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( कोरोना समय की एक कहानी)

मिसेज़ भादुड़ी का फैसला

 राजेश्वर वशिष्ठ

 कोरोना काल की इस भयावह चुप्पी को हम सब ने स्वीकार कर लिया है। सोसाइटी के भीतर की सड़कें खाली पड़ी हैं। खुली पार्किंग में लगी कारों पर धूल की मोटी परतें जमी हैं और उन पर चित्रकारी करने वाले बच्चों की उँगलियाँ गायब हैं। छोटे बच्चों के पार्क में लगे लाल हरे झूलों पर चिड़िएँ भी झूलने से परहेज कर रही हैं। हर तरह की चहल-पहल, गतिविधियाँ म्यूटमॉड पर चली गई हैं।टॉवर के गेट पर तैनात सिक्युरिटी गार्ड साहबों को सलामी देने और मेड्स के एंट्री कार्ड जाँचने की कवायद भूल चुके हैं। लिफ्टें अनजानी मंज़िलों पर घंटों खड़ी ऊँघती रहती हैं, उनकी पल-पल शोभा बढ़ाने वाली मेडसर्वेंट्स की सिल्हटी बंगाली की गूँज तो पिछले डेढ महीने से नदारद है।  

समय चलते-चलते लड़खड़ा कर ठहर गया है; चर्चा है कोरोना का शिकार हो गया है। 

जैसे-जैसे लॉक-डाउन की अवधि बढ़ती जा रही है घरों के बंद दरवाज़ों के पीछे चलने वाली कहानियों में,जटिलता आने के साथ-साथ रोमांच और तनाव भी बढ़ रहा है। 

मल्टी-नेशनल कंपनियों के साथ कार्यरत व्यस्ततम जवान जोड़ों ने लॉक-डाउन के पहले पंद्रह दिनों में जितना वर्क फ्रॉम होम किया लगभग उतना ही प्यार भी किया। उन्होंने एक दूसरे को सुरक्षित निजता की सुखदतम परिस्थितियों में पाया जहाँ घर के दरवाज़े की घंटी का अप्रिय दखल बिलकुल नहीं है। सुबह के सूरज की कुनमुनी धूप जब परदों के बीच से ताक-झाँक करने लगती है तो वे बिस्तर छोड़ने से पहले एक दूसरे को चूमते हुए, पायताने पड़ी चादर के नीचे दबे, अपने शरीर के न्यूनतम आवरण तलाश करते हैं।

कोरोना उनके घर में लगे डेट कैलेंडर पर क्लिप की तरह चिपक कर रह गया है। 

अधेड़ों की ज़िंदगी हमेशा ही उन किसानों की तरह रही है, जो चाहे घर में हों या खेत में पल-पल मौसम का ही हिसाब लगाने के ही लिए अभिशप्त हैं। उनके घरों में एक या दो किशोर बच्चे हैं। बूढ़े कहलवाना न पसंद करने वाले माँ बाप हैं और लॉक-डाउन के चलते, मल्टी नेशनल कम्पनियों में ऊँची पोजीशन पर होने के कारण, उनकी अनेक व्यावसायिक व्यस्तताएँ हैं। वे बच्चों को दादा-दादी के सुपुर्द कर, आश्वस्त हैं कि ऑन लाइन टीचिंग और स्नेह के मिश्रण से, बच्चों का विकास इस कठिन समय में भी बाधित नहीं होगा। अलग-अलग कमरों में बैठे उन दम्पतियों के कानों में दिन भर ईयर फोन लगे रहते हैं और उंगलियाँ लैपटॉप पर नाच रही होती हैं। मेडसर्वेंट्स के अभाव में, उन्हें बीच के अवकाश में उठ कर घर की सफाई भी करनी होती है और बच्चों की पसंद का खाना भी बनाना पड़ता है। जब से उन्होंने एक पिज़्ज़ा डिलीवरी ब्वाय के कोराना पॉजीटिव होने की खबर पढी है, उनके दायित्व बहु आयामी और जटिल हो गए हैं। शुक्र है किसी से भी न डरने वाले बच्चे, टेलिविज़न पर आ रही खबरों को देख कर, कोरोना को गब्बर सिंह मानने को तैयार हो गए हैं।   

