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समन्दर से लौटती नदी

हते हैं , काले जादू की कोई काट नही ......जो इसकी जद में आया समझो गया । और उस पर जादू अगर किसी जादूगरनी का हो तो किसी ढब निज़ात नही । मन किसी पगलाहट में मलंग हुआ फिरे।हम जहां हैं वहां हैं कि नहीं आठों पहर कुछ ऐसी नामालुम कैफ़ियत और बदहवासी कचोटती रहे।

इन दिनों यही कैफ़ियत सुकेश प्रधान के सारे वज़ूद पर तारी थी ।एक काला जादू उन्हें अलसुब्बह ही बालकनी में खीँच लाता वो अखबार सामने पसारे मंत्रबिद्ध से खड़े रहते जबकि उनका मन कबूतर बन पाँचवें माले की खिड़की पर दाने चुगता । सम्मोहन की गिरफ़्त ऐसी की छूटती ही न थी।

जादूगरनी लगभग रोज़ ही रियाज़ करती थी ।उसकी आवाज़ में वही खनक थी जो प्रायः बंगाली लड़कियों की आवाज़ में हुआ करती है ।

बालकनी की मुँडेर पर कुहनियां टिकाए सुकेश उसके सुरों के तिलिस्म में खोए ही थे कि रेणु ने गरम चाय का प्याला उनकी बाँह से सटा दिया।वे चौंक पड़े थे ।
" कितनी सधी हुई आवाज़ है..... जी होता है बस सुनते जाओ ।"
रेणु हँसी "ब्लैक मैजिक , लगता है चल गया तुम पर भी ।
" मुझ पर भी मतलब ?"
"तुम जैसे जाने और कितने होंगे ।"
"अच्छा ! तुम्हें कैसे पता ?"
उन्हें इस चुहल में कदाचित् मजा़ आ रहा था।
"वो चीज़ ही ऐसी है ।"
"हाँ सचमुच ...मगर चीज़ तो न कहो "
उन्होंने सीने पर बाँयी ओर हाथ मारकर एक नाटकीय आह भरी और ज़ोर से हँस पड़े।.
रेणु ने पौधों को पानी देते हुए मुंह बिचकाकर ढेर सी बूँदें उन पर उछाल दीं और झूठ मूठ की चिढ़न से कहा ..
"बेकार है ...वो भला तुम्हें घास डालेगी ?"
"मत डालने दो , वैसे भी ..….मुझे घास नही माँस पसंद है ।"
उन्होंने उसे करीब खींचकर उसकी अनावृत पीठ पर शरारत से अपने दाँत गड़ा दिए ।झेंपी सी रेणु ने ढलक आए पल्लू को संभालते हुए इधर -उधर झाँकते हुए नकली धिक्कार भेजी ...
" कुछ। श--र---म व--र---म करो .....चालीस पार हो ....."
और उनकी बांहों के घेरे से मुक्त होकर वह उबलते दूध के निमित्त रसोई में दौड़ गयी ।
सुकेश हँसते हुए वहीं से चिल्लाए
"चालीस पार हूँ तो क्या .. दिल पर कभी झुर्रियाँ नहीं पड़ती और उम्र के साथ शर्म बढ़ती नऽऽही .....घटती है ,सऽमऽझीं ।"


रेणु एक सुघड़ पत्नी थी।उनके बच्चों की स्नेही माँ ।समर्पित और संतुष्ट । किंतु सुकेश , उनकी बात और थी वो आख़िर कलाकार थे । अक्सर अधीर या गंभीर ,सजींदा या रजींदा । उनके मर्म को जाने क्या -क्या छूता था और उनकी संवेदना कुछ नया पकड़ लेने को हमेशा चौकन्नी रहती थी ।इस दुनिया से बिल्कुल ही अलहदा उनकी एक और दुनिया थी ।उनके रंग ,एज़ल और कैनवास ।जो उन्हें औरों से प्रथक करते थे.....और शायद यही वो अवयव थे जो असल में उन्हें औरों से जोड़े भी रखते थे।

बहरहाल... यहाँ बात रेणु या सुकेश की नही एक काले जादू की है और जादूगरनी उनके ठीक नीचे पाँचवें माले पर रहती थी ।जो महज़ महीना भर पहले ही अचानक उनकी दुनिया में दाखिल हुई थी ।

