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उपन्यास अंश

राजनटिनी

अतीत से निकल कर जब नायिकाएं आधुनिक लेखिकाओं की लेखनी से निसृत होती हैं, तो निश्चय ही कहीं इतिहास में दब कर रह गया या दबा दिया गया कोई अनूठा विद्रोही चरित्र सामने आता है, जो मिसाल ही नहीं देता है, आज की स्त्री के लिए नया वातायन खोलता है कि अतीत की स्त्रियां जिनके बारे में कहा जाता था कि वे चाहरदीवारों की संतानें थी और उनकी ज़बानें सात तालों में बंद थीं, यह एक भ्रम मात्र था। हम अपने जीनोटायप में भीरू गुणसूत्र नहीं जीवट स्त्रियों की विरासत लेकर आई हैं। गीताश्री का यह उपन्यास ऎसी ही एक स्त्री मीनाक्षी के प्रेम और जीवट की गाथा है। इसके कुछ अंश ---

 

ये तुम जो नीला आकाश देख रही हो न , वो तुम्हारी आंखों का कमाल है। आंखों से छिटक कर रंग फैल गए है नील गगन में।

शाम को समय था और आकाश बहुत साफ-सुथरा और नीला दीख रहा था। सौमित्र मिसिर बहुत अनुरागी मन लिए मीनाक्षी के पास बैठे थे।

गगन तो नीला ही होता है जब तक घटाएं उसे घेर न लें, सूर्य उसे दहकाए न...आप काव्य रच रहे हैं सौमित्र...

मैं एक गरीब नटी, जिसे आपके कारण राजृनटी का पद मिला, आपके प्रति आजीवन आभारी रहेगी।

दोनों बातें करते करते दूर निकल आए थे। अगले दिन सुबह सुबह मीनाक्षी को किसी दूसरे गांव अपनी टोली लेकर रवाना होना था। जाने से पहले सौमित्र उसके पास आए थे, उसे समझाने की, एक राजनटी किन किन नियमों से बंधी होती है। उसे नगर छोड़ने से पहले आज्ञा लेनी चाहिए। वो पहले की तरह आजाद नहीं है। ये ठीक है कि उसे राजा ने छूट दी है कि वह नगर-नगर, डगर-डगर घूम कर प्रस्तुति दे, फिर भी राजनटी के कुछ कर्तव्य होते हैं। उसे उसका ध्यान रखना चाहिए।

सौमित्र भीतर से बहुत आहत थे, मीना के उपेक्षित व्यवहार से। जब काम हो, जब कोई बात मनवाना हो तो गले में लटक जाती है, इठलाती है, जैसे ही वे करीब आना चाहते हैं, या करीब आने का अवसर जुटाते हैं, वो दूर छिटक जाती है। कितनी मतलबी लड़की है। उन्हें आज बेहद क्रोध आ रहा था। वे दो टूक फैसला चाहते थे। सब्र की भी कोई सीमा होती है। बहुत सब्र कर चुके। अब आर-पार का फैसला होकर रहेगा। कोई कितनी प्रतीक्षा करे। प्रेम में सब्र कहां होता है। उसे कितना सब्र रखना पड़ा। कई बार मन में कचोट होता कि किसी महत्वाकांक्षी लड़की से प्रेम करना दुष्कर काम है। ऐसी लड़कियां, अपने काम के प्रति इतनी धुनी होती हैं कि उन्हें पकड़ पाना आसान नहीं होता। वे अपनी प्रगति के लिए सिर्फ अवसर तलाशती रहती हैं। उनके सामने कोई आ जाए, उसे अनदेखा करके, राह का रोड़ा समझ कर आगे बढ़ जाती हैं। सौमित्र के मन में कुछ इसी तरह के खयाल घुमड़ रहे थे। मीना उसके हाथ नहीं आ रही थी। जब भी बात करो, सिवाए अपने काम के, कोई और बात करने की नौबत ही नहीं आने देती थी। बड़ी मुश्किल से उसके साथ नदी तट पर आई है। दूर-दूर तक वीराना है, सिर्फ अथाह जल है, दूर आती-जाती कुछ नौकाएं हैं, तेज हवाएं हैं जिनमें मौसम की आहट है, नदी की नमी है। मन की बात कह देने का इससे उपयुक्त समय और स्थान कोई और कहां।

वो दूर देखो, किस तरह पानी पर झुकी हुई हैं टहनियां..पानी छूने को बेचैन हैं। न पानी ऊपर आता है न शाखें लंबी हो रही हैं। हवा का एक वेग आएगा, दोनों को मिला देगा। हम तुम इन्हीं की तरह हैं मीना...

