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अग्नि-दाह
(राजस्थानी कहानी ‘अगन-दाग’ का हिन्दी रूपान्तर)

जाड़े की रात में ठंड़ अपने रंग में थी। अंधेरा अभी भी मध्य रात्रि के समान प्रतीत हो रहा था। आकाश में भौर का तारा तेज रक्तवर्णी आभा के साथ चमक रहा था। मुर्गे की बांग के साथ ही नारिया वादी और उसकी घरवाली समुड़ी उठ गए थे। चूल्हे में गत शाम को इकट्ठे किए हुए घास-फूस और पतली-पतली लकड़ियों से अलाव जला रखा था। अलाव तापते हुए दोनों नीम के दातुन नसवार के साथ दांतों पर घिस रहे थे। आकाश में भौर की लालिमा छाती जा रही थी, ठीक उसी तरह से नारिये के मन में विचारों के झंझावात उमड़ रहे थे।
पास में ठंड़ से ठिठुरता हुआ पैरों के बीच मंुह दबाये हुए उसका दैत्य जैसा कुत्ता षेरिया दुबका हुआ था। आस-पास हलचल होने के कारण षेरिया आगे के दोनों पैरों को लंबाता हुआ कूं...कंू करता हुआ उठा। कुछ दूर जा कर आकाश की तरफ मुंह करके लंबी तान मारकर भौंकना शुरू किया- जैसे किसी अनहोनी पर रो रहा हो। शेरिया नारिये को बहुत प्रिय था। यही तो उसका सच्चा साथी था, जो प्रायः शिकार करने में साथ निभाता था। किन्तु उसका सुबह-सुबह इस तरह से भौंकना उसे ठीक नहीं लगा। एक बार तो उसने ‘ऐ! शेरिया हाड़...हाड़...छू...छू...’ कहकर हौले से टरकाया किन्तु पलभर चुप रहकर पुनः भौंकने लगा। नारिये ने एक बड़ा-सा कंकड़ उठाया और शेरिये को मारा। वह कूं...कूं... करता हुआ बैठ गया।
समुड़ी ने मौन तोड़ा-‘बेचारे को ठंड़ में कैसा लगा होगा? वह भौंक रहा था तो उसे भौंकने दिया होता...तुम्हारा क्या बिगाड़ रहा था?’
‘डोरे फूट गए हैं तेरे? बापू पास में ही सोये हुए हैं। बीमार हैं, डाक्टर साहब ने घर पर रखकर सेवा करने केलिए कह दिया है। कल तो घबरा भी गए थे। ऐसे में कुत्ते का भौंकना ठीक नहीं है।‘
’बापू की और आगे दवाई कराने के लिए हमारे पास पैसे नहीं हैं। उनको तकलीफ हो रही है। एक न एक दिन मौत तो आनी ही है।’ -समुड़ी ने कहा। कुछ देर रुकी और शेरिया की तरफ देखकर पुनः नारिया से बोली-‘बेचारे शेरिया का इसमेें क्या कसूर है? अबोला जीव है, उसको कंकड़ मार दिया! ऐसी ठंड़ में कोई तुम्हें कंकड़ मार दे तो कैसा लगे?’
