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आरण्या

सु
नते ही वो भी लटक ली उस मुश्किल 'ट्रैकिंग एक्सपीडिशन' में साथ चलने की ज़िद पकड़ कर। उसी की सुनाई, सुन कर लिखी, उसकी कहानी आप भी पढ़ लीजिए।

यूनिवर्सिटी के लड़कों के एक ग्रुप को ट्रैकिंग-प्लान बनाते जान कर उसका चिबिल्ला मन भी उनके साथ जाने के लिए उछलने लगा। इतने लड़कों के बीच अकेली लड़की, जंगल-पहाड़ में जंगली जानवर, सांप-बिच्छू, नक्सलियों का खतरा अलग। पीठ पर पिट्ठू लाद कर इतनी दूर ऊंचे-नीचे में चल सकेगी क्या ! हम तो कहीं भी कैसे भी रह लेंगे इसका क्या होगा, और सबसे बढ़ कर प्रॉब्लम होगी वाशरूम और इनकी सेफ्टी की ! लाख समझाने पर भी नहीं मानी। हार कर उन्होंने अनायास ही गले पड़ी इस मुसीबत से अपने ग्रुप के लीडर विभाग के युवा 'असोसिएट प्रोफ़ेसर' को अवगत कराया। मगर समझा-बुझा कर किसी तरह पल्ला झाड़ने की उनकी कोशिश भी काम नहीं आ सकी। ऐसी 'रिसर्च स्कॉलर' से पहले कभी पाला नहीं पड़ने की वजह से उससे जान छुड़ाने का कोई उपाय नहीं सूझा। बोले सोच कर बताएंगे। उस समय उन्हें उसकी सोच, समझ, पृष्ठभूमि और इरादों का आभास नहीं हो पाया।

बचपन में अंगनाई में दाना छिटकते ही उड़-उड़ कर आती फुदकती चिंहुकती गौरैया देख-देख कर वो सोचती काश मैं भी गौरैया होती। उड़-उड़ कर छज्जे पर जा बैठती, कभी बगीचे में उड़ जाती, पेड़ों की फुनगी पर बैठ कर झुरमुट में छुप कर गा पाती। गर्मियों में सूरज उगते बगीचे में या छत पर
टहलती देखा-सुना करती चिरमिर-चिरमिर करते पंछी सूरज की रौशनी के साथ अपनी-अपनी टोली में या अकेले ही पंख तौलते जाने किधर उड़ जाते। उसे लगता गौरैया और बुलबुल के पंख छोटे होते हैं, थोड़ी ही दूर तक फुर्र-फुर्र उड़ सकती हैं आँगन से बगीचे, बगीचे से आँगन तक बस इत्ती सी दूर। सुग्गे-कबूतर-फाख्ते सुबह उड़ जाते हैं जाने कहाँ कितनी-कितनी दूर, कितना अच्छा होता अगर मैं उनकी जैसी सुगना होती मैना होती, दूर दूर तक उड़ आती। मौसम बदलने के साथ दीखते आसमान में अंग्रेजी के 'वी'अक्षर के आकार में पाँति बनाए उड़ते प्रवासी-परिंदों के झुण्ड के झुण्ड, देखती और सोचती ये पक्षी सबसे अच्छे हैं, इनके पखने भी बड़े हैं, दूर-दूर के अनजाने देशों से आते-जाते हैं, मुझे तो इन्हीं की तरह लम्बी उड़ानें भरनी हैं।

गाँव के बाग़ में पेड़-पौधों में मन रमता, ताल किनारे घूमती, धान-मकई-गेंहूं के खेतों की हरियाली और पकती फसलों को निरखती, आते-जाते मौसम, शीत-वसंत-वर्षा में रमती सपन-लोक में विचरा करती। भाइयों को स्कूल जाते देख सोचने लगी कैसा होगा स्कूल ! इतने बच्चे वहाँ जाते हैं बड़ा मज़ा आता होगा सबके साथ खेलने में! एक दिन सबकी पटियौती में अपने से बस्ता बाँध कर स्कूल जाने को तैयार होते देख दादी, माँ, चाचियां सब हंस पड़ीं 'एन्है देखा अबहियनै से पर जामै लाग, नामौ नहीं लिखान इस्कूल में औ चल दिहीं पढ़ै !!' उनको यह नहीं समझ आया कि पढ़ने से ज्यादा उसकी उत्सुकता घर से निकल कर स्कूल देखने और बहुत सारे बच्चों के साथ खेलने के लिए ललक रही थी। उसके पत्रकार पिता ने भी यह सब देखा और उसी दिन उसका दाखिला गाँव के स्कूल में करा आए।

