीगढ़ की सुनसान सड़कों पर। नयी किस्म के भय ने उन्हें जकड़ किया था। कहीं ऑटो वाला रामपुरिया निकाल कर उन्हें लूट ही न ले। यूं भी तो वे असक्त ही हैं।

'बेटा, ठीक जगह पहुंच देना। रात का वक्त है मकान ढूढने में मुझे दिक्कत होगी।' आश्वस्त होने के लिए ऑटो वाले को बातों में लगाए रखना उन्हें उचित जान पड़ा। 'अंकल जी तुसीं फिकर न करो। तुहाड़े ठिकाणे पहुंचाना मेरी डयूटी है।'

ठिकाणे पहुचाणा। क्या कर रहा है ये ऑटो वाला? उनका डर और ज्यादा गहरा गया। ठिकाणे का क्या अर्थ हो सकता है? द्विअर्थी जबाव। इसका इरादा कहीं लूटपाट का तो नहीं। उनका व्यक्तित्व पहनावा व बातचीत सम्पन्नता के सूचक थे। सवारी के पैसे पर आटो वालों की निगाह रहती है। मौका मिला नहीं कि दबोच लिया नि:सहाय सवारी को। उनकी काहिली आटोरिक्शा के लिये परेशानी का सबब बनती जा रही थी। 'अंकल जी फेज़ फाइव बहुत दूर है। बेरका चौक के पास।'

आधा घण्टे की मशक्कत के बाद वे पत्नी के नोट कराए पते पर पहुंच गये थे। मगर मकान सही है या नहीं उसकी पुष्टि शेष थी।

'बेटा तू इक मिनट वास्ते रूक। पता करके आता हूं।'

'नौ सौ पचासी। यही है, अंकल जी। फिर भी तूसीं चेक कर लओ।' प्रथम तल पर पहुंच कर उन्होंने काल बैल पर उंगली दबाई। एक लड़का प्रकट हुआ।

'तोशी यहीं रहता है। क्या?'

'हूं। आप कौण?'

मैं उसका डैडी। बुझे से स्वर में बमुश्किल उनके मुंह से निकला।

'ओह अंकल आप। आइए आइए। तोशी घर पर ही है। ठीक है मैं ऑटो वाले को पैसे देकर आता हूं।

तो घर पर ही है, उनका लाड़ला। मन हुआ मिलते ही झापड़ रसीद दे उस मरदूद पर।

सवा बारह। वे बुत की तरह दहलीज़ पर खड़े रहे।

'तोशी उठ यार। तेरे डैडी आए हैं।'

'उन्हें लगा तोशी का दोस्त किसी अधमरे व्यक्ति को जबरन उठने के लिए कर रहा हो। कहीं वह ड्रग एडिक्ट तो नहीं है? ड्रग्स की लत तो आम है। क्या तोशी भी..... नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता। ड्रग्स लेने वाला व्यक्ति कॉल सैन्टर की नौकरी नहीं कर सकता। यह जॉब तो हर वक्त सतर्क, मुस्तैद रहने वाला आदमी ही कर सकता है। कम्प्यूटर पर आंख गड़ाए। कानों पर चिपका इयर फोन। प्रत्येक नये कॉलर की आवाज़ की प्रतीक्षा में। वे खामखाह तोशी पर शक कर रहे हैं। दो बड़े कमरे। फर्श पर मारबल। छतों पर प्लास्टर ऑफ पेरिस के डिजाइन। दीवारों पर हलका पीला कम्प्यूटर मिश्रित रंग। अलमारियों में उत्ताम दर्जे का बुडवर्क। किन्तु दोनों कमरे स्कूली बेग साजो सामान के नामपर कुछ था तो फर्श पर पतली सी तलाइयां बिछी हुईं। उन पर पुरानी मैली व पतली चदरें। पतले तकिए का गिलाफ तो महीनों से न धोया हो। कहीं कोई एक अदद कुर्सी तक नहीं। बेड नहीं। तिपाई तक नहीं। एक कमरे के छत्ता पर छोटा सा कॉफी रंग का पंखा। बेपनाह गर्मी से लड़ते भिड़ते में नाकाम। दूसरे कमरे में बिछी तलाई के करीब एक मिनी टेबुल फैन।

