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अंधेरों से आती आवाज़ें
-2     

मैंने कह दिया जो उसके कानों की चाहत थी।
‘लेकिन उस दिन की तरह ज़ोर से कहो ना... ऑफिस में इतनी तेज़ आवाज़ में कह सकते हो, यह तो घर है यार... और वैसे भी अकेले हो...’
‘तुम भी ना कमाल करती हो... अब हमारी उम्र देखो, ऐसा पागलपन इस उम्र में शोभा नहीं देता...’
‘क्या उमर है हमारी... प्यार की कौनसी उम्र होती है... वैसे भी कौनसे बूढ़े हो गये हैं हम...’
‘ओके बाबा, लेकिन...’ मैं कुछ कहता इससे पहले ही उसने मेरी बात काटते हुए कहा, ‘कुछ मत कहो अब तुम, मुझसे प्यार करते हो तो बस मेरी बात सुनो...’
‘हां, तुम अपने बारे में भी तो बताओ ना...’
‘वो एक लंबी दास्तान है श्याम बाबू... उस इतिहास को भूल जाने दो...’
फिर एक लंबी-सी खामोशी छा गई हमारे बीच। मैं बहुत कुछ पूछता रहा और वह बस हां-हूं करती रही। बस बीच-बीच में जिद करके अपने मन का चाहा मुझसे अनगिनत बार सुनती रही। ‘आई लव यू...’
***

शनिवार आने तक मैं रोज़ थोड़ी बहुत पीता रहा और हर शाम उसके ख्वाब देखता रहा। रोज़ दिन में दो बार उससे बात होती और हर बार उसके पास कोई प्लान होता कि शनिवार को यह करें कि वह करें। आखिर यही फाइनल हुआ कि उस दिन साथ में लंच करेंगे और कोई फिल्म देखेंगे।
शनिवार के दिन सुबह से ही मैं बहुत बेचैन रहा। क्या पहनूं, क्या नहीं पहनूं, यही उधेड़बुन चलती रही। आखिर हमेशा की तरह सरदी से बचाव वाले कपड़े पहने और ऑफिस के लिए निकल गया। करीब साढ़े बारह बजे उसका फोन आया कि वो घर से निकल चुकी है और बाजार में कोई काम निपटाकर सीधे मेरे ऑफिस के बाहर पहुंचेगी। यानी इस काम में उसे एक घंटे से कम का समय लगना था। मैंने कहा कि मैं डेढ़ बजे से पहले ही उसे बाहर मिलूंगा।

मैंने अपना काम जल्दी ही निपटा दिया और पंद्रह मिनट पहले ही बाहर चला आया। वह रिक्शे से उतरकर आ रही थी। आज उसने काले पुलोवर के साथ नीले फूलों वाली साड़ी पहन रखी थी और सामान्य स्त्रियों जैसा ब्लाउज। जब मैं उसके नजदीक पहुंचा तो उसने नमस्ते किया। मैंने कहा, ‘आज मास्टरनी नहीं लग रही हैं आप।‘ वह मुस्कुराई, ‘उस दिन तो शिक्षा विभाग जाना था, इसलिये पहना, हमेशा थोड़े पहनते हैं।‘ मैंने एक रिक्शां रोका और उसे इस इलाके के एक बढिया रेस्टोरेंट ले चलने के लिए कहा। रिक्शे में वह मुझसे सटकर ऐसे बेफिक्र बैठी थी, जैसे हमें दुनिया का कोई डर न हो या कि हम पति-पत्नी हों। रेस्टोरेंट में जाकर वह कुछ असहज हुई। बाद में उसने बताया कि वह कभी ऐसे किसी रेस्टोरेंट में नहीं गई थी। वहां का हल्का‍ संगीत और अंधेरा उसे फिल्मी लग रहा था। हमने साथ खाना खाया। उसके खाने में उसका गंवईपन साफ झलक रहा था। हालांकि उसने पूरी कोशिश की थी कि शहरी नफासत अपना सके। खाने के दौरान बात करते हुए उसने बताया कि उसने ग्रेजुएशन के बाद प्राइवेट एम.ए. किया और अंग्रेजी में बी.ए. भी किया। वह प्राइमरी के बजाय हाई स्कूल के छात्रों को पढ़ाना चाहती थी, इसलिए बी.एड. भी किया और सैकिंड ग्रेड टीचर की भर्ती परीक्षा के लिए फॉर्म भी भरा। लेकिन जिन दिनों में प्रतियोगी परीक्षा आयोजित हुई, उन्हीं दिनों उसके बेटा पैदा हुआ। वो चाहकर भी परीक्षा नहीं दे सकी। कई बरस पहले की यह बात बताते हुए उसके चेहरे पर जिंदगी के हालात से समझौता करने के निशान साफ़ महसूस किये जा सकते थे। इसके बाद तो वह घर-गृहस्थी में ऐसी उलझी कि सब कुछ छूट गया... और वो प्राइमरी की मास्टरनी ही रह गई। खाने के बाद उसे बहुत बुरा लगा जब तीन सौ से ज्यादा का बिल आया। उसे ऐसी फिजूलखर्ची पसंद नहीं थी।

हम बाहर निकले तो मैंने पूछा कि घर कब जाना है? उसने बताया कि वह शाम तक का कहकर आई है। मैंने एक रिक्शा रोका और एक सिनेमा हॉल चलने के लिए कहा। उसने पूछा, ‘कौनसी फिल्म देखने जा रहे हैं हम?’ मैंने कहा, ‘पता नहीं, जो लगी होगी, देख लेंगे।‘ वह मुस्कुंरा दी। सिनेमा हॉल पहुंचकर रिक्शे वाले को पैसे देने के बाद मैंने उसे दो सौ रुपये देते हुए कहा कि दो बॉक्स के टिकट ले आओ। वह गई और टिकट ले आई। हम सिनेमा हॉल में पहुंचे तो हॉल खाली था। आज तो याद भी नहीं कि कौनसी फिल्म थी और क्या कहानी थी। बॉक्‍स में हमारे अलावा दो-चार जोड़े और थे। एक कोने में हम थे।
***

