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कुसुम कथा

मैं लगभग पच्चीस वर्षों बाद अपनी जन्मभूमि पर लौटी हूँ। आना तो वह भी चाहते थे, पर उन्हें फ़ुर्सत नहीं मिली। व्यवसाय की अपनी व्यस्तताएँ होती हैं - मकड़जाल की तरह फैली हुई। भाग-दौड़, लेन-देन, हिसाब-क़िताब आदि तरह-तरह के काम-काज से बुना हुआ मकड़जाल। मैं तो आज तक इस रहस्य को समझ ही नहीं सकी कि वह कैसे इस मकड़जाल के एक-एक धागे को पहचानते हैं ! हर धागे की शुरुआत से लेकर आख़िरी सिरे तक पर उनकी नज़र होती है। मज़ाल है कि कोई सिरा एक-दूसरे से उलझ जाए और फिर सुलझे नहीं ! हर हाल में चीज़ों को सुलझा लेना उनकी ख़ासियत है।

        मेरे साथ ठीक इसके उलट होता है। मुझे तो सब उलझा हुआ ही लगता रहा हमेशा। एक तो मैं उनसे कभी कुछ पूछती ही नहीं और अगर कभी कुछ पूछ लिया, तो वह हँसते हैं। कहते हैं - ''जितना दिमाग़ तुम्हें समझाने में ख़र्च करुँगा, उतने में मेरे दसियों काम निबट जाएँगे।........और तुम्हें समझने की कौन सी ज़रूरत आ पड़ी है ?''

        उनका आना तय था। बल्कि, पिछले कुछ दिनों से वह बार-बार यहाँ की चर्चा कर रहे थे। उन्होंने ही आने के लिए दिन तय किया। अपनी भाग-दौड़ भरी व्यस्त ज़िन्दगी के बीच इन दिनों जब उन्हें थोड़ी सी भी फ़ुर्सत मिलती, .....वह यहाँ की चर्चा करने लगते। बम्बई से पटना तक हवाई जहाज़,......और पटना से किराए की कार लेकर देवघाट तक जाने का कार्यक्रम उन्होंने ही बनाया।

        उनका उत्साह देखते ही बनता था। मेरी इस शंका पर कि क्या इतने दिनों तक उनका बम्बई से बाहर रह पाना,.....यानी यहाँ रह पाना सम्भव होगा, वह ठठाकर हँसे थे। यहाँ कम से कम एक सप्ताह तक रुकने का कार्यक्रम था। उन्होंने वापसी का टिकट इसी हिसाब से कराया था। मेरे मन में यह चिंता बनी हुई थी कि यहाँ पहुँचकर कैसे रहना हो सकेगा ?......कहाँ रहना   होगा ?......कौन-कौन मिलेगा और किस हाल में मिलेगा ?......किसका व्यवहार कैसा होगा ?.........पर उनके ऊपर इन चिंताओं का कोई असर नहीं था। उनका मन उछाह से भरा हुआ था।.........पर ऐन वक्त पर सबकुछ उलट गया। वह नहीं आ सके। उन्हें एक बड़े बिजनेस डील के लिए विदेश जाना पड़ा। वह उदास दिखे थे। उन्होंने कहा था - ''इतने सालों बाद सोचा जाने के लिए........तो....''