इस हाई एंड सोसाइटी में आलोक भादुड़ी जैसे सीनियर सिटीजन भी हैं जिन्हें रेलवे की नौकरी से रिटायर हुए सात वर्ष हो गए हैं।उनके बेटी और दामाद अमेरिका में रहते हुए, वीडियो-कॉल कर के हाल-चाल लेते रहते हैं।बेटा और बहु कोलकाता में मस्त और प्रसन्न हैं। मिसेज़ भादुड़ी सीनियर सिटीजन बनने की ओर बढ़ते हुए भी वास्तविक उम्र से दस साल छोटी नज़र आती हैं। ताँत की कलफ लगी साड़ी और माथे पर उषा उथुप जैसी बड़ी-सी बिंदी उनकी सामाजिक पहचान का हिस्सा बन चुकी है। उनके लो-कट, बैकलैस-स्लीवलैस ब्लाउज़ और नाभि-दर्शना साड़ी के विन्यास पर अधेड़ ही नहीं जवान पुरुष भी खूब ध्यान देते हैं। सोसाइटी के हर सांस्कृतिक, सामाजिक कार्यक्रम में वह इतना बढ़ चढ़ कर भाग लेती हैं कि महिलाएँ, अपनी गॉसिप्स में उनका नाम न जाने कितने पुरुषों से जोड़ते हुए पाई जाती हैं।  

भादुड़ी साहब अपनी चाय हमेशा से खुद ही बनाते आए हैं।अपनी सुपारियाँ भी सरोंते से खुद ही काटते हैं। इसके सिवाय घर के किसी काम-काज में हाथ बटाना, उन्हें शान के खिलाफ लगता है। कल मैंने हाल चाल जानने के लिए जब उन्हें फोन लगाया तो गुस्से से फट पड़े –‘कोरोना हो या मोरोना, अगर हम रेलवे की नौकरी से रिटायर न हुए होते तो कम से कम चार एम्पलोई हमारे बंगले पर हर वक्त तैनात रहते। आप लोगों ने सब पार्ट-टाइम मेडसर्वेंटस का एंट्रीब्लॉक करवा दिया है। बहुत फालतू आर डब्ल्यू ए है हमारा, सीनियर सिटिजंस की तो परवाह करो भाई।एक लम्बा पॉज़ लेने के बाद मिस्टर भादुड़ी ने कहा – ‘बात करो अपनी बौदी (भाभी) से, ये सबसे ज़्यादा परेशान हैं, ब्यूटीपार्लर तक बंद करवा दिया है आपने!’ 

नमस्कार भाभी जी, क्या कह रहे हैं दादा, आप परेशान हैं? मैंने मज़ाकिया लहज़े में पूछा।‘  उन्होंने बड़ी मीठी-सी हँसी हँसने के बाद गम्भीर होते हुए कहा – ‘आपका दादा कुछ नहीं जानता हमारे बारे में, हमारी चालीस साल पुरानी शादी व्यर्थ चली गई है यह समझो। जब हम शादी करके आए थे, अठारह साल थी हमारी वयस।आपका दादा तो रेलवे का अफसर था, बहुत लोग थे चाकरी में, पर हमारे लिए घर में काम नहीं थाऔर इनके पास हमारे लिए समय नहीं था, शुद्ध परेशानी तो तब थी।

ओह!’, मैंने कहा।

हमने ज़िंदगी को तब अपने तरीके से जीना सीखा।म्यूज़िक सीखा, डांस सीखा, पेंटिंग सीखा, बहुत लोगों से दोस्ती बनाया। पर देखो, झाड़ू-पौंछे जैसे घर के काम हमसे नहीं होते। उन्होंने संयत होते हुए कहा।

