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खत

“ऐम आई मीटिंग मेजर वर्मा...?” “यस,…दि सेम.!बट वाट्स योर प्रॉब्लेम?”
–“हेलो मेजर! आयम मिसेज गोम्स !”
मेजर वर्मा को लगा कि या तो उनके कान बजने लगे हैँ या फिर उनकी आँखों को चश्मे की जरूरत पड़ चुकी है।
उन्होंने तो कैप्टन रवि सक्सेना की पत्नी मिसेज गोम्स की कल्पना किसी और ही रूप में की थी।लम्बी...छरहरी...गोरी रंगत,बड़ी-बड़ी आँखें, नुकीली नाक और लम्बे-लम्बे बालों बाली कोई खूबसूरत युवती ही रवि की बीवी हो सकती थी पर सामने आई थी छड़ी टेककर झुकी-झुकी चलती यह वृद्धा… मिसेज गोम्स! परन्तु वृद्धा ने स्वयं आगे बढ़कर अपना परिचय दिया तो मेजर वर्मा को यकीन करना ही पड़ा कि वही मिसेज गोम्स थीं ।
हालाँकि मेजर वर्मा ने पहले भी बहुत सोचा था कि किसी ‘सक्सेना’ की बीबी कोई ‘गोम्स’ क्यों कर हो सकती थी? तो फिर कौन हैं यह वृद्धा जिसके पते पर रवि चिट्ठियाँ लिखा करता था?
“शायद ये रवि की माँ, ताई या चाची”...पर यह सवाल फिर भी बदस्तूर कायम था कि रवि सक्सेना की रक्त-सम्बन्धी कोई गोम्स कैसे हो सकती हैं।
ट्रेन स्टेशन छोड़कर निकल चुकी थी ।अगले मोड़ वाली पहाड़ी सुरंग में प्रविष्ट होने से पूर्व इंजन ने लम्बी सीटी दी तो मेजर वर्मा मानो चैतन्य हुए। कर्तव्यबोध हुआ। कुछ सवालों के जवाब के लिए मुनासिब वक्त का इन्तजार ही सबसे बेहतर तरीका होता है उत्तर पाने का ! धीरे-धीरे खुद-ब-खुद सामने आ जाती हैं सारी बातें।
-”आइए मैडम” मेजर वर्मा ने मिलिट्री जीप की ओर इशारा किया-“दिस वे प्लीज”
वृद्धा चुपचाप जीप में बैठ गई । मेजर वर्मा ने इग्नीशन में चाबी घुमाई । जीप को गियर मेँ डाला । जीप आगे की और दौड़ पड़ी । शाम ढल रही थी । पहाड़ी परिन्दे सिर के के ऊपर से चहचहाते अपने नीड़ों की ओर लौट रहे ये । पीपल, देवदार, सागौन और बुरूंश वृक्षों से सरसराती गुजरती हवा में सर्द खुश्की थी।
छावनी तक जाने वाली टेढ़ी-मेढ़ी पहाड़ी सड़क पर जीप चलाते समय भी मेजर वर्मा एकाग्रता-पूर्वक ड्राइविंग करने की कूबत नहीं जुटा पा रहे ये ।तय नहीं कर पा रहे थे कि बात कहाँ से शुरू करें।सोच नहीं पा रहे थे कि जिन हालात में रवि की मृत्यु हुई थी उसकी तफसील मिसेज गोम्स को बताना जरूरी है भी या नहीं । रवि सक्सेना के अभिभावक के रुप में किसी गोम्स की कल्पना तो वे कर ही नहीं सकते थे।

रवि...कैप्टन रवि सक्सेना उनकी गढ़वाल रेजिमेंट की सत्तरवीं ब्रिगेड का शायद सबसे जिन्दादिल जवान था । बेफिक्र, बेलौस...जिंदगी से भरा-भरा दूसरे जवानों के लिए एक आदर्श फौजी! हमेशा मुस्कुराता-खिलखिलाता...! संजीदगी तो जैसे उसे छू भी नहीं गई थी । हर समय अपने घर की बातें, चुटकुले, बीवी के किस्से आदि सुनाता रहता था ।