उसकी बारंबार ‘आई लव यू’ की मांग से तंग आकर मैंने कहा, ‘इसके अलावा भी कुछ है जिंदगी में...’
‘हां, है तो सही, लेकिन इसके बिना शायद कुछ नहीं है...’
‘तो उसकी बात करो ना...’
‘वही तो कर रही हूं अब तक... तुम नहीं जानते, मैंने तुम्हें कितनी बार, कितनी तरह से याद किया है... तुम्हारे लिए दुआएं और बड़ी मन्नतें मांगी हैं मैंने... तब जाकर तुम मुझे फिर से मिले हो।’
‘अच्छा...’
‘हां’ कहकर वो एकदम ख़ामोश हो गई।
***

हॉल के अंधेरे में टिकट चैकर के जाने के बाद उसने पूरे अधिकार के साथ मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया। अपनी गोद में रखकर वो मेरा हाथ सहलाती रही। मैंने अपना सिर उसके कंधों पर टिका दिया और हम चुपचाप बतियाते रहे। अपनी पसंद, नापसंद से लेकर दुनिया जहान की बातें। उसने बताया कि उसे उपन्यास पढ़ना पसंद है, लेकिन वक्त नहीं मिलता। संगीत में उसे ग़ज़लें पसंद हैं, बस यही शौक कभी-कभार पूरा कर लेती है घर में। अंग्रेजी में बात करना और अंग्रेजी अखबार पढ़ना, न्यूज सुनना पसंद है, मगर गांव में तो बस रेडियो-टीवी पर अंग्रेजी न्यूज़ से काम चलाना पड़ता है। शहर आती है तो अंग्रेजी अखबार और किताबें ले जाती है, जो गांव जाने के बाद कई दिनों तक यूं ही पड़े रहते हैं। फिर अखबार किसी काम आ जाते हैं और किताबें पढ़े जाने का इंतज़ार करती रहती हैं। इन बातों के बीच उसका प्रेम प्रदर्शन भी चुपचाप चलता रहा। इंटरवल तक वह मेरे गाल और हाथ कई बार चूम चुकी थी।

बहुत-सी बातें की थीं हमने उस दिन, फिर भी लगता था कि बहुत-सी बातें रह गई हैं। मैंने उसे बताया कि मैं उससे मिलने के बाद रोज़ शराब के दो पैग पी रहा हूं तो उसे बुरा नहीं लगा। वह बस इतना ही बोली, ‘चलता है इतना तो।‘ फिल्म ख़त्म होने पर हम जब बाहर निकले तो अंधेरा गहरा रहा था। मैंने ऑटो रिक्शा रुकवाया और हम दोनों बैठ गये। उसने कहा कि वह घर तक ऑटो से नहीं जाएगी। मैंने कहा कि जहां तक जाना हो ऑटो ले जाये। मेरा घर रास्ते में पड़ता है इसलिए मैं रास्ते में उतर जाउंगा। वह मान गई। फिर मिलने की बात पर उसने कहा कि अगर मैं चाहूं तो वह कल शाम यानी इतवार के दिन वह मेरे घर आ सकती है। मैंने हां भर दी तो वह बहुत खुश हुई। मैंने उसे अपने घर का पता समझाया और लिख कर देना चाहा तो उसने कहा कि वह उस बिल्डिंग को पहचानती है। वह आसानी से पहुंच जाएगी। मैं दूसरी मंजिल पर रहता हूं। उसने कहा कि वह शाम सात बजे बाद दूध की डेयरी पर मेरा इंतजार करेगी। डेयरी मेरे फ्लैट की खिड़की से दिखती है।
***

लंबी खामोशी के बाद उसने पूछा, ‘तुम्हारे घर से आकाश दिखता है...’
’हां, लेकिन क्यों...’
‘बाहर आ जाओ, हम दोनों एक साथ आसमान में किसी बड़े तारे को देखेंगे... इस तरह इतने बरसों बाद मिलेंगे...’
‘मैं तारों को नहीं पहचानता...’
‘लेकिन हम तो पहचानते हैं ना एक दूसरे को और आसमान को... चलो बाहर निकलो और देखो...’
मैं उठकर बाहर निकला तो हल्की-सी कंपकंपी महसूस हुई।
‘क्या हुआ, सर्दी लग रही है...’
’हां’
‘तो देखो अनगिनत तारे हमारे लिए रोशनी बिखेर रहे हैं...तुम वहां से कहोगे तो सितारों की रोशनी मुझ तक तुम्हारा संदेश ले आएगी...कहो, कहो ना’
‘क्या ...’
‘अरे बुद्धू वही, जो अब तक कह रहे थे, आई लव यू...’
उसने किसी फिल्मी धुन पर गाते हुए जैसे आखिरी लफ्ज कहे।‘
***

अगला दिन कुछ ज्यादा ही बेचैनी लेकर नमूदार हुआ। पहले तो कुछ करने का मन ही नहीं हुआ। फिर मुझे लगा कि उसके स्वागत में कुछ कर लेना चाहिये। मैंने कपड़े धोने के बाद घर को सजाने-संवारने का काम शुरु किया। दोनों कमरों की और रसोई की अच्छी तरह सफाई की। अस्तव्यस्त- चीजों को करीने से रखा। उसकी राह देखता हुआ मैं जल्दी से काम निपटाये जा रहा था। शाम गहराने लगी तो मेरी बेचैनी बढ़ने लगी। बार-बार मैं खिड़की पर जाकर देख आता। दूर तक उसके आने की कोई सूरत नज़र नहीं आ रही थी। सात बज गये तो मेरी हताशा बढ़ने लगी। पता नहीं उसे कोई काम हो गया हो और वह नहीं आये। मैंने उसके लिए दाल, चावल और आलू-मटर-पनीर की सब्जी भी बनाकर रख ली। आटा गूंद कर रख लिया। सोचा कि उसके हाथ की पकी रोटियां खायेंगे हम दोनों साथ-साथ। बेचैनी के साथ बढ़ती हताशा में मैंने एक पैग बना लिया।

जिसने कर लिया दिल में पहली बार घर दानिश
उसको मेरी आंखों की पुतलियां समझती हैं।
***