मैंने कहा -ओह! किसने सोचा था इस समय के विषय में?’ और फोन कट गया। 

मुझे लगा : इन दिनों तो अगर एयरटेल के थके-हारे नेटवर्क की टेस्टिंग भी करा ली जाए तो यकीनन वह भी कोरोना पॉज़िटिव मिलेगा। 

****

किसी तरह से अप्रैल का महीना कट गया था। कोरोना के देश व्यापी प्रसार और खास कर दिल्ली के हालात देखते हुए यह साफ हो चला था कि लॉक-डाउन तीन मई को खत्म नहीं होगा, इसे दो सप्ताह के लिए पुनः बढ़ाया जाएगा।  

सोसाइटी के व्हाट्स एप्प ग्रुप के मंच पर हंगामा मचा हुआ था। कुछ लोग सोसाइटी के भीतर ही सुबह-शाम सैर करने की अनुमति के लिए आग्रह कर रहे थे तो कुछ लोगों का कहना था कि अब बहुत हो गया है मेडसर्वेंट्स को एंट्री दे देनी चाहिए। मिसेज़ भादुड़ी की माँग सब को उद्वेलित कर रही थी कि घरेलू सहायकों के बिना उनका जीवन ब्लैक एंड व्हाइट हो गया है।  

हर सदस्य को हर पल ज़ुल्फें लहराती हुईं, लाचार और परेशान मिसेज़ भादुड़ीअपने आस पास ही नज़र आती थीं। हमारे प्रेसीडेंट मिस्टर अरोड़ा को तो आरोग्य सेतु एप्प में भी कोरोना संक्रमण की जगह मिसेज़ भादुड़ी की कत्थई लाल बिंदी ही नज़र आ रही थी। उनका विश्वास था कि हम भले ही कुछ न कर पाते हों, मेनका का कष्ट इंद्र को हर पल नज़र आता है, इसीलिए इन दिनों हर सप्ताह आंधी और बारिश आ रही है। गरमी ठीक से आ नहीं पा रही है और कोरोना लहालोट हो रहा है। हमने बड़ी मुश्किल से पड़ोस की किसी दूसरी सोसायटी का नोटिस मंगवा कर, माई गेट एप्प पर पोस्ट करते हुए, मिसेज़ मेनका भादुड़ी और अन्य उद्भ्रांत निवासियों को तात्कालिक रूप से शांत किया कि सभी सोसाइटियों में ऐसे प्रतिबंध जारी हैं। अगर कोरोना संक्रमण रुका तो 17 मई के बाद मेड-सर्वेंटस को सोसायटी में आने दिए जाने के विषय पर विचार किया जा सकता है। 

यह सारा तमाशा चल ही रहा था कि सिक्युरिटी सुपरवाईज़र का फोन आया कि टॉवर सात के बाईसवें तल पर स्थित फ्लैट नम्बर 2203 से किसी स्त्री के रोने, चिल्लाने की आवाज़ आ रही है। लेड़ी सिक्युरिटी गार्ड ने वहाँ जाकर कई बार दरवाज़ा खटखटाया है लेकिन फ्लैट में रहने वाला कपल दरवाज़ा नहीं खोल रहा है। क्या पुलिस को सूचना दी जाए?