हर सप्ताह उसके घर, नैनीताल से उसकी बीवी का एक खत जरूर आता था । किसी स्थापित रुटीन की तरह..., बिना नागा! वह उस खत को बारम्बार सबको दिखा-दिखा का चूमता था;... सैकड़ों बार…! शाम को कैन्टीन में वह उस खत को जोर-जोर से पढ़कर यों सबको सुनाता था मानो कोई उम्दा टी.वी. स्क्रिप्ट पढ़ रहा हो । ऐसे पत्र; जिसे कोई व्यक्ति अपने जिगरी दोस्त को भी दिखाना तक पसन्द न करे । फिर बाकी के छह दिन, अगला खत आने तक वह उस खत को यूनिफार्म की उपर वाली जेब में यूँ लिए फिरता था कि चिट्ठी का सिरा जेब से बाहर झांकता रहता या । वह कहता था-“जब तक कोई चक्र इस जेब पर नहीं टंक जाता यारो, ये खत ही तो मोर्चे पर हमारे मेडल्स हैँ ।“
एक दफा नेगी ने उसे टोका था-“चिट्ठी को हिफाजत से कहीं रख दे रवि, वर्ना कहीँ खो न जाय तेरा एक मेडल ।“’

ऐसे कमेंट्स के लिए रवि सक्सेना के पास कहीं से पढ़े हुए दो…तीन रटे-रटाए जुमले हमेशा तैयार रहते थे जिन्हें रवि अपनी जेब से बाहर झाँकती चिट्ठियों वाली हरकत को जस्टिफाई करने के लिए कहा करता…
“यार नेगी, चिट्ठियां तो वह गोंद हैं जो रिश्तों को चिपकाए रखती हैं,सो डोंट टेक दिस लेटर्स लाइट्ली! ये खत तो समय और दूरी की दरियाओं पर बने पुल हैं...समझे ?’
कभी कोई उसे झिड़कता, “क्या सक्सेना! तुम तो अपनी बीवी के प्रेम को भी एक्सपोजर की चीज समझते हो । ऐसे खत छुपाने की चीज हैं या प्रदर्शन की”...?”
“तुम क्या समझो प्यारेलाल...” रवि का उत्तर होता, “जलो मत। सबक लो इस लिफाफे पर चिपके टिकटों से । जब तक लिफाफा मंजिले-मकसूद तक पहुँच नहीं जाता चिपके रहते हैं लिफाफे से,फर्मावरदार बीवी की तरह।“-
टुकड़ों-टुकड़ों में रवि के ये किस्से मेजर वर्मा तक पहुंचते थे।
होम सिकनेस का ला-इलाज़ मरीज रवि सक्सेना । छुट्रिटयों पर घर जाते समय तो बच्चों…सा उत्साहित हो उठता था । बेहद रोमांचित…!पर विदा होते वक्त एकदम संजीदा हो जाता ।

-"फिर लौटना होगा न सर? क्या आप बता सकेंगे सर कि इस होम सिकनेस नामक बीमारी का इलाज कब तक ढूँढ लिया जा सकेगा?" मुस्कुरा देते मेजर वर्मा । कहते, "लौटने के बारे में घर पहुंचकर सोचा जाता है कैप्टन। विश यू ए हैप्पी जर्नी । गो माई सन एण्ड एंजाय योर हॉली-डेज और हाँ सक्सेना, लौटने का दिन मत भूल जाना ।"

...परन्तु इस बार छुट्टियों पर नहीं जा सका था रवि! पन्द्रह दिनों की छुट्टियां ग्रांट हुई थीं उसकी । साथ ही हफ्ते भर की छुट्टी अस्थाना की । पिछले माह ही अपनी शादी कराकर घर से लौटा था अस्थाना ! घर जाने को उतावला था पर छुट्टी पर जाने से पहले ही वह एमरजेंसी आ गई थी । आनन-फानन में हुआ, वह अभियान जिसमें रवि और उस मिशन में सबसे जूनियर अस्थाना...दोनों ही शहीद हो गए थे।