‘इतना तो मैं भी समझता हंू, लेकिन बापू जीते जी नरक भुगत रहे हैं। अभी उनको कुछ हो जाए तो बड़ी आफत आ जाएगी।’
‘कैसे?’-तपाक् से समुड़ी की ज़ुबान चली।
‘अपना डेरा अनजानी जगह पर है। हमारी यहां कोई जान-पहचान नहीं है, हमारा यहां रहना भी मुश्किल है। गांव के श्मशान के पास किसी का आना-जाना नहीं होता है इसलिए वीरान जगह पर हमने डेरा जमाया है। पास में किसी पशु की सड़ी हुई लाश पड़ी है, जिसकी बदबू से नाक फटा जा रहा है। फिर भी हमारा डेरा जमाए रखना हमारी मजबूरी है। ऐसे में भी इस ज़मीन का मालिक जान जाए तो यहां से निकाल दे...। कौन जाने कितने दिनों तक हमको यहां पर रहने मिलेगा?’ यह कहते हुए नारिया की आंखें भर आईं, जैसे वह अपनी लाचारी पर रो पड़ा हो।
उसका गधा रातभर से बिना हिले-डुले बैठा था, वह भी उठा और रैंकने लगा। नारिया को गधे का सुबह में रैंकना नीम की कोपल की तरह लगा। उसे उस पर भी गुस्सा आया किन्तु वह न तो कुछ भी बोला, न ही प्रतिक्रिया स्वरूप कोई हरकत की। उसने समुड़ी की तरफ कनखियों से देखा भर। समुड़ी नारिया की भावनाओं को भांप गई। गधे का रैंकना इतना तेज था कि दोनों बच्चांे एक तो घापूड़ी दूसरे रतूड़े ने बिस्तर में ही हलचल की। उनकी नींद उड़ गई। ठंड़ के कारण वे पुनः रज़ाई को अच्छी तरह से लपेटकर सो गए।
दिन पूरी तरह से निकल आया था। सब ने काली चाय पी। गांव की बस्ती कुछ दूरी पर थी। डेरे से नई बन रही ऊंची इमारतों की छतें दिखाई दे रही थीं। इन इमारतों को रतूड़ा ग़ौर से देख रहा था। नारिया का डेरा जहां भी जाता था, रतूड़ा बड़े-बड़े मकानों को कौतूहल भरी निगाहों से देखता था। चार साल की उम्र के बच्चे ने दुनिया का अभी देखा ही क्या था। ये तो उसके जीवन के शुरुआती दिन थे। लेकिन मकान की अवधारणा को लेकर वह अचंभित था और उनके बारे में जानने के लिए उत्सुक था। उनकी उपयोगिता उसके सोचने का विषय बनी हुई थी, जैसे किसी शोघार्थी की हुआ करती है। वह अपने पिता से बहुत कुछ पूछना चाहता था, लेकिन उसके पास जिज्ञासा को व्यक्त करने के लिए शब्दों की उपलब्धता नहीं थी। यदि उपलब्ध थे भी तो उनको कहने का सामथ्र्य और साहस नहीं थे, ऐसा ही कुछ था। किन्तु आज इमारतों की ऊंचाइयां उसके जे़हन में चूभ-सी गयी थीं। उसके षब्द जीभ पर तैरने लगे थे और मानस में साहस भी उमड़ रहा था। वह पिता के पास गया और जिज्ञासा भरी निगाह डालकर पूछ बैठा -‘बापू, ये लंबेताड़ कांई बण रिये हैं?’ उसने इमारतों की तरफ इशारा किया।
‘बेटा, ये बंगले बन रहे हैं।’
‘या बंगल किण काम आवें?’ -रतूड़े के बालमन ने फिर पूछा।
भले ही रतू ने बालमन से यह प्रश्न पूछ लिया, किन्तु नारिये के मन में कोंच लगने जैसी खुजली मच गयी। तन की बाहरी खुजली हो तो नाखूनों से खुजा ले, किन्तु भीतर की खुजली को कैसे मिटाए? उसको रतू पर बहुत क्रोध आ रहा था। सुबह में कुत्ते भौंकना और गधे का रैंकना उसको विचलित कर ही गया था और अब यह रतूड़ा चूभता-सा प्रश्न कर गया!