'अंकल बैठिए।' तोशी के रूममेट ने उन्हें तलाई पर बैठने का आग्रह किया। बेहतर होता वे आटोवाले को रोक लेते। तोशी की कुशलता लौट जाते। उस फर्श पर वे कैसे सोएंगे? रात भर कलपते रहेंगे। अब वे विकल्प हीन थे। बस अड्डे तक लौट पाना नमुमकिन।

बैग कंधे से उतार कर उन्होंने कमरे के एक कोने में रख दिया। बूट उतार कर बैग के करीब टिका दिए। फिर दीवार पर पीठ की टेक लगाकर तलाई के एक कोने में बैठ गये।

ओह गॉड। हॉरिबल।

अंकल पानी। तोशी का रूममेट उन्हें गिलास पकड़ा गया। अंकल चाय लेंगे?

नहीं।

उन्हें लगा वे किसी गलत जगह पर आ गये हैं। इस कमरे में और बस स्टैण्ड की उस सीमेन्ट की बैंच में क्या फर्क है? फिर उन्हें लगा कि वे किसी रेलवे प्लेटफार्म पर हों। ठीक उसी प्रकार जैसे ट्रेन की प्रतीक्षा में यात्री बैंचों पर जगह न पाकर आपने शरीर को कभी किसी बिजली के खम्बे टी स्टाल की दीवार या फिर पार्सल की बोरियों या डिब्बों से टिका लेते हैं।

उनींदां रहने के कारण वे बेहाल हुए जा रहे थे। कभी भी लुढ़क सकते हैं। शरीर से रक्त निचोड़ लिया है मानों। पैर पर हलका सा स्पर्श पाकर उनकी तन्द्रा भंग हुई। सामने तोशी था। आंखों में लाल डोरे लिए हुए।

'पापा। आई एम सॉरी। दिन में दो बजे तक ओवरटाइम किया था। आपको फोन करने के बाद नींद आ गई। ना तो फोन सुन सका, ना ही बस स्टैण्ड पहुंच पाया। आई एम एक्सट्रीमली सॉरी।'

आक्रोश का जलजला दबाए हुए थे वे भीतर। लावा फूट पड़ने के लिए खदबदा रहा था। बेरहम, बेहया, नाशुक्रा, एहसान फरामोश। कितनी ही लानते भेज दीं उन्होंने तोशी के लिए। बाप के प्रति इस कदर बेरूखी, बेअदबी और बेकद्री। सबक सिखा कर रहूंगा साले को। उत्तार आधुनिकता में पली पीढ़ी ने मनुष्य से कितना कुछ छीन लिया है। प्यार, सहजता, संवेदना। बुज़ुर्गों के प्रति घोर असंपृक्तता का भाव।

अगर वे नींद के आगोश में दीवार से न सटे होते तो शायद तोशी की कॉलर खींचकर उसका हुलिया बिगाड़ चुके होते।

नहा धोकर तोशी उनके सामने था।

पापा मैं जा रहा हूं। मैक्सी कैब आ गई है। मैं डयूटी पर जा रहा हूं। रात एक बजे की शिफ्ट है। सुबह दस बजे आऊंगा। आप आराम से सो जाएं।

तुशार चला गया। उसे यह पूछने का वक्त नहीं था कि उन्होंने कुछ खाया है या भूखे हैं। कैसी औलाद है? उसके इन्तजार में घण्टों बस अड्डे पर सूखते रहे। एक अदद चाय के सिवा कुछ भी तो नहीं खा पाये थे। भूख से पेट में बुलबुलाहट हो रही थी। भूखे पेट तो नींद भी नहीं आएगी।

तोशी का रूममेट चाय व बिस्कुट रख गया था।

'बेटा, तोशी क्या भूखे ही चला गया डयूटी पर?'

'नहीं अंकल। उसने आठ बजे खा लिया था। दाल-चावल बनाए थे हमने। सुबह काल सैंटर की कैन्टीन में नाश्ता कर लेगा। आपने शायद कुछ खाया नहीं। बना दूं कुछ, पुलाव?'