बस दो ही दिन तो गुजरे हैं उस हौलनाक वाकये को । मोर्चा फतह करने के बाद बचे लोगों और अपने दो जवानों के मृत शरीर के साथ वापस बेस-कैंप लौटे थे मेजर वर्मा! अस्थाना बिहार का था । उसकी लाश प्लेन द्वारा पटना भेजी जानी यी । रवि के सामानों की तलाशी ली गई थी ताकि यदि उसके घर का पूरा पता मिल जाय तो फौरन से पेश्तर उसके घर तार भेज दिया जाय । आफिसियल रेकार्ड्स में पता दूँढ़ने की कोशिश बाद की बात थी । नैनीताल कोई दूर तो था नहीं । अविलम्ब सूचित कर पाने की स्थिति में रवि की बीवी या कोई सगेवाला अगले ही दिन आराम से रवि के अन्तिम संस्कार में शामिल हो सकता था । या फिर डेड बॉडी ही क्लेम कर सकता था । वैसे भी रवि की डेड-बॉंडी के नाम पर गोश्त के कुछ लोथड़े, चन्द अस्थियाँ और यूनिफार्म की चिंदियों ही तो बची थीं ।
रवि के व्हेयर-सेक (फौजी झोले) में से एक लिफाफा बरामद हुआ था । जल्दीबाजी में रवि ने पत्र लिख तो डाला था पर उसे पोस्ट नहीं कर पाया था । उस अनभेजे खत पर जो पता था वह मिसेज गोम्स का था । 'एंजल्स होम, नैनीताल' । शायद बीवी के अलावा रवि का कोई और था भी नहीं क्योंकि यदि होता तो रवि कभी न कभी उसका भी जिक्र जरूर करता ।
 
रवि को निकट से जानने वालों ने मिसेज गोम्स के रूप में रवि की पत्नी की ही कल्पना की थी । शायद रवि ने किसी पारसी या क्रिश्चियन युवती से प्रेम-विवाह किया हो । बाज लड़कियां, खासतौर पर नौकरीपेशा, शादी के बाद अपने सरनेम नहीं भी बदलती ।...पर रवि की पत्नी के बदले आई थीं साठ-सत्तर वर्षीया यह महिला…मिसेज गोम्स…!झुर्रियों भरा चेहरा,हिमश्वेत केश,झुकी कमर और लगभग कांपती हुई-सी आवाज...।

सूरज कब का नीली चोटी के पीछे छुप चुका था । आकाश में नारंगी-पीले बादलों की पृष्ठभूमि में ढेर सारे बगुले धारियों में चोटी की ओर उड़े जा रहे थे । पहाड़ों में शाम वैसे भी कुछ जल्दी हो जाती है, ऊपर से हल्का-हल्का कोहरा भी घिरने लगा था। नीचे घाटी में स्थित बस्ती की रौशनियां कोहरे को चीरती टिमटिमाने लगी थीं।

ठंड बढ़ने लगी थी। मिसेज गोम्स के बूढ़े शरीर ने हल्की-सी झुरझुरी ली ।
"आपको सरदी लग रही है मिसेज गोम्स," मेजर वर्मा ने कहा-"यदि बुरा न मानें तो मेरा ओवरकोट कंधे पर डाल लें ।"
-“नहीं, ठीक है।“
-“ठीक नहीं है मिसेज गोम्स !" मेजर वर्मा ने सीट की पुश्त पर पड़ा अपना ओवरकोट मिसेज गोम्स की गोद में डालते हुए कहा, "बस, इस चढ़ाई के बाद हम सीधे लुढ़कते हुए छावनी में होंगे तब तक आप रवि के बारे में कुछ बताइए...इफ यू..!

मेजर वर्मा ने सोचा शायद इससे मिसेज गोम्स के भीतर जमा गुबार कुछ छंट सकेगा । शायद उनकी चेतना से बार-बार हथौड़े की तरह टकराता यह प्रश्न हल हो सकेगा कि आखिर कौन हैँ ये मिसेज गोम्स ।
…-"'पुअर चाइल्ड," मिसेज गोम्स ने गाढ़ी सांस ली, "जब भी च्छुट्टियों में आता तो पैसा पानी की तरह बहाता था । मैं रोकती तो बोलता-मिसेज गोम्स, किसके लिए बचाएगा हम पैसा? अपना और है ही कौन? जो है सो यहीं तो है । ये बच्चा लोग…तुम्हारा होम...और...और मेरी मम्मी !...तुम मिसेज गोम्स...ओह जीसस...!”
रो पड़ीं मिसेज गोम्स! मेजर वर्मा का मन हुआ पूछें..."और रवि की बीवी..."...पर मिसेज गोम्स का कन्धा हिचकियों के आवेग से जोर-जोर से हिलते देखा तो वे बलपूर्वक अपनी इच्छा दबा गए । वृद्धा को एक ही बार में ज्यादा कुरेदना ठीक नहीं । सुबह तक तो सारी बातें स्वयंमेव सामने जा ही जानी हैं । शायद रवि सक्सेना से बहुत प्यार करती थीं मिसेज गोम्स । पता नहीं क्या रिश्ता था दोनों में । उस अभियान की रात बेहद उत्साहित था सक्सेना । शायद इसलिए कि लौटते ही छुट्टियों पर जो जाने वाला था । अपनी बीबी से मिलने !... और इन मिसेज गोम्स से भी..!