अभी ठहरो, पुलिस को सूचना देने से पहले, लेड़ी सिक्युरिटी गार्ड के साथ उनके किसी परिचित को भेजते हैं, हो सकता है मामला यहीं निपट जाए।

सिक्युरिटी सुपरवाईज़र ने जयहिंद!बोला और फोन रख दिया। 

एडमिन स्टाफ ने बताया कि यह फ्लैट मिस्टर भादुड़ी के किसी संबंधी की प्रोपर्टी है और इस समय उसमें मिस्टर जयंत बोस किराये पर रहते हैं जो किसी दिल्ली की कम्पनी में नौकरी करते हैं। उनकी पत्नी यहाँ एक स्थानीय कम्पनी में कार्यरत है। 

अरोड़ा जी का कहना था – ‘इस करोना के समय में हम मिसेज़ भादुड़ी से कैसे कह सकते हैं कि वह उस फ्लैट में जाकर हालात का पता लगाएँ? बीमारी के भय से, सभी तो आतंकित है। क्या हम लोग अपनी पत्नियों को वहाँ भेज सकते हैं?’

तो पुलिस बुलाएँ?’ मैंने कहा।

अरोड़ा जी चुप हो गए। 

मैंने मिसेज़भादुड़ीको फोन लगा दिया।  

नमस्कार, भालो आछेन?, उनकी आवाज़ में वही माधुर्य था।

जी, भाभी जी। अचानक एक समस्या आ गई है, आपसे सहायता की दरकार है। मैंने विनम्रता पूर्वक कहा।

बोलून, अब क्या हुआ; मेडसर्वेंट को तो आप लोग एन्ट्री देगा नहीं, ब्यूटी-पार्लर खुलेगा नहीं, भाभी को ऐसे ही परेशान कर के मार डालोगे क्या? कोई बात नहीं, तुम काम बताओ?’

टॉवर 7 के फ्लैट 2203 में जो मिस्टर बोस रहते हैं न, उनके घर से उनकी पत्नी के रोने-चिल्लाने की आवाज़ आ रही है। सिक्युरिटी स्टाफ को पता करने के लिए वहाँ भेजा था पर वे दरवाज़ा नहीं खोल रहे हैं? हम पुलिस को सूचना देने से पहले आप को बताना चाहते थे।मैंने कहा।

, माई गॉड, आपने ठीक किया है। मैं ठीक से मास्क और हैंडग्लोव्ज़ पहन कर, अभी जाती हूँ। अस्पताल के डॉक्टर और पुलिस भी तो हमारे लिए जान जोखिम में डालते हैं न! मैं वहाँ जाकर आपको बताती हूँ कि क्या करना है।उन्होंने फोन रख दिया।  

यार कोई बड़ा पंगा न हो, बाद में हम से सवाल हो कि हमने तुरंत पुलिस को सूचना क्यों नहीं दी?’ अरोड़ा साहब ने परेशान होते हुए मुझ से कहा।

आपको मेनका भाभी पर भरोसा नहीं है क्या?’ मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

अरोड़ा जी ने अपनी मास्क ठीक करते हुए, सेनेटाइज़र की बोटल को मेरी ओर बढ़ा दिया।

हाथों को तरीके से चुपड़ने, रगड़ने के बाद, सामने लगे टीवी पर हम कोरोना की खबरें सुनने लगे। अगला समाचार था - देश में प्रवासी मजदूरों की घर वापसी के लिए बसों और रेलगाड़ियों की व्यवस्था की जा रही है।  

लगभग आधा घंटे बाद मेरा फोन बजा। मिसेज़ मेनका भादुड़ी का फोन था। 

सब ठीक हो गया है। मिसेज़ बोस ने शीशे का गिलास तोड़ कर उस से अपने हाथ की नस काटने की कोशिश की थी, नस बच गई, पर कलाई पर घाव हुआ है। मैंने टॉवर तीन से डॉक्टर शर्मा को बुला कर मरहम पट्टी करा दी है। मैं मिसेज बोस को अपने घर लेकर जा रही हूँ। पुलिस को सूचना देने की दरकार नहीं है।

अरोड़ा जी ने चैन की साँस लेते हुए कहा – ‘ऐसे वक्त में कौन सामने आता है। आज मिसेज़ भादुड़ी ने प्रू कर दिया कि वह कोई मामूली औरत नहीं हैं। पर यार वे बोस लोग तो न्यूली मैरिड़ हैं, उनके बीच इतनी जल्दी क्या हो गया?’