वह जून के आखिरी सप्ताह की कोई अलस दोपहर थी ।साहित्य कला परिषद की लंबी आर्ट गैलरी में बड़ी नफ़ासत से सजा था उनका 'सेवेंथ हैवन '। एग्ज़ीबिशन का आखिरी दिन था ।उस ऊँघती दोपहर में बाइस -चौबीस की वो युवती बड़ी गहराई से उनकी कला के मंतव्य को टटोल रही थी ।उन्हें अचरज हुआ था ,इस उम्र की लड़कियाँ कला दीर्घाओं में कम ही नज़र आती हैं ।
वो आकर्षक थी ।बल्कि बेहद आकर्षक ।चुस्त जींस ,चिपका हुआ टाॅप और कधें पर लापरवाही से झूलता स्नेक लैदर का झोलानुमा बैग ।अपनी रूचि और चयन की इस तंग पोशाक में उसकी देह के कटाव और अधिक मुखर हो उठे थे ।उसके बाल कमर तक थे ।सीधे और सिनग्ध । जिन्हें बीच -बीच में वह व्यस्त भाव से जूड़े की शक़्ल में लपेट लेती थी ।उसकी गहरी काली आँखें भीड़ भरे गलियारे में घूम फिरकर उनकी आँखों से टकराई और उसने एक बेहद मोहक मुस्कान उनकी तरफ़ उछाल दी जिसे तत्परता से लपककर वो उसके पास जा खड़े हुए थे । ठीक वहाँ .....जहाँ दीवार पर एक उभरे पेट वाली जर्जर औरत की तस्वीर थी ।तीन फटेहाल लड़कियों को लिए बूढ़े पीपल पर धागे बाँधकर मन्नत मांगती एक अधेड़ औरत ।
उस आकर्षक लड़की ने टिप्प से उसी तस्वीर पर अपनी अंगुली रख दी ।

"यहाँ क्या दिखाई देता है .... " उसकी आँखों में उलझन थी। " औरत होने की गरिमा या पश्चाताप ?"

" यहां सिर्फ उम्मीद है ।" वो सरलता से मुस्कराए ।"मेरे स्वर्ग की पहली सीढ़ी ।"

"अच्छाऽऽ ! " वो हँस पड़ी ।उसने तपाक से कहा "वाकई बड़ा ही सुन्दर है आपका स्वर्ग । "

फिर समूचे गलियारे पर एक सरसरी नज़र डाल बड़ी शोख़ी से कंधे उचकाकर वो फुसफुसाई ।

"मगर ....यहाँ बस औरतें ही रहती हैं ?"

इस शोख तंज़ को उन्होंने तुरंत ही पकड़ लिया ।

"औरतों के बिना कहीं कोई स्वर्ग होता होगा ?"

वो उसकी आँखों में झाँककर मुस्कराने लगे तो उसकी बेजोड़ बादामी आँखें कुछ और गहरी हो गयीं ।उसकी आँखों में उनके लिए सम्मान और आभार था। वो उनके आभामंडल के घेरे में थी।

"आप कलाकार हम औरतों को कितना खास बना देते
हैं। "

"शायद ....लेकिन आप सचमुच खास हैं ।"

"शुक्रिया "उसने शरमाकर थोड़ी नज़ाकत से कहा । उसके चेहरे पर सुर्खी दौड़ गयी।

वो खुश लग रही थी । फिर कला पर चर्चा करते हुए वे साथ -साथ गैलरी में टहलते रहे ।यूँ इस चर्चा का कोई औचित्य नही था ।उसे कला की ज्यादा समझ नही थी ।लेकिन उसका रूझान गौरतलब था । एक औपचारिक मुलाकात आत्मीय होने ही लगी थी कि चंद पत्रकारों ने उन्हें घेर लिया ।वह किनारे खड़ी कुछ देर चुपचाप उन्हें देखती रही और अततः विजिटर्स डायरी पर झुक गयी ।
मोती जैसे साफ सुंदर चार शब्द
"मोर देन एन आर्टिस्ट ।"--------शैफ़ाली

*******
शैफ़ाली मज़ूमदार ।
बक़ौल रेणु 'ब्लैक मैजिक '।
उसे लेकर वो हमेशा सन्देहों की गठरी बाँधे रखती थी।कि क्यों वो आधी रात तक गायब रहती है ,क्यों तमाम रात उसकी बत्तियाँ जला करती हैं । क्यों कभी उसका अखबार दोपहर तक दहलीज पर धूल फाँकता है , क्यों कभी मुँह अंधेरे ही वो सुर छेड़ देती है और क्यों घंटी बजा बजाकर परेशान दूधिया और कान्ताबाई बड़बड़ाते लौट जाते हैं ।

"बड़ी अजीब है ......जाने क्या करती है ?" रेणु के शब्दों में उसके लिए जिज्ञासा की तीक्ष्ण गन्ध होती।

जल्द ही बगल से गुज़रते हुए एक गूढ़ मुस्कान के साथ एक रोज़ उसने ये भेद भी खोल दिया ।ये बात अलग थी कि इस खुलासे के साथ भेद और गहरा गया था।उलझाना शायद उसका मनपसंद शग़ल था ।

"आप बस्स यूँ समझिए कि मैं ख़्वाब बेचती हूँ ।"