किसी धावे से पहले मेजर वर्मा सारी औपचारिकताएँ छोड़ कर जवानों के साथ ही बियर पीते ये । उस रात बेहद खिला-खिला था रवि । हालाँकि मिशन की सफलता के प्रति खुद मेजर वर्मा भी सशंकित थे । फिफ्टी-फिफ्टी के चांसेज थे पर रवि के चेहरे पर शिकन तक नहीं थी । वह हमेशा की तरह ही बेफिक्र था । बेलौस । ठहाके लगाता । उसने कहा था, "घर से हजारों मील दूर...बार्डर पर एक गुमनाम मौत मर जाना किसी फौजी की मंजिल नहीं होती । मौत आए तो ऐसी झूमकर आए कि याद रखें लोग।पूरे इक्कीस तोपों की सलामी के साथ फौजी का जनाजा जरा धूम से निकलना चाहिए! ..डाई विद योर शूज...! लाम पर गुमनामी की मौत एक लानत है ।"

उस रात अस्थाना कुछ ज्यादा ही संजीदा हो रहा था । रवि ने उसे टोका था, "क्या उजबक की तरह मुँह लटकाए बैठा है बे? बीवी की गोद में मरने की उतावली है तो बेटा जल्दी से मोर्चा फतह कर और जाकर गर्क हो जा बीबी के पहलू में।“
"नहीँ सर,-" अस्थाना बोला था…"वह एकदम देहातिन है! गॉव की ज्वाइंट फैमिली मेँ कोल्हू के बैल की तरह जुती रहती हैं सारा दिन और शाम ढले आँखें मूँदकर पड़ जाती है।“ …"'अभी तू बच्चा है मेरे बिहारी पुत्तर-" रवि ने उसके कंधे पर धौल जमाते कहा था,-"उस्तादी लटके सीख । जब कोई औरत आँखें बन्द कर लेटी रहे तो उसे सोया मत समझ लिया कर ।"

हॉल की छत ठहाकों से उड़ने-उड़ने को हो गई थी । नेगी, जोशी, राणे, पुरी और अस्थाना.. .सभी रवि के ठहाकों में बहकर स्थिति की गम्भीरता को बिल्कुल भूल गए थे। एयरबेस से उड़े विमानों की एरियल (हवाई) फोटोग्राफी से बने नक्शे के सहारे मेजर वर्मा ने टीम की आखरी ब्रीफिंग की थी । छिटकी चाँदनी वाली हल्के कोहरे की रात में टीम को पैराशूटों से दुश्मन के इलाके में उतारा गया था…चुपचाप ! यह लालगढ़ सेक्टर का कुख्यात इलाका था । घुसपैठियों का स्वर्ग ! भूतों की तरह सभी "फूलन-पास' के उस दर्रे तक पहुंचे थे जहाँ उनका टारगेट-वह गुफा थी । सूचना पक्की थी कि इसी गुफा में घुसपैठिए टिकते थे । रात होते ही,॰..अवसर पाते ही वे भारतीय सीमा में घुसपैठ करने की कोशिश किया करते ये । संगीनों की छाया मेँ यह एक बेहद ख़तरनाक और गुप्त आपरेशन था । ज़रा-सा खटका होते ही उन्हें दुश्मन के इलाके में घिर जाना था । जवाबी कार्रवाई का मतलब खुले तौर पर युद्ध को निमन्त्रण देना था ।