        कोई सम्बन्ध यदि टूट जाए, तो क्या उसके टूटने का दु:ख,.......या अंत तक नहीं निभ पाने का दु:ख लिये तमाम उम्र रोना चाहिए ? मैं जानती हूँ कि यह दुविधा भरा सवाल नया नहीं है। पर इन दिनों मैं बार-बार अपने-आप से यही सवाल करती हूँ।.......इंसान भी तो जीते-जीते अचानक मर जाता है। ग्रहों, नक्षत्रों और हाथ की रेखाओं के सारे खेल धरे के धरे रह जाते हैं। उम्मीदें,........सपने,........आनेवाले समय के लिए बुनी गईं तमाम इच्छाए, इंसान के मरने के साथ ही मर जाती हैं। बिना किसी हलचल के,......कोई तर्क-वितर्क किए बिना चुपके से सबकुछ निष्प्राण हो जाता है। अचानक रोशनी के बुझते ही तमाम आकृतियाँ जैसे पिघलकर बिना किसी आकार की स्याही में बदल जाती हैं, वैसे ही क्या सम्बन्धों के साथ नहीं हो सकता ? सम्बन्धों का टूटना ऐसे ही होना चाहिए। मृत्यु की तरह। जैसे जीवन की वापसी की सारी उम्मीदों पर ताले जड़ती और चाबी को गहरे कुएँ में डालती हुई आती है मृत्यु, वैसे ही समाप्त होना चाहिए सम्बन्धों को, यदि उन्हें समाप्त होना है तो। सम्बन्धों के टूटने के बाद यदि ज़रा सा भी कुछ शेष रह जाता है, तो वह ता-उम्र दु:ख देता है। सम्बन्धों के फिर से जीवित होने की आस टीस की तरह साथ-साथ चलती रहती है। सम्बन्धों का टूटना मृत्यु की तरह हो, तभी इस टूटने को सही मायने में टूटना कहा जा सकता है।

         देवघाट से बम्बई के लिए विदा होते हुए मैं अपने रिश्तों का बहुत सारा हिस्सा साथ लेती गई थी। हालाँकि, उनके अनुसार मैं कभी वापस नहीं आने के लिए गई थी, पर आज देवघाट में हूँ। बम्बई में रहते हुए पच्चीस वर्षों तक जो टीस मैं पालती रही, उसकी लहलहाती फ़सल आज यहाँ काट रही हूँ। है न अजीब बात,.......कुछ-कुछ उलझी हुई-सी। हाँ, बहुत कुछ उलझा हुआ है, पर मैं जानती हूँ कि इसे एक दिन,.......बहुत जल्दी सुलझ जाना है। बस, निर्णय लेने भर की देर है।

        कुसुम बुआ के आने के बाद घर में रौनक भर गई है। अपनी गृहस्थी में उलझी रहनेवाली जिस दिदिया को दो-चार दिनों के लिए भी छुट्टी नहीं मिलती थी, वह बुआ के आने की ख़बर सुनते ही देवघाट पहुँच गई। दो पीढ़ियों की बेटियाँ एक साथ मायके में हैं। मेरे घर में उत्सव का माहौल है। बुआ तो अकेली आई हैं, पर दिदिया के दोनों बेटों की धमाचौकड़ी और गौरैया की तरह फुदकती नन्हीं सी बेटी की चहकन में पण्डित धूर्जटि पाण्डेय का घर-ऑंगन डूबा हुआ है। मैंने दिदिया को इस घर पर राज करते हुए बचपन से देखा है। पर आजकल वह बुआ की शागिर्दी में लगी हुई है। उनके पीछे-पीछे डोलती फिरती है। अम्मा और दिदिया दोनों इन दिनों बाबा की सेवा से मुक्त हैं। मेरे बाबा पण्डित धूर्जटि पाण्डेय चाहे जिसको आवाज़ दें, उनकी आवाज़ पर उन तक बुआ ही पहुँचती हैं। पण्डितजी की पूजन-सामग्री से लेकर भोजन-स्नान तक की सारी व्यवस्था बुआ ने सँभाल ली है। सिर्फ ऌतना ही नहीं, मेरे बाबा के दो छोटे भाइयों के कुनबे यानी पट्टीदारों के साथ कुछ वर्षों से रिश्ते में जो ठंडापन आ गया था, देखते-देखते आत्मीयता की ऊष्मा से भर गया है। बुआ की उपस्थिति ने कई जगह प्रभाव डाला है, मानो वर्षों से यह प्रयोगशाला कुसुम नामक रसायन की प्रतीक्षा में थी।

