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न चाहते हुए 

दीदी के आने की खबर सुन कर जहां सारे घर में खुशी की एक लहर दौड ग़ई थी वहां थोडी ही देर बाद सबके चेहरे पर उदासी का एक सैलाब-सा उतर आया। यह सैलाब पापा के चेहरे से होता हुआ सबके चेहरे पर फैलता चला गया था।

-पत्र दौबारा तो पढना।अचानक ही यहां चले आने का प्रोग्राम कैसे बन गया ? ममी का एक-एक शब्द जैसे किसी ताबूत के अन्दर से निकल रहा हो।पल भर में ही पापा के चेहरे पर उदासी की जगह कोध की रेखाएं खिंच आयीं।पत्र को पटकते हुए बोले- क्या अनपढ समझ रखा है मुझे?

-मैंने यह कब कहा ! ममी जरा गुस्से में कह कर एकदम से सहज भी हो आयीं।कुछ पल रूक कर बोलीं- सुधीर भी साथ आ रहा है क्या ?

-नहीं  अकेली बच्चों को लेकर आ रही है।पापा जैसे न चाहते हुए भी ममी की बात का उत्तर दे गये।

 -शुक्र करो वह साथ नहीं आ रहा वरना।
-
क्या रज्जो कुछ न पूछेगी?
-
तो पहले सोचना था इस बात का। मैं न कहती थी  सोच-समझ कर पैसा खर्च करो।
 -
क्या सब कुछ मैंने अपने लिए किया है?
-
अपने लिए किया है या दूसरों के लिए  किया तो तुम्ही ने है। ममी का गला पूरी तरह से भर्रा आया । पापा असहाय सी दृष्टि से भैया के चेहरे की ओर देखने लगे।
 भैया  जो अब तक खामोश खडे थे  फट से पडे- ऌसमें परेशान होने वाली क्या बात है! पैसा ही है न  कर देंगे वापिस।और सर झटकते हुए वे तेजी से बाहर को निकल गये।

दरवाजे क़ो भीतर से बंद कर मैं अलमारी में से पासबुक निकाल कर देखने लगा।जानता था पासबुक में केवल पांच हजार रूपया रह गया है लेकिन इस सच्चाई को जैसे झुठला देना चाहता था मैं।इस बार पांच हजार के अक्षर लिखे होने की बजाए खुदे हुए से दिखाई दे रहे थे।और उन अक्षरों के बीच एक प्रश्न उभर आया था  बाकी का पांच लाख रूपया ? एक वर्ष में पांच लाख रूपया खर्च हो गया! दीदी सुनेंगी तो क्या कहेगी?

दीदी को दिल्ली से ले आने के बारे में ममी ने भैया से बात की तो भैया बोले- मीरा को भी तो जाकर लाना है।वह अकेली कैसे आएगीमन में तो आया था  कह दूं  दीदी इतनी दूर से अकेली आ सकती है तो भाभी नहीं आ सकती।लेकिन यह सब कह पाना क्या इतना आसान था।तभी पापा बोले- कोई बात नहीं दिल्ली तो में चला जाऊंगा  तुम जाकर बहु को ले आना।

अगले रोज शाम को भैया जालन्धर और पापा दिल्ली चले गए थे।उन दोनों के चले जाने से घर में छा गए मौन के साथ उदासी जैसे और बढ ग़ई थी।ममी रह-रह कर उसांस भरती- हे राम! अब क्या होगा? और ममी इधर-उधर पडी चीजाें को एकटक घूरने लगतीं।

-ममी! दीदी पराई थोडे ही है। हमने जो कुछ खरीदा है  उन्हें देख कर दीदी प्रसन्न ही होगी।

-तू नहीं जानता  जहां पैसे की बात आ जाए  वहां अपने भी पराए हो जाते हैं।और लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे?