एक किलोमीटर दूर से ही घुटनों और कुहनी के बल रेंगते हुए वे पाँचों पहाड़ी गुफा की ओर बढ़े थे पर चौकस दुश्मन ने शायद उन्हें भाँप ही लिया था । पता नहीं भीतर कितने लोग थे । गुफा के भीतर से तड़तड़ाती आवाजों के साथ गोलियां छिटकी थीं । अस्थाना से थोड़ी चूक हो गई धी । उसे दो-तीन गोलियां लग गई थीं और उसने रवि की गोद में ही दम तोड़ दिया था । मरते वक्त अस्थाना के होंठों पर बस अपनी नवविवाहिता पत्नी का नाम भर आ सका था।इसके बाद तो रवि जैसे आपे से बाहर हो गया था । बिना कोई आदेश मिले ही वह गले में ग्रेनेडों की माला-सी लटकाए कोहरे में गुम हो गया था । मेजर वर्मा तो सशंकित ही उठे थे कि शायद रवि भी खेत रहा । ऐसे आपरेशन में पीछे मुड़कर देखने या किसी को तलाशने का वक्त ही कहाँ होता है? पर नहीं...रवि सक्सेना तो मानो हाराकिरी ही करना चाहता था... आत्मघात !
अचानक रवि उस गुफा के ऐन मुहाने पर खड़ा दिखा था ।बस क्षण-भर के लिए !स्तब्ध रह गए थे मेजर वर्मा…।यह तो सरासर आत्महत्या थी।कंम्पलीट स्यूसाइड !वे फायरिंग द्वारा रवि को कवर करने की स्थिति में भी नहीं थे । कुहासे में उसे अपनी ओर की ही गोली लग सकती थी । अभी वे कोई फैसला भी नहीं कर पाए थे कि कोहरे की हल्की परतों में से चांद ने झाँका था ।रवि ने झुके-झुके आगे की और दौड़ लगाई थी । कोई दस मीटर दूर बची होगी वह गुफा । उसने दोनों हाथों में थमे ग्रेनेइस की पिन फिल्मी अन्दाज में दाँतों से ही खींच निकाली थी और पूरी ताकत से उन्हें गुफा के दहाने में झोंक दिया था ।अभी ग्रेनेड्स उसके हाथों और गुफा के बीच हवा में ही थे कि गुफा के भीतर से रेट् रेट् रेट्…की आवाजों के साथ गोलियों की बाढ़-सी छूटी थी । अगले ही क्षण भीषण धमाके के साथ हिल उठी थी पूरी पहाड़ी । शायद भीतर रखे ढेरों असलहे थे जिन्होंने आग में घी का काम किया था । भक्क्-से उड़ गई थी पूरी गुफा और जमीन पर गिरने से पहले छलनी-छलनी होता रवि का शरीर भी हवा में कलाबाजियां खाता दिखा था।

..."जीप अब सर्पीली पहाड़ी सड़क से नीचे लुढ़कती हुई छावनी का मुख्य-द्वार क्रॉस कर रही थी । अनुशासन के मामले में हिटलर कहे जाने वाले मेजर वर्मा की आँखों में भी जैसे कोहरा तिर आया । वे बुदबुदा उठे :-"पुअर ब्बाय..." -"'आपने कुछ कहा क्या?" मिसेज गोम्स ने उनकी ओर देखा । 'नहीँ तो;...क्यों?' मेजर वर्मा ने स्वयं को सँभाला ।

जीप गेस्ट हाउस के पोर्टिंको में जा लगी । जीप का इग्निशन ऑफ करते हुए मेजर वर्मा जीप से उतरे -"आइए मिसेज गोम्स ।

मिसेज गोम्स मेजर वर्मा के साथ इमारत के भीतर की और बढ गई। सुबह कैप्टन रवि सक्सेना की अंत्येष्टि पूरे सैनिक सम्मान के साथ होनी थी । सारी तैयारियाँ पूरी करने के बाद लगभग आधी रात को निवृत्त हुए थे मेजर वर्मा । अब अतिथिशाला के एक कमरे में गोल टेबिल के इर्द-गिर्द बैठे ये सभी! मेजर वर्मा, मेजर पुरी, कैप्टन राणे ओर रवि के मित्र नेगी, जोशी और पॉल। मिसेज गोम्स खिड़की के पास वाली आराम-कुर्सी पर अधलेटी -सी थीं । गेस्ट हाउस के उस कमरे में कतरा कतरा मौन टपक रहा था।