नहीं, वो मैंने बस स्टैण्ड पर ही खा लिया था। तुम आराम करो। मैं भी सो रहा हूं। थकान से बुरा हाल है। कितनी सफाई से झूठ को सच में बदल दिया था उन्होंने।

'ओके अंकल। गुड नाइट।'

'गुड नाइट बेटे।'

कॉल सैंटर की नौकरी ने तुशार को निचोड़ लिया है। ऑड वर्किंग आवर्स । कम्प्यूटर स्क्रीन पर टिकी आंखें। हिलना डुलना भी मुश्किल। कानों में दर्द की शिकायत। याद है दो माह पूर्व एक कान में परफोरेशन की शिकायत लेकर आया था। हफतों हस्पताल में ई.एन.टी. के चक्कर काटकाट कर परेशान हो गये थे वे। छह महीने बाद भरा था जख्म। इस जाब का बुरा असर पहले कानों पर ही होता है। सर्वेक्षण बताते हैं कि श्रवण ग्रन्थि सर्वाधिक प्रभावित होती हैं। कितनी दफा समझा चुके हैं, 'बेटा छोड़ दे ये नौकरी। तेरी शक्ल देखकर लगता है, कई सालों से बीमार हो। सेहत गिर रही है। ना दिन का पता है न रात का। सोषल लाइफ तो षून्य। खाने, सोने उठने या फिर किसी भी स्वाभाविक क्रिया का कोई वक्त नहीं। हर वक्त अव्यवस्थित।

मां बाप की नसीहतें बेअसर रहतीं। हलकी सी मुस्कान बिखेर कर सब कुछ सम्प्रेषित कर जाता तुषार।

कभी कभी वीकएण्ड में घर आता है। महीने दो महीने में। सुबह सबेरे रात की बस से पहुंचता। दो दिन सोते रहने के बाद लौटने की व्यग्रता। बस के आठ घंटे के सफर के बाद वक्त पर पहुंचने का तनावा मैक्सी कैब से पहले पहुंचना जरूरी है। क्या करूं पापा। रात एक बजे डयूटी शुरू होती है। बारह बजे तक चण्डीगढ़ पहुंचना जरूरी है। पिकअप वैन छूट गई तो गड़बड़ हो जाएगी। पूर्व अनुमति के बग़ैर  अवकाश ग्रहण करना कॉल सैन्टर की व्यवस्था में व्यवधान पैदा करता है। फ्लोर मैनेजर का चिड़चिड़ापन। व्यवहार में कटुता। उसकी नश्तरनुमा निगाहें उसे भीतर गहरे तक बेध जाती हैं। अक्सर अवसाद के क्षणों में वह टूटने लगता है। खुद से उलझने लगता है। नौकरी छोड़कर दूर कहीं भाग जाने का विचार दिलो दिमाग पर हावी होने लगता है। कॉल सैन्टर की कितनी ही नौकरियां छोड़ चुका इन आठ सालों में।

कॉफी देर तक वह उस बोसीदा, दुर्गन्ध से लबरेज तलाई पर लेटे लेटे पंखे को निहारते रहे। पंखा अपनी ताकत खो चुका था। उस सूने कमरे में केवलमात्र पंखा था जिसे देखते रहना उनकी मजबूरी थी। उनकी नजर सीधे पंखे पर थी। नीचे आ पाती तो आंखें बंद कर लेते। तय था कि आज की रात तो आंखों में ही कटेगी। उनके भीतर सूनापन उन चरागाहों की मानिन्द बिछता जा रहा था जो शिशिर में अपनी हरियाली गंवा बैठती है। क्या सचमुच वे पतझड़ की दहलीज़ पर हैं?

रात भर जठराग्नि से जूझने की वजह से वे प्रात: जगते ही खुद को असामान्य सा महसूस करने लगे। हल्के से तप्ता शरीर बुखार। पैरासिटामोल टेबलेट लेनी होगी।

चाय की तलव सताने लगी। तोशी तो दस बजे लौटेगा। रसोई में उलट पलट कर देखा। दूध नहीं था। चीनी पती का भी कोई अता पता नहीं। सोचा कालोनी में किसी चाय वाले की तलाश की जाए। दूर दूर तक कोई चायवाला नहीं। ढाबा तो मार्केट में होगा। चाय की तलाश में मकानों की भूल भुलैया में न खो जाएं। दो फर्लांग तक भटकने के उपरान्त पुन: लौट आए।

सवा दस बजे तोशी लौटा। रात बारह बजे सज धज कर अपटूडेट होकर गया था। विदेशी सेन्ट का छिड़काव किया था। सुबह लौटा तो लस्त पस्त। चेहरे पर मुर्दनी। आंखों में लाल डोरे। रक्तदान कर लौटा हो जैसे। हाथ में दूध, ब्रैड, मक्खन, अंडे का पॉलीथीन।

'नहा लिये क्या? ब्रेकफास्ट बनाऊं क्या?'

