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दार्शनिक प्रो. अमरनचन्द्र ब्रह्मो की मृत्यु

- अंबर पांडे

रेलवे स्टेशन की कैंटीन पर इडली और साम्भर सामने रखकर अपने नए आइफ़ोन को देर तक टटोलने के बाद के बाद कर्नल भीष्म ने फ़ोन लगाया और उनका एकालाप आरम्भ हो गया। फ़िल्टर कॉफ़ी ठंडी होती रही मगर वह कहते रहे

प्रो. के अधिकांश कार्य निरर्थक थे। उनके लिए किसी टेक्स्ट का अनुवाद करना ही उसे पढ़ना था। जितनी किताबें उन्होंने पढ़ी थी वे सभी वहीं थी जिनका अनुवाद उन्होंने जर्मन से फ़्रांसीसी या अंग्रेज़ी में, या फ़्रांसीसी से अंग्रेज़ी या जर्मन में या अंग्रेज़ी से फ़्रांसीसी या जर्मन में किया था।

वह महू में कहाँ से आए, यह उन्होंने कभी किसी को नहीं बताया था। कुछ पुराने दोस्त कभी कभी उनके रिश्तेदारों का अड्यार में होने की बात करते थे। उनका ब्रह्मोसमाज से भी कोई सम्बन्ध नहीं था। वह नागर ब्राह्मण थे मगर ब्रह्मो उपनाम क्यों लगाते है यह पूछने का साहस मैं कभी नहीं कर पाया हालाँकि यदि पूछता तो वह ज़रूर बताते ऐसा विश्वास मुझे उनके मर जाने के इक्तालीस वर्ष बाद भी है।

ओरफ़ियस सिनेमा के सामने दस्तूर नाई के यहाँ वह हजामत बनवा रहे थे। झबरी और झुकी हुई, खिचड़ी मूँछों में वह मुझे दर्पण में देखकर हँसे और आगे साबुन की कटोरी के पास रखी हुई एक ढीली, रीढ़ से फटती पुस्तक की ओर संकेत किया। मुझे उन दिनों केवल क़िस्से-कहानी पढ़ने लायक जर्मन आती थी। वह हीगल की धर्म के दर्शन पर दिए गए व्याख्यानों की पुस्तक थी। 

फ़ीडरीच होल्डालिन और हीगल अपने विद्यार्थी जीवन में यूनिवर्सिटी के एक ही कमरे में रहते थे और प्रोफ़ेसर उनके जर्मन में हुए संवादों की कल्पना करते रहते। पुस्तक देखते ही मुझे पता लग गया कि आज दोपहर भी मुझे कवि होल्डालिन के पात्र का निर्वाह करना है और प्रोफ़ेसर हीगल बनेंगे। हीगल के तीसरे साथी जोसफ़ वॉन शीलिंग से प्रोफ़ेसर अक्सर अप्रसन्न रहते और हमारे उन काल्पनिक संवादों की एकांत प्रस्तुति के समय वह जोसफ़ वॉन शीलिंग को अधिकतर अनुपस्थित दिखाते या उसकी भूमिका अपनी मेज़ को दे देते। मेज़ की भूमिका के समय वह जोसफ़ वॉन शीलिंग के प्रति अपवचन कहते।  

हम दोपहर डेढ़ बजे काली मिर्च और नमक डालकर ओम्लेट बनाते और उसे ब्रेड और कॉफ़ी के साथ खाकर ढाई बजे तक अपना लंच समाप्त कर देते। उसके बाद हमारे खेल का समय हो जाता।  

अट्ठारहवीं शताब्दी के जर्मनी की वेशभूषा हमारे पास नहीं थी इसलिए हम दोनों सफ़ेद पूरी बाँहों की बुशर्ट के ऊपर रेशम के नाइटगाउन पहनते। प्रोफ़ेसर सुनहरे बालों की विग़ लगाते और मैं काले ऊन का कनटोप पहन लेता। गरमियों में जिसके कारण मेरा सिर पसीने से भर जाता और सही जर्मन बोलने के अतिशय दबाव के कारण कनपटियों की नस फूलने लगती।  

इस महान, दार्शनिक, जर्मन भाषा में खेले जा रहे नाटक को देखनेवाला वहाँ कोई दर्शक न होता फिर भी छोटी सी भूल तक प्रोफ़ेसर को अक्षम्य थी। थोड़ी सी भी ग़लती होने पर उनकी आँखें लाल हो जाती जैसे वह अपने भीतर हिंसा करने की इच्छा को अब तक पढ़े एथिक्स के सभी प्रकार के दर्शनों से दबा रहे है।”  

सुनते हुए अपूर्व मुल्ला हाउस के आख़िरी माले पर धूलभरी फ़ाइलों में से कुछ ढूँढता रहा। कर्नल भीष्म पाँच फ़ुट पाँच इंच के थे, गोलमटोल और उनका भारतीय सेना में जाना सबके लिए आश्चर्य का विषय का था। उनका बेटा अपूर्व उनसे बिलकुल अलग था- लम्बा, दुबला युवा वकील होने के बावजूद बहुत कम बोलनेवाला। हाँ-हूँ में वह जवाब देता रहा। फिर उसने कहा, “पापा आपने खाना खाया?”  

