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प्रेम स्मृति

किस तरह से याद कर
मुझको
रोओगी तुम प्रिये?
था साथ अपना ये पुराना
अश्रु श्रृंगार दोगी उसे?
मैं न जब रहूँगा इस तन में
मन में रहूँगा, मैं तुम्हारे.
दिवा स्वप्नों के झुरमुटों में
लहराउंगा बन लौ दीप में
रागिनी बजती रहेगी रातभर.
स्मृतियों सी मिलन में
कुछ न खोने का विश्वास
देती रहेंगी वो विरह में.
भूलना कितना कठिन है
प्रेम को बैरी जगत में
छोड जाता साथ कोई,
कुछ न रहता, हाय! वश में.
इतने पलों का लम्बा सफर
तुमने मेरे साथ झेला
कितनी बडी थीं मुश्किलें पर
न दूर तुमने मुझको ठेला
मैं भ्रमर था उद्यान का
तुम कलिका गुलाब की.
सुरभित पवन था श्वास मेरा
मैं तुम्हारे पास था.
सहे जितने दिन वह हमने
दूर रह कर इस जगत में
व्यर्थ वे पल भी न निकले
गीत बने, उठ कर हृदय से.
मैं पास रहता हूँ तुम्हारे
सदा से ही सर्वदा
प्राणप्यारी, ओ सुकुमारी
जान लो मेरी व्यथा.

- लावण्या शाह
जनवरी 6, 2002
 

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