'बेटा ये नौकरी तेरी सेहत को तबाह कर रही है। वाई डॉन्ट यू अन्डरस्टैण्ड?'

फिर वही अधखिली मुस्कान। भीतर दबे दर्द को शिद्दत से बयां करती।

ब्रेकफास्ट से तृप्त हुए। वे चाहते थे कि तोशी अपना मन खोले। उसकी चुप्पी उन्हें अखर रही थी। अन्तर्मुखी होने का यह अर्थ तो नहीं कि संवाद की तिलांजलि दे डालो। क्या कॉल सेन्टर की वह जानलेवा सी नौकरी ही उसका स्थायी कैरियर है? कहीं और कोशिश क्यों नहीं करता। दर्जनों बार वे उससे सिर खपा चुके हैं। कोई मनचाहा प्रोफैशनल कोर्स  ज्वाइन कर ले। उनके परामर्श को वह हमेशा ही ठुकराता आया है। कैरियर को लेकर तोशी उन्हें कभी भी गंभीर नहीं लगा। घर मां बाप के प्रति उसका अवज्ञा भाव उन्हें सालों साल से विचलित करता रहा है।

वी.के. भटनागर। यही नाम था उनका। कोई भी सूत्र उनके हाथ नहीं आ रहा था। 

एक खास मकसद उन्हें नौनिहाल के पास खींच लाया था। उन्हें यकीन था तोशी को कॉल सेन्टर की नौकरी से इस्तीफा देने के लिए राज़ी कर लेंगे। भिड़ जाएंगे। डट जाएंगे। पर यह महज़ उनका भ्रम था। वह किसी भी कीमत पर अपने पैरों पर खड़े रहना चाहता है। बाप के टुकड़े पर पलना उसे कतई गंवारा नहीं। नतीजन, तोशी उन्हें संवाद का कोई भी सिरा पकड़ने का मौका नहीं दे रहा था। कॉल सेन्टर की नौकरी। उफ। अन्तहीन जद्दोज़हद। कशमकश। कैरियर और हैल्थ के मध्य एक मौन जंग। शरीर की किसे सुध। जब तक चुस्त दुरस्त है, इस्तेमाल करते जाओ। व्यक्ति हाड मांस का पुतला न होकर जैसे एक प्रॉडक्ट में तबदील हो चुका हो। बीपी ओज़ की उपभोक्ता संस्कृति ने युवा खिलखिलाते लड़के लड़कियों को उत्पाद में कदल दिया। मल्टीनेशनल कम्पनियां उनकी मेधा का भरपूर दोहन कर रही हैं। तुषार भी तो उसी संघर्ष और व्यवस्था के भयावह दौर का एक पात्र है। आदमी है या रोबेट। कम्प्यूटर की नित नई तकनीक ने मनुश्य की नैसर्गिक क्रियाकलापों, सूक्ष्म ध्वनियों, सिंफनियों को समाप्त कर उसकी मेधा को अपने हाथ में ले लिया है। शायद वह दिन दूर नहीं जब मनुश्य का हर काम रोबोट करेगा। मनुश्य तब सचमुच निहत्था होकर रह जाएगा। 

वी.के. भटनागर यह बात अच्छी तरह समझ चुके थे कि उनका लाडला उन्हें एल्यूड कर रहा है। उनके बीच वार्तालाप के छोटे-छोटे टुकड़े थे। वास्तविक रूप में मौन का नुकीला सा टुकड़ा उनके व तुषार के बीच चुपके से पसर गया था। उस नीम खामोशी ने उन्हें बेचैन सा कर दिया था। तोशी और उनके मध्य निस्तब्धता की एक ऐसी स्याह सुरंग है जिसके कोनों पर कोहरे की परतें जम चुकी हैं। आखिर कोहरा कब छंटेगा। इसी उधेड़ बुन में उनकी मनोदशा उत्तारोतर बिगड़ती जा रही थी।  