सिर्फ़ इतना कहकर उन्हें एलीवेटर तक छोड़ वह चट-पट सीढियाँ चढ़ गयी थी।और सुकेश उसकी देह की चपलता को ताकते रह गए थे ।हालाँकि बाद में उसने बताया था कि वह एक विज्ञापन एजेंसी के लिए एड जिंगल गाने और स्लोगन लिखने का काम करती है।
******
पाँचवें माले का यह फ़्लैट दरअसल रिटायर्ड कर्नल मजूमदार का था । उन्हें ये दिलवालों का शहर जाने क्यों रास न आया । सो साल दो साल में ही मजूमदार दम्पति कोलकाता वापस लौट गए और फिर उनके लिए दिल्ली दूर हो गयी ।
चाहे जो हुआ हो वीरान पड़ा पाँचवां माला एकाएक गुलज़ार हो उठा था .....और बेहद अप्रत्याशित ढंग से एक रोज़ छठा माला भी ।

एक शाम श्रांत क्लांत सुकेश घर लौटे तो दंग रह गए ।कमरे की कोई चीज़ अपनी जगह पर न थी । तकिए गॉव तकिए और कुशन यहां -वहां बिखरे पड़े थे ।शैफ़ाली घर भर में हिरनी सी दौड़ती फिर रही थी ।पीछे -पीछे नन्हें शावक से उसे पकड़ने को उतावले तरू और देव ।सोफ़े पर बैठी रेणु हँसते -हँसते दोहरी हुयी जा रही थी । वो भौचक खड़े रह गए ।इतने में शैफ़ाली ने एक छलांग भरी और देव को दबोच लिया ।" आss ये प - क -ड़ लिया ......अब भागो ,कहाँ भागोगे ।"
देव की मासूम खिलखिलाहटों से घर झूम रहा था। उन्हें देखकर शैफ़ाली ठिठककर सकुचाई सी एक तरफ़ को खड़ी हो गयी ।उसकी बेतरतीब साँसों के साथ गतिमान सीने के उतार -चढ़ाव और पसीने से लथपथ चेहरे को वे देखते रह गए। शैफ़ाली आँखें झुकाए पहले तो कुछ देर पाँव के अँगूठे से फ़र्श कुरेदती रही जैसे कि उसे सूझ न रहा हो कि वो क्या करे। फिर एक -एक चीज़ को जगह पर रखने लगी।

"देखिए तो ......कर्नल साहब की फ़ाॅर्मेलिटी ! "