तुम्हारी तारीख़ पर क्या हुआ?” कर्नल भीष्म ने पूछा।  

वह पचास लाख माँग रही है। कह रही है ब्राह्मण परिवार की होने के कारण दूसरी शादी नहीं कर सकती अपूर्व ने कहा और एक फ़ाइल से धूल झटकारने लगा। खिड़की के बाहर दो कौएं मछली चबा रहे थे।  

ऐसे कैसे माँग रही है बहू पचास लाख। हम भी ब्राह्मण है और हमारे यहाँ तो आजकल हो रहे है पुनर्विवाह”  भीष्म इतना उत्तेजित होकर बात कर रहे थे जैसे उनकी बहू और उसका पिता उनके सामने ही खड़े हो। फ़ोन कट चुका था।  

बहुत खटारा और डरावने ढंग से डोलती हुई १२० किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चलती बस में बैठकर जैसे तैसे कर्नल भीष्म महू पहुँचे। बचपन के शहर के प्रति उनमें कोई भावना न थी। वह व्यावहारिक आदमी थे, दिखते भी व्यावहारिक थे। सिग्नल विभाग की टोपी लगाए होने के कारण तुरंत उन्हें आर्मी गेस्टहाउस में कमरा मिल गया।  

बाहर निकले ही थे कि अपूर्व का फिर फ़ोन आ गया, “पापा जगह मिल गई न?” वह धोबी तलाओ की गलियों में भटक रहा था। कर्नल भीष्म भी महू की किसी भीड़भरे भरे बाज़ार में घूम रहे थे। शोर के कारण दोनों को सुनने में परेशानी थी। 

पहले पति पर बलात्कार और मारनेपीटने का आरोप लगाया और अब पचास लाख माँग रही है?” कर्नल भीष्म ने कहा।  

क्या आपके प्रो अमरनचन्द्र ब्रह्मो की कोई खबर मिली?” अपूर्व ने पूछा।  

तुम कहो तो मैं करता हूँ उसके बाप से बात। यह भी कोई बात हुई! उनचालीस साल में फिर से सेटल होना खेल है क्या!कर्नल भीष्म चलते चलते एक बंगले के आगे रुक गए। जिसके बाहर खानबहादुर बहराम इलावा की तख़्ती लगी हुई थी।  

क्या आपको नहीं लगता कि वे अब तक मर चुके होंगे आपके प्रो अमरनचन्द्र ब्रह्मो?” अपूर्व ने पूछा। वह एक फ़्रेमिंग करनेवालों की दुकान के आगे खड़ा था। उधर से कोई जवाब नहीं आया बल्कि मेसेज आया, “call you later” 

डॉली दीदी, डॉली दीदीपुकारते हुए कर्नल ने फाटक खोला और उजड़े हुए बगीचे में घुस गए। माली दौड़ा आया, “कौन है?”  

डॉली दीदी से कहो मैं हूँ कर्नल भीष्म पुराणिककर्नल ने जवाब दिया।  

कौन डॉली दीदी! माली चिल्लाया। बदतमीज़ था।  

एक अकालवृद्ध आदमी बाहर आया, “कायको हल्ला कर रहे!”  

डॉली दीदी कर्नल ने उत्साह से कहा। 

कौन डॉली?” अकालवृद्ध आदमी चिढ़कर बोला। 

डॉली दीदी कर्नल ने कहा।  

वह आदमी थोड़ी देर कुछ सोचता रहा, “कब से मर गई वह तो रे। चालीस से ज़्यादा बरस गएऔर वापस अंदर चला गया। माली ने बाहर जाने को इशारा किया और फिर लॉन में पानी डालने लगा।  

आर्मी मेस में गहमागहमी थी। बाहर ज़ोरों से बरसात ही रही थी, “an early pre-monsoon” कर्नल वेटर के सामने बुदबुदाए फिर पूछा, “खाने में क्या?”  

आपने डिनर का ऑर्डर नहीं दिया था सरवेटर ने कहा।  

ओह अच्छा अच्छा, ठीक है। चाय?”  

चाय डिनर टाइम में नहीं दे सकता। आई एम सॉरी सरवेटर ने जवाब दिया, “But I can serve you gin and tonic with almonds” 

“Give me soda” कर्नल भीष्म ने कहा और आसपास देखने लगे। गरम खाने से उठती भाप और खिड़की पर वार करती बरसात।  

“Please send me some app which can take dictation” कर्नल ने अपूर्व को मेसेज किया।  

अपूर्व फ़िल्म निर्देशक मणि कौल से ध्रुपद सीखता था। वह वीणा पर कुछ बजा रहा था, सामने स्क्रीन पर स्काइप से मणि कौल उसे कुछ समझा रहे थे, “शाम को जौनपुरी का रूप वैसा प्रकट नहीं होता जैसे सुबह। मेसेज आने पर उसने फ़ोन उठाया और खीजकर वापस पटक दिया।  पाँच मिनट बाद ऑनलाइन लेक्चर के दौरान ही फ़ोन उठाया और लिखा, “Dictatio”, when will you be back? I feel very lonely” देर तक मेसेज देखता रहा फिर dictatio को छोड़कर बाक़ी मेसेज मिटाकर बटन दबाया, sendजी, माफ़ करिएगा पापा का मेसेज था उसने कहा और स्क्रीन पर मणि कौल मुस्कुराए।  

अँधेरे में नये आइफ़ोन के प्रकाश में कर्नल भीष्म का बूढ़ा मुँह जगमगा रहा था और वह ज़ोर ज़ोर से फ़ोन के आगे मुँह किए बोल रहे थे, “सन् 1879 में सोसाइटी का प्रधान कार्यालय न्यूयार्क से मुम्बई में लाया गया। सन् 1886 में उसका प्रधान कार्यालय अद्यार (चेन्नै) में अंतिम रूप से स्थापित कर दिया गया। भारतवर्ष की राष्ट्रीय शाखा 18 दिसम्बर 1890 को अद्यार में स्थापित हुई। बर्टरम कैटले इसके प्रथम प्रधानमंत्री थे। सन् 1895 में राष्ट्रीय शाखा का प्रधान कार्यालय वाराणसी लाया गया। श्री मूलजी ठाकरसे इसके प्रथम भारतीय सदस्य थे।  

इसका मुखपत्र मासिक "थियोसॉफिस्ट" है। इसकी स्थापना सन् 1879 में मैडम ब्लैवेट्स्की द्वारा हुई थी। फ़ोन पर हिंदी में टाइप होता जा रहा था लेकिन बहुत सी मात्राओं की गलती के साथ।  