 लोग सुनें गे! उन्हें कैसे पता चलेगा ? कौन बताएगा उन्हें ? दीदी ? नहीं-नहीं! यह भला कैसे हो सकता है। और उस रोज न जाने क्या-क्या सोचता चला गया था मैं। 

अगले दिन शाम की गाडी से पापा दीदी बिंदु और टिंकु आ गए थे।
-
अरे! तुम तो बहुत बडे हो गए हो।मुझे गले से लगाते हुए दीदी बोली।कुछ पल दीदी के सीने से चेहरा गडाए खडा रहा।जी तो चाह रहा था फूट-फूट कर रो दूं।लेकिन अपने को संभालते हुए बोला- हां दीदी! हर कोई बडा हो जाता है।देखो तो  बिंदु और टिंकु भी कितने बडे हो गए हैं।मेरी इस बात पर सभी हंस पडे थे।

-भैया नजर नहीं आ रहे ? दीदी इधर-उधर नजर दौडाती हुई बोली।

-बहु को लेने गया हुआ है।आज आ तो जाना चाहिए था।शायद रात की गाडी से आ जाए।

न जाने क्यों मन ही मन ममी की बात पर मुस्करा दिया मैं।तभी मन में एक विचार उठा  हंसी का एक जोरदार ठहाका लगा कर कहूं- दीदी  भैया तुम्हारे डर से रूक गए होंगे।

ममी भैया की शादी पर हम कुछ भी न भेज सके।भाभी के लिए दो सडियां और भैया के लिए घडी ऌन्होंने लेकर भी रखी थी लेकिन उस समय कोई लाने वाला ही नहीं था।बॉय पोस्ट भेजना तो बहुत मुश्किल था।इतने की चीज नहीं होती जितनी ऊपर डयूटी लग जाती है।

तभी टिंकु ने दीदी के गले में बांहें डालते हुए कुछ कहा था।

मी ! बच्चों को भूख लगी है।

ां-हां! क्या खाएंगे ये ?

ग्ज!

मी की बात का जवाब टिंकु ने दिया था।

ण्डे तो फिज में रखे होंगे।डाईनिंगरूम की ओर नजर दौडाते हुए पापा बोले।

ापा फिज कब लिया ? पापा इधर-उधर देखने लगे थे मानो फिज का नाम लेकर कोई बहुत बडी भूल कर बैठे हों।

भी पिछले साल ही तो लिया है।तुम्हारी भाभी की बहुत इच्छा थी कि फिज ले लिया जाए।

ां होनी भी क्यों नहीं चाहिए।बहुत आराम रहता है इन चीजाें से।वहां पर तो इन सब के बिना गुजारा ही नहीं।

ुधीर का काम-काज कैसा चल रहा है? पापा ने शायद विषय बदलने के लिए ही यह बात पूछी थी।

ापा काम तो ठीक है।मेहनत बहुत करनी पडती है। सुबह आठ बजे जाते हैं और रात आठ बजे के बाद ही घर लौटते हैं।कई बार तो बच्चे पूछ बैठते हैं - ममी  पापा कहां गये हुए हैं?

िछले दिनों तूने लिखा था कि सुधीर बीमार भी रहा।

ां पापा! वहां का क्लाईमेट भी इन्हें सूट नहीं कर रहा।डाक्टर ने तो यह भी कहा हुआ है  इन्हें सर्दियों में इंडिया आ जाना चाहिए।लेकिन ये नहीं माने।कहने लगे पहले तुम चली जाओ।पापा और भैया से राय लेकर लिखना तब मैं आ जाऊंगा।                                             लेकिन बिजनस चलाना भी तो आसान नहीं।

ां ! यही तो अभी सोचना है।

ब बिजनस की बातें ही करते रहोगे या इन्हें कुछ खाने भी दोगे।ममी पास आती हुई बोली। दीदी उठ कर किचन में चली गई। रात खाना खाने के बाद दीदी काफी देर तक वहां के बारे में बताती रही।रह-रह कर हमारी आंखें विस्मय से फैल-सी जातीं।अभी बातें चल ही रही थीं कि भैया और भाभी भी आ गए। जिस आदर और स्नेह से भैया और भाभी ने दीदी का स्वागत किया था वह चन्द ही दिनों तक रहा।

एक रोज दीदी छत पर थीं तो भैया कह रहे थे  इतनी तो हम लोगों की कमाई नहीं जितना इन लोगों के आने से खर्च बढ ग़या है।अण्डे और मीट के बिना इनका गुजारा नहीं। तभी सीढियों पर हल्की सी पदचाप से भैया खामोश हो गए थे।
 अगले रोज अपने कमरे में बैठा पढ रहा था तो दीदी भीतर आ गई।न जाने दीदी से नजरें मिला पाने की हिम्मत ही नहीं पड रही थी।