रेणु ने मेज़ की तरफ इशारा करके शिकवा सा किया और एक कागज़ का पुर्ज़ा उन्हें थमा दिया । मेज़ पर कई तरह के सामानों का ढेर लगा था । नीली -गुलाबी तांत की साड़ी .... हलके रंग के बंगाली कुरते ...संदेश के डिब्बे । मजूमदार ने दो पंक्तियों की चिट्ठी में शैफ़ाली का ध्यान रखने का आग्रह किया था कि इस अनजान शहर में उसका अपना कोई नहीं ।
मोती जैसे साफ सुंदर शब्द .....वे चौंक गए ।ये लिखावट मजूमदार साहब की हरगिज़ नही थी ।ये जाने कैसा संकेत था ! शैफ़ाली ये सब क्यों कर रही थी !
" अच्छा मैं जाती हूँ ...आप लोग आइएगा ।"
उन्हें कशमकश में छोड़ वो लौट गयी ।वो दरवाज़े को देखते रहे जिससे होकर वो गयी थी।
"अच्छी लड़की है , नही ? " बड़ी उदारता से रेणु ने अपनी राय बदल दी थी और अब उस पर उनकी रज़ामंदी की मुहर चाह रही थी । वो मुस्करा कर रह गए । रेणु साड़ी का पल्लू छाती पर फैलाकर खुद पर रीझ रही थी ।
" ये मुझ पर कैसी लग रही है ? " वो अन्यमनस्क से "तुम पर सब जंचता है " दो टूक दायित्व निभाकर चाय के साथ घूँट -घूँट शैफ़ाली की उपस्थिति के रोमांच को पी रहे थे मानो वो अभी तक वहीं हो ।दौड़ती ,खिलखिलाती ,सकुचाती और उन्हें लगातार घूरती हुयी एक जादुई लड़की।
******
जादू सिर चढ़ रहा था ।सुकेश बदल रहे थे ।सामान्यतः देर तक सोने वाले सुकेश अपनी सुबह बालकनी में गुज़ारने लगे थे । बेमतलब ही सीढियाँ चढ़ने -उतरने लगे थे । एलीवेटर उन्हें एकदम ही फालतू की चीज़ लगने लगी थी।उनकी नज़र चोर हो गयी थी । कुछ नही तो उससे रूबरू होने को अखबार का ही बहाना सही .......
उसका घर भी उसकी तरह ही मायावी सा था।पुराने कायदे के फ़र्नीचर और एंटीक से सजा हुआ ।ड्रॉइंगरूम के सामने की दीवार का एक बड़ा हिस्सा म्यूरल आर्ट ने घेर रखा था।अगरु की महक से हर कोना सराबोर था।वो शायद संध्या वंदन करके उठी थी।कई बार उसके साथ उसकी उम्र की एक लड़की हुआ करती थी। मगर उस समय वो नहीं थी।
सुकेश ने इधर -उधर झाँककर पूछा ..
"तुम यहाँ अकेली रहती हो न ?"
"नही तो ।"
हैरान करना उसकी आदत थी और उसकी अदाओं पर हैरान हो जाना उनकी आदत।
".आप जो चौबीसों घन्टे साथ रहते हैं ।"
ऐसी चुहल करते हुए अक्सर हँसी उसके होठों से उठकर आँखों तक फैल जाती थी ।
"देखिए ना ।"
उसने मिनट भर में पिछले महीने भर के अखबारों की कतरने मेज़ पर बिछा दी थीं ।वो उसके आभारी हो उठे ।ऐसा चाव रेणु को भी है भला !
"आप चाय लेंगे या कुछ और ?" उसने हँसकर दीवार घड़ी पर नज़र डालकर कहा " आपका वक़्त हो गया है.... वैसे रोज़ पीना अच्छा नहीं ।"
वो फिर हैरान हुए थे कि वो उनके रोज़ पीने की बात कैसे जानती है !
चाय का प्याला थामते समय उसकी अंगुलियों से छू जाने की नाजायज़ सिहरन से वो देर तक थरथराते रह थेे।
उस रात एक विचित्र ऊर्जा ने उन्हें आंदोलित रखा। जैसे उनके भीतर टेस्टोस्टेरॉन का स्तर एकाएक ही बढ़ गया हो । रात गुज़रने को न आती थी ।तमाम रात वे करवटें बदलते रहे । छाती पर औंधी पड़ी रहीं खुशवंत सिंह की 'औरतें ' और सामने इतराती रही शैफ़ाली ।
"मैं ख़्वाब बेचती हूँ ।"
उन्हें लगा कि वो सचमुच ही कोई जादू जानती है ।
*****
शैफ़ाली चंद दिनों में ही प्रधान परिवार का एक अभिन्न अंग बन गयी थी ।अपरिहार्य और अनिवार्य ! उसके होने से रेणु को बड़ी सहूलियत हो गयी थी।
"तरू का होमवर्क मैं करा दुंगी ".....या "आप बैठिए ,आज चाय मैं बनाती हूँ ।" तरू और देव के लिए तो वो 'स्नो व्हाइट ' या ' रेपुन्ज़ेल' जैसी परी कथाओं की कोई नायिका थी ।उसका बैग था या कि किसी जादूगरनी का पिटारा ! उसमें उनके आकर्षण की ढेरों चीज़ें रहा करती थीं ।टाॅफ़ियां ,चाॅकलेट ,गुब्बारे ,सीटियां सुपरमैन के स्टिकर और जाने कितना कुछ ।देव को जो खाना खिलाने को रेणु घंटों झींकती थी उसे वो जाने क्या -क्या किस्से कहकर मिनटों में खिला देती थी।

कई बार वे घर में दाख़िल होते और दरवाज़ा खोलती शैफ़ाली।उसकी आमद उन्हें अजीब सा सुक़ून देती। रसोई में रेणु खाना बनाती होती और परोसती थी शैफ़ाली । वो भी इस अदा से कि गोया खाना नही एक भूख परोस रही हो .......कितना भी खाएं तो भी भूखे ही रहें।

उनके जैसे हर एक मर्द की ज़िंदगी में शैफ़ालियाँ हादसों की तरह आती हैं जैसे कोई ज़लज़ला या सुनामी ।और सिरे से सब कुछ उथल - पुथल कर जाती हैं।अपने पीछे छोड़ जाती हैं तबाही और पछतावे ।
********
किचन से बेडरूम तक उनके घर में बेधड़क विचरण किया करती थी वो दिलकश जादूगरनी । उसके कोई दायरे न थे।उस पर किसी को कोई आपत्ति न थी।वो उनकी निजी दराज से निकालकर उनके परफ़्यूम को खुद पर ढेर सा छिड़क लेती।फिर उसकी खुश्बू को अपने नथुनों से पकड़कर भीतर खींच ले जाती और होंठों को सिकोड़कर कहती .....
."पाॅ --य ---ज़---न । अब आप सारा दिन आस -पास रहेंगे। "
वो बस उसकी बातों पर हलका सा मुस्कराते भर ।कितनी नादान है शैफ़ाली ,उसे महसूस करने के लिए उन्हें किसी नकली वजह की ज़रूरत नही ।वो आँखें मूंदकर जब चाहे उसे अपने आगोश में समेट लेते हैं ।