‘बेटा! बंगला इसलिए रहने का पक्का मकान और क्या...?’-उसने खीजते हुए ज़वाब दिया। कुछ देर रुक कर पुनः बोला- ‘रतूड़ा आज तूने पहली बार तो बंगला नहीं देखा ना।’ अब की बार नारिये की यह गरज़ रही कि रतूड़ा का ध्यान उसके प्रश्न से हट जाए।
‘कुंण रैवे इण मकानां मांय?’-बिना विचलित हुए रतूड़े ने अगला प्रश्न दाग दिया।
‘बेटा कैसी बेतुकी बात पूछ रहा है? मनुष्य रहते हैं इनमें।’
‘अपना घर क्यांे नहीं बनाते हो, अपन मिनख नहीं हैं?’ -रतूड़ा एक से बढ़कर एक प्रश्न किए जा रहा था, इन प्रश्नों से नारिया आहत हो गया। आगे कुछ जवाब देने की उसके पास न तो ताकत थी, न ही हिम्मत बन पा रही थी।
पिता से अपने प्रश्न का उत्तर नहीं मिलने के कारण वह अपनी मां के पास भागा और वही प्रश्न दोहरा दिया। बेटे के प्रश्नों से आहत समुड़ी ने भी टालने की कोशिश की किन्तु यह तो बालहठ थी। अंततः उसने ज़वाब दिया- ‘बेटा, हम लोग मनुष्य तो हैं, किन्तु न जाने अपनी जात के लोग किस जनम में कैसे पाप करते होंगे कि ऐसा जीवन देखना पड़ता होगा। गांव-गांव भटकते फिरना, भीख मांगना, कोई छोटा-मोटा काम करना, इसके अलावा अपना कोई गुजारा नहीं होता है।’
‘अपन नौकरी नहीं कर सकते हैं?’
‘नौकरी करने के लिए पढ़ना पड़ता है, पैसों की जरूरत होती है और एक जगह पर रहना पड़ता है...ये सब अपनी किस्मत में नहीं हैं बेटा।’
रतू के भीतर की जमीन अभावों की आर्द्रता से इतनी उपजाऊ हो रही थी कि उस पर और भी प्रश्न पनप रहे थे। जिज्ञासा का एक महासागर-सा उसके मानस में उछालें मार रहा था। वह और भी कई प्रश्न पूछना चाहता था।
बिस्तर में दुबका हुआ नारिया का बाप रागू खूं...खंू...करता हुआ खांस पड़ा। आहत नारिये ने बाप के सामने देखा और दबी आवाज़ में कहा- ‘बापू, चाय बण गई है, कुल्ला कर के पी लो।’
रागू शायद ना कहना चाहता था, बोलने की कोशिश भी कि किन्तु पुनः तेजी से खांसी का दौरा पड़ा। वह पूरा हिल गया और बिना बोले ही हांफता हुआ लेट गया। कुछ देर तक वह बिना हिले-डुले पड़ा रहा। नारिये को कुछ अन्देशा हुआ। उठकर उसने रज़ाई में हाथ डालकर देखा तो उसे तसल्ली हुई कि बापू ठीक है।
नारिया तगड़े तन वाला युवक था। मुंह पर गहरी दाढ़ी, सांप की पूंछ की तरह मरौड़ी हुई मंूछें, मकर संक्रांति के दिन दान में मिला जिन्स का पेंट और कमीज पहने हुए ऐसे लग रहा था जैसे कोई रईसजादा हो। समुड़ी को भी वह अच्छे कपड़े पहनाता था। क्यों नहीं पहनाता? संक्रांति के दिन ढेर सारे उतरे हुए कपड़े मिल जाते थे; उनमें से वह अच्छे कपड़े देख कर छांटता था जो समुड़ी पर फ़बते थे।
रागू जंतर-मंतर और टोने-टोटके जानने वाला था। कहीं भी उसका डेरा रहता, कितना ही अज़नबी गांव अथवा कस्बा हो वह दिन में दो-चार जनों को पटा ही लेता था। पैसा निकलवाने की कला उसके पास पक्की थी।
बाप-बेटा दोनों मिलकर हर गांव में भंगारी(कबाड़ी) का धंधा करते थे, अखबार की रद्दी खरीदते वह अलग से। इससे पैसों का जुगाड़ बैठ जाता था। कुल मिलाकर ऐसा कहा जा सकता था कि रोज की कमाई तो वे हर हाल में पूरी कर लेते थे। उनकी जाति के सभी लोगों की तरह उनका दुःख समान ही था कि उनका कोई घर-बार अथवा जमीन-ज़ायदाद नहीं थे।