वे दिन भर चण्डीगढ़ की सड़कों की खाक छानते रहे। कुछ दोस्तों को मिले। पुरानी यादें ताज़ा कीं। सैक्टर सत्रह की मार्किट में घूमे। सोचा तोशी के लिए कुछ खरीद लें। तोशी का कमरा भी तो उसी की तरह खामोश है। ना टीवी सेट ना ही रेडियो टेपरिकॉर्डर। कुछ दुकानों के चक्कर लगाने के बाद उन्हें एक छोटा सा थ्री इन वन पसन्द आया। एफ.एम., टेपरिकॉर्डर और ऑडियो सीडी प्लेयर। यूं भी तोशी अच्छे संगीत का शौकीन है। वह छोटा सा उपहार पाकर खुश होगा। कमरे की तो नींद टूटेगी। 'ये क्या है? '
'
खोल कर देख ले। तेरे लिये लाया हूं। अरे पापा। आप भी। मालूम नहीं क्या उठा लाए?'
सोच रहे थे
, तुषार वह उपहार पाकर खुश होगा। उनका शुक्रिया अदा करेगा। मगर उसके खुश्क मिज़ाज रवइये ने उन्हें निराश किया।
'
थ्री इन वन है। तू तो संगीत का शौकीन है।
'
वो तो ठीक है बट....।'
'
पसन्द न हो तो कोई बात नहीं। रखे रख यहां। अगली बार आऊंगा तो ले जाऊंगा।'
किसी तरह वे गुस्से को ज़ब्त कर गये। उनका दिल तो कह रहा था कि उस डिब्बे को उठाकर सड़क पर पटक दे। नालायक। नाशुक्रा। बाप की भावनाओं की कोई कद्र नहीं।

'खाना तो खाओगे न...।' तोशी ने सहज भाव से पूछा किन्तु उन्हें उसकी टोन चुभी। नहीं बना सकता तो कोई बात नहीं। बाहर खा लूंगा।
नहीं
, वो बात नहीं। हम बना रहे हैं। नहा धोकर फ्रैश हो लें। डिनर के बाद स्कूटर पर छोड़ दूंगा बस स्टैण्ड।'
'
ठीक है।' वे पुन: फर्श पर बैठ गये। दीवार के सहारे पीठ टिकाकर। वक्त कटे तो कैसे?
'
क्या खाओगे?'
'
कुछ भी। जो तुम खाओगे।
'
रात को हम एक ही चीज़ बनाते हैं। मोस्टली दाल चावल। दही ले आता हूं मार्किट से।'
मार्किट जा रहा है तो शिमला मिर्च ले आना। आलू शिमला मिर्च बना ले। एक दाल बना लेना मुंगी की। मगर अपनी सहूलियत देख लो। अरे हां तेरे लिये आम लाया था। फ्रिज में रखे हैं और हां
, ये ले पैसे। एक बीयर ले आना।
'
रहने दो। मैं ले आऊंगा।'

वे नहा धोकर फ्रैश हुए और तोशी के ज़ल्द लौटने की प्रतीक्षा करने लगे। वक्त कटे तो कैसे? अखबार उलटने पलटने लगे। संपादकीय पृष्ठ पर छपे एक लेख पर उनकी निगाह टिक गयी। लेख बीपीओज़ के कुप्रभावों को केन्द्र में रखकर लिखा गया  था।

'अरे वाह! गजब का लेख है।' खुद से ही बतियाने लगे वे। तोशी को पढ़ाता हूं इसे। शायद कुछ असर हो। पर पहले खुद तो पढ़ लें। वे यह सोचकर आश्वस्त हुए कि तोशी की नौकरी को लेकर उनकी चिन्ता आधारहीन नहीं थी। वह भी तो उसी व्यवस्था का शिकार हो रहा था, जिसमें लाखों लड़के लड़कियां गुलामी के माहौल में सांस लेने के लिए अभिशप्त थे।

