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भागादेवी का चायघर


भागा चाय बेच रही है।
उसे नहीं पता कि चाय बेचकर अमेरिका जाया जा सकता है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली आदमी से मिला जा सकता है। रूस, चीन, भूटान, ब्राजील, नेपाल और जापान की यात्राएं की जा सकती हैं। म्यामांर, ऑस्ट्रेलिया, चीन और मॉरीशस का भ्रमण हो सकता है। श्री लंका, फ्रांस, जर्मनी और कनाडा घूमा जा सकता है। उसे नहीं मालूम चाय बनाते-परोसते वह मन की बात भी कर सकती है........जितना चाहे झूठ-सच बोल सकती है।
वह इस बात से अनजान है कि चाय बेच कर अच्छे दिन भी आते हैं।
भागा नहीं जानती कि वह चाय एक बेहद संकटग्रस्त समय में बेच रही है। एक सुन्दर पहाड़ी लड़की का इस बियाबान में चाय के साथ रहना आग के साथ रहना है। समुद्रतल से ग्यारह हजार पांच सौ फुट की ऊंचाई पर चाय बेचना हिमालय को चुनौती देने जैसा है।
भागा इस बात से बेख़बर है कि चाय के गिलास के साथ वह बार-बार बिक रही है। बेची-ख़रीदी जा रही है। उसके मोल-भाव हो रहे हैं। बोलियां लग रही हैं। गुपचुप होती इस ख़रीद-फ़रोख़्त में बाज़ार का हर आदमी शामिल है। नेता-राजनेता, सरकारी, अर्ध सरकारी और कार्पोरेट चेहरे शामिल हैं। युवा और अधेड़ हैं। वरिष्ठ और अति वरिष्ठ हैं। गंवई और शहरी हैं। इतिहासकार और समाजशास्त्री हैं। यात्री और सैलानी हैं। कवि, लेखक और पत्रकार हैं। फिल्मकार और नाटकबाज हैं। कार्टूनिस्ट और चित्रकार हैं।
इन लोगों और सैलानियों से कहीं ज्यादा खतरनाक देश-विदेश की कम्पनियों के कर्मचारियों और अधिकारियों का यहां आकर चाय पीना है। कुछ दिनों से उनकी आवाजाही बढ़ रही है। चाय के साथ वे हर उस चीज को निगलना चाहते हैं जो उनके फायदे में हैं। भागा का चायघर उनका पड़ाव बन गया है। मंजिल तो कहीं और है। उसके रास्ते झील, मंदिर और घने जंगल से होते हुए शिखरों तक पहुंचते हैं।
वे लोग चाय पीते हुए सहज नहीं दिखते। बैठने की मुद्राएं, शारीरिक भंगिमाएं, हावभाव और मनःस्थितियां वहां के अनुकूल नहीं है। उनकी आंखों से अज़ीब सी विकिरणें भीतर आ रही हैं। उन्हें केवल महसूस किया जा सकता है, देखा नहीं जा सकता। बहुत बार वे गुपचुप भीतर चाय बनाती भागा पर आक्रमण कर देती हैं। इस अप्रत्याशित हमले की कोई शक्ल नहीं है। आकार नहीं है। दृश्यरूप और आयतन नहीं है। उसकी आकुलता बढ़ने लगती है। धड़कने तेज होने लगती हैं।
उसे लगने लगता है कि कोई हिम-मानव हवा में समाहित होकर अपने खूंखार पंजे उसकी तरफ बढ़ा रहा है। वह सिहर उठती है। चाय का पतीला भभकती आग पर उल्ट पड़ता है। आग और चाय एक बंवडर में तबदील हो जाती है। भागा को ऐसा भ्रम होता है मानो कोई भयंकर बर्फीला तूफान जंगल को लीलता हुआ चायघर में घुस गया है..........वह अंधी और बहरी हो गई है। भट्टी की लकड़ियां चटकने और तड़कने लगती हैं। धुंए और राख का वह चक्रवात अंदर कुछ पलों के लिए एकछत्र साम्राज्य स्थापित कर देता है। चारों तरफ एक ऐसा रेडिएशन फैल जाता है जिससे उसका शरीर तीखी जकड़न महसूस करता है। उसकी सांसे फूलने लगती है। वह कुछ पल के लिए आंखें बंद कर लेती है। धीरे-धीरे उसे महसूस होता है कि झील के किनारे स्थित मंदिर के गर्भगृह से उठकर बूढ़ी नागिन मां उसमें समा गई है। वह अपने भीतर के तेज और आत्मबल को पुनः अर्जित करके उन विकिरणों को नेस्तनामूद कर देती है। भट्टी की आग पुनः सुलगकर लपटों में बदल जाती है। वह दोबारा चाय बनाने लग जाती।



उसके साथ प्रायः ऐसा होने लगा है। भागा उन विकिरणों से बार-बार दो चार होती रही है। बार-बार लड़ती रही है। यह सकारात्मक से नकारात्मक की लड़ाई है। इस भिड़ंत की कोई आवाज नहीं है। शोर नहीं है। हो-हल्ला नहीं है। एक गहरा सन्नाटा होता है जिसके भीतर सब कुछ तीव्रता से घटता जाता है।
वह सहज होकर बाहर आती है और सभी के आगे से चाय के जूठे गिलास उठाती है। गिलासों में बची चाय की बूंदों में मानो वह रेडिएशन घुलमिल गया है। भीतर जाकर उस जूठन को धोती है। मांजती है। पर वह धुलती कहां है। उंगलियों के पोरों में चिपक जाती है। हाथों में चिपट जाती है। उसी चिपचपाहट के साथ वह जी रही है। चाय बना रही है और बेच रही।
भागा के भीतर भी भट्टी जैसा कुछ जलता-भभकता रहता है। उसकी आंच, उसका ताप, उसकी गर्माहट, उसकी जलन वही महसूस कर सकती है। वह अपने गांव के घर के चूल्हे और चायघर की भट्टी का अंतर समझती है। चूल्हे की आग की मिठास और भट्टी में जलती लकड़ियों का अवदाह दोनों उसके भीतर है। पर जब से वह चाय बेचने लगी है उसके अपने भीतर वह गांव-घर का चूल्हा नहीं है, एक भट्टी सुलगती-धधकती रहती है। उसकी लपटें किसी दूसरे को नहीं दिखती। धुंआ-धुंआर नहीं दिखता। भागा देख सकती है। वे निरन्तर उसकी आंखों में दहकती रहती है। वह इन्हीं जलती आंखों से बाहर की दुनिया देखती है। चाय पीते हुए घुमक्कड़ों को परखती है। कारोबारियों को समझती है। उनके मन-मस्तिष्क में भाप बन कर उतरती है और जान जाती है कि उसमें क्या कितना अच्छा और गलत है। पर उसे कहीं भी कुछ अच्छा नहीं दिखता। सभी के भीतर एक जंगल उग आया है। उसमें अनगिनत गुफाएं मौजूद हैं। उनके दरवाजों पर खुंखार बाघ, चीते और तेंदुए अपने-अपने शिकारों पर झपटने के लिए आतुर बैठे हैं।
