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मन एक आईना

बहुत उलझाती है‚ ये उम्र। गुलाबों‚ चॉकलेट्स और गीतों की ही होती ये उम्र तो चिन्ता क्या थी? ये उम्र है‚ भविष्य के उस पार चमकती ज़िन्दगी की झील तक पहुँचने के लिये पहाड़ों को लांघने की। बहुत सारी पढ़ाई और मेहनत की। आखिर सारे जीवन की बुनियाद भी तो है ये उम्र‚ उस पर दिक्कत यह कि हज़ारों–हज़ार खुलते रास्ते और भटकाने को मृगमरीचिकाएं‚ कई कई आकर्षण। बहुत कठिन है समझ पाना कि सही क्या है और गलत क्या है।
ऐसे में आँखों पर ये चश्मा और कि मम्मी–पापा ओल्ड फैशन्ड हैं‚ टीचर्स फालतू उपदेश देते हैं। बस यही चश्मा उतार लें‚ और धीरज से मम्मी–पापा और टीचर्स की बातें सुन लें तो‚ उन्हीं बातों में कई बातें हमारी उलझनें सुलझा सकती हैं।
कभी–कभी हमें अपनी मर्जी से जीने की बस ज़िद सी हो जाती है। ऐसे में अगर हम खुलकर अपना पक्ष मम्मी–पापा के सामने रखें‚ और अपनी सेफ्टी का ख्याल रखने का विश्वास दिलाएं तो वो हमें पूरी स्वतन्त्रता दे देंगे। ऐसे में तनातनी और झगड़े की गुंजाईश खत्म।
नए फैशन अगर परिवेश का ज़रा सा ध्यान रख कर अपनाएं तो मम्मी से आपको फायदा ही होगा‚ बस अगर वो चाहती हैं कि रिश्तेदारों के घर मिनीज़ न पहन कर शलवार कुरता पहन लो तो क्या हर्ज़ है? अच्छी स्टाइल में हो तो शलवार कुर्ता भी ट्रेण्डी हैं। बस में‚ या पब्लिक प्लेसेज़ पर अगर मिनी पहनने से मना करती हैं मम्मी तो वह हमारी सुरक्षा की चिन्ता ही करती हैं। जिस तरह से‚ अपराध बढ़ रहे हैं‚ उनसे बड़ों की ये सीख हमें बचाती ही है। बुरी आदतों वाले दोस्तों से दूर रहने की सलाह भी तो गलत नहीं।
कितना वक्त लगता है‚ किसी की बातों में आने में हम टीनएजर्स को? ड्रग्स‚ स्मोकिंग‚ फास्ट ड्राइविंग‚ डेटिंग के नाम पर सेक्स…कितनी ही चीज़े हैं जो आपका भविष्य खराब कर सकती हैं‚और जो दिल के आईने में हमने अपनी ज़िन्दगी की जो खूबसूरत तस्वीर देखी है उसे धुंधला कर सकती हैं। हम नए नवेले किसलय सोच भी कैसे सकते हैं बिना आधार के आगे बढ़ पाने को?
फिर भी उलझनें बहुत हैं‚ जिन्हें हम मम्मी–पापा से डिसकस करते घबराते हैं। क्योंकि वे कह देते हैं ''तुम अभी छोटे हो। यह सब जानने के लिए।'' और जब बच्चों जैसा बिहेव करें तो'' अब तुम बड़े हो गए हो‚ बचकाना व्यवहार मत करो।''

बस यही बात बुरी लगती है बड़ों की। यही तो मुश्किल है कि‚ ''न हम छोटे हैं न बड़े।''

– गरिमा
 

 
 

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