पिछले दिनों किसी गांव में दूर निर्जन स्थान पर उनका डेरा जमाने के लिए एक पहाड़ी पर बांस की कुछ बल्लियां गाड़कर उन पर टाट लटकाए। डेरे का सारा सामान एक आम के नीचे रखा। रागू यह देखना चाहता था कि पहाड़ी पर कोई विरोध करता है या नहीं।
वहां उनकी जाति का एक डेरा था जो काफी लंबे समय से जमा हुआ था। पहाड़ी पर बांस की बल्लियां देखकर उनको भनक लगी कि कोई दूसरा डेरा जमाने की कोशिश कर रहा है। वे लोग गांव में गए और जमीन के मालिक से चुग़ली कर आए। शाम को बेचारे रागू के सारे बांस उखाड़ फेंक दिये गए और टाट फाड़ दिए। इतना भर हो जाता तो ठीक था किन्तु उस डेरे वाले लोगों ने गांव के कुछ लोगों से मिलकर कहीं भी डेरा जमाने नहीं दिया। आखि़रकार वे अपना डेरा पुलिस थाने के पीछे जमाने में सफल हुए। वहां उनको पुलिस की सुरक्षा का पूरा विश्वास था। उनका डेरा वहां पर सप्ताह भर रहा। जाति-जाति में बैर जमकर होता है। एक की खुशी दूसरे से सहन नहीं होती है, सहन भी हो जाए किन्तु अपनी रोजी-रोटी में दखल किसे ठीक लगे? उस डेरे वाले छोरे सोमिये ने जानबूझकर एक घर के बाहर पड़ी भंगार की चोरी कर ली और दूसरे दिन सुबह में रागू को बेच दी। उसी रात को सोमिये ने एक-दो दुकानों के ताले तोड़ दिए थे।
भंगार के मालिक को चोरी का पता लगा, उसने पुलिस में इत्तला दी। तफ्शीश के बाद रागू के डेरे से भंगार की बरामदगी हुई। रागू को पुलिस ने तो पीटा, साथ ही गांव वालों ने भी उसका कचूमर बना दिया। बेचारे रागू को भीतरी मार लग गई थी। नारिये की समझदारी के कारण एक दिन बाद ही यह साबित हो गया कि वास्तविक चोरी रागू ने नहीं की थी। रागू जेल जाने से बच गया, किन्तु चोरी का इल्जाम गरीब के जीवन में एक बार लगता है तो वह चमड़ी के साथ चिपक जाता है। गरीब बेचारा अपनी सफाई किस-किस को दे? किसका मुंह बंद रखे?
नारिये ने अपने बाप रागू का ईलाज कराया, किन्तु कहते हैं न कि बुढ़ापे में लगे घाव श्मशान पर ही मिटते हैं, ठीक इसी अवस्था में पहुंच गया रागू।
अब जबकि नारिया को अपने बाप की तबीयत पर पूरा विश्वास हो गया। सुबह जल्दी खाना खा कर वह अपनी साइकिल लेकर भंगार खरीदने के लिए निकल गया। जाते हुए उसने अपने मोबाइल की बैटरी चार्ज कराने के लिए एक दुकानदार को दे दी।
समुड़ी एक टोकरी लेकर ईंधन का जुगाड़ करने के लिए डेरे के आसपास ही निकल गयी। दादा की देखरेख के लिए बच्चे अकेले थे इसलिए उसका दूर जाना भी ठीक नहीं था। वैसे भी वह सुन्दर थी, इसलिए ऐसी सूनी जगह पर अकेली दूर नहीं जा सकती थी।
रागू ने बिस्तर में से हरकत की, उसका मुंह सूख रहा था। उसने धापू को बुलाया- ‘बेटी धापू, मुझे प्यास लगी है। थोड़ा पानी पिला दे।’ धापू गिलास भर पानी लाई और दादा को दिया। रागू ने ऊंचे हाथ से पानी पीने कोशिश की तो उसका हाथ कांप गया। पानी उसकी नाक में भी चला गया जिससे वह आकुल-व्याकुल हो गया और तेजी से खांसी आ गयी। उसका दम घुट-सा गया। दादा की ऐसी हालत देखकर धापू चिल्लाई- ‘भईया, रतू...रतू...दौड़... मां को बुला...दादा को कुछ हो गया है।’
कुत्ते के साथ खेल रहा रतू तुरन्त उठा और सामने कुछ ही दूरी पर दिख रही मां को बुलाया।