कर्नल ने अपूर्व के नाम के आगे लिखे बटन send को दबाया और अपना लिखा भेज दिया। देर तक उत्तर की प्रतीक्षा करते हुए सो गए।  

थियोसोफ़िकल लॉज का भवन बहुत ख़राब अवस्था में था। बिलकुल गिरने गिरने को हो रहा था हालाँकि दरवाज़े के पल्ले सलामत थे और ताला लगा हुआ था। थियोसोफ़िकल लॉज ऑफ़ सेंट्रल इंडिया अंग्रेज़ी में संगमरमर के पत्थर पर अभी भी खुदा हुआ था जिसपर गिलोय की सूखी हुई लता चढ़ी हुई थी। कर्नल भीष्म घूमकर पीछे की ओर गए जहाँ अमरनचन्द्र ब्रह्मो का कमरा और उसका दरवाज़ा हुआ करता था। दरवाज़े पर साँकल लगी हुई मगर ताला न लगा था। कर्नल साहब ने दरवाज़े को ज़रा धक्का दिया और वह खुल गया। अंदर से कबूतरों का झुण्ड घबराकर उड़ा।  

कर्नल साहब ने फ़ोन निकाला और तुरंत फ़ोटो लेने लगे। दो एक फ़ोटो लिए होंगे फिर अपूर्व को वीडियो कॉल लगा दिया। अपूर्व किसी कैफ़े में बैठा कोल्ड ड्रिंक पी रहा था।  

पापा, सॉरी कल आपको फ़ोन नहीं लगा पाया। जो थियोसोफ़िकल सोसायटी के बारे में आपने मेसेज भेजा था वह सब विकीपीडिया पर हैअपूर्व ने कहा, “where are you, papa?”  

मैं यहीं तो रोज़ आता था। चौदह साल की उमर से सत्रह तक मैंने अपनी सभी दोपहरें इसी कमरे में काटी है। यहाँ किताबें ही किताबें होती थी। ठीक यहाँ उनके पलंग के पास सोफ़े पर हमेशा Letters from Mahatma पड़ी रहती थी थियोसोफ़िकल सोसायटी का major text” कर्नल साहब जालों और धूल से भरा भवन अपूर्व को दिखाए चले जा रहे थे। तभी अपूर्व ने देखा उनके पीछे सेना का कोई सिपाही आकर खड़ा हो गया है।  

पापा, आपके पीछे कोई है अपूर्व ने कहा।  

कर्नल साहब घूमे। सिपाही ने कहा, “आप यहाँ कैसे आए? ताला नहीं देखा क्या?” सिपाही की आवाज़ कठोर थी। जवाब देने से पहले कर्नल साहब ने अपने झोले में से सिग्नल विभाग की टोपी निकालकर पहन ली। सिपाही ने तुरंत सलाम ठोंका।  

यहाँ प्रो ब्रह्मो का निवासस्थान थाकर्नल साहेब ने कहा। सिपाही ने उन्हें ध्यान से देखा जैसे वे कोई विक्षिप्त मनुष्य हो। 

सर, यहाँ पर पिछले कई वर्षों से कोई नहीं रहतासिपाही ने कहा। 

थियोसोफ़िकल लॉज का क्या हुआ?” कर्नल साहब ने पूछा। सिपाही ने कन्धे उचका दिए। कर्नल चलने को हुए। सिपाही ने फिर सलाम किया, “वन्दे मातरम् 

देर तक कर्नल साहब भवन के चक्कर काटते रहे। झाड़झंखाड़ और घास के अलावा कुछ भी न था। एक कुएँ की जगत पर बैठकर कर्नल साहब ने फ़ोन निकाला और वीडियो बनाने लगे। भवन की फ़िल्म बनाते हुए वे साथ साथ में भवन के विषय में जानकारी भी देते जा रहे थे, “वे बांग्ला नहीं थे। थेओसोफ़िकल सोसाइटी का सदस्य होकर महू आए और उसके बाद यहीं के होकर रह गए। कहाँ से आए कोई नहीं बताता था। पुराने लोग उन्हें डॉक्टर कहते किन्तु कभी यह पता न लग सका कि वे रोगियों के डॉक्टर थे या शोध करके डॉक्टर की उपाधि पाई थी। दो अण्डे, चार ब्रेड और एक गिलास दूध यही उनका रात का खाना होता, नाश्ते में बस पानी पीते और दोपहर के भोजन में सेब या संतरा खा लेते फिर भी वह दुबले नहीं थे। उनके शरीर की एक एक माँसपेशी दृष्टिगोचर होती जैसे कि कोई पहलवान प्रेम में पड़कर अचानक दुबला हो गया हो। उनके गाल उनकी बत्तीसियों में धँसे हुए थे और दाढ़ी लम्बी थी। अरबी के पत्तों की तरह काली, लम्बी और छाँह देनेवाली। 

उनके विषय में इतना सब मैं आपको इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि वह किसी मसीहा के कम न थे। काफ़्का के बाद वही थे जिनसे मिलने पर मुझे लगा कि उन्हें भविष्यदृष्टा माना जा सकता है- a prophet। उनके संग जो भी समय मैंने व्यतीत किया वह मेरा सबसे आध्यात्मिक समय था। इन संस्मरणों को सुननेवालों को भी वही शान्ति प्राप्त होगी जो मुझे इसे कहते हुए हो रही है। जापान में बीसवीं शताब्दी में बहुत से नए धर्मों का प्रादुर्भाव हुआ। भारत में भी नवीन सम्प्रदायों का गठन हुआ किन्तु नवीन धर्म की उद्भावना का साहस प्रो. ब्रह्मो को छोड़ किसी में न था। प्रो. ब्रह्मो के पिता ब्रह्मोसमाज के सदस्य अवश्य थे किन्तु प्रो. ब्रह्मो तक आते आते वह केवल उनके उपनाम में ही शेष रहा।  