दुबली-पतली सलोने चेहरे और खंजन जैसी कजरारी आँखों में भोला आकर्षण रचाए नए-नए अनुभव बटोरते स्कूल से कालेज पहुंच गयी। पढ़ने से अधिक उसका मन लगता खेल-कूद, किस्सा कहानियों और अन्य गतिविधियों में। पढ़ाई के विषयों में अच्छे नंबर मिलते और उससे कहीं बढ़ कर विशेष अंक अर्जित होते संगीत-नृत्य-नाट्य विधाओं में। चरफर-चरफर खूब बोलती पूरे उत्साह से लबरेज हो कर। जितना बोलती अक्सर उतना ही चुप रह कर सोचती उतनी ही संवेदनशीलता और समझदारी से, अक्सर खुले नीले आकाश को यूं ही निहारा करती। युवावस्था की देहरी पार कर रही काया लुनाई भरा रुप धरने लगी।

गाँव के स्कूल से पड़ोस के कस्बे वाले कालेज के परिसर और बाज़ार उसके बड़े हो रहे पखनों की उड़ान के लिए सीमित लगने लगे। अखबार और पत्रिकाओं में नए ज़माने की लड़कियों के आगे बढ़ कर अपना वजूद अपना कैरियर बनाने के प्रसंग पढ़ते उसका मन भी कुलबुलाने लगा किसी बड़े शहर की युनिवर्सिटी में पढ़ कर कुछ बनने का। घर की औरतों की ज़िंदगी देख कर उनकी तरह चूल्हे-चौके में खप कर परिवार की चहारदीवारी में ही सती होने को उसका मन किसी तरह से नहीं मानता। उसे लगता कहीं गाँव की दूसरी हमउम्र लड़कियों की तरह उसे भी शादी के बंधन में बाँध कर कैदी-जीवन बिताने के लिए मज़बूर न कर दिया जाए। ऐसे में उसकी माँ ने सहारा दे कर सुझाया 'पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़े होने लायक बनो'। लेकिन एक छोटे कस्बे तक सीमित सामाजिक संकोच के चलते वो अपने मन की बात पिता से कहने की हिम्मत नहीं जुटा पायी। माँ के माध्यम से उन तक पहुंची भी तो अपनी तीस साल पहले वाली मानसिकता से बमुश्किल बाहर निकल रहे पत्रकार पिता के गले नहीं उतरी।

बहुत सोच-विचार के बाद उसके पिता ने अपनी तईं बीच का रास्ता निकाला 'एंट्रेंस एक्ज़ाम पास कर के दिखाओ। बनारस क्या दिल्ली या विदेश जहाँ कहीं एडमीशन हो जाएगा वहीँ पढ़ाएंगे।' उन्होंने सोचा 'न पास होगी न कहीं भेजना पड़ेगा'। रोज-बरोज जगह-जगह लड़कियों के साथ हो रही बुरी घटनाओं की खबरें सुन-सुन कर हर सशंकित पिता का ऐसा सोचना स्वाभाविक ही था। उधर पिंजरे से उड़ने का दरवाज़ा खुलने की सम्भावना देख उसने दिन-रात एक करके की गयी पढ़ाई की बदौलत बी.एच.यू. का 'एंट्रेंस एक्ज़ाम' निकाल ही लिया। यह जान कर उसके पिता को बड़ा धक्का लगा, फिर भी किसी तरह बेटी को आगे बढ़ाने मन बना कर तैयार हो गए। मगर अब दूसरी ऐसी समस्या आ खड़ी हुई जिसका कोई निदान नहीं निकल सका। बी.एच.यू. में दाखिले की डेट निकल गयी और इधर लाख कोशिश के बाद भी उसके कालेज का रिज़ल्ट ही नहीं निकला पाया। हाथ आया मौक़ा इस तरह निकल जाने पर वो बहुत रोई, सबके सामने और अकेले में भी लेकिन उससे क्या हासिल होता। पास-पड़ोस के लोग अलग समझाने लगे जल्दी क्या है पी.एचडी के लिए भले ही दूर के शहर चली जाना तब तक यहीं पढाई करना बेहतर होगा। पिता जी को लगने लगा अगर कम्पटीशन निकाल सकती है तो हिंदी जैसा विषय क्या पढ़ना, बनना ही है तो आईएएस - पीसीएस बने अपना भी सीना चौड़ा हो जाए। लेकिन 'सिविल सर्विस' में उसकी कोई पसंदगी थी, वो पढ़ना चाहती थी अपनी पसंद का विषय ही। इसलिए सबकी सलाहें सुन कर बहुत दुखी होती फिर भी हिम्मत नहीं हारी। मेहनत से पढाई करती रही, अगले साल फिर एक्ज़ाम दिया और पिछले साल से ज्यादा नंबरों के साथ पास हो गयी।