समुड़ी ने आकर रागू की छाती दबाकर सब्जी का बिघार लगाने के लिए लाए हुए सरसों के तेल से सिर पर मालिश की। धापू ने दोनों हथेलियों और छोटे से रतू ने पांव की पिण्ड़लियों पर मालिश की। रागू की हालत कुछ ठीक हुई, फिर भी उसे दमे का दौरा पड़ गया था। उसकी सांसें तेजी से चल रही थी इसलिए समुड़ी को इशारा कर के अपने पास बिठाया।
धीमी आवाज में तुतलाते हुए रागू बोला ‘समू बेटा...तू हमारी जात के खानदानी परिवार की बेटी है। तूने मेरी जैसी सेवा की है इस युग में भाग्य से सौ में से एक-दो बहूएं करती हैं।...बेटी मेरे पास पैसे तो नहीं हैं, पर मेरी पेटी में प्लास्टिक की एक थैली में कुछ काग़ज़ हैं...’ रागू अब और आगे लगातार बोलने की स्थिति में नहीं था इसलिए वह सांस ठीक करने के लिए रुका। समुड़ी अधीर हो उठी उसने तपाक् से पूछ लिया- ‘कैसे काग़ज़...बापू?’
‘ज़मीन का पट्टा है...। यह ज़मीन सरकार ने घुमंतू जातियों के कल्याण के एक अभियान में हमारे नामे कर दी थी। यह जमीन मिलने पर गांव के लोगों ने हमको मार-पीट कर भगा दिया था। दूसरे वादी तो डर के मारे सस्ते में जमीन बेचकर भाग निकले थे। किन्तु मैंने ज़मीन नहीं बेची। वैसे यह ज़मीन गांव से दूर एकांत में बिना मौके की थी, किन्तु अब उस जमीन का महत्त्व बढ़ गया है।’
‘बापू! अपनी जात को गुनाह करने वाली गिना जाता है, ऐसे में हमें कौन अधिकार जमाने देगा और कौन मानवी बस्ती के पास में रहने देगा?’
‘ठीक कहती हो बेटी...बहुत दूर की सोचती हो। खानदानी ख़ून तो खानदानी कहलाता है। अपनी जात को मानवी बस्तियों के पास कोई भी रहने देने के लिए तैयार नहीं होगा, किन्तु इस जमीन को नारिया बेच भी देगा तब भी अच्छी कीमत मिल जाएगी। किसी अफसर से मिलकर यह काम करवाओगे तो न्याय ज़रूर मिल जाएगा। न्याय नहीं भी मिलेगा तो जो कीमत बनती है वह तो मिल ही जाएगी।...खूं...खूं...’ रागू को पुनः खांसी आ गई लेकिन स्वयं को संभालते हुए बोला- ‘अभी इस अनजान जगह पर मेरी मौत हो जाए तो यहां दूसरी जाति वाले उनके श्मशान पर मेरी लाश को जलाने नहीं देंगे...ऐसे में रात में कहीं पड़त जमीन देखकर गाड़ देना...। खूं...खूं....’ समुड़ी डर के मारे सहम गई। उसने अंजुलि में पानी भरा और ससुर के मुंह में डाला, तो फटे मुंह से पानी उगल आया और पूरा तन सूखी लकड़ी की तरह कड़क होकर लुढ़क गया।
जैसे किसी ने बुलावा भेज दिया हो, नारिया जल्दी ही लौट आया। उसका मन ज़ार-ज़ार रो रहा था, किन्तु उसने रोने-धोने में अपना समय नहीं गंवाया। अपने परिजनों व रिश्तेदारों को फोन लगाए किन्तु सब की हालत एक जैसी थी। दूर-दूर छितराए हुए थे। किसी के फोन की बेटरी जवाब दे गई थी, कोई नेटवर्क से बाहर था। किसी के फोन लगे तो उन्होंने कह दिया कि उनके आने का इंतजार न करे और जो भी क्रिया-कर्म करने हों कर ले। वे इतने दूर हैं कि जल्दी से लौट भी नहीं सकते।
जाति के मानो तब भी, कुटुंबी मानो तब भी और सगा-संबंधी मानो तब भी, मात्र नारिया ही था अथवा उसके कुनबे के सदस्य जिनमें कुत्ता शेरिया, एक मुर्गा, दो बकरियां और गधा भी माने जा सकते थे।
‘सा’ब नमस्ते।’ -नारिये ने थानेदार के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा।
‘बोल, क्यों आया है?’ -रौब झाड़ता हुआ थानेदार बोला।
‘सा’ब, मेरा बापू....’