अगले वर्ष क्या करने का इरादा है
? कुर्सी के कंधे पर हाथ रखती हुई दीदी बोली।

 प्री-मैडिकल तो नहीं करूंगा। इतने मुश्किल सब्जेक्ट्स मुझसे नहीं पढे ज़ाते।
ुन!
 -
हूं! मैंने नजर उठाई।महसूस किया कि दीदी कुछ ओर कहना चाहती है।यह सब तो शायद वह भूमिका बांध रही थी।
ासबुक कहां है ?
लगा  जैसे पांव तले से जमीन ही खिसक गई है।यह बात मुझसे ही क्यों पूछी दीदी ने
? जाती दफा पास-बुक मुझे ही रखने को कह गई थी शायद इसीलिए।

ापा के पास है ? मेरे चेहरे पर उतर आई घबराहट को देखते हुए ही शायद दीदी ने कहा था।
हीं तो! अनायास ही जैसे मुंह से निकल आया।पासबुक पापा को ही दे दी होती तो अच्छा था। अपने आप सामना करते इस स्थिति का।
ो कहां है?
लमारी में रखी है। उठने को हुआ तो दीदी ने मेरा कंधा दबा दिया- तू बैठ  मैं उठा लाती हूं।
एक तिरछी नजर दीदी की ओर डाली। अलमारी खोल वे इधर-उधर देखने लगी थीं।
यही है ने ? दीदी पास आती हुई बोली।

बिना कुछ बोले  हां  में सर हिला दिया।दीदी ने पासबुक खोली।जानता था अभी एक विस्फोट होगा।

  पैसा किसी को दिया हुआ है?

  नहीं! चाहते हुए भी दीदी के चेहरे की ओर देख नहीं पाया।दीदी सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई थी।

  कुछ लिया है उनका ?

पल भर के लिए दीदी के चेहरे की ओर देखा फिर गर्दन झुका ली।

  बोलते क्यों नहीं? इस बार दीदी का स्वर कठोर था।सहसा ममी की बात  पैसे की बात आ जाए तो अपने भी पराए हो जाते हैं  मस्तिष्क में दौड ग़ई।

िछले साल स्कूटर का नम्बर आ गया था तो भैया ने।

्कूटर पर कितने लगे होंगे  बीस हजार।बाकी का पैसा?

एक बार फिर असहाय सी दृष्टि दीदी की ओर डाली।

-घर में स्कूटर आ गया  फिज  कूलर  ए-सी  बडी अलमारी  क्या ये भी उन्हीं पैसों से नहीं लिये गए।

दीदी सब समझ गई है। मैं बुत्त-सा बना बैठा रहा।

ैं तो आते ही समझ गई थी।जिन चीजों को पापा बीस वर्षो में न खरीद सके वे सब एक वर्ष में खरीद लेना क्या इतना आसान था। भाभी दहेज में कुछ लाई नहीं और डॉली को दहेज में सब कुछ दिया गया है  इन बातों की तुम लोग डींगे हांका करते थे। आखिर कहां से आ गया था वह सब ? बिट्टु यह मत सोचो कि मुझे इस बात से दुख हो रहा है कि यह सब क्यों हो गया।मेरा भी तो कुछ सोचा होता अगर ये साथ आ जाते तो?

 मेरे भीतर भर आई घुटन आंसुओं में बदल चकी थी।रूआंसे स्वर में दीदी बोली- न जाने में सब कुछ तुम्हीं से क्यों कह गई।जिनसे कहना चाहिए उनके आगे जुबान नहीं खुलती।अब इन्हें क्या लिखूं? कल वाले पत्र में भी इन्होंने यही लिखा है कि पापा और विजय से बिजनस के बारे में बात करूं।आखिर क्या बात करूं? पापा इतना पैसा जुटा पाएंगे अब ? क्या फिर से इन सब चीजाें को बेच सकेंगे वे ?