उस हवा को मत रोको...उसे अपना काम करने दो...

मीना पानी के बहाव को देख रही थी। पानी की दिशा जिस ओर थी, उस ओर उसका हृदय खींचा चला जा रहा है। मन हुआ, छपाक से कूद जाए।

हे नदी...मुझे ले चल वहां...जहां मेरा बैरी बसता है। जाने कब आएगा...कौन मास में, किस ऋतु में। अब तो कला-साधना में भी वह चपलता न रही। पहले भली थी मैं...कोई न था जीवन में...एक प्रतीक्षा थी। प्रतीक्षा बनी रहती, मेरी शक्ति बनी रहती। अभी तो तन-मन में जाने कैसी आग लगी है।

मीना के मनोभावों से अनभिज्ञ सौमित्र अपनी बात कहे जा रहे थे-

तुम तो श्लोक पढ़ लेती हो, समझ लेती हो...अथर्व वेद में एक जगह लिखा है-

उत्तुदस्वोत तदतुमा घृथा: शयने स्वे ।  इषु: कामस्य या भीमा तया विध्यामि त्वा हदि ।।

अधापर्णा कामशल्यामिषुं संकल्पकुल्मलाम। तां सुसन्नतां कृत्वा कामो विध्यतु त्वा हदि।। ( 3/25/1-6)

आ बैठ प्रिया । मत सोती रह, तुझे उठाता मैं प्रेमी. बींधता हृदय, काम के तीर से....

बस...बस...

मैं इतना कठिन काव्य नहीं समझ पाती। आप बहुत विद्वान हैं, मैं अनपढ़ नटी। मैंने चोरी-चोरी पाठशालाओं में सुन सुन कर सीखा है। थोड़ा-बहुत पंडित श्रीधर से सीख-पढ़ रही हूं। इस उम्र में मन कहां लगता है पढने में।

वेदो में ऐसा लिखा है...?”

उसने अपनी नीली आंखें फैलाई।

सौमित्र को लगा, आकाश का थोड़ा और विस्तार हो गया है और क्षितिज से एक तीर आकर उनके हृदय को बींध गया है। उनका मन हुआ, मीना को अपने बाहुपाश में जकड़ लें। इतने दिनों का सब्र का बांध टूट जाए।

मीना इससे पहले कि संभलती, वह सौमित्र की बाहों में थी। सौमित्र की दहकती सांसे उसके चेहरे से टकरा रही थीं।

उसके मुख से काव्य की पंक्तियों की जगह कामासिक्त बातें निकल रही थीं। वह एक कामुक कवि में बदल गया था।

बहुत सताया तुमने, मैंने तुम्हारे लिए क्या न किया, कितने प्रपंच रचे, राजद्रोह किया..अब सब्र नहीं होता...मैं तुम्हें अपना बना कर रहूंगा...तुम मेरी रानी बनोगी...तुम अपूर्व सुंदरी हो...तुम सिर्फ मेरी हो...मेरी...मैं तुम्हें सदा के लिए अपना बनाऊंगा...तुम सहमति दे दो मेरी मीना...आओ...आज हम इस सांझ को अपना मान कर एक हो जाएं। नदी हमारी साक्षी रहेंगी।

सौमित्र ने मीना को दबोच कर बेतहाशा चूमना शुरु कर दिया था। दुबली-पतली मीना जोर से चीखी। पैरों से सौमित्र को ठोकर मारा और उससे छिटक कर अलग हो गई। उसकी चुनरी फट गई थी, धूल में वह मैली हो गई थी। केश खुल कर हवा में उड़ने लगे थे। चोली कसक-मसक गई थी। उसे किसी पुरुष का यह प्रथम स्पर्श अच्छा लगा था। कुछ देर वह सुख लेती रही...इस तरह तो किसी पुरुष ने उसे पहली बार छुआ था। पहली बार चूमा था। पहली बार उसके स्तनों को दबाया था।  उसके कानों में अगर अलबेली के शब्द न गूंजते तो शायद वह ढीली पड़ जाती।

कानों में अलबेली ने कहा था- तुम बल्लाल की अमानत हो...संभाल कर रखना। एक दिन तुम्हें वो लेने आएगा। तुम्हें सुहागन करेगा...महलों की रानी बनोगी...वह तुमसे अटूट प्रेम करता है...तुम्हारे बिना जी नहीं सकता...तुम न मिली तो वो मिथिला को नष्ट कर देगा...तुम उसकी हो...उसकी हो...सावधान मीना...तुम पर किसी और का हक है...जो तुम्हें प्रेम करता है...प्रेम साधिकार आता है...

