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योद्धा
भाग -7 (आपने
पढ़ा - वर्तमान देवराज इन्द्र की इन्द्रियलोलुपता एवं अदूरदृर्शिता से व्यथित
देवप्रजातियों में विद्रोह भावना भर गई। देवगुरु बृहस्पति ने कूटनीति करते
हुए पाताल नरेश दैत्यराज बली को देवराज इन्द्र को पद्च्युत करने के लिए
आमंत्रित किया। दैत्य
राज ने अत्यंत चतुराई एवं चपलता पूर्वक अपने कुछ विश्वस्त सैनिकों
के साथ छद्म वेश में अमरावती के राजप्रसादों पर अधिकार कर लिया व स्वयं को
इन्द्रसेन घोषित किया। इस
मध्य इस कूटनीति की जानकारी बृहस्पति ने स्वयं क्षीरसागर जाकर दिव्य पुरुष
एवं देवो के आध्यात्मिक गुरु विष्णु को दी एवं साथ ही किसी भी आपातकाल
में देवप्रजाति कि सहायता हेतु प्रार्थना की ---- अब आगे)
सम्पूर्ण नगरं सिंघे फूंके जाने से गूंज रहा था। वृहत संख्या में दैत्य सैनिक
अमरावती में प्रवेश कर रहे थे। दैत्यराज बली ने राजप्रासाद पर अधिकार कर
लिया था। हर कोई हतप्रभ सा इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को देख रहा था। कहीं -
कहीं देवसेना प्रतिरोध कर रही थी तथापि अंधिकाश सैन्य अधिकारी षडयत्र
पूर्वक नगर वधुओं के यहां निंद्रामग्न थे और ऐसे संक्रमण काल में वे सेना
के दिशा निर्देश हेतु उपलब्ध नहीं थे। सूर्य
क्षितिज से उपर उठ चुका था एवं सम्पूर्ण अमरावती स्वर्णमयी हो चुकी थी।
दैत्यराज बली राजप्रसाद के सर्वोच्च गवाक्ष में एक हाथ में खड्ग व एक हाथ
में सिंधा लिए खड़ा था। धीरे - धीरे वीथियां दैत्यसैनिकों से पटती जा रही थी।
राज प्रासाद के प्रागण में दैत्य सैन्य दल पंक्तिबद्व रुप से एकत्र हो रहें
थे। अनेक स्थानों पर दैत्य सैनिक महाराज इन्द्रसेन की जय बोलने वालों को
अभय दे रहे थे। पुष्प
वणिक वीथी से वृहत आकार की टोकरियों में पुष्प एकत्र कर मार्गो के दोनों ओर
सजाया जा रहा था। भय अथवा आश्चर्य एवं कौतूहल के वश अमरावती के नागरिक भी
श्रृंगार मे दैत्य सैनिको की सहायता कर रहे थे। प्रतिरोध अब समाप्त प्राय
सा था। दोपहर दिन चढ़ चुका था। सहसा
पश्चिम दिशा से आता हुआ कोलाहल सुनाई देने लगा। ऐसा लग रहा था। मानों सैकड़ों
तांत्रिक किसी मंत्र क्रिया में लग्न हो एकसाथ जाप कर रहें हो। मंत्र के घोर
शब्द फट् - फट् आदि एक साथ उच्चारित हो रहे थे। घोर गर्जन एवं इस विस्मयकारी
कोलाहल से अमरावती के नागरिक भयभीत से अपने आवासों मे ंलौटने लगे। कहीं-
कहीं गवाक्षों आदि से झांक कर उत्सुकता को शान्त करना चाहते थे।
पश्चिमी विक्षोभ अब नजदीक आ रहा था। गगनभेदी तांत्रिक मंत्रोच्चार भय को
आश्रय दे रहा था। अमारावती की वीथियां नागरिकों से विहीन हो चुकी थी।
सम्पूर्ण नगर में मात्र दैत्य सैनिक ही दीख रहें थे। अचानक पश्चिम दिशा पर
स्थित मुख्य द्वार पर अवस्थित विजय नक्कारे गूंजने लगे साथ ही वहां खडे
वीरों ने पूरी क्षमता से सिंघों को फूंकना शुरु किया ।नीचे खडे दैत्य सैनिक
मानों इसी क्षण हेतु प्रतीक्षारत थे। उन्होने विलम्ब नहीं करते हुए पश्चिम
द्वार के विशाल पटों को खोल दिया तब तक एक समूह राजपथ से द्वार की ओर बढ़ता
दीखने लगा था। दृश्य
रक्त जमा देने हेंतु पर्याप्त था। राजपथ के दोनों और विशिष्ठ वेशभूषा में