शैफ़ाली बिंदास उनके रंगों और कूचिंयों से छेड़छाड़ करती थी।उनके इस निज़ी कक्ष में किसी बाहरी की आमद की मनाही थी।मगर वो उनकी कूंचीयाँ उठाकर उनके गले पड़ जाती ...
"ये हुनर मुझे भी सिखाइए "।
वो हँसकर कहते " ज़रूर सिखा दुंगा ....मगर मेरी फ़ीस ?
"कहकर तो देखिए ।" वो एक अजीब बौराएपन से उन्हें जकड़ लेती ..."पूरी की पूरी शैफ़ाली आपकी ।"
ऐसा स्पष्ट इज़हार ! पता नही ये अभद्र दुस्साहसी लड़की उन्हें इतनी अच्छी क्यों लगती है ! हमेशा मर्यादाओं में रहने वाले सुकेश अपनी इस कमज़ोरी पर हैरत करते।वे कोशिश किया करते थे कि शैफ़ाली से अकेले में सामना न हो।

शैफ़ाली वक़्त - बेवक़्त बेखटके यूनिवर्सिटी चली आती थी। स्टाफ़ रूम में उसका यूँ चले आना उन्हें बेचैन करता था। वो इस बात को जानती थी।
"तुम यहाँ क्यों चली आयीं?"
"आप मेरे साथ अनईज़ी फ़ील करते हैं न ?
अपनी सामर्थ्य को बटोरकर और स्नायुओं को तानकर उन्होंने बड़ी कठिनता से कहा
" हाँ ।"
"क्यों ?"
" क्योंकि तुम मुझसे बहुत छोटी हो ।"
"अच्छा तो आपको मेरी उम्र पर एतराज़ है !
उन्हें समझ न आया कि क्या कहें कि शैफ़ाली कोई सवाल न करे।
उसने कहा "आपको इस पर एतराज़ नहीं घमंड करना चाहिए ..... वैसे भी उम्र कोई मसला नहीं।मैं सब जानती हूँ जितना आपकी उम्र की कोई औरत जानती है।"
वो पिघलने लगे थे।
" क्या जानती हो ?"
"यही कि आपको क्या चाहिए ।"
" क्या चाहिए मुझे ...यह तो मैं ही नहीं जानता।" उनकी आवाज़ दरकने लगी थी।
" आपको शैफ़ाली चाहिए ।"
उस समय विचलित हो उठे थे सुकेश। उनकी ज़रूरत को कोई दूसरा इतने दावे से बयां कर रहा है।
" और शैफ़ाली को क्या चाहिए ?" उन्होंने कहा।
"प्यार को प्यार ही चाहिए होता है।"

सचमुच उन्हें शैफ़ाली चाहिए थी ......उनके कैनवास को ,उनके कलाकार मन को ,उनके अंदर के चिर अत्रप्त पुरूष को।
और कमोबेश शैफ़ाली का भी तो यही हाल था।उसके भीतर कहीं गहरे बैठ चुके थे सुकेश ।क्या करती शैफ़ाली ! वो थे ही ऐसे ।छः फुट लम्बे ,गोरे -चिट्टे ,ठुड्डी पर गड्ढा और उनका बड़ा सा आभा मंडल । वो एक बुलंद रुतबा रखते थे ।कला जगत में उनकी धूम थी , हज़ारों मुरीद थे ।अखबार , टी.वी और पत्रिकाएं उन्हें खूब पहचानते थीं ।अपनी कूँची और रंगों से किसी को भी जीवंत कर देने का माद्दा रखते थे सुकेश ।
किन्तु कोई भय उन्हें शैफ़ाली को अपने कैनवास पर उकेरने से रोकता था ।कभी -कभी हद जो कर देती थी वो पागल लड़की। उन्हें घूरती तो बस घूरती ही जाती ।रेणु के सामने ही देव पर ताबड़तोड़ चुंबनों की झड़ी लगा देती
"कितना क्यूट है.......बिल्कुल आप पर गया है। "
और उसे यूँ कसकर जकड़ती है कि वो कसमसाने लगता है ।बड़ी कुशलता से कभी उनका टूथब्रश कभी रूमाल जेब में सरकाकर चलती बनती ।इस पागलपन से डरने लगे थे सुकेश कि कहीं उसकी मंशाओं को रेणु भाँप गयी तो !
" तो क्या ....कह देना आप मुझसे प्यार करते हैं "। वो ढीठता से उन पर झुक आयी थी ।
"पागल हुयी हो ?" वो झुंझला गए थे।
क्षण भर को उसका चेहरा मलिन हो उठा ।
"क्यों .....नहीं करते ?"
उनके अंदर बहुत सारा कुछ एक साथ टूट गया था ।कैसे कहें उसे कि वो उसके साथ चल तो सकते है पर कहीं पहुँच नही सकते ।तरू उसे दी कहती थी .....वो सिकुड़ जाते थे। किंतु शैफ़ाली किस मिट्टी से बनी थी .......वो किसी वर्जना को नही मानती थी।