वह मुझे सितारों के बारे में बताती रही और मैं सुनता रहा। कुछ देर बाद उसने कहा कि चलो अब सोने चलते हैं। मैं उसके इशारों पर भीतर आ गया। बाहर सच में ठंडक बढ़ गई थी, कंबल मुंह तक ले आने के बावजूद कंपकंपी हो रही थी।
‘सर्दी लग रही है क्या...’
‘हां, बाहर काफी ठंडक है।‘
‘अब तो मैं तुम्हें भीतर ले आई हूं, मेरे होते हुए सर्दी से डर... वो गाना याद है कि नहीं...’
‘कौनसा...’
‘हुस्न पहाड़ों का ओ सायबा... सरदी से डर कैसा संग गर्म जवानी है...’
***

पहला पैग बहुत धीरे-धीरे सिप करते हुए मैं खिड़की से देखता रहा और आखिरकार आठ बजे उसकी लंबी कनक-छड़ी-सी कामिनी काया रास्ता तय करती हुई दिखाई दी। मैं दरवाजा उढ़का कर तेज़ कदमों से सीढियां उतर नीचे गया। उसने दूर से मुझे देखा और सीधे चली आई। आज वह सलवार सूट में थी। सर्दियों में इस वक्त सब लोग अपने घरों में दुबके होते हैं। कोई इक्का -दुक्का आदमी ही दिखता है सड़क पर। मैं जिस सरकारी बिल्डिंग में रहता था, उसमें ज्यादातर फ्लैट खाली पड़े थे। मेरे वाले फ्लोर पर तीन में से दो खाली थे। मैंने देखा कि नज़दीक आते-आते उसने अपनी चुन्नी सिर पर लगभग घूंघट की तरह सरका ली थी। सर्द अंधेरे में उसकी आंखें चमक रही थीं। बिल्कुल पास आकर वह हल्के से नमस्ते कर मेरे पीछे सीढियां चढ़ती ऊपर आ गई। मैंने कहा, ‘बहुत देर लगा दी आपने तो?’
***

हम दोनों कितनी देर बातें करते रहे, याद नहीं। रात के करीब दो बज गये थे। उसने मांग की तो बरसों बाद हमने फोन पर फिर से चुंबनों का लेनदेन किया और पुरानी यादों में खो गये। मैंने बहुत जानना चाहा कि इन बीस बरसों में उसके साथ क्या हुआ, लेकिन वो चुप लगाती रही। मैंने आखिर उसे धमकी दी कि अगर वो नहीं बताएगी तो मैं फोन काट दूंगा। इस पर उसने कहा, ‘बताना तो नहीं चाहती तुम्हें, लेकिन बिना बताए हम आगे बात भी नहीं कर पाएंगे। अब बहुत देर हो गई है श्याम... मैं तुम्हांरे पास आती हूं, सुबह बात करेंगे, गुड नाइट...’
‘लेकिन, इस वक्त मेरे पास...’
‘हां, तुम्हारे बगल में... चलो सुलाओ मुझे... सुबह बात करेंगे।‘ कहकर उसने फोन काट दिया।
***

‘अब कैसे समझाउं कि सबको कैसे मनाकर बहाना बना कर आई हूं?’ उसने अपने पर्स के साथ एक छोटा बैग टेबल पर रखते हुए कहा। मैं रसोई से उसके लिए पानी लेकर आया। उसने पानी पिया और पानी पीते हुए ही पूरे घर का एक चक्कर लगाया।
‘तो ये है आपका खूबसूरत आशियाना?’
‘जी, क्या लेंगी आप? चाय, कॉफी या कुछ और?’
‘आप तो व्हिस्की लेंगे और हमें चाय में ही निपटा रहे हैं?... खुश्बू भी ना आंखों जितनी ही बुरी होती है दोस्त., सब बता देती है।’
‘तो आपके लिए बनाऊं... ?’
‘क्यों नहीं, आपकी दोस्ती के नाम एक जाम तो हम भी छलका सकते हैं?’
उसके इस बिंदास अंदाज पर मैं सच में मोहित हो गया। वह रसोई में गई और गिलास लाकर मेज पर रखते हुए कहने लगी, ‘तो डिनर तैयार है, बस चपातियां सेंकनी बाकी हैं?’
मैंने उसके लिए पैग बनाते हुए कहा, ‘आप तो बड़ी दूरदृष्टि रखती हैं।‘
‘आखिर दोस्त किसके हैं?’ उसने कहकहा लगाया।
उसने फ्रिज से ठंडे पानी की बोतल निकाली और गिलास भर दिया। वह बेफिक्री में आराम से मेरे सामने वाली आरामकुर्सी में पसर गई। फिर कुछ देर बाद उठी, गिलास उठाया और मुझे उठने का संकेत किया। मैं समझ गया था। हम दोनों ने गिलास टकराये और कहा ‘दोस्ती के नाम चीयर्स।‘ उसने अपना गिलास मेरे मुंह से लगाया और मेरा गिलास अपने होठों से। हम दोनों ने इस तरह पहला सिप एक साथ लिया। उसने कहा, ‘अब मैं तुम्हारी जूठी हो गई हूं और तुम मेरे जूठे।‘ पता ही नहीं चला कि कब उसने ‘आप’ का रिश्ता तोड़कर ‘तुम’ से जोड़ लिया।
‘बहुत प्यारे हो तुम... बिल्कुल बच्चे जैसे। मुझे बहुत अच्छे लगते हो। आई लव यू... तुम गांव के होकर भी इतने कोमल-चिकने हो कि क्या बताऊं... कहीं से नहीं लगते गांव के... और मैं शहर की होकर भी गंवार लगती हूं... मास्टरनी होकर भी अनपढ़ लगती हूं... तुम्हारी आंखें पता नहीं क्या जादू करती हैं कि मैं ख़ुद इनमें खिंची चली आई। तुम्हारी आंखें हैं कि मछुआरे का जाल... और कितनी मछलियां फंस चुकी हैं इस जाल में?’
***

कब नींद आई पता ही नहीं चला। सुबह जब आंख खुली तो धूप खिड़की से बहुत भीतर तक आ चुकी थी। काम वाली बाई आकर अपना काम करके जा चुकी थी। मैंने देखा मेरे मोबाइल की बैटरी खत्‍म होने का संकेत दे रही थी। सुबह के नौ बज रहे थे। मैंने फोन को चार्जर पर लगाया और बाथरूम में चला गया।