जितना समय लाग दरवाज़े के सामने वाले झाड़ में बुलबुल का घोंसला बनने, उसमें अंडा दे कर सेने, अंडे फूटने, नन्हें बच्चों के फुदकने और फुर्र हो जाने में उतने ही समय बाद वो अपने पिता के साथ बी.एच.यू. में दाखिला लेने की उड़ान पर निकल गयी। वहाँ उसे अपनी गहरी रूचि वाले 'हिंदी साहित्य' में 'एम ए.' में दाखिला मिल गया। रहने के लिए 'महिला छात्रावास' में जगह की कमी पड़ी तो उसी विभाग की हेड-वार्डेन ने अपने कोटे से रास्ता निकाल दिया। रूम-मेटस और सहपाठी सब नए, नए उत्साह और तरंगों से भरे-पूरे। अलग-अलग गाँवों कस्बों और शहरों से आए, अलग-अलग बोली और समझ वाले, अपने-अपने सपने संजोए। हॉस्टल और बी.एच.यू. का हरियाला कैम्पस। हर तरफ युवा स्टूडेंट्स के लहराती लहरों जैसे रेले। 'विश्वनाथ मन्दिर' और लाइब्रेरी, हर हॉस्टल के सामने खेल के मैदान, मॉर्निंग वाल्क से संझा तक रौनक ही रौनक। लंका से गोदौलिया से आगे पक्का महाल और जिधर जाइए गुलजार माहौल। 'लवंग लता' और 'मधुर मिलन' जैसी मधुरिम मिठाइयों का स्वाद, गंगा जी के घाटों के नज़ारे, कजरी और ठुमरी, धारा पर झूलती नइय्या में मस्ती वाली सैर, नयी उमर की कोमल भावों वाली उमगन। एकदम नयी मनभावन दुनिया में पहुँच गयी। काशी ने मन मोह लिया।

कालिदास रचित रामटेक पर्वत से अलकापुरी तक विचरते मेघ वाली 'मेघदूत' और बदलती ऋतुओं वाली 'ऋतु संहार', शिव प्रसाद सिंह की लिखी 'गली आगे मुड़ती है' और 'अलग अलग वैतरणी', विवेकी राय की 'सोना-माटी', फणीश्वर नाथ रेणु की 'परती परिकथा' जैसी रचनाओं ने उसकी आँखों और भावों में और अधिक सपनीले सपने सजा दिए। सबसे अधिक आनंद आता यात्रा-कथाओं और मौक़ा मिलते ही आस-पास की लिखनिया दरी, भल्दरिया दरी, टांडा फाल और सिरसी जैसे प्रपातों, उनसे लगे वनों की सैर करने में। कभी-कभार 'स्टडी टूर' में शिमला, दिल्ली, बम्बई के चक्कर भी लगे। दुनिया खुलती गयी और उसे देखने-समझने-परखने का दायरा भी फैलता गया। ऐसे ही पढ़ते-घूमते दो साल निकल गए। एम.ए. की डिग्री पा कर पी.एचडी के लिए रजिस्ट्रेशन कराया उन्हीं एसोशिएट प्रोफेसर के अंडर में जिनके नेतृत्त्व में उसके सहपाठी ट्रेकिंग के लिए निकलने की योजना बना रहे थे। शोध का विषय मिला 'प्राचीन और आधुनिक हिंदी में यात्रा-साहित्य।' साहित्य के साथ भिने घुमक्कड़ी के रस ने पहले से ही पैरों में लगे घूमने की मौज के पहिए और तेज़ी से घुमा दिए।