उसके जन्मदिन पर बुद्धा गार्डन के झुरमुटों में एक नयी शैफ़ाली से मिले थे सुकेश । जींस -टाॅप और सलवार -कमीज़ वाली शेफ़ाली से बिल्कुल जुदा ।शेफाॅन की नीली साड़ी के फिसलते पल्लू को संभालती सिमटी सी शैफ़ाली।झेंपती हुयी चुपचाप अपने बेहतरीन संवरे हुए नाखूनों से नेलपाॅलिश खुरचती रही ।जैसे इस लिबास ने उसके व्यकितत्व को ही नहीं किरदार को भी बदल दिया हो ।अपने जन्मदिन पर अपने मन का तोहफ़ा पाकर वो उत्साहित थी।
उनकी बनाई अपनी तस्वीर में उलझती हुई वो पूछ रही थी " इसमें मैं कहाँ हूँ ? "
शुष्क रेगिस्तान में झल - झल बहती एक नदी ।
"यही तो हो तुम।" उन्होंने कहा।
"ये मैं हूँ ? "अभिभूत हो उठी थी शैफ़ाली ।इसलिए तो चाहिए उसे ये सिरफिरा आदमी । इसलिए तो पगलाई रहती है वो उन जैसा कोई नहीं।उनकी तरह किसी ने उसकी आत्मा को नहीं छुआ।उसे जाने क्या हुआ घुटनों के बल बैठकर उनके होठों पर दो अंगारे से टिका दिए उसने ।
"तब तो आप समन्दर हैं ।"


मुलाकातों के सिलसिले चलते रहे ।अपने समंदर से नदी मिलती रही। .......लेकिन कब तक ! छिपकर प्रेम करने वाले सुकेशों पर सौइयों संकट हैं।

अचानक डाइनिंग टेबल पर एक विस्फोट हुआ ।
"छि : !...ज़रा शर्म न की .….तुमसे आधी उम्र की है वो ।"
अखबार सामने पटककर आँखों से आँसू और ज़बान से जहर उगलती रही रेणु।
"बदनाम तुम हुुए उसका तो नाम हुआ है ।"
अखबार में छपी उनकी और शैफ़ाली की घनिष्ठता की तस्वीरें उनके नाम का मखौल उड़ा रही थी। दाम्पत्य में एक शीत युद्ध सा छिड़ गया ।उनके बीच बिना संवाद के चूर -चूर हुए इस रिश्ते में कुछ भी न बचा हो जैसे।कितने ही दिन वो थाली में चुप्पी और आक्रोश निगलते रहे ।खुद से ही कुंठित और नाराज से थे सुकेश ।किसी एक के लिए सारी दुनिया को दाँव पर लगा सकें इतने खुदगर्ज़ कैसे हो सकते हैं सुकेश !अपनी सारी कुंठा और रोष के बावजूद वो जानते थे रेणु सही है।
उन्होंने शेफ़ाली के विरुद्ध ......नही . .. नहीं अपने ही विरुद्ध एक अहम फ़ैसला लिया ।

"हम और नही मिलेंगे ।"

"कब तक ? " शैफ़ाली निर्लज्जता से हँस दी।"आपको क्या लगा हमारा स्वागत होगा ?"
वो चुप रहे।
"आप अपने को बहुत कम महत्व देते हैं ........जब हम अपनी निजता को स्वीकारते हैं तब फ़ैसले समझदारी से होते हैं।"
उनके समग्र वज़ूद को चुनौती देकर दनदनाती चली गयी एक अदना लड़की ।
वो जितना दृढ़ होते थे उसे निकाल फेंकने को , उतनी ही और घुलती थी उनमें ।
शैफ़ाली उनके लिए प्यास भी थी और नदी भी ,सुकून भी और बेचैनी भी ,कारण भी और निवारण भी ।
लेकिन अब अपनी किसी बेज़ा हरकत से एक महान कलाकार के साथ खिलवाड़ नही कर सकते थे सुकेश ।
उधर शैफ़ाली भी अड़ी थी ।
"आप रह सकते हैं मेरे बगैर.....तो क्या मैं नही ?"

शनैः -शनैः गाड़ी पटरी पर लौट रही थी ।रेणु मुतमइन होने लगी थी ,उनके दरमियान का ग्लेशियर पिघलने लगा था।लेकिन वो नही जानते थे ये जादूगरनी का मायाजाल था जितना सहज है उसमें प्रविष्ट होना उतना ही दुष्कर है उससे बाहर निकलना ।

*************

रेणु के बाउजी की छाती का दर्द अचानक ही उखड़ गया था । सुबकती हुई वो आनन -फानन सूटकेस में सामान ठूँस रही थी साथ ही हिदायतों की फेहरिस्त भी थमाए जा रही थी ।"तरू के स्कूल में एप्लीकेशन भेज देना ......पौधों को पानी दो दिन में .......सर्दी से बचना रोज़ मत पीना ....सिगरेट बिल्कुल नही ।बस हफ्ते भर की बात है । बाऊजी के ठीक होते ही लौट आउंगी।"