इस बीच मुझे सुनाई दिया कि फोन तीन बार बज चुका है। आज छुट्टी का दिन है, कोई सरकारी फोन तो होने से रहा। बड़ा बेटा लंदन से कर सकता है या छोटा वाला ऑस्ट्रेलिया से। लेकिन उसका भी तो हो सकता है। यह सोचते ही जैसे बदन में एक झुरझुरी-सी दौड़ गई। बाहर निकल कर देखा तो तीनों कॉल उसी के थे।

मैंने फोन लगाया तो कोई जवाब नहीं आया। मैंने किचन में जाकर अपने लिए चाय बनाई और अखबार पलटते हुए नाश्ता किया। इस बीच मैंने दो बार उसे कॉल किया। बस घंटी ही बजती रही। हार कर टीवी चलाया, हर चैनल पर बुराई के प्रतीक रावण पर अच्छाई के प्रतीक राम की विजय का जश्न मनाया जा रहा था। लेकिन मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। मैं तो इसी उधेड़बुन में था कि मेरे जीवन में आई इस इकलौती रहस्यमयी स्त्री ने कैसे पिछले बीस बरस गुजारे होंगे, जिनमें वह मुझे बराबर खोजती रही। टीवी बंद करके फिर से फोन मिलाया। कामयाबी की दुआ करते हुए। तीन-चार घंटियों के बाद आखिर जवाब मिला, ‘हां, हैलो, सॉरी मैं बाथरूम में थी। कैसे हो...’
’मैं ठीक हूं, तुम बताओ...’
’ठीक हूं। कल बहुत परेशान किया ना मैंने...’
’नहीं कोई बात नहीं...’
‘अब क्या करूं, अकेली हूं ना, तुम मिले तो लगा जिंदगी ही बदल गई मेरी...एक तुम ही तो हो जिसके साथ मैं अपने सारे अरमान निकाल सकती हूं। तुम्हें बुरा तो नहीं लगा ना...’
‘नहीं, इट्स ओके’
***

वह लगातार बोले जा रही थी। उसका बोलना अच्छा लग रहा था। मैं बस चुपचाप उसे सुन रहा था। अचानक उसने कहा, ‘मैं पहले कपड़े बदल कर आती हूं।‘ उसने अपना बैग उठाया और सामने बाथरूम में चली गई। मैं सोचता रहा कि इस आशा के भीतर कितनी आशायें दम तोड़ चुकी हैं और कितनी अभी जिंदा बची हैं, जिन्हें यह मेरे साथ पूरा करना चाहती है। मैं उसके खुरदुरे हाथों की गरमास को बारंबार अपने हाथ और गालों पर महसूस करता उसके अगले कदमों की कल्पना कर रहा था कि वह बाथरूम में से बिल्कुनल बदली हुई निकली। मैं हैरत से उसे ऊपर से नीचे देखने लगा।

हे भगवान, उसने क्या ग़ज़ब का रूप धरा था। उसने अपने बाल एक जूड़े में बांध रखे थे। हो सकता है पहले से ही बंधे हों, जिन्हें मैं शॉल और चुन्नी के कारण नहीं देख पाया। कानों से उसके झुमके गायब थे और उनकी जगह लंबी-काली ईयरिंग्स लटक रही थीं। उसकी चमकती-बोलती आंखों पर कत्थई फ्रेम का हल्के पीले रंग का चश्मा था। होठों पर गहरी कत्थस लिपस्टिक थी। गले में काली चांदी का कोई एंटीक किस्म का हार था, जिसमें एक लॉकेट लटका था। उसके नीचे उसने एक पीली टी शर्ट पहन रखी थी, जिस पर अंग्रेजी में ‘लव’ लिखा हुआ था। उसकी लंबी-चुस्‍त टांगें एक फेडेड जींस में कसमसा रही थीं। बस उसके पांवों में वही सैंडल थे, जिन्हें वह पहनकर आई थी।
***
‘तुमने बताया नहीं इस बीच क्या कुछ हुआ तुम्हांरे साथ...’
‘तुम्हारे तो मां-बापू-बीवी सब एक-एक कर चले गये... जैसा कि तुमने बताया, बापू को दिल का दौरा पड़ा, मां को उनका ग़म और बीवी को कैंसर लील गया... और मेरे परिवार को ये समाज लील गया...’
‘कैसे... क्या हुआ...’
‘बेटे ने इंजीनियरिंग करने के बाद फैक्ट्री डालने की जिद कर ली थी... उसके बाप ने सारी ज़मीन बेच दी और बेटे ने गोधरा में खेती के औजार बनाने का कारखाना लगा लिया। बाप-बेटे कारखाना चलाने में लग गए। बेटी शादी के बाद चली गई अपनी ससुराल। मैंने अपना तबादला शहर के नज़दीक करा लिया और पीहर के पास में ही किराये से रहने लगी। जिंदगी ठीक ही चल रही थी, उम्मीद थी कि बेटे का कारखाना चल निकलेगा तो सब ठीक हो जाएगा। लेकिन किस्मत में क्या लिखा है हम नहीं जानते।...’
***

वह नई अदा से लहराती, बल खाती चली आ रही थी। और उसकी अदाओं में टीवी पर देखी गई बहुत-सी छवियां नज़र आ रही थीं। उसने दूर से ही हाथ लहराते हुए कहा, ‘हाय डियर, हाउ आर यू?’
‘आई एम फाईन... वॉव यू लुक ग्रेट...’
’थैंक्स, बट सॉरी...’
’सॉरी ? फॉर व्हाट?’
‘टुडे आई हैव किल्ड दैट ओल्ड आशा...’
’ओह...इट्स ओके... रिलेक्स डियर, सिप योर ड्रिंक’
’थैंक्यू , यू आर सो नाइस हनी....’ कहकर उसने अपना पैग उठाया, एक सिप लिया और मेज पर रख दिया। वह उस आरामकुर्सी में फिर से धंस गई। मैंने पूछा, ‘मैं अपना ड्रिंक बना लूं?’ उसने इशारे से कहा, ‘गो ऑन।‘ और मैं पैग बनाते हुए उसका बदला हुआ रूप देखता रहा। अगर मैं उसे नहीं जानता होता तो पहचान ही नहीं पाता कि यह वही सरकारी स्कूल की मास्टरनी है, जो लाख का चूड़ा पहनती है और नाभि से नीचे तक का ब्लाउज पहनती है। मैं पैग बनाकर हल्का होने के लिए बाथरूम गया तो देखा कि वहां उसके असल जीवन के कपड़े टंगे हुए हैं। सलवार, कमीज, चुन्नी और अंतर्वस्त्र।