प्रोफेसर साहब गहरे ग्यानी और शौक से खासे घुमक्क्ड़ी प्रवृत्ति के होने के कारण अक्सर अपने स्टूडेंट्स के साथ ट्रेकिंग और पर्वतारोहण के लिए निकल जाते। वे स्वयं और उनकी टोली के अधिकाश लड़के पर्वतारोहण की विधिवत ट्रेनिंग और अनुभव रखते थे। विभाग में आयोजित 'यात्रा-कथा वर्कशॉप' में मुख्य व्यक्तव्य देने आए एक सुदर्शनीय युवा साहित्यकार ने एक ऐसे सुरम्य स्थल की श्रम-साध्य यात्रा का ऐसी शैली में बखान किया कि उस नयी 'रिसर्च स्कॉलर' सहित सब पर बड़ा ही मनभावन प्रभाव पड़ा, जैसे रिमझिम फुहारों में नए-नए रोंपे गए धान की पौध हरियाने लगे, भीगी लतरों की कोमल फुनगियाँ आकाश की ओर चल पड़ें, शीतल बयार का स्पर्श-सुख मिले। ऊपर से उनके बोल-भाव-मुखमण्डल का सम्मोहन का गहरा असर बयान से परे। और जब उसके पीएचडी-सुपरवाइजर और उनके शिष्यों ने उसी स्थल की ट्रेकिंग की योजना बनायी तो वो भी मचल गयी उनके साथ वहां जाने के लिए। अंततः उसकी गहरी लगन देख-समझ कर गुरु जी उसे भी साथ ले जाने के लिए मान ही गए।

बड़े उत्साह से निकल पड़ी पूरी मण्डली जुलाई के महीने में बरखा-बहार का मज़ा लूटते। मगर वही बरखा उनके जी का जंजाल बन गयी। खौफनाक रास्तों पर बारिश में फिसलते उसी जगह का नाम टेरते चले - नीचे खाई, ऊपर से फिसलती आती मिटटी, बस भगवान् ने बचा लिया। मन मारे आधे रास्ते से ही लौटना पड़ा। लेकिन तभी से उसकी यह इच्छा और प्रबल हो गयी कि अब तो वहां जा कर ही रहेंगे। गाइड महोदय को भी अपने दृढ निश्चय से अवगत करा दिया 'आई वांट टू गो इन एनी कंडीशन'।

अगली बार वहीँ जाने के लिए गाइड का मैसेज मिलने पर मिली संतोष भरी ख़ुशी मन में ही ना समाय वाला हाल हो गया। सारी तैयारी खटाखट पूरी। उसके साथी कहते 'ज्यादा उछलो नहीं' लेकिन क्या करती आदत से मजबूर, जो अंदर वो बाहर आ ही जाता है। अगले दिन सुबह साढ़े पांच बजे तक घर से निकलने का प्लान बना। पर उसे हर बार की तरह ऐसे अभियान पर निकलने से पहले जागते हुए सपने आने लगे, इतनी कल्पनाएं बनने लगीं कि खुद से ही परेशान हो गयी। पूरी रात जागते हुए सपने देखते निकल गयी।

सुबह जरूरी कपड़े, सामान पिट्ठू, कैमरा गले में, उसके साथ स्लीपिंग बैग, फौजी कमांडो जैसी पैंट-टीशर्ट पहन कर लाम पर ंनिकलने को तैयार। रास्ता बहुत खूबसूरत मगर अपनी सनक में रास्ते का नक्शा बनाने में लगी रही, एक एक गाँव का नाम याद रखने की गरज से। जैसे जैसे चढ़ाई के साथ ऊंचाई बढ़ी, हवा ठंढी और आसमान का नीला रंग साफ होता गया। मरकुड़ी गाँव पास आया। गढ़ी जैसा बना 'चेरुई थाना' दिखा, बताया गया थाने की बुर्जियों में जगह-जगह बने पतले झरोखे नक्सलियों से संभावित मुठभेड़ की दशा में गोली चलाने के लिए बनाए गए हैं।