अब खाली घर ! खाली दिमाग ! और ब्लैक मैजिक !
कैसे बचते सुकेश ।


दोस्त की नयी किताब के जश्न में उन्होंने जमकर पी थी ।बमुश्किल खड़े हो पा रहे थे । बहुत दिन के बाद घर पहुँचने को फिर सीढियाँ चुनी थी ।पांचवें माले पर सन्नाटा और अंधेरा पसरा हुआ था । किस हाल होगी शैफ़ाली ?
अंधेरे में दरवाजे से सटी एक परछाई जरा सी हिली और मोेटे परदे के पीछे लोप हो गयी ।तो अब उन्हें यूँ छिप -छिपकर देखा करती है । प्यार ऐसा जघन्य अपराध तो नहीं। ठिठककर कुछ देर उसके दरवाज़े पर खड़े रहे सुकेश फिर लड़खड़ा कर आगे बढे और लहराकर धड़ाम से गिर पड़े ।शैफ़ाली की घुटी हुयी सी चीख़ उनके कानों से टकराई ।कितने ही मकानों की बत्तियाँ एक साथ जल उठीं।


ना जाने किस वक्त आँख खुली थी ।दिमाग चकरघिन्नी के मानिंद नाच रहा था ।बुखार से लस्त आँखें और बुरी तरह सूखा हुआ गला ।मिचमिची आँखों से उन्होंने टटोलकर देखा ।दांयी ओर मेज़ पर चश्मा .....घड़ी डनहिल का खाली डिब्बी ....एैश ट्रे....गिलास …...
और...और बांयी तरफ़ ---------उनके बिस्तर पर बिल्कुल निर्वस्त्र निशंक सोती हुयी शैफ़ाली।

क्रमशः उन्हें सब याद आता गया ।वर्मा की पार्टी में बेहिसाब पीना ,किसी परिचित का शैफ़ाली और उनके रिश्ते पर किया गया तंज़ ,गाली- गलौज ,मारपीट ,रेड लाइट पर पुलिसिए से हुयी झड़प ,वो भला आदमी जिसने स्कूटर रोककर कहा था ....
"जाने दीजिये साहब ....शरीफ़ आदमी हैं ।" फिर शैफ़ाली के दरवाजे पर लहराकर गिरना और पलंग के पास की हुयी सड़ांध भरी उल्टी और फिर ----फिर ....कुछ याद नहीं ।
दो मन के लोथ को कैसे उनके बिस्तर तक ढोकर लायी होगी शैफ़ाली ! किस तरह वो बदबूदार उल्टी साफ की होगी ,जिससे वो खुद भी घिन्ना जाएं ।कैसे उनके कपड़े बदले होंगे ।कृतज्ञता से वो लबालब हो उठे ।लहरों ने किनारे तोड़ दिए । भावावेश में पहलू में पड़ी निर्वस्त्र शेफ़ाली को बाँहों में भर जहाँ -तहाँ चूमते चले गए सुकेश । अमरबेल सी उनसे लिपट गयी शैफ़ाली।
रात भर अपने शयनकक्ष में एक नाजायज़ रिश्ते का अलाव तापते रहे हैं सुकेश प्रधान । कोई जान गया तो !उनकी कुन्द पड़ी चेतना सहसा लौट आयी ।अंदर बैठा इज्ज़तदार ,कुलीन कलाकार भयभीत हो उठा।ऐंठी हुयी तमाम पेशियाँ एक पल में शिथिल पड़ गयी ।
"तुम चली जाओ शैफ़ाली ।"
उनकी आवाज़ में रिरियाहट सी उतर आयी ।वो इस बदले हुए किरदार के लिए कदाचित कतई प्रस्तुत नही थी ।
"मैं नही जा सकती .....आपको बुखार है ।"
"प्लीज़ऽ ऽऽ जाओ यहां से और फिर कभी मत आना।"
याचना की मुद्रा में दोनो हाथ जोड़कर चिल्ला से पड़े थे सुकेश ।कैसे दयनीय लग रहे थे वो ।।स्तब्ध रह गयी शैफ़ाली ।ये कौन सा रूप है उनका ।बाहर से इतना मजबूत और सतुंलित दिखने वाला ये शख़्स असल में इतना कमज़ोर है ।

"तो आप पछता रहे हैं .........है ना ?"