मैं बाहर आया तो वह चहलकदमी कर रही थी। उसका पैग खत्म हो चुका था। उसने कहा, ‘आई वांट टू स्मोक।‘ मैं चकित था। मैं सिगरेट नहीं पीता, लेकिन किसी आगंतुक के लिए लाकर रख लेता हूं। पिछले दिनों जब बहन के जेठ आए थे तो उनके लिए लाकर रखी सिगरेट के पैकेट में कुछ बची थीं। मैंने सिगरेट लाकर दी तो उसने कहा, ‘डार्लिंग, मोहब्बत की आग सुलगा दी है तो इसे भी सुलगा दो ना प्लीज।‘ मैं रसोई में गया और माचिस लाकर सिगरेट सुलगा दी। वह खुश होकर बोली, ‘यू आर ग्रेट डियर। आई लव यू। मेरा पैग भी बना दो ना यार।‘ मैंने उसके लिए छोटा-सा पैग बनाया तो बोली, ‘इसे ज़रा प्यार से बनाओ ना, इस एक रात की रानी की सेहत का सवाल है डार्लिंग।‘ मैंने थोड़ा और बड़ा पैग बनाया। पानी डालने लगा तो कहने लगी, ‘यार इसमें दो आइस क्यूब डाल दो ना, इट्स टू हॉट हियर।‘ मैंने फ्रिज से आइस क्यूब निकाल कर उसके गिलास में डाली। वह आराम से कुर्सी से उठी और मेरे छोटे-से दीवान पर जा बैठी।
***
‘फिर क्या हुआ... चुप क्यों हो गई तुम...’
‘क्या होना था श्याम बाबू... वही हुआ जो नहीं होना चाहिये था... दकियानूसी ससुराल वालों की लापरवाही से बेटी चली गई...’
‘कैसे...’
‘वह पेट से थी और ससुराल वाले बेटे की आस में उसे पीर-फकीरों के ही ले जाते रहे और आखिरकार वो अपनी औलाद के साथ ही चली गई...’
‘ओह, भगवान...’
***

‘इधर आओ डियर, साथ बैठेंगे।‘
उसे सिगरेट पीना शायद नहीं आता था, इसलिये वह कभी सिगरेट का कश लेती तो कभी उसमें गुब्बारे की तरह हवा भरती और धुंआ उड़ता तो खुश होती। मैं अपना गिलास लेकर उसके पास जा बैठा, वह मेरे गले में हाथ डालकर सिगरेट फूंकने लगी। मैं चुपचाप बैठा था, उसने मेरा हाथ उठाकर अपनी पतली कमर पर लिया और मुस्कुराने लगी। उसने सिगरेट फेंक दी और मेरे गले में दोनों बांहों का हार बनाकर मुझे बेतहाशा चूमने लगी। हर बार उसके मुंह से ‘आई लव यू’ और ‘आई लाइक यू’ निकलता जा रहा था। मैं भी आखिर कब तक निश्चेष्ट रहता। शराब का असर हो रहा था, मैंने भी उसे कसकर बांहों में भर लिया। उसके चेहरे पर जैसे तृप्ति के भाव थे।
शराब बीच में ही छोड़कर मैं रसोई में गया, चपातियां बनाईं और खाना लगा दिया।

मैंने देखा वो तीसरा पैग खुद ही बनाकर पीना शुरु कर चुकी थी। बोतल में अभी एक पैग बचा था, मैंने उसे अपने गिलास में खाली कर लिया। रात के दस बज चुके थे। उसने बेमन से खाना खाया, हालांकि खाने की खूब तारीफ की। उसने शायद पहली बार शराब पी थी और वो भी इतनी तादाद में कि उसे ख़ुद को संभालने में बहुत मशक्कत करनी पड़ रही थी। मैंने उसे सलाह दी कि एक बार मुंह धो ले तो अच्छा महसूस होगा। उसने फ्रिज से ठंडे पानी की बोतल निकाली और रसोई के सिंक में ही मुंह धोकर आ गई। एक बार फिर वो आरामकुर्सी में धंस गई। मैंने बर्तन रसोई में रखे और चीजों को ठिकाने पर रखा। वो वहीं जमी हुई थी। मैंने पूछा, ‘आर यू ओके?’ उसने हाथ उठाकर इशारा किया तो मैं समझ गया कि उसे मदद की ज़रूरत है। मैंने उसकी दोनों बांहें थामीं तो वह खड़ी हो गई। मैंने उसे सहारा दिया और वह मेरे गाल चूम कर ‘आई लव यू’ कहती हुई मेरे सीने से लिपट गई। इसके बाद हम बेडरूम में थे।
***
‘फिर गोधरा के दंगों में पहले बेटा और फिर बाप दोनों कत्ल कर दिये गये... सब खत्म हो गया श्याम बाबू... इस बीच मैंने भी अपनी नौकरी छोड़ दी और गुजरात चली आई...’
‘फिर...’
***

दिसंबर की सर्दी में मुझे इतनी गर्मी कभी महसूस नहीं हुई, जितनी उस रात हुई। सुबह आंख खुली तो देखा वह मुझसे लिपटी हुई थी। उसके पतले-दुबले शरीर का ख़याल कर मैंने सोचा कि यह कैसे हुआ? मुझे तो एक अपेक्षाकृत स्थूल देह की आदत पड़ चुकी है, फिर इसके साथ कैसे? मैंने उसे हल्के-से अपने से अलग किया तो वह उल्टी लेट गई। उसकी पीठ पर अनगिनत निशान थे। मेरे माथे में गूंजने लगीं कुछ अस्फुट आवाजें... ‘प्ली-ज बाइट मी... ईट मी डियर...’ एक लंबी और अजीब-सी फिल्म थी वो, आंखों के आगे तैरती हुई, जिसमें एक अप्रत्याशित किस्म की उत्तेजनाओं का ज्वार था और इसके साथ ही था, भावों का एक ऐसा संसार, जिसमें मैं कभी नहीं उतरा था। शराब के नशे में उसकी बड़बड़ाहट अवचेतन की कई ग्रंथियां खोल चुकी थीं, लेकिन मैं खुद नशे में था, इसलिए कुछ याद नहीं।