ऐनी बेसेंट से उनका फ़्रांसीसी में पत्रव्यवहार उनके जीवन के आरम्भिक वर्षों के विषय में हमें बहुत सी जानकारियाँ देता है किन्तु वह इतने जटिल और सुन्दर थे कि उन्हें जानने के लिए कोई एक मार्ग पूर्ण नहीं हो सकता। हालाँकि उनके बचपन और कैशोर दिनों के विषय में हमें कुछ नहीं पता किन्तु इतनी जानकारी अवश्य मिलती है कि उनके प्रति एक स्त्री इतनी आसक्त हो गई कि उस स्त्री के कारण उन्हें मद्रास छोड़ना पड़ा। वह स्त्री कौन थी? क्या वह स्त्री थियोसोफ़िकल सोसाइटी के कोई सदस्य थी जिसके आकर्षण से भारत से लेकर ब्रिटेन तक लोग बिद्ध थे या कोई और यह कोई नहीं जानता।  

कई बार मज़ाक़ में प्रो ब्रह्मो कहते कि वह स्त्री उनके प्रेम में इतनी अधिक विक्षिप्त हो गई थी कि एक रात्रि उसका शरीर एक किताब में बदल गया और उस स्त्री का पति उसे प्रो ब्रह्मो को दे गया। प्रो ब्रह्मो के दर्शन में पुस्तक के परम महत्त्व के विषय में हमें बहुत गहन चिंतन मिलता है। एक स्थान पर वह लिखते है, “पुस्तक कोई मानवीय आविष्कार नहीं है। गणित और भाषा ब्रह्मांडीय त्रुटि है या सम्भवतः ब्रह्म अनुग्रह। यदि यह ब्रह्माण्डीय त्रुटि (cosmic fault) है तो ईश्वर की इस असावधानी का क्या कारण हो सकता है?” 

इतने में वह सिपाही पुनः आकर कर्नल साहब के पास खड़ा ही गया। कर्नल साहब को रिकॉर्डिंग रोकना पड़ी। 

सर, मेरी आपसे दरख्वास्त है कि वीडियो न बनाए। आप जानते ही होंगे आर्मी की बिल्डिंग की रिकॉर्डिंग मना है सिपाही ने कहा।  

क्या यह भवन सेना ने अधिग्रहीत कर लिया? कब?” कर्नल साहब ने पूछा।  

जब से यहाँ आया हूँ तब से इस भवन को सेना की सम्पत्ति के रूप में ही देखा हैसिपाही ने कहा। कर्नल साहब ने कुछ नहीं कहा। अपना फ़ोन पतलून की जेब में रख लिया और पैदल पैदल गेस्ट हाउस जाने को हुए।  

महँगी काट के कोट और पतलून के ऊपर वकीलोवाला लबादा पहने अपूर्व फ़ोर्ट के भीड़भाड़वाले चौराहे पार करता कहीं जाने की जल्दी में है। फ़ोन की घंटी बजती जा रही थी। उसने दो बार फ़ोन निकालकर देखा, पापा थे और नहीं उठाया। उसके कन्धे पर रुद्रवीणा रखी हुई है। तीसरी बार फ़ोन आने पर उसे फ़ोन उठाना ही पड़ा।  

कोई इमर्जन्सी है क्या पापा?” उसने चिढ़कर पूछा। रुद्रवीणा लेकर बात करना मुश्किल था। वह वीणा को एक जूनी बिल्डिंग के खम्भे से टिकाकर बात करने लगा। वीणा देखकर भिखारी बच्चे दौड़े आए और वीणा के तारों से छेड़छाड़ करने लगे। अपूर्व देर तक सुनता रहा फिर पूछा, “मैंने तो आपसे पहले ही कहा अब तक तो वे मर चुके होंगे आप मानने को तैयार ही नहीं थे। एनी बेसेंट १९३३ में मर गई और आपका कहना है प्रो अमरनचंद्र और बेसेंट एक दूसरे को चिट्ठियाँ लिखते थे। हाँ ठीक है आप लौट आइए। मरने के बाद इस बात का क्या अर्थ कि कैसे मरे! मणि सर ने जोसेफ के घर बुलाया है। आज साउथ बॉम्बे में ही क्लास है। ओह हाँ कैन्सर होने के बाद से वे दिन में तीन तीन बार क्लैसेज़ ले रहे है। क्या सेना ने बिल्डिंग ले ली! उनके सामान से आपको क्या करना! पंचनामा बना होगा। सिविल गवर्न्मेंट का अफ़सर होगा उस समय। आप पता करिए कि अधिग्रहण से पहले यदि वे मर गए थे तो क्या सेना ने उनके सामान का पंचनामा बनाया था? Bye papa, I can't talk anymore, getting late for class and for God’s sake please hire an Uber, don’t run along on public transport. Bye bye”.  

दूसरे दिन एक खचाखच भरे टेम्पो में बीड़ी पीनेवाले मज़दूरों के संग बैठकर कर्नल साहब हिलते-डुलते, पसीना पोंछते कहीं जा रहे है। टेम्पो इस तरह हिल रहा है कि लगता है कभी भी पलट जाएगा। बाहर बादल छाए है मगर बरस नहीं रहे बहुत उमस हो रही है। दारू पीकर एक आदमी तेज आवाज़ में अश्लील गाने सुन रहा है कि इतने में कर्नल साहब के फ़ोन की घंटी बजती है। शायद ही कोई और कर्नल साहब को फ़ोन करता था सिवा अपूर्व के और वही था। 

हेलो हेलो अपूर्व, बाद में फ़ोन लगाता हूँ। अभी कोदरिया जा रहा हूँ कर्नल साहब चिल्ला चिल्लाकर बोलने लगे।  

लहँगा उठा दे रिमोट मssssss’ अश्लील गाना और तेज बजा।  

कहाँ जा रहे है? क्यों? क्या बस से जा रहे है?” अपूर्व ने पूछा। वकीलोवाला लबादा ओढ़े वह कुछ फ़ाइल देखता हुआ बम्बई हाईकोर्ट के सामने खड़ा हुआ था।  