         जिस बुआ की उपस्थिति से यह हलचल मची है, उनके आने की ख़बर से पहले तक उनके नाम की चर्चा चलते ही एक सर्द चुप्पी छा जाती थी। मेरी अम्मा की ऑंखें देवघाट के किनारे-किनारे बहनेवाली सरयू की धारा की तरह उमड़ने लगतीं,.........मेरे बाबूजी पण्डित रूद्रदेव पाण्डेय आगे की थाली सरकाकर उठ जाते और कई दिनों तक चुप-चुप रहते,........और बाबा की ऑंखों में क्रोध की लपटें और नेह की आर्द्रता दोनों एक साथ दिखतीं। हम दोनों अचानक बदले इस मौसम से भयभीत हो जाते। क्यों होता है ऐसा ? यह प्रश्न हम दोनों को नींद में भी सताता। हमारे लिए हमारे बचपन का सबसे बड़ा रहस्य थीं कुसुम बुआ। दिदिया और मैं, जब दोनों साथ होते, बुआ के बारे में ख़ूब बातें करते। अपनी नासमझी के दायरे में ही सही, हम इस रहस्य को भेदने की कोशिशें करते। मैं तो कई बार पिटा भी हूँ। बुआ को देखने,......बुआ से मिलने,........बुआ के यहाँ जाने की ज़िद करता और घर में तनाव भर जाता। बाबा और बाबूजी तो नहीं, पर अम्मा पीटतीं। अक्सर इस तनाव का अंत मेरी पिटाई से ही होता। दिदिया होशियार थी। वह ऐसी ज़िद नहीं करती। चाहती तो वह भी थी, पर चुप लगा जाती। उसने बुआ को देखा था। वह जब पाँच साल की थी, तब बुआ यहाँ से गई थीं। पाँच साल की बच्ची को कितना कुछ याद रह सकता है भला ! फिर भी, उनके बारे में जो भी उसकी स्मृति में था, मुझे बताती और इस ज्ञान के बल पर मुझ पर रोब झाड़ती। जब हमदोनों बड़े हुए और धीरे-धीरे कुछ बातें मालूम हुईं, तो मुझे अजीब लगा।

        मेरे बाबूजी के भोलेपन और भीतर ही भीतर घुटते रहकर सब कुछ सहते जाने की आदत ने भी स्थितियों को जटिल बनाया था। बाबूजी एक मंदिर में पुजारी हैं। लोग उन्हें रूद्रदेव पाण्डेय नहीं, पुजारीजी कह कर बुलाते हैं। पिछली शताब्दी की शुरुआत में बने इस मंदिर में मेरी पिछली तीन पीढ़ियाँ पूजा करती आ रही हैं। अब बाबूजी को इस बात की चिंता घुन की तरह खाए जा रही है कि उनके बाद क्या होगा ? वह जानते हैं कि मैं पुजारी बनकर जीवन गुज़ारना नहीं चाहता। वह स्वयं भी नहीं चाहते कि मैं पुजारी बनूँ।......पर मामला पाँच बीघा ज़मीन की खेती का है। यह ज़मीन पुजारी की जीविका और मंदिर की देखभाल के लिए दान में मिली है। मेरे गाँव के ही एक कायस्थ परिवार ने यह मंदिर बनवाया था और ज़मीन दान में दी थी। वे लोग अब गाँव में नहीं रहते। शहर में बस गए। इसी पाँच बीघे की खेती के बल पर मेरे परिवार का भरण-पोषण होता रहा है।