एक आदिवासी गाँव के स्कूल में डेरा पड़ा। ऐसी जगह रुकने का बहुत मन था लेकिन कोई कभी ले ही नहीं जाता था। अब मौका मिला तो डर भी लगा कि इतनी मेहनत कभी की नहीं है पता नहीं क्या होगा लेकिन कोशिश तो करनी चाहिए। स्कूली बच्चों को मण्डली में शामिल लोग दूसरे गृह के प्राणी लगे। सबके सब सुन्न। उनके साथ खूब फोटो खींचे, बड़े अनोखे नाम थे उनके, एक का नाम था 'लालबत्ती' जिसकी माँ हमारा खाना बनाने वाली थी। हलकी बारिश शुरू हो गयी। चूल्हे की आग पर बना खाना ऐसा जैसा कभी बचपन में खाया था। टाट-खाट भी मिल गयी रही-सही कसर स्कुल के प्राचार्य जी ने जेनेरेटर से बिजली जलवा कर पूरी कर दी। ऐसा मौका पा कर हमारा बहुत मन हुआ गपियाने का मगर 'गाइड महोदय' ने आठ बजे ही लाइट बंद करवा कर सोने की घंटी बजा दी। मजबूरी में सोना पड़ा वरना भला ऐसे माहौल में इतनी जल्दी, बिना बातें किए, कोई कैसे सो सकता है।

रात में पेट में मरोड़ उठने का साथ उठ गयी। सभी लोग सोते दिखे, लगा आज सुबह सबसे पहले वो ही उठी है। पर अलार्म तो बजा नहीं । मोबाईल में देखा तो बजे थे साढ़े ग्यारह, रात के। बाहर पसरा सन्नाटा, ठंढी हवा, रोते हुए कुत्ते सियार, अकेले बाहर जाने की हिम्मत नहीं हुई। एक साथी को जगाया, बाथरूम जाने के लिए। इतनी जल्दी सोना और उससे भी पहले उठना कभी नहीं हुआ था। जीवन में पहली बार इस तरह के गाँव में रह रही थी। किसी तरह दुबारा सोई पर पेट में बहुत दर्द था। जिस बात का डर था वही हुआ। जो घूमना पहाड़ चढ़ना कल तक एडवेंचर लग रहा था अब बड़ा दर्दनाक लगने लगा।

कुछ भी होता रहे मगर वो हार मानने से रही। सुबह होते ही चल पड़ी ट्रेकिंग पर पूरे जोरशोर से। लड़कों से हार नहीं माननी इसलिए उनकी बराबरी में खूब चली। जंगल पहाड़ में ट्रेकिंग करते आखिर में पहुंच ही गए मंजिले मकसूद पर। पहाड़ कंदरा वनांचल सोन का विहंगम दृश्य स्वप्नलोक जैसा। घूमते-घामते ऊंची चट्टानों और कगारों में फोटो खींचते-खिंचवाते बारिश के आसार दिखने लगे इसलिए वहीँ फंस जाने के डर से जल्दी-जल्दी लौट पड़े । बूँदें पड़ने लगी, भगवान् से मनाने लगे पर उन्हें तो उसकी 'आई वांट टू गो इन एनी कंडीशन' वाली बात लग गयी थी। एक वरिष्ठ साथी के पैर में चोट और उसके पेट में दर्द इसलिए दोनों ही धीरे-धीरे टिंघुरते हुए घिसटने लगे।