उसे पता है बचाव में ही बचाव है। इतनी ऊंचाई पर अस्थायी तौर पर रहना खतरे से खाली नहीं है। यह उसका स्थायी घर नहीं है। गांव का घर नहीं है जहां एक आंगन होता है। आंगन में क्यारियां रहती हैं। साथ एक गौशाला होती है जिसमें गाय, भैंसे, भेड़-बकरियां बंधे रहते हैं। पराल और खजूर की मंजरियों पर बैठे उसके सास-ससुर होते हैं। उछल-कूद करते अपने स्कूल के बस्तों, किताबों और कापियों के साथ बच्चे होते हैं। पलैण पर चरान के लिए कुल्हाड़ी की धार मांजता उसका पति होता है। पखलों की सीमाएं निर्धारित करता आंगन की मुंडेर पर बैठा एक कुत्ता होता है। दाना चुगती गौरैया होती है और उन पर छपटने को आतुर किसी किल्टे या डाल के पीछे छिपी बिल्ली होती है। भागा कहीं भी आ जा सकती है। सभी को उसकी जरूरत है। बाहर-भीतर वही है। हर औरत एक घर की जरूरत होती है। आंगन की जरूरत होती है। चूल्हे को भी एक औरत ही चाहिए होती है जो लकड़ियों के साथ हर पल, हर रोज तिल-तिल जलती रहे। चूल्हे के आंवदों पर रखे पतीलों-डिबड़ियों में रखी दाल की तरह उबलती-खौलती रहे। यह खौल और उबाल ही जैसे उनका जीवन है।
 

 
पहाड़ के जिस दर्रे पर गाड़ियां और बसें रूकती हैं उसकी ऊंचाई समुद्र तल से ग्यारह हजार के करीब है। यहीं से पूर्व की ओर घने पेड़ों और विशाल चट्टानों के बीचोबीच एक सरपीली सी चैड़ी पगडंडी पहले भागा के चायघर पहुंचती है फिर झील तक जाती है। इस विशाल दर्रे की पीठ पर घना जंगल मौजूद है। देवदार और बान है। चीड़ और बुरांश है। डायनासोरों जैसी भयावह चट्टाने हैं। दर्रे के ओर-छोर लम्बी और चैड़ी घाटियां हैं जिनके पांव एक तरफ बहती सतलुज नदी में तो दूसरी तरफ ब्यास नदी में डूबते हैं। नदियां किसी घबराए हुए सांप की तरह नीचे की ओर दौड़ रही है मानो उनके पीछे दुश्मनों की फौजंे अत्याधुनिक हथियारों से लैस आक्रमण के लिए आमादा हों। निजी कम्पनियों के लोगों के साथ कई नेता और अफसर जैसे इन्हें जगह रोक-रोक कर जमींदोज करने के लिए व्याकुल हों। जब वे पकड़ीं जातीं हैं तो खूंखार मशीनें उन्हें पीस-पीस कर ऐसे तड़फाती है कि उनकी भयानक गर्जनाओं से पहाड़ दहल जाते हैं। छोटी-बड़ी परियोजनाओं के भारी-भरकम बोझों से वें थकी-हारी घाटियों के बीच अधमरी सी सोई दिखती हैं। कभी जागती हैं तो उनका आक्रोश आसमान पर होता है। वे अपने प्रतिबन्धों को भारी उफान से तोड़ती चलती हैं  और उनके रास्ते जो भी आए उसे लील लेती हैं । जब वे शांत होती हैं तो दुनिया उन्हीं की आंखों से उजास देखने लगती है। घर, गांव, शहर और महानगरों तक में उसी की चकाचैंध रची-बसी है।
दर्रे से ऊपर की ओर विशालकाय पहाड़ भी कुछ वैसे ही लगते हैं। मानो वे अपने साथ जंगलों, झीलों, जानवरों और पंछियों को किन्हीं खतरनाक हमलों से बचाते हुए बादलों के बीच ले जा रहे हैं। इन्हीं धारों और घाटियों के आर-पार और मध्य असंख्य-अनगिनत छोटे-बड़े गांव और पहाड़ी बाजार बसे हैं। सीढ़ीनुमा खेत हैं। उन्हें एक दूसरे से जोड़ती पगडंडियां हैं। नालों-झरनों से आती-बहती कूहलें हैं। पानी की बांवड़ियां है। गेहूं, मक्की और जौ पिसते घराट हैं।
इन्हीं के बीच से प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत् सड़कें निकल रही हैं । उन पर गैंती, झब्बल और फरुए से काम करते कामगर नहीं हैं। उनके मेट और उप-मेट नहीं हैं। लम्बी-लम्बी गर्दनों वाले डायनासोरों की माफिक आधुनिक मशीनें , बुल्डोजर और पैने दांत वाले आरे हैं  जो पलभर में जंगलों, पेड़ों, खेतों और घासणियों को निगलते और उनकी छातियों को चीरते हुए आगे बढ़ रहे हैं। वे जहां भी अपना मुंह मारते हैं ज़मीन ऐसे उधड़ती है मानो बाघों ने किसी गाय या भैंस के शरीर चीर दिए हों। बीच-बीच में जब डायनामाइटों के धमाके होते हैं तो पहाड़ दहाड़ते-चीखते हुए बिखर जाते हैं। उनके तीव्र धमाकों से जंगल, जानवर और गांव सहम जाते हैं।
 


भागादेवी का चायघर किसी गांव की सड़क पर नहीं है। पहाड़ी बाजार में नहीं है। वह गांव से बहुत दूर एक निर्जन जगह पर है। शांत और एकांत में है। वीरान और बीहड़ में है। वह विशाल चट्टानों से सनी एक पहाड़ी की ओट में निर्मित है। उसे अनगढ़े पत्थरों से चिना गया है। उसका कोई आकार नहीं है। रंग-रूप नहीं है। वह नाप-नपाव से भी नहीं बना है। दो कमरे हैं। छतों पर देवदार और बान की टहनियों की घनी परते हैं। पहाड़ी घर जैसी ढलवां छत मोटे-लम्बे पत्थरों से छवाई गई है। भीतर रसोई है जहां भागा भट्टी जलाती है। सामान रखती है। पीछे की ओर छोटा सा दरवाजा है जिससे पहाड़ी के भीतर बनी एक गुफा में घुसा जा सकता है। गुफा काफी खुली है। इसी दरवाजे से उसमें प्रकाश जाता है। हवा प्रवेश करती है। भागा और उसके बच्चे आते-जाते हैं। यह उनका अपना निवास है। सुरक्षित पनाह है। जब भागा को गांव नहीं जाना होता है तो वह बच्चों के साथ वहीं रह लेती है।
भट्टी के साथ एक खिड़कीनुमा जगह है जिससे भागा बाहर देख सकती है। आने-जाने वालों पर नजर बनाए रखती है। वहीं से चाय के ऑर्डर लेती है। मौसम अच्छा हो तो लोग बाहर बैठना ज्यादा पसंद करते हैं। चायघर के इस आंगन में सात प्लास्टिक की मेजें हैं। सभी के साथ दो-दो कुर्सियां है। आंगन को पत्थर की दीवार से ओटा गया है। दो फुट की इस दीवार पर कई जगह बोरियां और मक्की के पत्तों के बने पटड़े रखे हैं। उन पर भी लोग आराम कर सकते हैं। बैठ कर चाय पी सकते हैं। बीड़ी-सिगरेट फूंक सकते हैं। चोरी-छिपे सुल्फा-भांग के सुट्टे मार सकते हैं। जर्दा दांतों और ओंठो के बीच ठूंस सकते हैं। कोकाकोला और पैप्सी के बीच छुपाई शराब पी सकते हैं।