‘क्या हो गया तेरे बाप को?’ -नारिया की बात पूरी होने से पहलेे थानेदार बोला।
‘मेरा बापू मर गया है...’ -नारिये ने कहा।
थानेदार खड़ा हो गया और नरमी से पेश हेता हुआ पुनः बोला- ‘बोल मैं क्या करूं?’
‘बस सा’ब! आप से इतनी अरज है कि मेरे बापू के अंतिम संस्कार के लिए आपकी मेहरबानी और स्वीकृति चाहिए।’
‘देख, यहां गांव वालों के अपने क़ानून-कायदे होते हैं। हम उनको कुछ नहीं कह सकते। तेरे बाप की लाश को उनके श्मशान पर जलाने दें, न जलाने दें। अभी तू यहां किसी को पता मत चलने देना कि तेरा बाप मर गया है। चुपचाप उसके अंतिम संस्कार की तैयारी कर। तू ऐसा करना, कहीं खाली जगह देखकर लाश को गाड़ देना।’ कुछ और विचार कर के थानेदार पुनः बोला-‘सरपंच साहब के पास जा, वे जैसा कहेंगे वैसा करना। उनको तेरी पूरी जानकारी और सारी बात बता देना।’
नारिये के ऊपर दुःख का पहाड़ टूट पड़ा था। सहायता मांगने के लिए यहां आया था, किन्तु यहां से उसे कुछ भी नहीं मिला। शाम को मुश्किल से सरपंच मिला। उससे बात करने पर उसने सड़क के किनारे झाड़-झंखाड़ से भरी ऊसर गड्ढ़ेनुमा खाली जगह बताई। जगह के मालिक को बुलवाकर कहला भी दिया कि नारिये के बाप की लाश को गाड़ने के लिए गड्ढ़ा खोदने देना। बिना उपयोग की जमीन थी इसलिए मालिक ने हां कर दी।
नारिये ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर पिता की इच्छा के अनुरूप और परिस्थितिवश पिता की लाश को गाड़ने के लिए गढ्ढ़ा खोदन शुरू कर दिया। वे काफी जल्दी भी मचा रहे थे। उनको शायद इस बात का अंदेशा था कि लोगों का क्या? कुछ भी भरोसा नहीं और विशेषकर जमीन के मामले में तो बिल्कुल ही नहंीं। न जाने किस पल ज़मीन-मालिक का विचार पलट जाए। लगभग आधा फूट की खुदाई हो पाई थी कि उनको ज़मीन-मालिक दो लठैतों के साथ आता हुआ दिखाई दिया।
‘ऐ! खोदना बंद कर...’ -गरज़ता हुआ ज़मीन-मालिक बोला।
उन्होंने खोदना रोक दिया। नारिये ने कुछ बोलने की कोशिश की किन्तु वह बीच में ही अंगुली से इशारा करता हुआ बोला- ‘यहां गड्ढ़ा नहीं खोदना...मेरी ज़मीन को श्मशान थोड़े ही बनाना है! ...और कान खोल कर सुनले, जिन्दा रहना हो तो यहां से भाग निकल। नहीं तो तेरे बाप की लाश डेरे में रह जाएगी और तुम दोनों को यहीं जिन्दा गाड़ देंगे।’ दोनों लठैतों ने गैंती, फावड़ा और तगारे फैंक दिए।
अनजान गांव और अनजान लोग। नारिया के पास बोलने जैसी स्थिति भी नहीं थी। दोनों हाथ जोड़कर रवाना हो गए।
अंधेरा गहराने लगा था। अनायास हुई इस घटना से दोनों थर-थर कांपते हुए डेरे तक पहंुचे। दोनों बच्चे भी डर के कारण सहमे हुए थे। रतू तो धापू की गोद में सिर रखकर रो रहा था।