बारिश तेज होती गयी और रास्ते की चिपचिपी मिटटी फिसलने लगी। फिसलते-चलते कीचड़ में जूते लिथड़ाते दो ही मिनट में बुरी तरह भीग गए। भीग तो और लोग भी गए मगर उन्होंने अपने भीगे कपडे निचोड़ कर फिर से पहन लिए और मजे लेते रहे भीगने और आपसी हंसी मज़ाक मौज मस्ती में। बारिश में भींगना उसका भी फेवरेट है लेकिन उस 'कंडीशन' में नहीं जब पीरियड्स चल रहे हों, शायद किसी लड़की को पसंद नहीं होगा। खुले में कपड़े
निचोड़ कर दुबारा पहनने का ऑप्शन भी नहीं था उसके लिए। ठंढ में गिनगिनाते हुए चलने की मजबूरी में किसी तरह एक-एक कदम खींचती रही। कैमरा भीग कर तरबतर, कांदो में लपटी, जूता उतार कर हाथ में थामे गिरते-पड़ते, लस्त-पस्त। इतना ही नहीं जब थोड़ा सा ही उजाला रह गया तब सभी लोग आगे का रास्ता भटक गए, और उसके चेहरे से झूठी वाली हंसी भी गायब हो गयी। थोड़ी दूर चलने पर अंदाज़े से मिले रास्ते ने सीधे स्कूल के सामने ही पहुंचा दिया तब जान में जान आयी। मंजिल पर पहुँच कर मंडली के सभी साथियों को अचरज के साथ आ उसकी हिम्मत और इच्छाशक्ति का लोहा मानते हुए का मानना ही पड़ा कि 'उसका जवाब नहीं'।

सब लोग हाथ-मुंह धोकर लेट गए। सब की हालत खस्ता लेकिन हौंसला बनाए रखने के लिए कोई उफ़ तक न करता। मस्ती-मज़ाक का दौर भी चलता रहा। बेहद थकान के मारे सोचती रही कल वाले ट्रेक पर नहीं जाएंगे। तभी किसी ने कैम्प-फायर जला दिया जिसके पास थोड़ी देर बैठने के बाद
सबकी जान में जान लौटी।

सुबह जगने के बाद भी कोई 'स्लीपिंग बैग' से निकलना नहीं चाह रहा था। पैर और बदन पत्थर जैसे लगने लगे, जूते भीग चुके थे, चप्पलों में ही चलना होगा उन्हीं फिसलन वाले पहाड़ी रास्तों पर, यही सोचते बाहर झांकती और किसी को भी सोता देख झट से मुंह अंदर कर लेती। तब तक गाइड महोदय ने पूछ ही दिया 'तबियत कैसी है ?' तब कोई बहाना नहीं बचा, मुंहचोरी पकड़ी गयी। झट से बोली 'ठीक हैं सर ! 'गुड़ मॉर्निंग'। बहादुर हूँ, मैं क्यों नहीं जाउंगी, फटाफट उठ कर तैयार।

स्कूल के बरामदे में पड़े जूतों पर रात भर कुत्ते कूदते रहे थे, मोज़े उनके खेलने के सबसे प्यारे ऑब्जेक्ट हो गए थे। कुछ कुत्ते उनके गीले कपड़ों में घुस कर अपनी ठंढ भगाते रहे। उनकी वजह से पूरा बरामदा चहटा भरा दिखा। लेकिन उस दिन सुबह से ही अच्छी धूप के लक्षण दिखने लगे। चिड़ियों का एक झुण्ड उड़ कर आया, सामने बंधी रस्सी पर पांत बाँध कर बैठ गया, कुछ देर चकर-मकर करते पंछी कभी मूड़ी कभी पूँछ हिलाते चीं-चीं करके कहीं उड़ गए। जूते सुखाने की सोच कर उनकी कांवर बनाने का फैसला हुआ। एक साथी जिन्हें ऐसे कामों में बड़ा मज़ा आता, काला चश्मा नीला ट्रैकसूट और जूतों से सजी लाठी काँधे पर टांग कर चल दिए। बाकी ने अपने अपने जूतों की माला पहनी। एक औरत रुक कर ऐसे देखने लगी जैसे हम मदारी हों। किसी ने पूछा 'शाम को फिर बारिश हुई तो', 'तो क्या फिर जूते गीले करेंगे और कंधे पर टांग कर वापस चलेंगे। कभी हम जूतों पर कभी जूते हम पर। '

