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पने अपने सच

प्रतीक... क्या देख रहे हो? कोई अजनबी कान में फुसफुसा गया

'उ..म..म..... मैंने लगभग नींद से जागते हुए कहा नहीं कुछ नही.....बस उगते सूरज को देख रहा हूं ...।काफी मनमोहक दृश्य है। दुनिया की भीड में लोग कितने बेमानी नजर आते हैं। सिर्फ कुछ ही चीजे ज़ानी पहचानी रह गयी हैं यह उगता सूरज उनमें से एक है। मैने अपने आसपास देखने की कोशिश की पर कोई नजर नहीं आया।

दिन में कितने लोग तुम्हारी आंखों के सामने से निकल जाते हैं, किस किस को याद रखते होसुबह घर से निकलते हो, शाम को लौट आते हो, सारा दिन लोगों से मिलते हो, किसी को याद रखते हो किसी को भूल जाते होपर घर लौट आने के बाद ये सब कुछ कितना गैरजरूरी सा लगता है

हुह... सब कुछ कपडों के साथ खूंटी पे टांग देते हो पर परछांई कहीं टंगती है, परछाईं तो हमेशा रहती है - कंधे पर लदे बेताल की तरह विचारों का क्या है, आदमी अकेला हो और व्हिस्की का एक पैग हाथ में हो तो, वो भी मस्तिष्क में उमडने ही लगते हैंवैसे भी कोई प्रतिबन्ध तो है नहीं

खैर........ आजकल लोग अपने हिस्से की रोशनी, हवा, पानी आदि आदि अपनी अपने साथ अपनी जेबों में लेकर घूमते हैंएक जेब से सिगरेट निकाली और दूसरी से सूरज.. बस..फिर भला ऐसे में किसी दूसरे से क्या मतलब

यदि जेबों में नहीं है तो वो है जन्म और मृत्यु...पर फर्क क्या पडता है... न अपनी खुशी आये न अपनी खुशी चले..... ..दम भी नहीं घुटता...। और कितनी सीमायें अपने कपडों पर जेबों की तरह टांकी जा सकती हैं

''सीमायें हैं तो सही पर लोग खुश भी तो हैं और........। ''

''बात केवल खुशी की नहीं है, बात है टुकडा टुकडा जिन्दगी और सीमाओं में बटी खुशी की ...।''

''पेट की सीमा के बारे में क्या खयाल है, भूखे से पूछो वो बतायेगा, वैसे भी सीमायें पूरी तरह सापेक्ष हैं। कोई खुश है और कोई नहीं है।''

''माना कि सीमायें सापेक्ष हैं पर क्या व्यक्ति व्यक्ति का व्यक्तित्व और उसका अस्तित्व केवल पेट तक ही सीमित है? उसके आसपास कुछ सरोकार हैं........।''

''व्यक्तित्व भी ठीक है, अस्तित्व भी ठीक है और सरोकार भी समझ में आते हैं पर यदि ये सीमायें बनी हैं तो कोई न कोई कारण तो अवश्य ही होगाआज जब सब लोग अपनी अपनी जेबों में हाथ डालकर घूम रहे हैं तो इसका भी कारण है .....कि कोई दूसरा जेब न काट ले...। भई..लोग तो इस पर विश्वास भी करते हैं''

''ये विश्वास तो व्यक्तिगत है पर व्यक्तिगत विश्वास की जगह समाज में तो होती नही है, व्यक्ति कोई इकाई नहीं हैसब एक दूसरे से जुडे हैंसबका अपना अपना अस्तित्व है पर अपनी जगह पर जहां बात समुदाय या समाज की होती है वहां तुम्हारा कोई अलग अस्तित्व नहीं रह जातागत विश्वास व्यक्ति को अपने तक ही सीमित रखने चहियेबात सीमायें खींचने की और टुकडों में......।''

अचानक नजर घडी पर पड ग़यीसात बज रहे थेसिगरेट पीने का मन हो रहा था पर जेब में रखे सूरज की याद आते ही हंसी आ गयीतपन घर आ गया होगातेज कदमों से चल पडातपन बाहर बरामदे की धूप में बैठा अखबार पढ रहा थागेट खुलने की आवाज शायद उसने सुन ली थी सामने से अखबार हटाकर उसने मेरी तरफ देखा और फिर अखबार सामने टेबल पर रख दिया

''कोई खास खबर नहीं है क्या? '' मैंने पास पडी क़ुर्सी पर बैठते हुए पूछा।

''खास खबर तो मैं लाया हूं।''

''क्या?''