 उस रोज से दीदी के सामने बहुत कम गया था।रात काफी देर तक करवटें बदलता रहा।नींद आई तो एक अजीब-सा स्वप्न आंखों में तिर आया। ममी और दीदी का किसी बात पर झगडा हो रहा है।पापा उन्हें समझा रहे हैं।तभी भैया ने जीजाजी के बारे में कुछ अपशब्द कहे हैं और दीदी चिल्ला पडी- उन्हें दोष देने की बजाय जरा अपनी ओर देखा होता।कुछ भी शर्म होती तो मेरे आने से पहले ही इन चीजाें को बेच दिया होता।

-दीदी !  तभी एक हल्की-सी चीख के साथ मैं उठ बैठा था।

 -क्या बात है ? पासवाले पलंग पर दीदी करवट बदलती हुई बोली।ऐसे लगा जैसे दीदी पहले से ही जाग रही हैं।

 -कुछ नहीं! और मैं फिर लेट गया।

 -तबीयत तो ठीक है न तेरी ? मेरे माथे पर हाथ रखती हुई दीदी बोली।

 -हां  बस  यों ही ।

-स्वप्न आ रहा होगा ?

   मैं निरूत्तर सा आकाश की ओर देखने लगा।तभी एक तारा टूटा और मैंने आंखें बंद कर लीं।फिर एक के बाद एक न जाने कितने तारे टूटने लगे थे।

  सुबह नींद कुछ देर से उखडी।दीदी उठ गई थी।टिंकू और बिंदु एक दूसरे के सीने पर हाथ रखे सो रहे थे।उनका भोला सा चेहरा देख मन में प्यार उमड रहा था।तभी दीदी चाय का प्याला लिए भीतर आयीं।

  -लो चाय पियो।

  -मैं खुद ही ले आता।

  -आज हमारे हाथ की चाय पियो।सारी उम्र दूसरों की सेवा करके कभी-कभी यह जी नहीं चाहता कि कोई हमें भी पूछे। मैंने महसूस किया कि दीदी यह मुझे नहीं कह रही बल्कि यह उनका अपना ही आकोश है जिसे वह किसी भी रूप में जता देना चाहती है।एकाएक वह हंसती हुई बोली- सुबह-सुबह कहां की फिलॉसफी ले बेठी।

मैं न चाहते हुए भी मुस्करा दिया।दीदी एकटक मेरे चेहरे की ओर देखने लगी।

-बहुत जल्दी घबरा जाते हो।जिन्दगी में जो भी मुश्किल सामने आती है उसका कोई न कोई हल भी अवश्य होता है। दीदी ने जिस विश्वास से कहा लगा  जैसे दीदी को भी अपनी समस्या का कोई हल मिल गया है।मैंने एक प्रश्नवाचक दृष्टि दीदी पर डाली।

-तुम पढ लिख जाओ अच्छे सेटल हो जाओ मुझे और कुछ नहीं चाहिए।

आज दीदी के चेहरे पर उदासी की कोई झलक नहीं थ।बल्कि पहले की अपेक्षा अधिक प्रसन्न नजर आ रही थीं।

ुनो आज बैंक से तीन हजार रूपया निकलवा लाना।हां किसी से कहना नहीं।यह भी नहीं बतााना कि मैंने पासबुक देखी है।

-अगर पापा ने पासबुक मांगी तो?

मैंने जिस दृढता से प्रश्न किया दीदी उसी दृढता से बोली- तो बता देना कि पासबुक मेरे पास है। कल तक मैं अपने को जितना कमाजाेर महसूस कर रहा था आज मेरे भीतर उतनी ही दृढता भर आई थी। शाम की डाक से जीजाजी का एक और पत्र आ गया।
 -
क्या लिखा है ? दीदी पत्र पढ रही थी तो पापा बोले।ममी और भैया भी पास ही खडे थे।

-कुछ भी तो नहीं! बस ठीक-ठाक लिखा है।

-कुछ आने के बारे में ? भैया बोले।

           दीदी ने बिना कुछ कहे पत्र भैया की ओर बढा दिया।सभी की नजरें भैया की ओर उठ गयीं।

-न जाने जीजाजी ने यहां आने की रट क्यों लगा रखी है! पत्र पढने के बाद भैया बोले।

-मैं भी यही सोचती हूं।बिजनेस चलाना कोई आसान थोडे ही है।और फिर बच्चे भी यहां एडजस्ट नहीं हो पा रहे हैं।जब से आए हैं टिंकु बीमार रहने लगा है। बिंदु की पढाई में भी हर्जा होगा। यहां और वहां की पढाई में भी तो बहुत फर्क है।और फिर आजकल तो पेरैंटस बच्चों को पढाने के लिए विदेश जाने के लिए तरसते हैं।