नारिया पिता के शव के पास गया और हिचकियां लेकर रो पड़ा। वह शव से लिपट गया। उसने रोते हुए पिता से माफी मांगी कि बेटा समय रहते अगन-दाग नहीं दे पाया। अब शव का क्या करना? बच्चों को संभाले कि अंतिम-संस्कार की व्यवस्था करे? करे तो क्या करे?
गहराते अंधेरे के साथ ही नारिया के डेरे में दुःख और डर का संगम हो रहा था। सभी सदस्य भूखे थे। घर में शव रखा हो तो चूल्हा भी नहीं जलाया जा सकता। भोजन बना भी हुआ हो तब भी खाएं कैसे? उसके डेरे में दीया जल रहा था, किन्तु वह मद्धिम उजाला कहीं उनके होने का संकेत न बन जाए यह सोचकर नारिये ने उसे भी बुझा दिया। रोने-धोने, कुछ नहीं कर पाने की लाचारी के दुुःख और विचारों के झंझावात में दो घंटे बीत गए। नारिया दुविधा के भंवर में फंसा हुआ था। वह बार-बार अपनी लाचारी के लिए भगवान को दोषी ठहराकर गालियां देना चाहता था, लेकिन डर भी रहा था; क्यांेकि भगवान को गाली देने से पहले से रूठा हुआ भगवान और अधिक रूठ जाएगा।
लंबे अंतराल के पश्चात् उसकी आंखों से उमड़ते हुए आंसू पौंछने का उसे भान हुआ। उसने ऐसा किया तो उसकी आंखों में कुछ दूर हो रहा उजाला चूभ-सा गया। उसने पुनः आंखें मसली और आश्वस्त हुआ कि वाक़ई कहीं उजाला दिख रहा है। उजाले की दिशा में आंखें फाड़कर देखा। वह उठा और हिम्मत बटोरकर आगे बढ़कर देखा। देर शाम को किसी की मौत हो गई लगती थी। शव को रौवती देने का संस्कार संपन्न कराया जा रहा था। कुछ देर बाद वहां से भीड़ छंटने लगी और सभी लोग चले गए।
वापस आ कर नारिये ने डेरे की सारे ताम-झाम समेट लिए। गधे का लगड़ा तैयार कर उसे खूंटे से बांध लिया। उसकी पत्नी व बच्चे आश्चर्यचकित होते हुए देख रहे थे। उन्हें यह तो समझ में आ रहा था कि यह डेरे के पलायन की तैयारी है, किन्तु अनायास ही क्यों? यह उनके लिए अबूझ पहेली की तरह था।
नारिये ने चिता के उजाले में चारों तरफ का भूगोल नाप लिया और आश्वस्त हो गया कि सब कुछ ठीक है। उसने समुड़ी को संक्षेप में समझा दिया कि क्या करना है। बापू के शव को दोनों ने कंधों पर तोक लिया। दोनों बच्चों ने पतली-पतली लकड़ियां थाम ली, जितनी उनकी क्षमता थी।
श्मशान पर पहुंच कर शव को नीचे उतारा। सभी ने अंतिम प्रणाम किया और पुनः शव को हाथों में लेकर एक-दो बार हवा में लहराकर जलती चिता में फेंक दिया। यद्यपि चिता की तपिश बहुत अधिक थी, फिर भी यह काम सावधानी से पूरा हो गया। बच्चों के हाथों की लकड़ियां भी चिता में डाल दीं।