बाद में बात करता हूँ बाद में। आवाज़ धीमी करो तुमकर्नल साहब चिल्लाए। टेम्पो एक कीचड़ भरी सड़क पर मुड़ते मुड़ते एक बाइक से टकराया और कीचड़ में आड़ा हो गया। कुछ लोगों के सिर फट गए, एक का हाथ टूट गया। कर्नल साहब कीचड़ में दो लोगों के बीच फँसकर सुरक्षित बच गए। फ़ौज की ट्रेनिंग होने के कारण कर्नल साहब फ़ौरन उठ खड़े हुए, कीचड़ झटकी और सामने ग्राम कोदरिया की पंचायत की तख़्ती देखकर सम्भलते हुए दौड़े। 

कीचड़ से सने हुए पतलून और बुशर्ट में कर्नल साहब सेवा निवृत्त डिप्टी कलेक्टर रामधन साकल्ले की बैठक में चाय पीते हुए कह रहे है, “आपको कुछ याद आता है? प्रो अमरन चन्द्र ब्रह्मो?” 

पढ़ने का शौक़ीन तो मैं बचपन से ही था। दलित परिवार में जन्म लेने के कारण शिक्षा ही केवल जीवनोद्धार का मार्ग था। हिन्दी साहित्य में परास्नातक हूँ मैंसाकल्ले जी ने कहा। वे शुद्ध भाषा में बात करते थे, “आपको जो पुस्तक चाहिए वह आप मेरे पुस्तकालय से के जाए।” 

जी मुझे पुस्तक नहीं चाहिए। मुझे केवल प्रो. ब्रह्मो के बारे में पता करना है। यदि वे जीवित है तो इन दिनों उनका शुभ निवास कहाँ है और यदि दुर्भाग्य से उनका स्वर्गवास हो गया है तो उनका अंतिम समय कैसे बीता?” कर्नल साहब ने पूछा। अब वे विकल होने लगे थे।  

देखिए एक व्यक्ति का ध्यान तो आता है। वे शायद डॉक्टर ब्रह्मो थे प्रोफ़ेसर तो इन्हें कोई पुकारता नहीं था। थियोसोफ़िकल सोसायटी का भवन जब सेना ने अधिग्रहीत किया तो कहा गया वहाँ केवल थियोसोफ़िकल सोसायटी की ही सम्पत्तियाँ है। वे वृद्ध व्यक्ति कुछ पुस्तकें ले जाना चाहते थे किन्तु थियोसोफ़िकल सोसायटी के बम्बई कार्यालय ने अपनी अस्वीकृति भेज दी जबकि डॉक्टर ब्रह्मो का कहना था कि वे उनकी निजी सम्पत्तियाँ है। उन्होंने कई दफ़ा मुझे मौखिक अर्ज़ियाँ भी दी। फिर एक शाम अपना लोहे का ट्रंक लेकर वे कहीं चले गए। बहुत दिनों तक थियोसोफ़िकल सोसायटी के किसी सदस्य का न आना, सम्पत्तियों पर स्वामित्व न प्रकट करने के कारण वे चल सम्पत्तियाँ और पुस्तकें किसी विद्यालय को दान में दे गई। सम्पत्ति के नाम पर था भी क्या? कुर्सी, टेबुलें, एक सिंगलबेड और चंद केतलियाँ, कप। किताबें बहुत थी साकल्ले जी ने कहा और बत्ती जलाने उठने लगे। कमरे में अंधेरा हो गया था।  

क्या आप बता सकते है प्रो ब्रह्मो उसके बाद कहाँ गए?” निराश होकर कर्नल साहब ने पूछा।  

अफ़सरी का नशा था। मुझे याद नहीं कहाँ गए! इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि वे महू में कहीं रहते थे। फिर मेरा भी तबादला देवास हो गया थासाकल्ले जी जलते हुए बल्ब को प्रणाम करते हुए बोले।  

और उनकी किताबें? वह कौन से विद्यालय को दी गई?” कर्नल साहब खड़े हो गए। उन्हें लगा उन्हें चोट लगी है। बाएँ घुटने में दर्द था। कोहनी टीस रही थी।  

जी, जैसा मैंने बताया मेरा तबादला हो गया इसलिए कोई जानकारी नहीं। उसके बाद मेरी पोस्टिंग कभी महू में हुई ही नहीं साकल्ले जी ने कहा और कर्नल साहब के पीछे पीछे चले।  

आप चाहे तो आज रात्रि यहीं विश्राम करें। मेरे घर में मेरे बेटी के अलावा और कोई नहीं रहता। आपको आराम रहेगा और चाहे तो रात्रि को आप मेरा पुस्तकालय देख सकते है साकल्ले जी ने आग्रह किया और इतने में उनकी बेटी आ गई। वय में तो वह ३५ वर्ष की होगी किन्तु अविकसित मस्तिष्क के कारण उसका व्यवहार छह साल के बच्चे जैसा था।  

आपका बहुत आभार साकल्ले जी मगर परसों शाम की रेलगाड़ी से मुझे बम्बई लौटना है। संयोग हुआ तो पुनः भेंट होगी। आप भी बम्बई आए तो ज़रूर टेलीफ़ोन करें, मेरे घर ही ठहरे कहकर कर्नल साहब ने बिना पीछे देखे अन्धकार से भरी गली में पाँव बढ़ाया।  

कर्नल साहब नहा रहे थे कि अपूर्व का फ़ोन आ गया। किसी सस्ते मराठी भोजनालय में वह खाना खा रहा था, “पापा आप कहाँ हो?” 