          दीदी कह रही थी तो मैंने देखा ममी पापा एक दूसरे के चेहरे की तरफ देखने लगे हैं।

प्रैल में बच्चों की क्लासें शुरू होती हैं। बस पन्द्रह दिन ही तो रह गए हैं।सीट बुक कराने के लिए अभी दिल्ली जाना पडेग़ा नहीं तो बाद में मुश्किल हो जाएगा।

िकट पर कितना पैसा लगेगा ? मुझे अगले सप्ताह दिल्ली जाना है  टिकट तो मैं लेता आऊंगा। भैया बोले।

-यहां तो टिकट बनने में देर लग सकती है।मैं इन्हें लिख दूंगी ये वहां से बनवा कर भेज देंगे।तुम सीट का पता करके आना ताकि टिकट पर वही डेट लिखवाई जा सके।

           -रज्जो तुम्हारा वो पैसा।

भी उसे यहीं जमा रहने दो।दीदी ने झट से पापा की बात काट दी- आखिर हमें आना तो यहीं है।जब तक वहां काम कर सकते हैं ठीक है उसके बाद इंडिया आकर कोई काम शुरू कर लेंगे।

ेकिन ।

            पापा कुछ कहने लगे तो ममी ने उनका हाथ दबा दिया।पापा खामोश हो गए। 

          दीदी एकटक खिडक़ी से बाहर देखे जा रही थी।

-पापा सोचती हूं  दो-चार रोज क़े लिए निम्मो आंटी के पास हो आऊं।पता नहीं फिर कब आना हो।

-हां-हां ! क्यों नहीं । बेशक कल ही चली जाओ।

           अगले दिन सुबह ही दीदी ने निम्मो आंटी के पास जाने का प्रोग्राम बना लिया।

स्टेशन तक मैं ही छोडने गया था दीदी को।रास्त में दीदी बोली थी- इनका कोई पत्र आए तो मुझे रिडायरैक्ट कर देना।हो सकता है मैं कुछ दिन वहां रूक जाऊं।
-
लेकिन ।
-
पापा से दो-चार रोज क़े लिए तो यों ही बोल दिया था।

बिटटु सच कहूं तो   वहां से आते हुए सोचा था जितने दिन भी यहां रहूंगी इस घर की दीवारों कै भीतर ही रहूंगी।तुम नहीं जानते इस घर की दीवारों को देखने के लिए भी तरस गई थी।लेकिन अब यहां एक अजीब सी घुटन महसूस होने लगी है।शुरू-शरू में मेरे लिए सभी की भागदौड  लगता था जैसे मेरे आने की खुशी में है। लेकिन अब लगता है जैसे वे मेरा कर्ज उतार रहे थे।वरना अब इतना बदलाव क्यों आ गया।रिक्शा ने मोड लिया । स्टेशन सामने ही था।

-जाते ही वहां से पत्र डालूंगी।तुम भी आ जाना। कुछ घूमफिर लेंगे।

रिक्शा से उतरे तो गाडी क़ी आवाज सुनाई दी।

-मैं टिकट लेती हूं  तू अटैची लेकर भीतर चल।बच्चों को भी ले जा।

गाडी ने पहली व्हिसल लगाई तो दीदी भीतर आ गई थी।

-हां मैं भूली ही जा रही थी।ये तीन हजार रूपया ले और पासबुक में जमा करवा देना।आज ही।

-लेकिन तुम्हारे पास ?

-सुबह ममी से कुछ पैसे मांग लिए थे।यदि पापा को तीन हजार का पता चलता तो।

तभी गाडी ने दूसरी व्हिसल दी।

-अच्छा तू चल  मैं जाते ही पत्र लिख दूंगी। तब तक तेरे पेपर भी खतम हो जाएंगे।        

मैं फुदकता हुआ सा नीचे उतर आया।मन में आया था भाग कर दीदी के पास जाऊं और रूपये उनके हाथ पर रख कर कहूं- दीदी उन्हें पता चलना ही चाहिए।

लेकिन गाडी छुक-छुक करती आगे बढ ग़ई थी और पीछे  धुंए का एक धुंधलका सा फैलता चला गया था।


विकेश निझावन
मई 27,2008

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