मौसम खराब हो तो बाहर से मेजें और कुर्सियां भीतर रख दिए जाते हैं। इस घर में सामने और दोनों तरफ तीन हिदायती कागज के बोर्ड लगे हैं जिन्हें कापियों के गत्तों पर चिपका रखा है। जरूर यह काम बच्चों का किया लगता है। एक में लिखा है---‘खाने की चिजों के लिफाफे और बचा हुआ कचरा दस्तबिन में डालें।‘ यहां चीजों शब्द के ‘च‘ में छोटी ‘इ‘ की मात्रा पड़ गई है। दस्तबिन में ‘ड‘ तथा ‘ट‘ की जगह ‘द‘ और ‘त‘ लिख दिया है।
डस्टबिन पत्थरों से चिन कर बनाई गई है जो पानी के छोटे टैंक जैसी दिखती है। भीतर से वह धुंए की वजह से काली हो गई है। देर शाम इसमें एकत्र हुए कचरे को भागा जला दिया करती है। दूसरे पर लिखा है---‘बीड़ी-सिगरट के टोटे टर्रे में डालें।‘ इसमें एशट्रे की जगह टर्रे हो गया है। तीसरी हिदायत दारुबाजों के लिए हैं----‘करपेया शराब न पीएं और प्लास्टक की खाली बोतलें कूड़दनी में ही डालें।‘ इधर कृपया की जगह ‘करपेया‘ और कूड़ादानी के स्थान पर ‘कूड़दनी‘ लिख दिया है। प्रवेश द्वार पर जो बोर्ड चिपका है उसे काले, लाल और हरे स्कैचपैनों से गत्ते पर सफेद कागज चिपका कर लिखा गया है---चायघर। इसके साथ चाय का रेट लिखा है----चय दस रूपए। यहां चाय से ‘आ‘ की मात्रा गुम हो गई है।
इन हिदायतों के बावजूद लोग अपनी मर्जी के मालिक है। प्लास्टिक की मेजों पर जगह-जगह सिगरेट-बीड़ी बुझाने के निशान हैं। हालांकि दो-तीन टूटी हुई प्लेटें हैं जो राखदानियों का धर्म निभाती हैं। पर लोग अपना धर्म नहीं निभाते। वे जहां-तहां अधजले टुकड़े ठूंस देते हैं। कई बार वे अधजली बीड़ी या सिगरेटों को नीचे फेंक देते हैं जिससे धुंआ निकलता रहता है। चीजों को खा-पीकर जहां-तहां फैंक देते हैं। भागा उन पढ़े-लिखों की आदतों से खूब कुढ़ती है। खीजती है और भीतर से हिदायतें देती जाती है। कई लोग अपनी गलती सुधार लेते हैं पर अधिकतर गौर नहीं फरमाते। वह कई बार हैरान होती है कि विदेशी पर्यटक जो केवल घूमने की गर्ज से यहां आते हैं वे कभी ऐसा नहीं करते। खाली लिफाफों और बोतलों को कूड़ादान में डालते हैं। सिगरेट को खूब बुझाकर राखदानी में फैंकते हैं। चाय के पैसों का भुगतान करते हुए उनके चेहरों पर विनम्रता होती है। भागा को आश्चर्य होता है कि उसके अपने घर-गांव और देश के संस्कार बाहर कैसे चले गए हैं। अदब और तमीज सीमाएं क्यों लांघ गए हैं।
इस चायघर के लिए जो दरवाजा है वह मेहनत से बना है। जरूर किसी जानकार अनुभवी मिस्त्री ने बनाया होगा। इसमें रंद-रंदाई का कोई काम नहीं है केवल बान और चीड़ की मोटी टहनियों को काट कर एक दूसरे से जोड़ा गया है। यह इतना पक्का और मजबूत है कि दस जवान भी यदि तोड़ना चाहे तो नामुमकिन है। इस दरवाजे के पीछे कई चीजें लटकी रहती हैं।
बाहर बैठे लोग कनखियों से भागा के रूप-रंग और पहनावे को झांकते नहीं थकते। उनकी निगाहें चाय पर कम भागा पर ज्यादा जमी रहती है। उसके चेहरे पर हमेशा एक गंवई ठाठपन बसा रहता है। सिर पर हमेशा रंगदार धाठू बांधती है और अपने लम्बे बालों को रंगीन पुरांदू में गूंथकर रखती है। माथे पर सिंदूर का टीका होता है जो शाम तक चाय के भाप से उसकी भौंहों और नाक तक फैल जाता है। कानों में चांदी के लम्बे कांटे झूलते उसके गालों को सहलाते रहते हैं। बांए नथूने में सोने की बारीक बाली है। वह हमेशा बंद गले का लम्बा कुर्ता पहनती है जिस पर कई कंठिंया लटकी रहती हैं। उंगलियों में चांदी की दो अंगुठियां पहनी है जिनमें हरे और लाल रंग के नग जड़े हैं। कलाईयां लाल कांच की चूड़ियों से भरी हैं जो बराबर खनकती रहती है। उसका मधुर संगीत चायघर से निकल कर बाहर बिखरा रहता है। कुर्ते पर भूरी-सफेद ऊन की सदरी खूब जची रहती है। इसकी जेबें भागा की तिजोरियां हैं जिनमें चाय के पैसे ठूंसे रहते हैं।
भागादेवी के अपने कई चेहरे हैं, जिन्हें बाहर से देखना नामुमकिन है। वह कभी देवदारूओं की तरह आसमान की ऊंचाईयों पर होती है। तो कभी हिमालय की चोटियों की तरह अडिग और बर्फ की तरह कठोर और कोमल। कभी बुरांश के फूलों की तरह रम्य, खूबसूरत और सुगन्धित तो कभी बाघ की तरह खुंखार और बलिष्ठ। कौओं की तरह चालाक और तीव्र। आभी की तरह निश्चल, फुर्तीली और समर्पित।
भागा ने इन पेड़ों, जंगलों, जानवरों और पंछियों की तरह अनेक मौसम देखे हैं। परखे हैं। ओढ़े-बिछाए हैं। वह भारी बर्फबारी में उसे चीर कर चलना जानती है। आंधी-तूफान से लड़ना जानती है। उसकी निगाहें मौसमों के बदलते तेवरों पर हमेशा रहती है। ये निगाहें चाय बनाते हुए हर शख़्स के हाव-भाव की पहचान करती रही है। वह हवा से आगे सोच लेती है। पहाड़ों से ऊंचा देख लेती है। झील से ज्यादा गहरे डूब लेती है। पगडंडियों से कहीं लम्बा चल लेती है।
 