        मैंने इसी साल बी.ए. किया है। मास्टर बनने की कोशिश में हूँ। बाबा चाहते हैं कि मैं देवघाट में ही रहूँ। यहीं बच्चों को पढाऊँ और उनकी मृत्यु से पहले मंदिर में पूजा-पाठ का काम सँभाल लूँ।........कुसुम बुआ की बात करते-करते मैं यह कौन सी कथा कहने लगा ! अपनी इस आदत से बहुत परेशान हूँ मैं। बात कहीं से शुरु करता हूँ...........और कहीं ख़त्म। सिलसिलेवार बातों को रखने की कला नहीं सीख पाया। दिदिया को यह कला ख़ूब आती है। उसने देवघाट में अनुपस्थित बुआ के पच्चीस वर्षों को अपनी बातों से पाट दिया है। बुआ जिस किसी के बारे में जिज्ञासा करती हैं, दिदिया उसके बारे में विस्तार से बताती है। मसलन, किसकी मौत कब हुई ?.......किसको कितने बच्चे हैं ?.......किसकी शादी कब और कहाँ हुई ? यहाँ तक कि किसकी बहू के मायके से विदाई के समय क्या आया और किसने अपनी बेटी की शादी में क्या-क्या दिया ? बुआ की तमाम उत्सुकताओं को शांत करने में लगी है दिदिया। वह एक भी ब्योरा छूटने नहीं देती और बुआ हैं कि देवघाट की दिवंगत आत्माओं से लेकर नवजात शिशुओं तक का विवरण जानने के लिए उत्सुक हैं। बुआ बता रही थीं कि बम्बई में रहते हुए भी वह देवघाट की चारों दिशाओं में बसे ग्राम देवताओं - जोगी बाबा, आशा बाबा, ब्रह्म बाबा और सती माई को सुमिरती रही हैं। जोगी बाबा तो सफेद चोगा पहने उनके सपनों में आते रहे हैं।

        मैं एक बात बताना चाहता हूँ.........अपने बारे में। जब से बुआ आयी हैं, जाने क्यों मुझे लगता है कि मेरे जीवन की दिशा अब बदलने ही वाली है।

        बुआ के आने की ख़बर मिलते ही मैं भागती हुई देवघाट पहुँची। हालाँकि, दम मारने की भी फुर्सत नहीं थी मेरे पास। एक तो खेती-किसानीवाले घर में फुर्सत निकाल पाना वैसे ही मुश्किल होता है और ऊपर से चैत-वैशाख। इन महीनों में रबी फ़सल की कटनी-दौनी की अफ़रा-तफ़री मची होती है। मेरे घर के लोग पुरोहिताई नहीं करते। हमलोग अपने गाँव के बड़े खेतिहर हैं। मेरे श्वसुर पण्डित गजानन चौबे इलाक़े के मातबर लोगों में हैं। इस बदले हुए ज़माने में भी उनका रोब-दाब है।

        मेरे पति इकलौते हैं। दरवाज़े पर जीप है,......ट्रैक्टर है,.....थ्रेसर है,....पम्पिंग सेट है,......एक जोड़ी बैल हैं,......भैंस है,.....जर्सी गाय है। कलमी आमों और शाही लीची के पेड़ों का अपना बाग़ीचा है। दूध-दही-अन्न-फल से भरा-पूरा है मेरा घर। पूरे जवार में मेरे परिवार और पट्टीदारों की धाक है। देवघाट के लोग कहते हैं कि भगवान सबकी बेटी को पुजारीजी की बेटी जैसा भाग्य दे।