नियंत्रण ...नियंत्रण...रुक जा...क्षणिक आनंद , स्वर्ग से वंचित कर देगा। उसकी चेतना ने उसे चेताया। वह उन्माद को झटक कर दूर जा गिरी। दैहिक ताप से सुलगता हुआ सौमित्र कराह उठा। उसे पैरो से चोट लगी थी। पेट पकड़ कर वहीं भूमि पर बैठ गया था। मीना दूर खड़ी कांपती रही। वह कुछ बड़बड़ा रही थी। सौमित्र पेट पकड़ कर तत्काल उठा और अंगारे बरसाने लगा-

तुम क्या थी, क्या औकात थी तुम्हारी, दो कौड़ी की नटी, कौन पूछता तुम्हें, मैंने तुम्हें यहां तक पहुंचाया। तुमसे सुंदर स्त्रियां मिथिलांचल में भरी पड़ी हैं। मुझे कोई भी मिल जाती। मैंने सबको छोड़ कर तुम्हें अपना दिल दिया। तुमने मुझे भरम में रखा...तुमने अच्छा नहीं किया। अपनी जाति दिखा दी...?

मैं आपसे प्रेम नहीं करती हूं सौमित्र...आपसे मैत्री संबंध स्थापित किया था, आपने उसके गलत अर्थ लगाए। मुझे क्षमा कर दें, मैं आपके उपकारो के बदले अपने मन का सौदा नहीं कर सकती। मैं उसे पुरुष को नहीं वरुंगी जिसे मैं प्रेम नहीं करती।

किससे करती हो प्रेम...क्या विवाह नहीं करोगी तुम?”

सौमित्र का स्वर धीमा पड़ा। दर्द से अभी भी कराह रहे थे। बहुत जोर से लात मारा था मीना ने।

मन ही मन मीना के प्रति हिंसक हो रहे थे, ऊपर से बातें करते रहे। उनके भीतर मीना को सबक सीखाने और बदला लेने की इच्छा जाग उठी थी। जिस लड़की को महल तक पहुंचाया, उसे नष्ट भी कर सकता हूं, वापस झोपड़ी में पटक दूंगा। फिर से बंजारा न बना दिया तो मेरा नाम बदल देना...

भीतरी दुनिया में ये घमासान मचा था।

बाहर से वे हार मानने को तैयार न थे। एक नटी के साहस पर हैरान भी थे। जो हर बात के लिए उन पर निर्भर थी, उसे उपकृत करते रहते थे। उसकी खातिर राजदरबार में बदनामी भी झेल रहे थे। उन्हें बदले में क्या मिला। ये लातों का उपहार। ये अपमान कभी न भूलेंगे।

अपने मनोभावों पर काबू पाकर फिर पूछा- तुम किसी से प्रेम करती हो तो बताओ। तुमने बताया क्यों नहीं। कोई है तुम्हारे जीवन में।

मीना ने अपना मुख फेर लिया। वह घर लौटने को उद्धत हुई कि सौमित्र ने फिर आवाज लगाई- सोच लो नटी । मेरा प्रेम निवेदन ठुकरा कर तुमने अच्छा नहीं किया। सच तो बताती जाओ। क्या चाहती हो तुम।

बल्ला... हवा में कांपता रह गया नाम।

जोर से बोल कर भाग निकली। सौमित्र को ठीक से नाम सुनाई न दिया। इतना समझ में आ गया कि इसने किसी पुरुष का नाम लिया है और जिसका नाम बला...से शुरु होता है। अब इस नाम के पुरुष की खोज उसकी पहली प्राथमिकता हो गई थी , साथ ही उसके दिमाग में मीना को सताने के कई और षडयंत्र चलने लगे थे। वह शक्तिशाली था, कुछ भी कर सकता था। वह राजदरबार और मीना के बीच एकमात्र संपर्क सूत्र था। उसके साथ शत्रुता महंगी पड़ने वाली थी।

वैसे भी प्रेम में चोट खाया हुआ शक्तिवान पुरुष भयानक हो उठता है। उसकी शक्ति का नशा उसे विनम्र नहीं होने देता। किसी प्रकार स्त्री के दमन के बारे में सोचता है। उसे इतना दबा दो कि वह शरण में आ पहुंचे। एक साधारण हैसियत वाली स्त्री के द्वारा ठुकराए गए पुरुष बहुधा बनैले पशु की तरह हिंसक हो जाते हैं।

-गीताश्री

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