चायघर के कुछ आगे पेड़ों के मध्य विशाल झील है। उसके किनारे बूढ़ी नागिन का मंदिर है। झील और बूढ़ी नागिन का रिश्ता सदियों पुराना है। पहाड़ी शैली में बने इस मंदिर की ढलवां छतें स्लेट से छवाई गई हैं। गर्भगृह के भीतर बूढ़ी नागिन मां की पत्थर की प्रतिमा स्थापित है। वह नौ नागों की मां मानी जाती है। बाहर चारों तरफ खुला बरामदा है। इस स्थल का सौन्दर्य देखते ही बनता है। झील की अलौकिकता अचम्भित कर देती है। आर-पार की ऊंची पहाड़ियों पर कतारों में बान के वृक्ष ऐसे लगते हैं मानों गांव की औरतें झुण्डों में बैठी लोेकगीत गा रही हों। इसी झील के अद्भुत और दैविक आकर्षण की वजह से वर्ष भर हजारों सैलानी यहां आते-जाते हैं। प्रकृति को दुल्हन के रूप में प श्रृंगारित यहां देखा जा सकता है। चारों ओर दूर-दूर तक फैली पहाड़ियां हरे वनों से सजी-धजी रहती हैं। बर्फ से ढके इनके शिखरों का अप्रतिम बांकपन सभी को अपनी ओर खींचे रखता है।
भागा एक और जिम्मेदारी निभा रही है। भागा सुबह-शाम चायघर से लेकर झील और मंदिर तक फैला कचरा साफ कर लेती है। यह प्राकृतिक नहीं है मानवनिर्मित है। वे जहां बैठते-खाते हैं, वहीं खाली बोतलें और लिफाफे फेंक देते हैं। प्रकृति उनके लिए विशाल मंच हैं। जहां वे उसके अभिभूत कर देने वाले सौन्दर्य का मंचन देखते हैं, पैसे चुकाते हैं और घर लौट जाते हैं। पहाड़, नदी, झरने, झीलें, जंगल, वहां के आदमी और जानवर उनके लिए उस मंच के किरदार भर हैं।
भागा अक्सर सोचती है कि अब झील में पड़े तिनके और पत्ते उठाने आभी नाम की चिड़िया बहुत कम आने लगी हैं। उनकी बिरादरी बहुत कम हो गई है। उनकी संख्या घटती जा रही है। भट्टी जलाते ही वह एक बत्ती धूप, जल का लोटा और एक-आध जंगली फूल अपने साथ ले जाकर उसके दरवाजे पूजा करने चली जाती है। घी के चढ़ावे से लथपथ बूढ़ी नागिन जड़ हो गई है। भागा को इस तरह मां की मूर्ति पर घी डालना अच्छा नहीं लगता है। वहां इतनी सर्दी होती है कि घी डालते ही जमने लगता है। मां का सिर, माथा, आंखें, नाक, मुंह, कान और पूरा शरीर घी की जमाहट से ओतप्रोत है। मानो वह पत्थर की आदमकद प्रतिमा नहीं, घी से सना कोई बुत हो।
बूढ़ी नागिन के लिए घी की पूजा लगती है। सर्दियां शुरू होने से पहले एक निर्धारित दिवस पर गांव के सारे लोग एकत्रित होते हैं और सभी घरों का घी इकट्ठा कर लिया जाता है। फिर मुख्य पूजारी अपने कारदारों के साथ बूढ़ी नागिन मां को घी से नहलाता है। पिघले घी की धार भीतर से मंदिर की सीढ़ियों से उतरती हुई झील के जल में समाहित हो जाती है। इसके बाद झील की परिक्रमा की जाती है और एक बर्तन से घी की धार बना कर किनारे-किनारे डाली जाती है। यह परिक्रमा कई बार दोहराई जाती है और ध्यान रखा जाता है कि घी की धार न टूट पाए। ये रस्में गांव की सुख समृद्धि के लिए हैं। बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए है। साल फसल के लिए हैं। हारी-बीमारी के परित्राण के लिए हैं और विशेषकर प्रकृति को प्रकृति की तरह रखे रहने के लिए हैं।


विशेषकर भागा आभियों के बचे हुए जीवन के लिए गुहारती रहती हैं। झील के सौन्दर्य को बरकरार रखे रहने की लिए विनती करती है। भागा जानती है कि झील का निर्मल और सुन्दर रहना चाय बनाने और पिलाते रहने के लिए जरूरी है। जंगलों का बचे रहना जरूरी है। बुरांश का खिले रहना जरूरी है। मोरों का नाचना जरूरी है। बर्फ का गिरना जरूरी है। देवदारूओं का जिंदा रहना जरूरी है। कितनी सारी जरूरते हैं जिन्हें भागा बचाए रखना चाहती है। ये बचाव आज के क्रूर और हत्यारे होते समय से है। न्यायहीन और कुप्रबंध व्यवस्था से हैं। धृष्ट, निर्लज्ज, बेलिहाज और बेसलीका तथाकथित यात्री-मनुष्यों से हैं। इसीलिए वह जंगल का वैभव, साम्राज्य, विराटता और सर्वोच्चता बरकरार रखना चाहती है। मोरों की कूहकें, मोनालों, जुजुराणा, तितरों और दूसरे पंछियों द्वारा गाए जाने वाले भ्याग और सांझ के गीत सुरक्षित रखना चाहती है। बाघों, भालुओं और चीतों के आक्रमण, युद्ध, पैंतरे और उनके भय को महफ़ूज रखना चाहती है। भागा जानती है इन सभी का बचे रहना उसका अपना बचना है। मानवता का बचना है। गांव, देश और दुनिया का बचे रहना है।
झील भागा पर भरोसा करने लगी है। उसके लिए वह आभी चिड़िया हो गई है। बूढ़ी नागिन का उस पर भरोसा बढ़ा है। जंगल उस पर एतबार करने लगा है। जानवरों का यकीन भागा पर है। बान, बुरांश, चीड़ और देवदारूओं की विश्वसनीयता उस पर है। मोर, कोयल, मोनाल और जुजुराणा उसके सहारे-सहारे खाना चूग लेते हैं। जंगली माओं के कई बच्चे उसके चायघर के पीछे की झाड़ियों और चट्टानों के बीच खेल-कूद लेते हैं। कितनी बार ऐसा हुआ है कि भागा ने भारी बर्फबारी या दूसरे कारणों से जंगली माओं से बिछुड़े बच्चों को अपने चायघर में पनाह दी है। उनके नन्हों को अपने दोनों बच्चों के साथ दूध-रोटी खिलाई है। अपने दुधुओं से दूध पिलाया है। उन्हें अपने बच्चों की तरह पाला है।
भागा का बचपन इसी झील और जंगल के बीच बढ़ा-पला है। वह जब अपने पिता के साथ भेड़-बकरियों के रेवड़ के साथ यहां आती थीं तो बूढ़ी नागिन के मंदिर की सीढ़ियां और आंगन उसका खेलघर होता था। वह दिन भर छोटे-छोटे मेमनों के साथ यहां खेला करतीं। तभी वह देखती कि जैसे ही कोई बान का पत्ता या घास का तिनका झील में गिरता तो अचानक एक छोटी सी चिड़िया कहीं से प्रकट होती और उसे उठा कर ले जाती। पिता ने बताया था कि इस चिड़िया का नाम आभी है। भागा उसे आभी-आभी करके दिन भर पुकारती रहती थीं। फिर वें एक से दो और दो से चार हो जातीं। कुछ अपने नन्हें-नन्हें बच्चों के साथ भी आती जो शायद उन्हें झील से पत्ते और तिनके उठाना सिखाया करतीं। उन्हें अपना काम सिखाती ताकि बड़े होकर वे अपनी ज़िम्मेदारियां निभा सकें। यह सिलसिला दिन भर चलता। लेकिन समय के साथ-साथ जैसे यहां लोगों की आवाजाही बढ़ी, आभियांे ने अपने काम का समय बदल लिया। वे उस समय पत्तों को उठाने आती जब शाम ढलने लगतीं। उन्हें पता होता कि अब वहां कोई नहीं आएगा।