        मेरे श्वसुर ने मुझे फाल्गुनी शिवरात्रि के दिन मेंहदार के मेले में देखा था। मैं अम्मा के साथ शिवजी को जल चढ़ाने गई थी। बाबा, बाबूजी और नीलेश भी साथ थे। मैं मैट्रिक की परीक्षा देनेवाली थी। बाबा का कहना था कि यह संयोग है कि परीक्षा से पहले शिवरात्रि की तिथि है। मुझे शिवजी की पूजा करनी चाहिए। उनकी कृपा हुई तो मैं अच्छे नम्बरों से पास हो जाऊँगी। मैं ठीक परीक्षा से पहले कहीं जाने को तैयार नहीं थी, पर भाग्य में लिखा था शिव का वरदान पाना,....सो चली गई। परीक्षा और रिजल्ट से पहले वर मिल गया। चौबेजी ने मुझे देखा और पता लगवाया। जब उन्हें पता चला कि मैं देवघाट के पण्डित धूर्जटि पाण्डेय की पोती हूँ, तो बाबूजी को संदेश भिजवाया। विवाह तय हुआ, तो सपने की तरह लग रहा था सबकुछ। बाबूजी तो दोनों हाथ जोड़कर चौबेजी के सामने खड़े हो गए थे कि आपके घर के योग्य नहीं हैं हम। पर मेरे श्वसुर ने भरोसा दिलाया कि सम्बन्ध में हैसियत नहीं देखी जाती। यह तो लड़के-लड़की के भाग्य का खेल है।.....और मैं चैनपुर के चौबे कुल की बहू बन गई। मेरा रिजल्ट आने से पहले मेरा विवाह हो गया। उन दिनों ये बी.ए. कर रहे थे। सीवान के कॉलेज में पढ़ते थे। कॉलेज से लौटते तो मेरे लिए.........। मैं भी कौन सी पिटारी खोल बैठी ! ......कुछ दिनों बाद चुनचुन आया। फिर चुनमुन पैदा हुआ। इनको बेटी की साध थी, सो दो साल पहले चुन्नी हो गई।......इन्होंने हमेशा मुझे मान दिया है। ग़रीब के घर की बेटी मानकर कभी ओछा नहीं सोचा। मेरे मायके को लेकर कभी आनी-बानी नहीं बोलते। नीलेश की पढाई में हमेशा मदद करते रहे हैं। जब जितना चाहूँ,....,......जो चाहूँ बिना पूछे देवघाट भेज सकती हूँ। लीख को लाख कर दूँ या लाख को लीख, इनका मन कभी मलिन नहीं होता।

        शुरु में बुआ के बारे में इन्होंने भी कई बार पूछा। क्या बताती मैं ? चुप रहती या टाल जाती। पर कोई बात छिपती है भला ! कुछ दिनों बाद इन्हें मालूम हो गया। पर इन्होंने इस बात की कभी मुझसे चर्चा नहीं की। एक बार जब मैंने पूछा तो कहने लगे कि पैबंद का सीवन उधेड़ने से कपड़ा किसी काम का नहीं रहता और शरीर भी नंगा हो जाता।....सच है यह। यही बात लोग नहीं समझते। इस बात को न तो बाबा समझे न ही बाबूजी। जो होना था, सो हो गया। इसमें भला बुआ का क्या दोष !

        मैं पाँच साल की थी तो बुआ बम्बई चली गईं। मैं तीस की होने जा रही हूँ अब। चौदह साल पूरे होंगे मेरी शादी के। तीन बच्चों की माँ हूँ मैं। बड़ी आस थी कि मेरे ब्याह में तो बुआ आएँगी ही। पर बुआ नहीं आईं। बाद में पता चला कि मेरी माँ के बहुत रोने-गिड़गिड़ाने के बाद भी बाबा नेवता भेजने को तैयार नहीं हुए।  

 

        कुसुम बबुनी के आने के बाद मेरा मन थिर हुआ है। इतने सालों तक कुम्हार के चाक पर रखी गीली माटी की तरह चक्कर काटते-काटते मैं थक चुकी थी। अब थोड़ा आराम मिला है। मन को चैन मिला है।

         इन सालों में शायद ही कोई रात रही होगी, जब बिना रोए-सुबुके मेरी ऑंख लगी हो। ख़ुशी के ढेरों अवसर आए, पर कुसुम बबुनी को लेकर मेरे मन में टीस बनी रही। मैंने कुसुम को ननद नहीं, अपनी सहेली की तरह प्यार किया है। जब मैं ब्याह कर आई कुसुम के लिए वर खोजा जा रहा था। हम दोनों की उम्र में दो-तीन साल का ही फासला है। मेरी सास मर चुकी थीं। कुसुम ही घर सँभालती थी। हम दोनों, सखियों की तरह इस घर में डोलती फिरतीं। कुसुम ने ब्याह के साल ही प्राइवेट से मैट्रिक की परीक्षा पास की। बड़ी होनहार रही है वह। उन दिनों हमारे घरों में लड़कियों का पढ़ना-लिखना एक संयोग ही था। पढ़ाने का चलन ही नहीं था। बहुत जोड़-घटाकर मैं सिर्फ चिट्ठी बाँचना भर सीख सकी। मेरे श्वसुर पण्डित धूर्जटि पाण्डेय के विरोध के बावजूद मेरे पति अपनी बहन को परीक्षा दिलवाने ले गए थे।