''जन्मेजय को जानते हो, मिश्रा की पार्टीमें मुलाकात हुई थी...।''

'हां, तो...।''

''उसने आत्महत्या कर ली भई..लोग तो इस पर विश्वास भी करते हैं।''

''उहूं.. अजीब बात है, वो तो काफी मस्त आदमी था।''

तपन कुछ नहीं बोलापरेशान दिखायी पड रहा थावैसे भी तपन काफी इमोशनल है पता नहीं किस किस के बारे में सोचा करता हैलोगों के अपने अपने विश्वास हैं, अपनी अपनी मान्यताएं हैं जीवन और मृत्यु को लेकरजिन्दा रहने या न रहने के लोगों के पास व्यक्तिगत कारण हैं, कम से कम मैं तो ऐसा ही सोचता हूंपर तपन ऐसा नहीं सोचता, मैं जानता हूं

''...व्यक्तिगत विश्वास का आधार क्या है? हमारे सरोकार हमें एक दूसरे से किस हद तक जोडते हैं?'' जीने का अर्थ क्या केवल कैलकुलेटर के बटन दबाने की तरह है जहां एक और एक मिलकर दो होते हैं, फिर एक और एक ग्यारह करने वाले लोग भी तो हैंहमारे सरोकार यदि व्यापक नहीं हैं तो ..... और व्यापकता की सीमा क्या है? फिर सीमाएं...।''

''बकवास है...।'' उसी अजनबी की आवाज।

किसी ने सही कहा है कि कुछ बातें फालतू होती हैंअचानक तपन का चेहरा याद आ गया और फिर जन्मेजय की मौतमुझे लगा कि जन्मेजय की मौत पर मेरी प्रतिक्रिया से तपन को मायूसी हुई हैवो चाहता था कि मैं कुछ कहूं, कुछ और कहूंपर क्या? अब कहा या किया ही क्या जा सकता था मैं न तो अपने व्यक्तिगत मामलों पे किसी से बात करता हूं और न ही दूसरों के मामलों में हस्तक्षेपयदि कोई दूसरा ऐसा करता है तो मुझे पसन्द नहींजन्मेजय की मौत उसका नितान्त व्यक्तिगत मामला था और ऐसे में तपन मुझसे किस तरह की प्रतिक्रिया की अपेक्षा करता है, मैं समझ नहीं पाया

''दुःख नहीं हुआ जन्मेजय की मौत का...?''
''
नहींअब कोई वजह भी तो होनी चाहिये।''
''
इंसानियत के नाते भी नहीं...।''
''दुःख तो नहीं पर अफसोस अवश्य है।''
''
किस बात का...?''
''
यही कि वो एक भला अदमी था और उसे अभी और जीना चाहिये था।''
''
बकवास है...।''
''
बकवास क्या है?''

''मैं जन्मेजय को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता। लेकिन हर ऐसी मृत्यु के पीछे दुनिया से छूट कर अलग रह जाने की विडम्बना ही होती है। क्यों इतना आत्मकेंद्रित हो गया है जीवन...।हर आदमी...।अपनी जिन्दगी टुकडे टुकडे क़र के, उसे अपनी जेबों में भर के कोई भला कितने दिन जी सकता है। जन्मेजय की मौत के जिम्मेदार सब हैं और खुद जन्मेजय भी।''

लगा कि कोई सर्द आवाज झुरझरी बनकर रीढ क़ी हड्डी में उतर गयी होमुझे अपने कानों में सूंऽऽऽऽ की आवाज स्पष्ट सुनायी दे रही थीमन हुआ कि पकड क़र जान से मार दूंपर किसे?

शायद जन्मेजय ने भी यही सोचा होगा

अंशुमान अवस्थी
ग्राफिक्स पूर्णिमा वर्मन

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