भागा अपने बचपन में लौटने लगती है। आठवीं में थीं जब उसकी शादी बालेेराम से हुई थी। वह नौवीं कक्षा में पढ़ता था। शादी के बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी थी। भागा चाहती थी कि वह स्वयं आगे पढ़े। दसवीं के बाद काॅलेज जाए लेकिन उसके पिता ने उसकी शादी करके अपने घर और सिर का बोझ उतार दिया था। पढ़ाई छूट गई और एक पारिवारिक जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ा। उसके दो बच्चे हुए। एक बेटी और एक बेटा। बेटी तीसरी में पढ़ रही है और बेटा आठवीं में हो गया है।
बालेराम पहले गांव-परगने में मेहनत-मजदूरी करता रहता था। सड़क और जंगलायत में घ्याड़ी लगाता था। कुछ दिनों के बाद वह लकड़ी के चरानियों के साथ रहने लगा था। उसे हथ-आरा खींचने और कुल्हाड़ी चलाने का अच्छा अभ्यास हो गया था। वह इस काम में पारंगत हो गया था। पेड़ काटने में उसका कोई सानी नहीं था। दूर-दूर से लोग उसे इस काम के लिए ले जाते थे। उसी के गांव के तीन और लड़के थे जो इस काम में उसके साथ रहने लगे थे। इसी वजह से जंगलायत के ठेकेदार उसे सूखे पेड़ों की कटाई और चिराई का काम देने लगे थे। बर्फबारी के कारण जो पेड़ गिरते उनकी कटाई-चिराई भी अब उसी के ज़िम्मे थी। पहले बालेराम ईमानदारी से अपना काम करता था। लेकिन धीरे-धीरे उसे आभास होने लगा था कि जंगलायत महकमें के कई कर्मचारी और अधिकारी ठेकेदारों के साथ मिलकर जंगलों और जानवरों को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं। बालेराम देखता कि सूखे और गिरे हुए पेड़ों के साथ न जाने कितने जिंदा देवदारू और बान कट रहे हैं जिन्हें चोरी-छिपे भारी दामों पर बेचा जाता है। उन सभी को सूखे या गिरे-उखड़े हुए दर्शाया जाता। अपनी जुबान बंद रखने के लिए बालेराम को शराब, मीट और कुछ पैसे मिल जाते थे। उसे अब इन सभी की आदत पड़ने लगी थी।
इन्हीं धंधो को पनाह देने के लिए झील के साथ बालेराम को जंगलायत विभाग ने चाय का काम शुरू करने के लिए एक जगह दे दी थी। अब वह उनके भरोसे का आदमी बन गया था। वहां दिखावे के लिए चाय बनती और बेची जातीं पर रात को अवैध रूप से कटे पेड़ों की लकड़ियां रखी जाती और कई जानवरों को मार कर उनकी खालें निकाली जातीं। उनके मोल-भाव वहीं तय होते। बालेराम को शराब और भांग का खूब चस्का लग गया था जिसकी वजह से वह घर भी बहुत कम आता। भागा बहुत परेशान रहने लगी थी। परिवार में उसके बूढ़े सास-ससुर थे। दो बच्चे थे। उनकी पढ़ाई का खर्चा था। पशु थे। भेड़ बकरियां थीं। कुछ ही दिनों में बहुत सी बकरियां बिक गईं जिससे घर और पढ़ाई का खर्चा चलता रहा। वह अपने पति को बहुत समझाती पर उस पर कोई असर न होता। वह जब भी घर आता शराब पीकर आता। उसके साथ हमेशा दो-तीन लोग होते। भागा के लिए अपने सास-ससुर का खूब सहारा था और उनके लिए भागा का। वे अपने बेटे से बहुत परेशान हो गए थे। पर भागा ने कभी उन्हें बेटे की कमी महसूस नहीं होने दी। वे भेड़ बकरियां और पशु चरा लेते। खेतों में काम कर लेते। अब भागा ही उनका भी सहारा थी।
एक दिन पेड़ की कटाई करते-करते उसके पति का पैर कट गया। इस कारण वह तकरीबन छः महीने तक काम पर नहीं जा सका। उसने भागा को मजबूर कर दिया कि वह चाय बेचने का काम करें। वह जानता था कि उसे एक अच्छी जगह जंगलायत ने दी है जिससे चार पैसे मिलते रहेंगे। मन ही मन एक घबराहट भी थी कि भागा के होते हुए दूसरे धन्धें वहां कैसे चलेंगे। भागा ने न चाहते हुए भी हामी भर ली। जब वह वहां गई तो भीतर का नजारा देख कर दंग रह गई। जगह-जगह शराब की खाली बोतलें बिखरी थीं। बीड़ी-सिगरेट के बुझे हुए टुकड़ों के ढेर लगे थे। नमकीन के अनगिनत खाली लिफाफे जहां तहां पड़े थे। और जब उसने ढारे के पीछे मोरों और मोनाल के पंख और उनके कटे पैर देखे तो वह भौंचक्क रह गई। उसकी समझ में आने लगा था कि यहां चाय कम और गै़रकानूनी धन्धे ज्यादा होते हैं।
उसने जैसे-कैसे इस ढारे की सफाई की और गांव के मजदूरों की सहायता से इसकी मुरम्मत कर उसे एक सुन्दर चायघर में तबदील कर दिया। जंगलायत के लोगों ने जब देखा कि अब वहां पहले जैसे अवैध काम न हो सकेंगे तो उन्होंने भागा को तंग करना शुरू कर दिया। उनकी कोशिश थी कि इस जगह को किसी दूसरे ऐसे आदमी को दे दिया जाए जो बालेराम की तरह उनके ग़लत कामों में श़रीक रहे। लेकिन भागा ने दबंगता से उनका सामना किया। उसका साथ उसकी पंचायत की प्रधान सुमिता ने दिया जो महिला आरक्षण की वजह से प्रधान चुनी गई थी। सुमिता उसके साथ ही पढ़ती थी। उसने उसे सारी बात बताई थी। सुमिता ने बालेराम की बीमारी का सहारा लेकर जंगलात महकमें के बड़े अधिकारियों से मिलकर वह जगह भागा के नाम करवा दी थी। भागा ने अब मन लगाकर काम शुरू कर दिया था।
वह घर का कामकाज निपटा कर रोज दस बजे वहां पहुंच जाती। दिन भर चाय बेचती और शाम ढलते घर आ जाती। उसका गांव लगभग पांच किलोमीटर दूर नीचे नदी के पास था। रोज दस किलोमीटर का आना-जाना। सुबह शाम घर का ढेरों काम। चायघर को आते हुए पीठ पर कई किलो बोझा। वह हिम्मत से डटी रही थी। अब बच्चे स्कूल के बाद भागा के पास ही आ जाते और वहीं पढ़ते रहते। भागा के लिए उनका बड़ा सहारा हो गया था।