कतारबद्व रुप में सैनिक चल रहे थे। एवं इनके मध्य महिषों का एक विशाल समूह
चल रहा था। जिनके गले में पुष्पहार एवं मस्तक पर सिंदूर का तिलक था। ये
मदमस्त महिष झूमते हुए निर्विघ्न चल रहे थे। इस विशाल काय झुण्ड के
पश्चात एक अद्भुद रथनुमा यान जो कि वर्गाकार समतल क्षेत्र सा था चल रहा
था जिस पर सैकड़ो तांत्रिक एक पांव पर खडे मारक एवं उडययन बंध मंत्रो का
उच्चारण कर रहे थे। ये तांत्रिक रक्तिम नेत्र,
घुंघराले केश और श्याम वर्ण तन के थे। इनके तन पर
मात्र मृग छाला थी। ये लयबद्व मंत्रोच्चार कर रहे थे एवं एक साथ फट-
फट् कहते तो भीषण गर्जन सा प्रतीत हो रहा था। इस
वर्गाकार रथ के पृष्ठ भाग में एक रजत निर्मित आलयनुमा रथ था इसे पंचविश अश्व
खींच रहे थे। इस चांदी के विशाल मंदिर में दो मूर्तियां स्थापित थी । ये काली
एवं भैरव की थी। काली की मूर्ति एक काले चमचमाते हुए पाषाण से निर्मित
थी। वह वामा थी। उसका मुखारविंद अत्यंत सुंदर एवं सुघड़ था। उसके नेत्र चपल
से थे मानो अभी - अभी जीवंत हो उठेगे। उसके तन पर एक कमरबंध था। जो
अत्यंत दुलर्भ हीरको से जटित था। उसका शेष तन अत्यन्त आकर्षक एवं वस्त्र
विहिन था। उस मूर्ति के पार्श्व भाग में एक अत्यंत वीभत्स मूर्ति जो भैरव
की थी। इस पाषाण प्रतिमा के नेत्र भयावह एवं रौद्र थे।इस प्रतिमा के एक
हाथ में खड्ग एवं एक मे धधकती अग्नि थी । इस मूर्ति पर पूरा सिंदूर एवं
महिष रक्त पुता था अत: इसके पाषाण का ज्ञान कठिन था। इन दोनों प्रतिमाओं के
पृष्ठ भाग में एक ऊंचा रजतासन् था जिस पर श्यामवर्ण वाला अत्यंत वृद्व
किंतु विकट चितवन एवं अद्भुद उर्जावान व्यक्ति बैठा था। इसके श्वेत केश
व श्वेत दाढ़ी एवं एक नेत्र के स्थान पर एक ठोस पारद का नेत्र था जो स्फुलिंग
की भांति रह- रह कर चमक रहा था। इस विकट वृद्व पुरुष ने श्वेतवस्त्र धारण कर
रखे थे।
प्रत्येक 'फट्
-फट् ' के गर्जन पर एक महिष को काटा जा रहा था एवं
एवं उसके रक्त से भरा पात्र उस भीषण वृद्व को दिया जाता एवं वह अपना एक नेत्र
बंद कर श्याम पर्पटीयुक्त होठो से कुछ बुदबुदाता हुआ बारी - बारी से उस
अनिंघ सुंदरी प्रतिमा एवं भैरव का रक्ताभिषेक करता। महिष
कटते जा रहे थे। राजपथ रक्त स्नान करने लगा । तांत्रिकों के समूह में
मानों स्वस्फूर्त उर्जा थी।वे अधिक गंभीर स्वर में मंत्रोच्चार करने लगते ।
भयवश
अमरावती के नागरिको ने गवाक्षों के पट आवृत कर लिए थे। वह विशालकाय अद्भुद
समूह धीरे धीरे पश्चिम द्वार की ओर बढ़ रहा था। समूह की स्वागतार्थ पट अनावृत
थे। ज्यों - ज्यों समूह द्वार के पास आ रहा था। नक्कारो एवं सिंधें की
ध्वनि गगन भेद रही थी। उस
समूह के नगर में प्रवेश के साथ ही महाराज इन्द्रसेन की जय - जय कार होने
लगी। राजप्रासाद तक जाने वाले पथ पर दैत्य सैनिक कतर बद्व हो चुके थे।
समूह धीमे - धीरे राजप्रासाद की ओर अग्रसर था। सूर्य मस्तक पर चमक रहा था।
महाराज बली ने गवाक्ष से उस समूह को राजप्रासाद की ओर आते देखा तो वे चपल
भाव से मुड़े और कक्ष के द्वार से वीथिका में आ गए उनकी चाल में एक दृढ़ता
थी। तृतीय
प्रहर के प्रारंभ तक समूह राज प्रासाद के भव्य द्वार तक पहुंच चुका था।
दैत्यराज बली सीढ़िया उतर कर मुख्य द्वार तक आ चुके थे। सम्पूर्ण समूह दो