कोराना!मैंने शैतानी से मुस्कराते हुए कहा।

रात को बात करूँगा मिसेज़ भादुड़ी से तब पता चलेगा कि असल माज़रा क्या है?’  

रात को मेरी हिम्मत ही नहीं हुई कि मैं मिसेज़ भादुड़ी से पूछूँ कि आखिर क्या हुआ था उस कपल के बीच? उन्हें मिसेज़ बोस को अपने घर क्यों लाना पड़ा? वैसे यह सब जानने का हमारा कोई नैतिक अधिकार नहीं था, पर मुझे अरोड़ा जी की बेचैनी की फिक्र थी। वे निश्चित रूप से रात भर किसी सपने में मेनका जी के आस-पास ही घूमते रहे होंगे। 

सुबह के आठ बज रहे थे, मैंने सोचा कि मिसेज़भादुड़ी को फोन लगा कर यह पूछना तो बनता है कि मिसेज़ बोस की तबीयत ठीक है न?  

नमस्कार भाभी जी, अब कैसी हैं मिसेज़ बोस, रात उन्हें उन के घर भेज दिया था क्या?’ मैंने पूछा।

नहीं, अब तृष्णा मेरे साथ ही रहेगी।

अरे? समझौता करा दीजिए भाभी जी, पति-पत्नी में यह सब हो ही जाता है। अलग होने में सदा स्त्री का ही नुकसान होता है। आप समझ सकती हैं न। मेरे मुँह से निकल गया।

यू आरराइट, मैं ही समझ सकती हूँ। तुम नहीं जानते, आज से लगभग चालीस साल पहले एक ऐसा ही समझौता हुआ था। एक लड़की जिसकी शादी को, लगभग इनकी शादी जितना ही समय हुआ था, खड़गपुर रेलवे कॉलोनी के एक इंजीनियर्स बंग्लो में दारुण विलाप कर रही थी। उस लड़की ने अपने माता-पिता से कहा था, कि आपका दामाद किसी स्त्री को लैंगिक सुख देने योग्य नहीं है। मुझे यहाँ से ले चलो। पर किसी ने नहीं सुना था। उस लड़की की माँ ने नाराज़ होते हुए, अपनी बेटी से कहा था स्त्री के लिए शारीरिक सुख किसी मृग तृष्णा से अधिक नहीं होता। संतान तो किसी आनंद के बिना भी संभव है।अभिजात्य वर्ग में पुरुष की सामाजिक हैसियत देखी जाती है, आय देखी जाती है। हम तुम्हें नहीं ले जा सकते। तुम इस संबंध को अपना भाग्य मान लो।‘  

ओफ, सॉरी.....मैंने द्रवित होते हुए कहा।  

उस दिन, उस लड़की के साथ कोई नहीं था। वह बी. ए. पास थी पर उसे नौकरी पाने का भरोसा नहीं था। वह क्रूर समाज की नज़रों के बीच, बिलकुल अकेली खड़ी थी। उसने समझौता विवश होकर ही किया था। शुरु के कई सालों तक वह रात भर रोते हुए, करवटें बदलते हुए जागती रहती थी और दिन में सोती थी। उसकी माँ ने ठीक ही कहा था, गर्भ धारण करने के लिए स्त्री को कोई बड़ा द्वंद्व युद्ध जीतने की आवश्यकता नहीं होती। उसने दो बच्चों को जन्म दिया। बच्चों के पालन-पोषण में जीवन कटने लगा और एक दिन जब बच्चे बड़े हो गए, वह फिर से अकेली हो गई। लेकिन तब तक उसमें थोड़ी हिम्मत आ गई थी। 