जी किया झिंझोड़ डाले उन्हें ।वो इतनी तुच्छ नही कि
उस रात का इस तरह पश्चताप करें सुकेश ।कातर कर देने वाली नज़रों से उन्हें देखती चली गयी शैफ़ाली ।जैसे कह रही हो ...
"मैं घृणा करती हूँ आपसे । "उन आँखों का सामना करने की ताब कहाँ थी उनमें ।शैफ़ाली चली गयी थी।

*********
मगर अब जादू अपने चरम पर था ।कई दिनों से घर में गुनाहनारों की तरह कैद थे सुकेश ।
वो सीढियाँ उतरते तो उन्हें लगता कि असंख्य आँखें उनकी पीठ पर चिपकी हुयी हैं ।सैकड़ों फुसफुसाहटे और कहकहे कानों में भिनभिना रहें है।उनके हाथ -पाँव कांपने लगते।वो बौरा गए थे जैसे ।क्या करें कहाँ जाए ? सिगरेट फूँकते -फूँकते अँगुलियाँ पीली पड़ चुकी थीं । पाँचवा माला उन्हें भुतहा लगता था।दूधवाला …कांताबाई सबको आने को मना कर दिया था।खाली पड़े थे उनके शापित कैनवास..... और उनके रंग बदरंग हो गए थे। अजीब हालत थी उनकी ! कभी शैफ़ाली को छू लेने का जुनून ,कभी पश्चाताप । कभी लगता था किसी अचूक मन्त्र से छिन्न -भिन्न कर दे उसके सारे सम्मोहन और तन्त्र को । भस्म कर डाले उस जादूगरनी को ।और कभी इच्छा होती कि सरेआम उसका हाथ थामकर बस्स दौड़ते चले जाएँ वहाँ तक .....जहाँ वो सुकेश प्रधान न हों ।जहाँ उन्होंने अपने लिए कोई हद निश्चित न कर रखी हो ।

उधर अपने ही तिलिस्म में जली जा रही थी शैफ़ाली ।अपमान के संताप से खौलती ....उबलती ।अपना आपा भूली हुयी ।

रेणु लौटी तो जैसे डूबते को सहारा मिल गया ।
घर का हाल बेहाल था।गमलों में जूही ,पिटूनिया सूख गए थे।रसोई में जूठे बरतनों का ढेर लगा था।घर में जगह -जगह 'डनहिल ' के फिल्टर पड़े थे। सूखी हुई ब्रेड , अंडों के छिलकों और शराब की बोतलों से डस्टबिन भरा पड़ा था।

और वे खुद कैसे थे .... बेतरतीब बाल ,कई दिनों के सिलवटों भरे मैले कपड़े , बढ़ीं हुयी शेव , कितने रोज़ से जगी हुयी आँखें , और चेहरे पर पसरी हुयी मनहूसियत ।
"हुलिया देखा है अपना ......... हुआ क्या है...जंगली लग रहे हो , मैं ना रहूँ तो तुम बस्स ........जाने कब सलीका सीखोगे .."
लाड़ भरे बनावटी गुस्से से रेणु देर तक डपटती रही उन्हें ।

यही सुरक्षा चक्र तो है जो किसी भी काले जादू से बचाता है उन्हें ।नन्हें बच्चे की तरह रेणु की गोद में दुबक गए सुकेश ।
" तुम कभी कहीं मत जाना।"

**********

देर रात तरू ने कहा था ........"दी कोलकाता जा रही है ।"
स्टेशन की खचाखच भीड़ से जूझकर वे किसी तरह उस तक पहुँच सके थे ।उस रात के बाद अब देखा था उसे ।उफ़ ! कैसी लग रही थी शैफ़ाली !छटपटा उठे सुकेश ।सूखे पपड़ाए होठ , निस्तेज पीला चेहरा और आँखों के नीचे उतर आयी गहरी स्याही ।कुछ ही दिनों में ये क्या से क्या हो गयी थी शैफ़ाली ।किस गुनाह के बदले यह रौरव झेल रही थी जादूगरनी।
"आप क्यों यहाँ चले आए ?"
"जा रही हो ?" उनके गले में किरकिरा सा कुछ रूंध गया ।
"हाँ .....आपको यूँ डरा सहमा नही देख सकती ।"
वो अपराधी से खड़े थे ।
"इस रिश्ते में तुम्हारे हिस्से कुछ नही आएगा ।"
"ये आपसे किसने कहा ? उस कंठ स्वर में गहरा क्षोभ था या तिक्तता थी शायद ।
"मेरी फ़िक्र मत कीजिए अपना हिस्सा मैं ले चुकी हूँ ।"
फिर लगा वो रो पड़ेगी उसने चेहरा घुमा लिया ।
दिल्ली -सियालदह राजधानी रफ़्तार पकड़ चुकी थी ।
समन्दर से नदी लौटी जा रही थी ।
काश !वो सुकेश प्रधान नही होते तो द्रुत गति से दौड़ जाते उसके पीछे ।
कितनी ही देर भीड़ में वो ख्वाहमख्वाह खड़े रहे ।
लाचार ! अतृप्त ! हताश !
लेकिन एक बात थी ....आज उन्हें कोई भय न था कि वो पहचान लिए जाएंगे ।
 

-विजयश्री तनवीर

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