        कुमुद छोटी थी। कुसुम से लगभग दो साल छोटी। कुमुद के बारे में बातें करते हुए होठ नहीं खुलते....मन काँपता है, पर बात तो करनी होगी।......सबसे अलग थी कुमुद। चैत की पुरवाई की तरह चंचल, सिलाई-कढ़ाई और गीत-गवनई में हुनरमंद।......अब मैं सोचती हूँ, कुसुम से मेरे अपनेपन ने,.....मेरी निकटता ने अनजाने ही कुमुद के मन में मेरे और कुसुम के लिए घृणा के बीज बो दिए होंगे। मेरे लाड़-दुलार को उसने कभी स्वीकार नहीं किया। कुसुम से भी वह दूर होने लगी थी। वह चुप रहती। लाख चाहने के बावजूद वह मेरे निकट नहीं हो सकी। शायद उसे लगता रहा कि मैंने उसकी दिदिया को उससे छीन लिया है। जो भी हो, मैं तो इसे अपनी ही भूल मानती हूँ। हालाँकि मैंने कभी भेद-भाव नहीं किया। उसे छोटी बहन की तरह ही प्यार किया।......पर मेरे भीतर यह कसक है कि कुसुम से मेरे अपनापे ने उसे मुझसे दूर किया,......कुसुम से दूर किया और वह भीतर ही भीतर बदलती चली गई।

        कुसुम का ब्याह हुआ। पाहुन पढ़े-लिखे थे। जायदाद नहीं थी। हमलोगों जैसा ही पुरोहितों का परिवार था। कुसुम ससुराल गई। विदा होकर लौटी। सबकुछ ठीक था। ससुराल में सम्पन्नता नहीं होने के बावजूद कुसुम प्रसन्न थी। कुसुम के आने के बाद पाहुन का देवघाट आना-जाना शुरु हुआ। कुसुम की विदाई की बात चली, तो पाहुन ने मना कर दिया। वह चाहते थे कि कुसुम तब तक देवघाट में रहे , जब तक वह कोई नौकरी नहीं कर लेते या कोई अपना व्यवसाय नहीं शुरु कर देते। इस बीच मैं माँ बन चुकी थी। पाहुन का आना-जाना लगा रहा। वह आते, कुछ दिन रुकते और फिर अपने गाँव चले जाते। कुसुम की विदाई को लेकर फुसफुसाहटें शुरु हो चुकी थीं। लोग अपने-अपने ढंग से बातें गढ़ने लगे थे। दिन गुज़रते रहे।

        ......और एक दिन वज्र टूट पड़ा। पूरा का पूरा आसमान हमारे घर के ऊपर औंधे मुँह आ गिरा। विपत्ति के काले बादलों ने ऐसे ढँका कि आज तक ऍंधेरा पसरा हुआ है।.........बहुत छटपटाई थी कुमुद। जामुन की तरह काले हो गए थे उसके होठ। सारी देह नीली पड़ गई थी। इसके पहले कि कोई समझे-बूझे चली गई कुमुद। सुबह का समय था। जाड़े की सुबह को अपनी मौत की ऑंच से पिघलाकर पानी-पानी कर गई कुमुद।........रोने के लिए भी समय नहीं दिया। आनन-फानन में कुमुद का दाह-संस्कार हुआ। इस बुरी घड़ी में पट्टीदारों ने साथ दिया। कुमुद की अकाल-मृत्यु ने सबको सकते में डाल दिया था। कुल की मर्यादा ढँकने-छिपाने में लगे थे सारे लोग।.......पर कलंक छिपता है भला ! जब चन्द्रमा का कलंक नहीं छिप सका तो.......।