मैं गेस्ट हाउस में हूँ कर्नल साहब ने जवाब दिया।  

आपकी आवाज़ कुछ उदास लग रही है, क्या हुआ? पापा, आज मणि सर को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। अचानक तबियत बिगड़ गई। पता नहीं हमारी यह राग जौनपुरी कब पूरी होगी। It proved to be a jinxed raga” अपूर्व ने भरी भराई थाली आगे सरका दी। परोसनेवाला वेटर उसे शिकायती ढंग से देखने लगा।  

मेरा मेसेज मिला क्या? मैंने रेकोर्ड किया था आज का हाल कर्नल साहब ने पूछा, “शायद न मिला हो आज यहाँ इंटर्नेट काम नहीं कर रहा 

अपूर्व ने टेबल पर पैसे पटके और बाहर आ गया, “tell me something papa, why did you fight with your Prof. Amaran chandra Brahmo? अब उन्हें आप ढूँढते घूम रहे है। पचास साल तक आपने उनसे कोई कनेक्शन नहीं रखा। Why were you so damn angry with him?”  

उन्होंने मुझसे झूठ कहा था कि वे एनी बेसेंट से फ़्रांसीसी में पत्र व्यवहार करते थे जबकि वे सावित्री देवी मुखर्जी से फ़्रांसीसी में पत्रव्यवहार करते थेकर्नल साहब ने जवाब दिया।  

अपूर्व ने अपनी महँगी कार का दरवाज़ा खोलते हुए पूछा, “who is Savitri Devi Mukharji?” 

वह फ़्रांसीसी महिला थी जिसने किसी बंगाली से विवाह किया और भारत आ गई। वे हिन्दू धर्म और नाज़ीवाद की बड़ी समर्थक थीं और इन दोनों विचारधाराओं के सम्मिश्रण करने के लिए उनका मानना था कि ऐडॉल्फ़ हिटलर भगवान विष्णु के अवतार थे और ये अवतार यहूदियों के वजह से उत्पन्न हुआ कलि युग को समाप्त करने हेतु मनुष्यता के बलिदान थेकर्नल साहब ने कहा, “वह दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सन १९८२ तक नाज़ियों को फिर से संगठित करने के प्रयास करती रही 

“Don't tell me this was the reason you didn’t keep any contact with him for all these long years, with a person who was more than a father to you” अपूर्व ने इंजन चालू कर दिया था, “क्या कारण था पापा?”  

कर्नल साहब ने जवाब नहीं दिया। फ़ोन रख दिया और रोने लगे। थोड़ी देर बाद फ़ोन उठाया तो coverage नहीं था। उन्होंने टीवी चालू कर लिया।  

टीवी पर किसी स्थानीय चैनल पर विचित्र उच्चारण और विचित्र ढंग के कपड़ों में एक लड़की समाचार पढ़ रही थी, “आज मेहमूद अली हूसेन अली लॉंड्री का नाम लिम्का बुक ऑफ़ रीकॉर्ड में दर्ज कर लिया गया। मेहमूद अली हूसेन अली लॉंड्री का नाम इसलिए लिम्का बुक में दर्ज किया गया क्योंकि ऐसे कपड़ों का उनके पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा संग्रह है जिसके मालिक उन्हें धुलने तो दे गए मगर वापस लेने कभी आ न सके। लॉंड्री के पास सन १९३३ के कपड़े भी संग्रहित है। उनके मालिक महोमद बक्सवाला ने हमें बताया कि वे इन कपड़ों को अपनी ज़िम्मेदारी समझते है और इसे दुकान और जहान रहने तक सुरक्षित रखेंगे। इस ख़ुशी में बाज़ारवालों ने लॉंड्री के आगे फटाके फोड़कर जश्न मनाया।” 

दूसरे दिन सुबह आठ बजे ही कर्नल साहब निकल पड़े और लोगों से पूछते पूछते मेहमूद अली हूसेन अली लॉंड्री पहुँच गए। लॉंड्री बंद थी। वे बाहर ही चलकर समय काटने लगे। फाटकों का कचरा बाहर पड़ा हुआ था। फिर फ़ोन पर एक मेसेज टाइप किया, “I got an important clue- a laundry with highest number of unreturned clothes since 1933”. इससे पहले भेज पाते महोमद बक्सवाला आ चुका था।  

स्लिप के बिना दो साल जूना लत्ता वापुस नहीं किया जावेगामहोमद बक्सवाला ने शटर उठाते हुए कर्नल शाह से कहा, “कल से लोगों ने जूने लत्ते माँग माँगकर हैरान किया है 

जी, क्या आपके पास प्रो ब्रह्मो का कोई कपड़ा कोई पुराना कोट या पतलून मिल सकती है?” कर्नल साहब ने नम्रता से पूछा।  

कौन भरमो?” महोमद बक्सवाले ने मुँह बिचकाकर पूछा और काउंटर से उठाकर सैयदना की तस्वीर साफ़ करने लगा। लॉंड्री के अंदर दर्पण ही दर्पण लगे थे।  

जी महमूद अली जी को शायद पता हो?” कर्नल साहब ने कहा।  

उनको गुजरे तो साठ बरस से ऊपर गुजरे। बोहनी का टेम खोटी करने आए आप। कोई कपड़ा हो धोने को तो बोलो नहीं तो सलाममहोमद बक्सवाला बोला।  

कर्नल साहब ने टोपी निकाली और लगाई, “क्या कहा? कंटोनमेंट एरिया में सेना के अफ़सर से बात करने की ये तमीज़!

तुरंत महोमद बक्सवाला खड़ा हो गया, “सर, सर, गुस्सा क्यों ग़रीबों पर। कौन है ये भरमो मियाँ?”  