उम्र की ढलान पर उसे कई पुरुष मिले जो उसके गुणों और सुंदरता से प्रभावित होकर कुछ दूर साथ- साथ चलना चाहते थे। उसने इन संबंधों को इसलिए स्वीकार किया क्योंकि वह अपने शरीर में बज रही दुंदुभि को किसी जुगलबंदी के रूप में सुनना चाहती थी। जीवन को वे सब अनुभव पा लेने देना चाहती थी जिनसे वह लगातार वंचित रही थी।‘ 

कुछ देर के मौन के बाद मिसेज़ भादुड़ी ने कहा – ‘कल रात तृष्णा ने मुझे बताया था कि उसका पति ऑफिस से, बहुत देर कर के घर लौटता है। फिर थकान और मन न होने का बहाना करता है। वे सुख-भोग के इस इशु पर अकसर झगड़ते हैं और इस तरह से लगभग छह महीने बीत चुके हैं। वे दोनों एच.आर. में एम.बी. ए. हैं और अब इस कोरोना समय में, उनकी नियोक्ता कम्पनियाँ अस्थाई रूप से बंद हैं। घर के भरपूर आराम में कोई तनाव या चिंता नहीं है फिर भी तृष्णा शारीरिक सुख से वंचित है।

कल निलय ने तृष्णा से कहा था तुम हर वक्त मुझे क्यों परेशान करती रहती हो, अच्छे परिवारों की लड़कियों को वेश्याओं की तरह काम सुख की इच्छा नहीं रखनी चाहिए। निलय ने जब उस सामान्य स्त्री को वेश्या कहा तो वह उस अपुरुष द्वारा किए गए इस अपमान को कैसे सह पाती? इसी वजह से उसने आत्महत्या की कोशिश की थी।

अब क्या होगा मिसेज़ भादुड़ी?’

तलाक होगा। एक वकील मेरी पहचान का है, शाम को उससे बात करूँगी। तृष्णा के माँ-बाप भयभीत हैं, पर वह पढ़ी-लिखी लड़की है। उसके पास जॉब है। स्त्री का आत्म सम्मान अब इतना कमज़ोर नहीं है कि कोई अपुरुष, उसे वेश्या कह दे। कोई समझौता नहीं होगा, मैं उसके साथ खड़ी हूँ।‘ 

फोन कट गया। मेरा मन मिसेज़ भादुड़ी के प्रति श्रद्धा से भर गया। 

जब मिसेज भादुड़ी से मेरी बात-चीत चल रही थी, पीछे से अरोड़ा जी का फोन आ रहा था। कुछ ही क्षणों में फिर से फोन बजा अरोड़ा जी का ही फोन था।

क्या पता चला कहानी में आगे? मैं तो रात भर तुम्हारे फोन का इंतज़ार करता रहा!’ 

पल भर के लिए मैं विचलित हुआ पर खुद को संभालते हुए मैंने कहा – ‘कोई खास बात नहीं है बॉस, वे लोग रोज़-रोज़ टेलीविज़न पर कोरोना से होने वाली मौतों को देख कर घबरा गए थे। लड़की बहुत भावुक है, उसने अवसाद के कारण आत्महत्या की कोशिश की थी। मिसेज़ भादुड़ी ने कहा है कि वह लड़की को काउंसलिंग देंगी। सब संभाल लेंगी। इस मामले में जैसा आप सोच रहे हैं वैसा कुछ नहीं है।‘ 

आज झूठ बोल कर मैंने स्त्री अस्मिता को उपहास का पात्र बनने से बचा लिया था; मैं नहीं जानता इस कोरोना काल के गर्भ में और क्या-क्या उजागर होना निहित है।  

-राजेश्वर वशिष्ठ 

 

 कवि – कहानीकार राजेश्वर वशिष्ठ अपनी सीरीज़ याज्ञसेनी के लिए चर्चित रहे हैं, उनकी यह सीरीज़ स्टोरीटेल पर आ गयी है। उन्होंने कोरोना समय को पकड़ते हुए यह कहानी लिखी है जो इस अंक को समृद्ध करती है। 

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