"सचमुच उस ऐक्शन की कोई जरूरत नहीं थी-" मेजर वर्मा ने मौन भंग किया, "दुश्मन को तो वेसे ही उस गार में भून दिया जाना था । कब्र तो बननी ही थी उनकी पर रवि सक्सेना तो जैसे डेथ-विश…।“
“..मन की बात कौन जाने सर... " काफी सिप करते नेगी ने मेजर वर्मा की बात को बीच में ही लपक लिया-"शायद नएनए ब्याहे अस्थाना की मौत ने उसे जुनूनी बना दिया हो।शायद अस्थाना की जगह वह स्वयं को देखने लगा हो। किसी की बीवी को अपने सम्मुख विधवा होती देखकर अपनी बीवी की कल्पना ने उसका मानसिक संतुलन हिला डाला हो ।"
व्हाट रबिश...!" कैप्टन राणे ने मुंह बिचकाया।
“पर रवि की तो शादी ही नहीं हुई थी, फिर बीवी का सवाल ही कहां..? –
-“यह आप क्या कह रही हैं मिसेज गोम्स...?"मेजर वर्मा के नेत्र उत्कंठा से उबल पड़े। बाहर पहाड़ों में तेज हवा सीटियां-सी बजाने लगी थी ।
-“ओ…न्नो! याने रवि बैचलर…!" यह कैसे हो सकता है? फिर वे खत ? हर हफ्ते...? बिना नागा...?"-पाल की आँखों से भी हैरत टपकने थी।
सारी गर्दनें मिसेज गोम्स की ओर घूम चुकी थीं । सहज स्वर में कहा गया मिसेज गोम्स का एक वाक्य जैसे बिजली के नंगे तार-सा सबके जेहन से टकराया था । मिसेज गोम्स के झुर्रियों से भरे चेहरे पर करुणा से भीगी विषण्ण मुस्कान उगी! अक्टूबर की क्षीण धूप-सी । मोनालिसा की मुस्कान जैसी रहस्यमयी ।

-"हाँ,"... मिसेज गोम्स बताने लगीं-"कॉलेज के दिनों में उसका किसी लड़की से अफेयर जरुर था पर बात आगे बढ़ ही नहीं सकी! लड़की का फादर अनाथालय में पले बढ़े किसी ऐसे लड़के के साथ अपनी बेटी बाँधने को हर्गिज राजी नहीं था जिसका कि न कोई भूत था न भविष्य । कोई खानदान नहीं । कोई घर नहीं,मजबूत वर्तमान तक नहीं ।सो,...वहीँ फिनिश हो गया था सबकुछ।उस रॉटन लवस्टोरी के तुरन्त बाद ही रवि ने आर्मी ज्वाइन कर ली और फिर शादी-वादी के बारे में कभी दोबारा सिरियसली सोचा ही नहीं...!" नेगी, जोशी, पाल...सभी उपस्थित लोगों के चेहरे आश्चर्य, उत्तेजना और उत्कंठा से लिथड़े हुए थे । याने रवि की वह बेफिक्री;... वह जिंदादिली एक मुखौटा थी? फाल्स मास्क...!

-"फिर वो खत'...मिसेज गोम्स ।" मेजर वर्मा ने विस्मय भरी आवाज में प्रश्न किया ।
…"वो लेटर्स रवि खुद ही लिखता था।“ -मिसेज गोम्स तो मानो कई-कई रहस्य यूँ खोलती जा रही थीं जैसे कोई कुशल जादूगर हैट में से खरगोश निकाल रहा हो…"जब वह छुट्टियों में होम आता, हर रात एक खत लिखता था । ज्वाइनिंग के लिए वापस आते समय मुझे दर्जनों लेटर्स थमाते हुए कहता,...”मम्मी, मैं नहीं चाहता कि आर्मी में लोग मुझे लावारिस समझें। मोर्चे पर हर जवान के घर से पत्र आते हैं तो मुझे एक इंन्फीरियरीटी कांम्प्लेक्स महसूस होता है...फिर कौन लिखेगा लगातार हर हफ्ते मुझे चिट्ठियां ? तुम्हारा साथ काँपता है ना तो मैने तुम्हारी ओर से ये खत खुद अपने नाम लिख डाले हैं । हर हफ्ते इनमें से एक खत चर्च वाले लेटर बाँक्स में डालती जाना । इतनी तकलीफ तो मेरी खातिर जरूर उठा सकती हैं मेरी मम्मी...नो ?”