तकरीबन एक साल बाद भागा का पति बालेराम चायघर तक आने लगा था। वह एक टांग से लंगड़ा हो गया था। इस कारण उसका बोझ भी भागा पर ही था। उसकी आदतें अभी भी नहीं सुधरी थीं। वह किसी न किसी से दारू-भांग मंगवा लेता और नशे में धुत्त रहता। एक-दो बार पुराने साथियों के साथ उसने चायघर में शराब पीने का प्रयास भी किया लेकिन भागा ने सख़्त मना कर दी थी कि इस तरह के काम वह बर्दाश़त नहीं करेगी। इसके बाद भी जंगलायत महकमें के कारकुन बालेराम के द्वारा भागा को मनाने के चक्कर में रहते कि पहले की तरह चायघर में उनके धंधे जमे रहे लेकिन वे कभी भी सफल नहीं हो पाए थे।
कुछ दिनों से भागा के पति के साथ कई मोबाइल कम्पनियों के कर्मचारी और अधिकारी भी आने लगे थे। भागा उस समय बहुत घबरा जाती जब वह बाहर बैठे इन अज्ञात और अनपेक्षित लोगों के मध्य अपने पति को बैठे देखती है। वे इस प्रयास में थे कि उनका नेटवर्क पहाड़ों के दूर-दराज इलाकों तक पहुंचे। हर घर और हर हाथ में उनके मोबाइल हों। वे काफी देर भागा के चायघर के बाहर बैठे रहते और चाय पीते रहते। वहीं बैठकर अपनी दूरबीनों और कुछ दूसरे यन्त्रों से जंगल के ऊपर शिखरों को निहारते और अपनी डायरियों में कुछ नोट करते जाते। उनका आना-जाना बढ़ने लगा था। उनके पास बड़े बड़े कैमरे होते जिनसे वो दिन भर जंगलों के बीच जाकर जानवरों, पक्षियों और पेड़ों के चित्र खींचते और उनकी फिल्में बनाते। ऊंची धारों पर जाकर इधर-उधर का ज़ायज़ा लेते रहते।
उन कम्पनियों के लोगों के साथ अब आसपास और उसी के गांव के कुछ बेरोजगार युवा भी होते जो उनके पिट्ठू, दूरबीने और कैमरे उठाए रखते। वे भागा के चायघर के बाहर प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठते। सिगरिटें फूंकते रहते और बार-बार जेबों से डिब्बियां निकाल कर उसमें ठूंसा तम्बाकू हथेलियों पर झाड़ते और मुंह में ठूंसते जाते। कुछ देर बाद उनकी आंखें किसी अजीब से सुरूर में ऊंघने लगतीं। बावजूद उसके उनमें खुमार चढ़ा होता, उन्माद भरा होता। संदेह और जनून की लाल परतें बिछी होतीं।
कुछ दिनों में ही भागा के चायघर के साथ बड़े-बड़े खम्बे और छतरियां जमा होने लगी थीं। वहां से वें पहाड़ी के शिखर पर पहुंचती रही और बहुत कम समय में वहां विशाल टावर खड़े हो गए जिनमें अनगिनत उल्टी छतरियां टंगी दिखने लगी।

भागा झील के उस पार बुरांश फूलने पर सप्ताह में एक आध बार चली जाती है। उसकी पीठ में किल्टा होता है। दराट साथ रखना वह कभी नहीं भूलती। बुरांश के फूल तोड़ती वह बहुत ऊपर चली जाती है। उसे बुरांश का जूस बनाना अच्छा लगता है। वह कई बोतलें अपने इस्तेमाल के लिए बनाए रखती है। भागा देखती है कि टावरों तक चैड़ा रास्ता बन गया है। वह पगडंडी नहीं रही है जो गांव के पैरों लगी होती थीं। उसे कम्पनी वालों ने बाजारी पैरों से रौंद दिया है। वे उसी पर चलकर पहाड़ों के शिखरों तक आते-जाते हैं। उनके साथ उसका पति भी लंगड़ाता चलता रहता है। वह गांव-पहाड़ के लोगों के पेरों को जानती है। उनकी मीठी आहटों को पहचानती है। पगडंडियां और जंगल भी जानते हैं।
इन पैरों की आहटों से पंछी नहीं डरते। मोर अपनी मोरनियों के साथ बिन बादल नाचने लगते हैं। कोयलें कूहकने लग जाती हैं। बंदर और गुरिल्ले पेड़-दर-पेड़ उछल-कूद मचाने लगते हैं। हिरणों के झुण्ड बीहड़ों से चरांदो में चरने लगते हैं। वे ऐसे शोर मचा रहे होते हैं मानो इंडिया-पाकिस्तान का क्रिकट मैच चल रहा हो। वे इन पैरों की विनम्रता जानते हैं। भद्रता और कृतज्ञता समझते हैं। वे इनके अपनत्व की आहटों से वाकिफ़ हैं। वे जंगल को क्रूरता से इस्तेमाल नहीं करते। कोई स्वार्थ या व्यापार उसमें निहित नहीं होता। महज छोटी-छोटी जरूरतें पूरी करते हैं। बुरांश के फूल तोड़ लेते हैं। काफल चुग लेते हैं। दो जून रोटी पकाने के लिए चूल्हाभर लकड़ियां निकाल लेते हैं। अपनी गाय-भैंसो के लिए पत्तियां सहेज लेते हैं। घास काट लेते हैं और चरांदों में भेड़-बकरियां और पशु चुगा लेते हैं। दाल-रोटी चलाने के लिए गुच्छियां तलाश लेते हैं। अपनी खच्चरों के साथ पहाड़ी के उस पार आवाजाही कर लेते हैं। औरतें पगडंडियों के किसी कोने में घास की गड्डियां सिर से उतार कर पल दो पल किसी पेड़ की छांव में बैठ कर सुस्ता लेती है। अपने दुख-सुख लगा लेती हैं। गंगी-झूरी गा लेती है। बीड़ियां पी लेती हैं।
पर कम्पनी के लोगों के पांव जब से यहां दौड़ने लगे हैं पगडंडियां भयाकुल रहने लगी हंै। देवदारों की व्याकुलता बढ़ी है। बान और बुरांश आतंक में रहते हैं। उनकी टोह में रहते-बसते जानवर और पंछी खौफ़जदा हो गए हैं। भागा को आश्चर्य होता है कि उसके अपने गांव, पंचायत, परगने और जिले-राज्य तक के अधिकारी जब इन बाहरी लोगों के साथ होते हैं तो उनके पांव भी उन जैसे हो जाते हैं। उनके बूटों की थपथपाहट से झील थरथराने लगती है। बूढ़ी नागिन मां सहमी मंदिर के गर्भगृह में निश्वास दुबक जाती है। आभियां कहीं नहीं होती। बाघिने अपने बच्चों को समेटे चट्टानों के मध्य बनी गुफाओं में हो लेती है। सांभर, हिरण और घोरल का कहीं अता-पता नहीं होता। यानि जैसे जंगल पर कोई भयावह आक्रमण हो गया हो।