‘‘...इस तरह किसी की जलती चिता में दूसरी लाश को जलाना तो पाप होवे है... हे!राम...।’’-समूड़ी ने हिचकते हुए कहा।
‘‘...कैसी अजोगती बात करे है रे! हमारा धरम का काम भी तो पाप ही गिना जाता है...फिर हमारे लिए क्या तो धरम और क्या पाप...।’’ इतना कह कर नारिया चुप हो गया। उसके कपाल से पसीना बह रहा था और आंखों से आंसू भी लुढ़क रहे थे। गाल तक आते-आते दोनों का संगम हो रहा था। उसमें खारापन तो था लेकिन खार नहीं था।
समुड़ी ने रोते हुए हिचकियों पर काबू रखते हुए पूछने की हिम्मत की-‘गांव के लोगों को जब मालूम होवेगा कि हमने ऐसा किया है तो हमारा कांई होवेगा?’
‘कल मंगलवार है। शव के फूलांे की चारी कल नहीं बुहारी जा सकेगी और परसों तक तो हम इतने दूर जा चुके होंगे कि किसी को भनक तक नहीं लगेगी। ...और भनक लग भी जाएगी तो जो होगा देखा जाएगा...’ -नारिये ने रोते हुए किन्तु आत्मविश्वास के साथ ज़वाब दिया। अग्नि-दाह करने पर बेटा जोर से रो कर पौक लगाता है किन्तु नारिया ऐसा नहीं कर पाने को विवश था। वह प्रयासपूर्वक अपने रोने पर काबू रखे हुए था। समुड़ी औरतजात ठहरी। वह अपना रोना रोक नहीं सकी और तेज़ आवाज़ में उसके मुंह से एक चीख-सी निकल गई। नारिये को इस बात का पूर्वानुमान था इसलिए वह बिजली की गति से लपका और समुड़ी का मुंह अपने हाथों से दबा दिया। उसने दबी आवाज़ में कहा-‘रो-रो कर अपने बुरे हाल हो चुके होते किन्तु अभी हमें जोर से रोने की आज़ादी नहीं है। किसी और की चिता पर बापू का दाह-संस्कार किया है, ऐसे में हमारे रोने की आवाज किसी ने सुन ली तो....!’
नारिया बेआवाज़ रोये जा रहा था। बिना आवाज किये समुड़ी भी रोये जा रही थी और बच्चों की तो यह सब देखकर घिग्घी बंधी हुई थी। उनके निचले ओंठ लंबे तन रहे थे और आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे।
‘सभी जने बापू को अंतिम प्रणाम करो और जल्दी से निकल चलो। रातभर हमें चलना है।’ -नारिये ने दबी आवाज में कहा।
सभी ने ऐसा ही किया। सबसे आगे शेरिया, उसके पीछे गधा, गधे के पीछे बच्चे उनके ठीक पीछे समुड़ी और अंत में नारिया स्वयं। कारवां रवाना हो गया।
जलती चिता का उजाला पीछे छूटता जा रहा था। सामने गहरा अंधेरा था और अनजान राह थी। राह थी भी अथवा नहीं, कोई दिषाबोध भी नहीं था। बस चले जा रहे थे, बिना पदचाप किए।
कुनबे के सभी प्राणी डेरे के सामान के साथ इतने बड़े दुःख का बोझ भी ढो रहे थे, निःशब्द...।

-दिनेश पंचाल
‘पार्वती विहार’, सहज कालोनी, बस स्टेशन के पास,
विकासनगर, जि.-डूंगरपुर(राज.)-314404
मो.नं.-09460115566,

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