        मैं ही अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभा सकी। बड़ी भौजाई थी मैं। मुझे ही सँभालना था। मुझे ही अपनी ऑंखें खोलकर अपनी गृहस्थी को......अपने घर-बार को देखना था।.....अपने परिजनों की देख-रेख करनी थी।......जो मैं नहीं कर सकी।......और कुसुम ? कुसुम को तो काठ मार गया था। पत्थर बन गई थी वह। उस दिन जो कुम्हलाई कुसुम, सो आज तक उसके चेहरे पर चमक नहीं देख सका कोई। उसका तो सब कुछ उजड़ गया। पूरा जीवन ही जड़ से उखड़ कर इस तूफ़ान में उड़ गया।.... मैं बहुत कुछ कहना चाहती हूँ।.....पर क्या कहूँ ? अब सब कहना-सुनना बेकार है। अब मेरी समझ में आया कि मुसीबतों से जूझने के लिए ढीठ रीढ़ चाहिए। मुझ जैसी औरतों की रीढ़ तो जनमते ही सौरी घर में तोड़ दी जाती है। 

        मैंने अब तक जो कुछ कहा है, उसमें बहुत सारा झूठ शामिल है। अब कोई पूछे कि झूठ क्यों ?......तो झूठ इसलिए कि मुझे झूठ की छाया में जीने की आदत पड़ चुकी है। सच जब रौरव नरक की आग में जलाए, तो साँस लेने के लिए झूठ की छाया में जाना पड़ता है। इसे वही समझ सकता है, जिसे बिना किसी अपराध के दंड भोगना पड़े। मेरा यह तर्क बेकार और वाहियात हो सकता है, पर यह सच है कि ऑंधी में दीया-बाती की तरह टिमटिमाती रही हूँ मैं।

        मुझे जबरन वापस ससुराल भेजा गया। मुझे विदा कराने कोई नहीं आया था। भौजी और भइया ने मौन साध लिया। बाबूजी इस बात पर राज़ी नहीं थे कि मैं देवघाट में रहूँ। वह नहीं चाहते थे कि पहाड़ सा मेरा जीवन उनकी छाती पर बोझ बना रहे। उन्हें मेरी नहीं, गाँव-जवार......कुल-ख़ानदान की चिंता थी। वह सब कुछ को भाग्य का खेल मानते रहे। उन्होंने साफ़-साफ़ कहा था - ''जीवन भर अपनी ब्याहता बेटी को अपने घर रखकर दुनिया को कौन सा मुँह दिखाऊँगा ?.......किसके-किसके सवालों के जवाब देता रहूँगा ?''

        भइया मुझे मेरी ससुराल छोड़ आए। यदुनाथ दुबे बम्बई में थे। साल भर बाद वह गाँव लौटे, तो मुझे साथ लेकर बम्बई गए। मैं पति के साथ परदेस पहुँची। देसी कट्टों से भरा एक बक्सा भी मेरे साथ-साथ बम्बई आया था। इन्हीं कट्टों को बेचकर यदुनाथ दुबे ने अपना व्यवसाय शुरु किया। शराब,......मटका,......हथियार,......फिल्मों में एक्स्ट्रा डांसरों की सप्लाई जैसे कई धंधों से गुज़रते हुए एक बड़े व्यवसाय की नींव पड़ी। बम्बई के एक उपनगर में बँगला,....गाड़ियाँ.....बड़ा सा दफ्तर और लाखों-लाख का लेन-देन। इस बीच एक कमसिन औरत को ले आया यदुनाथ दुबे। अब मुझ जैसी नौकरानी के साथ पूरा जीवन तो वह काट नहीं सकता था। एक ख़ूबसूरत बीवी के बिना बड़े लोगों का संसार अधूरा होता है। ऍंग्रेज़ी बोलने वाली इस ख़ूबसूरत औरत ने देखते-देखते दुबे के संसार को वैभव से भर दिया। वह दुबे के साथ शराब पीती, पार्टियों में जाती और व्यवसाय के हित में लोगों को फाँसती। मैंने बम्बई पहुँचते ही साफ-साफ दुबे से कह दिया था कि मैं रोटी पका सकती हूँ........कपड़े धो सकती हूँ,.......तुम्हारा शरीर थक जाए तो गू-मूत साफ कर सकती हूँ, पर तुम्हारे साथ सो नहीं सकती। मेरी देह और मेरा मन पाने का अधिकार तुम खो चुके हो। तुमने मेरी कुमद की देह को नष्ट किया है। तुमने उसकी निर्मल देह को वासना की आग में झोंका है। उसकी नासमझ उम्र और भोले मन को नरक की आग में जलाया है।