पूरा दिन खुशगवार रहा मस्ती में कोई कसर नहीं छोड़ी। फिर उसी मुकाम पर पहुँच कर लगा लोग जंगल-पहाड में ही क्यों तपस्या करते हैं, क्योंकि
जहाँ निर्जनता होती है वहीँ हम प्रकृति से मिल सकते हैं उससे एक हो सकते हैं। कल की बारिश के बारे में सोचते हुए लगा इस जगह का बारिश से कोई रहस्यमयी नाता है। वर्कशाप वाले वक्ता जब यहां आए तब शायद फरवरी का महीना रहा होगा, फिर हमारे पिछले जुलाई वाले ट्रिप में और अब फिर मार्च में, तीनों बार बारिश ही बारिश।

खूब घूमे, घूम-घूम कर खूब तस्वीरें उतारीं, न सही कैमरा मोबाइल तो था ही। सचमुच अद्भुद रहे वहां के नज़ारे, सोन नदी सुनहरी चौड़ी रेखा जैसी, दूर जाते ट्रक डिब्बे जैसे, सूरज हमारे बराबर ऊँचाई पर, पीछे पलटने पर जंगल और आगे बिलकुल सीधी पहाड़ी कगार के नीचे गहरी घाटी। जंगल पहाड़ झरने कंदराएँ, दिलकश परिदृश्य, सोन का विहंगम मंज़र, ऐसी जगहों पर फोटो नहीं सीनरी बनती है जो उसके 'लैप टॉप' पर लगी रहेगी अगले एडवेंचर तक। लौटने हुए देखे तरह तरह के पेड़-पौधे, खपरैल वाले या मिटटी की कच्ची दीवारों वाले घर, बेफिक्र वनवासी, प्रसन्न मन बच्चे, हंसती हुई परम संतुष्ट ग्रामीण महिलाओं को देख कर समझा 'उन्हें नहीं मालूम उनके पास वो सारी खुशियां हैं जिन्हें हम तलाश रहे हैं अपना सब कुछ खो कर।' सभी ने गाने गाए, खूब मज़े किए, रास्ता छोटा लगा। अँधेरा होने पर चारों ओर धुली धवल चांदनी बिखर गयी। उसका टेस्ट पूरा हुआ तमाम परेशानियों 'कंडीशनों' की परीक्षाओं में पास होने के बाद। बारिश में भीगते हुए, दिन के उजाले में और रात की चांदनी में आनंद ही आंनद लूटा।

चलते समय जो भी राशन-पानी और सामान बचा 'लालबत्ती' के साथ आयी खाना बनाने वाली को भेंट कर दिया। उस सामान में एक काला चश्मा भी चला गया जिसकी एक कमानी निकल गयी थी। अभी दो मिनट भी नहीं लगे होंगे, 'लालबत्ती' डोरी से बाँध कर वही चश्मा लगाए हीरो बन कर हमारे बीच आ कर भी शरमा कर छुपने लगा। यह देख कर उस पर बड़ा प्यार आया और उसके साथ एक सेल्फी ले कर संजो ली।

इस ट्रिप में उसने निराली आनन्द भरी संतुष्टि पायी। आगे भी ऐसे एक्सपीडीशन्स पर जाने का हौंसला बना। हो सकता है वो कंडीशन लड़कों को उतने कष्टप्रद न लगे हों। लेकिन ट्रेकिंग के दौरान उसे हुए इतने खराब अनुभव उन्हें भी समझने चाहिए। जब लोग कहते हैं कि लड़कियां लड़कों की तरह काम नहीं करतीं तो उन्हें पता होना चाहिए ऐसा क्यों है और उसने उन्हें कैसे संभाला। "हाँ, मैं इसलिए उतना खुल कर नहीं कह सकती क्योकि मुझे नहीं मालूम कैसे कहना चाहिए।" एक फीमेल-ट्रेकर के रूप में इस हैजार्ड को पार कर पाने के अनुभव पर उसे गर्व हुआ। उसने यह भी सोचा 'क्यों न लगे हाथ बीएचयू के 'माउंटेनियरिंग इंस्टिट्यूट' का डिप्लोमा भी कर लिया जाय'। मगर फिर लगा 'पहले थीसिस फिर कुछ और। एकै साधै सब सधै, सब साधे सब जाय।'