हम जब बेडरूम में आए थे तो उसने मेरा चेहरा अपनी छातियों में छुपा लिया था। मैं उस वक्त उसकी देहगंध महसूस कर रहा था, जब उसने खुद अपनी टी शर्ट को ऊपर करते हुए मेरा सिर उसके नीचे ले लिया था। आम की छोटी कैरियों जैसे उसके स्तन मेरे मुंह में समा गये थे। सर्दी और उत्तेजना के मारे अगले कुछ पल बहुत वहशत में गुज़रे और हम एक ही रजाई के भीतर दाखिल हो गये। कोई आवरण नहीं रहा। हम सागर और नदी की तरह एक दूसरे में गिरते रहे। वह जैसे प्यास का एक कुआ थीं और मेरे पास कोई सागर नहीं था। हम दोनों बिना थके एक सफ़र पर चल रहे थे। उसके मुंह से जो शब्द निकल रहे थे, उन्हें लिखा नहीं जा सकता। बस इतना कह सकता हूं कि उसकी तमाम ग्रंथियां जैसे उन्हीं में खुल रही थीं। ... मालूम नहीं उसकी कितनी फरमाइशें मैंने उस रात पूरी कीं।...

उसका जूड़ा खुल गया था। लंबे बाल हिना की खुश्बूं में सराबोर थे और मुझे अपने भीतर भी मेहंदी का एक पौधा उगता दिखाई देने लगा था। याद आया उसका यह कहना, ‘एक दिन आपको इस खुश्बू में नहला देंगे।‘

सिरहाने की ओर उसकी गुलाबी ब्रा रखी थी और पांवों की तरफ़ पीले फूलों वाली पैंटी। जींस और टी शर्ट कुर्सी पर आराम फरमा रहे थे। मैंने घड़ी में समय देखा तो सुबह के पांच बजने वाले थे। ट्यूबलाइट जल रही थी। रात उसी ने कहा था, ‘अंधेरे में एक जिंदगी गुजार दी है यार... आज की रात तो उजाला रहने दो।‘ मैंने उठकर लाइट बंद की। नंगे बदन में एक ठंडी झुरझुरी सी दौड़ गई। खिड़की से आते स्ट्रीट लाइट के उजाले में कमरा अब किसी फंतासी की तरह लग रहा था। फिर से घड़ी देखी, तो तारीख पर ध्‍यान गया। 25 दिसंबर, ओह आज तो क्रिसमस की छुट्टी है। चलो फिर सो जाओ। इस बार मैं बेहोशी में नहीं, बाकायदा होश में था। बांहें फैलाते ही वो फिर लिपट गई मुझसे।
***

‘फिर क्या... जो हुआ वो पूरा देश जानता है...’
‘लेकिन तुम अकेली...’
‘हां, क्या. करती मैं... इतना कुछ होने के बाद कहां जाती... किस मुंह से जाती... पीहर में भी कोई नहीं बचा... मैं इकलौती बेटी, मां-बाप गुज़र चुके... और फिर है ही कौन जो इस बात की ख़बर ले कि हम जिंदा हैं या नहीं...’
‘लेकिन, कोई तो होगा रिश्तेदारी में...’
‘होंगे कहीं तो... रिश्तेदारियां वगैरह सब आदमी और दौलत रहने तक ही चलती हैं... जब मर्द चले गये तो क्या बचा...’
***

आठ बजे बाद हम दोनों उठे और बहुत देर बस बिस्तर में ही खामोश बैठे रहे। अब उसकी छरहरी देह बहुत अच्छी लगने लगी थी। उसने कहा कि जिंदगी में वो पहली बार किसी गैर मर्द के साथ रही है। मैंने कहा कि मैं भी पहली बार बीवी के अलावा किसी दूसरी महिला के साथ सोया हूं। उसने कहा कि यह हो नहीं सकता, क्योंकि तुम्हागरी आंखें बहुत मोहक हैं। मैंने कहा कि यही बात मैं तुम्हारे लिए कह सकता हूं। इस पर वो सिनेमाई अंदाज में मेरे सीने पर सिर रखकर गुदगुदी करने लगी।

मैंने अपने कपड़े सम्हालने की कोशिश की तो उसने रोक दिया। उससे कारण पूछा तो बोली, ‘नहीं रहने दो, जिंदगी में पहली बार इस तरह सोई हूं, इस अहसास को महसूस कर लेने दो, पता नहीं फिर कभी मिले कि नहीं।‘
मैं निरुत्तर था।
‘आप बहुत अच्छे इंसान हैं।‘ वह अब तुम से आप पर आ गई थी।
‘आप भी बहुत अच्छी हैं।‘
‘नहीं, मैं बहुत बुरी हूं। तभी तो आपके साथ इतना कुछ कर डाला... सॉरी।‘
‘सॉरी की कोई बात नहीं। सब कुछ आपसी रज़ामंदी से हुआ।‘
‘आपको मेरी याद आएगी क्या?’ उसने मेरे बालों में अंगुलियां फेरते हुए पूछा।
‘हां, कैसे भूल सकूंगा मैं ये दिन और महीना?’
‘या ख़ुदा किसी को भी याद न रहे ये महीना....’ उसने वापस अपना चेहरा मेरे सीने में छुपाते हुए जैसे बहुत गहरी पीड़ा के साथ कहा।
‘क्या ... ?’
’दिसंबर, 1992 का महीना एक दर्दनाक इतिहास है...’
‘मतलब... ?’
‘यह दिसंबर, 1992 है और क्या...’ वह हौले-हौले बोलती जा रही थी।
’इसे याद रखने का मतलब एक हैवानियत के साल को याद रखना...‍ जिसमें लाखों लोग मारे गये...’
***

‘किसी ने कोशिश नहीं की क्या तुम्हें तलाश करने की...’
‘गुजरात में इतने लोग मारे गये, कइयों की तो लाशें भी नहीं मिलीं... हमारी तलाश से किसी को क्या हासिल होना था, जो कोई हमें खोजने भी आता...’
‘लेकिन पारिवारिक रिश्तों में बहुत से ऐसे होते हैं जो बहुत नज़दीकी होते हैं, जिनमें मोहब्बत होती है, कोई तो होगा ऐसा अपना...’
‘नहीं, गुजरात में कोई अपनों की लाशें तलाश करने नहीं आता...’
***