         यदुनाथ दुबे को मेरी देह की ज़रूरत नहीं थी। वह बम्बई के बाज़ार का खिलाड़ी बन चुका था। उसके लिए क़दम-क़दम पर देह बिछी हुई थी। जब वह अपने लिए नई औरत ढूँढ़कर लाया, तो न उसे कोई झिझक थी और ना ही मुझे कोई चिंता। वह ताक़तवर औरत थी। उसने सब कुछ देखते-देखते हासिल कर लिया। हाँ, मुझे लेकर वह निर्विकार थी। उसने मुझसे कभी कुछ नहीं पूछा। मैं बँगले के पिछले हिस्से में रहने लगी थी। दुबे की पाप की कमाई से अन्न खाकर प्राण रक्षा का पाप करती रही मैं।

        मैंने झूठ कहा कि वे यहाँ आना चाहते थे। मैंने यदुनाथ दुबे नाम के इस राक्षस को कुमुद की मौत के बाद कभी आप कहकर नहीं पुकारा। न तो उसे यहाँ आना था और ना ही वह यहाँ आना चाहता था। उसके व्यवसाय, उसके धन, उसके हुनर से मेरा कोई लेना-देना नहीं। मैंने उसे सिर्फ इतना भर कहा था कि मैं देवघाट जा रही हूँ। वह पल भर के लिए अचम्भित हुआ था। मुझे सिर से पाँव तक देखा था और मुस्कुरा उठा था। ज़हर बुझी मुस्कान थी वह। ...........मैंने शुरुआत में जो कुछ कहा है, वे सब मेरी कल्पनाएँ हैं। क्या करती मैं ? पच्चीस साल में ढेरों कल्पनाएँ करती रही हूँ। इन कल्पनाओं को सुनाने बैठूँ, तो कई युग निकल जाएँ। इन्हीं कल्पनाओं के सहारे बेमतलब जीवित रही हूँ। इन्हीं कल्पनाओं से......इस झूठ से मुक्त होकर अब जीना चाहती हूँ मैं।

        .....यह भोंदू सा दिखनेवाला नीलेश ही वह देवदूत है, जिसने मेरी मुक्ति की राह खोल दी है। वह रेलवे की नौकरी का इन्टरव्यु देने बम्बई पहुँचा। मेरी ससुराल के गाँव जाकर बम्बई का पता लिया और एक दिन मेरे सामने खड़ा हो गया। उसी ने बताया कि बाबा सारी-सारी रात अकेले में रोते हैं। बाबूजी और अम्मा की भींगी हुई ऑंखों से हर रोज़ ऑंसू बनकर आप टपकती हैं। मेरी दिदिया आपके बारे में ढेरों प्यारे-प्यारे क़िस्से गढ कर सुनाती रहती है।..........और....बुआ, मैं आपको विदा कराने आया हूँ। साथ लेकर ही जाऊँगा।

        मैंने देवघाट से वापस नहीं जाने का निर्णय लिया है। मेरे बाबूजी पण्डित धूर्जटि पाण्डेय भी नहीं चाहते कि उनकी बेटी वापस जाए। मैं भी दुबे से अपने सम्बन्ध पर मृत्यु की तरह ताला जड़कर और चाबी समुद्र में फेंककर आई हूँ।.

 

हृषीकेश सुलभ

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