भागा उन पैरों से ज्यादा पहाड़ियों के शिखरों पर गगनचुंबी टावरों से डरने लगी है। कम्पनियों के ये टावर दूर-दूर से दिखते हैं। वे अपने-अपने नेटवर्क को दुरूस्त और संचालित करने में लगे हुए हैं। भागा का मोबाइल भी इसी से चलता है। पर जब से ये टावर लगे हैं भागा चिड़चिड़ी सी हो गई है। उसके सिर में बिन वजह दर्द रहने लगा है। चाय बनाते और बाहर आते-जाते जब उसकी नजर उन छतरियों से टकराती है तो पूरे बदन में एक सिहरन सी दौड़ने लगती है। सिर से कानों के ऊपर से नीचे उतरता सरकता जैसे कोई कीड़ा हो। इन छतरियों को देखकर उसे कुछ ऐसा ही महसूस होता है जैसे चाय पीते हुए लोगों की उपस्थिति में होता रहा है। कोई अदृश्य प्रहार और अदृश्य विकिरणें जैसे उस पर आक्रमण करने को आतुर हो।
 


कम्पनी के लोग भागादेवी की चाय से प्रसन्न है। इस निर्जन में उसके चायघर से खुश हैं। उसके अप्रतिम पहाड़ी सौन्दर्य से अविभूत है। उसके हाव-भाव, उसकी कामकाज़ में स्फूर्ति उन्हें प्रभावित कर रही है। झील और वहां का अद्भुत सौन्दर्य जैसे भागा में सिमट कर रह गया है। कम्पनी के लोग जानते हैं कि यह ऐसा पर्यटन स्थल बन कर उभर रहा है जहां हजारों-लाखों देशी-विदेशी सैलानी आ रहे हैं। वे भागा में अपने फायदे देख रहे हैं। लाभ देख रहे हैं। क्रेडिट और डेबिट देख रहे हैं। बाज़ार देख रहे हैं। अपने-अपने प्रोडक्ट के प्रचार-प्रसार की अपार संभावनाएं भागा में तलाश रहे हैं।
वे सीधे भागा से बात करना नहीं चाहते। उनकी हिम्मत भी नहीं होती। वे भागा के तेवरों से वाक़िफ हैं । उसकी दबंगता से परिचित हैं। पर उनके पास अनेकों तरीकें हैं। उन्हें अपना सामान बेचना है। नेटवर्क बेचना है। वे किसी भी कीमत पर भागा का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करना चाहते हैं। उसके लिए वे उसके पति को चुनते हैं। उसके द्वारा वे भागा तक पहुंच सकते हैं। अपने उत्पाद को प्रचारित कर सकते हैं।
इससे पहले कम्पनियों में आपसी डील जरूरी है। क्योंकि धारों पर जो टावर लगे हैं वे बहुत सी कम्पनियों के नेटवर्क को संचालित करते हैं। कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता। वे अपने मोबाइलों को हर घर में पहुंचाना चाहते हैं। हर हाथ में देना चाहते हैं। उनके पास तरह-तरह के पैकेज हैं। भागा के लिए भी एक बड़े पैकेज की आॅफर उन्होंने तैयार कर ली है। कई दिनों से कम्पनियों के एग्जेक्यूटिवस आपस में भिड़ रहे हैं। उसमें जी, ए, बी, एम, वो और आर कम्पनियां शामिल हंै। सभी प्राइम लोकेशन के लिए लड़ रही हैं। सभी चाहते हैं कि भागा की छाती वाली जगह उन्हें मिले जिसे वे प्रधान स्थल मानते हैं। वे उससे नीचे ऊपर बात नहीं करना चाहते। कई दिनों की माथापच्ची के बाद वे आपस में करार करते हैं। एक समझौता होता है जिसके लिए कम्पनियां एक दूसरे के लिए लाखों की कीमत देती है। उसी के आधार पर वे भागा के पति को समझाते हैं कि वह भागा को मनाएं कि दिनभर चाय बेचते हुए उनके मोबाइल और नेटवर्क का प्रचार करें। वे प्रारम्भ में 5 लाख सालाना का पैकेज देंगे और वर्ष-दर-वर्ष दस प्रतिशत बढ़ाते जाएंगे। यही नहीं उसके अपंग हुए पति को वे टावरों की चैकीदारी करने के लिए सात हजार प्रतिमाह अलग अदा करेंगे। बालेराम जब सुनता है तो उसकी बांछें खिल जाती हैं। उसे अपने कानों पर विश्वास ही नहीं होता कि बिना मेहनत और कामकाज के इतना धन मिलेगा। इसके लिए उसे भागा को मनाना होगा। वह जानता है कि जिस ग़रीबी में वे रह रहे हैं भागा कभी इंकार नहीं करेगी।
 

 
पर्यटक सीजन में भागा कई बार बच्चों के साथ चायघर में ही रूक जाती है। आज भी वह गांव नही जाएगी। काम निपटाते-निपटाते सांझ ढलने लगी है। बालेराम भी यहीं डटा है। वह दिनभर कम्पनियों के लोगों के साथ घूमता और शराब पीता रहा है। बालेराम की यह ख़ासियत रही है कि वह जितनी भी शराब पी ले वह आपा नहीं खोता। लड़खड़ाता गिरता नहीं है, बल्कि और जोश से भर जाता है। इसी जोश से वह भागा को मनाना चाहता है। आखीर पांच लाख कम नहीं होते और ऊपर से उसकी अपनी नौकरी। वह आज भागा के साथ ही रहना चाहता है। बहुत दिनों बाद ऐसा हुआ है कि वह चायघर में रूक रहा है।
भागा को पति का अपने साथ चायघर में रहना अच्छा लग रहा है। उन्हें अकेले में बातें करने की फुर्सत भी कहां मिलती है। वह बहुत सी बातें करना चाहती हंै। अपने दुःख-सुख बांटना चाहती है। उसके पास कई चीजें हैं। कई योजनाएं हैं। कई प्रस्ताव हैं। बहुत सी शिकायतें हैं। पर भागा को नहीं पता बालेराम के दिमाग में क्या चल रहा है। आज वह उसका पति नहीं है, मल्टीनेशनल कम्पनी का एक शातिर बिचैलिया है। एजैण्ट भर है। उसे अपनी पत्नी को पांच लाख रूपए में बेचना है। वह इस आॅफर को किसी भी कीमत पर हाथ से जाने नहीं देना चाहता। वह धीरे-धीरे अपनी बात पर आ रहा है। भागा को इस पैकेज के बारे में बताता है तो वह एक पल के लिए चैंक जाती है। उसके चेहरे पर क्षणभर के लिए ऐसी चमक उभरती है मानो सुबह का सूरज उग रहा हो। पांच लाख की राशि और पति की नौकरी छोटी बात नहीं है। भागा की समझ में नौकरी वाली बात तो आती है पर वह पांच लाख वाली बात समझ नहीं पाती। पति से विस्तार से समझना चाहती है कि पांच लाख कम्पनियां किस चीज के लिए दे रही है।
