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चैट
ठंड के मौसम में जब घर के सभी लोग गुनगुनाती धूप के मजे लूट रहे थे। मै नीचे कमरे में कम्यूटर में आखें लड़ाए उसके जवाब की प्रतीक्षा कर रहा था। आज शाम काफी पीने चलें यही पूछा था मैने उससे। यू तो हम पिछलें एक साल से घंटो एक दूसरे से बिना बोलें सिर्फ शब्दों से बात करते आ रहे थे। पर अब मै शब्दों को अवाज देना चाहता था। ऐसा नही कि मैने उसे ये ऑफर पहली बार दिया था। लकिन हर बार वह झट से ना कह देती। पर आज वह जवाब देने में बहुत समय लगा रही थी। और  शायद यही मेंरी बैचैनी की वजह भी थी। मन में कई तरह के सवाल उठ रहे थे। कभी लगता मेरे बार बार इस तरह पूछने से कही वो बुरा तो नही मान गई। या फिर उसका कनेक्शन तो नही कट हो गया। जरूर लाइट चली गयी होगी। पर दिख तो आन लाइन रही है। अब मुझसे नही रहा गया मैने सोचा इससे पहले की वो  इनकार करे मै माफी मॉग लेता हूं । और मैने झट से सॉरी लिखा। पर इन्टर का बटन अभी दबाने ही जा रहा था। कि उधर से जवाब आया ओके कितने बजें। मै खुशी से झूम उठा पर जल्दी से अपनी खुशी को संयत कर मैने झट से लिखा ६ बजें लिकं रोड के कार्नर में खुले नई काफी  शॉप में। और तुरन्त बात खत्म कर मै जल्दी जल्दी प्रोफाइल में रखी गई उसकी फोटो को गौर से देखने लगा। ताकि  शाम को उसे पहचाने में कोई चूक न हो जाए। तभी घड़ी ने ४ का घंटा बजाया। मै झट से उठा और  शाम के लिए तैयार हेशने लगा। पॉच बजते बजते मैने अपने को ५० बार  शीशे में  देख लिया था। कि कही कोई कमी तो नही रह गयी। समय काफी था पर मै जल्द से जल्द वहॉ पॅहुचना चाहता था। साढे पॉच के आसपास मै वहॉ पॅहुच गया।  शाम की अभी  शुरूआत ही हुई थी इसलिए मुझे अपने पंसद की जगह आसानी से मिल गयी जहॉ से मै दरवाजे की ओर बड़े आराम से नजर रख सकता था। मेरे पीछे एक यंग जोड़ा बैठा था। दाहिनी तरफ २८ साल का एक आदमी बैठा कुछ खोया खोया सा कॉफी पी रहा था । दिखने में वह एक पत्रकार लग रहा था। बाए ओर एक कार्नर में एक  औरत बैठने जा रही थी । उसकी उम्र यही कोई ४५ से ५० के आसपास होगी। वह अभी अभी वहॉ आयी थी। चारो ओर नजर घुमाने के बाद मैने खुद को व्यवस्थ्ति किया। फूलो के गुलदस्तें को भी मै संभाल कर रख दिया। तभी वेटर आया और पूछा- सर क्या लेना पंसद करेंगे। मैने कहा - मुझे किसी का इन्तजार है थाड़ी देर बाद आना। अब मै दरवाजे पर टकटकी लगा कर देखने लगा। और साथ ही साथ कभी कभी घड़ी पर भी नजर दौड़ा लेता था। धीरे धीरे सूई के काटे ६ के आगे जाने लगें। मै और भी ब्रेसबी से इन्तजार करने लगा था। और कब ७ बज गए पता ही न चला। अब मेरा मन मुझे ही समझाने लगा था। कभी कहता टैफिक में फस गई होगी। तो कभी कहता लड़की है तैयार होने में वक्त लग गया होगा। वेटर भी कई चक्कर काट चुका था। और धीरे धीरे ८ बज चुके थे। अब मन थोड़ा थेशडा खीज भी रहा था। मैने मन के झूठे सात्वने को सुनना बंद कर दिया और वेटर को बुला कर एक कॉफी का ऑडर दिया। और साथ ही ठान लिया कि काफी खत्म कर यहॉ से चला जाउगा। तभी बाएं कार्नर पर बैठी वह औरत मेरे पास आयी । उसके हाथ में एक तस्वीर थी। उसने वह तस्वीर मुझे दिखाते हुए बोला- क्या इसका इन्तजार कर रहे हो
? तस्वीर देखते ही मै सकपका सा गया और बोल उठा- हॉ।

उस औरत ने धीरे से मेरे हाथ को दबाया और बोला- बेटा ये तो कब की चली गयी। मै एकटक उसे परेशान भरी नजरो से देख रहा था। मैने अपने आप को नियंत्रित किया और धीरे से बोला - कब मै तो यही था?

उस औरत ने मेरे सामने की चेयर को खीच कर बैठते हुए बोला- आठ साल पहले।  मै अविश्वास करते हुए बोला- एैसा कैसे हो सकता मैने दोपहर में उसके साथ चैट किया और फिर  फिर  शाम को हमें मिलना था।

तब उस औरत  धीरे से बोली- वो मै थी। यह सुन कर मै कन्फयूज सा चुपचाप उसे देखने लगा। पर वो बोलती रही- देखो मुझे माफ कर देना एक एक्सिडेन्ट में इसके पापा और ये जब नही रहे तब मै बिल्कुल अकले पड़ गयी।   शुरू  शुरू पैसो के लालच में नाते रिश्तेदार ने मेरा काफी साथ दिया । पर मतलब निकलने पर सब  धीरे धीरे सब दूर हो गए । कोई भी मुझसे मिलता नही , बात नही करता । तब मैने अपनी बेटी के नाम से चैट कर लोगो से बात करने की सोची। ताकि जीवन का खलीपन भर जाए।  एैसा नही कि तुम पहले हो जिसे मैनें यह बात बतायी। पर जब जब मैने लोगो को अपनी सच्चाई बताई उन्हाने वापस मुझसे कभी बात नही की। उसकी बातें सुन मै दो मिनट तक खमोश बैठा रहा है। और फिर बिना कुछ बोले चुपचाप उठकर चला गया। घर आकर सीधा कमरे में गया और बिस्तर पर लेट गया। और उस वाक्ये को सोचने लगा और कब ऑख लग गयी पता ही न चला। । सुबह उठा तो याद आया बिल चुकाना तो भूल गया था। फिर मन ही मन मै मुस्कुराया और कम्यूटर ऑन किया। वह ऑन लाइन थी। मैने बिल चुकाने के लिए उसे धन्यवाद भेजा- थैक्यु फॉर काफी।


विवेक श्रीवास्तव
अप्रेल 16, 2007

 

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