लेख में काल सेन्टर्स में काम करने वाले युवा लड़के-लड़कियों के विषय में एक सर्वेक्षण के आधार पर टिप्पणी की गई थी। सर्वेक्षण एसोशिएटड चैम्बरस ऑफ कामर्स एण्ड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया ने किया था। रिपोर्ट को वे एकाग्र होकर पढ़ने लगे। ज्यों ज्यों वे लेख की पंक्तियां से गुजरते गये, उनका तनाव बढ़ने लगा। कॉल सैेन्टरस में काम करने वाले लड़के-लड़कियों का स्वास्थ्य गिर रहा है। उनमें सिरदर्द, अपच, अनिद्रा की शिकायतें आम हैं। उच्च रक्तचाप, तनाव सामान्य रोग हैं। ऐसे संस्थानों की थकाऊ व उबाऊ रात्रि सेवाएं बीमारियों का पिटारा लेकर आई हैं। ऑऊट सोर्सिंग करने वाली कंपनियों ने युवावस्था की महक से लबरेज़ लड़के लड़कियों  का सुख चैन छीन लिया है। वे अपने परिवार से भावनात्मक दूरी महसूस कर रहे हैं।

रिपोर्ट के एक एक शब्द को वे तन्मयता से पढ़ते जा रहे थे। मानों उन्हें उस विषय पर कोई प्रस्ताव लिखना हो, या फिर अभिभाषण तैयार करना हो। रिपोर्ट में बताया गया था कि काल सेन्टरस में काम करने वाले 30 प्रतिशत व्यक्तियों की पीठ में दर्द रहता है। यही नहीं 37.5 प्रतिशत महिलाओं में तनाव के लक्षण पाये गये। 45 प्रतिशत महिलाएं थकान से पीड़ित रहती हैं तो 45 प्रतिशत सांस लेने की तकलीफ से पीड़ित रहती हैं। सोने और जगने की स्वभाविक प्रक्रिया में व्यवधान पड़ता है। यह एक निर्विवाद सत्य है कि कॉल सेन्टरस की सेवाएं प्रकृति के विरूध्द हैं। यानी रात को जगो और दिन में आराम करो। सर्वे के मुताबिक रात भर जगने के कारण्ा दिन के वक्त शरीर में हारमोन्स और रसायनों का उत्सर्जन होता है। किन्तु रात के वक्त ये अंग स्वाभाविक उत्सर्जन नहीं कर पाते। कारण, वे आराम की मुद्रा में आ जाते हैं। ज़ाहिर है ऐसे में हारमोन्स और रसायनों का सन्तुलन बिगड़ जाता है।

वीके भटनागर को लगा सर्वेक्षण रिपोर्ट में तोशी का चेहरा घुलमिल सा गया है। तोशी कितने ही सालों से कॉल सेन्टरस की खाक छान रहा है। चण्डीगढ़, मोहाली, नोयडा, मुम्बई से लेकर बंगलूर तक की यात्राएं कर चुका है। महीना, दो महीने, छह महीने, ज्यादा से ज्यादा एक साल। कुछ हफतों में उसका शरीर जबाव लगता है। जब इन्तिहा हो जाती है तो नौकरी से त्यागपत्र। पुन: नई नौकरी की तलाश के वास्ते। दिन रात साइबर कैफे में नेट लॉगिंग। प्लेसमेंट ऐजैसिंयों के दफतरों के अन्तहीन चक्कर। नये नियुक्ति पत्र। नई जगहों पर ज्वाइन करने एडजस्ट करने, आवास व खानपान की समस्या से जूझने का जनून।

तोशी संगमरमर के फर्श पर गिलास और बीयर की बोतल रख गया। 
'
बेटा सुनो। वक्त मिले तो यह रिपोर्ट जरूर पढ़ना। इटस एन आई ओपनर।'
'
किस बारे में है ?'
पढ़ लेना। पता चल जाएगा खुद व खुद।

तोशी ने रिपोर्ट के शीर्षक पर सरसरी नजर फेंकी। 'पापा ये सब छपता रहता है। नो बडी टेक्स सच रिपोर्टस सीरियसली?'
'
हैल्थ इज़ इम्पोर्टटेंट ऑर जॉब?'
'
जॉब। हू केयरस फॉर हैल्थ?'
उन्होंने चुप्पी साध ली। वे कोई भी तरीका अख्तयार करें। कोई हल निकलने वाला नहीं है। 