मिसेज गोम्स की आवाज सुबकियों में डूब गई थी ।
पाल, नेगी और जोशी भी द्रवित हो गए। 'ठक्क्" की आवाज के साथ मेजर वर्मा ने काफी का मग टेबिल पर रख दिया और हाथ जेब में धंसा दिए।जेब से रूमाल निकालने के निर्णय-अनिर्णय के बीच झूलते हुए शायद ढूँढने लगे अपनी कमजोरी छिपाने का कोई ठोस बहाना।वे पूरी शिद्दत के साथ यह महसूस करने लगे थे कि अकेलेपन की एक सीमा के बाद आदमी सचमुच किसी से ढेरों बातें करने को आतुर हो उठता है परन्तु जब कोई सुनने वाला ही न हो तो या तो वह अपनी डायरियों के पन्ने रंगता है या फिर लिखने लगता है रवि की तरह ढेरों खत । शायद खुद को ही...: चंद खतों के लिए इतना बड़ा खेल'…? थोड़े से अपनेपन भरे लम्हों को महसूसने के लिए इतना बड़ा झूठ...? क्या सचमुच खतों की इतनी अहमियत होती है मोर्चे पर...?...हाँ...होती है शायद!शायद हम उस चीज की कीमत कभी आँक नहीं पाते जो हमें सहज उपलब्ध होती है ।
-"रवि ने अपने पीछे कुछ और नहीं छोड़ा सिवाय इस आखरी खत के ?”
-"ऐसा नहीं है मेजर । वह छोड़ गया है मेरे लिए ढेर सारी यादें । ढेर सारा प्यार और अपनापन...! एक शहीद सिपाही की माँ कहलाने का गौरव!यह कितनी बड़ी दौलत है, इसे तुम नहीं समझ सकते; क्योंकि मेजर, तुम मां जो नहीं बन सकते।“
"यस मैम यू आर एब्सोल्यूटली राईट।आयम सॉरी मिसेज गोम्स...!”मेजर वर्मा की आवाज आद्र हो उठी ।
मिसेज गोम्स ने मेजर वर्मा से मिले रवि के उस अन्तिम;अनभेजे खत को खोला। लिखा था,
डियर मम्मी,
जीवन-मौत का खेल खेलने जा रहा हूं।लौटने की उम्मीद बाकियों के लिए पचास पर मेरे लिए सौ-फीसदी । तभी तो तुम्हारे लिए टीकवुड की छड़ी और पशमीने की शॉल खरीद रखी है मैंने।ठंड से बचना।बर्फ में कत्तई बाहर मत निकलना वरना घुटनों का दर्द बढ़ जाएगा । अगले हफ्ते आ रहा दूँ इसलिए खत अब मत डालना । वैसे मुझे पता है कि तुम्हें तुम्हें अच्छा लगता भी नहीं । विद लव,
तुम्हारा मैं ।

मिसेज गोम्स को 'अक्षर धुँधलाते से लगे । कमरे में ब्लेड की धार-सा पैना सन्नाटा तिर आया था । अब मेजर वर्मा के पास यह पूछने हौसला नहीं बचा था कि रवि सक्सेना आखिर 'सक्सेना' ही क्यों था । कोई डिसूजा, कोई राड्रिक्स, कोई मैथ्यूज या फिर कोई 'गोम्स' ही क्यों नहीं...पर किसी की मौत के बाद जब उसके पीछे रोने को कब्र में पॉव लटकाए सिर्फ एक बूढ़ी औरत बच रही हो तो ऐसे सवालों की कोई अहमियत रह भी नहीं जाती! कोई मायने नहीँ रहते । आसमान मटमैला होने लगा था । सुबह होने-होने को थी । सन्नाटे को थोडी देर के लिए भंग करती सुनाई पडी गढ़वाल रेजिमेंट के बिगुल की आवाज...! फिर एकदम खामोशी छा गई । बाहर पहाड़ों में तेज़ हवा फिर सीटियां-सी बजा रही थी।

-राकेश कुमार सिंह

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