बहुत दिनों बाद अगली छुट्टियों में गाँव जाने पर घर वालों सहित सभी को वो बहुत बदली, खिली हुई खुश-खुश नज़र आयी। दिन भर गुनगुनाती, उड़ती हुई सी मुदित मन बच्चो से खेलती, माँ को दुलराती, पुरानी सखियों से मिलती, सबसे बतियाती बनारस के बारे में, घूमने के किस्से और अनुभव सुनाती। एक दिन ऐसे ही दादी के पाँव दबाते हुए उसने वही ट्रेकिंग वाला किस्सा उन्हें सुनाया। हूँ, हूँ हुंकारी भरती चुपचाप सुनती दादी पूरा सुन कर धीरे से पूछीं 'अच्छा ई बतावा ! जो अगर परफेसर साहब तोके साथे ले जाए के न तयार भइल होतें तब तैं का करतीं ?"

आँखों में चमक और चेहरे पर निश्छल हंसी छलका कर उसने बताया 'ओहू के लिए पहिलवैं से सोच के रखले रहली दादी ! हम लोग ओके प्लान बी-सी-डी कही ला, वो नहीं मानते तो उनके सीनियर से बोलती उनको समझाने को या गाइड साहब की वाइफ से कहती, आखिर में रोने का भी प्लान था। फिर भी न जा पाती तो अगली बार उन्ही वर्कशॉप' में व्यक्तव्य देने आए वक्ता का साथ पकड़ती।' यह सुन कर दादी चकित रह गयीं 'हम तो तुहैं नन्हकिऐ समझत रहली बकी तू तौ बड़ चतुर चलाक निकरि गइले रे।' इतना कह कर दादी कुछ देर चुप रहीं।

पहले की तरह पूरी लगन से दादी का पैर मींजते हुए वो गुनगुनाने लगी 'हम होंगे कामयाब एक दिन।' दादी चुप हो कर गहरी सोच में डूबी रहीं फिर उबर कर पास ही बैठी उसकी माँ से बोलीं 'ई 'आरनवा' त पुरहर बहल्ला निकरि गइल रे ! ऐसन जनले होतीं तो हम तो एके कउनो दसा में बनारस कै हवा न लगले देहले होती। घोड़ा एतना बड़ हो गइल है, तोहरे सब एकर बियाह गौन कब करत जाबा जा !' दादी की ओरहन सुन कर माँ के मुख पर भी चिंता के भाव उभर आए। मगर तब तक उसने दूसरा पैर थाम कर बात की दिशा दूसरी तरफ घुमाते हुए कहा 'दादी ! हजार बार कहा है मेरा नाम 'आरनवा' नहीं 'आरण्या' है 'आरण्या', वही बोला करो मगर तुम मानती ही नहीं।'

अब दादी उसका नाम रखवाने वाले पंडित जी और उसके पिता पर बिगड़ गयीं 'कहतै रह गइली कि नाम के बहुत असर पड़ा ला, मिनहा कै के हार गइली केहू मनबै नाहीं कइलस, कइऔ नाम सुझावल गइल अंकिता, अखिला, अर्चिता, अरुणा, बकी एनके बाप के सूझल एही 'आरनवा'।' और मजा लेने के लिए उसने मुस्कुराते हुए कहा कितनी बार तो बताया है दादी ! कोई खराब नाम थोड़े ही है। वनों में रहने वाले ऋषियों ने आरण्यक जैसे उत्कृष्ट
साहित्य की रचना अरण्यों में ही की। 'अरण्या' नाम की एक नदी है और इसी नाम की एक औषधि भी होती है। आप लोग सही से बोल नहीं पाते तो नाम ही बिगाड़ कर 'अरनवा' कर दिया।' अब दादी चिढ गयीं 'बने (वन) पर नांव धराइल है तब्बै न बने-बने बउराइल घूमत बाय।' ।

-राकेश तिवारी
सी-1 /173, सेक्टर - जी,
जानकी पुरम, लखनऊ (उ. प्र.) - 226021
 

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