बीयर का हलका सा सरूर उन पर तारी  होने लगा था। उन्होंने बोतल पर चिपके  लेबल को पढ़ा सुपर स्ट्रांग।
'
खाना लगा दूं'
'
हां'
वे खाने की प्रतीक्षा करते रहे और बीयर की कड़वाहट के बावजूद हलके हलके घूंट हलक से नीचे उड़ेलते रहे। लड़कों की आवाज़ों ने उन्हें चिन्तातुत कर दिया था। किस बात पर बहस रहे होंगे। कहीं उनके बारे में तो कोई बात नहीं हो रही
? अपनी उपस्थिति उन्हें बेमतलब जान पड़ी। याद है यहां आने से पूर्व तोशी टेलीफोन पर बार-बार उन्हें अप्रत्यक्ष हिदायतें दे रहा था। पापा आप यहां आने की क्यों तकलीफ कर रहे हैं। दो कमरों में चार लड़के रहते हैं। मिलजुल कर। सभी स्ट्रगलर्ज हैं। यहां सुख सुविधाएं नहीं हैं। न्यूनतम जरूरतों से भी महरूम हैं। कुर्सी, मेज, बेड, तिपाई कुछ भी नहीं है हमारे पास। फर्श ही हमारा बिछोना है। आपको आना ही है तो मैं किसी गैस्ट हाऊस या फिर होटल में कमरा बुक करा दूंगा। फर्श पर आपको नींद नहीं आयेगी। पंखा भी ठीक से नहीं चलता। यहां उमस है, पसीना है, गर्मी है। आपको तो पहाड़ के ठण्डे पॉल्यूशनफ्री में रहने की आदत है।

तोशी खाने की प्लेट रख गया। चावल। रौंगी की दाल। प्याज के टुकड़े। उन्होंने शिमला मिर्च की फरमाइश की थी। शायद मिली न हो। ठीक ही तो कह रहा था। रात को दाल, चावल बनते हैं।

'ये शोर शराबा किसलिये?'

'कुछ नहीं। आप खाना खाएं।'

'कुछ सीक्रेट है क्या?'

'नहीं पापा। कोई खास बात नहीं है।'

'नल बन्द हो गया। पीने का पानी हम स्टोर नहीं करते।'

'अरे कमाल है, नल में तो खूब पानी आ रहा था। मैं आधे घंटे पहले ही तो नहा धोकर फ्रेश हुआ हूं।'

'आपने बालटी खाली कर दी। नल बन्द हो गया। मेरे रूममेट को नहाना था। बाल्टी भरी होती तो नहा लेता।'

बीयर के सरूर ने उनका पारा ऊंचा कर दिया था। ज्यादा न सही मामूली से बहक गये थे। 'व्हॉट ए नांनसेंस।'

'मुझे क्या पता था यहां पानी कभी भी बन्द हो सकता है। तुझे पहले बताना चाहिए था। इटस योर फाल्ट।'

तोशी आपा खो बैठा। 'चुपचाप रहकर खाना खाओ। आपकी वजह से मुझे अपने रूममेटस का क्रिटिसिज्म सहना पड़ रहा है। नहाते वक्त बाल्टी भर देते तो आपका क्या बिगड़ जाता।'

'यू शट अप। वे आपे से बाहर हो गये।'

'चुप रहें आप। डॉन्ट ट्राई टू क्रिएट सीन। लड़कों के सामने मेरी टोपी उछाल रहे हैं आप। आप जैसे बूढ़ों की वजह से ही यंगर जनरेशन परेशानी झेल रही है।' क्या जरूरत थी यहां आने की ?'

ओह गॉड! फॉरगिव मी। बे खाने की प्लेट को एकतरफ रखकर खड़े हुए।

उन्होंने एक निवाला भी मुंह में नहीं डाला था। समूची ताकत से वे तलाई से उठे और बूटों की तलाश करने लगे। तस्में बांध कर बैग कंधे पर लटकाया और कमरे से बाहर आकर तेजी से सीढ़ियां उतर गये।

'पापा रूको। मैं स्कूटर पर छोड़ दूंगा। इस वक्त ऑटो रिक्शा मिलना मुश्किल है।' उन्होंने तोशी के आग्रह को अनसुना कर दिया।

मुख्य सड़क पर आकर उन्होंने ताज़ी हवा का झोंका महसूस किया। रात के खूब गाढे अंधेरे में मोटर गाड़ियों की चुंधियाती रौशनी में वे बस स्टैण्ड की दिशा में कदम बढ़ाने लगे।

                                        राजेन्द्र राजन
मार्च 26, 2008 

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