'हां, लेकिन हमारा प्रेम...’
‘नहीं, कोई प्रेम नहीं हमारे बीच...’ उसने सीने पर लेटे-लेटे ही मेरी बांईं घुंडी पर जीभ फेरते हुए कहा।
‘तो फिर...’
’बस एक अनुभव... सिर्फ एक अहसास... कि मज़हब से क्या कोई फर्क पड़ता है, इंसान-इंसान में, उनके बीच के संबंध में... आखिर कितने और कैसे अलग होते हैं, दो जुदा मजहबों के लोग?’
‘फिर... क्या अनुभव हुआ?’
‘...’
’प्लींज बोलो ना... तुम अब रहस्य बनती जा रही हो’
‘मैं रहस्य. थी और रहूंगी हमेशा के लिए...’
‘मतलब क्या.... मेरे पास तुम्हारा फोन नंबर है...मैं कभी भी फोन कर लूंगा...’
’कभी उसे मिलाया भी है?’
‘नहीं।‘
’फिर, ज़रूरी तो नहीं कि वो मेरा ही नंबर हो...’
’क्या। ?’
‘हां, वो मेरा नंबर नहीं... मेरे पास कोई फोन नंबर नहीं, मेरी ऐसी हैसियत नहीं कि फोन रख सकूं...’
‘तो तुम टीचर नहीं हो क्या ...’
’वो तो हूं, लेकिन गांव में...’
’तो क्या... ?’
‘आयशा नाम है मेरा...’
***

‘पता नहीं गोधरा और उसके बाद मारे गये लोगों की लाशें कहां हैं... हो सकता है हमारे रिश्तेदारों ने भी हमें ठिकाने लगा दी गई लाश ही समझ लिया हो...’
‘तुम तो तलाश कर सकती थी उन्हें... तुमने भी कोशिश नहीं की...’
‘मैं तो इतनी टूट चुकी थी कि क्या बताऊं। जब मैंने अपने बेटे और उसके बाप की लाशें तलाश की थीं तो मेरा हाल उस मां जैसा हो गया था, जिसका दुधमुंहा बच्चा मर जाए तो उसकी छातियों का दूध सूख जाता है... मेरे आंसू सूख गये थे... रोने की ताकत नहीं बची थी।‘
‘क्या कोई आस-पड़ौस का भी नहीं आया...’
‘कौन आता... दहशत के मारे यहां मुसलमान के साथ कोई नहीं खड़ा हुआ... सबको अपनी जान की पड़ी थी श्याम बाबू।‘
‘इंसानियत इतनी भी नहीं गिरी थी...’
‘तुमने हैवानियत नहीं देखी ना, इसलिए इंसानियत की बात कर रहे हो...’
***

‘मैं तो आशा ही समझता रहा... फिर ये सब... ?’
’क्या, सिंदूर, चूड़ा, मेहंदी वगैरह... ? वो तो हमारी जाति में सदियों पुराना रिवाज़ है। हम तो आज भी फेरे लेते हैं और भात भरते हैं।‘
‘फिर मेरे साथ यह रात और संबंध... ?’
उसने अपना बांया हाथ नीचे की ओर ले जाते हुए कहा, ’सच तो यह है कि आप उस दिन बहुत अच्छे लगे थे। एक दोस्ती शुरु हुई थी। मेरा कोई दोस्त नहीं। हम मुसलमानों में वैसे ही औरतों के मर्द दोस्त कहां होते हैं?... तो आपसे दोस्ती दिल की चाहत बन गई बस...।‘
यह कहते हुए उसने बहुत शोख़ शरारत में मेरे होठों के नीचे ठुड्डी को अपने लंबे दांतों से लगभग काट ही लिया। मैं उसके बालों में अंगुलियां फिरा रहा था, मैंने प्रतिक्रिया में उसकी एक लट खींच डाली। वो ‘उई मां’ कहती हुई मुझसे लिपटती चली गई।
***

‘लेकिन वो गांधी का गुजरात भी है...’
‘उस गांधी को मारने वाले ख़यालों का ही निजाम हो तो क्या होगा गुजरात में...’
‘लेकिन अच्छें लोग भी बहुत हैं वहां...’
‘होंगे, ज़रूर होंगे, अपने घरों में सुरक्षित और अफसोस जताते हुए लोग तो पूरी दुनिया में मिल ही जाते हैं...’
***

’मेरी जैसी बुरी औरत आपको नहीं मिलेगी इस दुनिया में। लेकिन पूरी कौम को बुरा मत कहना। ... मैंने रात जो प्रेम किया, वह सच्चा प्रेम है जो दो इंसानों की तरह दो कौमों में होना चाहिये... मैं प्यार में ढहती हुई एक बोसीदा इमारत थी और तुम मेरे कारसेवक....।‘
‘हे भगवान... ऐसा मत कहो आयशा, मैं उन दंगाइयों में नहीं हूं, जिन्हों ने एक इतिहास को ध्वस्त किया है। मैं कभी वैसा नहीं हो सकता, जैसा ये सिरफिरे बना देना चाहते हैं। मैं कारसेवकों में नहीं हूं आयशा...’
कहते हुए पहले मेरा गला रुंधा, फिर मेरी रुलाई फूट पड़ी थी।
‘तुम्हारे ये लफ़्ज़ मेरे कानों में जिंदगी भर गूंजते रहेंगे... मैं प्या‍र में ढहती हुई एक बोसीदा इमारत और तुम मेरे कारसेवक....।... इन लफ़्जों को वापस ले लो आयशा... प्यांर में कोई किसी को ढहाता नहीं है। मोहब्बत तो नई चीज़ें बनाती है, जैसे ताजमहल... ‘
‘कुछ सवालों का जवाब सन्नाटा ही होता है।‘
***

‘मेरा बेटा इंजीनियर था। उसने जो कारखाना लगाया था, उसमें वो ऐसी मशीनें बनाना चाहता था, जिनसे कम पानी में भी अच्छी खेती की जा सके... उसका सपना था कि एक दिन वह हवा की नमी को खेती के लायक पानी में बदल कर सूखे में भी चावल और गेहूं की फसल उगायेगा।‘
‘बदकिस्मती ने वो सब ख्वाब चूर-चूर कर दिये... कितने दुख की बात है।‘
‘हां श्याम, वक्त‍ पता नहीं कब, किस चोले में हमारे सामने आ खड़ा होता है और हम पहचान ही नहीं पाते...।‘
***