प्रो ब्रह्मो। यहीं थियोसोफ़िकल सोसायटी के भवन के पिछले हिस्से में रहते थे। बहुत बड़े फ़िलॉसफ़र थे। उनका कपड़ा हो यदि आपके पास तो मैं देखना चाहूँगाकर्नल साहब ने कहा। 

आप बैठिए। मैं देखता हूँ। कौन से सन की बात है?” महोमद बक्सवाला ने पूछा और फिर बिना उत्तर सुने चिल्लाया, “बब्बू ओ बब्बू 

अचानक काँच का एक किवाड़ खुला और एक गोरा सा सोलह सत्रह साल का लड़का चड्डी बनियान में आँखें मलते हुए बाहर आया।  

जा सर के लिए चाय ला और ये भरमो जी के कपड़े ढूँढ। क्या बताया सर कौन सा सन?” महोमद बक्सवाला ने पूछा।  

नाम है प्रो ब्रह्मो भरमो नहीं। सन तो पता नहीं १९७१ से आजतक के देखिएकर्नल साहब ने जवाब दिया।  

इत्ता लम्बा टेम! हो सकता नहीं बब्बू ने कहा।  

अबे, जा जाकर ढूँढ। एक रेपटा लगाऊँगा मना किया तोमहोमद बक्सवाला बोला, “आप शाम तक आइए सर 

शाम तक सम्भव नहीं। यहीं बैठता हूँ। कल मेरी गाड़ी है बम्बई के लिएकर्नल साहब ने कहा और अख़बार उठाकर पढ़ने लगे। महोमद उतरी शक्ल से देखता रहा। 

कर्नल साहब, बब्बू और इसाक धोबी नाम का एक बूढ़ा देर तक एक एक कपड़े देखते रहे और लगभग शाम चार बजे एक कोट मिला। तारीख़ डाली गई थी, “६ नवम्बर, १९७१, नाम डॉक्टर अमरन चन्द्र ब्रह्मोयही हैं यही है कहते हुए कर्नल साहब उल्लास के कारण लगभग उछलने लगे। कोट पारदर्शी प्लास्टिक बैग में ठीक से बंद था।  

हरे चौखानोवाला कोट प्रो ब्रह्मो को बहुत प्रिय था। गर्मियों में भी जब शाम को हम अनार का रस पीने जाते तो वे उसे पहन लेतेकर्नल साहब ने कहा। बब्बू और इसाक उन्हें ऐसे देखने लगे जैसे कोई बावले हो।  

इतने में महोमद बक्सवाला भी अंदर आ गया, “देख लिया साहब। ठीक ठाक रखा है न आपके भरमोजी का कोट। माँगकर शर्मिंदा मत कीजिएगा बस 

खोलकर तो देख सकता हूँ कर्नल साहब बच्चों की तरह ख़ुश दिख रहे थे। 

इसाकभाई खोलकर दिखाओ महोमद बक्सवाला कहकर वापस गल्ले पर चला गया।  

खुलने पर कर्नल साहब कोट की आस्तीन को ऐसे छूने लगे जैसे अपने प्रो ब्रह्मो से हाथ मिला रहे हो। देर तक कोट को टटोलते रहे। उलट पलटकर देखने लगे।  

बब्बू बोला, “कोई दिवालिए का कोट लग रहा है। रफू कित्ता किया है और बार बात खुलवाकर सिलाई कराई है।   

चुप बे गंड**इसाक धोबी ने बब्बू को डपटा, “वो बखत कुछ और था। साहब जेब में अर्ची पर्ची है क्या! देख लो।”  

बाहरी जेब में कुछ न था। अंदर की जेब से एक गुड़ीमुड़ी पर्ची निकली। इतनी पुरानी थी कि खोलने पर फट जाती। 

लाओ मेरे को दो। तुम बुड्ढे फाड़ दोगेकहकर बब्बू ने पर्ची ले ली और धीरे से खोल दी। काग़ज़ का थोड़ा सा बुरादा गिरा और एक कीड़ा बाहर निकलकर भागा, “इसकी माँ की। पिलस्टिक में कोट की जेब में पड़ी पर्ची में गिरस्ती चला रिया है साला बब्बू ने कहा।  

मैं पर्ची तो ले सकता हूँ न कर्नल साहब ने कहा।  

सेठ बताएगा इसाक धोबी ने कहा और कपड़ों का एक गट्ठर उठाने लगा, “दिन खोटी गया 

बाहर महोमद बक्सवाला कर्नल साहब से कह रहा था, “देखिए कोई जूना आइटम दे सकता नहीं। आपने बोला तो दो आदमी खटाकर आँखा रोज़ खोटी किया 

कर्नल साहब पर्ची पर लिखा पढ़ने लगे, “डॉक्टर दत्तात्रेय महादेव मालगाँवकर, नूरॉलॉजिस्ट, आर्मी अस्पताल, महू। तारीख़ ५/११/१९७१। मरीज़ का नाम श्री अमरन चन्द्र ब्रह्मो, उम्र: ६२ बरस। पेशा: फ़िलॉसफ़र (?) मर्ज़: ? RX: Persantine 200mg+Aspirin 25mg twice a day. दस्तख़त। देर तक देखने के बाद कर्नल साहब पेड़ी उतरने लगे। 

बब्बू इसको अंदर कोट में रखो महोमद बक्सवाला चिल्लाया। कर्नल पलटे और फिर दुकान में आकर बोले, “फ़ोटो तो ले सकता हूँ न 

आप सच में फ़ौजी मरद हो अबके बार महोमद बक्सवाला मुस्कुराया और पर्ची आगे बढ़ा दी।

आर्मी अस्पताल में कर्नल साहब वही पर्ची एक डॉक्टर के कैबिन में बैठके उसे दिखा रहे थे। डॉक्टर नई उम्र का था। देर तक पर्ची देखने के बाद उसने कर्नल साहब से पूछा, “is it your prescription sir?”  