वह बता रहा है कि उसके लिए भागा को उन कम्पनियों के बैनर अपने शरीर पर लगाने होंगे। कम्पनियों ने आपस में करार कर लिया है कि शरीर का कौन सा भाग किस कम्पनी का होगा। ‘जी‘ और ‘ए‘ कम्पनी का बैनर छाती जैसी प्राइम लोकेशन पर लगेगा। ‘बी‘ का सिर और माथे पर। ‘वो‘ का पेट पर और ‘आर‘ कम्पनी का कमर से नीचे की ओर।
भागा पति के मुंह से यह सुनकर सन्न रह जाती है। अचम्भित हो जाती है। यह ऐसा अप्रत्याशित और अकल्पनीय हमला है जिसने उसे भीतर तक बेध दिया है। दहला दिया है। उसके भीतर एक ज्वालामुखी फूट रहा है। भागा अपने पति की आंखों में झांकती है। वे गहरे उन्माद, जनून और मद से भरी हुई है। पुतलियों पर उसे कम्पनी के लोग नाचते दिख रहे हैं। वे भयंकर असुरी मुखौटे पहने हुए तांडव कर रहे हैं। वे सभी को भूमंडलीय बाजारी पैरों तले रौंदते हुए उन विशाल टावरों में लगी उल्टी छतरियों में पसर रहे हैं। वह देख रही है कि उसके सामने उसका पति नहीं बाजार का कोई कुख्यात बणिया बैठा है जो उसका मोल-भाव कर रहा है। वह थोड़ा सहज होती है तो आंखे डबडबा जाती हैं। छलछला जाती है पर उसे आंसुओं पर नियंत्रण करना आता है।
‘तो आप अब मुझे बेच रहे हैं। मेरे ज़िस्म का सौदा कर रहे हैं ?‘
‘ये सौदा बुरा नहीं है भागा। दिन भर तू चाय बेच कर कितना कमा लेती है.........इन कम्पनियों के लिए इतना भर करके तू चाय के साथ-साथ मुफ्त में इतने पैसे कमा लेगी........इसमें बुरा क्या है.......? तुमको अपने शरीर के ऊपर कम्पनियों के आकर्षक बैनर ही तो लगाने हैं जो तुम्हारे लिए विशेष तौर पर तैयार होंगे। तुमको कुछ बोलना नहीं है। कहना नहीं है। करना नहीं है। बस चाय बेचनी है। सर्व करनी है। लोग स्वयं उन्हें देखेंगे। देखते रहेंगे। कोई तेरे को छुएगा थोड़े ही। सभी करते हैं। पांच लाख की रकम कम नहीं होती भागा। इतने पैसे के लिए तो कुछ भी किया जा सकता है।‘
उसकी हिम्मत भागा की तरफ देखने की नहीं हो रही है। पर आवाज में किसी सौदागर जैसी खनक है। आत्मविश्वास है।
भागा के कलेजे में पति का वह ‘कुछ‘ शब्द गहरे चुभ गया है। दिल छननी हो रहा है। उसे लगता है कि उसके सामने अब बालेराम नहीं मोबाइल टावर खड़े हैं जिनकी छतरियों से विकिरणों का मायाजाल उस पर आक्रमण करने को लालायित है। पहले ये प्रहार, आघात और हमले उसे बाहर के लोगों से झेलने होते थे। लेकिन आज तो अपने भीतर से ही हो रहे हैं। वह जानती है कि अंदर के हमले कितने तीव्र और तकलीफदेह होते हैं जिनसे पार पाना कठिन है। भागा का बदन भट्टी की तरह तपने लगा है। पसीने से उसका बदन तरबतर है। चाय की झूठन की तरह उसकी चिपचपाहट उसके पूरे शरीर में फैलती जा रही है।
बालेराम बोले जा रहा है।
‘तुम तो वैसे भी इतनी सुन्दर हो। लोगों की निगाहें तुम पर लगी रहती हैं। वे तुम्हारी चाय कम तुम्हारे ज़िस्म को ज्यादा देखते हैं। बड़ी-बड़ी छातियों के कारण ही ‘जी‘ और ‘ए‘ कम्पनियों ने तुम्हारी इस उम्दा जगह को खरीदा है। उनका शेयर इसीलिए सबसे ज्यादा है।‘
भागा को स्वयं पता नहीं चलता कि वह पति के मुंह पर एक जोरदार तमाचा कब धर देती है। तमाचा इतने जोर का पड़ता है कि वह भागा के पास से कई फुट दूर लुढ़कता हुआ दरवाजे के पास जा गिरता है। उसका मुंह टेढ़ा हो गया है। उसे इस बात का भान तक नहीं था कि भागा इतनी आक्रामक भी हो सकती है। भागा जानती है कि वह वापिस वार करेगा इसलिए वह भट्टी से जलती हुई मोटी लकड़ी हाथ में उठा लेती है। उसकी आंखे, चेहरा लाल हो गया है। वह गुस्से से कांप रही है। उसका पति कनखियों से उसे देखता है तो लगता है सामने भागा नहीं है, बाघिन है जिसने अपना जबड़ा और पंजे शिकार के लिए अग्रसर कर लिए हैं। वह कभी भी झपट कर उसके शरीर को नोच-नोच तक निगल सकती है। वह वहां से भागने में ही भलाई समझता है। अपने बदन को संभालता, लंगड़ाता वह बाहर कहीं अंधेरे में गुम हो जाता है। बच्चे मां के इस रूप को देखकर अचम्भित है। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा है। वह दोनों बच्चों को अपनी छाती से भींच कर फूटफूट कर रो देती है।
तभी दरवाजे में हल्की-हल्की हूंकों के साथ खरखराहट होने लगती है। कोई जैसे दरवाजे को खोलना चाह रहा हो। भीतर एक सन्नाटा ओढ़ लेता है। धुप्प अंधेरा हो गया है। भागा अपने को सामान्य करते हुए बच्चों को अलग करती है। दियासिलाई लेकर लालटेन जला देती है। दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं है। पुनः हूं हूं की घ्वनि के साथ एक नन्हां सा सफेद पंजा दरवाजे की बीच में हिलता दिखता है। भागा झटपट दरवाजा खेलती है तो देखती है कि एक सफेद मादा भालु का बच्चा भीतर आने का प्रयास कर रहा है। वह उसे उठाने से पहले बाहर का ज़ायज़ा लेती है। भालुओं और बाघों की गंध महसूस करती है। वह उनकी गंध से भली-भान्ति परिचित है। आश्वस्त होकर उस नन्हें रूई के फाए जैसे बच्चे को अपनी गोद में उठा लेती है। वह जानती है किसी शिकारी ने फिर मादा भालु को मार दिया होगा। वह भीतर से दरवाजा बंद करके लौटती है तो बच्चों के उदास चेहरे खिल जाते हैं। भागा ने अभी भी उसे अपनी छाती से भींच रखा है।

 

-एस आर हरनोट
साहित्य कुंज, मारलब्रो हाउस,
नजदीक हिमाचल सचिवालय, धरातल मंजिल,
छोटा शिमला-171002 हि0प्र0
फोनः मो.  8219665436, 098165 66611

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