और वो तुम्हारा लिबास बदलना वगैरह... ?’
‘कौनसी कौम है जो मॉडर्न नहीं होना चाहती... ? सबको आज़ादी चाहिये...’ ‘लेकिन बेडरूम के भीतर या कि दिलों में ही बस...’
‘हुंह... जितनी भी मिले हासिल कर लेनी चाहिये... पिंजरे में कैद परिंदों को देखा है... वो उस मौके का इंतजार करते हैं कि कब मालिक दरवाज़ा खुला छोड़ दे ज़रा देर के लिए तो तुरंत उड़ जाएं... वो पिंजरे के भीतर इसीलिए छोटी-छोटी उड़ान भरते रहते हैं, ताकि उड़ना नहीं भूल जायें।... बेडरूम पिंजरा ही तो है, यहां आकर हर औरत वनपाखी हो जाती है।... जो बिस्तर में भी बंदी बनी रहती हैं, वे कभी आज़ादी नहीं चख सकती।..’
मैंने उसका चेहरा अपनी तरफ़ किया और माथा चूमना चाहा। उसने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिये और मुझ पर सवार हो गई।

थकी देह लिये हम दोनों बहुत देर चुपचाप लेटे रहे। मैंने उठकर ऊनी गाउन डाला और बाथरूम में चला गया। वापस आया तो वह सो रही थी। मैं रसोई में जाकर चाय बनाने लगा। कुछ खटपट हुई तो अंदाज हुआ कि वो बाथरूम गई होगी। मैं चाय बनाकर बेडरूम में लेकर आया तो देखा वह सलवार सूट पहने अपने कपड़े बैग में रख रही थी।
चाय खत्मं हो चुकी थी और उसकी पैकिंग भी। वह आगे बढ़ी और पहले हाथ मिलाया, फिर गले लगी।
उसने पूरा सामान पैक करने के बाद एक निगाह पूरे घर पर डाली और कहा, ‘सच, बहुत यादगार है यह रात।‘
जब वो जाने लगी तो मैंने पूछा, ‘अब कब मिलना होगा?’
’मैं तो तितली हूं, घरेलू तितली... मेरी उम्र क्या? तितली की उम्र तो कुछ घंटों से लेकर बस एक साल की होती है... हमारे बीच तो 120 घंटे गुज़र गये... कमाल है कि तितली अभी जिंदा है...’
उसने मेरे गाल और होठों पर एक जोरदार चुंबन जड़ते हुए कहा, ‘जिंदगी में तुम्हें मेरी जैसी मुसलमान औरत नहीं मिलेगी, यह याद रखना... और हां, तुम्हांरे जैसा कोई हिंदू मर्द भी नहीं मिलेगा मुझे...बाय...’
***

‘तुम्हारी दर्दनाक कहानी जानकर मैं सच में भीतर तक हिल गया हूं। मुझे बहुत अफसोस है... सच में कि एक दोस्त. के नाते मैं कुछ नहीं कर पाया...’

‘कोई बात नहीं, तुम कर ही क्या सकते थे... लेकिन कभी सोचा न था कि मैं तुमसे फिर कभी दुबारा मिलूंगी।... लेकिन सब कुछ खत्म होने के बाद यूं लगा कि एक तुम ही हो सकते हो, जिसे मैं अपना कह सकती हूं।... और इसी तरह तुम्हें खोजती चली गई। खुदा का शुक्र है कि तुम मुझे मिल गये।‘

‘जिंदगी इसी तरह हमें किसी न किसी मोड़ पर मिला देती है आशा, जैसे बीस बरस पहले यूं ही मिलाया था।‘

‘हां, सच कहा तुमने... पता नहीं हमारी जिंदगी में इस तरह मिलना क्यों लिखा था...’
***

और वो खटखट करती सीढियां उतरती चली गई। मैं उसे खिड़की से जाते हुए देखता रहा, जैसे 6 दिसंबर के दिन देश एक ऐतिहासिक इमारत को गिरते हुए देख रहा था।

बाम से उतरती है जब हसीन दोशीज़ा
जिस्म की नजाकत को सीढियां समझती हैं।

मेरी आंखों में उसके लिए उतने ही आंसू थे, जितने इस देश के किसी भी हिंदू की आंखों में किसी मंदिर का ध्वंस होने पर हो सकते थे। लेकिन उसकी आंखों में जो विश्वास था वो मुझे उसके बाद फिर कहीं नहीं दिखाई दिया। न हिंदुओं में और ना मुसलमानों में...।
***

‘अब क्या इरादा है तुम्हांरा...’
‘कैसा इरादा... मैंने सब कुछ बेच दिया है अब... मेरे पास कुछ नहीं बचा अहमदाबाद के इस फ्लैट के सिवा... कुछ पैसा है जो बैंक में है, बस उसी से गुज़र जाएगी बची-खुची जिंदगी।‘
‘यह तो ख़ैर ठीक किया... लेकिन अकेलापन...’
‘अरे, काहे का अकेलापन... तुम हो ना मेरे पास... या कि तुम भी जा रहे हो लंदन-ऑस्ट्रेलिया...’
‘नहीं, मैं क्या करूंगा वहां जाकर। दोनों बेटों की गृहस्थियां जम गई हैं। दोनों ने वहीं की लड़कियों से शादियां कर ली हैं। अब तो वे ही नहीं आते इधर, बस कभी फोन आ जाता है हालचाल पूछने के लिए।‘
‘तो चलो मैं ही आ जाती हूं, तुम्हारी देखभाल के लिए...’
‘...’
‘क्या हुआ... सांप क्यों सूंघ गया... मैंने ग़लत बात कह दी क्या...’
‘नहीं, ऐसी बात नहीं...’
‘तो फिर...’
‘तुमने तो मेरे मुंह की बात छीन ली...’
‘सच...’

उसके इतना कहने के साथ ही मेरा मन जैसे गाने लगा...

तुम तो ख़ुद ही क़ातिल हो तुम ये बात क्या जानो
क्यूं हुआ मैं दीवाना बेडियां समझती हैं

 

-प्रेमचंद गांधी

 
भाग - 1

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