नहींकर्नल साहब ने कहा, “मेरे पिता की है। मैं तब यहाँ नहीं था।” 

“Most probably these medicines were prescribed after a stroke. उस जमाने में लकवा होने पर यही दवा दी जाती थी। I hope you don’t have any problem?” डॉक्टर ने पूछा।  

अचानक कर्नल साहब खड़े हो गए। अनमने ढंग से जवाब दिया, “न न नहीं मुझे कोई तकलीफ़ नहीं। मुझे कोई तकलीफ़ नहीं 

“Are you sure, sir?” डॉक्टर पीछे से चिल्लाया मगर कर्नल साहब ने सुना नहीं।  

थियोसोफ़िकल लॉज के भवन के पास बने कुँए की जगत पर कर्नल साहब बैठे हाँफ रहे थे, यहाँ से उन्हें प्रो ब्रह्मो के कमरे की खिड़की दिखाई देती थी। शाम होने वाली थी। उन्होंने अपूर्व को फ़ोन किया। 

अपूर्व स्काइप के आगे बैठा था। मणि कौल से सम्पर्क साधने की कोशिश करता हुआ, झल्लाकर कहा, “yeah” 

अप्पू, अप्पू, अपूर्व, मेरे महू छोड़ने के हफ़्तेभर बाद प्रो ब्रह्मो को लकवा लग गया था।इसका मतलब है उस डिप्टी कलेक्टर की तारीख़ में कुछ गड़बड़ है। डॉक्टर ने कहा उस जमाने में लकवा ठीक नहीं होता था। विकिपीडिया पर भी  यही लिखा है। पता नहीं क्या हुआ होगा... हेलो हेल्लो हेल्लो कर्नल साहब को लगा अपूर्व सुन नहीं रहा।

पापा, रुकिए मणि सर का फ़ोन आ रहा है। आपसे बात करता हूँकहकर अपूर्व ने फ़ोन काट दिया। मणि कौल के जिस नम्बर से फ़ोन आ रहा था फिर से लगाया, “हेलो 

“He dies” एक स्त्री ने कहा और फ़ोन रख दिया। अपूर्व अपने कम्प्यूटर स्क्रीन पर स्काइप पर बार बार बटन दबाकर देखता रहा।  

कर्नल साहेब ने फ़ोन का कैमरा चालू किया और फ़्लैश चमकाकर अँधेरे में उसी खिड़की का वीडियो बनाने लगे। 

साथ साथ में वे अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड करते जा रहे थे बहुत अधिक पके, लगभग सड़ते हुए अमरूदों की गन्ध नींद में भी शयनकक्ष तक आती है। अंदर से गहरे लाल, सिकुड़ते हुए गूदे के रेशों से पृथ्वी अपना स्थान छोड़कर वातावरण में आर्द्रता प्रतिशत ९४.२ में विलीन होती जा रही है।  

भोजन की मेज़ के ऊपर अमरूदों का एक मेघ लटका हुआ है जिसके किनारे फ़िलिप्स का पुराना, पीला बल्ब, जो नियम से शाम छह से रात साढ़े दस बजे तक जलता है। प्रो ब्रह्मो ठीक साढ़े दस बजे ही बत्ती बुझाते है 

सर, सर आप फिर आ गए अचानक सिपाही चिल्लाया। हड़बड़ाहट में फ़ोन कर्नल साहब के हाथों से छूटकर गिरकर कुँए में गिर गया। सिपाही दौड़ा आया, “साहब आपसे निवेदन है हमारी नौकरी चली जाएगी। कर्नल साहब उसे ऐसे देखते रहे जैसे वह पागल हो। आइए आपको फाटक तक छोड़ दूँ सिपाही ने उनका हाथ पकड़ा और फाटक पर ले जाकर छोड़ दिया।  

बाहर लोग आ जा रहे थे, रोशनी थी। चौराहे तक कर्नल साहब चलकर गए और बीच रास्ते में गिर गए। वे अपने हाथ और पाँव ऐसे फेंकने लगे जैसे उन्हें  लकवा मार गया हो। उनका धड़ उछलने लगा जैसे उन्हें बहुत कष्ट हो। भीड़ लग गई। किसी ने उनका बटुआ भी निकाल लिया। कर्नल साहब ने दाँत भींचे हुए थे और उनका शरीर अकड़ा हुआ था।  

आर्मी अस्पताल में वही युवा डॉक्टर उनके बिस्तर के पास खड़ा था। उसके साथ महू सेना कार्यालय का सबसे बड़ा अफ़सर भी खड़ा हुआ था। डॉक्टर ने कहा, “his reflexes are alright. His problem, as far as I see is psychosomatic”.  

“Any identity?” अफ़सर ने पूछा। 

“He showed me early that evening when he came. He’s retired army colonel. Now he has no identity on him. डॉक्टर ने कर्नल साहब को देखते हुए कहा। अब भी उनके हाथ पैर ऐसे ही अकड़े हुए थे। गर्दन अजीब ढंग से टेढ़ी थी। 

“Keep him for some day and try to get his kith and kin. If you don’t get any and not get his identity too. Well leave him on the road” अफ़सर ने कहा और बूट बजाता बाहर चला गया।  

किसी जानवर की तरह कर्नल साहब बीच रास्ते पड़े हुए है। उनकी गर्दन अब भी अजीब ढंग से मुड़ी हुई है। वह हाथ पैर फेंक रहे है और उनके मुँह से झाग निकल रहा है।  

अपूर्व यूट्यूब पर मणि कौल का साक्षात्कार देख रहा है। पास में उसकी रुद्रवीणा रखी हुई है।

-अंबर

 -अंबर प्रतिभा का वह युवा विस्फोट हैं कि जिन्हें आप कितना भी चाहें उपेक्षित नहीं कर सकते। निषेध की तर्फ़ औत्सुक्य से देखने/लिखने वाला हर वह लेखक मुझे आकर्षित करता है, जिसके पास लिखने को नितांत अछूता होता है। अंबर के पास भाषा और उसके बरतने के असंख्य ढंग हैं, असंख्य प्राचीन काल के नूतन पात्र उनके जहन में कुलबुलाते रह्ते हैं, वे स्वयं भी अनेकानेक पात्रों का रूप धरने के और उसे पराकाष्ठा तक निबाहने के माहिर हैं। यह कहानी कौतुक प्रिय अंबर की प्रतिभा के गंभीर परिपाक का एक संकेत है। भविष्य अंबर का है अगर ह,अ हिंदी वाले अनेकानेक औसत पूर्वाग्रहों से ग्रस्त न होते चले गये तो।  

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