भागों में विभक्त हो गया एवं एक सीधा पथ जो उस सुंदर प्रतिमा के रथ तक
पहुंचता था बन गया। दैत्य राज महिषों के मध्य होते हुए वर्गाकार तांत्रिक
रथ को पार कर चढ़ गए एवं उस सम्पूर्ण रथ को पार कर वे उस मुख्य रथ तक
पहुंच गए जहां वह विकट वृद्व देवी व भौरव की प्रतिमा का रक्ताभिषेक कर
रहा था। उस रजत रथ में चढ़ते ही दैत्यराज बली अत्यंत विनम्र भाव से
करबद्व हो कर खड़े हो गए। शिष्य हाथ
जोड़े गुरु के समक्ष विनीत भाव से खड़ा था एवं एकाक्ष गुरु के एक
नेत्र में शिष्य के प्रति स्नेह व दूसरा नेत्र निर्र्विकार था। कई
पल गुरु- शिष्य आत्ममुग्ध से खड़े रहे। सहसा सैन्यपति ने आकर तंद्रा भंग
की। दोनों
की दृष्टि शीघ्र ही
प्रतिमाओं के सम्मुख खड़े एक अत्यंत विकराल एवं हृष्ट पुष्ट महिष पर
पड़ी।श्वेत रंग के इस महिष के कर्ण स्वर्ण आभूषणों से सुशोभित थे। श्रंग
पर रजत मढ़ी थी एवं ग्रीवा में अनेको पुष्पाहार थे। महिष को ठीक प्रतिमा के
सम्मुख खड़ा किया गया था। शुक्राचार्य एवं बली ने महिष की परिक्रमा की
तत्पश्चात् महिष के सम्मुख कर बद्व विनती करतें हुए कहा- ''हे
परम पशु,
तुम्हारी श्रेष्ठता अतार्किक है
एवं मातृशक्ति परमभाव से तुम्हारी बलि का नैवेध प्राप्त कर प्रसन्न होती
है। मैं दैत्यराज बली समस्त दैत्य कुल के इस हर्ष एवं सम्मान के अवसर पर
तुम्हें मातृशक्ति के चरणों में भेंट करता हूं''
खड्ग के
एक ही वार से बलिपशु
का सिर
अलग होकर भूमि पर
जागिरा। ताजा बहते रक्त
से
पार्श्व
में
खड़े
सैन्यपति ने एक
स्वर्णकलश
भर बली
के
हाथ
में दिया। तांत्रिकों के
समूह ने मानस यज्ञ में
मानो अन्तिम
आहूति देते हुए।
'हुं
फट् फट्'
हुंकारा। शुकाचार्य ने बली
को रक्त
से उस अनिंध
सुं दर प्रतिमा का
रक्ताभिषेक का आदेश दिया। बली
हाथ में
स्वर्ण
कलश
लिए
रक्त से उस अनिध सुंदर
प्रतिमा का रक्ताभिषेक करने लगा।
पवित्र श्वेत महिष का
ताजा एवं गाढ़ा रक्त उस
रति को लज्जित करने वाली
प्रतिमा के चमकीले नेत्रों,
सुडौल नासिका एवं कपोलो,
मृणालग्रीवा,
उन्नत उरु प्रदेश,
क्षीण कटि
व नाभि से होता हुआ
सम्पूर्ण तन को रक्तिम करने लगा। पात्र में
शेष आधे रक्त से भैरव का अभिषेक किया गया। तत्पश्चात शुकाचार्य को अवलम्ब
प्रदान करते हुए बली ने
उन्हें रथ से नीचे उतारा एवं दोनो राजप्रासाद की ओर बढ़
चले ।
राज सभागृह जगमगा रहा था।
दोनो इंद्रासन तक पहुंचे । सभागृह खचाखच भरा था। शुकाचार्य ने बली को आसन पर
बिठाते हुए स्नेह से कहा- ''तुम्हारा
यश चहुंदिशि फैले दैत्यराज ।आज से स्वर्ण पर भी इन्द्रासेन का आधिपत्य हुआ''
और स्वर्णपात्र में से
शेष रक्त से दैत्य राज के ललाट पर तिलक कर दिया। सम्पूर्ण सभागार जयकारों से
गूंज उठा। रात्रि के दो
प्रहर बीत चुके थे।
दैत्यराज बली एवं
गुरु
शुक्राचार्य मंत्राण
कक्ष में थे। ''हमें
प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा गुरुदेव''
कक्ष में
मौन छा गया । इस बार बली के मुख पर भी कदाचित
शंका स्पष्ट
थी । शुकाचार्य आसन से
उठ गए। दोनो ने एक दूसरे को अभिवादन किया। एवं शुक्राचार्य कक्ष से बाहर
प्रस्थान कर गए।
सम्पूर्ण नगर में दीप झिलमिला रहें थे।
(क्रमश:)
-
अरविन्द सिंह आशिया
भाग -
।
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